श्री कृपालुजी महाप्रभु कार्तिक मास को भक्त के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों कहा है? उन्होंने साधना के लिए कार्तिक मास को विशेष क्यों माना है ?
कार्तिक मास में मनगढ़ धाम में विषेश कर, पुरे मास वो साधना क्यों करवाते थे ?
आइए जानते हैं भक्तों के लिए , साधकों के लिए कार्तिक मास का महत्व:-
समस्त युगों में सर्वश्रेष्ठ युग सतयुग कहलाता है, शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ वेद कहलाता है, तो बारह मासों में सर्वश्रेष्ठ मास कार्तिक मास कहलाता है। कार्तिक मास वह मास है, जिसे विजय मास कहते हैं। अर्थात् कार्तिक मास जीवों को विजय प्रदान करता है। कार्तिक मास की बड़ी महिमा है! यह भक्तों को अनंत फल प्रदान करता है। यह भक्तों का मास है। इसे दामोदर मास भी कहते हैं ।
इस मास को विजय मास कहा जाता है।
क्योंकि इसी मास में कार्तिकेय जी ने नरकासुर का बध किया था। इसी मास में श्री राधाकृष्ण आराधना के फलस्वरूप , सत्यभामा जी तथा लक्ष्मी के अवतार रूक्मिणी जी को भगवान कि पटरानी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था । इसलिए यह विषेश मास , यानी कार्तिक ऑफर मास है ! जैसे बाजार में दिवाली में ऑफर मिलता है न ! सामान्य दिन में हम उसी सामान को बहुत रेट में लेते हैं, लेकिन ऑफर में एक के बदले दो ले लो, चार ले लो! ऐसे ही आप इसको कह सकते हैं ऑफर मास! क्योंकि कार्तिक मास में ही सारे त्योहार हैं, सारी लीलाएँ हैं, जैसे- श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला, दामोदर लीला, ऊखल बंधन लीला, तुलसी विवाह। बहुत-से त्योहार इसी मास में हैं! तो, श्रीराधारानी इस मास की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए यदि इस मास में श्रीराधारानी की उपासना की जाएगी तो अनंत फल प्राप्त होगा, बशर्ते कि मन से की जाए । क्यों? -क्योंकि स्कन्ध पुराण में ऐसा बताया गया है-
दृष्ट्वा भागवतं दैवात् सन्मुखे यो न याति हि। -हरिभक्ति विलास।
अर्थात् यदि आपके सामने कोई भगवत पुरुष या भगवद् शक्ति प्राप्त संत या देव पुरुष हों और उनकी पूजा, आराधना और सेवा न करें, तो उसके विषय में स्कन्द पुराण क्या कह रहा है-
न गृह्णाति हरिस्तस्य पूजां द्वादश वार्षिकीम्।:- हरिभक्ति विलास।
कोई भगवद् तत्व की पूजा-उपासना-सेवा नहीं करता तो ऐसे मनुष्य की पूजा श्रीहरि १२ साल तक ग्रहण नहीं करते। उनके निजजन की सेवा इतनी महत्वपूर्ण है! क्यों? क्योंकि-
आराधनानां सर्वेषां विष्णोराराधनं परम्।
तस्मात् परतरं देवि तदीयानां समर्चनम्।।
- पद्मपुराण
भगवान शंकर पार्वती जी से कह रहे हैं- वैसे तो सबसे श्रेष्ठ आराधना श्री कृष्ण की है( यहां विष्णु शब्द भगवान श्री कृष्ण वा श्री राम के लिय उन्होने कहा है ), लेकिन- 'तस्मात् परतरं देवि।' हे पार्वती! सुनो, जो श्री राधा की आराधना करता है, मैं अपनी आराधना से भी श्रेष्ठ उस आराधना को मानता हूँ।
इस प्रकार इस मास में यदि कोई श्रीराधारानी की उपासना करता है, तो श्रीकृष्ण को विशेष आनंद मिलता है। ऐसे तो हर क्षण उनकी उपासना करनी है, लेकिन कार्तिक मास विशेष की अधिष्ठात्री देवी श्रीराधा हैं और यदि श्रीराधा का ही दिन-रात चिंतन होगा, तो श्रीकृष्ण विभोर होकर हमारी योग्यता-अयोग्यता पर विचार न कर अनंत-अनंत फल प्रदान करते हैं ।
आपको पहले ही बताया जा चुका है कि इस मास को दामोदर मास भी कहा जाता है अर्थात् इस मास में आने वाली दीपावली के दिन ही ऊखल बंधन लीला हुई थी। यशोदा मैया ने भगवान श्रीकृष्ण को माखन चुराते हुए पकड़ा था- 'चौराग्र गण्यं पुरुषं नमामि।' ऐसे हैं परमपुरुष! जिन्होंने माँ यशोदा की अधीनता स्वीकार की और मैया ने उन्हें घसीटते हुए ले जाकर ऊखल से बाँध दिया । दाम माने रस्सी और उदर माने पेट। तो मैया ने ऊखल से लगाकर उनके पेट को रस्सी से बाँध दिया था।
