Saturday, 30 September 2023

मो सम कौन कुटिल खल कामी।जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी॥

हममें से जिनको जिनको ये अहंकार है कि हमसे बड़ा साधक या भक्त नही कोई , हमसे बढ़िया व्यक्ति कोई नहीं , उन्हें इस तत्वज्ञान को जरूर एक बार पढ़ना चाहिए:- 
बड़े बड़े महापुरूष, भगवद् प्राप्त संत स्वयं को पतित खल कामी मानते हैं । 
लेकिन हम साधारण मनुष्य जिसका ह्रदय गंदा है, अंत:करण गंदा है, बुद्धि भ्रमित है, स्वयं का अभी ठिकाना नहीं कि हम अगले जन्म में कुत्ता बिल्ली गद्हा घोड़ा बनेंगे या मनुष्य शरीर ही मिलेगा ! लेकिन घोर आश्चर्य कि बात की तमाम तत्वज्ञान सुनने, जानने और समझने के बाबजूद हम स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान, बुद्धिमान और सबसे ऊंचा तथा अच्छा मानते हैं, और दुसरे को छोटा समझते हैं , दुसरे को अधम , पतित नीच तथा गंदा समझते हैं, यही पहचान है कि हमारा अंत:करण कितना गन्दा है, कितना हमने कमाया है और कितना गंवाया है आज तक । फिर भला हमारे जैसे सोंच बाले जीव का कल्याण कैसे हो सकता है ? 
स्वयं को बड़ा समझना और वांकि संसार के लोगों को झूठा समझना , नीच समझना यह सिद्ध करता है कि हमारा मन कितना गन्दा है , अंतःकरण कितना गन्दा है ? यह सबसे बड़ा पहचान है स्वयं के नीच होने का । 

भगवद् प्राप्त महापुरुष तुलसीदास , मीरा , तुकाराम सुरदास आदि स्वयं को सबसे छोटा मानते हैं , अधम तथा पतित कहते हैं खूद को :- 

मो सम कौन कुटिल खल कामी।
जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी॥
भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी।
हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी॥
पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी।
सूर, पतित कों ठौर कहां है, सुनिए श्रीपति स्वामी॥ :- सुरदास

भक्ति कि महारानी, भक्ति महादेवी की प्रति मूर्ति सबरी कहती हैं राम से :- 
"अधम ते अधम अधम अति नारी। 
तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥" 
सबरी कहती हैं "हे राम, भला मुझसे अधिक अधम मतिमंद कौन है इस जग में " ? 

 दास भाव भक्ति में श्रेष्ठ श्री हनुमानजी ने विभीषण से कहा -
कहहु कवन मैं परम कुलीना।
कपि चंचल सबही विधि हीना।।

यानी, कहो विभिषण जी, मैं कौन सा परम कुलीन हूं, मैं तो बंदर हूं, चंचल हूं और सब प्रकार से हीन हूं !

अस मैं अधम सखा सुनूं, मोहूं पर रघुबीर।
कीन्हीं कृपा सुमिर गुन, भरे विलोचन नीर।।

हे सखा सुनो, मैं ऐसा अधम हूं फिर भी रघुबीर ने मुझपर कृपा की है। इस प्रकार भगवान राम के गुणों का वर्णन करके हनुमानजी की आंखें डबडबा जाती हैं।

अरे भक्तों में श्रेष्ठ , भगवान शंकर श्री राम से प्रार्थना करते हैं और स्वयं को दीन स्वीकार करते हुए कहते हैं :- 

गुण सील कृपा परमायतनं। प्रणमामि निरंतर श्रीरमनं॥
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं॥
जय राम रमा रमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनम॥
अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो॥ :- भगवान शंकर । 

भावार्थ:- 
हे राम आप गुण, शील और कृपा के पराकाष्ठा हैं। आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरंतर प्रणाम करता हूँ। हे रघुनन्दन! (आप जन्म-मरण, सुख-दुःख, राग-द्वेषादि) द्वंद्व समूहों का नाश कीजिए। हे जीवों का पालन करने वाले राजन, मुझ दीन जन की ओर भी दृष्टि डालिए॥10॥ :- भगवान शंकर ।

भक्तों में श्रेष्ठ श्री भरत कह रहे हैं :- 

मोहि समान को पाप निवासू। 
जेहि लगि सीय राम बनबासू॥
रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा।
 बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा॥2॥

भावार्थ:-भरत कह रहे हैं कि मेरे समान पापों का घर कौन होगा, जिसके कारण सीताजी और श्री रामजी का वनवास हुआ? राजा ने श्री रामजी को वन दिया और उनके बिछुड़ते ही स्वयं स्वर्ग को गमन किया॥2॥

फिर भरत जी कह रहे हैं :- 
मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। 
बैठ बात सब सुनउँ सचेतू॥
बिन रघुबीर बिलोकि अबासू। 
रहे प्रान सहि जग उपहासू॥3॥
भावार्थ:-और मैं दुष्ट, जो अनर्थों का कारण हूँ, होश-हवास में बैठा सब बातें सुन रहा हूँ। श्री रघुनाथजी से रहित घर को देखकर और जगत् का उपहास सहकर भी ये प्राण बने हुए हैं॥3॥

गौरांग महाप्रभु जी ने स्वयं को दीन हीन पतित कहा :- 
एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः॥२॥ - शिक्षाष्टकम्।

 गौरांग महाप्रभु कहते हैं कि हे प्रभु आपने अपनी कृपा के कारण हमें भगवन्नाम के द्वारा अत्यंत ही सरलता से भगवत-प्राप्ति कर लेने में समर्थ बना दिया है, किन्तु मैं इतना दुर्भाग्यशाली हूँ कि आपके नाम में अब भी मेरा अनुराग उत्पन्न नहीं हो पाया है ॥२॥

तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥३॥ :- शिक्षाष्टकम्

हमारे गुरूदेव श्री कृपालु महाप्रभु जी ने अपने पदों में अनेकों जगह स्वयं के लिए " कृपालुमतिमंद " जैसे शब्दों का प्रयोग किया है । 

कबीरदास जी ने कहा है :- 
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय ॥ 

लेकिन हम है कि हमें दुसरे में दोष हीं दोष नजर आता है । यही सबसे बड़ा अहंकार है । 
जिसका मन बुद्धि चित्त अहंकार जितना गंदा होता है उसको दुसरे में उतना ही दोष नजर आता है । वो स्वयं को सबसे अच्छा और दुसरे को बुरा समझता है , इससे बड़ी मुर्खता कुछ भी नहीं । 
ऐसा जीव कभी भगवद‌् मार्ग का अधिकारी नहीं हो सकता । चाहे कितना भी सिर पटक ले महापुरुषों के चरण में । 

भगवद् मार्ग पर चलने वाले पथिक के लिए सबसे पहली कक्षा का पहला Lession है कि स्वयं को भगवद् प्राप्ति के पहले तक सबसे बड़ा गुणहगार , सबविधि दोषी, सबसे छोटा , अधमों में सबसे बड़ा अधम , अति पतित , अति दीन तथा भिखाड़ी समझना और दुसरे हरेक को अपने से उच्च मानना, चाहे कोई घोर संसारी हीं क्यों न हो ।
 
दुसरा Lession है स्वयं के लिए सम्मान न चाहे और हर किसी को सम्मान दे , दुसरे को अपने से ऊंचा माने वही भगवद् प्रेम मार्ग में सफल हो सकता है ।
 जिसको यह अभिमान है कि हम बड़े अच्छे हैं और दुनियां के वांकि लोग हमारे सामने कुछ भी नहीं वो सबसे बड़ा गद्हा है । बला का मुर्ख है वो । 
हमे भगवद् प्राप्ति के पहले सेकंड तक स्वयं को सबसे बड़ा पतित मानना चाहिए। नहीं तो गए , पतन निश्चित है ।
लेकिन हम है कि उल्टा सोंचते है , हम दुनिया को झूठा , मक्कार और फरेबी मानते हैं और स्वयं को महापुरुषों का दादा मानते हैं । यह हमारे अहंकार का पहचान है । यह सिद्ध करता है कि हमें कोई तत्वज्ञान नहीं । हमने गुरू से कुछ सिखा ही नहीं । कुछ भी ग्रहण नहीं किया । 
:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन से ।

Wednesday, 20 September 2023

संसार में क्या मां बाप अपने संतान से निस्वार्थ प्रेम नही करता ?

एक बार कुछ सत्संगी ने श्री महाराज जी से प्रश्न किया - महाराज जी इस संसार में क्या मां बाप अपने संतान से निस्वार्थ प्रेम नही करता ? 
श्री महाराज जी द्वारा उत्तर :- आज के युग में ऐसा बहुत कम उदाहरण है । न के बराबर ।
मैंने कई बार आप लोगों को बतलाया है कि प्रेम का कोई कारण न हो , फिर भी प्रेम हो , केवल उसे निष्काम प्रेम कहते हैं ? 
जिस प्रेम का एक भी कारण हो उसे प्रेम नहीं कहते, इसे स्वार्थ युक्त अटैचमेंट कहते हैं , स्वार्थ आधारित प्रेम कहते हैं । 

सतयुग , त्रेता , द्वापर आदि में संसारी माता पिता का ऐसा अनेको उदाहरण मिलता है शास्त्रों में जिसने अपने संतानों को पाला पोसा बड़ा किया और बिना किसी हिचक के उसे भगवान के निमित्त, गुरू सेवा के निमित्त स्वेक्षा से दे दिया । फिर उससे कोई संबंध नहीं, कोई अटैचमेंट नहीं, कोई लगाव नहीं । लेकिन प्रेम वश दे दिया , इसका परम कल्याण होगा । संतान से निस्वार्थ प्रेम है , उसके कल्याण कि चाह है , इसलिए दे दिया । खूद का कल्याण करेगा तत्पश्चात संसार के अन्य जीवों का भी कल्याण करेगा , इसलिए दे दिया , निज हित , निज स्वार्थ की कामना नहीं है । 

लेकिन कलयुग में ऐसा उदाहरण नहीं है । आज कुछ उदाहरण है भी तो वो वेमनी से ऐसा किया है । 

शंकराचार्य जब आठ वर्ष के थे तो अपनी मां से कहा कि मैं भगवान के निमित्त घर छोड़ना चाहता हूं , मुझे आज्ञा दे दो , मां ने आज्ञा नहीं दी, क्योंकि माता को पुत्र से स्वार्थ युक्त प्रेम था , स्वार्थ ए कि यह मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा, विवाह करेगा , बच्चे पैदा करेगा , वंश वृद्धि करेगा आदि तमाम स्वार्थ जो आज आपलोगों को अपने संतान से है । 

जब बात नहीं बनी तो शंकराचार्य ने योगमाया के बल पर एक लीला किया , महापुरुष थे शंकराचार्य, महापुरुषों की लीला समझना कठिन है, तो शंकराचार्य ने मां के साथ नदी गए स्नान करने के लिए , उनके पैर को एक मगरमच्छ ने पकड़ लिया, अब उन्होंने काफी प्रयास किया उससे पैर को छुड़ाने की लेकिन मगरमच्छ उनको और भी गहरे पानी के तरफ खींचने लगा ( अरे यह सब तो लीला थी , भला किसकी हिम्मत है इस संसार में कि महापुरुष के बिना ईच्छा के उसे पकड़ ले और न छोड़ें ) , तमाम नाटक हुआ , शंकराचार्य ने अपनी मां आर्याम्बा ( शंकराचार्य कि मां का नाम है आर्याम्बा ) से कहा अगर मुझे संन्यासी बनने कि आज्ञा नहीं दोगी तो ए मगरमच्छ मुझे नहीं छोड़ेगा , मेरा जीवन लीला अभी समाप्त हो जाएगी । 
तब शंकराचार्य के मां आर्याम्बा को मजबूरी में आज्ञा देना परा । यहां भी शंकराचार्य कि मां ने एक शर्त रख दी , देखो तुमको मेरे अंत समय में मेरे पास आना पड़ेगा अंतिम संस्कार करना पड़ेगा । 
जब कोई वास्तविक सन्यासी बन जाता है तो तमाम संसारिक कर्म धर्म से मुक्त हो जाता है वो, तमाम संसारिक रिश्तो को त्याग कर कोई मनुष्य सन्यासी बनता है । लेकिन शंकराचार्य को अपने मां को बचन देना पड़ा, ठीक है ठीक है , मैं आऊंगा । 
तो आज इस कलयुग में तो एक भी माता पिता ऐसा नहीं जो स्वेक्षा से अपने सन्तान को हरि और गुरू के निम्मित कर दे । 
अगर कोई छोड़ता भी है तो वेमनी से। उसको तो खूश होना चाहिए कि उसकी संतान परम कल्याणकारी मार्ग पर जा रहा है, वो भगवान का संतान है , भगवान के निमित्त जा रहा है । 

अरे मनुष्य से ज्यादा निस्वार्थ प्रेम तो जानवरों को है अपने संतान से । इस मामले में जानवरों के माता पिता का स्थान मनुष्य से कहीं ऊंचा है । 
भगवान ने जानवरों को भी स्वाभाविक गुण दिया है , ममता का , दया आदि का । 
गाय भैंस बाघिन भालु बंदरिया , कुतिया बिल्ली आदि को आपलोग रोज देखते हैं । बच्चे को जन्म देते ही उसको चाट चाट कर गर्भ के मल को साफ करती है, सेवा करती है , उसकी रक्षा करती है , उसको दुध पिलाती है, पाल पोस कर योग्य बना देती है फिर उसे छोड़ देती है दुनियां में बिना किसी हिचक के , कोई अपेक्षा नहीं , कोई स्वार्थ नहीं , कोई अटैचमेंट नहीं । 
कोई कामना या कंप्लेन नहीं कि मैंने इसको जन्म दिया है, इसको अपना दुध पिलाया है , इसको पाला है , रक्षा कि है मैंने , अब ए बड़ा होकर मेरी रक्षा करें , मेरा ख्याल रखें , मेरी सेवा करें , अब यह मेरा स्वार्थ पुरा करें ! ऐसा कोई स्वार्थ जानवर माता पिता में नहीं है । इस दृष्टि से जानवर का अपने बच्चे से निस्वार्थ प्रेम कहा जाएगा । 

तो मनुष्य में तो ऐसा एक भी माता पिता नहीं मिलेगा संसार में जो निस्वार्थ प्रेम करें अपने संतान से और उसकी संतानें भी निस्वार्थ प्रेम करें अपने मां बाप से । 

