Wednesday, 28 April 2021

वेद-के बारे में महत्वपूर्ण ज्ञान :-

वेद-के बारे में महत्वपूर्ण ज्ञान :-

प्र.1- वेद किसे कहते है ?
उत्तर- ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है। भगवान की आप्त वाणी को वेद कहते हैं । 

प्र.2- वेद-ज्ञान किसने दिया ?
उत्तर- ईश्वर ने दिया।

प्र.3- ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ?
उत्तर- ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया।

प्र.4- ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ?
उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण के लिए।

प्र.5- वेद कितने है ?
उत्तर- चार ।                                                  
1-ऋग्वेद 
2-यजुर्वेद  
3-सामवेद
4-अथर्ववेद

प्र.6- वेदों के ब्राह्मण ।
        वेद ब्राह्मण
1 - ऋग्वेद - ऐतरेय
2 - यजुर्वेद - शतपथ
3 - सामवेद - तांड्य
4 - अथर्ववेद - गोपथ

प्र.7- वेदों के उपवेद कितने है।
उत्तर - चार।
      वेद उपवेद
    1- ऋग्वेद - आयुर्वेद
    2- यजुर्वेद - धनुर्वेद
    3 -सामवेद - गंधर्ववेद
    4- अथर्ववेद - अर्थवेद

प्र 8- वेदों के अंग हैं ।
उत्तर - छः ।
1 - शिक्षा
2 - कल्प
3 - निरूक्त
4 - व्याकरण
5 - छंद
6 - ज्योतिष

प्र.9- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन किन ऋषियो को दिया ?
उत्तर- चार ऋषियों को।
         वेद ऋषि
1- ऋग्वेद - अग्नि
2 - यजुर्वेद - वायु
3 - सामवेद - आदित्य
4 - अथर्ववेद - अंगिरा

प्र.10- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ?
उत्तर- समाधि की अवस्था में।

प्र.11- वेदों में कैसे ज्ञान है ?
उत्तर- सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान। वेद चराचर जगत का ईश्वर प्रदत एक मात्र संविधान है । इसके आधिन समुचा ब्रह्मांड और तमाम जीव जगत है । सब पर यह लागु है और प्रलय कल तक लागु रहेगा ।

प्र.12- वेदो के विषय कौन-कौन से हैं ?
उत्तर- चार ।
        ऋषि विषय
1- ऋग्वेद - ज्ञान
2- यजुर्वेद - कर्म
3- सामवेद - उपासना व भक्ति
4- अथर्ववेद - विज्ञान

प्र.13- वेदों में।

ऋग्वेद में।
1- मंडल - 10
2 - अष्टक - 08
3 - सूक्त - 1028
4 - अनुवाक - 85 
5 - ऋचाएं - 10589

यजुर्वेद में।
1- अध्याय - 40
2- मंत्र - 1975

सामवेद में।
1- आरचिक - 06
2 - अध्याय - 06
3- ऋचाएं - 1875

अथर्ववेद में।
1- कांड - 20
2- सूक्त - 731
3 - मंत्र - 5977
          
प्र.14- वेद पढ़ने का अधिकार किसको है ? उत्तर- भगवद् प्राप्त संतों , महापुरूषों को वेद पढ़ने , पढ़ाने और समझाने का अधिकार है, असंत और साधारण मनुष्य उसको पढ़के गलत अर्थ हीं करेगा जो विनाशकारी है ।

प्र.15- क्या वेदों में मूर्तिपूजा का विधान है ?
उत्तर- नहीं है उनके लिए जो भगवद् प्राप्त कर चुके हैं और उच्च कोटी के ऋषि-मुनि हैं संत हैं जिनको भगवान का दर्शन हटात् और साक्षात होता रहता है , पर सधारण मनुष्यों के लिए वेद में यह स्पष्ट है कि वो सगुण साकार भगवान की मुर्ती का सहारा लेकर उसमें भगवद् भावना करके अपना कल्याण कर सकता है ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है , वेद कण कण में भगवान की उपस्थिति को मानता है इसलिए भगवान का उपासक मुर्ति में भी अपने इष्ट की उपस्थिति को मानता है जो सत्य है ,वेद सम्मत है ।

प्र.16- क्या वेदों में अवतारवाद का प्रमाण है ?
उत्तर- नहीं है कारण यह अलौकिक ग्रंथ है , पुराणों में, उपनिषदों में अवतार का प्रमाण है जो वेद का हीं अंग है।

प्र.17- सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ?
उत्तर- ऋग्वेद।

प्र.18- वेदों की उत्पत्ति कब हुई ?
उत्तर- वेदो की उत्पत्ति सृष्टि के आदि से परमात्मा द्वारा हुई । अर्थात 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 43 हजार वर्ष पूर्व । 

प्र.19- वेद-ज्ञान के सहायक दर्शन-शास्त्र ( उपअंग ) कितने हैं और उनके लेखकों का क्या नाम है ?
उत्तर- 
1- न्याय दर्शन - गौतम मुनि।
2- वैशेषिक दर्शन - कणाद मुनि।
3- योगदर्शन - पतंजलि मुनि।
4- मीमांसा दर्शन - जैमिनी मुनि।
5- सांख्य दर्शन - कपिल मुनि।
6- वेदांत दर्शन - व्यास मुनि।

प्र.20- शास्त्रों के विषय क्या है ?
उत्तर- आत्मा, परमात्मा, प्रकृति, जगत की उत्पत्ति, मुक्ति अर्थात सब प्रकार का भौतिक व आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान आदि।

प्र.21- प्रामाणिक उपनिषदे कितनी है ?
उत्तर- केवल ग्यारह।

प्र.22- उपनिषदों के नाम बतावे ?
उत्तर-  
01-ईश ( ईशावास्य )  
02-केन  
03-कठ  
04-प्रश्न  
05-मुंडक  
06-मांडू  
07-ऐतरेय  
08-तैत्तिरीय 
09-छांदोग्य 
10-वृहदारण्यक 
11-श्वेताश्वतर ।

प्र.23- उपनिषदों के विषय कहाँ से लिए गए है ?
उत्तर- वेदों से।
प्र.24- चार वर्ण।
उत्तर- 
1- ब्राह्मण
2- क्षत्रिय
3- वैश्य
4- शूद्र

प्र.25- चार युग।
1- सतयुग - 17,28000 वर्षों का नाम ( सतयुग ) रखा है।
2- त्रेतायुग- 12,96000 वर्षों का नाम ( त्रेतायुग ) रखा है।
3- द्वापरयुग- 8,64000 वर्षों का नाम है।
4- कलयुग- 4,32000 वर्षों का नाम है।
कलयुग के 4,976 वर्षों का भोग हो चुका है अभी तक।
4,27024 वर्षों का भोग होना है। 

पंच महायज्ञ
       1- ब्रह्मयज्ञ   
       2- देवयज्ञ
       3- पितृयज्ञ
       4- बलिवैश्वदेवयज्ञ
       5- अतिथियज्ञ
   
स्वर्ग - जहाँ सुख है, पर यह सुख माईक है । स्वर्ग भी मायाधिन है , । 
नरक - जहाँ दुःख हीं दु:ख है।.

प्र.26 पुराणों की संख्या कितनी है ?
ऊ- पुराणों की संख्या 18 है ।

प्र. 27 पुराणों के नाम ? 

उत्तर - ब्रह्म पुराण
पद्म पुराण
विष्णु पुराण -- (उत्तर भाग - विष्णुधर्मोत्तर)
वायु पुराण -- (भिन्न मत से - शिव पुराण)
भागवत पुराण -- (भिन्न मत से - देवीभागवत पुराण)
नारद पुराण
मार्कण्डेय पुराण
अग्नि पुराण
भविष्य पुराण
ब्रह्मवैवर्त पुराण
लिङ्ग पुराण
वाराह पुराण
स्कन्द पुराण
वामन पुराण
कूर्म पुराण
मत्स्य पुराण
गरुड पुराण
ब्रह्माण्ड पुराण

प्र28- उप पुराणो की संख्या कितनी है ? 
ऊ- उप पुराणो की संख्या 24 है ? 

प्र 29- उप-पुराणों के नाम ? 

ऊ- आदि पुराण (सनत्कुमार द्वारा कथित)
नरसिंह पुराण
नन्दिपुराण (कुमार द्वारा कथित)
शिवधर्म पुराण
आश्चर्य पुराण (दुर्वासा द्वारा कथित)
नारदीय पुराण (नारद द्वारा कथित)
कपिल पुराण
मानव पुराण
उशना पुराण (उशनस्)
ब्रह्माण्ड पुराण
वरुण पुराण
कालिका पुराण
माहेश्वर पुराण
साम्ब पुराण
सौर पुराण
पाराशर पुराण (पराशरोक्त)
मारीच पुराण
भार्गव पुराण
विष्णुधर्म पुराण
बृहद्धर्म पुराण
गणेश पुराण
मुद्गल पुराण
एकाम्र पुराण
दत्त पुराण

प्र30- पुराणों में श्लोकों की संख्या ? 
ऊ- 
पुराण श्लोकों की संख्या
ब्रह्मपुराण- १४०००
पद्मपुराण -५५०००
विष्णुपुराण -तेइस हजार
शिवपुराण -चौबीस हजार
श्रीमद्भावतपुराण -अठारह हजार
नारदपुराण -पच्चीस हजार
मार्कण्डेयपुराण -नौ हजार
अग्निपुराण- पन्द्रह हजार
भविष्यपुराण- चौदह हजार पाँच सौ
ब्रह्मवैवर्तपुराण -अठारह हजार
लिंगपुराण ग्यारह हजार
वाराहपुराण- चौबीस हजार
स्कन्धपुराण -इक्यासी हजार एक सौ
वामनपुराण -दस हजार
कूर्मपुराण -सत्रह हजार
मत्सयपुराण- चौदह हजार
गरुड़पुराण- उन्नीस हजार
ब्रह्माण्डपुराण- बारह हजार

प्र31-पुराणों के नाम और उनका महत्त्व संपादित करें ?

उत्तर - १८ पुराण के नाम और उनका महत्त्व संपादित करें
(१) ब्रह्मपुराण : इसे “आदिपुराण” भी का जाता है। प्राचीन माने गए सभी पुराणों में इसका उल्लेख है। इसमें श्लोकों की संख्या अलग- २ प्रमाणों से भिन्न-भिन्न है। १०,०००…१२.००० और १३,७८७ ये विभिन्न संख्याएँ मिलती है। इसका प्रवचन नैमिषारण्य में लोमहर्षण ऋषि ने किया था। इसमें सृष्टि, मनु की उत्पत्ति, उनके वंश का वर्णन, देवों और प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन है। इस पुराण में विभिन्न तीर्थों का विस्तार से वर्णन है। इसमें कुल २४५ अध्याय हैं। इसका एक परिशिष्ट सौर उपपुराण भी है, जिसमें उडिसा के कोणार्क मन्दिर का वर्णन है।

(२) पद्मपुराण : इसमें कुल ६४१ अध्याय और ४८,००० श्लोक हैं। मत्स्यपुराण के अनुसार इसमें ५५,००० और ब्रह्मपुराण के अनुसार इसमें ५९,००० श्लोक थे। इसमें कुल खण़्ड हैं—(क) सृष्टिखण्ड : ५ पर्व, (ख) भूमिखण्ड, (ग) स्वर्गखण्ड, (घ) पातालखण्ड और (ङ) उत्तरखण्ड। इसका प्रवचन नैमिषारण्य में सूत उग्रश्रवा ने किया था। ये लोमहर्षण के पुत्र थे। इस पुराण में अनेक विषयों के साथ विष्णुभक्ति के अनेक पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। 

(३) विष्णुपुराण : पुराण के पाँचों लक्षण इसमें घटते हैं। इसमें विष्णु को परम देवता के रूप में निरूपित किया गया है। इसमें कुल छः खण्ड हैं, १२६ अध्याय, श्लोक २३,००० या २४,००० या ६,००० हैं। इस पुराण के प्रवक्ता पराशर ऋषि और श्रोता मैत्रेय हैं।

(४) वायुपुराण : इसमें विशेषकर शिव का वर्णन किया गया है, अतः इस कारण इसे “शिवपुराण” भी कहा जाता है। एक शिवपुराण पृथक् भी है। इसमें ११२ अध्याय, ११,००० श्लोक हैं। इस पुराण का प्रचलन मगध-क्षेत्र में बहुत था। इसमें गया-माहात्म्य है। इसमें कुल चार भाग है : (क) प्रक्रियापाद – (अध्याय—१-६), (ख) उपोद्घात : (अध्याय-७ –६४ ), (ग) अनुषङ्गपादः–(अध्याय—६५–९९), (घ) उपसंहारपादः–(अध्याय—१००-११२)। इसमें सृष्टिक्रम, भूगो, खगोल, युगों, ऋषियों तथा तीर्थों का वर्णन एवं राजवंशों, ऋषिवंशों,, वेद की शाखाओं, संगीतशास्त्र और शिवभक्ति का विस्तृत निरूपण है। इसमें भी पुराण के पञ्चलक्षण मिलते हैं।

(५) भागवतपुराण : यह सर्वाधिक प्रचलित पुराण है। इस पुराण का सप्ताह-वाचन-पारायण भी होता है। इसे सभी दर्शनों का सार “निगमकल्पतरोर्गलितम्” और विद्वानों का परीक्षास्थल “विद्यावतां भागवते परीक्षा” माना जाता है। इसमें श्रीकृष्ण की भक्ति के बारे में बताया गया है। इसमें कुल १२ स्कन्ध, ३३५ अध्याय और १८,००० श्लोक हैं। कुछ विद्वान् इसे “देवीभागवतपुराण” भी कहते हैं, क्योंकि इसमें देवी (शक्ति) का विस्तृत वर्णन हैं। 

(६) नारद (बृहन्नारदीय) पुराण : इसे महापुराण भी कहा जाता है। इसमें पुराण के ५ लक्षण घटित नहीं होते हैं। इसमें वैष्णवों के उत्सवों और व्रतों का वर्णन है। इसमें २ खण्ड है : (क) पूर्व खण्ड में १२५ अध्याय और (ख) उत्तर-खण्ड में ८२ अध्याय हैं। इसमें १८,००० श्लोक हैं। इसके विषय मोक्ष, धर्म, नक्षत्र, एवं कल्प का निरूपण, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, गृहविचार, मन्त्रसिद्धि,, वर्णाश्रम-धर्म, श्राद्ध, प्रायश्चित्त आदि का वर्णन है।

(७) मार्कण्डयपुराण : इसे प्राचीनतम पुराण माना जाता है। इसमें इन्द्र, अग्नि, सूर्य आदि वैदिक देवताओं का वर्णन किया गया है। इसके प्रवक्ता मार्कण्डय ऋषि और श्रोता क्रौष्टुकि शिष्य हैं। इसमें १३८ अध्याय और ७,००० श्लोक हैं। इसमें गृहस्थ-धर्म, श्राद्ध, दिनचर्या, नित्यकर्म, व्रत, उत्सव, अनुसूया की पतिव्रता-कथा, योग, दुर्गा-माहात्म्य आदि विषयों का वर्णन है।

(८) अग्निपुराण : इसके प्रवक्ता अग्नि और श्रोता वसिष्ठ हैं। इसी कारण इसे अग्निपुराण कहा जाता है। इसे भारतीय संस्कृति और विद्याओं का महाकोश माना जाता है। इसमें इस समय ३८३ अध्याय, ११,५०० श्लोक हैं। इसमें विष्णु के अवतारों का वर्णन है। इसके अतिरिक्त शिवलिंग, दुर्गा, गणेश, सूर्य, प्राणप्रतिष्ठा आदि के अतिरिक्त भूगोल, गणित, फलित-ज्योतिष, विवाह, मृत्यु, शकुनविद्या, वास्तुविद्या, दिनचर्या, नीतिशास्त्र, युद्धविद्या, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, छन्द, काव्य, व्याकरण, कोशनिर्माण आदि नाना विषयों का वर्णन है।

