लवकुश पर प्रश्न था कि उन्होने अश्वमेध का घोड़ा क्यों रोका और फिर गुरू के कहने पर हीं छोड़ा ! ऐसा क्यों ?
उत्तर - सबसे पहले हम इसे जीव-धर्म, ज्ञान, तथा व्यवहार के दृष्टिकोण से समझते हैं और फिर साथ साथ तत्वज्ञान कि दृष्टि भी चलेगी ।
लवकुश का जन्म वाल्मीकि आश्रम में हुआ था । उनकी सभी प्रकार कि शिक्षा चाहे वो संसारिक हो , आध्यात्मिक हो, वाल्मीकि जी से तथा उनके वरिष्ठ शिष्यों के द्वारा हुआ था ।
तत्वज्ञान कि दृष्टि से लवकुश भगवान राम और उनकी ह्रलादिनी शक्ति सीता जी के पुत्र थे ।
लेकिन लव तथा कुश दोनों को यह जानकारी नहीं थी कि वे दोनों राजा राम और सीता जी के पुत्र हैं । वो अपनी मां के बारे में नहीं जानते थे कि उनकी मां हीं सीता है ।
वाल्मीकि जी तत्वदर्शी थे उन्होंने राम लीला से पहले ही रामायण लिख दिय थे और बाद में उसी लिखावट के अनुसार राम जी लीला रचे । यानी वाल्मीकि जी को पता था कि अश्वमेध यज्ञ होगा और लवकुश को घोड़ा पकड़ना है और उसके लिए उनको राजा राम के सेना को परास्त करना है , अपने चाचा लक्षुमण , भरत तथा शत्रुघ्न को भी परास्त करना है । यहां तक कि हनुमान जी को भी बांध देना है और भगवान राम को आने के लिए विवश कर देना है फिर अंत में उनको लवकुश को रोकना है , घोड़ां छोड़ने का आदेश देना है , पहले नहीं ।
अब एक और गुढ़ तत्वज्ञान पर ध्यान देने वाली बात है , तत्वज्ञान कि दृष्टि से देखिए तो भगवान राम हीं पांच बन गए लीला के लिए , क्योंकि भगवान एक हीं हुआ करता है , दो कभी नहीं अनंत ब्रह्मांड में ।
इसलिए एक तो स्वयं भगवान राम रूप में है , फिर वही स्वयं लक्षूमण बने हैं ( केवल लीला तथा ज्ञान कि दृष्टि से ए शेषनाग के अवतार हैं ) पर तत्वज्ञान कि दृष्टि से भगवान राम हीं अपने सजातिए भेद शून्य, स्वरूप शक्ति के संबित अनुभाग से खुद भरत और शत्रुघ्न बने है और तो और वहीं स्वयं ह्रलादनी शक्ति स्वरूप से सीता बने हैं इस लीला में ।
तो जरा लीला तो देखिए । लवकुश जब घोड़ा पकड़ा तो स्वभाविक है उनके महामंत्री सुमंत जी उनको नहीं पहचान सके होंगे कि ए भगवान राम के हीं पुत्र लवकुश है । लेकिन लक्षुमण , भरत और शत्रुघ्न जो स्वयं भगवान हीं है को कम से कम पहचान लेना चाहिए था अपने भगवद् दृष्टि से कि लवकुश भगवान राम और सीता का हीं पुत्र हैं , उनका भतिजा है । पर लीला यानि एक्टिंग तो देखिए जो सर्वद्रष्टा है वो न पहचानने का एक्टिंग कर रहें है ।
और तो और तत्वज्ञान कि दृष्टि से देखिए तो हद हो गया , हनुमान जी जो रूद्रावतार है ,दास भाव में है वो पहचान गए लवकुश को कि वो कौन है और वहां खुद को शरेंडर कर दिया लवकुश के सामने , बंधवा दिया उनके हाथों । और आश्चर्य कि सीमा पार कर गया , बुद्धि चकरा जाएगी कि खुद राम जब खुद आए अंत में घोड़ा छुड़वाने तो वो भी नहीं पहचान रहे है कि लवकुश उनका पुत्र हैं,क्या बढ़िया लीला है , एक्टिंग है भगवान की, हमारी साधारण बुद्धि से परे है यह सब ।
देवता लोग , महापुरुष लोग , सब लीला देख रहे हैं उपर आकाश से । शीव जी और ब्रह्मा विष्णु भी इस लीला को देख रहे हैं कि भगवान ने संसार को संसारिक कर्म धर्म कि शिक्षा देने के लिए क्या खुब एक्टिंग कर रहे हैं ।
वाल्मीकि जी भी सब देख रहे हैं शुरू से नौटंकी , अरे खुद लिख चुके थे रामायण इन लीलाओं से पहले हीं । त्रिकाल दर्शी है । सब जानते हैं , चाहते तो घोड़ा पकड़ने के पहले हीं समझा देते लवकुश को कि मत पकड़ो ।
नहीं समझाए क्योंकि संसारिक अल्पबुद्धी बाले हम मनुष्य को धर्म कर्म का शिक्षा जो देना था ।
तो क्या शिक्षा देना था ?