मनुष्य में संसारिक प्रेम केवल स्वार्थ पर टीका होता है, संसार में जबतक एक दुसरे से स्वार्थ पुरा हो रहा है तथा भविष्य में भी पुरा होने कि संभावना है , उम्मीदें हैं , अपेक्षा है , आशा है तब तक प्रेम है , स्वार्थ खत्म प्रेम खत्म ।

 इस ब्रह्यांड में केवल महापुरूष और भगवान हीं जीव से निस्वार्थ प्रेम करता है और जीव से भी यही अपेक्षा करता है कि वो भी उनसे निस्वार्थ प्रेम करें । निष्काम प्रेम करें ।

भगवान ने बिना किसी स्वार्थ के बिना किसी भेद भाव के संसार के तमाम जीवों के लिए हवा , पानी , पृथ्वी , भोजन कि व्यवस्था कर दिया , जन्म लेने के लिए शरीर दिया, मां का गर्भ बनाया , उसके लिए मां के स्तन में दूध बना दिया समय पर इस प्रकार तमाम उपकार है हमारे उपर भगवान का, वो भी बिना किसी स्वार्थ के । 
उसी प्रकार एक शरणागत शिष्य के कल्याण के लिए बिना किसी स्वार्थ के गुरू क्या क्या भगीरथ प्रयास करता है वो तो भगवद् प्राप्ति के बाद हीं जीव को पता चलता है । 
आप क्या देते हैं गुरू को ? जो देते हैं वो सब मायिक वस्तूए है , उसकी कोई जरूरत नहीं, उपयोग नहीं किसी वास्तविक महापुरूष को , फिर भी वो आपसे इस हाथ लेकर उस हाथ से आपके हीं निम्मित खर्च कर देता है और आपके ही लाचार भाई बंन्धूओं के सेवा में लगा देता है ।
लेकिन महापुरूष आपको जो देता है उसका मुल्य तो कभी आप चुका हीं नहीं सकते । चाहे वो आप स्वर्ग सम्राट बन कर स्वर्ग का भी दान कर दो ! गुरू और भगवान के ऋण को कोई नहीं चुका सकता । 

श्री महाराज जी के एक प्रवचन श्रृंखला का सार, पुर्व सुने हुए मेमोरी के आधार पर । :- संजीव कुमार

ईश्वर इतना कठोर क्यों हैं ?

एक व्यक्ति का प्रश्न श्री महाराज जी से , महाराज जी ईश्वर इतना कठोर क्यों हैं ? 

श्री महाराज जी द्वारा उत्तर :- न न न यह सब ग़लत बातें हैं , भगवान कठोर नहीं होते हैं , उनसे बड़ा दयालु, उनसे बड़ा कृपालु तो कोई नहीं पुरे ब्रह्यांड में । भक्त के लिए तो भगवान का प्राण भी हाजिर है । जिसके आंखों में भगवान श्री कृष्ण के प्रति निष्काम प्रेम का आंसू हैं , जो स्वाभाविक रूप से नम्र है , विनम्र है , सहिष्णु है , जिसको अपने धन बल, शरीर बल, रूप बल , ज्ञान बल आदि का अहंकार नहीं , जो स्वयं को वास्तव में दीन मानता है और भगवान कि भक्ति करता है मन से , उसके लिए भगवान से बड़ा दयालु कृपालु तथा कोमल कोई नहीं , भक्त के लिए भगवान का ह्रदय तो एक क्षण में पिघल जाता है , भक्त के लिए वो अपनी भगवत्ता तक भूल जाते हैं , ऊखली में बंध जाते हैं , साटी से मार खाते हैं, घोड़ा तक बन गए ब्रज में , यह सब भगवान कि लीला आप लोग जानते हैं । भक्त के पीछे-पीछे डोलते हैं भगवान । 
निष्काम भक्त के प्रति वो स्वयं को ऋणि मानते हैं , भक्त के लिए वो अपने ही बनाए नियम कानून को त्याग देते हैं और भक्त कि रक्षा करते हैं , जो उसने मांगा भी नहीं वो भी उसे दे देते हैं मैटेरियल वस्तू भी और दिव्य सामान कुछ भी हो , भक्ति में इतनी शक्ति है , सब वो भक्त को देने के लिए आतुर रहते हैं , इसके लिए न वो भक्त का प्रारब्ध देखते हैं और न अगला पिछला कर्म धर्म । भक्त हमेशा सचेत होता है वो अपराध नहीं करता कभी।
जिसके आंखों में ईश्वर के प्रति निष्काम प्रेम का आंसू हैं भगवान उसके मुठ्ठी में है । 

हां भक्त को छोड़ कर वांकी जीवों के लिए भगवान कठोर हैं , जो घोर संसारी है , संसार में लिप्त है , अहंकार से युक्त है , स्वयं को देह मानता है , जिसको अपने ज्ञान , धन, वल , शरीर तथा सामर्थ्य का अहंकार है , उसके लिए भगवान न्यायी है , उसके लिए उनको कठोर बनना पड़ता है क्योंकि न्याय करना है उनको । 
भगवान को इस ब्रह्मांड के प्रत्येक जीवों ( मनुष्यों ) के मन में उठे प्रत्येक क्षण के प्रत्येक संकल्पों को नोट करने का कार्य करना पड़ता है तथा उन संकल्पों के अनुरूप किये गए कर्मों का फल देना पड़ता है , न्याय करना पड़ता है , इस काम को करने के लिए उनको कठोर बनना पड़ता है ,बिना कठोर बने न्याय नहीं हो सकता है , फल नहीं दिया जा सकता । 
संसार में एक मनुष्य ने दुसरे मनुष्य को मार दिया, तो जज को सजा सुनानी पड़ती है , अपराधी को कठोर सजा देनी पड़ती है , मृत्युदंड तक देना पड़ता है , यह काम इतना आसान नहीं होता , जज को न्याय करने के लिए , सजा सुनाने के लिए कठोर बनना पड़ता है । 
इसी प्रकार संसार में लिप्त घोर संसारी जीव को वक्त पर भगवान को भी दंड देना पड़ता है , उसके कर्मों के अनुसार फल देना होता है । 
अब जीव गलत कर्म करता है तो उसको दंड मिलता है , वो भाग भाग के मंदिरों में जाता है , तीर्थों में सिर पटकता है , लेकिन उसको फल के रूप में सजा भोगना पड़ता है, सबको भोगना पड़ता है , पुर्व जन्मो के किए कर्म तथा इस जन्म का उसका किया क्रियामान कर्म, पाप-पुण्य कर्म जब फलीभूत होता है तो वो माफ नहीं होता , चाहे कितना भी कोई संसारी मंदिर मस्जिद, गुरूद्वारा आदि जा कर सिर पटके, और सब करने पर भी जब उसे दंड मिलता है , फल भोगना पड़ता है तो वो समझता है कि भगवान कठोर हैं । 
अरे संसारिक कर्म धर्म के लिए हरेक देश में कायदा कानून हैं, कानून का उलंघन हुआ तो देश के कानून के हिसाब से सजा मिलती है ।
उसी प्रकार ब्रह्यांड के तमाम जीवों के लिए एक कानून हैं भगवान का, वहां से बचना मुश्किल है । नियम का उलंघन हुआ दंड मिलेगा, कोई नहीं बच सकता वहां से चाहे कोई कितना रोये गिड़गिड़ाए , गलत कर्म करते समय क्यों नहीं सोचा तुमने ? 
:- श्री महाराज जी के प्रवचन से ।

Monday, 18 September 2023

अपेक्षा , आसक्ति और वैराग्य

किसी व्यक्ति,वस्तु,या बिषय से आसक्ति ही उससे अपेक्षा को जन्म देती है, अपेक्षा पुरी होने पर उससे आसक्ति और भी बढ़ जाती है, आसक्ति और बढ़ने से अपेक्षाएं और भी बलबती होती है, और पुरी नहीं होने पर उस बिषय , व्यक्ति , वस्तु या सामान से दुख मिलता है, जब दुख मिलता है तो या तो क्रोध कि उत्पत्ति होती है या द्वेष बढ़ता है , और जब क्रोध या द्वेष से भी काम नहीं बनता तब अपेक्षाएं कम होती है , और जब बार बार अपेक्षाएं खंडित होती है तो उससे आसक्ति समाप्त हो जाती है, जीव उससे उदासीन हो जाता है ।

 इस प्रकार आसक्ति समाप्त होने पर उस बिषय , वस्तु , व्यक्ति तथा सामान से मोह समाप्त हो जाता है , इसी को वैराग्य कहते हैं या दुसरे शब्दों में संसार का छीन जाना कहते हैं । मोह पुरी तरह से समाप्त हो जाने पर ही वैराग्य कि उत्पत्ति होती है । अत: वैराग्य के लिए मन से उस बिषय , वस्तु , व्यक्ति तथा सामान से अपेक्षाओं का मिटना परमावश्यक है । 
भगवान और गुरू यही कार्य करते हैं । अपने शरणागत शिष्यों की आसक्ति को संसार से मिटाने के लिए अपेक्षित फल के विपरित फल देते हैं , यानि अनापेक्षित फल देते हैं, अर्थात उल्टा परिणाम देते हैं ताकि शरणागत शिष्य संसार से निराश होकर भगवान में मन लगाने का कार्य करें , यानि किसी भी बिषय वस्तु व्यक्ति तथा सामान से अपेक्षाएं समाप्त कर लें और केवल हरि और गुरू से मानसिक स्तर पर अटैच्ड हो जाए । 
संसार से सारी अपेक्षाएं मिटते ही वैराग्य उत्पन्न होता है और वैराग्य होते ही मन भगवान तथा गुरू में सेंट पर्सेंट लग जाता है , जीव को भगवद् दर्शन होता है , इसी को भगवद् प्राप्ति कहते है । 
जब तक मन के किसी एक भी कोने में किसी भी प्रकार के मायिक बिषय वस्तु व्यक्ति या सामान से सुख की अपेक्षाएं हैं, भगवद् प्राप्ति नहीं हो सकती । :- 
श्री महाराज जी का सिद्धांत पूज्यनीय रासेश्वरी देवी जी के शब्दों का सार ।

Saturday, 16 September 2023

अन्न और मन का सम्बन्ध

श्री महाराज जी कि दिव्य वाणी और निर्देश :- 
***********अन्न और मन का सम्बन्ध*************

चाहे जो भी हो ऋषि हो, मुनि हो, भक्त हो, नास्तिक हो, शरीर रखे हो, उसको देना पड़ेगा सब सामान। विटामिन ए. बी. सी. डी. सब। नहीं तो फिर बीमारी होगी और फिर बैठकर बीमारी का चिन्तन करोगे फिर भगवान् का चिन्तन नहीं होगा। वह जरूरी है। 'तनु बिनु भजन वेद नहिं बरना' शरीर के बिना भक्ति नहीं हो सकती। और वह शरीर के लिये सामान सही-सही होना चाहिये, यह भी शर्त है भगवान् की-

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
 युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ (गीता ६.१७)

वो कर्मयोगी हो, ज्ञानयोगी हो, भक्तियोगी हो तीनों के लिये ठीक-ठीक खाना, ठीक-ठीक व्यवहार, ठीक-ठीक सोना, ठीक-ठीक जागना। सबका नियम है। वैज्ञानिक भी और आध्यात्मिक भी। उसके अनुसार चलना होगा। अधिक सोये बीमारी हो जायेगी, कम सोये बीमारी हो जायेगी। अधिक खाया बीमारी हो जायेगी, कम खाया बीमारी हो जायेगी।

 नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्रतः। (गीता ६.१६)

 अधिक खा लेने वाला योगी नहीं हो सकता।
न चैकान्तमनश्रतः ।
और जो बिल्कुल न खाये, आ गया हठ योग में, मैं कुछ नहीं खाता। कितने दिन ?

वेद में कथा है कि मन खाने से बनता है। ये वेद में लिखा है। आप लोग जो खाना खाते हैं उससे मन बनता है। एक हिस्सा ऐसा होता है जिससे मन बनता है, एक हिस्सा ऐसा होता है जिससे रस बनता है फिर रस से रक्त बनता है, फिर रक्त से माँस बनता है। ऐसे ही धातुएँ बनती हैं सात, और एक हिस्सा लैट्रीन बन जाता है। ये तीन हिस्से होते हैं, आप लोग जो कुछ खाते हैं।

तो शिष्य ने पूछा कि गुरुजी यह तो ठीक है रक्त वगैरह बनता है। और यह भी ठीक है कि हाँ पाखाना बनता है। लेकिन मन बनता है यह बात मैं कैसे मान लूँ? क्योंकि खाना तो मोटी चीज है। गेहूँ है, चावल है यही सब तो खायेगा, फल खायेगा तरकारी खायेगा। ये मोटी चीजें है भौतिक, और मन तो होता है सूक्ष्म। तो मन का क्या सम्बन्ध है खाने से ? तो गुरुजी ने कहा- हाँ ठीक है फिर बतायेंगे। और दूसरे दिन गुरुजी ने कहा देखो आज से तुम्हारा खाना बन्द अब गुरुजी की आज्ञा हो गई। अब देखो कितने दिन को बन्द करते हैं। दया आ जायेगी गुरुजी को शाम को ही कहेंगे अच्छा खा ले, खा ले। दो दिन, चार दिन, छः दिन, दस दिन, बारह दिन, पन्द्रह दिन, सोलह दिन हो गये, और वो बेचारे को चक्कर आने लगा तो उन्होंने कहा इधर आओ। बताओ तो तैत्तिरीयोपनिषद् के अमुक अनुवाक् का अमुक मंत्र क्या है? उसने कहा गुरुजी !... उससे बोला ही नहीं जा रहा था बेचारे से सोचने की शक्ति भी चली गई सोलह दिन में, मेमोरी, जिससे याद करता है आदमी। तो उन्होंने कहा लाओ खिला दो संतरा-वंतरा का रस दो भाई और दो दिन बाद कहा इधर आना अब बताओ तैत्तिरीयोपनिषद् के उस अध्याय के उसका मंत्र बता दिया। तो उन्होंने कहा बताओ खाने का सम्बन्ध मन से है कि नहीं? हाँ गुरु जी ।

तो शरीर को ठीक-ठीक रखने के लिये भी सामान देना होगा। :- श्री महाराज जी ( भगवद् गीता , भाग -6)

Friday, 15 September 2023

भोजन और भजन

श्री महाराज जी के श्री मुख से -
***********भोजन और भजन *************
नारद भक्ति दर्शन में नारद जी ने एक सूत्र बनाया-
 निरोधस्तु लोक वेद व्यापारन्यासः।