(९) भविष्यपुराण : इसमें भविष्य की घटनाओं का वर्णन है। इसमें दो खण्ड हैः–(क) पूर्वार्धः–(अध्याय—४१) तथा (ख) उत्तरार्धः–(अध्याय़—१७१) । इसमें कुल १५,००० श्लोक हैं । इसमें कुल ५ पर्व हैः–(क) ब्राह्मपर्व, (ख) विष्णुपर्व, (ग) शिवपर्व, (घ) सूर्यपर्व तथा (ङ) प्रतिसर्गपर्व। इसमें मुख्यतः ब्राह्मण-धर्म, आचार, वर्णाश्रम-धर्म आदि विषयों का वर्णन है। 

(१०) ब्रह्मवैवर्तपुराण : यह वैष्णव पुराण है। इसमें श्रीकृष्ण के चरित्र का वर्णन किया गया है। इसमें कुल १८,००० श्लोक है और चार खण्ड हैं : (क) ब्रह्म, (ख) प्रकृति, (ग) गणेश तथा (घ) श्रीकृष्ण-जन्म।

(११) लिङ्गपुराण : इसमें शिव की उपासना का वर्णन है। इसमें शिव के २८ अवतारों की कथाएँ दी गईं हैं। इसमें ११,००० श्लोक और १६३ अध्याय हैं। इसे पूर्व और उत्तर नाम से दो भागों में विभाजित किया गया है। 

(१२) वराहपुराण : इसमें विष्णु के वराह-अवतार का वर्णन है। पाताललोक से पृथिवी का उद्धार करके वराह ने इस पुराण का प्रवचन किया था। इसमें २४,००० श्लोक सम्प्रति केवल ११,००० और २१७ अध्याय हैं।

(१३) स्कन्दपुराण : यह पुराण शिव के पुत्र स्कन्द (कार्तिकेय, सुब्रह्मण्य) के नाम पर है। यह सबसे बडा पुराण है। इसमें कुल ८१,००० श्लोक हैं। इसमें दो खण्ड हैं। इसमें छः संहिताएँ हैं—सनत्कुमार, सूत, शंकर, वैष्णव, ब्राह्म तथा सौर। सूतसंहिता पर माधवाचार्य ने “तात्पर्य-दीपिका” नामक विस्तृत टीका लिखी है। इस संहिता के अन्त में दो गीताएँ भी हैं—-ब्रह्मगीता (अध्याय—१२) और सूतगीताः–(अध्याय ८)। इस पुराण में सात खण्ड हैं—(क) माहेश्वर, (ख) वैष्णव, (ग) ब्रह्म, (घ) काशी, (ङ) अवन्ती, (रेवा), (च) नागर (ताप्ती) तथा (छ) प्रभास-खण्ड। काशीखण्ड में “गंगासहस्रनाम” स्तोत्र भी है। 

(१४) वामनपुराण : इसमें विष्णु के वामन-अवतार का वर्णन है। इसमें ९५ अध्याय और १०,००० श्लोक हैं। इसमें चार संहिताएँ हैं—(क) माहेश्वरी, (ख) भागवती, (ग) सौरी तथा (घ) गाणेश्वरी । 

(१५) कूर्मपुराण : इसमें विष्णु के कूर्म-अवतार का वर्णन किया गया है। इसमें चार संहिताएँ हैं—(क) ब्राह्मी, (ख) भागवती, (ग) सौरा तथा (घ) वैष्णवी । सम्प्रति केवल ब्राह्मी-संहिता ही मिलती है। इसमें ६,००० श्लोक हैं। इसके दो भाग हैं, जिसमें ५१ और ४४ अध्याय हैं। इसमें पुराण के पाँचों लक्षण मिलते हैं। इस पुराण में ईश्वरगीता और व्यासगीता भी है। 

(१६) मत्स्यपुराण : इसमें पुराण के पाँचों लक्षण घटित होते हैं। इसमें २९१ अध्याय और १४,००० श्लोक हैं। प्राचीन संस्करणों में १९,००० श्लोक मिलते हैं। इसमें जलप्रलय का वर्णन हैं। इसमें कलियुग के राजाओं की सूची दी गई है। 

(१७) गरुडपुराण : यह वैष्णवपुराण है। इसके प्रवक्ता विष्णु और श्रोता गरुड हैं, गरुड ने कश्यप को सुनाया था। इसमें विष्णुपूजा का वर्णन है। इसके दो खण्ड हैं, जिसमें पूर्वखण्ड में २२९ और उत्तरखण्ड में ३५ अध्याय और १८,००० श्लोक हैं। इसका पूर्वखण्ड विश्वकोशात्मक माना जाता है।

(१८) ब्रह्माण्डपुराण : इसमें १०९ अध्याय तथा १२,००० श्लोक है। इसमें चार पाद हैं—(क) प्रक्रिया, (ख) अनुषङ्ग, (ग) उपोद्घात तथा (घ) उपसंहार । 

Tuesday, 27 April 2021

Spare 2 minutes to read it please..

Spare 2 minutes to read it please..

One day, a very wealthy man was walking on the road. Along the way, he saw a beggar on the sidewalk. The rich man looks kindly on the beggar and asked, "How did you become a beggar? The beggar said, "Sir, I've been applying for a job for a year now but haven't found any. You look like a rich man. Sir, if you'll give me a job, I'll stop begging." The rich man smiled and said, "I want to help you. But I won't give you a job. I'll do something better. I want you to be my business partner. Let's start a business together. The beggar blinked hard. He didn't understand what the older man was saying. "What do you mean, Sir? "I own a rice plantation. You could sell my rice in the market. I'll provide you the sacks of rice. I'll pay the rent for the market stall.. All you'll have to do is sell my rice. And at the end of the month, as Business Partners, we'll share in the profits. Tears of joy rolled down his cheeks. "Oh Sir," he said, "you're a gift from Heaven. You're the answer to my prayers. Thank you, thank you, thank you!" He then paused and said, Sir, how will we divide the profits? Do I keep 10% and you get the 90%? Do I keep 5% and you get the 95%? I'll be happy with any arrangement. The rich man shook his head and chuckled. "No, I want you to give me the 10%. And you keep the 90%. For a moment, the beggar couldn't speak. When he tried to speak, it was gibberish. Uh, gee, uh, wow, I mean, huh? He couldn't believe his ears. The deal was too preposterous. The rich man laughed more loudly. He explained, I don't need the money, my friend. I'm already wealthy beyond what you can ever imagine. I want you to give me 10% of your profits so you grow in gratitude The beggar knelt down before his benefactor and said, Yes Sir, I will do as you say. Even now, I'm so grateful for what you've done for me! 

And so that was what happened. He forgets where the blessings came from. Each day, the beggar now dressed a little bit better operated a store selling rice in the market. He worked very hard. He woke up early in the morning and slept late at night. And sales were brisk, also because the rice was of good quality. And after 30 days, the profits were astounding. 

At the end of the month, as the ex-beggar was counting the money, and liking very much the feeling of money in his hands, an idea grew in his mind. He told himself, Gee, why should I give 10% to my Business Partner? I didn't see him the whole month! I was the one who was working day and night for this business. I did all this work! I deserve the 100% profits! 

A few minutes later, the rich man was knocking on the door to collect his 10% of the profits. The ex-beggar opened the door and said, "You don't deserve the 10%. I worked hard for this. I deserve all of it!" And he slammed the door.

If you were his Business Partner, how would you feel? 

Hi, this is exactly what happens to us, God is Our Business Partner. God gave us life-every single moment, every single breath, every single second. God gave us talents-ability to talk, to create, to earn money. God gave us a body-eyes, ears, mouth, hands, feet, heart. God gave us mind- imagination, emotions, reasoning, language. 

Sharing 10% with him is an expression of gratitude and love. So never forget to do your bit and do it with immense gratitude, joy & love.

🌹भक्तियोगरसावतार कृपालु महाप्रभु जी का अवतार रहस्य🌹

🌹भक्तियोगरसावतार कृपालु महाप्रभु जी का अवतार रहस्य🌹

                          ●●●●
काले घुंघराले केश प्रेम परिलुप्त सजल नेत्र चित्ताकर्षक मृदु मुसकान  के साथ जब 34 वर्षीय आचार्य श्री ने काशी विद्वतसभा के मध्य प्रवेश किया, सभी विद्वान् मन्त्र-मुग्ध से देखते रह गये । समस्त शास्त्रों, वेदों, पुराणों तथा अन्यान्य धर्मग्रंथों के असाधारण अलौकिक ज्ञान से युक्त कठिन संस्कृत में दिये गये वक्तव्य से तो सब नतमस्तक हो ही गये उनकी दिव्यातिदिव्य देह क्रान्ति से निर्झरित भक्तिपीयूष धारा ने सभी विद्वानों को यह स्वीकार करने के लिये बाध्य कर दिया कि ये भक्तियोगरसावतार हैं। उपस्थित विद्वत जनों ने यह अनुभव किया कि इनके रोम-रोम से भक्ति महादेवी का प्राकट्य हो रहा है। वे स्वयं ही-

रसो वै सः रसँ्ह्येवायं लब्ध्वाअनन्दी भवति ।

इस वेद वाणी का क्रियात्मक रूप हैं । ये रस और रसिक दोनों प्रतीत होते हैं । इनकी उपस्थिति ही अनुपम रस धारा प्रवाहित कर रही है, सबके ह्रदय में अपार उल्लास का संचार हो रहा है मानो राधाकृष्ण-भक्ति मूर्तिमान हो गयीं हैं। भक्ति की अन्तिम परिणिति का नाम महाभाव का मूर्तिमान विग्रह हैं श्री राधा । श्रीकृष्ण रसिक शिरोमणि हैं, सम्पूर्ण अलौकिक रसों की निधि हैं । भक्ति और रस दोनों का अपूर्व सम्मिश्रण हैं ये कृपालु । अतः राधाकृष्ण दोनों के ही सौन्दर्य रुपी अमृत के भण्डार रसिकों के शिरोमणि, प्रेम के साक्षात् स्वरुप जगद्गुरु कृपालु जी वेदज्ञ ,शास्त्रज्ञ-तो हैं ही ये भक्तियोगरसावतार भी हैं । श्री राधाकृष्ण भक्ति का मूर्तिमान स्वरुप हैं ।

यह ऐतिहासिक घटना 14 जनवरी सन 1957 को हुई। उस समय श्री कृपालु जी माहराज की आयु मात्र 34 वर्ष की थी । जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज विश्व के पाँचवें मूल जगद्गुरु हैं । उनके पूर्व केवल चार महापुरुषों को ही जगद्गुरु की मूल उपाधि प्रदान की गयी थी - जगद्गुरु श्री शंकराचार्य, जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य एवं जगद्गुरु श्री माध्वाचार्य ।

पूर्ववर्ती आचार्यों के दार्शनिक सिद्दांत्तों को सत्य सिद्ध करते हुये अपना समन्वयवादी दार्शनिक सिद्धांत प्रस्तुत करने वाले जगद्गुरु श्री कृपालु जी  महाराज को काशी विद्वत्परिषत्  ने ' निखिलदर्शन समन्वयाचार्य ' की उपाधि से भी से भी विभूषित किया, तथा उन्हें ' भक्तियोगरसावतार 'की उपाधि दी ।

    ●श्रीमत्पदवाक्यप्रमाणपारावारीण,  
          वेदमार्गप्रतिष्ठापनाचार्य,
         निखिलदर्शनसमन्वयाचार्य, सनातनवैदिकधर्मप्रतिष्ठापनसत्संप्रदायपरमाचार्य, 
                भक्तियोगरसावतार, भगवदनन्तश्रीविभूषित 

जगद्गुरु १००८ स्वामि श्री कृपालु जी महाराज●

काशी विद्वन्मण्डल द्वारा उद्घोषित  भक्तियोगरसावतार वाला स्वरुप उनके जीवन में पग-पग पर परिलक्षित होता है । विस्तार से तो कुछ लिखना सम्भव ही नहीं है क्योंकि दिव्य भावों के विषय में दिव्य लेखनी ही वर्णन कर सकती है । प्राकृत शब्दों की गति दिव्य भाव राज्य में कहाँ है। तथापि अनुभवात्मक प्रमाण और शब्द प्रमाण के आधार पर कुछ लिखना अनुचित नहीं होगा ।

●अनुभवात्मक प्रमाण:-

प्राक्तन में महारासिकों ने जिस ब्रजरस की वर्षा की है उसी ब्रजरस को पात्र अपात्र का विचार किये बिना जगद्गुरु सब को पिला रहे हैं ।

इनके दर्शन मात्र से चित्तवृति परिवर्तित हो जाती है। भगवद प्रेम का अंकुर प्रस्फुटित हो जाता है । दुष्ट प्रवृत्ति का ही संहार हो जाता है अतः कितने असुर प्रवृत्ति वाले श्रीकृष्ण प्रेमी बन गये । 

प्रेमावतार जगद्गुरु कृपालु जी बिना जाति पांति, साधु, असाधु, पात्र-अपात्र का विचार किये श्रीकृष्ण प्रेम प्रदान कर करुणा की पराकाष्ठा प्रकाशित करके अपने कृपालु नाम को चरितार्थ कर दिया । 

कलियुगी जीवों के पाप कलुषित चित्त में भी युगल प्रेम का संचार, उनके भक्तियोगरसावतार स्वरुप को प्रमाणित करता है । 

सभी मूर्धन्य विद्वानों एवं भक्तसाधकों का प्रत्यक्ष अनुभव ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि जगद्गुरु कृपालु जी महाराज स्वयं गौरांग महाप्रभु का ही स्वरुप हैं । 

इस सम्बन्ध में नदिया ग्राम वासियों के मनोमस्तिष्क में किंवदन्ती के रूप में जीवित, अद्वैताचार्य के श्राप की घटना याद आती है । जब चैतन्य महाप्रभु संन्यास की आज्ञा लेने के लिये श्री अद्वैताचार्य के पास गये तो सब स्तब्ध रह गये । उन्होंने समझाया निमाई तुझमें व सन्यासी में क्या अन्तर है ? तू तो स्वयं ही भक्ति का साक्षात स्वरुप है और हम सबके ह्रदय में भी भक्ति का सतत संचार कर रहा है फिर तुझे अपनी ममतामयी माँ , वह सुन्दर पतिव्रता पत्नी को छोड़कर जाने का विचार ही क्यों आया ? तेरे सुन्दर केश क्या इस तेजस्वी मुख मण्डल से च्युत होने के लिये बने हैं ? यह हम सबको सुख देने वाला गौरांग क्या भभूति लगाने के योग्य है ? तेरी कोमल काया क्या परिव्राजक धर्म के कष्ट सहने के लिये है ? परन्तु जब महाप्रभु को संन्यास के पथ पर चलने हेतु अडिग देखा तो अद्वैताचार्य फूट-फूट कर रोने लगे । बिलखते हुये प्रेमावेश में उन्होंने निमाई को एक अनूठा श्राप दे डाला ।

जिसके अन्तर्गत उन्होंने कहा - कि मैं तुम्हे श्राप देता हूँ कि अगले पाँच सौ वर्षों के अन्दर ही तुम्हें गोलोक छोड़कर पुनः इस धराधाम में में अवतरित होना होगा अपनी जन्म भूमि को ही तुम अपनी लीलास्थली बनाओगे तथा सन्यासियों के सिरमौर होकर भी तुम गृहस्थ धर्म का पालन करोगे । अपनी पत्नी एवं परिजनों का परित्याग न करते हुये उनको भी अपनी लीला का अंग बनाओगे ।

