Friday, 24 May 2024

प्रश्न :- मन और चेतना क्या अलग अलग वस्तु है या एक हीं है अन्तर क्या है? सुख और दुख कि कारक चेतना है या मन? कृपा करके मेरे संसयकाे दुर करेगें ?

प्रश्न :-   मन और चेतना क्या अलग अलग वस्तु है या एक हीं है अन्तर क्या है? सुख और दुख कि कारक चेतना है या मन? कृपा करके मेरे संसयकाे दुर करेगें ?

मेरा उत्तर :- अंत:करण चातुष्ट मन बुद्धि, चित तथा अहंकार को कहते हैं । संक्षिप्त में :- बिचारो का प्रवाह है मन  और चेतना प्राण वायु या प्राण उर्जा का प्रवाह है । 
संक्षिप्त में बताऊं आपको कि अंतःकरण चातुष्ट्य मन बुद्धि चित्त  और अहंकार को कहते हैं । 
यह हमारे सुक्ष्म शरीर का अंग है ।
मानव शरीर में आत्मा अपने कारण शरीर ( अपनी अतृप्त इच्छा, वासना  और प्रारब्ध ) एवं सुक्ष्म शरीर के साथ प्रवेश करती है । हमारा यही कारण शरीर भगवान द्वारा फल के रूप में निहित प्रारब्ध के कारण तय योनि में स्थूल शरीर के प्रकार को प्राप्त करता है । अगर मानव शरीर मिला तो फिर कुल , गोत्र,  धर्म,  जाति , देश , गांव,  अमीर , गरीब परिवार , गुण प्रकार परिवार (जैसे सात्विक ,राजसिक या तामसिक ) में जन्म होता है । 
जैसे हीं शरीर में आत्मा का प्रवेश होता है वैसे ही शरीर का यह सौफ्ट वेयर जिसको अंत:करण चातुष्ट्य कहते हैं  एक्टीभ हो जाता है । यानि शरीर में दस प्रकार के प्राण 72000 नाड़ियो द्वारा पुरे शरीर को चेतन मान कर देती है।
जिसमें पांच प्रमुख प्रान , यानि 1 प्राण ,2 अपान ,‌3 व्यान , 4 समान, और 5 उदान  , एवं तीन मुख्य नाड़ियां इड़ा , पिंगला , सुषुम्ना नाड़ी है । 
और अंतिम दसवां प्राण धनंजय कहलाता है जो मरने के बाद जब तक देह का फुनरल यानी जलाने के बाद हीं शरीर से निकलता है अग्नी मार्ग द्वारा ।

तो अब विज्ञान से भी साबित है ( सिगमंड फ्रायड का नाम सुना होगा मशहुर साईक्लोजीस्ट  ) 
जिसने भी सिद्ध किया की 
जीव तीन अवस्था में ही जीता है जब तक जीता है तबतक , ये तीन अवस्था है - 
१. जागृत ( जिसको conscious  mind कहते हैं )
 २. अर्ध जागृत ( जिसको subconscious mind ,) 
३. पूर्ण सुसुप्ति ( जिसको unconscious mind ) कहते हैं ।
और 99.9% मानव इड़ा और पिंगला में हीं तमाम उम्र गुजार देते़ है । 

पर संत महापुरुष , असली भक्त , योगी आदि सुषुम्ना में अपने प्राणों के संचार को तीव्र और स्थिर कर लेतें हैं । जिससे वो जीवन और मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर अपनी इच्छा से इस मृत्यु लोक में आते जाते हैं । उनपर काल का बस नहीं चलता । वे स्वेच्छाचारी होते हैं , सुसुप्ति अवस्था में भी हमेशा जागृत रहते हैं । या यूं कहिए की वे हमेशा हर अवस्था में जागृत रहतें हैं । जिसको जागृत महावस्था कहते हैं सर्वांतर्यामी अवस्था, सर्व दैविय शक्ति और ईश्वरीय गुणों से सम्पन्न । (always awakening ) जैसे हमारे प्रभु श्री कृपालु महाप्रभु जी ।

और हम लोग इड़ा या पिंगला नाड़ी में ही जीते हैं तो जिसका जो नाड़ी अधिक एक्टींभ होगा वो उसी प्रकार के दो प्रकार के गुणों यानि रजोगुण या तमो गुणी स्वाभाव का होगा । उसका प्रसनैलटी , सोच बुद्धि आदि उसी गुणों के सापेक्ष में होती है । जिसका अनुभव सबको है । कि वो किस प्रकार के सोंच व व्यक्तित्व  का जीव है । 

पर जो जीव ( साधक ) महान महापुरूषों के संग में आ जाता है तो धीरे धीरे उनका सुषुम्ना नाड़ी में दिव्य प्राण उर्जा का  प्रवाह अपने आप शुरू होने लगता है  पर यह साधना के स्तर पर निर्भर करता है । चाहे वो भक्ति मार्गी हो या जप तप , योग मार्गी । पर कलयुग में केवल भक्ति मार्ग जल्दी और तुरंत फलदाई है । 

वांकी आज के तथाकथित योग केवल दो नाड़ी यानि इड़ा और पिंगला को ही मैनेज करती है रामदेव बाबा वाला योग  , जिससे कफ पीत वात को ठिक करके जीव रोग  मुक्त हो सकता है । पर भक्ति से सुषुम्ना नाड़ी एक्टिभ हो जाता है , जिसका प्रारंभिक  प्रमाण है तत्वज्ञान , यादास्त आदी काफी मजबुत हो जाना ।  मैं यह आपको अपनी यादाश्त से लिख के ज़बाब दे रहा हुं । और अगर आप फिजाकली सामने होते तो और भी डिटेल्स में आपको बता पता ।

सुषुम्ना नाड़ी में प्राणों की ज्यादा प्रवाह जीव को पहले सतोगुणी बनाता है । फिर भगवद् प्राप्ति के साथ हीं निर्गुण हो जाता है । और जैसे हीं निर्गुण होता है उसी क्षण गुरू द्वारा शरीर दिव्य हो जाता है और फिर कमाल होता है। उस जीव कि चेतना दिव्य होकर उसका प्रवाह भगवान के तरफ होने लगती है , और भगवान को इन्हीं आंखों से देखने लगता है । तो मन तभी एक्टीभ होता है जब शरीर चेतन मान हो , अतः चेतना प्राण उर्जा का प्रवाह है और मन बिचारों के प्रवाह है । दोनों अलग है । पर यह तभी काम करेगा जब शरीर चेतन मान हो , जैसे कार तभी चलेगी जब उसमें पेट्रौल हो ,फिर उस पेट्रोल से अग्नी रूपी प्राण उत्पन्न होकर कार को चलाएमान करता है और मन ड्राईवर है जो उस कार का संचालन और दिशा देता है  । 

और सुख दूख का कारण मन है , यही सुख दुख का अनुभव अपने तीन गुणों के प्रभाव वश करता रहता है । जिस समय जिस गुण में स्थिर या लय रहता है जीव को उसी प्रकार का अनुभव होता है । एक ही परिस्थितियों को अपने इन्हीं गुणों के प्रभाव के वश अलग अलग सुख दुख के मात्रा और प्रकार को फिल करता है जीव ।
  श्री राधे । : -  संजीव कुमार ।

