जहां तक गुरु देव की कृपा से मुझे थोड़ा बहुत ज्ञात है वो यह की न तो संसार की कमी से वैराग्य हो सकता है और न संसार मिलने से वैराग्य होगा ।
नही तो कितने गरीबों को संसार से वैराग्य हो गया रहता । किसी बस्तु के आभाव में वैराग्य हो जाता तो करोड़ो को , जिसे दो वक्त की रोटी भी नसीब नही होती , सबको वैराग्य हो गया होता । दुसरा - संसार मिलने पर हम साधारण संसारी जीव को और भी संसार की कामना बढ़ती जाती है । तभी तो अमीर और अमीर बनने के प्रयत्न में लगा रहता है ।
पर जब कोई व्यक्ति किसी सद्गुरु कृपा से यह समझ लेता है कि इस असार संसार में सुख का लवलेस भी नही है तो उसे संसार में रहते हुए वैराग्य अवस्य हो जाता है । संसार का त्याग वास्तविक त्याग या वैराग्य नही है। संसार से मन हटा कर भगवान् मे लगाने का बार बार प्रयास करते हुए एक दिन हरिगुरु कृपा से भगवान में मन लग जाना ही वास्तविक वैराग्य है । वर्णा जब तक संसार से हटाया हुआ मन भगवान् मे न लगेगा तो स्वाभाविक तौर पर मन फिर से संसार में चला जाएगा । क्योंकि मन जो है वो माया का बना है । और नेचुरली यह अपने सजातिये में चला जाएगा । किन्तु यही मन जब बार बार प्रैक्टिस के द्वारा , हरिगुरु के बताए साधना द्वारा संसार से हट कर भगवान् में लग जाएगा तो फिरसे यह संसार में नही लगेगा । अत: मन को संसार से हटाना और भगवान् में लगाना ही साधना है । और जब यह प्रैक्टिस करते करते एक दिन हरिगुरु कृपा से भगवान में लगने लगेगा तो सच्चा वैराग्य हो जाएगा । संसार से मन की आसक्ति का त्याग ही वैराग्य है । संसार को फिजिकली छोड़ देना और मन संसार में ही टीका होना वैराग्य कतई नही हैं
तो संसार से आसक्ति की समाप्ति के लिय सद्गुरुदेव की बताई साधना करनी होगी । भगवान में मन को बार-बार लगाने का अभ्यास करना होगा , अन्य कोइ दुसरा मार्ग नही है ।
मेरी छोटी सी बुद्धि में तो हरिगुरु के कृपा से यही ज्ञान है । राधे राधे ।
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