चैतन्य साहित्य में भी इस बात का उल्लेख है कि महाप्रभु ने पुनः दो बार अवतरित होने का आश्वासन भी दिया था।

एइ  मत आछे  आर  दुइ अवतार ।
कीर्तन  आनन्द  रूपहइब  आमार।।
ताहतेओं  तुमि  सब  एइ  मत रंगे ।
कीर्तन करिवा महासुखे आमा संगे।।

अतः सभी भावुक भक्तों के प्राण स्वरुप गुरुदेव गौरांग महाप्रभु ही हैं ऐसा विश्वास अपने आप हो ही जाता है।

वही गौरवर्ण, आजानुलम्बित भुजायें, प्रेम परिलुप्त सजल नेत्र, प्रेमदान को आतुर चित्ताकर्षक स्नेहमय व्यक्तित्व सभी कुछ तो गौरांग महाप्रभु जैसा ही है। दोनों की लीलाओं में अद्भुत समानतायें हैं । एक दो नहीं हजारों लीलाएं हैं जो उस समय भी हुई और आज भी हो रही हैं । निकटतम उदाहरण के रूप में भक्ति-मन्दिर के उद्घाटन के अवसर पर सद्गुरु सरकार द्वारा श्रंग्वेरपुर धाम से स्वयं भक्तगणों के साथ गंगा-जल लाकर निज कर कमलों से मार्जन करता देख चैतन्य महाप्रभु के गुणिटचा मार्जन की स्मृति अनायास ही आ जाती है । विभिन्न अवतारों की भगवल्लीलाओं द्वारा चैतन्य महाप्रभु ने अपने विभिन्न भगवद्स्वरूपों के दर्शन कराये जिससे उनका भगवद् चिन्तन प्रगाढ़ हो जाय और वह लीलामृत के माधुर्य का रसास्वादन कर सकें ।

पिछले तीन वर्षों के पहिले के पांच वर्षों में श्री महाराज जी  भी अनेक प्रकार की भगवल्लीलाओं का आयोजन करके भक्तों को लीला माधुर्य रससिन्धु में अवगाहन करा रहे थे । घोर संसारासक्त और परम विरागी सभी साधक अपनी रूचि के अनुसार लीलामृत का पान करके भाव विभोर हो रहे थे । श्री महाराज जी स्वयं पात्रों का चयन करते और भक्तों के प्रेमाग्रह पर वे स्वयं भी किसी प्रमुख पात्र का स्वरुपधारण करके सभी को आनन्दित करते । कभी जनकन न्दिनी प्राकट्य महोत्सव तो कभी सीता स्वयंवर तथा राम विवाह होता तो कभी भरत मिलाप जैसे मार्मिक हृदय स्पर्शी लीलाओं का प्रदर्शन जिससे आनन्द का समुद्र तो उमड़ता ही साथ ही अश्रु प्रवाह भी । कभी राम विवाह, तो कभी शंकर विवाह, कभी मुनि वशिष्ठ,  तो कभी ऋषि दुर्वासा,  कभी श्रीकृष्ण , तो कभी श्री राम, कभी सीता,  तो कभी श्री राधा,  कभी शंकर , तो कभी अर्धनारीश्वर अनेक भगवत्स्वरूपों के दर्शन करके सभी भक्त असीम आनन्द का अनुभव करते हुये प्रेम रस का पान करते ।

गौरांग सरकार की भाँति ही शास्त्रों वेदों के गूढ़ रहस्यों को बहुत ही सरल और सरस रूप में हम लोगों के समक्ष प्रकट कर दिया है जो अगणित जन्म माथा पच्ची करने के बाद भी असम्भव है । चैतन्य अष्टपदी में निहित भगवन्नाम विज्ञान को तथा भक्ति सम्बन्धी शास्त्रीय ज्ञान को जन जन तक पहुँचाने  के लिये भागीरथ प्रयास करते रहे। अपने सुख का परित्याग करके ' भूर्ज तरु सम सन्त कृपाला। परहित सह नित विपति विसाला।।' रामचरित मानस की इस चौपाई को चरितार्थ करते हुये अपना सर्वस्व भक्तों के लिये लुटाते रहे । अकथनीय है इनकी कृपा । जो 500 वर्ष पूर्व श्री चैतन्य महाप्रभु ने सिद्धान्त, सूत्र रूप में प्रकट किये थे वही अब पूर्ण रूप में प्रकट किये गये हैं। संकीर्तन के साथ-साथ साधन साध्य तत्व का भी प्रचार और प्रसार किया गया जो उस समय नहीं हो पाया था। साथ ही संकीर्तन के परम  प्रमुख अंग रूपध्यान को कृपालु महाप्रभु ने परम आवश्यक बताया ।

प्रेमरस सिद्धान्त, प्रेम रस मदिरा, राधा गोविन्द गीत, भक्ति शतक, सेवक सेव्य सिद्धान्त आदि जैसे अनुपम अद्वितीय शास्त्रीय सिद्धान्तों को प्रकट करने वाले ग्रंथों एवं प्रवचनों के अतिरिक्त कृपालु महाप्रभु द्वारा रचित काव्य में ब्रजरस का तो सागर उमड़ता ही है, साथ ही तत्वज्ञान भी साधक के मस्तिष्क में बिना किसी प्रयास के सुदृढ़ होता रहता है । प्रमाणार्थ यहाँ एक दो उदाहरण देना सूर्य के किरण सम ही है । अतः पाठक उनके मूल साहित्य द्वारा इस बात की परिपुष्टि कर सकते हैं । प्रेमा भक्ति के इन दोनों आचार्यों ने श्री राधा नाम सुधा रस जैसे अमूल्य खजाने को बिना किसी मूल्य के जन जन तक पहुँचाया है ।

अतः श्री कृपालु जी महाराज के द्वारा आचरित , प्रचारित एवं प्रसारित भक्ति एवं प्रेमरस सिद्धान्त को देखकर सभी भक्त गुरुदेव को युगलावतार गौरांग महाप्रभु के रूप में ही देखते हैं । जिन जिन सिद्धान्तों पर चैतन्य महाप्रभु ने उस अवतार काल में बल दिया और उनकी श्रेष्ठता सिद्ध की उन्ही को कालान्तर में श्री कृपालु जी महाराज ने विस्तारित एवं स्थापित किया है ।

●शब्द प्रमाण :-

काशी विद्वत्परिषत् के पश्चात शब्द प्रमाण की आवश्यकता नहीं रह जाती क्योंकि यहाँ सभी विद्वान् वेदों, शास्त्रों का ही चल रूप है । प्रत्यक्ष रूप में भी आचार्य श्री की दिव्यविरहोन्माद अवस्था में आठों सात्विक भावों का उद्रेक हो जाता है । आठों सात्विक भावों का उद्रेक देखकर भावुक भक्त भी और तत्वज्ञानी भी बरबस यही मानते हैं कि गौर श्याम मिलित वपुधारी गौरांग ही कलिमल ग्रसित जीवों को भगवत्स्मृतिविहीन अतिशय दीन दशा निवृत्ति के लिये पुनः आये हैं।

संकीर्तन के समय सभी को ब्रजरस से सराबोर कर देना उनके अन्दर छिपे ब्रजरस सागर का परिचायक है।

प्रेमोन्मत्त अवस्था में भागवत में वर्णित -

एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चै: ।
हसत्यथो रोदितिरौतिगायत्त्युन्मादवन्नृत्यति लोक बाह्य: ।।

                      ( भाग. ११-२-४०)

वाग्गद् गदा द्रवते यस्य चित्तं,
 रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च ।
विलज्ज उद् गायति नृत्यते च,  मद् भक्तियुक्तो  भुवनं पुनाति ।।

                    ( भाग. ११-१४-२४ )

के अनुसार ही आचार्य श्री की अवस्थायें हो जाती।

श्रीकृष्ण नाम, रूप, लीला, गुण, धाम संकीर्तन के समय कभी हँसते, कभी रोते, कभी चीखते, कभी गाते तथा कभी उन्माद रोगी की भांति लोकातीत होकर नाचने लगते। भक्ति रसामृत सिन्धु में वर्णित -

स्तंभ: स्वेदोअथ रोमांच: स्वरभेदोअथ वेपुथ:।
वैवणर्यमश्रुप्रलय इत्यष्टौ सात्विका: स्मृता: ।।

                               ( भ. र. सि. )

अर्थात प्रेमास्पद की याद में वृक्ष के समान स्थिर समाधिस्थ हो जाना, पसीना निकलना, रोंगटे खड़े हो जाना, आवाज बदल जाना, शरीर काँपना, चेहरे का रंग बदल जाना, आँसू निकलना , मूर्छित हो जाना । उपर्युक्त अष्ट सात्विक भावों का एक साथ उद्रेक अगाध दिव्य प्रेम का परिचायक है । आचार्य श्री के अन्दर ये सभी सात्विक भावों का जब उद्रेक होता । सम्पूर्ण वातावरण भक्ति-रस से ओतप्रोत हो जाता । एक-एक अंग से शोभा श्री की ऐसी सुधा धारा  प्रवाहित होती है जो सभी के अंग प्रत्यंग में अमृत का संचार कर देती । भक्तवृन्द आल्हाद सुधा सरिता में बह जाते । सभी का हृदय अपार आनन्द से भर जाता । परमानिर्वचनीय रसमत्तता में सभी डूब जाते ।
राधे राधे

जरूर ध्यान से पढ़ें :- बहुत-बहुत महत्वपूर्ण तत्वज्ञान रामायण के जटायु और महाभारत के भिष्म पितामह दोनों से

जरूर ध्यान से पढ़ें :- बहुत-बहुत महत्वपूर्ण तत्वज्ञान रामायण के जटायु और महाभारत के भिष्म पितामह दोनों से :- 
अंतिम सांस गिन रहे जटायु ने कहा कि "मुझे पता था कि मैं रावण से नही जीत सकता लेकिन फिर भी मैं लड़ा ..यदि मैं नही लड़ता तो आने वाली पीढियां मुझे कायर कहतीं"

जब रावण ने जटायु के दोनों पंख काट डाले... तो मृत्यु आई और जैसे ही मृत्यु आयी... तो गिद्धराज जटायु ने मृत्यु को ललकार कहा...

"खबरदार ! ऐ मृत्यु ! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना... । मैं तुझ को स्वीकार तो करूँगा... लेकिन तू मुझे तब तक नहीं छू सकती... जब तक मैं माता सीता जी की "सुधि" प्रभु "श्रीराम" को नहीं सुना देता...! 
यह कर्मयोग है जटायु का , मन में भगवान राम और सिता और कर्म अपने इष्ट के निमित्त तथा साथ साथ न्याय का पक्षधर की भुमिका भी । 

 मौत उन्हें छू नहीं पा रही है... काँप रही है खड़ी हो कर...मौत तब तक खड़ी रही, काँपती रही... यही इच्छा मृत्यु का वरदान जटायु को मिला ।
किन्तु महाभारत के  भीष्म पितामह छह महीने तक बाणों की शय्या पर लेट करके मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहे... आँखों में आँसू हैं ...वे पश्चाताप से रो रहे हैं... भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं...! भिष्म भी भगवान के भक्त हैं पर हट अपने प्रतिज्ञा के प्रति , फर्ज भुल गए । 

कितना अलौकिक है यह दृश्य... रामायण मे जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं... 
प्रभु "श्रीराम" रो रहे हैं और जटायु हँस रहे हैं... 
वहाँ महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान "श्रीकृष्ण" हँस रहे हैं... भिन्नता प्रतीत हो रही है कि नहीं... ?

अंत समय में जटायु को प्रभु "श्रीराम" की गोद की शय्या मिली... लेकिन भीष्म पितामह को मरते समय बाण की शय्या मिली....!
 जटायु अपने कर्मयोग के बल पर अंत समय में भगवान की गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहे हैं.... प्रभु "श्रीराम" की शरण में...।

और बाणों पर लेटे लेटे भीष्म पितामह रो रहे हैं.... और भगवान श्री कृष्ण हंस रहें हैं ।

ऐसा अंतर क्यों?...     

ऐसा अंतर इसलिए है कि भरे दरबार में भीष्म पितामह ने द्रौपदी की इज्जत को लुटते हुए देखा था... विरोध नहीं कर पाये और मौन रह गए थे ...! 
 दुःशासन को ललकार देते... दुर्योधन को ललकार देते...
तो उनका साहस न होता, लेकिन द्रौपदी रोती रही... बिलखती रही... चीखती रही... चिल्लाती रही... लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे... नारी की रक्षा नहीं कर पाये...!

उसका परिणाम यह निकला कि इच्छा मृत्यु का वरदान पाने पर भी बाणों की शय्या मिली और .... 
 जटायु ने नारी का सम्मान किया... 
अपने प्राणों की आहुति दे दी... तो मरते समय भगवान 
"श्रीराम" की गोद की शय्या मिली...!
आध्यात्मिक शिक्षा :- जो हमेशा भगवान को अपने हृदय में मान कर उनके निमित्त कर्म करता है वो कर्मयोग है और इससे लोक परलोक दोनों सफल होता है 
जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं ... उनकी गति भीष्म जैसी होती है ... 
जो अपना परिणाम जानते हुए भी...औरों के लिए संघर्ष करते है, उसका माहात्म्य जटायु जैसा कीर्तिवान होता है ।

अतः सदैव गलत का विरोध जरूर करना चाहिए । 
"सत्य" परेशान जरूर होता है, पर पराजित नहीं ।।
:- संजीव

Friday, 23 April 2021

हमारे श्री कृपालु जी महाराज ।

हमारे प्राण प्रिय गुरूदेव श्री कृपालु महाप्रभु जी ने वेदों शास्त्रों का प्रमाण देकर , जीवन पर्यंत अथक परिश्रम करके शास्त्रों के क्लिष्ट श्लोकों के वास्तविक अर्थ को सरल और शुद्ध भाषा में हमें समझाकर  भगवान की भक्ति,प्रेम के मार्ग में फैले अंधविश्वासों का खंडन करके भक्ति के वास्तविक सिद्धांतों को इस कलिकाल में  पुनर्स्थापित किया हैं, उन्होंने पोंगा पंडितों, अयोग्य ज्योतिषों, स्वघोषित तथाकथित विद्वानों के फैलाए पाखंड, ढोंग, गलत फहमी  पर से पर्दा ऊठाकर भक्ति को सीधा सरल बना कर हमें भगवान के विशुद्ध भक्ति के तरफ प्रेरित किए है , । 
उन्होंने  सनातन धर्म के तमाम शास्त्रों में छुपे तमाम श्लोकों के वास्तविक अर्थ का सरल भाषा में प्रचार प्रसार करके हमें उन शास्त्रों के श्लोकों का मूल रस को पिलाया है । उन्होंने आध्यात्म और भौतिक दोनों को भगवान की भक्ति की और शरीर के आवश्यकता के सार्थकता को सिद्ध किया है । 
उन्होंने मानव जीवन के वास्तविक उद्देश्य से हमें परिचित कराया हैं । उन्होने अति उत्कृष्टता से  वैज्ञानिक पहलुओं  और आध्यात्मिक पहलुओं व शास्त्रों में छुपे गुढ़ व दिव्य तत्त्वज्ञान  द्वारा  उदाहरण देकर सनातन धर्म में विधर्मियों द्वारा  फैलाए गए अंध विश्वास , कुरितियां , बुराईयों  को दुर करने का अथक प्रयास किए हैं । 
उन्होंने आजकल कलयुग में किए जा रहे भक्ति के तरिके हीं नहीं वल्कि कलयुग में  ज्ञान मार्ग , कर्मकांड , तीर्थ , आदि की कलिकाल में निष्फलता  के मूल स्वरूप को समझाते  हुए यह सिद्ध किए हैं कि जब तक मन का अटैचमेंट भगवान में ना हो तबतक ना तो ज्ञान मार्ग , ना कर्मकांड और ना हीं जप तप , योग और तपस्यचर्या , गंगा स्नान  का कोई फल है  । 
उन्होंने  अनेकों शास्त्रों का प्रमाण देकर यह  साबित किए की  बिना मन के अटैचमेंट का सारा कर्म एक शारीरिक वहीरंगा उछल कुद ( फिजिकल ड्रील) मात्र है जिसका कोई लाभ नहीं वल्कि नुकसान है , भ्रम है , विप्रलिप्सा , कर्णपाटव और प्रमाद रूपी भ्रांत ज्ञान फैला  है ।
श्री महाराज जी ने सनातन धर्म में फैले तमाम अंधविश्वासों , कुरितियो , बुराईयो पर से पर्दा हटा कर हम मानव जाति का कल्याण हीं नही बल्कि सनातन धर्म को भी‌ उनके मूल स्वरूप में पुनर्स्थापित किया है । 