Thursday, 23 May 2024

एक और अवतार इसी बैवस्वत मन्वंतर में होगा , श्री कृपालु महाप्रभु फिर आएगें । जानने के लिए पढ़िय :-

एक और अवतार इसी बैवस्वत मन्वंतर में होगा , श्री कृपालु महाप्रभु फिर आएगें । जानने के लिए पढ़िय :- 
यह सभी जानतें हैं कि श्री कृपालु महाप्रभु जी श्री राधाकृष्ण के अवतार हैं राधाकृष्ण का कृपावतार , सर्वोतकृष्ट अवतार । ऐसा अवतार एक कल्प में सिर्फ एक बार होता है । 
गौरांग महाप्रभु, भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी का हीं युगल अवतार थे । इस‌ श्रीगौरांग अवतार काल में भगवान श्री कृष्ण अपने हीं आत्मा श्री राधा रानी के ह्रदय को धारण करके अपने हीं रस रूप गुण और लीला का पान किय थे । 
जो वो ब्रज में आज से 5,178 बर्ष परकीया भाव के लीलावतार मे खुद न पा सके । 
ब्रज के वृन्दावन में वो लगभग एगारह वर्ष हीं रहे और पुर्व निर्धारित अनुग्रहित जीवों ( गोपियां जो की ऋषि मुनि थी रामावतार काल के जनकपुर , अयोध्या , दणडकारण्य आदि की ) पर प्रेम रस लुटाया , किन्तु खुद अपने प्रेम रस से वंचित रह गए । 

उसी प्रेम रस का ( यानि अपनी आत्मा श्री राधा रानी के अपने प्रति प्रेमरस का आस्वादन हेतु ), पान करने के लिय गौरांग अवतार लेकर आए । 
फिर वो कृपालु कृपावतार में उसी विलक्षण प्रेम रस को अपने पुर्व निर्धारित जनों में वितरित करने हेतु एक और अवतार लिए । इसलिए यह पुर्वनिर्धारित हम सब जीव बहुत गुढ़ रहस्य हैं । जो करोड़ो जीव पांच हजार दो सौ साल पहले उनके ब्रज में भी उनके प्रेम रस से वंचित रह गए थे और कामना की थी प्रार्थना की थी , भक्ति की थी उनके ब्रज से जाने के बाद उनके प्रेम रस को पाने के लिए । उन उन जीवों को वहीं युगल सरकार कृपालु अवतार में अपने उसी प्रेम रस को वितरित किय उन जीवों को जो उस समय तीव्र भक्ति किया था । उन जीवों को अपने भक्ति भावों की तीव्रता और गहराई के अनुसार मिला । इस अवतार में उनके द्वारा गुढ़ दिव्य तत्त्व ज्ञान हमें मिला , मार्ग दर्शन मिल गया और मिल रहा है लगातार । उनके द्वारा अपने इस‌लीला के कुछ प्रेम का झलक भी मिला और मिल रहा है हमें ताकी हम और प्रयास बढ़ा‌ दें अपना , आगे जुड़ने वाले को भी मिलेगा । यह जन्म तैयारी के लिय है हमें अधिकारित्व प्राप्त करने हेतु ।

 अतः भगवान श्रीराधाकृष्ण की श्री गौरांग लीलावतार अपने राधाभावमयी प्रेम रस का स्वपान हेतु हुआ था और वो अपनी मां, "शची माता" को कह कर गय थे कि मेरा दो अवतार और होगा । और दोनों अगले अवतार में तुम हीं मेरी मां बनोगी । 
उन्होने एक अवतार पांच सौ साल बाद लेने का संकेत दिया था । उनका यही अवतार श्री राधाकृष्ण का कृपावतार श्री कृपालु महाप्रभु अवतार है ।
जो अनुग्रहित पुनर्निर्धारित जीवों के कल्याण के लिए सर्वोत्कृष्ट अवतार है । इस अवतार में श्री महाप्रभु ने अपने जिस रस का पान किया था गौरांग अवतार काल में , वही वो अपने पुर्वनिर्धारित जीवों के मध्य वितरित किए और कर रहें हैं आज लीला संवरण के बाद भी अपने प्रचारक जनों के द्वारा ।
अब आगे एक और अवतार होगा इसी बैवस्वत् मन्वंतर में । ( याद रखिए भगवान श्री राधाकृष्ण का प्रत्यक्ष अवतार , गौरांग अवतार और श्री कृपालु महाप्रभु अवतार इसी बैवस्वत मन्वंतर में हुआ था ) 
हां श्रीराधाकृष्ण फिर आऐगें एक बार , अंतिम बार इस बैवस्वत मन्वंतर में फिर कृपालु कृपावतार होगा । 
इसका उदेश्य अपने कृपालु अवतार में जो लोग श्रीकृपालु महाप्रभु को हीं अपना गुरू मान कर उनका भजन कर रहें हैं उसकी तृप्ति के लिए , अपने परम दिव्य रस का पान कराने के लिए आऐगें । इसलिए सिरियस हो जाईए, अवसर चुके ना । यह चुके तो फिर ऐसा अवसर कबहु नहीं मिलेगो । कितनी भी परीक्षा हो इस जीवन में , लगे रहिए । 
उनका अगला अवतार होगा हम प्रेम रस से वंचित रह गए जीवों को प्रेम रस देने के लिए , हमें एक बार फिर मानव देह मिलेगा उनकी कृपा से और माहौल भी मिलेगा और हमारा यह जन्म भी उनकी कृपा से याद हो जाएगा प्रेम रस मिलने के बाद की हम कितना भक्ति कर रहे हैं अभी ।
जो जो लोग उनका भजन कर रहें जिस भाव से उसको उसी प्रकार अधिकारी बना कर वो प्रेम रस देने के लिए एक अंतिम अवतार, इसी कल्प के इसी बैवस्त मंवतर में लेंगें । यह चैतन्य महाप्रभु जी द्वारा उनका आप्त वचन है अपनी शची मां को ।
और श्रीकृपालु महाप्रभु जी ने भी अपने कुछ प्रवचन में हमें स्पष्ट संकेत देते हुए कहें हैं कि " मुझे एक बार फिर नाक के बल आना होगा " , उन्होंने यह भी कहें हैं कि "हमारे अनुयायियों को फिर से मानव देह मिलेगा क्योंकि ए लोग राधे राधे रटते हैं" । श्री राधे । :- मां रासेश्वरी देवी जी और स्वामी श्री युगल शरण जी के प्रवचन के आधार पर ।

" जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः। केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोस्मि तथा करोमि॥' :- दुर्योधन

प्रश्न - कुछ लोग धर्म कर्म तथा तत्वज्ञान जानते हुए भी भगवान कि ओर नहीं चलते और कुछ लोग किसी महापुरुष से थोड़ा सा जानते हीं तुरंत संसार से एवाऊट टर्न लेकर गुरू के शरणागत होकर भगवान के हो जाते हैं , क्या कारण है ? 
उत्तर :- इस बात को समझने के लिए दो सबसे बढ़िया उदाहरण है - एक अर्जुन का और दुसरा दुर्योधन । दोनो महत्त्वपूर्ण है इस बिषय को जानने ,‌ समझने के लिए ।

