Thursday, 31 August 2023

आत्म शक्ति का ह्रास किन किन कारणों से होता है ?

पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी के द्वारा बतलाया गया श्री महाराज जी का सिद्धांत :- 
आत्म शक्ति का ह्रास किन किन कारणों से होता है ?
१. जरूरत से अधिक बात करने बालों की आत्म शक्ति क्षीण हो जाती है ।

२. निरर्थक बातों से बचना चाहिए ।‌

३. मिथ्या संभाषण से साधकों को बचना चाहिए। 

४. संसार को उतना हीं समय देना चाहिए जितना आवश्यक हो , शेष समय को भगवान और गुरू के रूप गुण लीला धाम के चिंतन में हीं लगाना चाहिए। 

५. संसार में अनावश्यक संबंध नहीं बढ़ाना चाहिए । 

६. कम से कम दोस्ती रखो , जितना आवश्यक हो संसार के लिए बस उतना हीं । 

७. साधक जब भी मिलें एक दुसरे से कभी भी , कहीं भी तो आपस में केवल हरि गुरू का हीं रूप गुण लीला और धाम की चर्चा करना चाहिए । अपने अपने संसार की चर्चा विल्कूल नहीं करना चाहिए, नहीं तो इससे हम जितना आगे बढ़ते हैं उससे कई गुणा पीछे चले जाते हैं । 

८. अपने गुरू तथा ईंष्ट को हमेशा अपना रक्षक तथा निरीक्षक मानना चाहिए, हम जो भी सोच रहे हैं , कर रहे हैं वो सभी देख रहें हैं , सुन रहे हैं तथा नोट कर रहें हैं , यह हमेशा याद रहे । 

९. अपने गुरू और ईष्ट के सिद्धांतों के विपरित न सोचना है और न करना है । 

१०. लोक रंजन तथा कुसंग से हमेशा बचना चाहिए । 

११. आध्यात्मिक बातों में किसी से बहस नहीं करना चाहिए, कोई अगर हमारे गुरू के विपरित बात कर रहा हो , प्रतिकूल बात कर रहा हो तो वहां से हट जाना चाहिए, उसके साथ बहस नहीं करना चाहिए, उसे समझाने का प्रयत्न कभी नहीं करना चाहिए। बहस करने से आत्म शक्ति नष्ट होती है । 

१२. अपने ईष्ट और गुरू के सिद्धातों की चर्चा केवल उन्हीं से करना चाहिए जो सचमुच का जिज्ञासु हो, जो सचमुच में भगवद् बिषय समझना चाहता हो , उसे वास्तव में उत्कंठा हो , श्रद्धा हो । भगवद् लाभ उठाने की भावना लेकर आया हो । 
अनावश्यक बहस करने तथा गुरूदेव के फिलोसॉफी को बताने पर उसको काटने वाले , विरोधी बात करने वाले व्यक्ति से बात करना तुरंत बंद कर देना चाहिए, जबरदस्ती उसे समझाने का प्रयत्न कभी नहीं करना चाहिए। 

१३. इस दुनियां में सबके अपने-अपने , अलग-अलग संस्कार है, अलग-अलग विचार तथा भावना आदि है , अलग-अलग चरित्र है , वो उसी के अनुरूप सोंचता है और करता है । जबतक किसी जीव के पुर्व जन्मों के अच्छे संस्कारों का उदय नही‌ होता वो वास्तविक संत व महापुरुषों के तरफ आकर्षित नहीं होगा । ऐसे जीवों को समझाने में अपनी आत्मशक्ति को नष्ट नहीं करना चाहिए। जिस दिन उसके अच्छे संस्कार जागृत हो जाएंगे वो खुद हीं वास्तविक जिज्ञासु भाव से हमारे गुरू और ईष्ट के तरफ आकर्षित हो जाएगा , फिर उसको बताने पर उसमें श्रद्धा और विश्वास कि उत्पति होगी । और वो फिर श्री महाराज जी को अपना गुरू मान लेगा एवं साधना में जुट जाएगा । 

१४. किसी भी दुसरे मार्गावलंबियों और धर्मावलंबियों के साथ अपने गुरू के सिद्धांतों की चर्चा कभी नहीं करना चाहिए, न हीं उनसे उनके गुरू के सिद्धांतों की चर्चा सुनना चाहिए, सबके अलग-अलग मार्ग है, सिद्धांत हैं , अलग-अलग सोंच है , चिंतन है , अलग-अलग ज्ञान है, अलग-अलग संस्कार है तथा स्तर है । अतः किसी के साथ बाद-विवाद में उलझने से आत्म शक्ति का ह्रास होता है और साधक साधना पथ से भटक जाता है । 

१५. जिस प्रकार स्कूल कौलेज में छात्रों का अलग-अलग स्तर होता है, पढ़ने में मेहनत करने के हिसाब से ,‌ श्रम के मात्रा के अनुसार, उसी प्रकार शिष्यों का, साधकों का भी अलग-अलग स्तर होता है , कोई जल्दी-जल्दी आगे बढ़ता है कोई धीरे-धीरे , कोई वहीं पर रूका हुआ है उसी कक्षा में जहां पर वो था । लेकिन हमें किसी के साथ भेद भाव कभी नहीं करना है , न जाने कब कौन अचानक आगे बढ़ने लगे । हम किसी के आंतरिक स्थिति को नहीं जान सकते , अरे हम स्वयं को ठीक से नहीं जान सके अबतक , केवल शाब्दिक ज्ञान है हमें कि हम आत्मा है पर अनुभव नहीं है अभी, तो दुसरे को समझने का प्रयास करना तो हस्यास्पद् हीं है । इसलिए किसी के प्रति कोई दुर्भावना कभी नहीं करना चाहिए, स्वयं को सबसे छोटा मानना चाहिए , तथा प्रत्येक को अपने से आगे ।
इस प्रकार उपर्युक्त बातों को ध्यान में रख कर हम आगे बढ़ेंगे तो बहुत जल्दी लाभ होगा , सफलता मिलेगी साधना भक्ति में ।
:- पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी ।

Tuesday, 29 August 2023

दिव्य शरीर और सूक्ष्म शरीर

एक नया साधक का प्रश्न है कि मनुष्य का मन बुद्धि चित्त अहंकार यानि साधन चातुष्ट्य माया के गुण तथा जाति का है तथा माया एवं आत्मा के तरह यह भी अनादि है और सदा जीवात्मा के साथ ही रहती है सूक्ष्म शरीर में और अनंत काल तक रहेगा , और आत्मा दिव्य है सदा से और भगवान श्री कृष्ण का अंश है तो जब साधन भक्ति के फलस्वरूप जीवात्मा सिद्धि हासिल कर लेता है यानि भगवद् प्राप्ति कर लेता है और जीवन के अंत में गोलोक गमन करता है तो जीवात्मा इन्हीं मायिक मन बुद्धि चित्त के साथ गोलोक कैसे गमन करता है जबकि यह सब माया का ही बना है ? स्पष्ट करें ! 