आज जो भी भाग्यशाली लोग श्री महाराज जी के शरण में है , उनको अपना प्राणाधार मानते हैं , उनपर अटुट श्रद्धा और दृढ़ विस्वास करतें हैं उनके इसी जीवन में उनके कल्याण से दुनिया की कोई शक्ति (स्वयं भगवान की  माया शक्ति भी )  नहीं रोक शक्ति है यह उनके द्वारा घोषित चैलेंज है ।
जो लोग अभी भी संशय और भ्रम में हैं उनसे एक बार पुनर्आग्रह है कि वो उनको अपना मान लें और उनके निर्देशित साधना और दिव्य बातों को तहे दिल यानि मन के गहराइयों  से मान कर अपने जीवन के मूल उद्देश्य के प्राप्ति के राह में अग्रसर हो ।
अन्यथा आने बाले अनेक युगों तक भी जब लोग विकृत ज्ञान  कुविज्ञान , विधर्मियों द्वारा फैलाए गए भ्रांत ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी ले जा कर अंतत्वोगत्वा  थक जाएगें  तो अंत में केवल श्री महाराज जी का आज के बतलाए एक मात्र मार्ग ही सहारा बनेगा उनका  । 
अतः भटकना क्यूं ? आज ही , अभी ही क्यूं न उनको अपना मान कर उनके बतलाए मार्ग का अनुसरण करें और अपने भावी पीढ़ी से भी अनुसरण करवाएं । क्यों हम खुद और हमारे भावी पीढी को अन्यत्र भटकने के लिए छोड़े । 
क्योंकि भटकने के बाद तमाम दुसरे की मनगढ़ंत  फिलौसफी को अपनाने और उस पर चलने के बाद आना तो उनके शरण में ही पड़ेगा , क्योंकि विशुद्ध भक्ति का कोई दुसरा मार्ग है हीं नहीं जगत में  । 
जब विश्व का सर्वोत्तम बैद् , हकीम, डौक्टर श्री कृपालु  महाराज जी के रूप में स्वयं यूगलसरकार हमारे लिए इस कलिकाल में  शूलभ हुए , खुद के परम कल्याण के लिए उनके बतलाए औषधि हमारे लिए उपलब्ध है तो अनेक डौक्टरों के यहां भटकना क्यूं ? 
सोचना चाहिए हमसबको । 
मैंने श्री कृपालु महाप्रभु उर्फ यूगलसरकार के द्वारा मेरे अंत:करण में डालें गए प्रेरणा के परिणामस्वरूप सबके कल्याण के लिय उपर्युक्त बातें लिखी हैं । श्री राधे । :- 
आपका संजीव कुमार , 23 अप्रैल 2021.

Thursday, 22 April 2021

प्रश्न - शास्त्र कितने प्रकार के होतें हैं‌?'वेद' , पुराण , 'श्री रामायण' , 'श्री माहाभारत ' और ' श्रीमद्भागवत, गीता' आदि किन प्रकार के शास्त्र है ?

प्रश्न - शास्त्र कितने प्रकार के होतें हैं‌?
'वेद' , पुराण , 'श्री रामायण' , 'श्री माहाभारत ' और ' श्रीमद्भागवत, गीता' आदि किन प्रकार के शास्त्र है ?
उत्तर :-
नंबर 1 कृत ग्रन्थ: यह मयाबद्द जीवो द्वारा लिखें जाते है। इसमें लिखने वाले न तो भगवद् प्राप्त हैं , न हीं प्रत्यज्ञ भगवद् अनुभवी , ये अपनी अक्ल से प्रसेप्शन से , अपनी समझदारी से ग्रंथ लिखें है , इसलिए ऐसे ग्रंथों में बहुत सारी त्रुटियां है । जो हमारे लिए भक्ति मार्ग में बाधक है , तथा इनको पढ़ना कुसंग कहा गया है । जब कोई भगवद् अनुभव हीन मनुष्य बिना समर्थ गुरू के , केवल अपनी संकल्पना के आधार पर गीता , रामायण और वेद पढ़ कर अपने अनुसार उसका अर्थ करके कोई किताब लिखता है तो उसको कृत ग्रंथ कहते हैं । यह ग्रंथ सर्वदा दोष सहित है क्योंकि वो जीव माया बद्ध है जिसने यह लिखा है । और मया बद्ध जीव अपने माईक मन बुद्धि से जो भी लिखेगा वो दोषयुक्त हीं होगा । 

 नंबर 2 स्मृत ग्रन्थ : यह भगवद् प्राप्त महापुरूषों द्वारा प्रकट किय जाते है लिखे जाते है। यानि भगबद् प्राप्त ,महापुरूषों द्वारा ,‌अवतार धारण करके पृथ्वी पर प्रकट भगवान द्वारा , जैसे गीता, भागवत, रामायण आदि ग्रंथ आते है। इसलिए यह ग्रंथ दोष रहित है ।इसमें कोइ दोष नहीं हैं । क्योंकि लिखने वाले महापुरूष माया से परे थे। वो भगवान की शक्ति से अपना कोई भी काम करतें हैं , भगवद् प्राप्ति के बाद भगवान की पर्सनल पावर योगमाया शक्ति उन महापुरुषों को मिल जाती है । वो 
मायिक दोषों से विल्कूल मुक्त हैं । प्रैक्टिकल महापुरूष होतें है , भगवान को प्रत्यक्ष देखा और सुना और गले लगाया है इन्होने , कोई सपने वपने में नहीं । तमाम उदाहरण है ऐसे महापुरुषों के आप सब जानते हैं , शंकराचार्य , रामानुजाचार्य, माध्वाचार्य , वल्लभाचार्य, निंबारकाचार्य सुरदास , तुलसीदास , और हमारे श्री महाराज जी श्री कृपालु महाप्रभु जी आदि ।

 नंबर 3 विनिर्गत ग्रन्थ: यह भगवान की वाणी है । उनकी आप्त वाणी है , यानि उनसे हीं‌ प्रकट हुआ है ,ऐसे ग्रंथ सृष्टि के समय प्रकट हो जाते है और प्रलय में भगवान मे लीन हो जाते है। वेद पुराण आदि विनिर्गत ग्रंथ है ।और यह पूर्णत: निर्दोष निष्कलंक ग्रंथ है । परंतु ऐसे ग्रंथ को स्वयं पढ़ कर या किसी ऐसे गुरू और शिक्षक से समझा नहीं जा सकता जो केवल थ्योरिटिकल मैन हो , भगवद् प्राप्त ना किया हो । 
थ्योरिटिकल मैन इसको समझने में और समझाने में अपनी बुद्धि लगा देगा जिससे वो वास्तविक अर्थ को ना तो खुद समझ सकता है और ना दुसरे को ठीक ठीक समझा सकता है । थ्योरिटिकल मैंन अपनी बुद्धि से अपनी बात डाल देगा इन ग्रंथों को समझाने में । अतः कोई भी थ्योरिटिकल कथा बाचक , बाबा जी, पंडीत आदि और बहुत सारे स्वघोषित विद्वान लोग हमारे देश में हुए हैं और है जो अपने अपने हिसाब से गीता , रामायण , भागवद् , वेद , पुराण का गलत अर्थ करके अनर्थ कर रहें हैं किताब लिख रहे हैं इन पर । इनसे सुनकर अधिकांश लोग गलतफहमी के शिकार हो रहें है ऐसे लोग ऐसे ही जीव से ज्ञान सुन कर , इनपर , धर्म पर अपने अपने हिसाब से अपनी माईक बुद्धि से बहस करते मिलते हैं । इनसे साधकों को बचना चाहिए , नहीं तो यह कुसंग है । 
हां कोई श्रोत्रिए , ब्रह्मनिष्ठ भगवद् प्राप्त संत महापुरुष मिल जाए तो उनसे समझना चाहिए , ध्यान दिजिए श्रोत्रिए और ब्रह्मनिष्ट का मतलब थ्योरिटिकल मैन के साथ साथ प्रैक्टिकल मैन भी हो , मतलब जिसने सगुन साकार भगवान को अपनी आंखों से देखा हो , छुआ हो ,बातें किया हो , सपने में नहीं , आभासीए नहीं । साक्षात सामने खुली आंखों से उनको देखा हो छुआ हो , गले लगाया हो , वैसे महापुरुष किसी को मिल जाए और उनको अपना गुरू बना लें , मान लें उनको गुरू फिर उनके मुख से सुनें , जाने तो सही सही ठीक ठीक तत्वज्ञान मिलेगा । 
नहीं तो पांच अंधे वाली बात होगी , एक ने हांथी का पैर छुआ और अनुमान लगाया यह खंभा है और सबकों डिक्लियर कर दिया यह खंभा है , एक ने सुंड को छुआ और कह दिया सबसे यह पाइप है । दोनों गलत ज्ञान का शिकार , बोलने वाला अनुभव हीन बाबा भी और उनसे सुनने बाला भी ग़लत फहमी का शिकार ।
अतः ध्यान दिजिए , स्मृत ग्रंथ और विनिर्गत ग्रंथ को ठीक ठीक समझाने के लिए केवल भगवद् प्राप्त संत महापुरुष ही सक्षम है और उन्हीं के शरण में जाना होगा , अन्य दुसरा मार्ग नहीं है , नहीं तो तमाम हानि हो जाएगी । 
:- स्वामीं श्री युगलशरण जी महाराज । 
श्री राधे।

इस ध्येयवाक्य का अर्थ महाभारत के श्लोक 'यतः कृष्णस्ततो धर्मो , यतो धर्मस्ततो जयः से आता है.

इस ध्येयवाक्य का अर्थ महाभारत के श्लोक 'यतः कृष्णस्ततो धर्मो , यतो धर्मस्ततो जयः से आता है. कुरुक्षेत्र के दौरान,  अर्जुन अपने बड़े भाई युधिष्ठिर की अकर्मण्यता को दूर कर उन्हें प्रेरित करने की कोशिश कर रहे थे. वो युधिष्ठिर से कहते हैं, "विजय सदा धर्म के पक्ष में रहती है, और जहां भगवान श्रीकृष्ण हैं, वहां धर्म है।

हमें गर्व है कि यतो धर्मः ततो जयः (या, यतो धर्मस्ततो जयः) जो कि एक संस्कृत श्लोक है और यह भारत के सर्वोच्च न्यायालय का ध्येय वाक्य है। यह महाभारत में कुल ग्यारह बार आता है और इसका मतलब है "जहाँ धर्म है वहाँ जय (जीत) है। पर आज हमारे न्यायालयों के कुछ न्यायाधिपति इस मूल ध्येय वाक्य को भुल जातें हैं । जिससे न्याय में बहुत देरी होती है । और न्याय में देरी या न्यायालय में व्याप्त भ्रष्टाचार एक बहुत बड़ा अन्याय है एवं एक बहुत बड़ा अभिशाप है , महापाप है । पैसे के बल पर न्याय को खरीदनेवाले और बिकने वाले जजों एवं वकीलों को अपने ईमान को नहीं बेचना चाहिए । 

अधिवक्ता का धर्म है सच्चाई को सामने लाना न कि अपने प्रोफेशन का हवाला देकर , अर्थ को बदल करके या अनर्थ करके किसी भी मुजरिम का साथ देना । चाहे वो असली मुजरिम का वकील क्यों ना हों । जब अधिवक्ता को पता चल जाए कि हम जिसका केस हाथ में लिए है , वो सचमुच दोषी है तो अहंकार त्याग कर मुजरिम के खिलाफ हो जाना चाहिए । यही एक सच्चे अधिवक्ता का कर्तव्य और धर्म है । 

सत्यमेव जयते (संस्कृत विस्तृत रूप: सत्यं एव जयते) भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है।
इसका अर्थ है : सत्य ही जीतता है / सत्य की ही जीत होती है। यह श्लोक तीन मुख बाला सिंह, हमारे भारत देश के राष्ट्रीय प्रतीक के नीचे देवनागरी लिपि में अंकित है। यह प्रतीक उत्तर भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में वाराणसी के निकट सारनाथ में 250 ई.पू. में सम्राट अशोक द्वारा बनवाये गए सिंह स्तम्भ के शिखर से लिया गया है,  और 'सत्यमेव जयते' जो हमारे भारत देश के प्रतीक चिन्ह के नीचे लिखा गया संस्कृत श्लोक है यह मुण्डकोपनिषद से लिया गया है  :-
 'सत्यमेव जयते' मूलतः मुण्डक-उपनिषद का सर्वज्ञात मंत्र 3.1.6 है से लिया गया है ।
पूर्ण मंत्र इस प्रकार है:-

सत्यमेव जयते नानृतम सत्येन पंथा विततो देवयानः।
येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यत्र तत् सत्यस्य परमम् निधानम्॥
अर्थात अंततः सत्य की ही जय होती है न कि असत्य की। यही वह मार्ग है जिससे होकर आप्तकाम (जिनकी कामनाएं पूर्ण हो चुकी हों) मानव जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।:- संजीव कुमार ।

मेरे एक मित्र ने आज कहा मुझसे की देश हीं नहीं पुरे विश्व में और प्रायः सभी राज्यों में आज शूद्र का शासन है इसलिए अव्यवस्था फैली है बहुत से उन राज्यों में जहां शूद्र का शासन है , अस्तु !

 मेरे एक मित्र ने आज कहा मुझसे की देश हीं नहीं पुरे विश्व में और प्रायः सभी राज्यों में आज शूद्र का शासन है इसलिए अव्यवस्था फैली है बहुत से उन राज्यों में जहां शूद्र का शासन है  , अस्तु ! 