तो शिक्षा यह देना था कि भगवान राम ने नहीं अयोध्या के राजा राम ने एक साधारण अनपढ़ गंवार , जाहिल धोवी के कहने में आकर अपने पत्नी को त्याग दिए जो न्याय के विपरित बातें है । राजा को तो न्यायी होना होता है न । पर राम ने एक अवला नारी को त्याग दिए । वो भी गंदे अंत:करण वाले जीव के व्यंग के कारण । यह गलत हो गया था । और उपर से राजा राम ( भगवान राम नहीं ) खुद को चक्रवर्ती सम्राट साबित करने के तथा युद्ध में किए गय ब्रह्म हत्या के प्रायश्चित के लिए अश्वमेध कर रहे हैं तो यह सफल कैसे हो सकता है , निर्दोष पतिव्रता नारी का त्याग और अश्वमेध यज्ञ ???
तत्वज्ञान कि दृष्टि से भगवान राम को अश्वमेध यज्ञ करने कि क्या जरूरत , वो तो पाप पुण्य से परे हैं । अश्वमेध यज्ञ तो अयोध्या का राजा राम कर रहे हैं ।
वाल्मीकि जी ने लवकुश को यही कहानी सुनाए थे कि राजा राम ने अपने निर्दोष पतिव्रता पत्नी का त्याग कर दिया था , वो भी गर्भवती स्त्री को ।
जो न्यायोचित नहीं था ।
इसलिए लवकुश ने एक क्षत्रिए वीर होने के कारण उनके चुनौती को स्वीकार किया और धर्म कर्म युद्ध के निहितार्थ अश्वमेध यज्ञ के घोड़ा को पकड़ लिया ।
और सुमंत जी , यहां तक कि लक्षूमण जी भरत, शत्रुघ्न तथा हनुमान जी का शक्ति भी काम नहीं किया , वहां । जहां अन्याय होता है वहां भगवान अपनी शक्तियों का दुरूपयोग कभी नहीं करते ।
लक्षूमण जी मुर्क्षित हुए लवकुश के वाण से । भरत शत्रुघ्न यहां तक कि हनुमान जी को हार मानना परा । यह शिक्षा देने के लिए संसार को कि भगवान भी अगर वेद विरुद्ध, वैदिक न्याय प्रस्थान के विरूद्ध कोई काम करें तो एक महान गुरू के शिष्य होने के नाते अधर्म का , अन्याय का विरोध करने में तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिए तबतक जबतक गुरूदेव स्वयं आदेश न दें और उचित अनुचित का निर्णय न कर दें ।
अत: अंत में जब इन लीला का उद्देश्य पुरा हो गया , समर्पित शिष्य को अनिति के खिलाफ धनुष उठाने का व्यवहारिक शिक्षा मिल गया लवकुश के माध्यम से संसार में तो गुरू वाल्मीकि जी ने लवकुश को आदेश दिया कि घोड़ा छोड़ दो , यही राम तुम्हारे पिता है और तुम्हारी माता हीं सीता है ।
और भी एक महत्वपूर्ण बात :-
आपने कहीं देखा है पढ़ा है ? शास्त्रों में रामायण के रचनाकार महापुरूष , महान तत्वज्ञानी वाल्मीकि जी ने , तुलसीदास जी ने या श्री मद्भागवत के रचनाकार वेद व्यास जी ने या स्वयं भगवान श्री कृष्ण तथा राम ने, कहीं भी संसार को यह कहा है कि तुम मेरे पुत्र लवकुश को तथा प्रदुम्न या अनिरुद्ध कि पुजा करो । उनको अपना आराध्य मानों , उनसे शास्त्र ज्ञान हासिल करो ??????
या ये लोग मेरे इन लीलाओ़ का प्रचार करेंगे । तत्वज्ञान का प्रचार करेंगे ?
