Sunday, 23 June 2024

मानव योनि एक विकसित योनि है । मैं इसे सात प्रकार में बांटता हुंँ सबसे पहले , तब समझेगें।1. परमात्म केंद्रित ( GOD Centric ) Suprime soul.2. आत्म केन्द्रित ( Soul Centric )3. मन केंद्रित ( Self Centric )4. परिवार केंद्रित ( Family Centric)5. समाज केंद्रित ( Society Centric )6. संप्रदाय केंद्रित ( community centric )7. विश्व केंद्रित। ( Universe centric )

मेरा यह पोस्ट आध्यात्मिक्ता से तटस्थ लेख है जिसमें भौतिक , अभौतिक दोनों का समावेश है  । है तो यह श्री महाराज जी द्वारा दिया दृष्टि के प्रभाव का हीं फल । पर उनके अनुयायियों से एक प्रार्थना है कि इस लेख को केवल एक लेख और बिचार के समझ से पढ़े और देखें। 
और अपना स्वतंत्र बिचार बिना किसी पुर्वाग्रह के रख सकतें बिना भेद भाव‌ राग और द्वेष के  , इसमें किसी से राग और द्वेष की भावना नहीं है । बस एक चिंतन है ।

मानव योनि एक विकसित योनि है । मैं इसे सात प्रकार में बांटता हुंँ सबसे पहले , तब समझेगें।
1. परमात्म केंद्रित ( GOD Centric ) Suprime soul.
2. आत्म  केन्द्रित ( Soul Centric )
3. मन केंद्रित       ( Self Centric )
4. परिवार केंद्रित ( Family Centric)
5. समाज केंद्रित ( Society Centric )
6. संप्रदाय केंद्रित ( community centric )
7. विश्व केंद्रित।    ( Universe centric ) 

१. God centric - इसमें वो महान जीव है जो भगवान को पुर्ण निष्काम भाव से प्रेम करतें हैं । ऐसे जीव पराकाष्ठा का भगवद् प्रेमी होतें हैं । यहां तक की वो भगवान या अपने गुरु से इतना प्यार करतें हैं कि भगवान या गुरू की इच्छा हीं उनकी इच्छा हैं । वो दर्शन दें नहीं दें , बदले में प्यार करें या न करें , कोई अपनी कामना नहीं इनको । आध्यात्मिक कामना भी नहीं , भौतिक की तो बात हीं नहीं । ए पुर्ण निष्काम मनुष्य अति दुर्लभ भगवद् अवस्था का प्रतिरूप होतें हैं । परमात्म प्रेम भाव में लीन भीतर से । दुनियां से या किसी से कोई लेना देना नहीं , विल्कूल स्थित प्रज्ञ । भौतिक शरीर , भौतिक संसार में होते हुए भी निर्विकल्प , ना शरीर का भान न ‌संसार का ना अपने आत्मा का । पुर्णपरमहंसावस्था। अद्वैत अवस्था में हरि स्वरूप होते हैं । और जन हित हेतु द्वैत भाव से अपने भगवद् स्वरूप में स्थित होते हुए विश्व के सभी जीवों के आत्मिक कल्याण हेतु शरीर धारण करतें हैं । 

२. Soul centric - ऐसे मनुष्य आत्म केन्द्रित वाले सकाम भक्त होतें हैं । इनको अपने आत्मा का प्रैक्टिकल अनुभूति , आत्म साक्षात्कार  या आत्मा का ज्ञान हो  गया होता है । आत्माराम होतें हैं पर ए पूर्ण निष्काम नहीं होतें हैं । हां भौतिक बस्तुओं की कामना इनको नहीं होती , ये भौतिक शरीर और संसार को एक साधन समझ कर इसका ख्याल रखतें हैं । अपने संसार का सदुपयोग भर बस ।  ए भगवद्‌प्रेम चाहतें हैं यही लक्ष्य होता है । आत्मा से परमात्मा के प्रेम को महसुस करना , उनको देखने , सुनने , बातें करने , आलिंगन करने , रस रूप का स्वाद और सुगंध की कामना होती है । ये भक्त होतें हैं । अपने ईष्ट व गुरू से अटूट और अनन्य प्रेम करतें हैं । 