निरोध किसे कहते हैं? 'लोक वेद व्यापारन्यासः' लौकिक वैदिक दोनों प्रकार के कर्मों का न्यास। न्यास क्या है ? तो न्यास कहते हैं 'भगवति समर्पणं न्यासः ।' न्यास शब्द का एक अर्थ तो आप लोग जानते ही होंगे - त्याग, संन्यास। सम् उपसर्ग है और न्यास शब्द है। संन्यासी लोग घर-वर सब छोड़ देते हैं। तो न्यास माने त्याग - लौकिक-वैदिक कर्मों का त्याग कर देना। ये है निरोध। लौकिक-वैदिक कर्म का त्याग हो जाय, उसकी कामना ही गई।

 लौकिक कर्म भी, वैदिक भी। लौकिक कर्म से संसार के विषयों की कामना हम करते हैं और वैदिक से स्वर्गादि लोकों की कामना करते हैं। यज्ञ करो, स्वर्ग मिलेगा। ये करो तो स्वर्ग मिलेगा। तो लौकिक भी, वैदिक भी, दोनों कर्मों का त्याग हो जाय ।

लेकिन, कुछ तो कर्म करने पड़ेंगे। कौन-सा ऐसा भक्त और ज्ञानी है जो कर्म रहित हो जायेगा ? साँस लेगा? हाँ। देखेगा ? हाँ। चलेगा-फिरेगा ? हाँ-हाँ, हाथ-पैर होगा तो चलेगा-फिरेगा। कुछ खायेगा-पीयेगा ? अरे साहब! खाता तो परमहंस भी है। 'पश्वादिभिश्चाविशेषात्।' ब्रह्मसूत्र बनाया गया है वो। तो जैसे पशु वगैरह के लिए खाना आवश्यक है ऐसे ही परमहंस के लिए भी खाना आवश्यक है, शरीर जब तक रखेगा तब तक उसको शरीर सम्बन्धी सामान देना होगा। सब विटामिन प्रोटीन । अगर कहीं गड़बड़ किया तो नेचर दण्ड देगा फिर हरे राम की जगह हरे सिर, हरे पैर, हरे पेट बोलेगा। अरे, कष्ट होगा शरीर में तो फिर उसका चिन्तन करेगा। अरे दो दिन, चार दिन, दस दिन, बीस दिन धींगा-मुश्ती चल जायेगी, हमेशा थोड़े चलेगी।

एक बार गौतम बुद्ध निराहार होकर के ध्यान कर रहे थे, निराहार। कई दिन हो गये तो चक्कर आने लगे। तो कुछ गाँव की स्त्रियाँ गाती हुई जा रही थीं- गाना। उस गाने का आशय ये था कि तानपूरे के तारों को कस कर बजाओ। आप लोगों ने देखा होगा, तानपूरा। उसको कसने को खूँटियाँ लगी होती हैं। गवैये लोग काफी देर तक कस के पहले उसका स्वर- वर मिलाते हैं। अगर वो ढीला रहेगा और आप उँगली चलायेंगे तो आवाज ही नहीं आयेगी। तो तार को कसो लेकिन इतना न कसो कि तार टूट जायें- ये गाना था। तो महात्मा बुद्ध के कान में वो शब्द पड़े तो उन्होंने कहा- ये बेपढ़ी-लिखी गँवार स्त्रियाँ भी कितनी बढ़िया बात कह रही हैं कि बिना कसे ना बजाओ लेकिन इतना न कसो कि तार ही टूट जाय यानी -

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । 
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ (गीता ६.१६)

इसी बात को गीता में भगवान् ने अर्जुन से कहा कि अनाप शनाप खाने से भी साधना नहीं होगी और खाना एकदम छोड़ दोगे, इससे भी साधना नहीं होगी

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
 युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ (गीता ६.१७)

आगे नारद जी भी एक सूत्र लिखे हुए हैं इसी के लिए,
बाकायदा-

लोकोऽपि तावदेव किन्तु भोजनादिव्यापारस्त्वाशरीरधारणावधि । (नारद भ. सू. १४)

तो निरोध ये कि लोक-वेद दोनों प्रकार के फल देने वाले जो भी कर्म हैं, उनको हम त्याग दें, लेकिन कुछ कर्म ऐसे हैं शारीरिक कर्म जिसे कहते हैं वो करने पड़ेंगे। सबको करने पड़ेंगे -

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । (गीता १८.११)

सारे कर्मों का त्याग कोई देहधारी नहीं कर सकता। तो जितने कर्म कम से कम आवश्यक हैं, उतने कर्म आप कीजिये लेकिन थोड़ा-सा उसमें करेक्शन कर दीजिये। ये कर्म जो आप कर रहे हैं ये भगवान् को अर्पण करके प्रसाद रूप में स्वीकार कीजिये ।

चलो, सबसे जो बेकार का कर्म है, उसकी बात करते हैं। नींद आ रही है, सोना चाहिये। सोना चाहिये ? ये सोना एक कर्म है, नींद लेना एक कर्म है। अब हम सोने चले, अपने सुख के लिये ? नहीं। होशियार हो जाओ यहीं पर, अपने सुख के लिये नहीं। नींद आयेगी तो सपना होगा तो श्यामसुन्दर मिलेंगे, उनकी लीलाएँ देखेंगे। हे श्रीकृष्ण ! आज ऐसी कृपा करना, नींद में तुम खूब हमको दिखाई पड़ो। ये सोच के सो जाओ। ये आपका सोना भी हो गया स्पिरिचुअल अथवा ये सोच लो- जल्दी सो जायें ताकि सबेरे ब्राह्म मुहूर्त में उठकर श्रीकृष्ण भक्ति करें और अगर सोयेंगे नहीं तो फिर शरीर ठीक नहीं रहेगा तो फिर श्रीकृष्ण सेवा वाली बात हमारी बिगड़ जायेगी। चलो, ऐसा सोच लो, यानी अपने प्रत्येक कार्य भगवान् को अर्पित करो फिर प्रसाद लो। उद्धव सरीखे ज्ञानी परमहंस ने कहा श्रीकृष्ण से

त्वयोपभुक्तस्रग्गंधवासोऽलंकारचर्चिताः ।
उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेमहि ॥ (भागवत ११.६.४६)

आपका उच्छिष्ट सब सामान मालायें, वस्त्र, आभूषण, इत्र, सबका सेवन करेंगे। आपको चढ़ाकर, देकर, समर्पित करके प्रसाद रूप में उसको ग्रहण करेंगे तो वो हानिकर तो होगा ही नहीं अपितु इतना लाभकर हो जाएगा कि 'तव मायां जयेमहि।' चैलेंज कर रहे हैं उद्धव परमहंस, आपकी माया जो आपकी पॉवर के बल पर अकड़ा करती है । -
शिव चतुरानन देखि डेराहीं

उस पर विजय प्राप्त कर लेंगे हम महाराज ! केवल प्रसाद सेवन से, यानी समर्पित किया और फिर सेवन किया। हर क्रिया में। खुजली हो रही है, अब खुजलाने चले। ध्यान रखो, अपने सुख के लिये न खुजलाओ। खुजा रहे हैं। हँ ऽ वो खड़े हैं, उनको हँसी आ रही है, हँसो हम खूब खुजा
लेंगे और हँसो। किसी न किसी बहाने से हम उनको सामने खड़ा रखें। कोई भी क्षण हमारे लिए कोई कर्म का ऐसा न हो कि उनको माइनस करके हम कर्म कर अकेले कर्म किया कि बँध गये, मरे। हर कर्म में। हैं। बस,

इस सूत्र का एक अर्थ और भी कुछ महात्माओं ने किया है। वो कहते हैं - लौकिक कर्म भी करो, वैदिक कर्म भी करो लेकिन वो जो यहाँ न्यासः कहा गया है, तो वो कहते हैं भगवान् को समर्पित कर दो। जैसे- हम रागानुगा भक्ति के अनुसार आपको बता रहे हैं कि जितने में काम चल जाय ऐसे शारीरिक कर्म करो लेकिन उसको भी समर्पित करके प्रसाद रूप में। और वे लोग जो इस सूत्र का अर्थ करते हैं, कर्मयोगी लोग, वो कहते हैं कि वेद के अनुसार और लोक के अनुसार कायदे-कानून से सब कर्म करो लेकिन भगवान् को अर्पित करके करो। उनको अर्पित करो यानी हर कर्म के समय उनका स्मरण हो। अपने में कर्तृत्व की बुद्धि न आने पाये। मैं कर्ता हूँ, ऐसी फीलिंग न हो।
 :- श्री महाराज जी ( भगवद् गीता भाग -6)

Thursday, 14 September 2023

सनातन वैदिक धर्म के विरोधी लोगों या अपराधियों को समाप्त करने भगवान स्वयं क्यों नहीं आते ? इनका विनाश वो कैसे और कब करते हैं ?

कुछ ऐसे नास्तिक मनुष्य जिनको सनातन वैदिक धर्म, सनातन भगवान में, उनके संतो में श्रद्धा का आभाव है , संशय है , वो अक्सर पुछते है कि भगवान गलत कर्म करने वाले लोगों के मुखिया को , सरदार को, लीडर को , यानि जो नास्तिकों का मुखिया होता है , जो खुद तो गलत करता है और दुसरे को भी गलत करने के लिए प्रेरित करता है उसका विनाश क्यों नहीं करते अगर है तो ?
क्यों छोटे छोटे अपराध करने वाले का सबसे पहले सफाया हो जाता है पर गलती के सरदार को , नंबरी गुंडा का सफाया सबसे अंत में होता है ? 
इसका मतलब भगवान अन्यायी है ! ऐसे प्रश्न होते हैं कुछ लोगों का । 

तो सबसे पहले मैं उनको यह कहना चाहुंगा कि शास्त्र कहता है -

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।4.40।। (भागवत )

यानि अज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त मनुष्य नष्ट हो जाता है,  उनमें भी संशयी जीव के लिये न यह लोक है,  न परलोक और न दोनों लोकों का सुख अत: उनका नाश निश्चित है वो भी बुरी तरह से ।। 

 भगवान के बहुत से लीला आदि साधारण लोगों के समझ से परे होता है । 

मैं तो केवल बस उस ओर उनकी दृष्टि ले जाने चाहता हुं कि इसका क्या मूल कारण है , आप खुद ही जान जाएंगे ।

तो सुनिय ,  यही प्रश्न एक बार भईया बलभद्र श्री कृष्ण से पुछ बैठे थे , कि तुम हर बार युद्ध में  जरासंध का साथ देने वाले सभी राजाओं को तथा उसकी सेना का सफाया कर देते हो, पर जरासंघ को छोड़ देते हो ऐसा क्यों ? सभी दुष्टों के इस सरदार को क्यों छोड़ देते हो तुम  । यह बार बार फिर हमसे युद्ध करने आ जाता है दुसरे दुष्ट राजाओं को साथ लेकर , दुसरे के साथ गठबंधन करके , उससे दोस्ती करके ?
हमें हर बार इससे युद्ध करना पड़ता है , आज सत्रहवां बार तुम उसको छोड़ दिये हो , और जब इसका बद्ध करने की बारी आती है , रण छोड़ कर तुम भाग जाते हो ? 

भगवान श्री कृष्ण ने ज़बाब दिया  भईया । अगर इसको सबसे पहले मार दुंगा तो फिर वांकी  छोटे छोटे राक्षसों का , दुष्ट मनुष्यों का , पापियों का विनाश नहीं हो पायेगा । 

इसको इसलिए छोड़ देता हुं ताकि यह अधिक से अधिक संशयात्मा को इकट्ठा करके, छोटे छोटे अपराधियों को , दुष्टों के जमात को इकट्ठा कर , भगवद् विश्वास रहित जीव , सनातन धर्म विरोधी जीवों को इकट्ठा करें और सबसे पहले उसका विनाश हो सके  । 

संशयात्मा एक ऐसा बीज है जो कई गुणा अधिक गलत लोगों के समुह को खड़ा कर देता है समाज में , जो भोले भाले श्रद्धावान लोगों को सताता है , समाज में व्यभिचार का वाहक होता है । 
ऐसा जीव जो खुद पर और ईश्वर पर भरोसा ना करें और  दुसरे गलत लोगों के बहकावे में आ जाए , उसके पास भगवान के प्रति ना श्रद्धा हो और ना विश्वास हो , जो दुष्कर्म करने वाले अन्याय , अत्याचारी के बहकावे में झट से आ जाए उनका मानव जीवन व्यर्थ है  । अत: उसका मानव शरीर भी व्यर्थ है , इसलिए उससे सबसे पहले ऐसे जीवों का  मानव शरीर में छीन लेता हुं किसी अन्य को माध्यम बना कर और सबसे अंत में उस दुष्ट सरदारों का सफाया करवाता हुं यह मेरी रणनिति है  । 
भइया अगर मैं सबसे पहले रावण , कुंभकर्ण , कंस आदि को मार देता तो छोटे छोटे राक्षसों का विनाश कैसे हो पाता , वो तो बच जाते , छुप जाते  । पृथ्वी का भार इन दुष्टों से कैसे कम होता भला ?
इसलिए मै जरासंध को सत्रह बार छोड़ दिया ।अगली बार भीम भईया से इसको समाप्त करवा दुंगा । अगर स्वयं मारूंगा तो मुझे इनको अपना लोक देना पड़ेगा । इसलिए इनको मारने के लिए मैं स्वयं नहीं आता । इनको मारने के लिए मैं अन्य माध्यमों का इस्तेमाल करता हूं । 

तो इससे हमें शिक्षा मिलती है कि कोई अगर किसी को भगवान के खिलाफ करता है, असली महापुरूषों से,  संतों के खिलाफ भड़कता है , उनसे दुर करने का कुकृत्य करता है तो भड़काने वाले को सबसे अंत में भगवान सजा देते हैं और  भड़कने वाले जीव का सफाया सबसे पहले होता है । 
:- संजीव कुमार , रांची । 🙏❤️🙏

आज के युग मे हमसब कैसे हैं किस तरह का हमारी समझदारी है , कैसी हमारी सोंच है ! एक काम कि कहानी ।

बहुत ही काम की कहानी - आज के युग मे हमसब कैसे हैं किस तरह का हमारी समझदारी है , कैसी हमारी सोंच है ! किसी चीज , व्यक्ति , घटना , उसके बात को समझने का अंदाज क्या है! यह किसी एक महापुरुष व्यक्ति ने भगवान शंकर और माता पार्वती जी को पात्र बना कर हमें समझाने की कोशिशें कि हैं । पर है यह बहुत उपयोगी । समझने कि जरुरत है कि हम सब याथार्थ में कैसे हैं और दुसरे के बिषय में साधारणत: हमारी क्या राय होती हैं ?