नहीं न ।
या आपने कहीं देखा है या सुना है इतिहास में कि हमारे पांचों मूल जगद्गुरुओं में से कोई भी अपने संतान को अपने फिलौसफी के प्रचार के लिए नियुक्त किया हो ?
नहीं कोई नहीं किया । न भगवान ने और न वास्तविक मूल जगतगुरूओं में से कोई भी नही ।
सभी जगद्गुरूओं ने तथा भगवान ने भी अपने फिलौसफी के प्रचार के लिए अन्य परिकर को हीं नियुक्त किया है अपने वंश या डिसेंडेंट को कभी नहीं । इसिलिए हर जगह भगवान राम सीता , श्री कृष्ण , राधा रानी तथा गुरू रूप कि हीं अराधना , पुजा तथा भक्ति के लिए भगवान के सभी अवतार तथा महापुरुषों ने मनुष्य को प्रेरित किया है अपने संतान को नहीं ।
यही कारण है कि आज लवकुश या प्रदुम्न या अनिरुद्ध कि कहीं पुजा और भक्ति नहीं कि जाती । मंदीर नहीं है ।
और भगवान तथा महापुरुषों के संतान ने भी कभी स्वयं आगे आ कर उनके सिद्धांतों का प्रचार प्रसार या अपना चरण पुजा नही करवाया कभी । क्योंकि इससे उनके पिता के यश पर प्रभाव पड़ता । यश तथा प्रतिष्ठा धुमील होता और जीवों का उद्धार नहीं होता । और साधारण संसारी यह समझता कि राम का , कृष्ण का या महापुरुष का पुत्र है इसलिए यह तो स्वभाविक है अपने पिता का गुण तो गायगा हीं । लोगों का श्रद्धा डगमगाता है , गलत परिपाटी विकसित होगी इससे ।
फिर संसार को तो यही शिक्षा मिलता की जब आप अपने पिता का गुण गाते हो तो हम क्यों न अपने शारिरिक पिता का हीं गुण गाए । और लोग हरे राम हरे कृष्ण की जगह हरे लव हरे कुश कहे, यह लव कुश कभी नहीं चाहते हैं क्योंकि वो भी असली महापुरूष है , विल्कूल निष्काम और निस्वार्थता का मिसाल ।
तो महापुरूषों के संतान को केवल वही करना चाहिए जो भगवान के पुत्रों ने किया । नहीं तो संसारिक लोग नहीं समझेंगे और गलत मैसैज जाएगा संसार में ।
सारा संसार भगवान और महापुरुषों के संतती है , कोई मानता है, कोई नहीं मनाता है, पर सभी जीव भगवान का, महापुरुषों का ही संतान है यह तत्वज्ञान है । और सब पर उनकी दृष्टि है , सबके कल्याण कि चिंता उनको रहता है । केवल अपने लीला के दरम्यान पुत्र के लिय नहीं । भगवान और महापुरूष हमेशा निष्पक्ष होते हैं । पुरा ब्रह्मांड और सभी जीव उनके अपने है ।
केवल परकिया भाव के लीला के निमित्त किसी जीव या महापुरुष को भगवान अपने अकारण करूण स्वाभाव से वो अपने पुत्र के रूप में लाते हैं संसार में । अगर वो संतान वास्तव में महापुरुष हैं तो वो भगवान और अपने पिता के इच्छा के विरुद्ध कोई व्यवहार नहीं करेगा कभी । और अगर नहीं है तो फिर .... भगवान को केवल अपना हीं संपत्ति समझेगा और पाप का भागीदार होगा ।
और एक अनन्य शिष्य का पहला धर्म है कि वो केवल अपने इष्ट और गुरू के आदेशों का हीं पालन करें उन्हीं के सिद्धांतों पर चले या जरूरत परे तो शंका समाधान के लिए उनके द्वारा अधिकृत या नियुक्त जीव के पास हीं जाए शंका समाधान के लिए । अन्य का कभी नहीं , चाहे वो भगवान या महापुरुषों के संतान या संबंधी या रिस्तेदार क्यों न हो ।
सम्मान तो हरेक का करना चाहिए पर शिष्य को केवल अपने इष्ट और गुरू के प्रति ही समर्पित तथा उत्तरदाई होना चाहिए, अन्य का परवाह कभी नहीं करना चाहिए । और अन्याय , अनिति , अधर्म के बारे में खुद को तथा संसारी को सचेत करना चाहिए जहां तक संभव हो ।
श्री राधे ।:- संजीव कुमार । रांची ।।