उत्तर :- इसका उत्तर बड़ा आसान है । श्री महाराज जी ने हमें बताया है कि जीव जब भगवान और गुरू कि साधना भक्ति करता है तो साधन भक्ति के पराकाष्ठा पर पहुंचते पहुंचते यह शूद्ध हो जाता है ।  

शूद्धि का मतलव क्या है ? तो शूद्धि का मतलव है अनंत जन्मों के पाप, पुण्य , अच्छे तथा बुरे सभी प्रकार के मायिक संस्कारो का भस्म हो जाना । इसी को शास्त्रीय भाषा में पंचकोष का भष्म हो जाना कहते हैं । पंचकोष मतलव जीव का अन्नमय कोष , मनोमय कोष, प्राणमय कोष , विज्ञानमय कोष तथा आनंदमय कोष । 
इनके भष्म होते ही जीव त्रिगुण यानि न केवल तमोगुण, रजोगुण यहां तक कि तीसरा गुण सतोगुण से भी जीवात्मा मुक्त होकर निर्गुण हो जाता है । 
पंचकोष के भस्म होते ही जीव त्रिविध तापों यानि आध्यात्मिकताप , भौतिकताप , तथा दैविक तीनों ताप से भी मुक्त हो जाता है । 
इसके साथ साथ एक और महत्वपूर्ण बात होती है , घटना घटती है जीव के साथ कि पंचकोष के भस्म होने के साथ साथ जीव के पंचक्लेश यथा अविद्या, अस्मिता, राग , द्वेष तथा अभिनिवेश ही न केवल समाप्त होते हैं वल्कि जीव का अंत:करण शूद्ध होने के साथ साथ स्वरूपावरी का माया एवं गुणावरी का माया यानि दोनों माया हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है । 
और इन सभी घटनाओं के घटते ही गुरू अपने स्वरूप शक्ति से जीव के उसी शूद्ध हुए अंत:करण को दिव्य बना कर उसमें भगवान के दिव्य प्रेम यानि राधातत्व रूपी प्रेम रस का दान कर देते हैं और जीवात्मा सदा के लिए भगवान तथा अपने गुरू की सिद्धा भक्ति प्राप्त कर लेता है । 
तो श्री महाराज जी द्वारा दिए गए तत्वज्ञान से यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा का मन बुद्धि चित्त फिर मायिक नहीं रह जाता।

 भगवद् प्राप्ति के साथ , यह गुरू के कृपा से दिव्य बन जाता है । पंचकोष भष्म होते ही जीवात्मा का स्थूल शरीर के अंदर का सूक्ष्म शरीर भी भाव शरीर के रूप में दिव्य शरीर बन जाता है । जीव संसार से पूर्ण वैराग्य कि स्थिति में पहुंच जाता है इसका मतलव उसके सभी संसारिक कामनाएं समाप्त हो जाती है और स्वाभाविक है कि संसारिक कामनाएं जब समाप्त हो जाने का मतलव जीव का कारण शरीर भी समाप्त हो जाता है । जीव को दिव्य शरीर मिल जाता है, मन बुद्धि चित्त सभी दिव्य बन जाता है यह मायिक नहीं रहा जाता । जीव के आंतरिक स्वरूप में पुर्ण परिवर्तन हो जाता है । 

 सार यह कि भगवद् प्राप्ति होते ही जीवात्मा सभी प्रकार के मायिक शरीर एवं बंधनों से सदा के लिए मुक्त होकर सत् चित् आनंद कंद भगवान श्री कृष्ण और गुरू प्राप्त करके हमेशा के लिए आनंदमय हो जाता है । 
श्री राधे ।

जिनकी तश्वीर देखने मात्र से ह्रदय में प्रेम का उद्रेक होता है ,

जिनकी तश्वीर देखने मात्र से ह्रदय में प्रेम का उद्रेक होता है , 
जिनके चरणों के दिदार मात्र से रोम रोम पुलकित हो जाता है । 
जिनकी वाणी सुनने मात्र से शरीर में रोमांच उत्पन्न हो जाता हैं , जिनके चरण रज को ह्रदय में लागाने मात्र से एक अद्भुद् आनंद की अनुभुति होती है ।
 जिनके चरण जल पीने मात्र से समस्त कुसंस्कार भष्म होकर आत्मा को अद्भुद आनंद प्राप्त होता है और श्री युगल सरकार में मन रमने लगता है । प्रेम का आंसु अपने आप बहने लगता है , ह्रदय प्रेम भाव से भर जाता है ।
 जिनके सत्संग मात्र से समस्त भयों का नाश होता है । जिनको गुरू रूप में प्राप्त कर जीव धन्य हो जाता है । जिनके दर्शन मात्र से मन का हरण हो जाता है और युगल सरकार के चरणों को प्राप्त होता है । मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है । और पंचक्लेश , पंचकोश , त्रिविधताप , त्रिगुण , त्रिदोष का समन हो जाता है ।

ऐसे दिव्य परम निधि को पा कर कौन इनके शरण में नहीं आना चाहेगा भला । ऐ खुद युगल सरकार का एकरूप हैं । आपके चरणों में कोटी कोटी कोटी प्रणाम गुरूदेव ।

"कृपालु कृपा दरबार " यह महादिव्य दरबार हैं । यह अंतिम और परम पावन दरबार हैं । एक ऐसा दरबार जहां हम पतितों को सम्मान दिया जाता हैं । कृपा कि जाती है । अनाधिकारी जीवों को भी अधिकारी बनाया जाता है ।

 बने बने को सब जगह पुछा जाता है, पर ए तो वो दरबार हैं जहां जग से ठुकराया गया और शरण में आए जीवों पर कृपा की बरसात होती है ।
 यह महा महा दरबार है । 
एक ऐसा दरबार जहां स्वयं युगल सरकार, श्री कृपालु सरकार में आसक्त जीवों पर कृपा लुटाते हैं , हमेशा के लिए अपना लेतें हैं ,उसका योगक्षेम वहन करतें हैं ।

 महागुरू का दरबार , सर्वसमर्थ गुरूदेव का दरबार, आनंद दरवार , प्रेम दया और करूणा का भंडार है । 

हरि गूरू के दरबार में सजदा करने वाले कितने सौभाग्यशाली हैं इसकी कल्पना हम जीवों के लिए नामुमकिन है । यह तो उसी को अनुभव होता हैं जो मन से अपने गुरूवर को प्यार करतें है ।

 बड़े बड़े ज्ञानी , ध्यानी ,योगी को यहां प्रवेश नहीं जबतक वो भी कर्म धर्म ज्ञान योग छोड़ कर इनके शरण में न आ जाए । वो भी जब गुरू कृपा से आते हैं यहां तो अपना सब ज्ञान भूल जाते हैं , सोचिए ऐसे परम दुर्लभ प्रशनैलटी के छत्र छाया में हैं हम लोग ! जब भी उनके कृपा का एहसास होता है कि ऐसे परम रसिक प्रसनैलिटी के छत्र छाया में हैं हम लोग जिनके पीछे पीछे श्रीकृष्ण स्वयं चलते हैं और इनके साधको पर कृपा करतें हैं तो रोम रोम पुलकित हो जाता है । हे महाप्रभु आपके तसवीर को ह्रदय से लगाने मात्र से एक दुर्लभ आनंद का अनुभव होता है तो आगे का आनंद का अनुमान लगाना नामुमकिन हीं है । 
:- आपका संजीव ।

Kripalu Panchamrit

Kripalu Panchamrit:-
Every individual soul in the universe naturally desires unlimited happiness because of being an eternal part of the Supreme Lord, Shri Krishna who is the very embodiment of existence, knowledge and divine bliss.