३. Mind centric ( self centric ) ऐसे जीव भगवान और गुरू से अपने आध्यात्मिक प्यास के साथ साथ भौतिक प्यास के पूर्ति की भी  कामना रखतें हैं । यानि केवल मैं और मेरा तु । लेकिन पहले मैं तब तु। इनका ध्येय वाक्य है - पहले आत्मा यानि मन तब परमात्मा, ऐसा सोचते हैं   । ए मन को हीं आत्मा समझते हैं ।
भौतिक कामना की पूर्ति में व्यवधान आया तो प्यार खत्म , जिस मात्रा में भौतिक कामना की पूर्ति हुई उतना प्यार छलक गया । प्यार का उतार चढ़ाव अपने संसारिक इच्छा के पूर्ति के हिसाब से । तो ऐसे लोग आध्यात्म से और भौतिक संसार दोनों से तटस्थ होतें हैं लेकिन खुद के लिए केवल । खुद को खुद से प्यार है और भगवान से भी प्यार है पर स्व हित के लिए । पुर्ण स्वार्थी , ए भगवान, महापुरूष ,संसार , संसारिक रिस्तों  का यानि परिवार , दोस्त , मां बाप , भाई बहन  ,‌बेटा वेटी यानि सभी resources का इस्तेमाल खुद के संतुष्टी के लिए करतें हैं । यह खुद का भक्त होतें हैं । 
भगवान का कभी नहीं । हां भ्रम है इनको की हम भगवान का भक्ति करतें हैं , भक्त हैं पर यह सिर्फ भ्रम है ।
इनके लिए मन हीं देवता , मन हीं ईश्वर , इससे बड़ा ना‌ कोई । इनको बहुत अहंकार होता है। जरा सा बात बर्दास्त नहीं अपने मन के खिलाप । 

४. Family centric - परिवार केंद्रित , ऐसे जीवों के लिए खुद के priority के साथ परिवार का भी priority है । तो ऐसे लोग खुद और अपने परिवार तक सिमित होतें हैं । और इसी हित के लिए भगवान को पुजते है ( इनको भी भक्त नहीं कह सकते हैं ) ए पुर्णत: स:स्वार्थी होतें हैं । समाज रहे या नहीं, मैं और मेरा परिवार, जिसमें बहुत अगर है तो मां वाप को भी शामिल कर लिया नहीं तो‌ केवल मैं मेरा पति हैं मेरी पत्नी और मेरा बच्चा है  बस इससे आगे कुछ नहीं । वांकी सब नाते , रिस्तेदार साधन है इनके लिए । जरूरत परे मां बाप को भगवान , भाई को भगवान , बहन को देवी स्वार्थ बस और गद्हा को भी बाप बना लेतें हैं ।  कोई कोई अपवाद स्वरूप मां वाप भाई से , बहन से प्रेम पर १००% निष्काम नहीं और अपने अहंकार का चरम और उसकी तूष्टि से मतलव है । आप सही वोले तो विरोध गलत बोले तो विरोध । इनका आरती उतारिए , ऐ खुश । कल भुल गए आपका विरोध । ऐसे को समझना और संतुष्ट करना असंभव है । कब किस बात पर नाराज़ हो जाए आपको बताऐंगें भी नहीं । बस खफा । 

५. Society centric - ऐ समाज सेवी होतें हैं । मानव‌मात्र , जीव मात्र के लिय दयालु  ,‌ लेकिन  अपने समाज तक केंद्रित होतें हैं । समाज सेवा के बदले यश , सम्मान आदर चाहिए होता है । नाम भी चाहिए होता है । ऐसे लोगों से समाज चलता है । देश सेवी भी इसी में है। 

६. Community centric ( संप्रदाय विशेष केंद्रित ) ऐ लोग कट्टर होतें हैं , अपने संप्रदाय विशेष को मानने वाले और उसके लिए ही काम करने और लड़ने बोलने बाले। ए लोग सभी चीजों का इस्तेमाल अपने संप्रदाय के अहंकार को तुष्ट करने के लिए करतें हैं । चाहे धर्म ग्रंथ हो या भगवान , जय श्री राम हो या जय शंकर या जय हनुमान या अल्लाह हो या अकबर‌ खुदा हो या कुरान  , ईश्वर जीसस हो या खुदा , भौतिक रिसोर्स हो या आध्यात्मिक । पर सब अपने संप्रदाईक अहंकार की पूर्ति के लिए । एक दूसरे को निचा दिखाना और खुद को ऊंचा साबित करने का प्रयास करना ,  यह विशेषता होती है इन लोंगों की । इनको लगता है कि दुनिया में 12 आना अक्ल सिर्फ मेरे पास है और 4 आने में पुरी दुनियां है । 

७. Universe centric ( विश्व केंद्रित ) ऐसे लोग संसार में महान होतें हैं यह जाति पांति , धर्म , संप्रदाय , चर अचर से उपर उठकर सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय कि चिंता और प्रयास करने वाले होतें हैं । "बसुधैव कुटूंबकं"
ऐसे जीव महात्मा भी होतें हैं और समग्र जीवों के भौतिक कल्याण की भावना वाले होतें हैं , इनका मुख्य ध्यये होता है अपने भौतिक आवश्यकता को कम करो और प्रकृति से तटस्थ होकर जियो । जो आजकल बहुत कम है इस भोगवादी युग में । भगवान ऐसे लोगों को अपना माध्यम बना कर जग कल्याण का काम करतें हैं । ए संत की भांति संसार के जीवों के प्रति निष्काम भाव से समर्पित होते हैं , इनको नाम और बदनामी की कोई चिंता नहीं । बस इनमें सेवा का लक्ष्य सर्वोपरि होता है । 