याद होगा सबको कि भगवान पांडवों के तरफ से शांतिदूत बन कर गए थे हस्तिनापुर में । धृतराष्ट्र के दरवार में दरवारियों कि सभा बैठी हुई थी । 
भगवान श्री कृष्ण दुर्योधन को समझा रहें हैं कि पांच गांव हीं दे दो पांडवों को सिर्फ। भगवान ने बहुत लौजिक दिया कर्म धर्म का भरी सभा में ।
पर दुर्योधन कहता है भगवान् को कि - 

" जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः। 
केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोस्मि तथा करोमि॥' 
यानि मैं जानता हूँ कर्म-धर्म अच्छी तरह से लेकिन मेरी प्रवृत्ति इनमें नहीं है , मेरी रूचि इन बिषयों में नहीं है । और मैं अधर्म भी जानता हूँ अच्छी तरह से , लेकिन मेरी निवृत्ति न हुई इससे , यानि संसार से आसक्ति समाप्त नहीं हुआ । भोग विलास तथा सत्ता से मुझे वैराग्य नहीं हुआ है इसलिए मैं कर्म धर्म को जानते हुए भी इससे विमुख हुं । 

मतलव वो कह रहा है कि " हे कृष्ण मुझे प्रवचन मत दिजिए धर्म क्या है अधर्म किसे कहते हैं यह मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं, पर मैं क्या करूं ? मेरा न धर्म में प्रवृत्ति हो पा रही और ना अधर्म से निवृत्ति हो पा रही है ।‌ क्योंकि मेरी मनोवृत्ति हीं ऐसी है । मतलव मेरी ( व्यक्तित्व )पर्सनैलिटी हीं ऐसी है ।
हे कृष्ण एक हीं गुरू द्रोण और कृपाचार्य कुल गुरू के हम सब शिष्य हैं (यानि कौरव सौ भाई और पांडव पांचों भाई ) । दस हजार हाथियों का बल भीम में हैं तो मुझमें भी दस हजार हाथियों का बल है पर हम दोनों की मनोवृत्ति अलग अलग है । इसलिए प्रवृत्ति भी अलग अलग है। "

अब आप सब यह भी जानते हैं कि अर्जुन क्या पुछा भगवान से, जब गीता का ज्ञान दे रहे थे भगवान कुरूक्षेत्र में । 
अर्जुन पुछ रहा है :- 
चंचलं हि मन:कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ।। ( गीता.६.३४)
वो कहतें हैं भगवान से की यह मन हीं तो बश में नहीं है , मन का ही गुलाम हुं मैं , आप कहें तो मैं हवा का रूख को मोड़ दु़ , नदी के धारा को बदल दुं , पर मन को बश में करना बहुत कठीन है । इसलिए हे श्री कृष्ण यह बतलाइए मैं अपने मन को बश में कैसे करूं ? हे जगद्गुरु श्री कृष्ण मैं अपने मन बुद्धि को आपमें कैसे निवेश कर दूं । यानि आपकी शरणागति कैसे करूं ? 
तब भगवान बोलते हैं कि - 
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।(गीता 6.35।।)
(आप सब भावार्थ जानते हैं इसका । लिखने की जरूरत नहीं है ।)
 अर्जुन को तत्वज्ञान में रूचि है , वो तत्वज्ञान अपने सखा श्री कृष्ण से नहीं वल्कि उनको गुरू मान कर समझने में रूचि दिखाई और इस प्रकार गीता का प्रकटीकरण हुआ जगद्गुरु श्री कृष्ण के मुख से । 

अर्जुन जानता था यह बात कि ज्ञान तो भगवद स्वरूप गुरू से हीं मिल सकता है भगवान से डायरेक्ट नहीं , इसलिए बड़े बुद्धिमत्ता से उसने श्री कृष्ण को गुरू मान कर , तथा बोल कर संबोधित किया । 
अब गुरू को अपने शिष्य के अज्ञान को मिटाना हीं होगा । इसलिए भगवान सत्तरह अध्याय तक अर्जुन के प्रश्नों तथा परिप्रश्नों का जबाब देते रहे । यह संबाद हीं गीता है । 
अंत में अर्जून शरेंडर कर देता है खुद को ( हालाकी अर्जुन पहले से हीं महापुरुष हैं, हम जीवों के शिक्षा के लिए वो यह सब कर रहा हैं , पांडव शरेंडर तो पहले से हीं है भगवान के प्रति । इसलिए तो अर्जुन भगवान‌ से सेना ना मांगकर भगवान को ही मांग लिया था । )

तो दोनों में अंतर है । अर्जुन को प्रपत्ति यानि शरणागत है ।
प्रपत्ति मूला भक्त हैं अर्जुन यानि शरणागत भक्त है वो , इसलिए उसका मनोवृत्ति बदल गया है , मनोवृत्ति बदल गया तो उसकी प्रवृत्ति यानि आचरण धर्मानुकूल हो गया है। इसलिए उसका व्यक्तित्व बदल गया है , इसलिए आज भी अर्जुन के प्रति लोगों का आकर्षण है, आदर है , अर्जुन का व्यक्तित्व आकर्षित करता है सज्जन को । 
पर दुर्योधन का वृत्ति नहीं बदला ,, वो प्रपत्त नहीं है। किसी का भी नहीं , भगवान‌ को तो छोड़िए यहां तक कि ना भीष्म का , न तत्वज्ञानि ताऊ श्री विदुर जी का और न अपने गुरू का ।

 क्योंकि वो माया के दुर्गुण रूपी शकुनी से प्रभावित हैं इसलिए उसकी निवृत्ति अधर्म से नहीं हुआ अंत तक । जैसी संगती वैसी मनोवृत्ति, जैसी मनोवृत्ति वैसी प्रवृत्ति , जैसी प्रवृत्ति वैसी वृत्ति , जैसी वृत्ति वैसा संकल्प , जैसा संकल्प वैसा दृष्यमाण कर्म - यह सिद्धांत है वेद का ।
अत: उसकी मनोवृत्ति अशुद्ध है इसलिए वो उपहास का पात्र है आज भी । और यही कारण था कि अग्नी पुत्री यानि यज्ञशैनी द्रोपदी उस पर व्यंग करते हुए कहा की अंधे का पुत्र अंधा , क्योकि एक स्वाभाविक विकर्षण था उसके प्रसनैल्टी में । मजाक का पात्र बना लिया था खुद को दुर्योधन । अत: गलत लोगो से दुर रहना श्रेयकर है । 

यही कारण है कि तत्वज्ञान केवल जानने से , या समझने से या सुनने से कुछ नहीं होगा । हम संगति किसका कर रहे हैं ? यह महत्वपूर्ण है । जिसकी जैसी संगति उसकी वैसी प्रवृत्ति अपने आप हो जाती है । जिसकी जैसी प्रवृत्ति वैसा आचरण हो जाता है । 
इसलिए हमारे गुरूवर ने कहा है , आदेश दिया है हमें कि सत्संग भले न मिले , या कम मिले लेकिन कुसंगी से दुर रहो । संगति अच्छे लोगों का करो, अच्छे साधकों का करो । 
तब व्यक्तित्व बदलेगा , व्यक्तित्व बदलेगा तो संकल्प भक्ति अनुकूल होगा । संकल्प भक्ति अनुकूल होगा तो वृत्ति शुद्ध होगी । अंत:करण शुद्ध होगा । अंत:करण शुद्ध होगा तो गुरू उसमें दिव्य शक्ति देगा । जब दिव्य शक्ति मिलेगा तो लक्ष्य मिल जाएगा । 