There are numerous controversies prevalent in the world regarding the means to attain this infinite bliss; however, all of them can be classified irrefutably into only two categories: spiritualism and materialism. The science behind this is that one who identifies the self with the soul is called a spiritualist, and the one who identifies the self with the body is called a materialist. Though both condemn each other, in my opinion the truth is both are actually ignorant. Just as the body and the soul have an eternal relationship, in the very same way, spiritualism and materialism are equally indispensable. You can practice spiritual discipline only by keeping your body healthy, and in turn, the very existence of your body depends entirely on the soul.

The infinite bliss that the individual soul desires incessantly can only be obtained by the grace of Shri Krishna, that He showers only on completely surrendered souls. The first step to receive His grace is to acquire true spiritual knowledge from a Guru, who is well versed in scriptures and has practically realized God. By sincerely following the spiritual discipline specified by such a Guru, your heart will begin to purify. It is only when your heart becomes completely purified that you will attain divine bliss, through the grace of your Guru.

The only spiritual discipline that will completely purify your heart is the performance of the nine devotional processes to Shri Krishna known as navadha bhakti. Chant the glories of His divine names, forms, qualities, pastimes, abodes and Saints. Shed tears of love and continuously increase your longing to see your beloved Shri Krishna. Abandon all desires, including even the desire for the five kinds of liberation (sarupya, salokya, samipya, sarshti and sayujya).

It is the mind alone that has to surrender and practice devotion to Shri Krishna, and therefore, your mind must always be engaged in the constant loving remembrance of Shri Krishna and His names, forms, qualities, pastimes, abodes and Saints. While doing this, perform all your necessary duties pertaining to the maintenance of your physical body. In this way, live in the world with your mind absorbed in the loving thoughts of God and your body performing all your essential duties. This alone is the essence of the entire Gita known as karmayoga and the quintessence of the philosophy of the Vedant known as jnanayoga.

The Quintessence:- 
1.Shri Krishna and bliss are synonymous words. Every person in the world desires only bliss. In other words, he is a servant of bliss and therefore, unknowingly a servant of Shri Krishna.

2. Shri Krishna, Divine Bliss, can be attained only by bhaktiyoga, which is popularly known as navadha bhakti, the nine forms of devotional practice.

3.It is only by devotional practice that the heart becomes pure and then one can attain the divine love of Shri Krishna.

4.It is impossible to attain divine qualities such as truth, non-violence, etc. without the purification of the heart.

5.Every devotional practice is related only to the mind. Any spiritual discipline practiced merely with the senses is not spiritual discipline at all.

6.The consequences of love and hatred in the material world are the same; therefore, true detachment can be attained only by being neutral.

7.The perfection of spiritual life is to perceive Shri Krishna in all objects of the world – animate as well as inanimate.

8.Although the human body is invaluable, it is transient. Therefore, to procrastinate in devotional practice even for a moment is the greatest loss.

9.To see faults in others is the surest proof that we possess faults ourselves.

10.Spiritual practice is possible only under the guidance of a true Saint or Master.

:- By sri kripalu jee Maharaj

foult finding प्रदोष दर्शन एवं स्वयं के गुणों का बखान ।

परदोष दर्शन और स्व गुण बखान के कारण साधक साधना करके भी अपने लक्ष्य से कोसों दूर ही बने रहते हैं । साधना का कोई फल उन्हें प्राप्त नहीं होता, उल्टा हानि होती है ।

 स्वयं में आध्यात्मिक प्रगति न पाकर साधकों की निराशा बढ़ने लगती है । उससे कई तरह के अपराध होने लगते हैं । इतना ही नहीं , उसकी श्रद्धा हरि-गुरु के प्रति भी डगमगाने लगती है और उनके अपने मन में सर्वस्व हरि-गुरु के प्रति भी गलत विचार आने लगते हैं , जिसे शास्त्रों-वेदों में नामापराध कहा गया है । यह सबसे बड़ा पाप है । इसका कोई प्रायश्चित नहीं हैं । इससे तो पुन: गुरु ही उबार सकता हैं हम पर अहैतुकी कृपा करके । 

परदोष दर्शन से दो हानि होती है - एक तो वह दोष हमारे मन में आयगा , दूसरा इसके साथ हम में अहंकार भी आएगा । ' मन से ही तो दोष का चिन्तन करोगे न! तो वह मन में आएगा और मन को और गंदा करेगा । उसका दोष तो जाएगा नहीं , उल्टे तुम और दोषी हो जाओगे ।  
किसी की गंदगी को अपने अंदर डाल लेने से तो तुम्हारा मन और गंदा हीं होगा । तो मन से यदि दूसरे का दोष देखेंगें तो हम सदोष हो जाएँगें । 

अनन्त जन्मों में अनन्त अपराध हमलोगों ने किए हैं , इसलिए ऐसे ही क्या कम सदोष है हम जीव , और उपर से और दूसरे का दोष मन में लाकर इसे और गंदा ही किए जा रहे हैं , अरे हमको तो अपने अन्त:करण को शुद्ध करना है और हम उल्टा किए जा रहे हैं ।

दूसरे में दोष देखने से अपने में अहंकार आएगा ।' ऐसे ही कम अहंकार है क्या ? यही अहंकार हीं तो हमे चौरासी लाख में घुमा रहा है। इसलिए सावधानी परमावश्यक है । यदि हम सावधान न रहे तो ये दोनों ही दोष हमारे अंदर बलवान होते चले जाएँगें । 

नम्बर तीन , ' हम इसी प्रकार अगर अपने में गुण देखेंगें, तो अपने में दोष नहीं दिखाई पडेगा ।' साधना तो हम करेंगें , किन्तु हम इसके साथ यह भी करेंगें चोरी- चोरी - ' हमने इतना कीर्तन किया , इतना भजन किया , इतना दान किया ।' स्व प्रशंसा की तुष्टि हेतु हम बारम्बार इसकी आवृत्ति करेंगें और हमें इसकी आदत पड़ जाएगी । बिना बताए चैन नहीं । हमें अपने साधना का अहंकार हो जाएगा । दिन - रात इसी में व्यस्त रहेंगें , साधकों के दोष नही जाएँगें क्योकि भगवान के चिन्तन का हमारे पास समय ही कहाँ होगा ! 
हम तो गुणों का चिन्तन कर रहें है अपने । लोगों से बस यही कहते फिर रहें हैं । 
इसलिए यह गांठ बांधकर मन में वैठा लो की ' परमार्थ का जो भी काम करो, उसमें यह समझो कि यह भगवान और गुरु की कृपा ने करा लिया मुझसे । वरना मै करता भला ! अरे हमारे कितने भाई - बहन संसार में हैं ! वे क्या कर रहें हैं ? 
पूरे संसार का चिन्तन । उसी में चौबीसों घंटे लगे हैं । माँ, बाप, बेटा, बीवी, पैसा , सम्मान, सब उसी के चक्कर में लगे हैं । पता नहीं हमारे ऊपर क्या कृपा हो गई भगवान और गुरु की कि हमको तत्त्वज्ञान हो गया - यह चिन्तन हो , उसमें भगवत्वकृपा मानो। पर दोष दर्शन के स्थान पर अपने दोषों को दूर करने का सोंचों हरदम , तो फिर जल्दी - जल्दी आगे बढ़ोगे भगबत क्षेत्र में । :- श्री महाराज जी

change and transformation.

