Saturday, 16 September 2023

अन्न और मन का सम्बन्ध

श्री महाराज जी कि दिव्य वाणी और निर्देश :- 
***********अन्न और मन का सम्बन्ध*************

चाहे जो भी हो ऋषि हो, मुनि हो, भक्त हो, नास्तिक हो, शरीर रखे हो, उसको देना पड़ेगा सब सामान। विटामिन ए. बी. सी. डी. सब। नहीं तो फिर बीमारी होगी और फिर बैठकर बीमारी का चिन्तन करोगे फिर भगवान् का चिन्तन नहीं होगा। वह जरूरी है। 'तनु बिनु भजन वेद नहिं बरना' शरीर के बिना भक्ति नहीं हो सकती। और वह शरीर के लिये सामान सही-सही होना चाहिये, यह भी शर्त है भगवान् की-

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
 युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ (गीता ६.१७)

वो कर्मयोगी हो, ज्ञानयोगी हो, भक्तियोगी हो तीनों के लिये ठीक-ठीक खाना, ठीक-ठीक व्यवहार, ठीक-ठीक सोना, ठीक-ठीक जागना। सबका नियम है। वैज्ञानिक भी और आध्यात्मिक भी। उसके अनुसार चलना होगा। अधिक सोये बीमारी हो जायेगी, कम सोये बीमारी हो जायेगी। अधिक खाया बीमारी हो जायेगी, कम खाया बीमारी हो जायेगी।

 नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्रतः। (गीता ६.१६)

 अधिक खा लेने वाला योगी नहीं हो सकता।
न चैकान्तमनश्रतः ।
और जो बिल्कुल न खाये, आ गया हठ योग में, मैं कुछ नहीं खाता। कितने दिन ?

वेद में कथा है कि मन खाने से बनता है। ये वेद में लिखा है। आप लोग जो खाना खाते हैं उससे मन बनता है। एक हिस्सा ऐसा होता है जिससे मन बनता है, एक हिस्सा ऐसा होता है जिससे रस बनता है फिर रस से रक्त बनता है, फिर रक्त से माँस बनता है। ऐसे ही धातुएँ बनती हैं सात, और एक हिस्सा लैट्रीन बन जाता है। ये तीन हिस्से होते हैं, आप लोग जो कुछ खाते हैं।

तो शिष्य ने पूछा कि गुरुजी यह तो ठीक है रक्त वगैरह बनता है। और यह भी ठीक है कि हाँ पाखाना बनता है। लेकिन मन बनता है यह बात मैं कैसे मान लूँ? क्योंकि खाना तो मोटी चीज है। गेहूँ है, चावल है यही सब तो खायेगा, फल खायेगा तरकारी खायेगा। ये मोटी चीजें है भौतिक, और मन तो होता है सूक्ष्म। तो मन का क्या सम्बन्ध है खाने से ? तो गुरुजी ने कहा- हाँ ठीक है फिर बतायेंगे। और दूसरे दिन गुरुजी ने कहा देखो आज से तुम्हारा खाना बन्द अब गुरुजी की आज्ञा हो गई। अब देखो कितने दिन को बन्द करते हैं। दया आ जायेगी गुरुजी को शाम को ही कहेंगे अच्छा खा ले, खा ले। दो दिन, चार दिन, छः दिन, दस दिन, बारह दिन, पन्द्रह दिन, सोलह दिन हो गये, और वो बेचारे को चक्कर आने लगा तो उन्होंने कहा इधर आओ। बताओ तो तैत्तिरीयोपनिषद् के अमुक अनुवाक् का अमुक मंत्र क्या है? उसने कहा गुरुजी !... उससे बोला ही नहीं जा रहा था बेचारे से सोचने की शक्ति भी चली गई सोलह दिन में, मेमोरी, जिससे याद करता है आदमी। तो उन्होंने कहा लाओ खिला दो संतरा-वंतरा का रस दो भाई और दो दिन बाद कहा इधर आना अब बताओ तैत्तिरीयोपनिषद् के उस अध्याय के उसका मंत्र बता दिया। तो उन्होंने कहा बताओ खाने का सम्बन्ध मन से है कि नहीं? हाँ गुरु जी ।

तो शरीर को ठीक-ठीक रखने के लिये भी सामान देना होगा। :- श्री महाराज जी ( भगवद् गीता , भाग -6)

No comments:

Post a Comment