मेरा उत्तर :- आपका कहना सही है कि आज पुरे विश्व के बहुत तेरे देशों में , भारत में और अनेक राज्यों में शूद्रों का शासन है । पर सभी शूद्र शासकों का आचरण खराब है आज ऐसा मैं नहीं मानता  । पहले भी चंद्रगुप्त मौर्य शूद्र शासक हुआ जो चाणक्य जैसे उच्च कोटी के ब्राह्मण गुरू के कृपा प्रभाव के कारण उत्तम शासक हुआ है हमारे देश में हीं । एक उच्च आदर्श आचारवान पुरूष किसी को भी उत्तम बना सकता है।
हमारे देश में डाकु रत्नाकर भी नारद जी जैसे गुरू को पाकर महर्षि हो गय , महर्षि वाल्मिकी हो गए जिन्होंने रामायण जैसा सर्वोत्तम काव्य लिख दिया   , कालीदास कबीर दास , रै दास , सूरदास,  रविदास,  रसखान भगवद् प्राप्त कर कर्म से उसी जन्म में  उच्च कोटी के ब्राह्मण बन कर भगवद् प्राप्त संत व ब्राह्मण तुल्य कार्य किए हैं । विस्वामित्र क्षत्रिए से ब्राह्मण बन गए भगवद् प्राप्ति के बाद् आदि तमाम उदाहरण भरा परा है इतिहास में । 

और अगर ऐसा है भी आपके अनुसार कहीं तो जरा खोजिए , चिंतन करिए  की आज इसका जिम्मेदार कौन है पहले ? 
जरा ध्यान मुद्रा ( Meditation )  में जाकर इसका कारण ढुंढेंगे तो उत्तर मिल जाएगा ।
मुझे जो उत्तर मिला है वो निम्नलिखित हैं :- 
हिंदु संस्कृति में मानव जाती को चार वर्णों में बांटा गया है सदियों पहले । यह जन्म के साथ मुख्यतया कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था था समाज  और  देश के व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए । चारों वर्णों का बराबर महत्व था समाज और देश रूपी गाड़ी के चार पहिए की तरह । गाड़ी का चार पहिए में से एक की भी हवा निकल जाए तो जिस प्रकार गाड़ी नहीं चल सकती , ठीक उसी प्रकार चारों वर्णों में से कोई एक भी अकर्मण्य हो जाए तो समाज बिखड़ जाता है । 
और जब तक चारों वर्ण बिना भेद भाव के मिलजुल कर अपना फर्ज पुरा करते रहे तब तक हमारे भारत में बहुत सुंदर रूप, सुचारू रूप  से सभी कार्य होते थे , समय बदला , यवनों व मुगलों का आक्रमण शुरू हुआ , उसके बाद अंग्रेजों का और भारत की मूलभूत शिक्षा निति ( नालंदा , विक्रमशिला और तक्षशिला ) को बर्बाद कर दिया गया , हमारा भारत अपने उत्तम शिक्षा व्यवस्था  के लिए पुरे विश्व में  जाना जाता था , बाहर के देशों से लोग यहां पढ़ने आते थे , फाहयाण ह्वेनसांग आदि अनेकों उदाहरण हैं इसका  । 
पर आताताइयों का आक्रमण के फलस्वरूप  हमारी शिक्षा व्यवस्था तहस नहस होने के बाद एक अराजकता फैला । डिभाईड एंड रूल जैसी मानसिकता के लोग समाज के चारो वर्णों में फुट डालने में कामयाब हुए जो आजतक कायम है । 
ध्यान रखिए एक उत्तम शिक्षा हीं लोगों को चरित्रवान बनाता है । पर बुरी व्यवस्था के फलस्वरूप
ब्राह्मण वर्ण के लोग  योगी की जगह भोगी होने लगे , धर्मी के जगह कुधर्मी होने लगे , त्यागी के जगह लोभी हो गए । और आज तक यह शिलशिला जारी है । बात करवी है पर सत्य है । 

क्षत्रिय वर्ण के लोग देश का रक्षक ना होकर भक्षक होने लगे , मानसिंग और जयचंद जैसा क्षत्रिए पैदा होने लगे । 

चाणक्य जैसा आचारवाण , बिचारबाण और  नीतिवाण ब्राह्मण  इतिहास के पन्नों में खो गए । 

वैश्य वर्ण के लोग व्यापारी ना होकर मुनाफाखोर हो गए , 
आज हमारे देश में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसा सेवा क्षेत्र भी व्यापार का माध्यम बन गया , ताकतवर और रसूख वाले माफिया  शिक्षा और मेडिकल व्यवस्था के ऊपर कब्जा करके अनैतिक तरिके से धन कमाने लगे । 
इनमें से ज्यादा लोग यही तीन वर्ण वाले हैं । 
उपर्युक्त तीनों वर्ण के लोग भोगी , कामी और भक्षक बन गए । तो चौथा वर्ण भी वैसा ही कर रहा है अब ! सिखाए तो हम हीं । 

तो जाहिर है की उपर्युक्त तीनों वर्णो के लोग में से 90% लोग जब भ्रष्ट हो गए तो भगवान ने शूद्र को मौका दिया शासन करने के लिए । 
तो अब तकलिफ क्यों हो रहा है हमें ? 

जब जब हम धर्म से विमुख होकर अधर्म के मार्ग पर आगे बढेगें  तो जाहिर है कि दुसरा यह काम अपने हाथ में लेगा ही ।
अतः हमें दुसरे में दोष देखने से पहले  खुद अपने में झांकना होगा की हम ऐसा क्यों हो गए ?
हम अपने पतन के लिए खुद दोषी हैं । और जब स्पेश दिया तो आरक्षण से तो कोई आएगा हीं  और हम पर शासन करेगा ही करेगा । और कर रहा है तो अब बुरा क्यों लग रहा है हमें ? 

जब हम अपना चरित्र , नैतिकता , ईमान और धर्म को बेचना शुरू कर देतें है तो हमारा पतन तो निश्चित है और उसके लिए हम खुद दोषी हैं :- संजीव कुमार ।

Tuesday, 13 April 2021

मेरा निज अनुभव साक्षी मंदिर उड़िसा और बरसाना धाम ।

मैं इसी साक्षी गोपाल मंदिर उड़िसा में, भगवान श्रीकृष्ण के बगल में खड़ी राधा रानी जी का पैर साक्षी गोपाल मंदीर में पीछले साल अचानक छु लिया था । पंडित जी गुस्सा गए थे । मेरे मुख से विनम्रता के साथ , दीनता से अपने आप निकल गया था उनके सामने " मैं तो अपनी मां का पैर छुआ है , आपके लिए ए भगवान् हैं, लेकिन ए तो मेरी मां है मां सिर्फ मां ,और बच्चे को मां के पास जाने से कौई रोक सकता है भला ! चाहे बच्चा गन्दा में हीं लिपटा क्युं ना हो ! 
तब पंडित जी हंसने लगे , क्रोध शांत हो गया उनका । श्री राधे । वो वोले राधा रानी का चरण दर्शन साल में एक बार हीं दर्शकों को होता है , इसलिए वोला था ,‌अब उनकी जैसी इच्छा । 

एक बार बरसाना‌ धाम में राधा रानी के दरवार में 2017 में दर्शन के लिए गए । प्रसाद पाने के लिए बहुत भीड़ देखकर थक कर उनके महल में बैठ गया , उस दिन बहुत पैदल चलना पड़ा था मुझे धाम में। और आंखों में अपने आप हीं आंसु बहने लगे , मुझे बहुत भीड़ अच्छा नहीं लगता है , मन हीं मन सोच रहा था कि राधा रानी तो मेरी भी मां हैं । अगर वो प्रसाद देना हीं चाहेंगी तो मुझे प्रसाद जरूर मिल जाएगा । 
कुछ समय में देखता हुं भीड़ कम हो गई और मां के बगल में खड़े एक पंडित मुझे बुला रहे हैं । पहले तो नहीं समझा मैं , पर वो आवाज़ देकर हाथ के इशारे से वोले की तुमको हीं बुला रहा हुं । मैं गया उनके पास , वो मेरे सिर को हाथ से दवा कर राधारानी के चरण में झुका दिए और उनका एक माला मेरे सिर में डाल दिय और हाथों में ढ़ेर सारा प्रसाद डाल दिए । श्री राधे ।- आपका संजीव

असली संतों , वास्तविक संतों के पास अपेक्षाकृत कम लोग क्यों जातें हैं ?

असली संतों , वास्तविक संतों के पास अपेक्षाकृत  कम लोग क्यों जातें हैं ? क्योंकि असली संत मुख देखा बात नहीं करते , झूठा आशिर्वाद नहीं देते । असली संत कटु सत्य सामने रखते हैं , वे वेद् , शास्त्र सम्मत वास्तविक बात और उसका असली अर्थ बतातें हैं एवं हमेशा सही एवं उचित मार्ग दर्शन करतें हैं दिर्घकालिक परम कल्याण हेतु लोगों का । जो बहुतों को अच्छा नहीं लगता है आज के युग में। 

 किसी भी संस्कृति में सभी लोग बुरे नहीं होते ।सभी संगीतकार और फिल्मी संगीत ग़ज़ल ,‌शेरो शायरी बुरे नहीं होते , चाहे वो किसी भी भाषा में क्यूं ना हो । कुछ भटके हुए इंसानों को देखकर  , सभी को एक तराजु में तौल देना , यह अच्छे लोगों का , विद्धानो ( सही सही ज्ञानी Real literate people ) का काम नहीं है । 
In this world nothing is perfect except real Sant . Every things has  two side like coin , one side  is good second is evil . So every things has composition of good and evil except  God and real Sant .

So man of learned always thinks according to good side of coin . 
Where evil always  thinks according to bad insight  .
आज  व्यास पीठ पर बैठने वाले कुछ दो चार कथा बाचक  तत्वज्ञानी तो क्या संसार का भी उनको ठीक से ज्ञान नहीं है । कथा बांचना एक साधारण पेशा बना दिया गया है  । 

क्षूद्र लोकेशना ( घटिया लोकप्रियता ) की मंशा से  और स्वार्थ हेतु धन कमाने की लालसा से ग्रसित व्यक्ति  फुहर लोकरंजन का समावेश व्यासपीठ पर बैठकर अपने कथा में करतें है । लोग अज्ञानतावस, शास्त्रों से दुर होने के कारण, जल्दी इनके झांसे में आ जातें हैं । क्योंकि इनको झूठ के बुनियाद पर आधारित गलत दिलासा भगवान के नाम पर दिया जाता है । भोगवादी कथा कहानियों का समावेश  आजकल ऐसे कथाकार अपने कथा में खुब करतें हैं। 
घटिया फिल्मी गानों पर घटिया फिल्मी डांस का नूमाईस कुछ कथाकारों द्वारा खुब हो रहा है। जबकि फिल्मों में भी भावयुक्त भक्ति गाने हैं और भक्ति में भावयुक्त क्लासिकल नृत्य का समावेश किया जा सकता है  ।

पर कुछ लोग सही सही भक्ति भावयुक्त  फिल्मी भक्ति संगीत का भी चुनाव नहीं करतें हैं । 

गलत गानों को अपनातें है ताकी उसपर फुहर ठुमका अच्छे से लग सके  और लोग भी उसी स्टाइल में इनके  प्रवचनों में खुब ठुमके लगा लगा कर अपने को बहुत बड़ा भक्त मान बैठतें हैं , दिखातें हैं ।   वो उछल कुद भक्ति नहीं हैं । धोखे में हैं ।
हरेक धर्म में ऐसे लोग हैं । कोई गला फार फार कर हितोपदेश दे रहें हैं । तो कोई ऊंची ऊंची मिनार पर लाउडिसपिकर से जोर जोर से वाग दे रहें है । ऐसे कथावाचक  कुछ संस्कृति में कम तो कुछ में बहुत ज्यादा है ।
 दु:खी लोगों को भगवान, ईश्वर , खुदा , अल्ल्लाह, जीसस आदि  के नाम पर आए दिन  हाथ की सफाई से जादुई चमत्कार दिखा कर  ठगा जाता है , खुब गुमराह किया जा रहा है । और अनपढ़ हीं नहीं वल्कि तथाकथित पढ़ें लिखे लोग ( कुशिक्षित  लोग ) भी इनके पास दौड़ लगातें हैं , यहां खुब भीड़ जुटती है ।
अभाव ग्रस्त लोग , दु:खी जीव अपने स्वसांत्वना हेतु इनका हांथ अपने सर पर रखवाना चाहतें हैं, इसलिए झांसे में आकर लोभ और लालचबस , दु:ख निवृति की आकांक्षा से ऐसे लोगों का चरण छुते हैं और वेचारे के हांथ कुछ नहीं लगता है , उल्टे बरबाद होकर वापस लौटते हैं और फिर इल्जाम लगाते हैं कि फलाने ने मेरी अस्मिता लुट ली , तो धन लुट ली । अपनी गलती नहीं मानतें हैं । शौर्ट कट दु:ख निवृति और सुख की प्राप्ति के लालसा में अंधे होकर पहले तो ए लोग उनके पीछे दौड़तें हैं फिर अपना सबकुछ लुटने के बाद बाप-बाप करते हुए कोर्ट और कचहरी के चक्कर लगातें है और फायदा होता है मिडिया को ,‌वकिलों को , तो राजनैतिक पार्टी को । और यह कहानी बन जाता है लोकरंजन के लिए । वांकी लोग बड़े मजे से ऐसे ऐसे कहानी को मिडिया एवं  सोसल मिडिया में डालकर खुब लाईक और टी आर पी पाकर सस्ती और घटिया प्रसिद्धि पाने चेष्टा करतें हैं । यही चल रहा है आज कलयुग में । 
 जय जय जय श्री राम ।

आत्महत्या करके मर जाना समस्या का समाधान नहीं है ।

इस प्रश्न - आत्महत्या करके मर जाना समस्या का समाधान नहीं है । श्री महाराज जी का प्रबचन , तत्त्वज्ञान सुनिए उनके मुख से :- " तीन शरीर होते हैं।
स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर यह तीन बंधन है प्रत्येक जीव के साथ, जो तीन शरीर से परे चला गया वह आनंदमय हो गया, मुक्त हो गया। किन्ही शब्दों में कह दीजिए।
तो स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर।
थोड़ा समझ लीजिए इसको। स्थूल शरीर तो आप जानते ही हैं, यह जो आपका है पंचमहाभूत का शरीर जिसमें हाथ पैर नाक कान आंख बने हैं। यह पांच, छ: फुट का शरीर जो आपका हाड़ मांस का है इसे कहते हैं स्थूल शरीर।
एक सूक्ष्म शरीर होता है, सूक्ष्म शरीर हीं सबसे बलवान है और सूक्ष्म शरीर 18 तत्वों से बना है। उसमें 18 चीजें !! सूक्ष्म शरीर और 18 चीजें !! और स्थूल शरीर में पांच चीजें हैं।
वाह ! क्या कमाल है। स्थूल शरीर में पृथ्वी जल तेज वायु आकाश कुल 5 ,
और सूक्ष्म शरीर में 18 तत्व हैं। पांच प्राण, पांच ज्ञानेंद्रिय, पांच कर्मेंद्रिय, मन बुद्धि अहंकार ये 18।
पंचप्राण आप जानते होंगे - प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान और पंच ज्ञानेंद्रिय भी आप जानते हैं आंख कान नासिका आदि। और पंच कर्मेंद्रिय भी आप जानते हैं - हाथ-पैर वगैरह और एक मन एक बुद्धि, एक अहंकार तीन यह। तो पांच + पांच = दस+ पांच = पंद्रह और तीन ये अठारह तत्त्वों का बना है सूक्ष्म शरीर।
और आपको मालूम होना चाहिए कि यह सुक्ष्म शरीर मरने के बाद भी साथ जाएगा। यह पीछा नहीं छोड़ेगा। आप चाहे कुत्ते बिल्ली गधे की योनियों में जाएं। स्वर्ग में इंद्र बनकर जाएं आप जहाँ जहां जाएंगे यह 18 तत्वों से बना सुक्ष्म शरीर आपकी आत्मा के साथ सम्बद्ध होगा। और यह तब तक सम्बद्ध रहेगा, जब तक इस सूक्ष्म शरीर से आप परे न चले जाएं। अर्थात या तो ज्ञानमार्ग के द्वारा इनको भस्म कर दीजिए, या तो भक्तियोग के द्वारा इनको दिव्य कर दीजिए।
वरना यह ऐसी बीमारी है जो मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ती। आप लोगों का जब मन परेशान होता है संसार में कभी तो आप कहते हैं मर जाए, छुट्टी मिले। यह छुट्टी वुट्टी नहीं मिलेगी क्योंकि आप तो परेशान हैं सूक्ष्म शरीर से और वह तो आपके साथ ही जाएगा। छुट्टी कहां मिलेगी। स्थूल शरीर नें बेचारे ने क्या बिगाड़ा है। परेशानी तो आपको भीतर से हो रही है। मन से हो रही है। सुख-दुख की फीलिंग मन को होती है। तो मन जो दुखी है आपका उसी के कारण आप कहते हैं मर जाए तो अच्छा है। शरीर छोड़ दे तो अच्छा है, तो शरीर छोड़ दो इससे क्या फर्क पड़ना है। दूसरा शरीर मिलेगा। फिर वहां वही बीमारी होगी। क्योंकि वही मन है, वही ज्ञानेंद्रियां है, वही बुद्धि है, सब चीजें वही रहेगी। यह हुआ सुक्ष्म शरीर। एक होता है इससे आगे कारण शरीर। कारण शरीर को समझना बड़ा कठिन है। वैसे आप लोग मोटे तौर पर समझ लीजिए, वासनात्मक शरीर। जिसमें वासना मात्र हो। सब ख्वाहिशों का केंद्र है वो। ये तीन शरीर हमारे लिए परेशानी के कारण बने हुए हैं। ये तीनों से परे जो हो जाए बस वह निर्ग्रंथ हो जाए, माने ग्रन्थि रहित, आनंदमय हो जाए।" :- श्री महाराज जी, प्राणधन जीवन कुंज बिहारी, पेंज 59

ज्ञान, तत्त्वज्ञान और सिद्धांत क्या है ? क्या अंतर है ?