कथा इस प्रकार है - एक बार इस कलयुग में भगवान शंकर जी और माता पार्वती भेष बदल कर संसार में भ्रमण पर निकले , उनके साथ उनका भक्त नंदी भी एक साधारण वैल के रुप में साथ साथ चल रहे थे । भगवान शंकर और माता पार्वती आगे आगे और नंदी एक साधारण वैल के रुप में पीछे पीछे एक गांव से गुजर रहे थे, इतने में कुछ लोग उसी रास्ते से आ रहे थे । लोगों ने देखा की एक प्रौढ पुरुष और स्त्री पैदल चल रहा है और साथ में हट्टाकठ्ठा वैल पीछे पीछे है। यह देख कर एक आदमी ने कौमेंट करते हूए कहा कि " देखो तो कैसा पागल है साथ मे वाहन है , ये पागल व्यक्ति लगता है कि बहुत दुर से आ रहा है फिर भी अपनी फुल सी कोमल पत्नी को भी पैदल ही चला रहा है, ये नही की अपनी पत्नी को वाहन पर हीं वैठा ले और फिर रास्ता तय करें । जबकी वाहन साथ में है"
 यह कहकर वो आगे बढ़ गया , अब भगवान् शंकर जी ने पार्वती जी को कहा की
 " सब सुना न आपने ! अब आप कृप्या वैल पर बैठ जाये ताकी लोग बातें नही बनावें " 
पार्वती जी फिर वैल पर बैठ गई और आगे बढ़ने लगे सभी । इतने फिर आगे एक और आदमी का झुंड आया । उसमे से एक व्यक्ति ने खिल्ली उडाते हुये कहा की ये महारानी जी लगती तो हैं पतिव्रता पर देखो तो कितने ठाठ से खुद वैल पर वैठी है और पति महोदय वेचारे पैदल रास्ता नाप रहें है । कैसा जमाना आ गया आजकल तो धर्म वर्म कुछ रहा ही नही, छी छी छी ।"

यह सुनकर पार्वती जी तत्क्षण नीचे उतर गई और जिद् करके भगवान् शंकर को वैल पर वैठा कर खुद पैदल चलने लगीं । 
 
आगे एक और आदमी का झुंड आया तो उसमें से एक ने कहा की "कमाल है खुद वाहन पर वैठा है , ये नही की पत्नी को भी वैठा लें , वैल तो हट्टाकठ्ठा है अगर दोनो वाहन पर वैठ कर रास्ता तय करे तो क्या हर्ज है भला ! हमारे पास वाहन हो और हम कष्ट करे ये कितना हास्यस्पद् है भला ।" 

अब यह सुन कर दोनो वैल पर बैठ गये और चलने लगे तो आगे फिर तीसरे आदमी का झुंड आया , उसमें से सब देखा फिर कहने लगा की " राम राम राम क्या जुल्म है कितना कसाई है दोनो देखो तो , दोनो बेचारे वैल पर बैठा है। एक बेजुवान जानवर पर जुल्म कर रहा है छि छि छि , क्या घोर कलयुग हैं ।"

भगवान ने कहा चलो अब वापस आज के कलयुग का प्रभाव है । किसी में गुजारा नही हैं ।हर चीज को , घटना को , व्यक्ति को , उसके बात को गलत समझने की आदत है लोगों की , सोंच है लोगों की , चाहे वह व्यक्ति माहान से महान गुरु का संग ही क्यों नही करता दिखे पर फिर भी उसके बिचार मे, सोंच मे, समझने के तरीके में , समझदारी मे, किसी दुसरे को देखने के दृष्टिकोण मे, किसी मे दोष देखने में कोई अंतर नही आया है । 
पार्वती जी ने भगवान से पुछा की "हे प्रभु इस कलयुग में ऐसा क्यों है ? क्यों संतो का महापुरुषों का प्रभाव नही पर रहा हैं लोगों पर या क्यों किसी की अच्छी बाते भी बुरी लगती है, ऐसा क्यों ? 
तो भगवान ने कहा की आज कलयुग में ज्यादातर लोग पुरइन के पत्ते पर जल रुपी शिष्य की तरह है । रहता तो है गुरु के साथ , गाता भी है गुरु ज्ञान और महीमा भगवान का और गुरु का परंतु वास्तव मे गुरु तो क्या आध्यत्म से कोसों दुर है । इनको नही समझाया जा सकता कभी । कभी नही । कमल के पत्ते पर पड़ा जल के बुंद के सामान ही रहेगा और दुसरे को गलत दृष्टि से देखता रहेगा आध्यात्मिक जीवन मे भी । संसारी बिषय की बात तो संसारी ही हैं । आज किसी मे, गुजारा नही है । लोग हमेशा किसी को गलत ही समझेगें तबतक जब तक वो खुद को नही बदले गुरु ज्ञान के बाद भी । 

हमे दुसरे को दोष युक्त बुद्धि से देखने की आदत छोड़नी चाहिये , खुद में दोष देखना चाहिये । ये महाराज जी ने तो सबसे पहले समझाया है फिर भी हमारी आदत नही बदलती । क्योंकि गुरु में श्रद्धा और विस्वास लेस मात्र भी नही । इनके तर्क , कुतर्क , वितर्क से बड़े बड़े जगद्गुरु भी हार जाते हैं ! हम आप किस खेत की मूली हैं ? 
हरि बोल हरि बोल ।

हमारा अस्तित्व ही भगवान के अस्तित्व को सिद्ध करता है ।

हमारा अस्तित्व ही भगवान के अस्तित्व को सिद्ध करता है । हम तमाम जीव जिस शक्ति से सांसें लेते हैं, जिस उर्जा से हमारा ह्रदय स्पंदन करता है तथा हमारे शरीर में प्राण वायू का संचार होता है , हम जिस शक्ति से चेतनमान है, जिस शक्ति से इस ब्रह्मांड का अस्तित्व कायम है वहीं शक्ति तो भगवान का प्रमाण है। भगवान कण कण में व्याप्त है , वो निराकार भी है और सगुण साकार भी है , निराकार भगवान के सगुण साकार होने के गुणों के कारण हीं हम तथा हमारा ब्रह्यांड आकार धारण किए हुए है, तथा गतिशील है । हमारा निराकार आत्मा ब्रह्म श्री कृष्ण के बल से ही हमारे शरीर के रूप में सगुण साकार स्वरूप धारण करता है । अत: यह सिद्ध हुआ कि हमारा अस्तित्व एक मात्र भगवान के अस्तित्व पर निर्भर है , वो समस्त कारणों का एक मात्र आदि कारण है।
"सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता " :- दे.भागवत्
 श्री राधे । :- श्री महाराज जी द्वारा दिए गए तत्वज्ञान के आधार पर ।

Tuesday, 12 September 2023

( संसार मिलना कृपा नही)" भगवान से कभी संसार कभी नहीं मांगना चाहिए , क्योकि संसार मिलना कृपा नही है‌ ।

Pujyaniya maa Raseshwari devi ji -
( संसार मिलना कृपा नही)
" भगवान से कभी संसार कभी नहीं मांगना चाहिए , क्योकि संसार मिलना कृपा नही है‌ ।
 बल्कि भगवान तो खुद भागवत मे कहते है की मै जिसपर कृपा करता हूं उसका संसार धीरे धीरे छीन लेता हूं-
"यस्याहं अनुगृहामि हरिष्ये तद्धनं शनै:
-
यानि संसार छीन जाए तो ये भगवान की कृपा है।

 और लोग संसार छीन जाने पर भगवान को दोष देते है और संसार मिलने पर भगवान कि कृपा समझते है ।

 मनुष्य को संसार मिलता है तो मनुष्य का संसार मे आकर्षण हो जाता है और फिर मनुष्य भगवान को भुल जाता है -- जैसे सुग्रीव को जब राज्य मिला तो सुग्रीव भगवान राम को भुल गया था--
 धन का नशा,प्रभुता का नशा,सौंदर्य का नशा-- यानि जितना संसार मिलेगा उतना ही संसार मे मनुष्य फंसता जाएगा-- 

" नहि कोऊ अस जनमा जग माहीं ,प्रभुता पाई जाहि मद नाही"

 किंतु भगवान अपने भक्तो के कल्याण के लिए भक्तो का संसार छीन लेते है 
ताकि भक्तो का मन पुरी तरह बस भगवान मे लगा रहे--जब नारद जी पुर्वजन्म मे दासी के पुत्र थे तो जब उनकी माता ने शरीर त्यागा था तो नारद जी ने इसे भगवान की कृपा ही समझा था ।भगवान भक्तो पर अनुग्रह करने के लिए भक्तो का संसार छीन लेते है ताकि भक्तो का मन संसार मे ना उलझ पाए ।

जैसे सर्दियो मे अगर बच्चा कहीं से आईसक्रीम ले आऐ तो मां उस बच्चे के कल्याण के लिए वो आईसक्रीम छीन लेती है उसी प्रकार भगवान भी भक्तो के कल्याण के लिए संसार छीन लेते है ।

वैसे एक जिज्ञासा यहां उठती है की ध्रुव को भी तो राज्य मिला था तो क्या ये कृपा नही है ।
 देखिये सबसे बडी बात भगवान के स्मरण करने की है। ध्रुव तो बचपन मे ही मायातीत होकर भगवान को प्राप्त कर चुके थे । अगर प्रारब्ध अनुसार संसार मिलने पर भी भक्त का मन भजन मे ही पुर्ण रुप से लगा रहे तो ये कृपा है लेकिन अगर संसार मिलने पर मन संसार मे फंस जाए तो ये कृपा नही है ।

तभी तो गीता मे भगवान ने कहा की जो शुभ वस्तुओ यानि जो संसार पाकर हर्षित नही होता ओर संसार छीन जाने पर दुखी नही होता वही सच्चा भक्त है ।

यानि हर स्थिति मे पुर्ण रुपेण श्री कृष्ण मे ही मन लगाकर रखना है-- वैसे तो भगवान के अनुग्रह करने के बहुत लक्षण है लेकिन कुछ लक्षण भगवान ने बताए है की--

" देशत्यागो महानव्याधि: विरोधो बन्धुभि: सह
धनहानि अपमानं च मदनुग्रहलक्षणम्" 

भगवान कहते है की व्यक्ति को घर अथवा देश त्यागना पडे,,महान व्याधियां आ जाए,,घर परिवार के लोग अगर विरोध करने लग जाएं,धन की हानि हो जाए,,अपमान होने लगे तो ये सब मेरी कृपा ही समझना ।
यानि सब बातो का सार ये है की संसार छीन जाए तो ये कृपा है ।

और संसार मिलने पर भी भगवान मे मन का पुर्ण समर्पण रहे तो ये भी कृपा है । लेकिन जब सुग्रीव जैसे महापुरुष संसार मिलने पर भगवान को भुल गये थे तो हम तो सामान्य प्राणी है। 
इसलिए भगवान से प्रार्थना करनी चाहिये की हे प्रभु ,,हम बस निष्काम भाव से आपकी शरण मे बने रहें ।

 निष्काम भाव से हम आपका भजन करते रहें क्योकि भजन मे ही वास्तविक सुख है- प्रहलाद जी से जब भगवान ने वर मांगने को कहा तो प्रहलाद जी ने कहा की हे प्रभु अगर आप मुझे वर देना हीं चाहते हो तो केवल ये वर दे दीजिये की मै कभी भी आपसे कुछ ना मांगू ।यानि हमेशा निष्काम बना रहूं क्योकि भगवान को भी निष्काम भक्त बहुत प्रिय है। 
 खुद गीता मे भगवान कहते है की -

" यो न ह्रष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति,,शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान: स मे प्रिय:

 "अर्थात् जो शुभ वस्तुओ के प्राप्त होने पर उनमे मन नही लगाता और जो द्वेष नही करता,जो शोक नही करता और जो मुझसे कुछ नही चाहता वही भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है । ईसलिए निष्काम भाव से भजन करते रहना चाहिये । हम भगवान के है ओर केवल भगवान हमारे है । :- पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी द्वारा श्री महराज जी के तत्वज्ञान की विवेचना । 🙏❤️🙏

संसार की कामना करने वाला पूर्ण नास्तिक है | वन परसेन्ट नहीं , पूर्ण नास्तिक है वह कभी आस्तिक नही हो सकता |

संसार की कामना करने वाला पूर्ण नास्तिक है | वन परसेन्ट नहीं , पूर्ण नास्तिक है वह कभी आस्तिक नही हो सकता | 
जब तक संसार की कामना अपने मस्तिष्क में रखकर और मन्दिरों में जायेगा , संन्तो के पास जायेगा , भगवान् से कामना करके , याचना करके , मानता करके , नाटक करेगा ये सब , तब तक वो आस्तिक नही हो सकता |
आस्तिक की पहली परिभाषा है कि भगवान् में आनन्द है , संसार में नहीं है | ये बात मान ले | और ये बात मान लिया तो संसार की कामना कभी नहीं करेगा |
नम्बर दो , अरे भई तुम ये जानते हो कि भगवान् सर्वज्ञ है | हाँ , हाँ गधा भी जानता है ये कौन नही जानता | 
तो क्यों जी संसार में कोई किसी से कुछ माँगता है इसलिये कि वह जिसे माँगना है वह सर्वज्ञ नही है |
इसलिये उससे लोग माँगते हैं | अरे भई हमको दे देना
दरी, हमको दे देना टोपी , हमको दे देना रुपया , हमको दे देना अमुक चीज | 
जब भगवान् सर्वज्ञ हैं फिर माँगते क्यों हो ?
इसका मतलब हैं तुम भगवान को ये समझते हो कि उनको पता नहीं है मैं जो माँगना चाहता हूँ | मैं बता दूँ उनको | 
नम्बर तीन , ये बताओ जब तुमको ये पता नहीं है कि कौन चीज अच्छी है कौन बुरी है तो फिर तुम माँगने क्यों चले ?
भगवान् के यहाँ क्या - क्या सामान है उनकी दुकान में पता है?
अजी भगवान् को हम जानते ही नहीं हैं उनकी दुकान में क्या - क्या है, क्या पता है ? तो फिर तुम क्या मांगोगे छोटा सा बच्चा क्या मांगता है ?
खिलौना टॉफी | बस उसकी दुनिया उतनी बड़ी है|
तुम जिस मल मूत्र के पिटारे में पले हो और जिस विषय विष्ठा में तुम मर रहे हो अनादिकाल से वही माँगोगे | 
  तो हम लोग अगर अपनी बुद्धि लगाकर माँगेंगे तो क्या माँगेगे ?
जहां हमारा अटैचमेंट है वही मांग लेंगें | उससे अधिक हम कुछ जानते ही नहीं |
क्योंकि अगर जानते तो फिर संसार में अटैचमेंट ही क्यों होता , बड़ी सीधी सी बात है |