जब कोई जीव हरिगुरू कि भक्ति तथा कृपा से अपने मन के अंदर के संसार को शांत कर लेता है , अपने अंतःकरण चातुष्ट्य ( मन बुद्धि तथा चित्त ) को गुरू के चरणों में स्थिर कर लेता है , तब बाहर के संसार का कोई भी हलचल , कोलाहल, उथल-पुथल, मान सम्मान या अपमान आदि उसे प्रभावित नहीं कर सकता । 
आंतरिक स्वरूप के परिवर्तन को रूपांतरण कहते हैं और बाहरी रूप तथा व्यवहार में परिवर्तन को बनावटी रूप कहते हैं । रूपांतरण अति महत्वपूर्ण तथा स्थाई होती है क्योंकि इसमें स्वभाविकता है जबकि परिवर्तन अस्थाई ।
हम अपना बल लगा कर जब यह संकल्प करते हैं तथा कोशिश करते हैं कि हमें क्रोध नहीं करना , ईर्ष्या द्वेष नहीं करना किसी से तो इसे बनाबटी क्रिया कहते हैं , हम मान लेते हैं कि हम परिवर्तित हो चुके , लेकिन नहीं । प्रतिकूल परिस्थितियों में फिर हमारा मूल स्वभाव प्रकट हो जाता है क्योंकि स्वभावगत हम अपने मूल स्वरूप में ही हैं अभी । इसलिए हमारा स्वाभाव नहीं बदला अभी तक , यह स्वाभाविक तौर पर नहीं हुआ केवल बैचारिक स्तर पर हुआ है । इसलिए हमारा रूपांतरण नहीं हुआ ।‌ 

अत: रूपांतरण आवश्यक है, बैचारिक परिवर्तन नहीं । 
और रूपांतरण के लिए प्रैक्टिकल साधना की आवश्यकता होती है जिसे अभ्यास कहते हैं , तत्पश्चात गुरू कृपा से इसमें महारत यानि सिध्दि मिलती है ।

जब गुरू कृपा होती है तभी जीव का रूपांतरण होता है जिसे आंतरिक स्वरूप का ट्रांसफोर्मेशन कहते हैं , अंतःकरण की शूद्धि कहते हैं । जैसे जैसे अंत:करण कि शूद्धि होती है जीव स्वाभाविक रूप से परिवर्तित होता जाता है, फिर हर परिस्थितियों में वो समभाव , स्थिर , स्थिर प्रज्ञ हो जाता है । स्थित प्रज्ञ की अवस्था को प्राप्त कर लेता है । 

अत: रूपांतरण स्थाई तथा महत्वपूर्ण है ।
जब डांकू रत्नाकर नारद जैसे संत के संपर्क में आता है और उनसे तत्वज्ञान प्रात करके उनकी आज्ञा पालन करके राम राम राम को मरा मरा मरा बोल कर भी बिना किंतु परंतु के प्रैक्टिकल साधना करता है तो गुरू कृपा से उसके आंतरिक स्वरूप का परिवर्तन हो जाता है और वो वाल्मीकि बन जाता है । 
फिर वाल्मीकि वापस कभी डांकू रत्नाकर नहीं बन सका और न बन सकता है । 
लेकिन अगर वही रत्नाकर डाकू केवल तत्वज्ञान तक या केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक ही सीमित रह कर अपने बल से अपने काम क्रोध मद मोह लोभ ईर्ष्या द्वेष को दबाने कि कोशिश करके कुछ समय केवल बाहरी तौर पर दीन, विनम्र सहिष्णु या साधु बनने का नाटक करता जो आजकल अधिकांश साधु संन्यासी या लोग लोक लाज के लिए करते हैं तो प्रतिकूल परिस्थितियों में फिर से उनके अंदर का डाकू रत्नाकर फिर से हावी हो हीं जाता उन पर । 

इसलिए वस्त्र परिवर्तन, स्थान परिवर्तन, भेष भूषा भाषा परिवर्तन, अपने बल से मायिक दुर्गुणों को दबा कर साधू भेष का नाटक करना खूद को धोखा देना है । 
जबतक रूपांतरण नहीं होगा तबतक जीव सुखी नहीं हो सकता, आनंदमय नहीं हो सकता , साधु नहीं हो सकता , सन्यासी नहीं हो सकता , वैरागी नहीं हो सकता , ज्ञानी नहीं हो सकता, भक्त नहीं हो सकता , भले कोई बाहरी तौर पर कुछ समय के लिए एक्टिंग भले कर लें , ढोंग कर लें , पाखंड कर लें । 
आंतरिक स्वरूप रूप से स्वाभाविक ट्रांसफोर्मेशन कि प्रक्रिया गुरू निर्दिष्ट साधना भक्ति करने तथा गुरू आज्ञा पालन करने के रास्ते से ही गुजरती है , अपने बल से यह संभव नहीं । 
श्री राधे । :- श्री महाराज जी के द्वारा दिए गए तत्वज्ञान से ।

ब्रह्मांड की उत्पत्ति।

भगवान श्री कृष्ण स्वयं सृष्टि नहीं करते , वो सृष्टि करने का केवल संकल्प करते हैं , यानि सोंचते है केवल । उनके सोंचते हीं प्रकृति में हलचल होता है , क्योंकि वो अगर संकल्प नहीं करेंगे तो प्रकृति में हलचल नहीं होगी । तो उनके संकल्प करते हीं सबसे पहले उनका ही एक स्वरूप महाविष्णु का प्रकटीकरण होता है ब्रह्मांड में । महाविष्णु के प्रकट होते ही भगवान श्री कृष्ण के स्वरूप शक्ति से योगमाया शक्ति द्वारा उनसे ब्रह्यांड के अनंत आकाशगंगा , फिर आकाश गंगा में अनेकों सौरमंडल तथा उस अनेकों सौर मंडल में पृथ्वी का प्रकटीकरण होता है फिर अनंत पृथ्वी के लिए अनेक ब्रह्मा , अनेक विष्णु, अनेक शंकर आदि प्रकट होते हैं , फिर वो ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, श्री कृष्ण आगे का काम नहीं करते , यह सब काम अब उनके नित्य दास ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा योगमाया आदि शक्ति के द्वारा होता है । अत: ब्रह्मा कहते है :-

'न सृजामि तन्नियुक्तोय्हं तन्नियुक्त:'

अर्थात उनका नियुक्त किया हुआ मैं सर्वेंट, ब्रह्मा कह रहा है मैं सृष्टि करता हूँ । 

और उनके द्वारा नियुक्त हुये शंकर ' हरो हरति तद्वश: तद्वश: ' वो श्रीकृष्ण के वश में रहते हैं शंकर जी उनके अंश हैं । उनके सर्वेंट हैं । 

' विस्वं पुरूषरूपेण परिपाति त्रिशक्तिधृक् ' (भागवत् )

इसलिये श्रीकृष्ण को कहा गया- 

' स्वयं त्वसाम्यातिशय स्त्र्यधीश: ' (भाग)

वो तीनों के अधीश हैं । अध्यक्ष हैं ब्रह्मा विष्णु शंकर का ।
तो श्रीकृष्ण का जो अंश स्वरूप है उसको महाविष्णु कहते हैं वो महाविष्णु अनंत वैकुंठ के अध्यक्ष कहलातें हैं । - श्री महाराज जी ( हम दो हमारे दो-तीन पेंज- ३६)

शरणागति कैसे होती है । शरणागति किसको कहते हैं?

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹श्री कृपालु महाप्रभु जी के श्री मुख से -शरणागति कैसे होती है । शरणागति किसको कहते हैं? most most most important :- 
हमेशा हरि गुरू के अनुकूल चिन्तन हीं शरणागति है -

आनुकूल्यस्य संकल्पः प्रातिकूल्यस्य वर्जनम्। (भक्ति र.सि.)