तो यही कारण है कि कलयुग में अधिकतर लोगों कि रूचि हीं नहीं है तत्वज्ञान में । गलत संगति के कारण प्रसनैल्टी डिजऔर्डर का शिकार है अधिकतर लोग आज और कष्ट पाने के बाद भी समझ नहीं । अच्छी बातें न पढ़ना चाहते हैं और न सुनना । केवल मादक बिषयों को सुनने में और उसमें लिप्त रहने में ही रूचि है अधिकतर की । 

 अब बात करते हैं कि यह व्यक्तित्व बनता बिगड़ता कैसे हैं । तो यह अंत:करण चातुष्ट्य के विज्ञान का कमाल है ।
आप सब जानते हैं कि यह अंत:करण चातुष्ट्य क्या हैं ?
मन , बुद्धि , चित् और अहंकार को अंत:करण चातुष्ट कहते हैं । तो ऐ मन क्या है बुद्धि क्या है ,‌ चित् किसे कहतें हैं , अहंकार क्या हैं ? यह कहां रहता है शरीर में कैसे काम करता है यह ? कैसे यह संस्कार को शुद्ध करता है !
फिर यह मशीन‌ कैसे हमारा उद्धार करता है और बर्बाद भी ? 
कैसे यह शुद्ध होता है कैसे और कैसे अशुद्ध हो जाता है ?
तो यह एक विज्ञान है इस पर चर्चा अगले पोस्ट में होगी । 
:- पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन का जीस्ट ( सार )

Friday, 17 May 2024

पुष्पक विमान।

शरीर छुटने के वाद कृष्ण दिवानो को श्री कृष्ण स्वयं अपना निज विमान भेज कर लिवाने भेजते है. दुनिया से मत उम्मीद रखो भइया ये तो आज साथ कल भुल जाते हैं , राधे राधे बोल राधे राधे बोल .

अतुलनीय पुष्पक विमान- बाल्मीकि रामायण मे स्पष्ट लिखा है कि शिल्पाचार्य विश्वकर्मा ने ब्रह्मदेव के लिये दोव्य पुष्पक विमान की रचना की। प्रभास नामक बसु की पत्नी महासती योग सिद्धा श्री देव शिल्पी विश्वकर्मा की माता है। देवताओं के समस्त विमानादि तथा अस्त्र-शस्त्र इन्ही के द्वारा निर्मित है। 
लंका की स्वर्ण पुरी द्वारका धाम भगवान जगन्नाथ का दारुक श्री विग्रह इन्होने ही निर्मित किया। इनका नाम त्वष्टा है। सूर्य पत्नी संज्ञा इनकी पुत्री है। इनके पुत्र विश्वरुप ओर वृत हुए सर्वमेघ के द्वारा इन्होने जगत की सृष्टि की ओर आत्म बलिदान करके निर्माण कार्य पूर्ण किया। समस्त शिल्प के ये अआदि देवता है। 
भगवान राम के लिये सेतु निर्माण करने वाले वानर राज नल इन्ही के अंश से उत्पन्न हुये थे। हिन्दू शिल्पी अपने कर्म की उन्नति के लिए भाद्रपद की संक्रान्ति को इनकी आराधना करते है। देवताओं के गृहकार उत्तम विमानों मे सबसे अधिक आदर पुष्पक विमान का ही होता था। जिसके निर्माता श्री विश्वकर्मा है। उस पुष्पक विमान का वाल्मीकि रामायण मे बडा विस्तृत वर्णन किया गया है जो इस प्रकार है। 
मेघ के समान ऊंचा सुवर्ण के समान सुन्दर कान्तिवाला पुष्पक भूतल पर बिखरे हुए स्वर्ण के समान जान पडता था। अनेकानेक रत्नों से जडित, भाति-भांति के वृक्षों के फूलों से आच्छादित तथा पुष्पों के पराग से भरे हुए उस पर्वत शिखर के समान शोभा पाता था। विन्ध्यमालाओं से पूजित मेघ के समान रमणी रत्नों से देदीप्यमान था।
श्रेष्ठ हंसों द्वारा आकाश मे ढाये जाते हुए देखता था। बहुत ही सुन्दर ढंग से उसका निर्माण किया गया था जो अद्रात शोभा सम्पन्न दिखता था। अनेक धातुओं के कारण पर्वत शिखर गृहों और चन्द्रमा के कारण आकाश और अनेक वर्णों से युक्त होने के कारण वह विमान विचित्र शोभा सम्पन्न दिखता था। 
उस विमान की आधारभूमि सोने के द्वारा निर्मित कृत्रिम पर्वतमालाओं से बनाई गई थी। वे पर्वत वृक्षों की विस्तृत पंक्तियों से हरे भरे रचे गए थे। वे वृक्ष फूलों के बाहुल्य से व्याप्त बनाए गये थे। तथा फुलों की पंखुडियों से पूर्ण निमित्त थे उस विमान मे श्वेत भवन बने हुए थे। पुष्पक विचित्र वन और अद्धैत सरोवरों से चित्रित किया गया था। वह पुष्पक रत्नों की आभा से प्रकाशमान था और कही भी भ्रमण करता था। 
नाना प्रकार के रत्नों से विचित्रवर्ण के सर्पों का नक्काशी किया गया था। अच्छी जाति के घोडों के सुन्दर अंग वाले अश्व भी बनाए गये थे। उस पर पक्षियों के सुन्दर मुख और मनोहर पंख वाले बहुत से ऎसे विंहगम चित्र निर्मित थे जो साक्षात कामदेव के सहायक जान पड्ते थे। उनकी सारे फर्श , दिवाल मूंगे और सुवर्ण के बने फूलों से युक्त थी। तथा पक्षियां रूपी परियां लीलापूर्वक अपने पंखों को समेट रखा था। जो लक्ष्मी का अभिषेक करते हुए से नियुक्त थे। उनके साथ ही तेजस्विनी लक्ष्मी की प्रतिमा भी विराजमान थी। जिनका उन हाथियों द्वारा अभिषेक हो रहा था। इस प्रकारसुन्दर कंदराओं वाले पर्वत के समान तथा बसंत ऋतु मे सुन्दर कोटरों वाले परम सुगंध युक्त वृक्ष के समान वह विमान बडा मनोहारी था।  
उस विमान की विशेषता थी कि वह समयानुसार छोटा या बडा किया जा सकता था तथा उसमे मन की गति से चलने की क्षमता भी थी। अपने स्वामी की इच्छानुसार उसमे गति होती थी तथा चाहे जितने लोगों को यात्रा करवाने की पूर्ण क्षमता थी। जो आकाश मे स्वामी की इच्छानुसार भ्रमण कर सकता था। 
आज के अति वैज्ञानिक कहे जाने वाले युग के बने अति आधुनिक विमान भी उस पुष्पक विमान की जो श्री विश्वकर्मा द्वारा निर्मित था, कोई तुलना नही की जा सकती। ऎसा था वह विमान "पुष्पक विमान:। पुष्पक विमान का परारुप एवं निर्माण विधि ब्रह्मर्षि अंगिरा ने दी औए निर्माण साज-सजा भगवान विश्वकर्मा द्वारा"। जिससे वे शिल्पी कहलाये ।