नम्बर चार, एक बात सोंचो कि प्रारब्ध सबको भोगना पड़ेगा | जी हाँ | ज्ञानी को भी ? जी हाँ |
बड़े से बड़े तुम बुद्धिमान हो , लेकिन अगर तुमको अरबपति होना नही लिखा है , तुम्हारे भाग्य में तो कोई नही बना सकता | 
अरब रुप्या पड़ा हुआ तुमको मिल जाय और तुम कहो मैं बन गया , तो तुरन्त रिवाल्वर दिखा देगा एक आदमी छीन लेगा | आया हुआ चला जाएगा |
प्रारब्ध में वो शक्ति है |
तो प्रारब्ध मिटाने की शक्ति परमहंसो मे नही है जो मायातीत हो चुके है उनको भी प्रारब्ध भोगना पड़ता है | यहाँ तक कानून कायदा है |
अरे जिसके मामा भगवान श्री कृष्ण , पिता अर्जुन सरीखा गीता ज्ञानी महापुरुष , ब्याह कराने वाले वेदव्यास भगवान् के अवतार वो उत्तरा विधवा हो गई , अभिमन्यु मारा गया |
और सब बैठ कर शोक मना रहें हैं |
श्री कृष्ण भी बैठे हैं , अर्जुन भी बैठा हैं |
कोई नही बुला पा रहा है, 
अर्जुन रो रहा है मेरे बेटे से मिला दो , भगवान् ने कहा अरे भई ये सब प्रारब्ध के मामले हैं 
:- " श्री कृपालु जी माहाराज ( कामना और उपासना , भाग - ||)

Sunday, 10 September 2023

निराकार ब्रह्म के अनन्य उपासकों को योगी, यानि ज्ञान मार्गी , परमात्मा श्री विष्णु के उपासकों को वैष्णव , शिव के उपासकों को शैव, दुर्गा यानि शक्ति के उपासकों को शाक्त तथा केवल भगवान श्रीराधाकृष्ण के अनन्य उपासकों को भक्त कहते हैं


निराकार ब्रह्म के उपासकों को योगी, यानि ज्ञान मार्गी , परमात्मा श्री विष्णु के उपासकों को वैष्णव , शिव के उपासकों को शैव, दुर्गा यानि शक्ति के उपासकों को शाक्त तथा केवल भगवान श्रीराधाकृष्ण के अनन्य उपासकों को भक्त कहते हैं, श्री महाराज जी ने एक बार कहा था कि हमारे जितने भी सत्संगी है जो केवल मुझमें हीं पूर्ण श्रद्धा और दृढ़ विश्वास करके अनन्य भाव से मेरे हीं बतलाए बातों का अनुसरण करते हुए केवल श्री राधाकृष्ण को हीं भजते हैं , रूपध्यान करते हुए उनका स्मरण तथा चिन्तन करते रहते हैं, केवल इन्हें ही अपना ईष्ट तथा प्रियतम मानते हैं , अन्य किसी भी देवी देवता को कभी नहीं भजते, वो विशूद्ध वैष्णव है और इन सभी के योगक्षेम भगवान श्री राधाकृष्ण वहन करते हैं, इनको किसी प्रकार से कभी कोई चिंता करने कि आवश्यकता नहीं है। 
सकल धर्म को मूल हैं, एक कृष्ण भगवान् ।
 मूल तजे सब शूल हैं, कर्म, योग अरु ज्ञान ॥ ६५ ॥ - भक्तिशतक 

- पूज्यनीयां मां रासेश्वरी देवी जी ।

Tuesday, 5 September 2023

क्या संसार के आभाव में वैराग्य होता है या संसार मिलने पर फिर से संसार मे मन क्यों चला जाता है । इसका निदान कैसे हो ?

एक प्रश्न का ऊत्तर :- क्या संसार के आभाव में वैराग्य होता है या संसार मिलने पर फिर से संसार मे मन क्यों चला जाता है । इसका निदान कैसे हो ?

जहां तक गुरु देव की कृपा से मुझे थोड़ा बहुत ज्ञात है वो यह की न तो संसार की कमी से वैराग्य हो सकता है और न संसार मिलने से वैराग्य होगा । 
नही तो कितने गरीबों को संसार से वैराग्य हो गया रहता । किसी बस्तु के आभाव में वैराग्य हो जाता तो करोड़ो को , जिसे दो वक्त की रोटी भी नसीब नही होती , सबको वैराग्य हो गया होता । दुसरा - संसार मिलने पर हम साधारण संसारी जीव को और भी संसार की कामना बढ़ती जाती है । तभी तो अमीर और अमीर बनने के प्रयत्न में लगा रहता है ।
पर जब कोई व्यक्ति किसी सद्गुरु कृपा से यह समझ लेता है कि इस असार संसार में सुख का लवलेस भी नही है तो उसे संसार में रहते हुए वैराग्य अवस्य हो जाता है । संसार का त्याग वास्तविक त्याग या वैराग्य नही है। संसार से मन हटा कर भगवान् मे लगाने का बार बार प्रयास करते हुए एक दिन हरिगुरु कृपा से भगवान में मन लग जाना ही वास्तविक वैराग्य है । वर्णा जब तक संसार से हटाया हुआ मन भगवान् मे न लगेगा तो स्वाभाविक तौर पर मन फिर से संसार में चला जाएगा । क्योंकि मन जो है वो माया का बना है । और नेचुरली यह अपने सजातिये में चला जाएगा । किन्तु यही मन जब बार बार प्रैक्टिस के द्वारा , हरिगुरु के बताए साधना द्वारा संसार से हट कर भगवान् में लग जाएगा तो फिरसे यह संसार में नही लगेगा । अत: मन को संसार से हटाना और भगवान् में लगाना ही साधना है । और जब यह प्रैक्टिस करते करते एक दिन हरिगुरु कृपा से भगवान में लगने लगेगा तो सच्चा वैराग्य हो जाएगा । संसार से मन की आसक्ति का त्याग ही वैराग्य है । संसार को फिजिकली छोड़ देना और मन संसार में ही टीका होना वैराग्य कतई नही हैं 
तो संसार से आसक्ति की समाप्ति के लिय सद्गुरुदेव की बताई साधना करनी होगी । भगवान में मन को बार-बार लगाने का अभ्यास करना होगा , अन्य कोइ दुसरा मार्ग नही है ।
मेरी छोटी सी बुद्धि में तो हरिगुरु के कृपा से यही ज्ञान है । राधे राधे ।

आजकल कलयुग में बाबाओं द्वारा कान में मंत्र फुक कर चेला बनाने के नाटक पर श्री महाराज जी का प्रवचन

आजकल कलयुग में बाबाओं द्वारा कान में मंत्र फुक कर चेला बनाने के नाटक पर श्री महाराज जी का प्रवचन :- 
जो लोग कान फूंकते हैं, इनसे पूछो पहले कि आप कान में क्या देना चाहते हैं? तो वो कहेंगे- मंत्र। किसका मंत्र ? भगवान का। उस मंत्र का क्या मतलब है? हे भगवान ! हम आपकी शरण में हैं। हे भगवान! आपको नमस्कार है। ये दो अर्थ वाले सारे मंत्र हैं, जितने सम्प्रदाय हैं। तो क्यों जी, अगर हम हिन्दी में कह दें, अंग्रेजी में कह दें, फारसी में कह दें, हे भगवान ! आपको नमस्कार है तो उसको भगवान स्वीकार नहीं करेंगे? आपने जो संस्कृत में हमारे कान में मंत्र दिया या देना चाहते हैं, 'ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय', 'क्लीं कृष्णाय नमः', 'राम रामाय नमः', 'नारायण चरणौ शरणं प्रपद्ये' इत्यादि मंत्र हैं तो ये कान में जो आप देना चाहते हैं उसको हम हिन्दी में बोलें तो भगवान् स्वीकार नहीं करेंगे? क्या जो राम-राम, श्याम-श्याम लोग कहते हैं। इस राम नाम से आपका मंत्र अधिक महत्व रखता है? वो कहेंगे क्योंकि ये हमारे गुरु-परम्परा से आया है, सिद्ध-मंत्र है। तो तुम्हारे सिद्ध-मंत्र में विशेष बात होगी, चमत्कार होगा कुछ? हाँ, बिल्कुल। तो जब तुम कान में हमें मंत्र दोगे तो हमको कोई चमत्कार की फीलिंग होगी, अगर नहीं हुई तो या तो गुरुजी गलत हैं या मंत्र गलत है। अब गुरु जी कहेंगे, तुम्हारा पात्र खराब होगा तो फीलिंग नहीं होगी, चमत्कार की। तो तुमने ये नहीं सोचा कि अगर पात्र खराब है तो गुरु जी को मंत्र नहीं देना चाहिये। आज कल बारह दिन के बच्चे के भी कान फूंक देते हैं ताकि उसे और कोई शिष्य न बना ले। माइक से मंत्र दे रहे हैं। हजारों लोग चेले हो गये सुन करके। जो शास्त्रवेद का नाम तक नहीं जानता, वो भी गुरु बन जाता है। शिष्यों की लाइन लगाता जाता है और वेद कहता है ' श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् '।जो थ्योरिटिकल मैन भी हो, प्रैक्टिकल मैन भी हो उसी को गुरु बनाना है। वो चेला नहीं बनायेगा, तुमको गुरु बनाना होगा उसको। वो चेला तब बनाएगा जब तुम्हारा अन्तःकरण सेन्ट परसेन्ट शुद्ध हो जाएगा।

अन्तःकरण से सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण चला जाए । काम, क्रोध, लोभ, मोह चला जाए। भक्ति करते-करते जब अन्त:करण पूर्णतया शुद्ध हो जायेगा, एक साल, दो साल, एक जन्म, दो जन्म, दस जन्म में तब गुरु देगा, मंत्र कान में। पहले नहीं देगा। मंत्र देते ही भगवत्प्राप्ति, माया निवृत्ति, सब काम खत्म। जैसे आप अपने घर में पहले सब तारों की फिटिंग कर लेते हैं। पंखे लगा लें, बल्ब लगा लें। अब कहिये पॉवर हाउस से कि हमको बिजली दे दो, इलेक्ट्रिसिटी दे दो। सब फिटिंग होने के पश्चात् पॉवर हाउस आपको बिजली देता है। अब आपने घर में कुछ लगाया ही नहीं और आप पॉवर हाउस से कहते हैं, बिजली दे दो तो पॉवर हाउस बिजली कहाँ देगा? दीक्षा से तात्पर्य है- दिव्य प्रेम दान। जब तक अन्त:करण का बर्तन ही तैयार नहीं होगा तो गुरु कहाँ प्रेम देगा क्योंकि आपका पात्र मायिक है और प्रेम प्राकृत अन्तःकरण में धारण नहीं हो सकता।

गौरांग महाप्रभु ने कहा-

दीक्षा पुरश्चर्या विधि अपेक्षा न करे।

भगवान का नाम दीक्षा की अपेक्षा नहीं करता।

नो दीक्षां न च सत्क्रियां न च पुरश्चर्यांमनागीक्षते।
(पद्यावली)

भगवान् के नाम में भगवान् की शक्ति भरी है। राम राम राम, बस इतना काफी है। श्याम श्याम श्याम, राधे राधे राधे, बस। वो संस्कृत, गुजराती, मराठी, बंगाली, किसी भाषा में हो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अरे, यशोदा मैया ने तो कभी राम राम, श्याम श्याम भी नहीं कहा। ऐ कनुआ! इधर आ। 'कनुआ', ये कौन शास्त्र में नाम है, कनुआ। कृष्ण का नाम कनुआ, बलराम का नाम बलुआ। ए 'बलुआ'! इधर आ। क, ख, ग, घ हर एक नाम है, भगवान का। वेद कहता है कं ब्रह्म, खं ब्रह्म, अकारो वासुदेवः ।' अ' माने श्रीकृष्ण, 'उ' माने शंकर जी, भगवान के सभी नाम हैं, हर नाम में भगवान की भावना होनी चाहिये, उसका लाभ मिलेगा। मंत्र देते ही यानी दीक्षा देते ही माया का अत्यन्ताभाव हो जाएगा और अनन्त आनन्द मिलेगा। त्रिगुण, त्रिकर्म, त्रिदोष, पंचक्लेश, पंचकोश सबसे सदा को छुट्टी मिल जायेगी। हमको जब गुरु मंत्र देता है, तो हमारे ऊपर उसका असर होना चाहिये, मामूली-सा बिजली का करेन्ट छू जाता है तो कितना असर होता है और वो इतनी बड़ी स्प्रिचुअल पावर दे रहा है, उस मंत्र में डाल के और कोई असर नहीं हुआ। तत्काल माया निवृत्ति, भगवत प्राप्ति, दु:ख-निवृत्ति, आनन्द प्राप्ति का लक्ष्य परिपूर्ण हो जाना चाहिए और अगर नहीं हुआ, इसका मतलब तो गुरु ने धोखा दिया। वो चार सौ बीस है, गुरु नहीं है। वो व्यापार कर रहा है अपना, लोगों को कान फूँक-फूँक करके, चेला बना-बना करके उनसे स्वार्थ-सिद्धि कर रहा है। आखिर उसने क्या किया? उसने दिया- 'राम रामाय नमः', 'ऊँ नमो वासुदेवाय ', 'श्री कृष्णाय नमः। अरे! ये क्या है? अगर हम खाली राम कहें, श्याम कहें तो उस मंत्र में, उस नाम में कुछ कमी है ?