ज्ञान, तत्त्वज्ञान और सिद्धांत क्या है ? क्या अंतर है ? 
श्री महाराज जी बार बार कहतें हैं कि 
" यह सब ज्ञान की बातें हैं ,इसको छोड़ो , केवल तत्त्वज्ञान को और सिद्धांत को हमेशा अपने मस्तिष्क में बैठाए रखो , यह जरूरत के समय सुरक्षा करेगा , तुम्हारी रक्षा करेगा , पतन नहीं होने देगा । "
अब हमको यह अंतर अगर मालुम नहीं है कि कौन ज्ञान है और कौन तत्त्वज्ञान है तो हम किसको छोड़ें , किसको रखें ? 
तो ज्ञान जो है वो तमाम तरह का है भौतिक ज्ञान , संसार का ज्ञान । इतिहास, भूगोल , मैथ जीव विज्ञान आदि ज्ञान है , और भौतिक में सिद्धांत भी है जैसे -तमाम तरह का वैज्ञानिक जैसे - न्यूटन , का आर्कमिडीज आदि का सब जानते हैं , यह सब भी ज्ञान है , पर हमको जानना है केवल आध्यात्मिक- ज्ञान , तत्त्वज्ञान और सिद्धांत ।

तो सबसे पहले हमसब यह जानते है कि ज्ञान चाहे वो भौतिक हो या आध्यात्मिक वो हमेशा सत्य होता है , जो असत्य है वो परिकल्पना है , वो मिथ्या है, यह ज्ञान नहीं है इसमें कोई बहस नहीं ।

अब अध्यात्म में जो जानकारी है वो ज्ञान है और आध्यात्म में जो विज्ञान है वो तत्त्वज्ञान है । और आध्यात्म में जो सिद्धांत है जो संतों द्वारा शास्त्रों से मथ कर वनाया गया है हमारे आध्यात्मिक लाभ के लिए , आध्यात्मिक जीवन मुल्यों के लिए वो सिद्धांत हैं ।

तो जैसे भौतिक विज्ञान का सिद्धांत खोजा गया , दिया गया आर्कमिडीज के द्वारा "प्लवन का सिद्धांत" ठीक उसी प्रकार आध्यात्म का वैज्ञानिक -उनके संत जो सिद्धांत का प्रतिपादन किए और जिसका आदेश , उपदेश हमे दिए , जिससे हमारा परम कल्याण हो सके वो सिद्धांत है । 

अब उदाहरण -नारियल का फल - जिस प्रकार नारियल का फल होता है उसका ऊपरी परत अज्ञान है मान लिजिए थोड़ी देर के लिए , तो उसके अंदर का रेशा , वो ज्ञान है परत दर परत , उसके वाद उसके अंदर फल है उजला , जिसको हम खातें हैं तो यह तत्त्वज्ञान है , और उसका पानी सिद्धांत हैं । और किसी नारियल में फुल है वो भक्ति है ।

तो इस उदाहरण से यह समझ आया की ज्ञान में तत्त्वज्ञान , सिद्धांत और भक्ति छुपा रहता है । यह एक साथ रहता है ‌।
बिना ज्ञान का अज्ञान नहीं जाएगा । और बिना अज्ञान समाप्त हुए तत्त्वज्ञान नहीं होगा । और बिना तत्त्वज्ञान के भक्ति करना असंभव है । असंभव । 
बिना भक्ति किए भगवद् भक्ति "ओरिजनल भक्ति" गुरू द्वारा नहीं मिलेगा ।

अब अच्छे से समझते हैं । एक जीव वो शास्त्र पढ़ लिया और आध्यात्मिक शिक्षक ( विना भगवद् प्राप्त शिक्षक ) से ज्ञान पाया इतिहास की तरह उपर ही उपर वो केवल ज्ञान है उनको तत्वज्ञान नहीं है । तो यह मृत ज्ञान हुआ ।
बिना तत्त्वज्ञान के ज्ञान मृत कहलाता है । क्योंकि तत्वज्ञान ज्ञान का प्राण होता है । 

ज्ञान का उदाहरण- अब वो शिक्षक तमाम प्रोफैशनल प्रवचन कर्ता है बिना प्रैक्टिकल के केवल थ्योरी है उनके पास वो स्पीच देतें हैं जैसे राम की कहानी कह दिया , श्रीकृष्ण की कहानी आदि । मतलब इतिहास की तरह कि दशरथ के पिता का नाम ए था उनके चार पुत्र हुए फिर आगे कथा की तरह कह दिया सभी कांड रामायण का और बोल दिया की भगवान के अवतार थे राम और कृष्ण । फिर और कोई थोड़ा और बोल दिया विष्णु के अवतार थे , फिर पुछा विष्णु कौन थे तो शास्त्रों का शाब्दिक अर्थ बोल दिया विष्णु भगवान थे , पालन कर्ता है यह सब उपर उपर का बात ज्ञान हैं । वो ए भी बोल दिय कि हम आत्मा है । फिर आत्मा क्या है तो बोल दिय परमात्मा का अंश है बस इसके आगे उनको नहीं पता जो तत्वज्ञान है वो नहीं मालुम उनको ठीक ठीक ।

तत्त्वज्ञान का उदाहरण - पर असली संत प्रैक्टिकल संत , भगवद् प्राप्त ओरिजनल जगद्गुरू हीं अपने प्रैक्टिकल अनुभव से तत्त्वज्ञान बता सकते है । क्योंकि तत्वज्ञान थ्योरि की चीज नहीं अनुभव की बात है ‌ ।
जैसे आत्मा किस प्रकार से भगवान का अंश हैं । जैसे यह भगवान श्रीकृष्ण के हीं जीव शक्ति विशेष का अंश है । उनके उर्जा का अंश है, छोटा है ,लिमिट है ,जैसे एक लाख वाट का सौ वाट बल वो है और परमात्मा से हीं प्रकाशित है । परमात्मा प्रकाशक हैं , आत्मा प्रकाशित है परमात्मा सर्वशक्तिमान हैं तो कैसें हैं आत्मा अल्पशक्ति धारक कैसे है आदि आदि।

इसी प्रकार भगवान कौन है? परमात्मा और ब्रह्म कौन हैं क्या अंतर है ? क्या क्या शक्ति प्रकट है अलग अलग तीनों में तो यह तत्वज्ञान हुआ ।

भगवान का , उनका लीला का "नौलेज" ज्ञान है पर भगवान के बारे में और उनके उनके लीला विशेष का उद्देश्य , रहस्य , तत्त्वज्ञान है । ठीक उसी प्रकार भगवान का गुण , भगवान का धाम , उनके संत, उनके शक्ति की बिशेष जानकारी तत्वज्ञान है । माया के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान भी तत्वज्ञान है ।
तो रामायण में , गीता में तमाम ज्ञान है और उनमे छुपा तत्वज्ञान है जो मूल है शास्त्रों का । प्राण है शास्त्रों का ।

जैसे और समझ लिजिए क्लियर हो जायगा उदाहरण से गीता में भगवान अर्जुण को उपदेश दिए तो सतरह अध्याय तक अर्जुण पुछता रहा भगवान ज़बाब देते रहे सब प्रकार का ज्ञान जैसे कर्म , धर्म , राजयोग , जप ,तप , यज्ञ , आसन , प्राणायाम , आदि का वो ज्ञान है ।
फिर अंत में अर्जुण जब यह पुछा कि हे माधव आप कौन हैं , मैं कौन हुं , ए सब कौन है , संसार क्या है लोक परलोक क्या है आदि आदि , तभी वो तत्वज्ञान दिय भगवान और अपना वास्तविक स्वरूप भी दिखाय। 

तो जो तत्वज्ञान दिया । तत्त्व यानी परम तत्त्व यानी भगवान कौन ? उनका रूप , गुण , शक्ति आदि सहित तमाम बातें तत्वज्ञान हैं । और अंत में सिद्धांत बोल दिए भगवान कि तमाम ज्ञान , कर्म , धर्म , पाप पुण्य की चिंता छोड़ मेरे शरण में मन और बुद्धि से शरण में आ जाओ ‌ । तो यह सिद्धांत हुआ ।

अब सिद्धांत - तो भगवान को पाने के लिए उनके संत जो शास्त्रों से मथ कर या स्वयं जो नियम बना दिय साधको के लिए वो सिद्धांत है । जैसे श्री महाराज जी ने चौबिस मुख्य सिद्धांत बतलाए हैं ।जो कितनी बार यहां फेसबुक पर घूमा है सबके सामने से, कुछ उदाहरण तोर पर यह है- जैसे - 
किसी के प्रति दुर्भावना ना करो ।
किसी निंदनिय की भी निंदा ना करों , आज का नास्तिक कल का उच्च साधक हो सकता हैं ।
तो इस प्रकार ऐसी तमाम निर्देश जो है वो सिद्धांत हैं ।
और रूपध्यान का विज्ञान तो हमें दिया ही हैं उन्होंने सभी को कि कैसे इसे करना है ।
तो अब जब भी श्री महाराज जी का यह बात सुनिय कि 'तमाम ज्ञान को फेंक दो , तत्वज्ञान मस्तिष्क में बैठा लो और अपने गुरू द्वारा दिया गया , बनाया गया नियम को फौलो करो । और केवल चार बातें याद रखो,और साधना करो ( चार बातें कौन सी है सबको मालुम ही है ) " तो समझ जाइए कि वो किसको छोड़ने के लिए वोले और क्या याद रखने और क्या करने के लिए । फिर हमें कनफ्युजन नहीं होगा । श्री राधे ।

सच्ची घटना । भगवान के एक भक्त की कहानी ।

सच्ची घटना । 
एक व्यक्ति भगवान को हमेशा गाली देता रहता था अकेले में या सबके सामने । वो भगवान को बहुत से गाली देता रहता था । वो किसी की बातों पर ध्यान नहीं देता था , अपनी मस्ती में रहता था , और भगवान को गाली देता था । 

गांव के लोग जब उसके झोंपड़ी के पास‌ से होकर गुजरते थे भगवान की पुजा अर्चना के लिए मंदिर में सुबह और किर्तन करने जाते थे शाम में तो उसको गाली देता सुनते थे । और फिर सब मिल कर उस बेचारे को भला बुरा कहता था , कोई कोई तो ढेला भी फेंक कर उसको मारता था , पर वो सब हंसी के साथ खुशी खुशी सह लेता और किसी के उपर कोई गुस्सा नहीं करता था । 
उल्टे किसी के कांधे से गिरा गमक्षा संभाल कर रख देता और उसके लौटते समय उसको वापस दे देता था मूस्कुराते हुए ।

कई दिन बीत गया , एक दिन वो व्यक्ति अपने झोपड़ी से गायब हो गया । 
लोगों ने सोचा चलो अच्छा हुआ । वला ठली , एक पापी जो भगवान को चौबिसो घंटे गाली देता रहता था और हम सबके कान में परता था तो हमको भी सुनकर पाप होता था , इससे निजात मिला । वो कहीं जाकर मर गया होगा , अच्छा हुआ , दफा हो गया , अच्छा हुआ ।

अब जिस दिन से वो गायब हुआ उस दिन से वर्षा बंद हो गया गांव में और जिला में । पेड़ पौधा जलने लगा । पक्षी चहकना बंद कर दिया । गाय दुध देना बंद कर दिया ।
गांव के गाय का सभी बच्चे , कुत्ता , बंदर आदि रोने लगता था सुबह शाम ।
चारों तरफ रोग , शोक आ गया । त्राहि-त्राहि मचने लगा ।

गांव वाले एक पहुंचे हुए संत के पास गय और पुछे क्या करूं रात दिन कुत्ता रोता है , गाय दुध नहीं देती है । फुल नहीं खिलते डाली पर , रात को शियार और कुत्ते रोतें हैं सब विमार हो रहे हैं । बहुत उपाय किया कुछ समझ नहीं आता है । अब आपके शरण में हुं । बताईए कौन‌ सा अपराध हो गया हम सबसे । हम सब सुबह शाम भक्ति करतें हैं भगवान का ।
 एक हीं गाली देने बाला पापी था , वो चला गया , अब तो कोई गांव में ऐसा नहीं जो उसके जैसा पापी हो । 
फिर भी हम सब पर विपत्ति आ गई है । ऐसा क्यों ।

तो वो भगवद् प्राप्त संत ने ध्यान किया । फिर कुछ देर वाद वोले ।
तुम्हारे गांव में एक मात्र वही तो धरमात्मा था , वांकी तुम सब लोग पापी हो । भक्ति का दिखावा करते हो नाटक करते हो ।
वो चला गया जो एक हीं पुण्यात्मा था तुम्हारे गांव में। जिसके बल पर तुम सब खुशहाली से थे । पेड़ पौधा , गाय , बछड़ा कुत्ता आदि सब यह जानते हैं । उसके जाने से भगवान श्री कृष्ण उसके पीछे पीछे चले गए । उनके पीछे लक्ष्मीं भी चली गई । अब भोगों ।
सब लोग रोने लगे । पांव पकड़ लिया संत का । आप कुछ करिय । 
संत बोले जिसके प्रति तुम दुर्भावना किया है माफी तो वही देगा । भगवान और मैं भी नहीं माफ कर सकता हुं ।
अब गांव बाले सब मिलकर दर दर का खाक छानने लगा उसको ढुढने के लिए ।
तीन महीने बाद वो मिला । सब उसके पैड़ों में गिर कर माफी मांगा । उन्होंने माफ भी कर दिया ।
 सब लोग बहुत धन चढ़ाया उनके पैर में, वो किसी चीज को हाथ भी नहीं लगाया और अपना झोली उठाया फिर भगवान को गाली देता हुआ , मुस्कुराता हुआ चल दिया किसी अनजान रास्ते की तरफ ।
तो इससे आपको क्या शिक्षा मिली । अपना काम करिए किसी पर अंगुली मत उठाईए । अपनी दो अंगुली की खोपड़ी से । आप सर्वांतर्यामी नहीं जो कौन क्या है जान लेंगें , किसी के बाहरी चाल चलन से आप नहीं जान सकते । नहीं तो आपको हीं बहुत नुक्सान उठाना पड़ेगा । आपका दोस्त आपको छोड़ कर चल देगा । जिसको आप अपना दुश्मन मानने की भूल कर रहें हैं ।
श्री राधे ।