Tuesday, 14 May 2024

वो सनातन धर्म , ( हिन्दु संस्कृति ) और इनमें और भगवान में दृढ़ आस्था रखने वाले साधु जन , सज्जन की रक्षा वो स्वयं करते हैं ।

पंचम मूल जगद्गुरूत्तम श्री कृपालू जी महाप्रभु के सिद्धांतों पर आधारित लेख, इस लेख का अंतिम भाग अवश्य पढ़ें :- 
हमें अगर अपने भगवान श्री कृष्ण पर भरोसा है तो फिर हम सनातनी इतना बैचैन क्यूं हैं कि सनातन धर्म को कोई समाप्त कर देगा ? ऐसा सोचने वाला गलत है। फुल मैड है ।
सनातन धर्म का उद्भव और अंत ।। ( एक सत्य चिंतन )

जिस प्रकार भगवान अनादि है उसी प्रकार हमारी आत्मा अनादि है और ठीक उसी प्रकार सनातन वैदिक धर्म आनादि है । 
हम कब से ? जब से भगवान हैं। भगवान कब से ? जब से हम है यानि आत्मा , शरीर नहीं है हम । भगवान और हम कब से जब से सनातन धर्म हैं । 

"यानि भगवान श्री कृष्ण हीं सनातन है । अत: भगवान श्री कृष्ण हीं सनातन वैदिक धर्म है । जिसको श्री कृष्ण में अनुराग नहीं वो अधर्मी है । ऐसे धर्म को त्याग देना चाहिए जो श्री कृष्ण चरणार वृंद में अनुराग न पैदा करता हो । श्री कृष्ण के चरणों में रति हीं धर्म है वांकि सब अधर्म है । वांकि सब कर्म धर्म चौरासी लाख योनियों में घुमाने वाला कर्म है । जबतक जीवात्मा भगवान श्री कृष्ण के चरणों में अनुरक्ति प्राप्त नहीं करता , वो भव सागर में अन्य कर्म धर्म के चक्कर में बंधा हुआ दुख पाता रहेगा " :- श्री कृपालु जी महाराज ।।

तो हम तीनो का तीनों सनातन है । सनातन मतलब सदा से है ‌। तीनों की उत्पत्ति नहीं होती । न जन्म होता है । 
सिर्फ प्रकटिकरण होता है भगवान श्री कृष्ण के महोदर से । यानि भगवान श्री कृष्ण के संकल्प मात्र से सृष्टि होती है और उसी के साथ साथ सनातन धर्म ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों के साथ साथ प्रकट हो जाते हैं ।

और इन तीनों को अंत भी नहीं है । यानि भगवान , हमारी आत्मा और सनातन तीनों अजन्मा हैं ।
और इन तीनों को कोई भी समाप्त नहीं कर सकता कभी । स्वयं भगवान भी नहीं । 

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
 न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।।२३।। गीता ।

तो इसका भावार्थ तो आप सब लोग जानते हैं कि आत्मा हो या परमात्मा इसको किसी भी बिधि से कोई समाप्त नहीं कर सकता है स्वयं भगवान भी नहीं । 

तो यह स्वत: सिद्ध है कि तीनों का जन्म नहीं होता , तीनों का अंत किसी भी विधि नहीं हो सकता । 
तो तीनों को समाप्त करने का कोई सोचें अगर तो वो फुल मैड है । थोड़ा या हाफ नहीं फुल मैड । 

तो फिर हम सनातनी इतना बैचैन क्यूं हैं कि कोई सनातन धर्म को समाप्त कर देगा ? ऐसा सोचने बाला अगर कोई है तो उसका दिमाग ठीक नहीं है , उसे डौक्टरों के पास जाना चाहिए ।
 कुछ लोग परेशान रहते हैं फलां फलां धर्म बाले , अपना जनसख्यां विस्फोट करके पुरे धरती पर फ़ैल जाएंगे और सनातन एक दिन खत्म हो जाएगा , मैं कहता हुं वो भोले हिन्दु है जो ऐसा सोचतें है । उनको खुद पे अपने सनातन धर्म पे और अपने ईष्ट पर भरोसा विल्कूल नहीं है यह उनकी चिंता साबित करती है । 

कलयुग में सनातन धर्म नहीं लुप्त होगा । हां इसको मानने वाले कि संख्या कम जरूर होती जाएगी , कोई नहीं रोक सकता इसको । उसका कारण कलयुग कि प्रकृति है । कलयुग कि प्रकृति हीं ऐसी है कि दिव्यता धीरे धीरे अंतर्ध्यान होती जाएगी । धर्म कुछ लोगों तक सीमित हो जाएगा । पाखंडियों , विधर्मियों , अधर्मियों कि संख्या बढ़ती जाएगी । पाप बढ़ेगा पृथ्वी पर , लोग अवसाद में रहेंगे । रोग बढ़ेगा । पुण्य का क्षय होगा । धर्म के नाम पर बाचालो कि संख्या बढ़ेगी । मानवता समाप्त होगी । दैविक गुणों का क्षय होगा । 

पृथ्वी पर आसुरी प्रवृत्ति वाले लोग होंगे । कुछ बचे हुए वास्तविक सनातन वैदिक धर्मावलंबी को सताया जाएगा । भगवान के वास्तविक भक्तों को सताया जाने लगेगा । 
फिर भगवान श्री कृष्ण अपने वास्तविक भक्तों के दुख को नहीं बर्दास्त कर पाएंगे और फिर उनका एक क्रोधावेशित अवतार कल्कि के रूप में होगा । 
पुरी पृथ्वी के आसुरी वृत्ति वाले जीव का संहार करेंगे और सनातन वैदिक धर्म कि पुर्नस्थापना करेंगे वो । 

भगवान सर्व समर्थ है । वो अपनी सत्ता की रक्षा स्वयं करते हैं । वो किसी भी जीव और महापुरुष को भी यह अधिकार नहीं देते । 
वाकी सब शक्ति अपने संत अपने जन और महापुरूषों को दे देते हैं , पर दो कार्य सदा अपने पास रखते हैं ‌ । सत्ता कि रक्षा और मानव के कर्म फल नोट करके उसे फल प्रदान करना स्वयं करते हैं । 

"सुनहु तात यह अकथ कहानी। 
समुझत बनइ न जाइ बखानी॥ 
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। 
चेतन अमल सहज सुख रासी॥1॥" - उत्तरकांड 7.117

और उसी प्रकार सनातन धर्म भी अजन्मा है और अविनाशी है । स्वयं भगवान भी स्वयं को , किसी भी आत्मा को और ना सनातन धर्म का मिटा सकते हैं कभी । तो फिर मानवों दानवों कि औकात ही भला क्या है ? भोले सनातनी इतना हाय तोबा , चित्कार क्यूं कर रहें हैं मुझे समझ में नहीं आता ?