भगवान के नाम में समस्त शक्तियां विद्यमान हैं। जिस दिन किसी जीव को यह विश्वास हो जायेगा कि भगवान और उनका नाम दो नहीं है, एक ही है, तुरन्त भगवत्प्राप्ति हो जायेगी। इसलिये आप लोग उन बाबाओं के चक्कर में न पड़ना। पहले अन्तःकरण शुद्ध करो, बर्तन बनाओ, फिर कोई गुरु दे देगा, आपको सामान। जो असली गुरु हैं वो ढूँढ़ते रहते हैं, कोई पात्र मिल जाए। ऐसा नहीं होता कपड़ा रँगा लिया, बाल रखा लिया, तिलक लगा लिया और अण्ड-बण्ड बोलना सीख लिया, एक मंत्र, और कहते चले गये- आओ, सब लोग चेला बन जाओ। हम तुम्हारे गुरु हैं, हमारे चरण धोकर पियो और गोलोक में हम मिलेंगे ऐसे गुरु की क्या गति होगी, मरने के बाद वह कहाँ जायेगा। नरक जायेगा और तुम्हें गोलोक का टिकट दे रहा है। इतना बड़ा धोखा हमारे देश में चल रहा है। 
गौरांग महाप्रभु से प्रश्न किया लोगों ने कि मंत्र अगर लिया भी जाय तो ब्राह्मण गुरु से लिया जाय या किसी भी जाति वाले से लिया जाय।

गौरांग महाप्रभु ने उत्तर दिया- 
जेइ कृष्ण तत्ववेत्ता सेइ गुरु हय

 चाहे ब्राह्मण हो, चाहे संन्यासी हो, चाहे शूद्र हो, चाण्डाल हो, अगर उसने भगवत्प्राप्ति किया है तो उसकी शरण में चले जाओ, डरो मत। जाति मत देखो।

चांडाल से भी भगवान सम्बन्धी तत्त्वज्ञान प्राप्त करो। जाति मत देखो। ये तो शरीर का धर्म है। वर्णाश्रम धर्म जो है, ये तो शरीर का धर्म है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, यह सब तो तुम्हारा शरीर है, तुम तो आत्मा हो। सभी जीव भगवान के दास हैं और सब एक-सी आत्मायें हैं। जब सृष्टि हुई तो ब्रह्मा प्रकट हुये, ब्रह्मा के बाद फिर सृष्टि चली तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सबके पूर्वज ब्रह्मा ही तो हैं। तो ब्रह्मा को ब्राह्मण कहोगे कि क्षत्रिय कहोगे कि वैश्य कहोगे कि शूद्र कहोगे। भागवत कहती
है-
अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः स्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥
(भाग. ३-३३-७)

वो चाण्डाल परम पूज्य है जो भगवान् का भक्त है।

न मे प्रियश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः स्मृतः।

भगवान कहते हैं- मुझे चारों वेद का विद्वान ब्राह्मण प्रिय नहीं है, जो मेरा भक्त है वो चाण्डाल भी प्रिय है।
रैदास चमार हो, चाहे कोई हो। जिसने भगवान को पा लिया अब उसको क्या पाना बाकी है, उससे बड़ा और कौन होगा?

ब्राह्मणेष्वपि वेदज्ञो ह्यर्थज्ञोऽभ्यधिकस्ततः।(भाग. ३-२९-३१)

भागवत कहती है- ब्राह्मणों में वो ब्राह्मण श्रेष्ठ है जो चारों वेदों का विद्वान हो और चारों वेदों के विद्वान ब्राह्मणों में भी वो श्रेष्ठ है जो वेद-शास्त्र का अर्थ जानता हो और उन वेद-शास्त्र के अर्थ जानने वाले ब्राह्मणों में भी वो श्रेष्ठ है जो दूसरे को समझा सके, और उस ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ वो है जो श्रीकृष्ण का भक्त हो।

विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्द नाभपादारविन्दविमुखाच्छ्व्पचं वरिष्ठम्।
मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थप्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः॥
(भाग, ७-९-१०)

बारह गुणों से युक्त ब्राह्मण भी पूजनीय नहीं है और एक चाण्डाल पूज्य है, अगर वह श्रीकृष्ण भक्त है। अत: जो भगवत्प्राप्ति कर चुका, वह किसी भी जाति का हो, वह गुरु बन सकता है। वह मंत्र दे या न दे, उसकी इच्छा है। मंत्रदान द्वारा भी दीक्षा दे सकता है या अन्य किसी प्रकार से भी दे सकता है। प्रेमदान करना है, जैसे भी करे। तो जाति-पाँति से कोई मतलब नहीं है। अगर वो सिद्ध महापुरुष नहीं है और आपने उससे मंत्र लिया है तो दोनों नरक जायेंगे।

अवैष्णवोपदिष्टेन मंत्रेण निरयं ब्रजेत्।

दोनों को नरक मिलेगा? अजी, हमें क्यों मिलेगा? हम क्या जानें, ये महात्मा है कि नहीं, पूरा-पूरा? जानना चाहिये, ये तुम्हारी ड्यूटी है। इससे छुट्टी नहीं मिलेगी कि हमको धोखे में डाला, इस बाबा ने। क्यों धोखे में पड़े? तुम्हारी भी गलती है और उसकी तो है ही है, वो तो जायेगा ही नरक। मंत्र देने का मतलब है, मंत्र में दिव्य शक्ति देता है गुरु। मंत्र दीक्षा के द्वारा जो दिव्य शक्ति देता है गुरु, उसको सहन करने की शक्ति होनी चाहिये आप में, नहीं तो ये शरीर भस्म हो जायेगा, राख भी नहीं मिलेगी। देखो, संसार में भी जब किसी को कोई बड़ा आनंद मिलता है, जैसे- किसी भिखारी की लॉटरी खुल गई, एक करोड़ की, तो उसका हार्ट फेल हो जाता है या किसी आदमी का एक दम जवान लड़का मर जाय, उसका हार्ट फेल हो जाता है। यानी अधिक आनन्द, अधिक दुःख से हम शरीर छोड़ देते हैं, सहन नहीं कर सकते।

तो अनन्त आनन्द भगवान का अगर देगा गुरु तो उसे सहन करने का बर्तन भी होना चाहिये अर्थात् अन्तःकरण दिव्य होना चाहिये। इसलिये गुरु पहले आपको बर्तन बनाने का साधन बतायेगा, तत्त्वज्ञान देकर साधना करायेगा। साधना करते-करते जब अन्तःकरण शुद्ध होगा तो वह स्वरूप शक्ति से अन्त:करण को दिव्य बना देगा। तब तुम्हारी इन्द्रियाँ, तुम्हारा मन, तुम्हारी बुद्धि, सब दिव्य हो जायेंगे। उस दिव्य इन्द्रिय, मन, बुद्धि में फिर ये शक्ति है कि भगवान का दिव्यानन्द सह लो। मंत्र दान से तात्पर्य है भगवत्प्राप्ति। जैसे- जब आपने घर में सब फिटिंग कर लिया बिजली की, पंखे भी लगा लिये, टयूब-बल्ब सब लगा लिये तब पावर हाउस से तार जोड़ते हैं, अब लाइट भी जल गई, पंखे भी सब चलने लगे। अगर आपने कोई फिटिंग की ही नहीं है तो तार कहाँ जोड़ोगे, पावर हाउस से।

तो जब अन्तःकरण का बर्तन दिव्य हो जायगा, तब महापुरुष भगवान की दिव्य शक्ति देगा। और बस उसी क्षण भगवत्प्राप्ति, उसी क्षण माया-निवृत्ति, त्रिगुण, त्रिकर्म, त्रिताप, पंचक्लेश-निवृत्ति, पंचकोष-निवृत्ति, सब काम समाप्त।

भक्तियोगरसावतार_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।।

रूपध्यान का गाइडलाइंस -पार्ट -IIश्री महाराज जी के इस निर्देशन को पढ़ने के साथ साथ ही श्री कृष्ण का रूपध्यान बनने लगेगा, तथा रूपध्यान के तरीके संबंधित अन्य कंफ्यूज भी दुर हो जाएगा

रूपध्यान का गाइडलाइंस -पार्ट -II
श्री महाराज जी के इस निर्देशन को पढ़ने के साथ साथ ही श्री कृष्ण का रूपध्यान बनने लगेगा , तथा रूपध्यान के तरीके संबंधित अन्य  कंफ्यूज भी दुर हो जाएगा :- 

बंधन और मौक्ष का , कारण मनहि बखान ।
याते कौनिउ भक्ति करू, करू मन ते ध्यान।।
:- श्री कृपालु जी महाप्रभु। 
'यहाँ 'हरिध्यान' से श्री महाराज जी का तात्पर्य स्मरण भक्ति से है जिसके लिए उन्होंने मन द्वारा रूपध्यान साधना किए जाने पर बल दिया है। ताकि ध्यान करते समय मन भगवान के रूप, गुण, लीला, धाम के चिंतन में लगा रहे। चिंतन में निरंतर परम शुद्ध भगवान का सान्निध्य मिलने पर अनादि काल से मन पर जमा कलुष साफ होने लगता है और हम भगवान के निकट पहुँचने लगते हैं।

श्री महाराज जी ने कभी भिलाई नगर के सत्संगियों के मध्य रूपध्यान साधना की पद्धति बतलाई थी। देखिए, साधना में सर्वप्रथम कुछ बातें आवश्यक हैं। पहले तो आपको यह मानकर चलना है कि मैं युगल उपासक हूँ। मैं केवल कृष्ण उपासक नहीं हूँ। युगल उपासक होने के कारण मैं दोनों की साधना करता हूँ। वे मेरे माता-पिता हैं। वे मेरे स्वामी- स्वामिनी जू हैं, इस भाव को लेकर चलना है। आप तिलक लगाते हैं! पहले लम्बा तिलक लगाते हैं, फिर गोल बिंदी लगाते हैं। जो लम्बा तिलक लगाते हैं, वे केवल कृष्ण उपासक हैं। जो लम्बा और गोल लगाते हैं, वे युगल उपासक हैं। ऊपर का तिलक कृष्ण का, नीचे की बिंदी राधारानी की! आपके तिलक से ही लोग समझ जाएँगे कि आप युगल उपासक हैं। पर यह नहीं जान पाएँगे कि आप राधाकृष्ण के उपासक हैं या सीताराम के। लेकिन, यह समझ जाएँगे कि युगल उपासक हैं। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आपको युगल उपासना करनी है।

दूसरी बात, साधना में ऐसा कोई जरूरी नहीं है। कि दोनों को सदा साथ रखना है। मान लीजिए कि आप श्रीकृष्ण माधुरी का पद गा रहे है। आपको इस समय श्रीकृष्ण का ध्यान करने की इच्छा है, आप अपने सामने श्रीकृष्ण को खड़ा कीजिए। किसी समय आपको स्वामिनी जू का ध्यान करने की इच्छा है, तो राधारानी को खड़ा कीजिए। कभी आपको युगल उपासना करने की इच्छा है, तो दोनों को खड़ा कीजिए। परन्तु हमेशा हमें यह याद रखना है कि यदि उन्हें हम सर्वस्व मानेंगे तो जब चाहें जिस भाव में आ पाएँगे। लेकिन यदि आप दास्य भाव में भक्ति करेंगे तो फिर सखा नहीं मान सकेंगे। इसलिए टॉप की साधना कीजिए। कभी इच्छा हो रही है श्रीकृष्ण को प्रियतम मानने की, तो उसी भाव से उपासना करें। और पुरुष भी साधना करते समय यह न सोचें कि वे श्रीकृष्ण को कैसे प्रियतम मानेंगे! आपका शरीर पुरुष का है, पर हर कोई कई बार पुरुष या स्त्री दोनों हो चुका है। यह तो शरीर का सिर्फ नाम है।

उपासना मन से होती है। आपका जो भाव देह बनता है, वह मुख्य है। भगवान आपके शरीर को 
नहीं देखते। आपके मन से जो भावना बनायी जाती है, उसी का भावदेह बनता है। भावदेह से आपने भगवान का जैसा रूपध्यान किया है, आपको उनके वैसे ही साक्षात् दर्शन होंगे। इसलिए यहाँ यह महत्वपूर्ण नहीं है कि मैं पुरुष हूँ। महत्वपूर्ण यह है कि मैं आत्मा हूँ और आत्मा स्त्रीलिंग होती है।

परमात्मा आत्मा को ग्रहण करता है और आत्मा स्त्रीलिंग होती है। इसलिए मीरा ने जीव गोस्वामी से कहा था, अब तक तो मैंने जाना था कि पूरे ब्रह्माण्ड में एक ही पुरुष है और बाकी सब नारियाँ हैं। वह एक ही प्रियतम है। तुम एक दूसरे पुरुष कहाँ से आ गये ? - तो अब स्पष्ट है कि हम सब आत्माएँ हैं । आत्माओं के प्रियतम परम पुरुष श्रीकृष्ण हैं। दंडकारण्य के ऋषि-मुनि आत्माएँ हैं। तभी तो वे ऋषि-मुनि होकर भी राम को देखकर प्रियतम भाव से आकृष्ट हो रहे हैं। ये ऋषि-मुनि जोगी हैं, वैरागी हैं। काम उनको छू नहीं सकता, किंतु राम को देखकर कामुक हो गए! - आश्चर्य नहीं लगता? इसलिए उनको प्रियतम भाव से प्रेम करना है । पुरुष-स्त्री सभी आत्माएँ हैं और श्रीकृष्ण सबके प्रियतम हैं।

तीसरी बात, जब आप रूपध्यान करने बैठें तो आपको उनके साथ संबंध बनाना है, वे मेरे क्या लगते हैं! उनके साथ आपके सारे रिश्ते हैं! वे आपके सर्वस्व हैं! अब मन की भूमिका आरंभ 
होती है क्योंकि ध्यान मन से होता है, आपका शरीर ध्यान नहीं करता । शरीर स्थूल है। इससे आपको कुछ नहीं करना। सारा काम मन का है। मन को काम देना है। अब आप मन को क्या काम देंगे? आप एकांत में बैठेंगे: श्री महाराज जी का पद लेंगे। मान लीजिए, आपने दैन्य माधुरी का पद लिया या आपने श्रीकृष्ण माधुरी का पद लिया। जो पद है, उसी पद के अनुसार आपको साधना करनी है। यदि आपने दैन्य माधुरी का पद लिया है तो उसमें जो वर्णन है तदनुसार आप सावधान होकर बैठेंगे। फिर अपने इस स्थूल शरीर को भी छोड़ देंगे । मन से इसको छोड़ दीजिए। नहीं है मेरा यह शरीर इस समय ! मैं हूँ. मेरे प्रभु हैं, जो मेरे हैं। मैं हूँ, मेरे गुरु हैं। बस ! मैं, गुरु और भगवान हम तीन ही हैं, और कुछ नहीं। सर्वत्र समुद्र-ही-समुद्र है, किसी से कोई लेना- देना नहीं ।