इसमें भी एक पॉइन्ट सबसे इम्पॉर्टन्ट 'आनुकूल्यस्य संकल्पः' अपने शरण्य के अनुकूल ही सोचना। (ध्यान दो।) बस यही एक शरणागति का लक्षण है। अपने शरण्य के, भगवान् के गुरु के अनुकूल ही सोचना। करना बोलना ये सब नहीं। सोचना। 'आनुकूल्यस्य संकल्पः ।' ‘आनुकूल्यस्य संकल्पः।' आप सोचते कुछ और हैं क्रिया करते हैं शरणागति की। ये नहीं मानी जायगी शरणागति ।

भगवान् के यहाँ क्रिया नहीं देखी जाती, मन देखा जाता है, बुद्धि देखी जाती है। वो शरणागत है कि नहीं। तो अनुकूल ही चिन्तन करेगा, बस। ऐसा करो। क्यों ? क्यों नहीं बोलना, बस करो। तुम नहीं जानते अपना भविष्य मैं जानता हूँ। मैंने जो आज्ञा दी उसका पालन करो।

वाल्मीकि से उनके गुरु ने कहा मरा मरा बोलते जाओ जब तक मैं लौट कर न आऊँ। उसने नहीं पूछा आप कब लौट कर आयेंगे ? किस तारीख को आयेंगे ? आखिर हम कब तक मरा मरा बोलते जायें। कोई क्वेश्चन नहीं, बस आज्ञा पालन । 

"आज्ञा सम न सुसाहिब सेवा ।"

आज्ञा पालन ही सेवा है, आज्ञा पालन ही शरणागति है। अपनी बुद्धि नहीं लगाना है। यही 'आनुकूल्यस्य संकल्पः ' का सेन्स है और यही शरणागति है। अनुकूल ही सोचना।

लक्ष्मण! मेरे साथ चलो। भरत लौट जाओ। एक भाई को साथ ले लिया और हमको कहते हैं कि तुम जाओ, वापिस । ये कैसे भैया हैं! बड़े भैया, इनकी दो आँख है। आजकल के लोग यों बोलते। उनकी इच्छा में इच्छा रखना है। उनको सुख देना है। वो हमारे स्वामी हैं न भगवान् और गुरु सेव्य हैं। तो सेव्य का मतलब सेवा करने योग्य, सेवा के पात्र और हम हैं सेवक ।

तो सेवक को सदा सेव्य की इच्छानुसार चलना चाहिये। यही शरणागति है। यही हम नहीं कर सके अनादिकाल से अब तक। सोचते तो हैं हम लोग, ऐं हम तो शरणागत हैं। वाह ! तुम्हारे मिथ्या अहंकार से थोड़े ही शरणागति हो जायगी। प्रतिक्षण रहनी चाहिये, निरंतर शरणागति जैसे कोई ब्रह्मचारी है तो सदा ब्रह्मचर्य से रहना चाहिये। ऐसे नहीं कि हम बाइस घंटे ब्रह्मचारी हैं। सत्यवादी है हरिश्चन्द्र तो सदा सत्यवादी हैं। तो उसी प्रकार शरणागत है कोई तो सदा शरणागत रहे, चौबीस घंटे। एक रस। हर वस्तु भगवान् की आनन्द ग्राह्य, विभोर होकर ग्रहण करना। गौरांग महाप्रभु ने इतनी पिटाई कर दी एक बूढ़े आदमी की और वो विभोर हो रहा है। बलिहारी है ! बलिहारी है।

यानी शरणागति का अभिप्राय है अनुकूल ही सोचना, उनकी इच्छा में इच्छा रखना। इसीलिये ये बड़ा कठिन है। बड़े अभ्यास से हर समय सावधान रहे तभी कर सकता है कोई। इसीलिये हम लोग नहीं कर पाये। थोड़ी देर को थोड़ा हो भी जाते हैं। फिर गड़बड़ हो जाता है। ये बुद्धि देवी फिर आ जाती हैं। अपना कमाल दिखा देती हैं। ये तो ठीक है लेकिन ऐसा क्यों? ऐसा क्यों! तुमको सोचने का अधिकार किसने दिया ? वेदों ने, शास्त्रों ने, पुराणों ने ? उच्छृंखल हो, तो वो शरणागत नहीं हो सकता। अनन्त बार भगवान् को हमने देखा, संतों से मिले अनन्त जन्म में, कहीं शरणागत नहीं हुये। हुये, कुछ मात्रा में और कुछ फिर, कुछ अपनी बुद्धि लगा दी। किसी को वियोग देने में कृपा है, किसी को संयोग देने में कृपा है। किसी की ओर देखने में कृपा है। किसी की ओर न देखना भी कृपा है। ये सब भगवान् और महापुरुष किसका किसमें कल्याण है ये सोचकर के उसके अनुसार आज्ञा देता है। और हम अपनी बुद्धि लगा देते हैं। उसको तो ऐसा किया हमको ऐसा कर रहे हैं। बस हो गया नामापराध। शरणागति से च्युत हो गये हम।

तो अनुकूल ही चिन्तन करना यही है सर्व समर्पण। फिर गड़बड़ कभी कर ही नहीं सकता वो। उससे गड़बड़ी कोई
हो ही नहीं सकती। क्योंकि प्रतिकूल सोचेगा नहीं। और जब प्रतिकूल सोचेगा नहीं तो प्रतिकूल वर्क नहीं होगा।

मन बुद्धि की शरणागति वर्क की कोई इम्पॉर्टन्स है ही नहीं भगवान् के यहाँ । आप बड़े जोर से दण्डवत करें मन्दिर में गुरु को, चरण धोकर के पीयें। ठीक है नथिंग से समथिंग अच्छा है। थोड़ी बहुत दीनता आ जायगी लेकिन ये शरणागति नहीं। शरणागति तो मन, बुद्धि की असली है। ये जो दण्ड के समान शरीर गिरता है गुरु के चरण में। दण्डवत प्रणाम कहते हैं उसको। दण्डे की तरह उसका मतलब क्या है ? उसका मतलब ये नहीं है कि हम चमड़े का सिर पैर पर रख देते हैं वो नमस्कार नहीं है। दण्डवत प्रणाम का मतलब मेरा सब कुछ आपके चरणों में अर्पित है। सब कुछ। अब सब कुछ में सब कुछ आ गया। अब कोई भी चीज ऐसी नहीं है जो आपकी प्राइवेट हो। 

और हम लोग। सोचो सब लोग अपने-अपने मन में। ए! महाराज जी से न बताना, ए! महाराज जी न जानें, फिर
आधा घंटे बाद महाराज जी तो सब जानते हैं। ये क्या है जी? ये क्या नाटक कर रही है तुम्हारी बुद्धि ? थोड़ी देर में कुछ मान लेती है थोड़ी देर में कुछ मान लेती है। और शरणागति का दावा भी करते हो। ये गड़बड़ हमने अनन्त जन्मों में की और पता नहीं आगे कब तक करेंगे। ये तो हमारे ऊपर निर्भर है। हम चाहे एक सेकिण्ड में शरणागत हो जायें और चाहे अनन्त युग बीत गये और आगे ऐसे ही बितावें। चौरासी लाख में घूमें।

तो भगवान् का दर्शन हो, चाहे भगवत्प्रेम हो चाहे मोक्ष हो ये जितनी चीजें अलौकिक हैं, दिव्य हैं, इनको पाने के लिये बस एक मार्ग है, शरणागति ।
:- श्री कृपालु महाप्रभु जी ( प्रवचन 1980) गीता भवन मुंबई।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

