जिसके पास विषय भोग रूपी धन नहीं हो और कोई इन वस्तुओं के अभाव में स्वयं को सन्यासी घोषित करे उसका कोई ठीक नहीं । वो सन्यासी नहीं ।
ईमानदार या चरित्रवान वो है जिसके पास बेईमानी का अवसर भरा परा हो , भ्रष्ट तथा चरित्रहिन होने का अवसर भरपुर मिल रहा हो उसे फिर भी उसका ईमान न डोले वो ईमानदार है । जिसको अवसर कभी मिला हीं नहीं बेईमानी का और वो स्वयं को ईमानदार कहता हो या समझता हो ऐसे जीव पर भरोसा कभी नहीं करना चाहिए ।
साधू , सन्यासी, चरित्रवान भले लोगों तथा भक्त की परीक्षा प्रतिकूल तथा अनुकूल दोनों परिस्थितियों में ही होता है । भगवान और गुरू उसे अनुकूल तथा प्रतिकूल दोनों परिस्थितियां देकर परीक्षा लेते है कि दोनों में जीव कैसा व्यवहार करता है ? कितना राग द्वेष ,मोह , लोभ , क्षोभ , हर्ष , विषाद , अहंकार, घृणा है किसी से संसार में ? यह कितना कम हुआ है ? इंद्र ने अर्जुन के पतन के लिए उसके पास स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी को भेज दिया नृत्य करके रिझाने के लिए पर वो उर्वशी का नृत्य देखने के बाद उसको मां कह कर पुकारा ।
क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो। :- दिनकर जी
ऐसा गृहस्थ जिसके पास भरा पूरा संसार हो , संसार का सभी साधन हो फिर भी अपने गुरू से प्राप्त तत्वज्ञान द्वारा तथा साधना भक्ति सेवा के फलस्वरूप उसमें रूचि समाप्त होने लगे और गुरू तथा ईष्ट से प्रेम बढ़ने लगे , यदि किसी भी जीव के किसी भी व्यवहार से न सुख का, न दुख का , न मान सम्मान से, न अपमान से मन में किसी प्रकार का हर्ष या विषाद उत्पन्न हो तब समझना चाहिए कि हमारा वास्तव में उत्थान होने लगा है , हम सही रास्ते पर है ।
पुज्यनियां मां ने 2010 में अपने रांची के प्रवचन में उमर बगदाद का एक कथा सुनाई थी , पेश है पुनः-
संसार मे रहो पर ध्यान रहे की संसार आप में न बसे |
मशहूर सूफी संत उमर बगदाद में रहते थे। उनके पास रोज बड़ी संख्या में लोग मिलने आते थे। वे सभी से प्रेमपूर्वक व्यवहार करते और यथोचित सत्कार भी करते थे। एक बार एक दरवेश उनके पास पहुंचा। उसने देखा कि कहने को तो उमर फकीर हैं, लेकिन वे जिस आसन पर बैठे हैं, वह सोने का बना है। चारों ओर सुगंध है, जरी के पर्दे टंगे हैं, सेवक हैं तथा रेशमी रस्सियों की सजावट है। रस्सियों के निचले हिस्से में सोने के घुंघरू बंधे हैं जो जमीन तक आ रहे हैं। हवा चलती है तो रेशमी रस्सियां हिलती हैं, और उनके घुंघरू बज उठते हैं। कुल मिलाकर हर तरफ विलास और वैभव का साम्राज्य है।
दरवेश देखकर भौंचक रह गया। उमर उसके सम्मान में कुछ कहते, इसके पहले ही दरवेश बोल उठा-'आपकी फकीराना ख्याति सुन दर्शन करने आया था, लेकिन देखता हूं आप तो भौतिक संपदा के बीच मजे में हैं।' उमर ने कहा-'तुम्हें ऐतराज है तो मैं इसी पल यह सब वैभव छोड़कर तुम्हारे साथ चलता हूं।' दरवेश ने हामी भरी और कुछ ही पलों में उमर सब छोड़कर उसके साथ चल पड़े। दोनों पैदल कुछ दूर चले होंगे कि अचानक दरवेश पीछे मुड़ा। उमर ने वजह पूछी तो उसने बताया कि वह उमर के ठिकाने पर अपना कांसे का एक कटोरा भूल आया है। उसे लेना जरूरी है, इसलिए फिर वहीं लौटना होगा।'
तब उमर ने हंसते हुए कहा-'बस यही बात है। मैं तुम्हारी एक आवाज पर अपना लाखों का भौतिक साम्राज्य पल भर में ठोकर मारकर आ गया, लेकिन तुम एक कटोरे का मोह भी न निकाल पाए। मेरे ठिकाने की रेशमी रस्सियां तो धरती की मांटी तक धंसी थीं। यह कटोरे का मोह तुम्हारे मन में धंसा है। जब तक मन में किसी भी चीज को मोह है तब तक भगवान को पाना कठिन है।' दरवेश लज्जित हो गया।
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