कोई नाता ही नहीं है मेरा किसी से! उस समय कुछ याद न रहे। केवल मैं, गुरु और भगवान! अब मन से अपना भाव देह बनाइए। भाव देह बहुत महत्वपूर्ण है। आपके मानसिक चिंतन से जो भाव देह बनता है, यही परिपक्व होता है। इसी भावदेह से आप श्यामाश्याम के दर्शन करेंगे । जिसने जिस क्लास का चिंतन किया होगा, उसका उसी भाव में भाव देह परिपक्व होगा। मान लीजिए आपने दास्य भाव में उनका चिंतन किया है तो आपको प्रभु दास्य भाव में ही मिलेंगे। - तो भाव देह बनाना है और उस भाव देह को दिव्य धाम गोलोक में ले जाना है। अपने भाव देह से देखना है कि मैं इस समय कहाँ हूँ। पृथ्वी पर । पृथ्वी के नीचे सात लोक। ऊपर सात लोक और चौदह भुवन । इसको फोड़ कर जाना है। 'यहाँ नहीं हैं मेरे प्रभु! मुझे गोलोक जाना है' यह आपको चिंतन करना है। इस चिंतन में बड़ी शक्ति है।

आपने माया का लोक छोड़ा और आपको विरजा नदी मिली। यह विरजा नदी दिव्य नदी है। भगवान ही है यह! इसे भगवान के द्वारा प्रकटित मानिए या मानिए कि यह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ही है, जहाँ माया नहीं है। गोलोक में हर चीज़ श्रीकृष्ण ही बने हैं। यह विरजा नदी लक्ष्मण रेखा है। इस नदी के नीचे माया के लोक हैं और ऊपर दिव्य लोक। आपका भाव देह माया के लोक को फोड़कर विरजा नदी के पास पहुँचा। आपने इस भाव देह से विरजा नदी में स्नान किया। स्नान करते ही यह भाव देह दिव्य हो गया, प्रकाशयुक्त हो गया! अब यह गोलोक जाएगा। रास्ते में कई लोक पड़ेंगे। जितने अवतार हैं, उनका भी अपना-अपना लोक है, जैसे नरसिंहादि का लोक। ये सब परव्योम में आ जाते हैं। इन सबसे हमारा कोई काम नहीं है। हम उन्हें प्रणाम करते हुए चलते जाएँगे। सबसे पहले ज्ञानियों का सिद्ध लोक मिलेगा। फिर शिवलोक है। ऊपर उठिए। अब परव्योम लोक वैकुण्ठ है, यहाँ महाविष्णु हैं।
अब साकेत है। हर एक का अपना-अपना लोक है। बस, आप चलते जाइए। हमको गोलोक जाना है। सबसे ऊपर अन्तिम है गोलोक ! उसके बाद कुछ नहीं । गोलोक पहुँचना है। पहुँच गए.... बाहर से हम देख रहे हैं कि गोलोक गोलाकार है। कमल के रूप का बड़ा सुंदर! वह दिव्य प्रकाश । आप गोलोक में प्रविष्ट होते हैं गोलोक के मध्य जो श्रीकृष्ण का अंतःपुर है, वह कमल के रूप का है और कमल की जो पंखुड़ियाँ हैं, वह गोपकुमार का निवास स्थान है! कमल के मध्य जहाँ कर्णिकाएँ हैं, यहाँ श्रीकृष्ण का महल है और इस महल में सदा किशोर अवस्था में श्रीराधाकृष्ण विराजित हैं! हमारे स्वामी स्वामिनी जू माता- पिता के रूप में सदा विद्यमान होकर अपनी सृष्टि को देखते रहते हैं! सृष्टि के चर-अचर सभी जीवों की खबर उनके पास है! उसी गोलोक में वृंदावन भी है। दिव्य वृंदावन....! दिव्य वृंदावन में ही भगवान की नित्य लीलाएँ होती हैं। तो यह वृंदावन जो गोलोक में है, वहाँ पर चार भाव के रस हैं, जिसका आस्वादन भगवान अपने परिकरों के, अपने जनों के साथ करते हैं! वहाँ कोई मायाबद्ध नहीं जा सकता। जितने उनके अपने जन, सन्त, नित्य पार्षद और नित्य परिकर हैं, उनके साथ ये लीलाएँ चलती रहती हैं चाहे वे दास्य भाव की हों, चाहे सख्य भाव की हों, चाहे वात्सल्य भाव की हो या माधुर्य भाव की हों । लेकिन गोलोक में ये जितने भी हैं, जिस भाव में भी रहें, ये सब निष्काम प्रेम करते हैं और सदा राधाकृष्ण की सेवा के लिए आतुर व्याकुल रहते हैं। इसलिए प्रभु को इनके साथ रसास्वादन में बड़ा सुख मिलता है।

यही भगवान श्रीकृष्ण सातवें मन्वंतर की अट्ठाइसवीं चतुर्युगी के अंत में द्वापर में आते हैं। भगवान गोलोक का वृंदावन भी लेकर आ जाते हैं जो इस स्थूल वृंदावन में लीन हो जाता है और इस प्रकार वे अपने लोगों को लेकर उस रस का आस्वादन इस मृत्युलोक में भी करते हैं। आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व जो श्रीकृष्ण आए थे, वे स्वयं गोलोक बिहारी थे । द्वापर तो हमेशा होगा लेकिन हमेशा गोलोक बिहारी नहीं आएँगे, युगावतार आएँगे जो श्रीकृष्ण के अंश हैं- प्रथम पुरुष, द्वितीय पुरुष, तृतीय पुरुष ! तो प्रथम पुरुष हैं कारणार्णवशायी जो महाविष्णु हैं। द्वितीय पुरुष हैं गर्भोदशायी जिनकी नाभि से ब्रहमा, विष्णु, शंकर पैदा होते हैं और तृतीय पुरुष हैं क्षीरोदशायी जो सभी जीवों के हृदय में रहते हैं। हम बड़े सौभाग्यशाली हैं कि हमने जिनकी लीलाएँ सुनी हैं, वे स्वयं गोलोक बिहारी श्रीकृष्ण हैं, जो 5000 वर्ष पूर्व इस जगत में आए थे। इसलिए हम जो रूपध्यान करेंगे, वह गोलोक बिहारी श्रीकृष्ण का होगा। तो गोलोक चलना है। फिर गोलोक में हम अंतःपुर में जाएँगे। अंतःपुर में राधाकृष्ण के दर्शन करेंगे। अब हमें यदि भावों में प्रविष्ट होना है, तो फिर वृंदावन जाएँगे । हमें अपने भावदेह को दिव्य वृंदावन में ले जाना है। गोलोक में भी वृंदावन है! अब वृंदावन में आपको देखना है कि मैं कुंज में जाऊँ या यमुना जी के किनारे जाऊं ! कहाँ जाऊँ, यह भाव देह निर्धारित करेगा। मैं कुंज में जाऊँगा आप कुंज में जा रहे हैं। निकुंज में तो मैं जा नहीं सकता! अधिकारी नहीं । निकुंज में तो केवल अष्ट सखियाँ और राधारानी सहित श्रीकृष्ण ! निभृतनिकुंज में केवल राधाकृष्ण !! तो हम न तो निकुंज में और न ही निभृत निकुंज में जा सकते हैं, हम कुंज तक जा सकते हैं। तो कुंज में जा रहे हैं! अब आप कुंज में पहुँच गए हैं, कुंज में कुंजबिहारी श्रीकृष्ण शिला पर बैठे हैं और आप भाव देह से उनके दर्शन कर रहे हैं और आप पद गा रहे हैं, 'प्राण धन, जीवन कुंजबिहारी' -यह महाराज जी द्वारा रचित पद है !

पद गाते समय यही ध्यान करना है कि आप गोलोक पहुँच गए। गोलोक में वृंदावन का कुंज! और कुंज में मैं कुंज बिहारी को बैठे देख रहा हूँ। उसके बाद पद अनुसार आप विनती कीजिए। गोलोक बिहारी के समक्ष । देखिए, मन को कितना काम मिल गया। कहाँ जाएगा मन! वह तो कुंजबिहारी में अटक ही जाएगा। इधर-उधर कैसे भागेगा ! अब आप कुंजबिहारी से कह रहे हैं। कि आप मेरे प्राणधन हैं! इसी मन से कुंजबिहारी के प्रत्येक अंग पर शोभित शृंगार को देखिए! शीश से शुरू करके चरणों तक जाइए या चरणों से शुरू करके शीश तक जाइए। शीश पर मोर पुच्छ सुशोभित है। इसके आगे ? उसके आगे मुकुट है। क्या लगा है मुकुट में ? देखिए, देखते जाइए। मुकुट में मणियाँ हैं। मणियों का क्या रंग है ? फिर उस पंक्ति में किस प्रकार की मणियाँ लगी हैं? अच्छा, किनारे में मोतियों की लड़ी भी लगी है। और, माथे पर भी जो लड़ें हैं, वे भी मोतियों की हैं! मोतियों का रंग कैसा है? घुँघराले केश काँधे तक हैं। भाल पर कस्तूरी तिलक लगा हुआ है ! तिलक का रंग कैसा है ? मेरे कृष्ण के कपोल कैसे हैं ? लम्बे हैं, गोल हैं, कैसे हैं ? आते जाइए नीचे। गले में क्या पहन रखा है ? काँधे पर कौन से रंग का दुपट्टा है ? गले में कौस्तुभ मणि की माला है! साथ ही गले में सुगंधित पुष्पों एवं कमल के फूलों से बनी वनमाला भी सुशोभित है! मेरे श्यामसुंदर की अंगकान्ति नीले रंग की है! अब ये नीले रंग का शरीर, उस पर वनमाला, कहीं सफेद फूल, कहीं कमल का गुलाबी फूल, कहीं हरे रंग का तुलसी दल! आप रूपध्यान कीजिए, कितना सुंदर लग रहा होगा! सुगंध से मतवाले होकर भौंरे आकर माला के पुष्पों पर बैठ जाते हैं और कभी-कभी श्यामसुंदर की दिव्य सुगंध सूँघने के लिए उनके श्रीअंगों पर भी बैठ जाते हैं, फिर उड़ जाते हैं! काँधे पर गुलाबी रंग का दुपट्टा है! नीले श्रीअंग पर दमकती दामिनी के समान पीतांबर सुशोभित है! मंद-मंद हवा चल रही है! मेरे कृष्ण का पीतांबर लहराता हुआ उनके नीले चरणों को चूम रहा है! चरणों पर मणियोंवाली पायल सुशोभित है। और जो नख हैं उनसे निकलनेवाला दिव्य प्रकाश चारों ओर दीपित हो रहा है। नील सरोरुह सदृश हाथों में उन्होंने मणि जटित मुरली थाम रखी है जिसे अधरों से लगाए फूँक-फूँककर बजा रहे हैं और रतनारे नेत्र तो मानो सुधा रस छलका रहे हैं ! श्यामसुंदर अपने तिरछे नेत्रों से मुझे देख भी रहे हैं! अपने भावदेह से जब आपने यह देख लिया कि नेत्रों से वे आपकी ओर देख रहे हैं, आप उनको देख रहे हैं, दोनों के नयन एक-दूसरे से मिल रहे हैं, बस अब आपको उनसे निवेदन करना है! आप उनसे अपने दिल की बात कहेंगे ! आपको यह ध्यान करना है कि मैं जो कह रहा हूँ, सुन रहे हैं। अरे, उन्होंने तो मुरली बजाना बंद कर दिया है, वे ध्यान से मेरी बात सुन रहे हैं! अब तो उन्होंने प्यार से दोनों भुजाएँ भी फैला ली हैं! अरे, वो मेरी ओर चले आ रहे हैं! मेरा आलिंगन कर रहे हैं ! मुझे अपने गले से लगा लिया ! देखो, उनके गले लगते ही मुझे अनंत आनंद मिल रहा है! मैं फूट-फूट कर रो रहा हूँ ! ये सब आपको ध्यान में अनुभव करना होगा । जब आप इस प्रकार से रूपध्यान साधना करेंगे, तो इसमें कोई संदेह ही नहीं है कि आपको मुरली ध्वनि भी सुनाई पड़ेगी! आपको दिव्य स्पर्श की भी अनुभूति होगी! आपको कानों में उनकी मधुर आवाज भी सुनाई पड़ेगी। लेकिन ऐसी ही साधना करनी होगी । श्री महाराज जी द्वारा रचित पदों का प्रत्येक शब्द दिव्य प्रेमरस में निमज्जित है! श्री महाराज जी ने हमें अपने पदों के रूप में जो दिव्य भाव संपदा प्रदान की है, उनका यदि इस प्रकार से साधना करते हुए आप गान करेंगे तो स्वयं देखेंगे कि आपके भीतर कितना परिवर्तन आयेगा! 
:- भक्ति पियुष -I 2022 , ब्रजगोपिका सेवा मिशन ,पेंज नंबर -27-32

Sunday, 3 September 2023

एकांत रूपध्यान साधना करने का संपूर्ण तरिका गुरूदेव श्री कृपालु जी महाप्रभु द्वारा निर्देशित

एकांत रूपध्यान करने का संपूर्ण तरिका गुरूदेव श्री कृपालु जी महाप्रभु द्वारा निर्देशित :- 
आध्यात्मिक जगत को रूपध्यान श्री महाराज जी का अमूल्य उपहार है। उन्होंने ही बार-बार यह कह- कहकर इस बात को सबके मस्तिष्क में भरा है कि बिना रूपध्यान के साधना हो ही नहीं सकती। संसार में भी पहले स्मरण करते हैं, उसके बाद क्रियाएँ होती हैं।

भक्तियोग का प्राण रूपध्यान:- 
श्री महाराज जी कहते हैं- रूपध्यान ही भक्तियोग का प्राण है। भक्ति में रूपध्यान ही सर्वप्रथम महत्त्वपूर्ण चीज है। प्रतिपल अपनी समस्त मानसिक शक्ति को भगवान से जोड़ने का सबसे सुन्दर और सरल उपाय है, 'रूपध्यान'। यह मायिक विचार धारा को दिव्य चिन्तन में रूपान्तरित करने का अद्भुत तरीका है। रूपध्यान के बिना साधना का अभ्यास प्राणहीन शरीर के समान है। मानव मस्तिष्क रूप बनाने का अनादिकाल से अभ्यस्त है। उसकी इसी विशेषता का भगवदीय क्षेत्र में पूर्ण उपयोग व सर्वांगीण विकास ही रूपध्यान है।