Tuesday, 22 August 2023

कलयुग में कर्मकांड जप तप योग पूजा पाठ हवन यज्ञ व्रत उपवास तीर्थ विर्थ आदि फलदाई क्यों नहीं ।

आजकल हमारे देश में अधिकांश संख्या में लोग जप तप व्रत पूजा पाठ, उपवास तीर्थ-विर्थ हवन यज्ञ रूद्राभिषेक सत्यनारायण की पुजा , दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा , गणेश पूजा , लक्ष्मी पूजा , काली पूजा , सुंदरकांड की पाठ, आदि तमाम तरह के कर्मकांड करने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही है , बड़े बड़े मंदिरों में रात रात भर भजन कीर्तन, जागरण, दान आदि करते पाए जाते हैं । 

आजकल तो इतने प्रवचन करने वाले बाबा लोगों की भरमार हो चुकी है हमारे देश में जितना की आम लोगों की जनसंख्या भी नहीं थी सतयूग तथा त्रेता आदि में हमारे देश भारत में । आजकल इतना अधिक लोग ये सब कर्मकांड करते पाये जाते हैं जितना की सतयुग, त्रेता तथा द्वापर आदि का लोग भी नहीं किया होगा कभी । और करेंगे कैसे द्वापर में आज के तुलना में जनसंख्या ही कितनी थी ? आज भारत में हीं केवल एक सौ चालीस करोड़ लोग रहते हैं । 

लेकिन आज एक भी आदमी यह दावा नहीं कर सकता कि ए सब करने से उनके मन की एक प्रतिशत भी शुद्धि हुई है, मनों रोग - काम क्रोध , मद , मोह, लोभ , मातषर्य , ईर्ष्या घृणा , राग द्वेष चिंता आदि लेश मात्र भी कम हुआ है, सुख शान्ति तो बहुत दूर कि बात है ।

अरे आम लोगों कि कौन कहे स्वयं को बड़े बड़े पंडित , पुजारी , आचार्य , प्रवचन करने वाले लोग , कर्म कांड कराने वाले पंडितो के भी ये रोग कम नहीं हुए हैं । 

जरा सा कुछ प्रतिकूल बातें कोई इनके खिलाफ बोल दे , तुरंत गुस्सा , और लोभ लालच , राग द्वेष, अहंकार आदि इतना अधिक इनके मन में पाय जाते हैं कि उसी मंदिर के दुसरे पंडितो के प्रति राग द्वेष भरा परा है । जब इन पंडितो पुजारियों , आचार्यों का यह हाल है तो आम लोगों कि कौन कहे , अपने ही मंदिर के दुसरे पुजारी , आचार्य का बुराई करते मिल जाते हैं आज । आपस में एक दुसरे कि बुराई तो छोड़िये ये कर्मकांडी पंडित आचार्य लोग तो बड़े बड़े जगद्गुरुओं को भी नहीं छोड़ते , उनके बारे में गलत-सलत बातें बोलते रहते हैं , बड़े बड़े जगद्गुरुओं के प्रति भी दुर्भावना तथा द्वेष रखते हैं अपने मन में । 99% पंडितो में आचार्यों में दीनता , नम्रता, सहिष्णुता नहीं मिलेगा आज आपको , तो फिर पुजा पाठ हवन यज्ञ आदि कराने वाले गृहस्थों की तो बात ही छोड़िए । 

जब पंडितो पंडों, आचार्यों आदि का यह हाल है जो मंदिर में दिन रात भगवान के विग्रह कि सेवा करते हैं पुजा पाठ करते और कराते हैं तो भला साधारण लोग , इनसे कर्म कांड कराने तथा करने वाले गृहस्थों के मन बुद्धि चित्त अहंकार कि शूद्धि कि बात कौन सोचें ? 
तो इन सबका क्या कारण है ? तो पहला और सबसे प्रमुख कारण है आजकल केवल शरीर से भक्ति कि जा रही है । मन इंभौल्व हो या न हो कोई मतलव नहीं । दुसरा कारण कलयुग में कर्मकांड के सभी नियम तथा निषेधों का ठीक ठीक पालन असंभव है ।

अगर कोई पंडित यह कहता है कि भगवान कि फिजिकल सेवा , शरीर से पूजा पाठ , व्रत उपवास हवन यज्ञ करने से अभीष्ट यानि भौतिक बस्तूओं तथा संसारिक सुख सुविधा के साधनों कि प्राप्ति होती है तो जरा उनको देखा जाए जो लोग यह सब नहीं करते और न कभी किया आज तक फिर भी उनके पास आज रूप्या पैसा धन जन आदि पुजा पाठ जप तप हवन यज्ञ व्रत तीर्थ-विर्थ उपवास करने वालों कि अपेक्षा कई गुणा अधिक क्यों हैं ? 

नंबर दो अगर वो यह कहते हैं कि इन सब कर्मकांड से पाप समाप्त होता है कष्ट मिटते हैं तो आज ये सब करने बाले वेचैन क्यों है , इतना चिंता निराशा आदि से ये लोग घिरे क्यों रहते हैं ? आगे पाप करने के प्रवृत्ति का नाश क्यों नहीं हूआ ? 

नंबर तीन अगर यह दावा करते हैं पंडित लोग कि इससे लोगों के संस्कार का निर्माण होता है मन कि शूद्धि होती है तो जरा यह देखिए आज कि कितने लोगों यहां तक पंडितो तथा पंडों के खुद राग द्वेष काम क्रोध ईर्ष्या आदि समाप्त हुए हैं या कम हूए है ? 

तो यह सब वेकार कि बातें हैं । शास्त्र कहता है कलयुग में मंत्र तंत्र पुजा पाठ , जप तप हवन यज्ञ व्रत उपवास तीर्थ विर्थ संसारिक गानों के साथ भजन कीर्तन, नृत्य , उछल कूद सब निर्थक है इन सबका कोई लाभ नहीं है और न भगवान इन सब कर्मों से एक रत्ती भी खुश होते हैं , और न कृपा करते हैं । 

यहां तक कि इस कलयुग में इनसे न कोई आध्यात्मिक लाभ है और न कोई भौतिक लाभ है । 

भौतिक बस्तुएं तो जीव के केवल पुर्व जन्मों के संचित कर्मों जिसे प्रारब्ध कहते हैं प्लस इस जन्म के क्रियामान कर्मो से ही मिलता है । 
और अपवाद रूप में कोई सतयुग तथा त्रेता एवं द्वापर आदि के जैसे नियम तथा पुरे विधान से जो कि आज असंभव है, अगर कर भी ले ठीक ठीक तो उसके कुछ पिछले संचित पाप आदि धुल सकते हैं लेकिन जीव का उद्धार नहीं हो सकता , क्योंकि जीव के अनंत जन्मों के पाप की गठरी उसके माथे पर है । इन सबका क्षय इन सबसे नहीं हो सकता जब तक जीव के पंचकोष , पंचक्लेश , त्रिविध ताप आदि पुरी तरह भस्म न हो जाए ।
और जहां तक आध्यात्मिक लाभ एवं मन बुद्धि चित्त अहंकार, साधन चातुष्ट्य आदि कि शूद्धि आदि कि बात है तो यह केवल मन से भगवान तथा योग्य गुरू कि निरंतर तथा अनन्य भक्ति , पुर्ण शरणागति एवं साधना से हीं संभव है वरना कलयुग में कोई अन्य साधन फलदायी नहीं है । 
:- गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज द्वारा प्राप्त सिद्धांत ज्ञान से । श्री राधे ।