भगवान का काम है रक्षा करना , उनका पहला काम है अपने सत्ता की रक्षा करना, सत्ता मतलव जीवात्मा , माया यानि संसार और दुसरा काम है अनंत ब्रह्माण्ड के अनंत जीवों के मन में उठे संकल्पों को नोट करना । याद करिए श्री कृपालु महाप्रभु जी का दिया तत्वज्ञान ।
तो जब भगवान अपनी सत्ता , मतलब सनातन धर्म यानि नियम , यानि उनका संविधान यानि वेद् पुराण उपनिषद आदि सब की रक्षा वो स्वयं करते हैं । और अपने जन खुद पर भरोसा करने वाले , आस्था रखने वाले सज्जनों की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं । और जिस बसुंधरा पर अवतरित होते हैं उस भारत देश की रक्षा भी वही करते हैं तो चिंता कैसी ?
उन्होंने स्वयं कहें है :- 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ :- गीता ।

उनका उद्घोष है - वो सनातन धर्म , ( हिन्दु संस्कृति ) और इनमें और भगवान में दृढ़ आस्था रखने वाले साधु जन , सज्जन की रक्षा वो स्वयं करते हैं ।

 दुष्ट कुधर्मी , व्यभिचारी , राक्षसों , असुरों का उत्पात जब जब लिमिट से बढ़ जाता है तो वो खुद इन सबका एक साथ काम तमाम कर देतें हैं । 
और किए भी है । हम सभी जानते हैं । हिरण्यकशिपु का और उसके साम्राज्यों का , हिरण्याक्ष का और उसके साम्राज्य से लेकर त्रेता में रावण और उसके साम्राज्य लंका से लेकर द्वापर में कंश आदि सब का बजूद मिटा दिए ।
तो फिर हम सनातनी इतना भयभीत क्यों ?
भय का मतलब की हमें अपने भगवान पर , अपने इष्ट पर अपने सनातन हिन्दु धर्म पर भरोसा नहीं । 

सभी जानते हैं कि एक सनातन धर्म ही अजन्मा है और इसका अंत कभी नहीं हो सकता । 
और वांकी सभी बिचारधारा है , पंथ है जो मानवकृत है , जिसका प्रदुर्भाव हुआ है अलग अलग समय में किसी के बिचार के कारण । पीछले हजार दो हजार तो ढाई हजार साल में जिस पंथों कि उत्पत्ति हुई है मानवों द्वारा उसकी समाप्ति निश्चित है । 
क्योंकि जिसकी उत्पत्ति होती है उसका एक दिन समाप्ति अवश्य होता है । 

एक और बात , सभी बिचार धारा उसी सनातन धर्म रूपी मूल( जड़ ) से निकला जिसका मूल जड़ तना हिन्दु है और वांकी‌ सब शाखा हीं तो है ।
अब कोई बिचार धारा यह सोचे , कोई शाखा यह सोंचे की अपने हीं मूख्य तना और जड़ को समाप्त कर देंगे तो वो फुल मैड है । फुल मैड । वो खुद ही समाप्त हो जाएगा ।

और फिर भी नहीं माना तो भगवान तो कहा है हीं कि :- 
 यदा यदा हीं धर्मस्य ..... 

तो होना ही है कल्कि अवतार और फिर एक बार असुर और उनका साम्राज्य समाप्त होगा । 
और वो भी नहीं बचेंगे जो हिन्दु में जन्म लेकर अपने ही जड़ में जहर घोलने का प्रयास कर रहें हैं , जैसे कौरव समाप्त हो गए जो सनातन धर्म के विधान के विरूद्ध काम किया । भगवान कृष्ण के विरूद्ध खड़ा हो गया था दुर्योधन , वो भी समाप्त हो गया । 

तो मेरी आप सभी हमारे सनातन धर्मावलंबी भाइयों से प्रार्थना है कि चिंता ना करें , विधर्मियों से न उलझे । अपने भगवान की भक्ति करें , अपने महापुरुषों और संतों का , देश भक्तों का सम्मान करें । और दृढ़ आस्था रखें । दूसरे की बुराई ना करें । अपने सनातन का प्रचार करें , अपने असली संतों के बारे में और भगवान ईष्ट की चर्चा करें । सत्संग करें । 
और अपने शरीर के लिए जिविका के लिए सनातन धर्म के पथ पर चल कर शुभ कर्म करें । 
सबसे प्रमुख सिद्धांत कि अगर आप किसी से भी नफरत करेंगे , द्वेष करेंगे , और यह आपके मन में चरित्र में , सोंच में संकल्प में जम जाएगा तो फिर आप अगले जन्म में उसी धर्म में , उसी पंथ में हीं नहीं उसी धर्मावलंबी के घर जन्म लेंगे । 

जहां आपका राग द्वेष अधिक होगा उसी की प्राप्ति आपको अगले जन्म में होगी ।‌
तो अगर आप किसी भी पंथ विशेष, धर्म विशेष या विचारधारा विशेष , समुदाय विशेष या व्यक्ति विशेष से नफरत करेंगे तो फिर समझ लीजिए कि उसी में आपको अगला जन्म मिलेगा । 
तो यह तो आप खुद के लिए गढ़ा खोद रहे हैं । याद रखिए धर्म हमारी रक्षा करता है, हम धर्म कि रक्षा नहीं कर सकते । हम धर्म का पालन कर सकते हैं केवल । और श्री कृष्ण भक्ति हीं धर्म है । वांकि से उदासीन रहना श्रेयकर है ।। 
:- पंचम मूल जगद्गुरूत्तम श्री कृपालू जी महाप्रभु के सिद्धांतों पर आधारित लेख । - संजीव कुमार ।

प्रश्न - कुछ लोग धर्म कर्म तथा तत्वज्ञान जानते हुए भी भगवान कि ओर नहीं चलते और कुछ लोग किसी महापुरुष से थोड़ा सा जानते हीं तुरंत संसार से एवाऊट टर्न लेकर गुरू के शरणागत होकर भगवान के हो जाते हैं , क्या कारण है ? उत्तर :- इस बात को समझने के लिए दो सबसे बढ़िया उदाहरण है - एक अर्जुन का और दुसरा दुर्योधन । दोनो महत्त्वपूर्ण है इस बिषय को जानने ,‌ समझने के लिए ।

प्रश्न - कुछ लोग धर्म कर्म तथा तत्वज्ञान जानते हुए भी भगवान कि ओर नहीं चलते और कुछ लोग किसी महापुरुष से थोड़ा सा जानते हीं तुरंत संसार से एवाऊट टर्न लेकर गुरू के शरणागत होकर भगवान के हो जाते हैं , क्या कारण है ? 
उत्तर :- इस बात को समझने के लिए दो सबसे बढ़िया उदाहरण है - एक अर्जुन का और दुसरा दुर्योधन । दोनो महत्त्वपूर्ण है इस बिषय को जानने ,‌ समझने के लिए ।

याद होगा सबको कि भगवान पांडवों के तरफ से शांतिदूत बन कर गए थे हस्तिनापुर में । धृतराष्ट्र के दरवार में दरवारियों कि सभा बैठी हुई थी । 
भगवान श्री कृष्ण दुर्योधन को समझा रहें हैं कि पांच गांव हीं दे दो पांडवों को सिर्फ। भगवान ने बहुत लौजिक दिया कर्म धर्म का भरी सभा में ।
पर दुर्योधन कहता है भगवान् को कि - 

" जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः। 
केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोस्मि तथा करोमि॥' 
यानि मैं जानता हूँ कर्म-धर्म अच्छी तरह से लेकिन मेरी प्रवृत्ति इनमें नहीं है , मेरी रूचि इन बिषयों में नहीं है । और मैं अधर्म भी जानता हूँ अच्छी तरह से , लेकिन मेरी निवृत्ति न हुई इससे , यानि संसार से आसक्ति समाप्त नहीं हुआ । भोग विलास तथा सत्ता से मुझे वैराग्य नहीं हुआ है इसलिए मैं कर्म धर्म को जानते हुए भी इससे विमुख हुं । 

मतलव वो कह रहा है कि " हे कृष्ण मुझे प्रवचन मत दिजिए धर्म क्या है अधर्म किसे कहते हैं यह मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं, पर मैं क्या करूं ? मेरा न धर्म में प्रवृत्ति हो पा रही और ना अधर्म से निवृत्ति हो पा रही है ।‌ क्योंकि मेरी मनोवृत्ति हीं ऐसी है । मतलव मेरी ( व्यक्तित्व )पर्सनैलिटी हीं ऐसी है ।
हे कृष्ण एक हीं गुरू द्रोण और कृपाचार्य कुल गुरू के हम सब शिष्य हैं (यानि कौरव सौ भाई और पांडव पांचों भाई ) । दस हजार हाथियों का बल भीम में हैं तो मुझमें भी दस हजार हाथियों का बल है पर हम दोनों की मनोवृत्ति अलग अलग है । इसलिए प्रवृत्ति भी अलग अलग है। "

अब आप सब यह भी जानते हैं कि अर्जुन क्या पुछा भगवान से, जब गीता का ज्ञान दे रहे थे भगवान कुरूक्षेत्र में । 
अर्जुन पुछ रहा है :- 
चंचलं हि मन:कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ।। ( गीता.६.३४)
वो कहतें हैं भगवान से की यह मन हीं तो बश में नहीं है , मन का ही गुलाम हुं मैं , आप कहें तो मैं हवा का रूख को मोड़ दु़ , नदी के धारा को बदल दुं , पर मन को बश में करना बहुत कठीन है । इसलिए हे श्री कृष्ण यह बतलाइए मैं अपने मन को बश में कैसे करूं ? हे जगद्गुरु श्री कृष्ण मैं अपने मन बुद्धि को आपमें कैसे निवेश कर दूं । यानि आपकी शरणागति कैसे करूं ? 
तब भगवान बोलते हैं कि - 
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।(गीता 6.35।।)
(आप सब भावार्थ जानते हैं इसका । लिखने की जरूरत नहीं है ।)
 अर्जुन को तत्वज्ञान में रूचि है , वो तत्वज्ञान अपने सखा श्री कृष्ण से नहीं वल्कि उनको गुरू मान कर समझने में रूचि दिखाई और इस प्रकार गीता का प्रकटीकरण हुआ जगद्गुरु श्री कृष्ण के मुख से । 

अर्जुन जानता था यह बात कि ज्ञान तो भगवद स्वरूप गुरू से हीं मिल सकता है भगवान से डायरेक्ट नहीं , इसलिए बड़े बुद्धिमत्ता से उसने श्री कृष्ण को गुरू मान कर , तथा बोल कर संबोधित किया । 
अब गुरू को अपने शिष्य के अज्ञान को मिटाना हीं होगा । इसलिए भगवान सत्तरह अध्याय तक अर्जुन के प्रश्नों तथा परिप्रश्नों का जबाब देते रहे । यह संबाद हीं गीता है । 
अंत में अर्जून शरेंडर कर देता है खुद को ( हालाकी अर्जुन पहले से हीं महापुरुष हैं, हम जीवों के शिक्षा के लिए वो यह सब कर रहा हैं , पांडव शरेंडर तो पहले से हीं है भगवान के प्रति । इसलिए तो अर्जुन भगवान‌ से सेना ना मांगकर भगवान को ही मांग लिया था । )

तो दोनों में अंतर है । अर्जुन को प्रपत्ति यानि शरणागत है ।
प्रपत्ति मूला भक्त हैं अर्जुन यानि शरणागत भक्त है वो , इसलिए उसका मनोवृत्ति बदल गया है , मनोवृत्ति बदल गया तो उसकी प्रवृत्ति यानि आचरण धर्मानुकूल हो गया है। इसलिए उसका व्यक्तित्व बदल गया है , इसलिए आज भी अर्जुन के प्रति लोगों का आकर्षण है, आदर है , अर्जुन का व्यक्तित्व आकर्षित करता है सज्जन को । 
पर दुर्योधन का वृत्ति नहीं बदला ,, वो प्रपत्त नहीं है। किसी का भी नहीं , भगवान‌ को तो छोड़िए यहां तक कि ना भीष्म का , न तत्वज्ञानि ताऊ श्री विदुर जी का और न अपने गुरू का ।

 क्योंकि वो माया के दुर्गुण रूपी शकुनी से प्रभावित हैं इसलिए उसकी निवृत्ति अधर्म से नहीं हुआ अंत तक । जैसी संगती वैसी मनोवृत्ति, जैसी मनोवृत्ति वैसी प्रवृत्ति , जैसी प्रवृत्ति वैसी वृत्ति , जैसी वृत्ति वैसा संकल्प , जैसा संकल्प वैसा दृष्यमाण कर्म - यह सिद्धांत है वेद का ।
अत: उसकी मनोवृत्ति अशुद्ध है इसलिए वो उपहास का पात्र है आज भी । और यही कारण था कि अग्नी पुत्री यानि यज्ञशैनी द्रोपदी उस पर व्यंग करते हुए कहा की अंधे का पुत्र अंधा , क्योकि एक स्वाभाविक विकर्षण था उसके प्रसनैल्टी में । मजाक का पात्र बना लिया था खुद को दुर्योधन । अत: गलत लोगो से दुर रहना श्रेयकर है । 

यही कारण है कि तत्वज्ञान केवल जानने से , या समझने से या सुनने से कुछ नहीं होगा । हम संगति किसका कर रहे हैं ? यह महत्वपूर्ण है । जिसकी जैसी संगति उसकी वैसी प्रवृत्ति अपने आप हो जाती है । जिसकी जैसी प्रवृत्ति वैसा आचरण हो जाता है । 
इसलिए हमारे गुरूवर ने कहा है , आदेश दिया है हमें कि सत्संग भले न मिले , या कम मिले लेकिन कुसंगी से दुर रहो । संगति अच्छे लोगों का करो, अच्छे साधकों का करो । 
तब व्यक्तित्व बदलेगा , व्यक्तित्व बदलेगा तो संकल्प भक्ति अनुकूल होगा । संकल्प भक्ति अनुकूल होगा तो वृत्ति शुद्ध होगी । अंत:करण शुद्ध होगा । अंत:करण शुद्ध होगा तो गुरू उसमें दिव्य शक्ति देगा । जब दिव्य शक्ति मिलेगा तो लक्ष्य मिल जाएगा । 

