उत्तम और उदार चरित्र, परोपकारिता , न्याय , त्यागशीलता , दयाशीलता , क्षमाशीलता , धर्मनिष्टता , दानशीलता , करूणाकारित्व , कल्याणकारिता , ईमानदारी , कर्तव्यनिष्टता , सुसंस्कार , नीतिवान, नैतिकता , अहंकारशून्यता, दीनता और कर्मयोग आदि , ये जो सभी दैविक गुण हैं, ये सभी सुशिक्षा (तत्त्वज्ञान) यानि सत्संग , साधना का फल और तत्पश्चात् , हरि गुरू के कृपा का प्रसाद है । यह गुरू सेवा का परिणाम है । अंत:करण की शुद्धि होतें हीं जीवों में ये सभी गुण पहले आ जातें हैं ।
इन दैविक गुणों का बीज सच्चे साधकों के ह्रदय रूपी मिट्टी ( अंत:करण) में हीं अंकुरित होतें हैं ।
साधक जब अतिव्याकुल होकर , गुरू के चरणों का शरणागत होकर , पूर्णश्रद्धा और विश्वास के खाद और अपने अश्रुपूरित नेत्रों के जल से अपने गुरू भक्ति रूपी फसल को सिंचता है एवं आर्त पुकार करता है, तो सद्गुरूदेव से जीव को श्री राधाकृष्ण रूपी प्रेम धन तत्क्षण मिल जाता है।
भगवान यूगलसरकार का प्रत्यक्ष दर्शण हो जाता है । हमेशा के लिए दु:ख निवृत्ति हो जाती है , सदा के लिए परमानंद मिल जाता है , जीव मलोमाल हो जाता है । - पुज्यनियां मां रासेस्वरी देवी जी ।
No comments:
Post a Comment