Monday, 21 August 2023

मनुष्य के जीवन में सफलता का मुख्य मार्ग ।

अपने गुरू द्वारा प्राप्त वैदिक सिद्धांतो तथा  तत्वज्ञान से अपने मन पर कंट्रोल तथा विजय हासिल करने का अभ्यास हमें हर रोज करना होगा, और यह अभ्यास एकांत में हरि गुरू के रूपध्यान साधना से हीं संभव है अन्यथा मानवीय चंचल मन कि उच्छृंखलता कभी दूर नहीं हो सकती । 

 उच्छृंखल मन हमेशा उदंडता करता रहेगा तथा यह तर्क , कुतर्क , वितर्क एवं अति तर्क में हीं उलझा रहेगा हमेशा और यही उदंड मन जीवन के हर क्षेत्र में असफलता का सबसे बड़ा कारण है । एक उच्छृंखल मन मनुष्य का पतन करा देता है । उच्छृंखल मन मनुष्य को अपने लक्ष्य पर कभी पहुंचने नहीं दे सकता है ।
अनेक बिचारों का प्रवाह यह मानवीय मन जीव के आत्मशक्ति को छिन्न-भिन्न करके रखता हैं जिस कारण यह मन किसी भी शुभ कर्म में केंद्रित नहीं हो सकता । 

इसलिए मन को ध्यान ( Meditation )  द्वारा "साधना" होगा । एकांत रूपध्यान साधना के द्वारा मन को दिव्य शक्ति यथा ज्ञान शक्ति के मूल स्त्रोत हरिगुरू में जमाना होगा, केंद्रित करना होगा । रूपध्यान साधना द्वारा इसको नियोजित करने की कला सिखनी होगी । मन को अनावश्यक बिषयों के चिंतन , चिंता तथा नकारात्मक बिचारो के प्रवाह से हटाने कि क्रिया को मन का निग्रह कहते हैं, दुसरे शब्दों में चित्त का मार्जन करना भी इसी क्रिया को कहते हैं तथा इसे हरिगुरू द्वारा दिया ज्ञान एवं सकारात्मक चिंतन में लगा कर दिव्य गुणों को ग्रहण के क्रिया को परिग्रहण कहते हैं । 

मन को अनेको अनुपयोगी बिषयों के चिंतन से हटाकर किसी एक परम उपयोगी तथा कल्याणकारी बिषय में लगाने की कला को मन को नियोजन करना कहते हैं । इंग्लिश में इसे Mind Management कहते हैं । 

अनियोजित मन अज्ञानता के कारण अनादि काल से अनित्य को हीं नित्य मान बैठा है , यह अपने शरीर तथा इस संसार को ही नित्य मान बैठा है , अत: यह सदा से अविद्या माया का शिकार है । इसी अविद्या माया के कारण जीव का मन  भ्रम , प्रमाद , विप्रलिप्सा तथा कर्णपाटव जैसे मानसिक रोगों से ग्रसित है । 

यही अविद्या माया अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश का भी मुख्य कारण है । और यही पांचों अवगुण जीव के मन को चिंता तथा भय से ग्रसित कर रखा है । 
जब तक मनुष्य का मन इनसे मुक्त नहीं होगा तब तक जीव अपने लक्ष्य को कभी हासिल नहीं कर सकता । 
जब तक मनुष्य का मन स्थिर नहीं होगा, जीव हमेशा अशांत रहेगा , दुखी रहेगा , हताशा तथा निराशा का शिकार रहेगा चाहे वो कितना भी अनित्य संसाधनो को अपने लिए जमा करके रख ले ।
जब तक जीव अपने मन के अनंत शक्तियों  को नियंत्रित करने का कला नहीं सिखेगा तब तक मनुष्य का पंचकोष भष्म नहीं हो सकता , और जब तक पंचकोष भष्म नहीं होगा, जीव पर त्रिताप तथा पंचक्लेश हमेशा हावी रहेगा और जीव दुखी हीं रहेगा , चाहे वो कितना भी धन , जन वैभव तथा अन्य अनित्य भौतिक बस्तूओं को इकट्ठा कर लें । 

आज कलयुग में भगवान तथा गुरू कि भक्ति तथा उनकी बतलाई साधना ही एक मात्र ऐसा साधन है जिससे जीव अपने मन को अपने वश में कर सकता है दुसरा कोई अन्य साधन नहीं है, क्योंकि अनादि काल से संसार में हीं आवागमन के कारण चतुर्युगी युग चक्र के अंतिम युग कलयुग में जीव का मन इतना उच्छृंखल हो चुका है कि वो अंधविश्वास तथा रूढ़िवादिता को ही कर्म तथा धर्म एवं ज्ञान समझ बैठा है । 
अत: कलयुग में जीव कर्म धर्म एवं ज्ञान के मूल स्वरूप को समझने में असमर्थ है । 
यही वजह है कि जीव आज कर्म धर्म के रूप में जो भी कर रहा है वो निष्फल होता जा रहा है चाहे वो पुजा पाठ हो , जप, तप, व्रत, उपवास तीर्थ, विर्थ, हवन या कोई भी अन्य कर्म कांड क्यों न हो । 

अत: कलयुग में केवल भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ तथा कल्याणकारी है,  लेकिन अफसोस कि आज कलयुग में अधिकतर लोग भक्ति के मूल स्वरूप तथा वास्तविक अर्थ को भी नहीं जानते। 

इस कलयुग के परमाचार्य पंचम मौलिक जगद्गुरूत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु ने भक्ति कि जो परिभाषा कि है तथा भक्ति के  जिस मार्ग को प्रशस्त किया है जीव केवल उसी को अपना कर अपने जीवन को सफल बना सकता है अन्यथा इस कलयुग में अन्य कोई मार्ग सक्षम नहीं है । अन्य सभी मार्ग भ्रम में डालने वाले हैं तथा मानसिक रोग को और भी बढ़ाने वाले मार्ग है । श्री राधे :- संजीव कुमार। ( अपने गुरू के प्रेरणा से दो शब्द )

Friday, 18 August 2023

संसार में केवल दो जाति के मनुष्य रहते हैं एक श्रेय मार्ग वाले जिनको केवल भगवान श्री कृष्ण और उनके जनों से हीं प्रेम है और दुसरा प्रेय मार्ग वाले जिनको संसार से और अपने संसारिक रिश्तेदारों से प्रेम है ।

श्री महाराज जी :- संसार में केवल दो जाति के मनुष्य रहते हैं एक श्रेय मार्ग वाले जिनको केवल भगवान श्री कृष्ण और उनके जनों से हीं प्रेम है और दुसरा प्रेय मार्ग वाले जिनको संसार से और अपने संसारिक रिश्तेदारों से प्रेम है ।

संसार का उपयोग दोनों प्रकार के जीव करते हैं, अंतर इतना है कि श्रेय मार्ग वाले संसारिक संसाधनों, यथा तन , मन ,धन का उपयोग भगवान व उनके जनों के सेवा के लिए करते हैं, भगवान और उनके जनों के सुख के लिए करते हैं और सेवा एवं साधना के माध्यम से जितेंद्रिय होकर परमानंद की प्राप्ति करते हैं वो भी सदा के लिए , जबकि प्रेय मार्ग वाले संसार का उपयोग नहीं उपभोग करते हैं , वो भी खुद के इंद्रियों के क्षणिक सुख के लिए लेकिन अंत में असह्य दु:ख पाते हैं।   