तो यही कारण है कि कलयुग में अधिकतर लोगों कि रूचि हीं नहीं है तत्वज्ञान में । गलत संगति के कारण प्रसनैल्टी डिजऔर्डर का शिकार है अधिकतर लोग आज और कष्ट पाने के बाद भी समझ नहीं । अच्छी बातें न पढ़ना चाहते हैं और न सुनना । केवल मादक बिषयों को सुनने में और उसमें लिप्त रहने में ही रूचि है अधिकतर की । 

 अब बात करते हैं कि यह व्यक्तित्व बनता बिगड़ता कैसे हैं । तो यह अंत:करण चातुष्ट्य के विज्ञान का कमाल है ।
आप सब जानते हैं कि यह अंत:करण चातुष्ट्य क्या हैं ?
मन , बुद्धि , चित् और अहंकार को अंत:करण चातुष्ट कहते हैं । तो ऐ मन क्या है बुद्धि क्या है ,‌ चित् किसे कहतें हैं , अहंकार क्या हैं ? यह कहां रहता है शरीर में कैसे काम करता है यह ? कैसे यह संस्कार को शुद्ध करता है !
फिर यह मशीन‌ कैसे हमारा उद्धार करता है और बर्बाद भी ? 
कैसे यह शुद्ध होता है कैसे और कैसे अशुद्ध हो जाता है ?
तो यह एक विज्ञान है इस पर चर्चा अगले पोस्ट में होगी । 
:- पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन का जीस्ट ( सार )

Sunday, 12 May 2024

सत्य कि स्थापना असत्य के द्वारा नहीं हो सकता कभी । धर्म कि स्थापना अधर्म से नहीं किया जा सकता कभी । सत्य को झूठ के द्वारा कभी सावित नहीं किया जा सकता है । न्याय को अन्याय से नहीं पाया जा सकता है कभी । यह अकाट्य सिद्धांत है ।

सत्य कि स्थापना असत्य के द्वारा नहीं हो सकता कभी । 
धर्म कि स्थापना अधर्म से नहीं किया जा सकता कभी ।
 सत्य को झूठ के द्वारा कभी सावित नहीं किया जा सकता है । 
न्याय को अन्याय से नहीं पाया जा सकता है कभी । यह अकाट्य सिद्धांत है । 
धर्म के आर में कुछ लोग अधर्म करते हैं ।‌ धर्म के नाम पर आज कलयुग में लोग अधर्म करते हैं । भगवान के नाम पर कुछ लोग पाखंड करते हैं । 
ऐसे लोगों का अंत गति बहुत भयावह होती है । और मरने के बाद रो रो नरक में जाते हैं , हनुमान जी को चमत्कार दिखाने की लालसा नहीं होती है । वो भगवान है । भगवान अपने बनाए नियम को नहीं तोड़ते । हनुमान जी स्वयं भगवान है और उनके भी ईष्ट श्री राम अल्टिमेट भगवान हैं । उनके लिखे विधान का निरादर हनुमान जी करेंगे ऐसा सोंचना भी महापाप है । 
भगवान श्री राम ने किसी के पुर्व कर्म का फल लिख दिया उसको भला हनुमान जी कैसे बदल सकते हैं ?
भगवान के नाम पर अपनी मर्जी चलाना और अनाधिकारी के कर्म फल को बदलने का दावा करना सनातन वैदिक धर्म तथा वेद के प्रतिकूल है । ऐसे पाखंडियों से आस्तिकों को बचना चाहिए। 
भला चाहते हैं अपना तो हमेशा शुभ कर्म करने का संकल्प लें और आज से करना शुरू कर दें , देखिए किस्मत कैसे बदलती है । भाग्य कैसे बदलती है आपकी । 
मनुष्य का भाग्य मनुष्य का शुभ कर्म हीं बदलने में सक्षम है । और कोई नहीं । 

कर्म प्रधान विश्व करि राखा , जो जस करहीं सो तस फल चाखा ,- भगवान का यह सिद्धांत सभी संसारी लोगों के लिए है । संसारिक भोग कि बस्तुओं की प्राप्ति के लिए विश्व में कर्म का विधान है । 

और "होईहे वहीं जो राम रची राखा" को करि तर्क बढ़ावही शाखा - यह नियम भगवान तथा गुरू के शरणागत जीवों के लिए है । शरणागत जीव का काम तथा फल भगवान की इच्छा से होता है । भगवान हीं शरणागत जीव का कर्म करते हैं । वो जीव उनके इच्छा के विरुद्ध नहीं जाता । भगवान के प्रत्येक इच्छा को वो सहर्ष स्वीकार करता है ।‌

शरणागत जीव भगवान से भगवान का प्रेम , उनकी सेवा , उनकी भक्ति , उनका ज्ञान और वैराग्य चाहता है ,‌संसार नहीं ।‌

संसार की प्राप्ति के लिए तो कर्म का विधान है । और भगवान की प्राप्ति के लिए पुर्ण शरणागति का विधान है । 

एक असली महापुरूष और संत कभी आशिर्वाद का नाटक नहीं करता है । असली संत कभी भगवान के कर्म फल विधान में दखल नहीं देते हैं ‌। और जो देने का नाटक करता है , वो संत के भेष में बहुरूपिया है ‌, उसका विनाश उसके पाप का घड़ा भरने के बाद स्वत: हो जाता है । ऐसे लोग अपना तो अहित करते हीं है धर्म विरूद्ध आचरण, भगवान विरोधी आचरण करके अपने अनुयायियों को भी रौ रो नरक में पहुंचाने का गंभीर पाप करते हैं । इनको कहीं मुक्ति नहीं मिलती । इनको फिर कभी मानव शरीर नहीं मिलता ।

 इसलिए हमेशा वास्तविक महापुरूष के यहां जाएं । कभी संसार कि कामना न हो । सब उन पर छोड़ दें । वो जो करते हैं जीव के कल्याण के लिए करते हैं । वास्तविक संत पर पुर्ण श्रद्धा और विश्वास रखें । 

अनाधिकार कुछ भी पाने के लिए पाखंडियों के शरण में न जाएं ‌ । 
क्योंकि पाखंडियों के पास न खुदा यानि न भगवान हीं मिलेगें और न कभी विशाले सनम ( यानि संसारिक वैभव ) मिलेगा । 
आप न इधर के रहेंगे और न‌ उधर के । 
जो है आपके पास धर्म , कर्म पुण्य वो भी छीन जाएगा पाखंडियों के यहां जाने से । 
इसलिए समझदारी से काम लें । 
हर पीला बस्तु सोंना नहीं होता । 
हर चमकने वाला पत्थर हीरा नहीं होता । 
अत: संत के भेष में अधिकतर बहुरूपिया भरा परा है , पाखंडी भरा परा है । 
असली संत न मिले न सही लेकिन बहुरूपिया के चक्कर में अपना सबकुछ न‌ गवाएं । सत्संग न मिले न सही लेकिन कुसंग में न फंसे कभी ।। 
असली संत को पाने के लिए भगवान के सामने रोया करें ह्रदय से । असली संत मिल जाएंगे । :- संजीव कुमार। 
श्री राधे ।