Tuesday, 29 August 2023

change and transformation.

जब कोई जीव हरिगुरू कि भक्ति तथा कृपा से अपने मन के अंदर के संसार को शांत कर लेता है , अपने अंतःकरण चातुष्ट्य ( मन बुद्धि तथा चित्त ) को गुरू के चरणों में स्थिर कर लेता है , तब बाहर के संसार का कोई भी हलचल , कोलाहल, उथल-पुथल, मान सम्मान या अपमान आदि उसे प्रभावित नहीं कर सकता । 
आंतरिक स्वरूप के परिवर्तन को रूपांतरण कहते हैं और बाहरी रूप तथा व्यवहार में परिवर्तन को बनावटी रूप कहते हैं । रूपांतरण अति महत्वपूर्ण तथा स्थाई होती है क्योंकि इसमें स्वभाविकता है जबकि परिवर्तन अस्थाई ।
हम अपना बल लगा कर जब यह संकल्प करते हैं तथा कोशिश करते हैं कि हमें क्रोध नहीं करना , ईर्ष्या द्वेष नहीं करना किसी से तो इसे बनाबटी क्रिया कहते हैं , हम मान लेते हैं कि हम परिवर्तित हो चुके , लेकिन नहीं । प्रतिकूल परिस्थितियों में फिर हमारा मूल स्वभाव प्रकट हो जाता है क्योंकि स्वभावगत हम अपने मूल स्वरूप में ही हैं अभी । इसलिए हमारा स्वाभाव नहीं बदला अभी तक , यह स्वाभाविक तौर पर नहीं हुआ केवल बैचारिक स्तर पर हुआ है । इसलिए हमारा रूपांतरण नहीं हुआ ।‌ 

अत: रूपांतरण आवश्यक है, बैचारिक परिवर्तन नहीं । 
और रूपांतरण के लिए प्रैक्टिकल साधना की आवश्यकता होती है जिसे अभ्यास कहते हैं , तत्पश्चात गुरू कृपा से इसमें महारत यानि सिध्दि मिलती है ।

जब गुरू कृपा होती है तभी जीव का रूपांतरण होता है जिसे आंतरिक स्वरूप का ट्रांसफोर्मेशन कहते हैं , अंतःकरण की शूद्धि कहते हैं । जैसे जैसे अंत:करण कि शूद्धि होती है जीव स्वाभाविक रूप से परिवर्तित होता जाता है, फिर हर परिस्थितियों में वो समभाव , स्थिर , स्थिर प्रज्ञ हो जाता है । स्थित प्रज्ञ की अवस्था को प्राप्त कर लेता है । 

अत: रूपांतरण स्थाई तथा महत्वपूर्ण है ।
जब डांकू रत्नाकर नारद जैसे संत के संपर्क में आता है और उनसे तत्वज्ञान प्रात करके उनकी आज्ञा पालन करके राम राम राम को मरा मरा मरा बोल कर भी बिना किंतु परंतु के प्रैक्टिकल साधना करता है तो गुरू कृपा से उसके आंतरिक स्वरूप का परिवर्तन हो जाता है और वो वाल्मीकि बन जाता है । 
फिर वाल्मीकि वापस कभी डांकू रत्नाकर नहीं बन सका और न बन सकता है । 
लेकिन अगर वही रत्नाकर डाकू केवल तत्वज्ञान तक या केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक ही सीमित रह कर अपने बल से अपने काम क्रोध मद मोह लोभ ईर्ष्या द्वेष को दबाने कि कोशिश करके कुछ समय केवल बाहरी तौर पर दीन, विनम्र सहिष्णु या साधु बनने का नाटक करता जो आजकल अधिकांश साधु संन्यासी या लोग लोक लाज के लिए करते हैं तो प्रतिकूल परिस्थितियों में फिर से उनके अंदर का डाकू रत्नाकर फिर से हावी हो हीं जाता उन पर । 

इसलिए वस्त्र परिवर्तन, स्थान परिवर्तन, भेष भूषा भाषा परिवर्तन, अपने बल से मायिक दुर्गुणों को दबा कर साधू भेष का नाटक करना खूद को धोखा देना है । 
जबतक रूपांतरण नहीं होगा तबतक जीव सुखी नहीं हो सकता, आनंदमय नहीं हो सकता , साधु नहीं हो सकता , सन्यासी नहीं हो सकता , वैरागी नहीं हो सकता , ज्ञानी नहीं हो सकता, भक्त नहीं हो सकता , भले कोई बाहरी तौर पर कुछ समय के लिए एक्टिंग भले कर लें , ढोंग कर लें , पाखंड कर लें । 
आंतरिक स्वरूप रूप से स्वाभाविक ट्रांसफोर्मेशन कि प्रक्रिया गुरू निर्दिष्ट साधना भक्ति करने तथा गुरू आज्ञा पालन करने के रास्ते से ही गुजरती है , अपने बल से यह संभव नहीं । 
श्री राधे । :- श्री महाराज जी के द्वारा दिए गए तत्वज्ञान से ।

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