इसलिए बुद्धिमान मनुष्य केवल वो है जो संसार में रहते हुए भी संसार से अनासक्त हैं और अपना निज रिस्तेदार भगवान और उनके जनों को हीं मानते हैं , इसलिए ऐसे जीवों के ह्रदय कमल में भगवान व गुरू पुर्ण रूपेण करूणा कारक रूप में निवास करते हैं, वे ऐसे जीवों के किसी भी संसारिक कर्मो को नोट नहीं करते तथा हर पल हर प्रकार से रक्षा एवं योगक्षेम वहन करते हुए उसको उसके लक्ष्य की प्राप्ति करा देते हैं , परमानंद प्रदान कर देते हैं सदा के लिए । 

जबकि प्रेय मार्ग वाले जीव का ह्रदय तमाम संसारिक काम और वासनाओं का घर होता है , अत: भगवान इनके ह्रदय में इनके आत्मा के साथ केवल सायुज्य सखा के रूप में लेकिन न्यायी भाव में रहते हैं और यहां वो ऐसे जीवों के मन में उठे प्रत्येक संकल्पो को नोट करके उसे उसके कर्मो के अनुरूप हीं फल प्रदान करते हैं । ऐसा जीव अनंत काल तक अपने प्रारब्ध के अनुसार चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता हैं और दुख पाता हैं । - श्री महराज जी, साधन साध्य से ।

Saturday, 5 August 2023

प्रश्न:- अज्ञात भय से कभी कभी मन परेशान होता रहता है , समझ में नहीं आता कि ये अज्ञात भय क्यों कभी कभी होता है ।इसका मनोवैज्ञानिक कारण समझावें ।

 प्रश्न:- अज्ञात भय से कभी कभी मन परेशान होता रहता है , समझ में नहीं आता कि ये अज्ञात भय क्यों कभी कभी होता है ।इसका मनोवैज्ञानिक कारण समझावें । 

उत्तर :- इसका एक मात्र कारण हैं अवचेतन मन जो कि जीव का परमानेंट मेमोरी है उसमें डर स्टोर हो जाना । मनुष्य का मन अति संवेदनशील होता है , चारों तरफ विश्व में निगेटिव घटना घटते देख कर , सुन कर समाचार चैनल से , टी भी सिरियल से , जैसे क्राईम पेट्रौल , जागते रहो , सी आई डी या लगभग वैसे हीं अनेक प्रकार के गंदे धारावाहिक चार चार पांच शादी वाला , साजिश वाला धारावाहिक या खुद के साथ पहले की कष्टकारी घटना आदि , संसारिक कार्य में असफलता आदि के कारण जीव के अवचेतन मन में अनेक प्रकार का भय , डर , आगे आनेवाले समय में वैसी ही या उससे बड़ी घटना , दुर्घटना न हो जाए ऐसा भय दमित हो जाता है । यही डर कुछ समय बाद जीव को सशंकित करता रहता है , भय पैदा करता रहता है , आत्मबल को क्षीण कर देता है । कुसंग दमित होता रहता है अवचेतन मन में । फिर यही अवचेतन मन का डर , भय मनुष्य के मन में अकारण बिचारों के रूप प्रवाहित होता रहता है , चुके अवचेतन मन को तर्क की कोई क्षमता नहीं होती , चेतन मन को तर्क करने की क्षमता होती है पर अवचेतन को नहीं , अत: अवचेतन मन का यही डर ओवर फ्लोटिंग होकर बिचार के प्रवाह के माध्यम से चेतन मन में आता रहता है तो मनुष्य समझ नहीं पाता कि आखिर इस डर का वास्तविक कारण क्या है ? 

और जैसे हीं यह डर चेतन मन में निगेटिव बिचार बन के उभरता है वैसे हीं मनुष्य के शरीर का सभी ग्रंथि अस्त व्यस्त हो जाता है, अंदर ही अंदर डिस्टर्ब हो जाता है , जैसे ह्रदय का धड़कन बढ़ जाना , blood pressure अनियंत्रित हो जाना या बढ़ जाना , शरीर में हार्मोन का असंतुलन हो जाना , डाइजेस्टिव सिस्टम अनियंत्रित हो जाना , आमासय में गैस बनना । मस्तिष्क के हार्मोन जैसे सिरोटोनिन डोपामान , ईंडोरफिन , आक्सीटोसीन आदि का असंतुलन पैदा होना आदि बहुत से प्रभाव पड़ता है मानव मन तथा शरीर पर । यही कारण है कि अज्ञात भय , भविष्य के प्रति अनजाने डर पैदा होता रहता है मन में । और कभी कभी तो यह डर सच भी हो जाता है क्योंकि मनुष्य का कर्म भी उसी डर के प्रभाव के कारण वैसा हीं हो जाता है जिससे वो डरता है। जैसा वो सोचता है वैसा हीं घटना को निमंत्रण मिल जाता है फिर वही सोच हावी होकर वैसा हीं कर्म करवा देता है जो उस डर को भय को प्रैक्टिकल रूप से बुला लेता है । 

अत: जितना हो सके निगेटिव वातावरण , गंदे गंदे फिल्म, जलन घृणा वाला फिल्म , गंदे गाने , गंदा खान पान ( मांसाहार की अधिकता, शराब का सेवन की अधिकता, मादक पदार्थों का सेवन ) निगेटिव लोग , निगेटिव सोंच वाले मनुष्य , ईर्ष्या जलन द्वेष घृणा की अधिकता वाले मनुष्य से दुर रहना चाहिए और वास्तविक महापुरुषों से तत्वज्ञान अधिक से अधिक हासिल करना चाहिए। बार बार रिविजन , चिंतन मनन , भगवान का चिंतन मनन भगवान का तथा गुरू देव का रूपध्यान अधिक से अधिक करना चाहिए, जिससे हमारे अवचेतन मन में अच्छी बातें स्टोर होगी और गंदी बातें , निगेटिव बातें ओवरफ्लो होकर बाहर निकल जाएगी , ठीक वैसे हीं जैसे एक गंदे पानी के वर्तन को शुद्ध जल के नल के निचे रख कर नल को खोल दे तो कुछ समय बाद गंदा पानी ओवर फ्लो होकर बाहर निकल जाता है और बर्तन में केवल शुद्ध जल बचता है । नहीं तो उसमें और निगेटिव या कुसंग रूपी गंदा जल डालेंगे तो रही सही आत्म बल , सेल्फ स्टीम समाप्त हो जाती है और जीव गहरा डिप्रेशन का शिकार हो जाता है कोई कोई तो आत्महत्या कर लेता है । तो निगेटिव लोगों से , अति स्वार्थी जीव से नागेटिभ वातावरण , क्रोधी , लालची , ईर्ष्यालु का संग त्याग कर केवल वास्तविक महापुरुषों का सत्संग सुनना चाहिए, वास्तविक साधक से , भगवद् प्रेमी जनों से भगवान का गुरू का चर्चा करना चाहिए और कोई ना मिले तो खुद उनका पुस्तक पढ़ कर अधिक से अधिक उनका रूपध्यान चिंतन मनन करना चाहिए। जिससे अवचेतन मन साफ हो जाएगा , शुद्ध हो जाएगा । फिर शुद्ध बिचारों का प्रवाह होने लगेगा मन में , जीवन आनंदमय होने लगेगा ।