मानव योनि एक विकसित योनि है । मैं इसे सात प्रकार में बांटता हुंँ सबसे पहले , तब समझेगें।

मेरा यह पोस्ट आध्यात्मिक्ता से तटस्थ लेख है जिसमें भौतिक , अभौतिक दोनों का समावेश है । है तो यह श्री महाराज जी द्वारा दिया दृष्टि के प्रभाव का हीं फल । पर उनके अनुयायियों से एक प्रार्थना है कि इस लेख को केवल एक लेख और बिचार के समझ से पढ़े और देखें। 
 बस एक चिंतन है ।

मानव योनि एक विकसित योनि है । मैं इसे सात प्रकार में बांटता हुंँ सबसे पहले , तब समझेगें।
1. परमात्म केंद्रित ( GOD Centric ) Suprime soul.
2. आत्म केन्द्रित ( Soul Centric )
3. मन केंद्रित ( Self Centric )
4. परिवार केंद्रित ( Family Centric)
5. समाज केंद्रित ( Society Centric )
6. संप्रदाय केंद्रित ( community centric )
7. विश्व केंद्रित। ( Universe centric ) 

१. God centric - इसमें वो महान जीव है जो भगवान को पुर्ण निष्काम भाव से प्रेम करतें हैं । ऐसे जीव पराकाष्ठा का भगवद् प्रेमी होतें हैं । यहां तक की वो भगवान या अपने गुरु से इतना प्यार करतें हैं कि भगवान या गुरू की इच्छा हीं उनकी इच्छा हैं । वो दर्शन दें नहीं दें , बदले में प्यार करें या न करें , कोई अपनी कामना नहीं इनको । आध्यात्मिक कामना भी नहीं , भौतिक की तो बात हीं नहीं । ए पुर्ण निष्काम मनुष्य अति दुर्लभ भगवद् अवस्था का प्रतिरूप होतें हैं । परमात्म प्रेम भाव में लीन भीतर से । दुनियां से या किसी से कोई लेना देना नहीं , विल्कूल स्थित प्रज्ञ । भौतिक शरीर , भौतिक संसार में होते हुए भी निर्विकल्प , ना शरीर का भान न ‌संसार का ना अपने आत्मा का । पुर्णपरमहंसावस्था। अद्वैत अवस्था में हरि स्वरूप होते हैं । और जन हित हेतु द्वैत भाव से अपने भगवद् स्वरूप में स्थित होते हुए विश्व के सभी जीवों के आत्मिक कल्याण हेतु शरीर धारण करतें हैं । 

२. Soul centric - ऐसे मनुष्य आत्म केन्द्रित वाले सकाम भक्त होतें हैं । इनको अपने आत्मा का प्रैक्टिकल अनुभूति , आत्म साक्षात्कार या आत्मा का ज्ञान हो गया होता है । आत्माराम होतें हैं पर ए पूर्ण निष्काम नहीं होतें हैं । हां भौतिक बस्तुओं की कामना इनको नहीं होती , ये भौतिक शरीर और संसार को एक साधन समझ कर इसका ख्याल रखतें हैं । अपने संसार का सदुपयोग भर बस । ए भगवद्‌प्रेम चाहतें हैं यही लक्ष्य होता है । आत्मा से परमात्मा के प्रेम को महसुस करना , उनको देखने , सुनने , बातें करने , आलिंगन करने , रस रूप का स्वाद और सुगंध की कामना होती है । ये भक्त होतें हैं । अपने ईष्ट व गुरू से अटूट और अनन्य प्रेम करतें हैं । 

३. Mind centric ( self centric ) ऐसे जीव भगवान और गुरू से अपने आध्यात्मिक प्यास के साथ साथ भौतिक प्यास के पूर्ति की भी कामना रखतें हैं । यानि केवल मैं और मेरा तु । लेकिन पहले मैं तब तु। इनका ध्येय वाक्य है - पहले आत्मा यानि मन तब परमात्मा, ऐसा सोचते हैं । ए मन को हीं आत्मा समझते हैं ।
भौतिक कामना की पूर्ति में व्यवधान आया तो प्यार खत्म , जिस मात्रा में भौतिक कामना की पूर्ति हुई उतना प्यार छलक गया । प्यार का उतार चढ़ाव अपने संसारिक इच्छा के पूर्ति के हिसाब से । तो ऐसे लोग आध्यात्म से और भौतिक संसार दोनों से तटस्थ होतें हैं लेकिन खुद के लिए केवल । खुद को खुद से प्यार है और भगवान से भी प्यार है पर स्व हित के लिए । पुर्ण स्वार्थी , ए भगवान, महापुरूष ,संसार , संसारिक रिस्तों का यानि परिवार , दोस्त , मां बाप , भाई बहन ,‌बेटा वेटी यानि सभी resources का इस्तेमाल खुद के संतुष्टी के लिए करतें हैं । यह खुद का भक्त होतें हैं । 
भगवान का कभी नहीं । हां भ्रम है इनको की हम भगवान का भक्ति करतें हैं , भक्त हैं पर यह सिर्फ भ्रम है ।
इनके लिए मन हीं देवता , मन हीं ईश्वर , इससे बड़ा ना‌ कोई । इनको बहुत अहंकार होता है। जरा सा बात बर्दास्त नहीं अपने मन के खिलाप । 

४. Family centric - परिवार केंद्रित , ऐसे जीवों के लिए खुद के priority के साथ परिवार का भी priority है । तो ऐसे लोग खुद और अपने परिवार तक सिमित होतें हैं । और इसी हित के लिए भगवान को पुजते है ( इनको भी भक्त नहीं कह सकते हैं ) ए पुर्णत: स:स्वार्थी होतें हैं । समाज रहे या नहीं, मैं और मेरा परिवार, जिसमें बहुत अगर है तो मां वाप को भी शामिल कर लिया नहीं तो‌ केवल मैं मेरा पति हैं मेरी पत्नी और मेरा बच्चा है बस इससे आगे कुछ नहीं । वांकी सब नाते , रिस्तेदार साधन है इनके लिए । जरूरत परे मां बाप को भगवान , भाई को भगवान , बहन को देवी स्वार्थ बस और गद्हा को भी बाप बना लेतें हैं । कोई कोई अपवाद स्वरूप मां वाप भाई से , बहन से प्रेम पर १००% निष्काम नहीं और अपने अहंकार का चरम और उसकी तूष्टि से मतलव है । आप सही वोले तो विरोध गलत बोले तो विरोध । इनका आरती उतारिए , ऐ खुश । कल भुल गए आपका विरोध । ऐसे को समझना और संतुष्ट करना असंभव है । कब किस बात पर नाराज़ हो जाए आपको बताऐंगें भी नहीं । बस खफा । 

५. Society centric - ऐ समाज सेवी होतें हैं । मानव‌मात्र , जीव मात्र के लिय दयालु ,‌ लेकिन अपने समाज तक केंद्रित होतें हैं । समाज सेवा के बदले यश , सम्मान आदर चाहिए होता है । नाम भी चाहिए होता है । ऐसे लोगों से समाज चलता है । देश सेवी भी इसी में है। 

६. Community centric ( संप्रदाय विशेष केंद्रित ) ऐ लोग कट्टर होतें हैं , अपने संप्रदाय विशेष को मानने वाले और उसके लिए ही काम करने और लड़ने बोलने बाले। ए लोग सभी चीजों का इस्तेमाल अपने संप्रदाय के अहंकार को तुष्ट करने के लिए करतें हैं । चाहे धर्म ग्रंथ हो या भगवान , जय श्री राम हो या जय शंकर या जय हनुमान या अल्लाह हो या अकबर‌ खुदा हो या कुरान , ईश्वर जीसस हो या खुदा , भौतिक रिसोर्स हो या आध्यात्मिक । पर सब अपने संप्रदाईक अहंकार की पूर्ति के लिए । एक दूसरे को निचा दिखाना और खुद को ऊंचा साबित करने का प्रयास करना , यह विशेषता होती है इन लोंगों की । इनको लगता है कि दुनिया में 12 आना अक्ल सिर्फ मेरे पास है और 4 आने में पुरी दुनियां है । 

७. Universe centric ( विश्व केंद्रित ) ऐसे लोग संसार में महान होतें हैं यह जाति पांति , धर्म , संप्रदाय , चर अचर से उपर उठकर सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय कि चिंता और प्रयास करने वाले होतें हैं । "बसुधैव कुटूंबकं"
ऐसे जीव महात्मा भी होतें हैं और समग्र जीवों के भौतिक कल्याण की भावना वाले होतें हैं , इनका मुख्य ध्यये होता है अपने भौतिक आवश्यकता को कम करो और प्रकृति से तटस्थ होकर जियो । जो आजकल बहुत कम है इस भोगवादी युग में । भगवान ऐसे लोगों को अपना माध्यम बना कर जग कल्याण का काम करतें हैं । ए संत की भांति संसार के जीवों के प्रति निष्काम भाव से समर्पित होते हैं , इनको नाम और बदनामी की कोई चिंता नहीं । बस इनमें सेवा का लक्ष्य सर्वोपरि होता है । 

तो पहला तो अति उत्तम पर्सनैलिटी है । दुसरा उत्तमतर है और सातवां उत्तम पर्सनैलिटी है, पांचवां ठीक हीं है । 
अत: हमको इन चार प्रकार से हीं मतलव रखना चाहिए ।‌ 

( मेरा यह लेख एक भुमिका है आगे के संसारिक लेख के लिए , उस लेख में इनका इस्तेमाल होगा आगे ) 
श्री राधे ।
आपका संजीव ।

Sunday, 11 April 2021

हमारे प्राणों से ज्यादा प्रिय श्री महाराज जी ।

हमारे प्राणों से ज्यादा प्रिय श्री महाराज जी ।
आप हम साधकों का प्राण हैं । आप हमारे ह्रदय सम्राट हैं । आपको गुरू रूप में पाकर हम धन्यातिधन्य हैं । 
आपकी महिमा का बखान करना हम साधारण जनों के लिए असंभव हीं हैं । 
मैं इसे अपना पुण्य पूंज मानु या आपकी कृपा मानु जो आप मिले ।
मैं तो यही जानता हुं और मानता हूँ कि मेरा कोई पुण्य है हीं नहीं , ए तो आपकी करूणा है जो आप मुझे मिले ।
आपके कृपा का थाह नहीं पाता हूँ ।
ये तो आपकी कृपा शक्ति ने मेरे जीवन को संवार दिया ।
मेरे जैसे तुक्ष जीव पर आपकी कृपा का परिणाम है, जिससे मेरे जीवन की दशा और दिशा दोनों श्री हरि की ओर उन्मुख हो गई ।
नहीं तो मैं भी अर्थ , और यश के प्राप्ति के अंधे दौड़ में पड़कर अपने किमती , बहुमूल्य मानव जीवन को यूं हीं गमा डालता ।
आप ने क्या क्या नहीं दिया मुझे भी, इस का लिस्ट बनाना मूश्किल सा है । 

सब आपको कहतें हैं कि आप हरि हैं । मैं भी जानता हूँ और मानता हुँ कि आप हीं साक्षात श्री हरि हैं । अनुभव भी किया है ।

लेकिन मेरे लिए अब एक मात्र आप हीं सबकुछ हैं ।
मेरे गुरूदेव, मेरी मां , मेरे पिता , मेरा भाई , मेरे सारे रिस्ते नातेदार अब आप से शुरू और आप हीं से खत्म होता है ।
अब आपको मैं प्यार इसलिए नहीं करता कि आप हरि का अवतार है ।
वल्कि अब तो आप से अगाध प्रेम इसलिए करता हूं कि आप हीं एक मात्र मेरे सरकार मेरे नाते रिस्तेदार , मेरे मां बाप , दोस्त सबकुछ हैं । 
आपसे बढ़कर अब कोई नहीं है मेरा ।
अब मेरी मृत्यू के समय मैं खुद को अधुरा कभी नहीं समझूंगा । 
मैं आपको पाकर अपना यह मानव जीवन सफल मानता हूं । पूर्ण मानता हूं । भगवद् प्राप्ती पाकर कैसा लगता है मुझे मालुम नहीं । इसका मुझे अनुभव नहीं है ।

मैं तो आपको पा लिया इसी को भगवद् प्राप्ती समझता हूँ।

आपको अपने ह्रदय में पा कर , चौबिसों घंटे महसूस कर मैं कृत कृत हो रहा हूँ आपकी कृपा से ।

अब मुझे लगता है कि कुछ भी पाना शेष नहीं हैं ।

भगवान आप से ज्यादा सुंदर नहीं होंगें ऐसा मुझे लगता है ।
मैंने आपके प्राकृत शरीर में आपकी कृपा से उस दिव्य शरीर को प्रतिपल अनुभव करता रहता हुँ जो आपका वास्तविक स्वरूप है - "श्री राधामहाभाव "।
हे गुरूदेव आपकी सुरत से अलग भगवान की सुरत क्या होगी ! 
आप ने मेरे मन के चंचलता को हर लिया है । आपने मुझको अपने श्री चरणों में बसा लिया हैं । मुझ जैसे तुक्ष प्राणी के दहकते मन को असीम दिव्य शीतलता प्रदान किया है ।

आपने मुझे तत्त्वज्ञान देकर मेरे घोर अज्ञानता को समाप्त किया । 
आपने मुझे अपने साधकपरिवार में सम्मिलित किया है ।

आपने मुझे पूज्यनियां मां रासेस्वरी देवी जैसी उच्च कोटी का गाईड दिया जो माता सम मुझे स्नेह देतीं हैं ।

आपने मुझे उच्चकोटी का गुरूभाई बहन जैसा परिवार दिया । 
आपने मुझे मनगढ सा दिव्य गुरूधाम दिया ।
आपने अपने प्राण सम तीनों अपने पुत्रियों सा दीदी दिया, जो बहुत स्नेह करती है हमें ।।
मैं आपका अनंत काल तक ऋणीं हूँ ।
आपके इस ऋण से ऊऋण होना असंभव है । और मैं चाहता भी नहीं ऊऋण होना ।
मैं आपका पुत्र हु़ँ , आपका दास हूँ ।
मेरी आत्मा पर अब केवल आपका एकाधिकार है गुरूदेव ।
मुझे आपने लक्ष्य भी दिया , साधना भी दी और साध्य भी आपके रूप में मिल गया । और बल भी आप हीं हैं ।
मुझे कुछ भी फिकर नहीं अब । 
अब सारी ईक्छा समाप्त । 
अब तो जब तक यह मानव शरीर है तबतक आपके हीं यादों के सहारे जी रहा हुँ ।
आपके कर्मयोग की शिक्षा, प्रेरणा और बल से मैं जीवन जी रहां हूं । एक ऐसा जीवन जो अनासक्त हैं संसार से ।
अब मेरी आसक्ति तो केवल आपके चरणों से है गुरूदेव ।
मैं आपके प्रेरणा से यह समझ गया हूंँ और आस्वस्त हूंँ, विस्वस्त हूँ कि मेरी मृत्यू के पश्चात आपके श्री चरणों की सेवा हीं मिलेगी और इस आवागमन से छुट्टी मिलेगी ।

अब तो आप जब आऐंगे धरा धाम पर अपनी परकिया भाव की लीला करने तब मैं भी आऊंगा आपके चरणों का दास बनकर । बस अब आपकी सेवा हीं मेरी अंतिम एक मात्र कामना हैं गुरूदेव ।
हे गुरूदेव चीर सनातन मेरे प्राणाधार आपके श्री चरणों में मेरा साष्टांग प्रणाम हैं । मैं एक मात्र आपकी शरण में हूँ।
 आपका और एक मात्र आपका ही संजीव ।
श्री राधे ।