तो पहला तो अति उत्तम पर्सनैलिटी है । दुसरा उत्तमतर है और सातवां उत्तम पर्सनैलिटी है, पांचवां  ठीक हीं है । 
अत: हमको इन चार प्रकार से हीं मतलव रखना चाहिए ।‌ 

( मेरा यह लेख एक भुमिका है आगे के संसारिक लेख के लिए , उस लेख में इनका इस्तेमाल  होगा आगे  ) 
श्री राधे ।

Sunday, 2 June 2024

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय"-कबीर ।आज कल कबीरदास जी के इस दोहे का दुरूप्योग अक्सर तकिया कलाम के जैसे करते हुए बहुत से तथाकथित विद्वान और भोले भाले लोगों को सुन रहें हैं आप सब । जरूरी है इन बातों को समझना पहले श्री महाराज जी द्वारा ।

श्री महाराज जी द्वारा इस दोहे की व्यवहारिक व्याख्या -
"निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय"-कबीर ।

आज कल कबीरदास जी के इस दोहे का दुरूप्योग अक्सर तकिया कलाम के जैसे करते हुए बहुत से तथाकथित विद्वान और भोले भाले लोगों को सुन रहें हैं आप सब । 
जरूरी है इन बातों को समझना पहले श्री महाराज जी द्वारा ।
मैंने श्री महाराज जी से एक पिकनिक के कार्यक्रम के दौरान एक व्यक्ति के इस दोहे के उपयोग संबधी मार्ग दर्शन सुना है । वो आपसे शेयर करता हुं । बहुत जरूरी है ।
श्री महाराज ने समझाएं हैं ( मैं अपने शब्दों में उनका दिशा निर्देश लिख रहा हुं ) कि कौन से निंदक को अपने आंगन में कुटी छवा कर रखने की सिफारिश कबीर दास करतें हैं तो यह उस दोहे में उन्होंने स्वयं लिखा है - कि जो आपको बिना‌ पानी और साबुन का निर्मल बना दे । आपके बिचारों को शुद्ध कर दे । आपको आपकी गलती बतलाकर आपको सही रास्ता दिखाएं और आपके हित का सोंचें , बिना राग द्वेष के आपका भला चाहे ।

अब ए जो आपका निंदक है जिसके लिए आपको उसका कुटी बनबाना है वो कैसा है ? यह समझना जरूरी है पहले आपके लिए ।
हां तो वो निंदक स्वयं शुद्ध होना चाहिए सबसे पहले , यानि जो स्वयं शुद्ध है , निर्मल है । जिसका मन बुद्धि निर्मल है , वहीं तो आपको भी शुद्ध करेगा ।

 जो खुद गंदा है , जिसका अंत:करण मलिन हैं , बुद्धि क्षूद्र है । मन गंदा है वो आपको तो और गंदा हीं करेगा । और ऐसा निंदक निंदक क्या होगा भला , एक क्षूद्र बुद्धि है तमाम बुराई है उसमें । वो क्या किसी को शुद्ध करेगा ? उससे तो दुर हीं रहना श्रेयकर है ।

निर्मल जल में हीं चेहरा साफ नजर आता है । कोई गंदा पानी में जाकर देखें तो चेहरा और गंदा नजर आएगा और आएगा भी नहीं ।
अतः ऐसा जीव जो निर्मल हो चुका हो या निर्मल है मिलेगा नहीं संत को महापुरुष को छोड़कर इस संसार में कलयुग है , सब गंदा है संत और महापुरूषों को छोड़ कर। 
तो कबीरदास ने ऐसे संत और महापुरूषों को जो स्वयं निर्मल है और आपको आपके गलती को सुधारने के लिए आपके सामने रखता है , तो ऐसे निंदक को अपने घर में कुटी छवा कर यानी उसका संग करने के लिए कबीरदास ने कहा है । वो किसी गंदे जीव को मत रख लिजिएगा आंगन में कुटी बनवाकर, वो तो कुसंग का माध्यम बनेगा , खुद गंदा है तो भला आपको तो और गंदा हीं करेगा । 

आजकल लोग बोल देतें ए दोहे दुसरे की निंदा करतें हैं और अपने बचाव के लिए ऐसा ज्ञान दे देतें हैं । इन लोगों से बच करके रहें । श्री राधे ।