सनातन वैदिक धर्म का अल्टीमेट संविधान चार वेदों में "कुंभ मेला या कुंभ स्नान " का जिक्र कही नहीं है । वेदों में कुंभ शब्द का प्रयोग घट यानी घड़ा के लिए आया है , न कि कुंभ मेले तथा स्नान के लिए ।
ऐसा माना जाता है कि कुंभ स्नान कि शुरुआत आदि जगद्गुरू श्री शंकराचार्य के द्वारा चेतना के उच्चतम स्तर को प्राप्त जीवों के लिए किया गया था।
चेतना के उच्चतम स्तर को प्राप्त योगभ्रष्ट व्यक्ति, साधन चातुष्ट्य संपन्नता हेतु अपनी अध्यात्मिक साधना के लिए पहाड़ , जंगल , नदी आदि को अपने साधना और सिद्धि के लिए अनुकूल मानते हैं । इसलिए आदि जगद्गुरू शंकाराचार्य ने इस मेले की शुरुआत की थी जो केवल वैरागी साधुओं के लिए थी । वैरागी वो साधु जो चेतना, चरित्र के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुके थे, ऐसे लोग अपने मन को अष्टांग योग तथा साधन चातुष्टय के बल पर शूद्ध कर चुके हो या करने कि प्रक्रिया में हो, तो ऐसे साधन चातुष्ट्य संपन्न योगभ्रष्ट जीव अपने अनुगत शिष्यों को साधना कराने के लिए त्रिवेणी घाट पर लेकर आते थे और वहां अष्टांग योग कि साधना आदि करते थे ।
बाद में ढोंगी आडंबरी , पाखंडियों और अंधविश्वासियों ने इसे अपना लिया , इनका नकल करने लगा और व्यापारियों द्वारा इसका बाजारीकरण हो गया ।
आम आदमी को इस कुंभ मेले से कोई लाभ नहीं होता । उल्टा नुकसान ही होता है ।
मानविए चेतना तथा चरित्र के निम्न स्तर का लोग जो जूआ , मांस , मदिरा , नशा, ड्रग आदि का सेवन करते हैं ठगी , चोरी , धोखाधरी , अत्याचार , दुराचार , पापाचार व्यभिचार आदि में लगे रहते हैं उनके लिए ज्ञान , ध्यान, साधना, पुण्य, भगवान की सेवा , भक्ति और मौक्ष असंभव है हमारे वेदों के अनुसार , ऐसे लोग अनाधिकारी माने जाते हैं शास्त्रों के सिद्धांतों के अनुसार। क्योंकि ये सब महापाप के केटेगरी में रखा गया है शास्त्रों में । इस तरह के पाप को करने वाले जीव का अंत:करण अत्यंत गंदा होता है । ऐसे लोगों का अन्नमयकोष दुषित होता है , अन्नमयकोष दूषित होने के कारण ऐसे लोगों का मनोमय कोष और बिचार दोनों प्रदूषित होते हैं । मन में गंदे गंदे विचार उत्पन्न होते हैं, मन अशांत तथा खिन्न रहता है , क्या अच्छा है क्या बुरा है इनके समझ में नहीं आता है ।
इसलिए सही शिक्षा देने वाले का ऐसे लोग विरोध करते हैं काटने दौड़ते हैं , अपने चाल चारित्र तथा कुकर्म को सही ठहराने के लिए ऐसे असुर प्रवृत्ति के लोग वास्तविक धर्म को नहीं समझते । असुरों को अत्याचार , दुसरे को गाली देना , मारना सताना , ढोंग , पाखंड आडंबर तथा अंधविश्वास के सहारे अपना जीवन जीने की प्रवृत्ति होती है ।
अमृत के घड़े को असुर लेकर भागे थे लेकिन उसका कल्याण नहीं हुआ । वो और भी उग्र हो गय और देवाताओ से युद्ध किया ।
राक्षसी बिचार धारा , आसुरी बिचारधारा वाले जीव तमोगुणी होते हैं , उनपर अमृत के गुणों का उल्टा असर होता है । उदंड लोग किसी विषय और बस्तू का हमेशा ही दूरूपयोग किया है और करता रहेगा ।
ऐसे राक्षसी सोच वाले जीव को सात्विक बातें, धर्म का असली अर्थ नही समझ में आता कभी । ऐ लोग ढोंग पाखंड , आडंबर तथा अंधविश्वास को ही मुर्खता के कारण धर्म समझते हैं ।
तो ये कुंभ स्नान केवल उन सतोगुणी जीवों के लिए आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने कि थी जो योगभ्रष्ट हो चुके थे तथा चेतना के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुके थे । पहले से जिनका मन शूद्ध हो चुका था ऐसे लोग मौक्ष कि कामना से कर्म कांड और साधना के लिए त्रिवेणी को चुना था जो आगे चलकर परंपरा का रूप ले लिया और ढोंग , पाखंड , आडंबर तथा अंधविश्वासियों का अड्डा बन गया ।
अत: आम लोगो को सिद्ध संत , महापुरुषों का नकल नहीं करना चाहिए कभी । नहीं तो यह दैविक प्रकोप का कारण बनता है और दैविक दुख के सीवा और कुछ प्राप्त नहीं होता इन सब से ।
कल कुंभ मेले में इसी दैविक प्रकोप के कारण सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों लोग अपना का टांग हाथ फसली और गर्दन तुड़वाकर होस्पीटल में हैं , अपाहिज हो चुके हैं , जो दैविक प्रकोप का एक ताजा उदाहरण है आज 29 जनवरी 2025 का ।