Saturday, 10 April 2021

हमारा सबसे बड़ा अवगुण एक मात्र अहंकार है। ये अहंकार हीं सबसे बड़ा बाधक है प्रेम मार्ग में , भक्ति मार्ग में । और संसारिक कार्य में भी

हमारा सबसे बड़ा अवगुण एक मात्र अहंकार है। ये अहंकार हीं सबसे बड़ा बाधक है प्रेम मार्ग में , भक्ति मार्ग में । और संसारिक कार्य में भी , यही अहंकार सभी झगड़े का जड़ हैं । हमारा यही अवगुण , conflicts  का कारण है । 
इस एक मात्र अवगुण के कारण , काम, क्रोध , ईष्या , द्वेश आदि अन्य दोष उत्पन्न होता है ।
यह अवगुण जबतक नहीं मिटेगी दीनता नहीं आएगी ।
जबतक दीनता नहीं आएगी भक्ति नहीं होगी ।

ए अहंकार इतना खड़ाब अवगुण है कि हम इसी कारण किसी भी भगवद् विषय को महत्त्व नहीं देते । 

हम तत्त्वज्ञान पाने के बाद भी इस सूक्ष्म लेकिन सबसे बड़े अवगुण को समझ नहीं पाते ।
इसी एक मात्र अवगुण के कारण हम दुसरे को छोटा और तुक्ष समझते हैं । अपने को हर जगह बड़ा मानते हैं ।
यहां तक कि भगवद् क्षेत्र में भी हम अहंकार ले आते हैं । हम समझने लगते हैं कि हम बड़ा भारी हरि भक्त और गुरूभक्त हैं । हम भला दुसरे को क्यों महत्त्व दें ।
हम जो काम करते हैं वहीं अहंकार ले आता है हमारे मन में । इसे दूर करने का प्रैक्टिस करना जरूरी है । नहीं तो यह हमें किसी भी चीज में आगे नहीं बढ़ने देगा ।
चाहे संसार हो या अध्यात्म अहंकार का राज हर जगह हमें नीचे हीं गिराता है ।

अरे जब हम खुद भगवान स्वरूप गुरू को पाकर भी , उनके द्वारा दिए गय तत्व ज्ञान पा कर भी हम  अहंकारी हीं  हैं,  तो हम से अच्छा तो वो संसारी है जिनको ऐसा दिव्य चिन्नमय भगवान स्वरूप गुरू नहीं मिला अबतक और अज्ञानता वश अहंकार करता हैं ।
हमें इस अहंकार को समझना होगा । यह बहुत सूक्ष्मतम से सूक्ष्मतम और बड़ा से बड़ा होता हैं ।

हर समय खुद में झांकते रहना होगा ।
Intorspaction करते रहना होगा कि कहीं हममें अहंकार तो नहीं है ।
श्री महाराज जी ने बड़ा अच्छी शिक्षा दिए हैं अहंकार को  समाप्त करने के लिए :-

एक सन्यासी एक पत्थर के मूर्ती के पास खड़ा होकर उस पत्थर की मूर्ति से भिक्षा मांगता था ।
एक व्यक्ति ने उससे पुछा ,' ऐ तुम इस पत्थर के मूर्ति से भिक्षा क्यूं मांगते रहते हो बार बार '
तो वो वोला कि मैं इस पत्थर की मुर्ती से भिक्षा इस लिए मांगता हूंँ यह जानते हुए कि यह भिक्षा नहीं देगा ।
और इस तरह हमारा अहंकार धीरे धीरे कम होगा और जब किसी व्यक्ति से भिक्षा मांगुंगा और वह नही देगा तो मुझे क्रोध नहीं आएगा ।
अहंकार हीं क्रोध की जननी है ।

मैं भी अपने प्यारे गुरूदेव के तत्त्व ज्ञान से लाभ लेता हूँ ।
मैं संसार में या सोसल मिडिया में सबको अपने ऊंचा मानता हूँ । खुद को वास्तव में सबसे नीचा मानता हूं ।
जब कभी अहंकार सूक्ष्मतर रूप में मेरे मन में आता है तो मन को खबरदार करता करता रहता हूं ।
और अहंकार के विपरीत जाकर सबको अच्छा मानता हूं । सबको अहमियत देता हूं । सबमें अपने ईष्ट के उपस्थिति को देखता हुं । सभी जीव हमसे महान है । बड़ा है ।
 यह वास्तव में मैं करता हूं । बड़ा लाभ हुआ है मुझे ।
सदगुरू देव के दिए गय ज्ञान को याद रखना काफी नहीं है वल्कि हरेक तत्व ज्ञान को अपने जीवन में लागु करने का प्रैक्टिस के साथ साथ रूपध्यानसाधना बड़ा आवश्यक है । बड़ा लाभ है । जय जय श्री राधे 
श्री महाराज जी की जय ।

प्रश्न - धर्म अर्थ काम और मौक्ष को कैतव क्यों कहा गया है ?

प्रश्न - धर्म अर्थ काम और मौक्ष को कैतव क्यों कहा गया है ? 
उत्तर - धर्म, अर्थ, काम ऐ सब बंधन कारक है। यानि यह पुनर्पि जननम पुनर्पि मरनम, यानी आवागमन के चक्र में बांधने वाला कारक है इसलिए इस त्रिकर्म को कैतव कहा गया है । और मौक्ष अपवर्ग है  , यह तो बड़ा खतरनाक है । इसे महाप्रभु ने पिशाचनी की संज्ञा दिए हैं । क्यूंँकि मौक्ष प्राप्त होने के बाद ज्ञानि खुद ब्रह्म स्वरूप हो जाता है । आनंदस्वरूप हो जाता है । फिर मैं और मेरा का संबंध खत्म हो जाता हैं । आनंद पा कर आनंदित होना‌ और आनंद स्वरूप बन जाना दोनों में बड़ा भारी अंतर है ।

अब शुभकर्म किया तो स्वर्ग मिलेगा,  स्वर्ग भी माया के अधिन है। मनुष्य हीं शुभकर्म करके ,‌ यानी जीव ही कर्म धर्म करके देव लोक में इंद्र वरूण कुबेर बनतें हैं। और फिर  जब उनके सारे पुण्य क्षीण हो जाते हैं स्वर्ग के भोग द्वारा तो फिर धरती पर उनको मनुष्य का शरीर भी नहीं मिलता।  देवता एक भोग योनि हैं अन्य जीव की तरह, देवता कर्म नहीं कर सकते क्यूंकि शरीर नहीं है मनुष्य के तरह उनके पास। 
और जब उनके सारे पुण्य समाप्त हो जातें हैं तो धरती पर कीड़ा मकोड़ा का यौनि प्राप्त करते हैं। इसलिए ये त्रिवर्ग धर्म, अर्थ काम  के द्वारा मनुष्य ही स्वर्ग या पृथ्वी के राजा तक बनतें हैं। 
इसलिए इसे कैतव कहा गया है, कैतव यानि दोषपूर्ण। 

अब आपको जानकर आश्चर्य होगा की उसमें भी मौक्ष को महा कैतव कहा गया  है !

वो इसलिए कि एक तो अरबों में कोई एक ज्ञानी, अपनी साधना के वल पर , ध्यान साधना के द्वारा,  अष्ठांग योग द्वारा, षठसंपत्ति रूपी पुरूषार्थ द्वारा,  अपने अंत:करण ( मन, बुद्धि ,चित्त, अहंकार) को जला कर भष्म कर देते हैं। 
ये पंच कोष ( अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष ) को भष्म कर देते हैं। और अंत में उनके शरीर में केवल सत्ता रह जाती है। 
सत्ता का मतलव‌ है आत्मा, 
यानि अरबों में कोई एक ज्ञानी जब मौक्ष की कामना लेकर सगुण साकार भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करके  माया से परे हो जाता है तो फिर निराकार ब्रह्म में उनका लय हो जाता है।  और इस प्रकार ज्ञानि आवागमन से मूक्त हो जातें हैं एवं स्वयं आनंदस्वरूप हो जाते है। 
जैसे मीठे जल की नदियां समुद्र में मिल कर अपना स्वरूप खो कर समुद्र रूपी खाड़ा जल हो जाता है। 

ठीक उसी प्रकार ज्ञानी जब स्वयं आनंदरूप हो जातें हैं तो आनंद महसूस उन्हे कैसे हो सकता है भला ? 

एक उदाहरण - एक रसगुल्ला है, यह रस मय है। अब इस रसगुल्ले को हम खाते हैं तो हमें इस रसगुल्ले के रस के आनंद का अहसास होता है। 
लेकिन अगर हम खुद हीं रसगुल्ला में समाहित होकर खुद रसगुल्ला बन जाएं तो फिर क्या हम रसगुल्ले के आनंद को कभी महसुस कर पाएंगें ?
इस प्रकार मौक्ष प्राप्त करने के बाद ज्ञानि का  संसार भी गया, और खुदआनंदस्वरूप हो गए जिससे आनंद का एहसास भी गया हाथ से ।  यानी मानुष तन भी कभी नहीं मिलेगा ज्ञानि को ,  कि फिर से भक्ति करके  सगुण साकार भगवान श्रीकृष्ण के परमानंद को पाने के काबिल हो, उनके प्रेम को पा सके। 
इसप्रकार मोक्ष पाने के बाद ज्ञानि जब खुद ही रसगुल्ला बन गया तो ना कभी संसार मिलेगा फिर से और ना परमानंद की अनुभूति होगी उनको ।

यानि मौक्ष एक ऐसी स्थिति है जैसे कि -
ना खुदा हीं मिला ना विशाले सनम ,
ना इधर के रहें और ना उधर के रहे। 

इसलिए धर्म अर्थ काम और मौक्ष को कैतव कहा गया है ।
श्री राधे ।
( मेरे पास अपना कोई ज्ञान नहीं है । मैं अपने गुरूदेव से प्राप्त ज्ञान के आधार पर  लिखता हुंँ। कहीं लिखने में भुल हो तो क्षमा प्रार्थी )- आपका संजीव

श्री महाराज जी का एक पद् है गुरु बंदना जिसमें एक लाईन है ।" रहत ना रह संसार , जाऊं गुरू चरण कमल वलिहार "

श्री महाराज जी का एक पद् है गुरु बंदना जिसमें एक लाईन है ।
" रहत ना रह संसार , जाऊं गुरू चरण कमल वलिहार " 

इसका अर्थ ही काफी है यह समझने के लिए ।
तो इस लाइन का अर्थ जरा समझना होगा हमें ,  तो जेनरली हमलोग यही समझते हैं कि संसार में रहते हुए भी संसार में आसक्ति ना हो । एक बार कई लोगों से जब पुछा गया आश्रम में कुछ पद के लाईन का अर्थ इसी तरह से तो अस्सी प्रतिशत हमलोग सही सही पूर्ण उत्तर नहीं दे सके । 

और इसका डिटेल्स में जो अर्थ है वहीं काफी है यह समझने के लिए कि महाराज जी अपने शिष्य को डौक्टर , प्रोफेसर आदी बनते देखना चाहते हैं ।

तो मैं जब सबसे  पहले यह पद् समझा था , जो श्री महाराज जी की कृपा से समझा मां से वो यह कि-
 यह कर्मसन्यास को समझने बाला सबसे बढ़िया पद् जिससे मुझे बड़ा प्यार  है और अर्थ ठीक से समझे बिना मैं समझता हुं पद गाना उतना लाभप्रद नहीं होता है ।‌

इसका लाईन का  मतलव , हमारा संसार यानि संसार में कोई डौक्टर बने , इंजीनियर बने या व्यापारी बने , घर बसाया , शादी किया, मां वाप है , दोस्त रिस्तेदार है  । अब एक डौक्टर है उदाहरण के  लिए तो यह उसका संसारिक पद हुआ प्रोफेशन में । और फिर उसका परिवार है , यह भी उसका संसार है ,दोस्त रिस्तेदार यह भी उसका संसार है और उसका पेसेंट है तो यह भी उसके कार्य क्षेत्र का , प्रोफेशन का, सेवा का परिवार है । 
तो इस प्रकार कोई यह सब संसार के होते हुए भी सेवा भाव से परिवार का भरण पोषण , पेसेंट को सेवा भाव से देखें पर मन से अनासक्त ही रहे इस अपने बाहर के संसार से ,  भीतर से यानि मन से इन सभी से अनासक्त रहे बाहर के संसार से हमेशा सब काम ठीक ठीक करते हुए ।
तो इस प्रकार हमें हमारे संसार का होते हुए भी संसार हमारे भीतर नहीं है । हमारे भीतर केवल हमारा गुरू और हमारा श्याम सुंदर हीं है ।
तो यह असली अर्थ है स्पष्ट रूप से "रहत ना रह संसार " का ।‌

 श्री महाराज जी का सिद्धांत मन के सन्यास से है ना की शरीर के सन्यास से  । मन से सन्यास का मतलव माया से मन कि आसक्ति का मिटना । अनासक्त भाव से संसार में डोक्टर आदि बनने से मना कतई नहीं है । जबकि वो चाहते हैं कि उनका शिष्य डौक्टर आदि हो ।
 उन्होंने यह नहीं कहा कि शरीर से डौक्टर इंजिनियर , आइ ए एस ना बनो । वो तो यह सब बनने के लिए कहें हैं कर्मयोग के लिए । भक्तियोग के लिए । वो तो पक्षधर थे कि बढ़िया से बढ़िया आदमी बनों पोस्ट पाओ , पर आसक्ति ना हो पोस्ट में , पैसा में , संसार में । पोस्ट पा कर सेवा करो ज्यादा बढ़िया से । लोगों को जोड़ों । अपने बच्चे को जोड़ों  उसके बच्चे को जोड़ों । आसक्ति विहिन भौतिक विकाश के साथ आसक्ति युक्त आध्यात्मिक विकास ज्यादा से ज्यादा हो यह उदेश्य है हमारा  ।
तो हम लोग सत्संग तो करते है रात दिन पर उनके प्रचारक का ध्यान से नहीं सुनते जब वो पद की व्याख्या करते हैं तो हमारा ध्यान कहीं और चला जाता है और हमें पता भी नहीं चलता की हमारा ध्यान भटक गया था और महत्वपुर्ण  व्याख्या छूट गया । इसिलिए कुछ बच्चे लोग पद आदि टाईप करके पोस्ट तो करते हैं पर उसका उल्टा अर्थ लगा लेते हैं कि श्री महाराज जी संसार हीं छोड़ देने के लिए कहा है । यह बड़ा खतरनाक है ।
और फिर लाईन बाई लाईन अर्थ समझे गवईया के तरह गाना और झुमने से कोई लाभ कभी भी होगा क्या ?
इसलिए तो श्री महाराज जी बराबर गौरांग महाप्रभु का यह बात बोल देते हैं कि 
बहु जन्म यदि करें श्रवन किर्तन ,
तऊ नाई पाए श्री कृष्ण पदे प्रेम धन।।

तो इस प्रकार ना पद गाने से कुछ लाभ होगा और ना मंदिर में भगवान की तरह फुल माला चढ़ा कर आरती उरती करने से , रह सब तो संसार में अनेकों साल से लोग करते ही आए हैं भगवान का पुजा , आरती आदि ।‌
जब गुरू बंदना का सही अर्थ कुछ भोले बालक नहीं समझते तो वांकी पदों का बात हीं छोड़िए । 
तो हमें बहुत सतर्क होकर सुनना चाहिए प्रचारकों का। इसलिए उनके द्वारा पहले कह दिया जाता है कि अब आपलोग समाहित चित् हो जाईए और  होकर सुने । पर हम शरीर से केवल सतर्क होकर बैठ जाते हैं , मन कहीं और रहता है ‌ । जब की कहा जाता है समाहित चित् यानि मन से सावधान । 
श्री राधे ।