भविष्य पुराण में एक और प्रसंग द्वापर युग के कार्तिक मास का आता है। एक दिन एक कुंज में श्रीराधारानी श्रीकृष्ण की प्रतीक्षा करती हार गईं और उन्हें मान हो आया। जब बहुत विलम्ब के बाद श्रीकृष्ण पधारे तो मानिनी ने कृष्ण के करकमल को पकड़कर कुंज की माधवी लताओं से बाँध दिया। यही कारण है कि वैष्णवजन कार्तिक मास को राधा दामोदर मास भी कहते हैं। सेवाकुंज में जीव गोस्वामी के विग्रह राधा दामोदर उसी के प्रतीक हैं। यह प्रसंग जीव गोस्वामी जी ने बतलाया है, जिसकी चर्चा भविष्य पुराण में है।
युगल उपासक नामग्रहणकारी साधकों की उपासना में श्रीराधा उपासना की प्रधानता है। श्री महाराज जी ने अपने अनुयायियों को विशेष रूप से कहा कि माधुर्यभाव में श्रीराधाकृष्ण की उपासना स्वयं को दास मानकर करनी है। और! उपासना में भी श्रीराधा प्रधान हों। श्रीकृष्ण भी स्वयं ह्लादिनी शक्ति की आधीनता स्वीकार करते हैं। तो, हम लोगों के लिए यह कार्तिक मास बड़ा महत्त्वपूर्ण है।
यही कारण है कि हमारे गुरुवर जगद्गुरु स्वामी श्री कृपालु जी महाराज ने शरद पूर्णिमा से कार्तिक मास तक एक माह का साधना शिविर श्री मनगढ़ धाम (श्री भक्ति धाम) में परम्परागत रूप से रखा है। उन्होंने यह साधना विशेष रूप से स्वयं की उपस्थति में पूर्णतः मौन का पालन करवाते हुए करवायी ताकि मन-वाणी से केवल हरिनाम स्मरण-मनन हो । यह जब से प्रारंभ किया, आज तक चल रहा है और आगे भी चलता रहेगा। उसके पीछे कारण एक ही है कि यह मास विजयी होने का मास है। साधक के लिए प्रेम प्राप्ति हेतु साधना में लगने का मास है। इस समय अनंत फल प्राप्त होते हैं क्योंकि इसकी अधिष्ठात्री देवी श्रीराधा हैं। श्रीराधा तो हैं कृपामयी! दयामयी !! करुणामयी !! वे अपने जनों पर करुणा करने हेतु सदा आतुर रहती हैं, इसलिए वे हमारे क्षुद्र प्रयास पर अपार करुणा करती हैं।
कार्तिक मास संकल्प का मास है। इस समय कार्तिक व्रत होता है। लोग शरद पूर्णिमा से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक कार्तिक व्रत रखते हैं। व्रत से मेरा तात्पर्य भोजन छोड़ना नहीं है। व्रत का अर्थ होता है- संकल्प ! दृढ़ निश्चय !! उस निश्चय के पीछे कुछ शर्तें हैं; जैसे, अल्प खाओ आदि ताकि आलस्य न आए। पर यह सब गौण है। प्रमुख संकल्प है भक्ति! भक्ति के विविध व्रतों में सर्वश्रेष्ठ व्रत दो ही हैं- भगवान की रसमय लीला-कथा का श्रवण-चिन्तन व श्री राधाकृष्ण के नामों का भावयुक्त गुणगान।
'लीलाकथारसनीषेवणमन्तरेण।'
- श्रीमद्भागवत
भागवत लीला रस कथा का पान करने से क्या होगा ?
पुंसो भवेद् विविधदुःखदवार्दितस्य।
- श्रीमद्भागवत
त्रिताप, पंचक्लेश आदि से मुक्ति मिलेगी। हृदय में प्रेम का सिंचन होगा। इसलिए भगवान के लीलामृत, कथामृत, गुणानुवाद का मन से श्रवण और चिंतन करना है। बस ये दो व्रत ही पूरे मास करने हैं। तो गोपियाँ कहती हैं-
तब कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्।
श्रवणमंगलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः।
- श्रीमद्भागवत
उनकी कथाओं का श्रवण करो, जो कल्मष का नाश करती हैं। प्रभु विरह का दर्द हृदय को शीतलता प्रदान करता है। तो पहला व्रत है कि हम केवल श्रीकृष्ण की लीला व कथारस का श्रवण-चिंतन-मनन करेंगे। दूसरा व्रत, हम श्री राधाकृष्ण के नामों का भावयुक्त गुणगान करेंगे। मन से भाव बनाएँगे और वाणी से गुणगान करेंगे। गुरुदेव स्वामी श्री कृपालु जी महाराज ने साधना के रूप में यही दो कार्य पूरे मास करवाया ।
तो, कार्तिक मास में आपको क्या करना है? - संसारी चिंतन को हटाकर मन में आध्यात्मिक चिंतन भरना है। वह आध्यात्मिक चिंतन भी क्या करना है? -हरि गुरु संबधित लीला, कथा, नामावली का गुणगान । इस व्रत को धारण करने से अनंत भक्ति का फल प्राप्त होगा। और यदि इस आराधना में श्रीराधा जी की उपासना विशिष्ट रूप में हो, तो बात ही क्या है!
-पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ( पुस्तक - भक्ति रत्नाकर शिक्षाष्टकम्)