अभ्यास अति सरल:-
श्री महाराज जी ने रूपध्यान के अभ्यास का बड़ा ही आसान तरीका बताया है। वे कहते हैं कि हम रूपध्यान में जैसा रूप चाहें, वैसा बनाएँ। जो भी संबंध बनाना चाहें, वह बनाएँ, जैसे-दास्य, वात्सल्य, सख्य, माधुर्य रूपध्यान के समय साधक जिस भी संबंध से मूलत: जुड़कर साधना करता है, वह उससे नीचे की श्रेणी में जाकर साधना कर सकता है। पर ऊपर की श्रेणी में जाकर साधना नहीं कर सकता। सर्वोत्कृष्ट संबंध में अपने इष्ट को प्रियतम माना जाता है। इसे माधुर्य भाव कहते हैं। माधुर्य भाव का यह साधक सख्य, वात्सल्य, दास्य और माधुर्य भाव में जा सकता है। जबकि एक दास्य भाव अवलंबी साधक श्रीराधाकृष्ण की उपासना वात्सल्य, सख्य और माधुर्य भावों में नहीं कर सकता है।

निरन्तर रूपध्यान का उपाय:- 
रूपध्यान के समय मन के संसार में चले जाने पर वापस रूपध्यान से जोड़ने का बहुत सुन्दर उपाय श्री महाराज जी ने बताया है। वे कहते हैं कि मन जहाँ भी जाता है, उसे जाने दो। तुम वहीं श्यामसुन्दर को खड़ा कर दो। वह दिन अवश्य आएगा, जब मन थककर भटकना छोड़ देगा। बार-बार अभ्यास से मन अपने आप मायिक जगत से हटता जाएगा और रूपध्यान सरल होता जाएगा। फिर रूपध्यान बनाना नहीं पड़ेगा, रूपध्यान में डूबे रहना तुम्हारा स्वभाव बन जाएगा।

साधना के नियम:-

श्री महाराज जी का साधकों के लिए निम्नलिखित आदेश हैं-
1.रूपध्यान करते हुए संकीर्तन करो ।
2. निरन्तर मौन व्रत का पालन करो।
3. अत्यन्त दीनभाव उत्पन्न करो।
4. हरि-गुरु के अनुकूल ही चिन्तन करो।
5. अन्य साधकों में सम्मान का भाव करो।
6. भाव प्रकट करने का दंभ कभी न करो।
7. मोक्षपर्यन्त की भी कामना कभी न करो।
8. क्षण-क्षण सर्वत्र सर्वदा हरि स्मरण करो।

रूपध्यान की प्रारम्भिक तैयारी:- 

1. अपने इष्ट श्रीराधाकृष्ण की मनभाई तस्वीर या मूर्ति चुनें।

2. अपनी साधना का स्थान को तैयार करें। आप वहाँ अपने इष्ट श्रीराधाकृष्ण और सद्गुरु को आसीन करें। ध्यान रहे कि आपकी साधना का स्थान एकान्त में हो।

3. अपनी साधना के लिए निश्चित समय निर्धारण करें।

4. जब आप साधना करने के लिए बैठें तो ऐसा अनुभव करें कि आप समस्त संसार से दूर केवल अपने हरि-गुरु के साथ हैं।

5. आँखें बन्द करें। अपना एक भाव शरीर बनाए, उस भाव शरीर से या तो गोलोक जाएं, या गुरूधाम , गोलोक या गुरूधाम में प्रवेश करने के अनुमति के लिए गुरू से याचना करें । फिर अनुभव करें, आपको अनुमति मिल गई है और आप गोलोक या दिव्य गुरू धाम मनगढ़ के साधना हौल मे प्रवेश कर चुके हैं तथा आप अब हरि- गुरु के समक्ष उपस्थित हैं। चारो तरफ से शीतल तथा सुगंधित पवन बह रही है, हजारो प्रकार के दिव्य पुष्प खिली हुई है, दिव्य तथा रंग विरंगे प्रकाश चारो तरफ विखड़ा हुआ है, गुरूदेव और श्री राधाकृष्ण सिंहासन पर विराजमान है, उनके शरीर से दिव्य प्रकाश हर दिशा को प्रकाशित कर रहा है , हजारो गोप गोपिंया स्तूति कर रहीं हैं, भवन के पास ही यमुना जी अठखेलियां कर रही हैं । गुरू देव और श्री राधाकृष्ण आपको ममता तथा स्नेह की दृष्टि से देख रहे है , आप आगे बढ़ कर उनके चरण कमल को स्पर्श कर रहे हैं तथा उनको दिव्य माला पहना रहे है, अब उनकी रूपमाधुरी का पान करें । 

6. उनकी सेवा करें, जैसे- श्रीचरणकमल पखारना,
पंखा झलना, भोग अर्पित करना आदि-आदि।

7. इस भाव को दृढ़तर करते जाएँ कि आप उनके और वे आपके हैं।

8. एकाग्रचित्त हो जाएँ। अब साधना आरम्भ करें। सर्वप्रथम भावयुक्त हो प्रार्थना करें। फिर आर्त पुकार करते हुए हरि-गुरु की आरती करें। 
( नोट :- याद रखें यहां आप भाव शरीर में है, इसलिए फिजिकल रूप से आरती के लिए खड़ा होने कि कोई आवश्यकता नही है , आप भाव शरीर में वहां दिव्य दरवार में रूपध्यान में खडे हैं , रूपध्यान वाले आपके भाव शरीर के हाथो में दिव्य आरती कि थाली भी है और उसी भाव शरीर से आप उनके समक्ष खडे होकर आरती कर रहे है , इसलिए आरती के लिए इस भौतिक शरीर से खडे होने की कोई आवश्यकता नही है ) 

9. आरती के बाद अब भाव शरीर से वहां आसन पर बैठ जाए , अब उनके नाम, गुण, लीला, धाम का रूपध्यान करते हुए अश्रु बहाकर कीर्तन स्वयं गाएँ या सीडी लगा कर साधना करें।

10. बड़े प्रेम से भोग -गीत गाते हुए उन्हें भोग अर्पित करें और उन्हें ग्रहण करते देखकर आनन्द से रोमाञ्चित हों।

11. साधना की समाप्ति के बाद यह रूपध्यान करें कि आपके हृदय में हरि-गुरु विराजित हैं और प्रतिपल आपके साथ हैं। अपना संसारी कर्तव्य निभाते समय भी बार-बार अपने हृदय में विराजित हरि-गुरु के दर्शन करते रहें। हर पल हर क्षण अपने गुरु को अपने साथ महसूस करने का अभ्यास करें।

क्रियात्मक साधना का आधार- 'प्रेम रस मदिरा' :- 

श्री महाराज जी ने साधना हेतु अक्षय खजाना दिया है। उसी खजाने का सबसे बेशकीमती हीरा है- 'प्रेम रस मदिरा' | 'प्रेम रस मदिरा' स्वयं श्री महाराज जी का प्रत्यक्ष रूप है। यह अपने आप में एक पूर्ण ग्रंथ है। इस ग्रंथ में श्री महाराज जी ने अपने आप को स्थापित कर दिया है। श्री महाराज जी का व्यक्तित्व पारलौकिक है। अतः उसी कक्षा का रस इस ग्रंथ में भर रखा है। ये 'प्रेम रस मदिरा' के पदों में स्वयं बैठे हैं। इसलिए जब ये पद गाए जाते हैं तो रोमांच होता है। आँसू आते हैं। गुरु जिस कक्षा के होते हैं उसी कक्षा की शक्ति अपनी रचनाओं में भर देते हैं। श्री महाराज जी ने भावावेश की अवस्था में इस 'प्रेम रस मदिरा' ग्रंथ की रचना की है। इसका प्रत्येक पद अलौकिक हैं। अपनी पूर्ण शक्ति लिए हुए हैं। इसमें समुद्र-सी गहराई है, हमारी साधना हेतु । संसार के परम कल्याण हेतु इन्होंने इसे प्रकट किया है। अपने इस अनुपमेय ग्रंथ में श्री महाराज जी ने अपनी पूरी साधना पद्धति को परत-दर-परत खोलकर रख दिया है। यह वेद-शास्त्र का सार एवं रस शास्त्रों की सर्वोत्कृष्ट अमूल्य निधि है। इसका निरन्तर चिन्तन चित्त के कल्मर्षो का मार्जन करता है और प्रेम-रस-सुधा का पान कराता है।

साधना के विविध चरण निम्नलिखित है :- 

साधना के लिए 'प्रेम रस मदिरा' ग्रंथ को श्री महाराज जी ने विभिन्न माधुरियों में विभाजित कर दिया है। इसी के अनुसार उनके द्वारा प्रशिक्षित किसी प्रचारक के निर्देशन में साधना करनी है।

1. आर्त पुकार:- 
सर्वप्रथम श्री महाराज जी ने 'आरती माधुरी' रखी है। आरती क्यों की जाती है? आरती का अर्थ होता है दीन-हीन अकिंचन साधकों की आर्त पुकार! करुण पुकार !! अपने आपको वास्तव में निराश्रित स्वीकार करना है। साधनहीन स्वीकार करना है। जब वास्तविक आर्त्त पुकार कोई करता है, तो उसकी पुकार भगवान सुनते हैं। उस आर्त्त के लिए वे भागे-भागे आते हैं। 

2. अमोलक गुरु उपकार स्मरण:- 
अपने आपको अपने गुरुदेव का ऋणी मानें, जिन्होंने उन तत्त्वों के रहस्यों का ज्ञान अपनी कृपाशक्ति से आपको करा दिया जिन्हें कोई हजारों जन्मों में वेद-शास्त्रों को पढ़कर भी नहीं जान सकता है, जैसे- श्रीकृष्ण तत्त्व, श्रीराधा तत्त्व, जीव तत्त्व, माया तत्त्व, गुरु तत्त्व आदि। गुरु के उपकारों से ऋणी साधकों को प्रतिदिन आरती के बाद कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए 'सद्गुरु माधुरी' का पद गाना चाहिए।

3. सिद्धांत पुनरावृत्ति:- 
इसके बाद 'सिद्धान्त माधुरी आती है। यह माधुरी
सिद्धान्त की बातों का बारंबार मनन करने के लिए है। सिद्धान्त की बातें मन को शान्त करने के लिए हैं। मन बड़ा चंचल है। अतः उसे सिद्धान्त बताना है। जब मन को सत्य तथ्यों का पता चलेगा तो वह सावधान होगा। जब मन सावधान होगा तो वह बेचैन होगा इस बात को सोचकर कि मुझे क्या करना है और क्या कर रहा हूँ। सिद्धान्त से जब मन को सावधान किया गया कि संसार से विरक्त हो जाओ क्योंकि मृत्यु का पता नहीं, तो मन कहेगा कि यह तो बिल्कुल सत्य है।

4. दैन्य भाव में अवस्थान:- 
सिद्धान्त पाकर मन ने उसे स्वीकारा कि तुरन्त दैन्य 'माधुरी' की सहायता से विनम्र बनाना है। दैन्यमाधुरी का अर्थ है दीनतापूर्वक, विनम्रतापूर्वक व्याकुल होकर भगवान को पुकारना। दैन्यमाधुरी से उत्पन्न चिंतन से मन बिल्कुल शान्त होकर विनम्र हो जाएगा। जब साधक को अपने अपराध दिखाई देने लगेंगे। अब प्रभु के चरणों में बार-बार निवेदन करना है कि कृपा करो। दयनीय दशा का चिंतन हृदय को विगलित कर देता है। फिर आँसुओं के रूप में वह बह कर निकलता है। इन आँसुओं को देखकर भगवान का मन पिघल जाता है। हृदय में जितना अधिक पश्चाताप का भाव आएगा, उतने ही आँसू बहेंगे। हृदय उतना ही इन आँसुओं से स्वच्छ होता जाएगा और भगवान उतनी कृपा करते जाएँगे।

5. नाम-रूप- लीला-धाम-जन गुणगान:- 
जब आप आँसू बहाकर वास्तविक रूप में भगवान के सामने अपने आपको प्रस्तुत कर चुके होंगे तो आपको यह बोध होगा कि प्रभु मुस्कुरा रहे हैं और आपको सान्त्वना दे रहे हैं। उनके वात्सल्य भरे नेत्र आप में कुछ आशा जगा रहे हैं। फिर आप उनकी स्तुति करेंगे। उनके सुन्दर रूप को देखेंगे। उनके शृंगार को देखें गे। उनके गुणों का उत्कंठित होकर गान करेंगे। आप अपने आपको उन्हें दे देना चाहेंगे। आप बराबर उन्हीं का संग चाहेंगे। वे आपको सर्वाधिक प्रिय लगने लगेंगे। यही कारण है कि श्री महाराज जी ने दैन्यमाधुरी के बाद अपने इष्ट का गुनगान किया है। 'श्रीकृष्ण माधुरी', 'श्रीराधा माधुरी', 'धाम माधुरी' आदि माधुरियाँ इसके अन्तर्गत आती हैं। आप रूपध्यान में उनके धाम में जाइए। वृन्दावन के कुंज में बैठकर कुंजबिहारी एवं कुंजबिहारिणी का ध्यान कीजिए। उन्हें पुकारिए ।

6. रुचि के अनुसार विविध माधुरियों का चयन:-

आप अपनी रुचि अनुसार कभी भी किसी माधुरी को लेकर उपासना कर सकते हैं। जैसे- 'युगल माधुरी', 'सखी माधुरी', 'धाम माधुरी', 'मुरली माधुरी', 'प्रकीर्ण माधुरी', 'विरह माधुरी' आदि-आदि।

7. सभी माधुरियों में विरह माधुरी सरताज:-

सभी माधुरियों में 'विरह माधुरी' का अपना विशिष्ट महत्व है। विरह माधुरी गाकर जितना आप उनके वियोग में तड़पेंगे, अश्रु बहाएँगे, उतना ही आपका हृदय स्वच्छ होगा। आत्मा उतनी उज्ज्वल होगी। साधना परिपक्व होगी। सोना जितना तपता है उतना ही उज्ज्वल होता है। उसका रंग निखरता है, सुन्दर होता है । 

:- भक्ति पियुष , पेंज नंबर 30 -33
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अनेको श्रद्धालु तथा जिज्ञासु साधको के आग्रह पर मैने यह लेख बहुत प्रयास के बाद ढूंढ़ कर भक्ति पियुष से लिखा है । आशा है श्री महाराज जी द्वारा दिया गया यह गाइडलाइन आपको एकांत रूपध्यान साधना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा । 
आपका गुरूभाई संजीव कुमार। श्री राधे ।