श्री महाराज जी द्वारा उत्तर :- आज के युग में ऐसा बहुत कम उदाहरण है । न के बराबर ।
मैंने कई बार आप लोगों को बतलाया है कि प्रेम का कोई कारण न हो , फिर भी प्रेम हो , केवल उसे निष्काम प्रेम कहते हैं ?
जिस प्रेम का एक भी कारण हो उसे प्रेम नहीं कहते, इसे स्वार्थ युक्त अटैचमेंट कहते हैं , स्वार्थ आधारित प्रेम कहते हैं ।
सतयुग , त्रेता , द्वापर आदि में संसारी माता पिता का ऐसा अनेको उदाहरण मिलता है शास्त्रों में जिसने अपने संतानों को पाला पोसा बड़ा किया और बिना किसी हिचक के उसे भगवान के निमित्त, गुरू सेवा के निमित्त स्वेक्षा से दे दिया । फिर उससे कोई संबंध नहीं, कोई अटैचमेंट नहीं, कोई लगाव नहीं । लेकिन प्रेम वश दे दिया , इसका परम कल्याण होगा । संतान से निस्वार्थ प्रेम है , उसके कल्याण कि चाह है , इसलिए दे दिया । खूद का कल्याण करेगा तत्पश्चात संसार के अन्य जीवों का भी कल्याण करेगा , इसलिए दे दिया , निज हित , निज स्वार्थ की कामना नहीं है ।
लेकिन कलयुग में ऐसा उदाहरण नहीं है । आज कुछ उदाहरण है भी तो वो वेमनी से ऐसा किया है ।
शंकराचार्य जब आठ वर्ष के थे तो अपनी मां से कहा कि मैं भगवान के निमित्त घर छोड़ना चाहता हूं , मुझे आज्ञा दे दो , मां ने आज्ञा नहीं दी, क्योंकि माता को पुत्र से स्वार्थ युक्त प्रेम था , स्वार्थ ए कि यह मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा, विवाह करेगा , बच्चे पैदा करेगा , वंश वृद्धि करेगा आदि तमाम स्वार्थ जो आज आपलोगों को अपने संतान से है ।
जब बात नहीं बनी तो शंकराचार्य ने योगमाया के बल पर एक लीला किया , महापुरुष थे शंकराचार्य, महापुरुषों की लीला समझना कठिन है, तो शंकराचार्य ने मां के साथ नदी गए स्नान करने के लिए , उनके पैर को एक मगरमच्छ ने पकड़ लिया, अब उन्होंने काफी प्रयास किया उससे पैर को छुड़ाने की लेकिन मगरमच्छ उनको और भी गहरे पानी के तरफ खींचने लगा ( अरे यह सब तो लीला थी , भला किसकी हिम्मत है इस संसार में कि महापुरुष के बिना ईच्छा के उसे पकड़ ले और न छोड़ें ) , तमाम नाटक हुआ , शंकराचार्य ने अपनी मां आर्याम्बा ( शंकराचार्य कि मां का नाम है आर्याम्बा ) से कहा अगर मुझे संन्यासी बनने कि आज्ञा नहीं दोगी तो ए मगरमच्छ मुझे नहीं छोड़ेगा , मेरा जीवन लीला अभी समाप्त हो जाएगी ।
तब शंकराचार्य के मां आर्याम्बा को मजबूरी में आज्ञा देना परा । यहां भी शंकराचार्य कि मां ने एक शर्त रख दी , देखो तुमको मेरे अंत समय में मेरे पास आना पड़ेगा अंतिम संस्कार करना पड़ेगा ।
जब कोई वास्तविक सन्यासी बन जाता है तो तमाम संसारिक कर्म धर्म से मुक्त हो जाता है वो, तमाम संसारिक रिश्तो को त्याग कर कोई मनुष्य सन्यासी बनता है । लेकिन शंकराचार्य को अपने मां को बचन देना पड़ा, ठीक है ठीक है , मैं आऊंगा ।
तो आज इस कलयुग में तो एक भी माता पिता ऐसा नहीं जो स्वेक्षा से अपने सन्तान को हरि और गुरू के निम्मित कर दे ।
अगर कोई छोड़ता भी है तो वेमनी से। उसको तो खूश होना चाहिए कि उसकी संतान परम कल्याणकारी मार्ग पर जा रहा है, वो भगवान का संतान है , भगवान के निमित्त जा रहा है ।
अरे मनुष्य से ज्यादा निस्वार्थ प्रेम तो जानवरों को है अपने संतान से । इस मामले में जानवरों के माता पिता का स्थान मनुष्य से कहीं ऊंचा है ।
भगवान ने जानवरों को भी स्वाभाविक गुण दिया है , ममता का , दया आदि का ।
गाय भैंस बाघिन भालु बंदरिया , कुतिया बिल्ली आदि को आपलोग रोज देखते हैं । बच्चे को जन्म देते ही उसको चाट चाट कर गर्भ के मल को साफ करती है, सेवा करती है , उसकी रक्षा करती है , उसको दुध पिलाती है, पाल पोस कर योग्य बना देती है फिर उसे छोड़ देती है दुनियां में बिना किसी हिचक के , कोई अपेक्षा नहीं , कोई स्वार्थ नहीं , कोई अटैचमेंट नहीं ।
कोई कामना या कंप्लेन नहीं कि मैंने इसको जन्म दिया है, इसको अपना दुध पिलाया है , इसको पाला है , रक्षा कि है मैंने , अब ए बड़ा होकर मेरी रक्षा करें , मेरा ख्याल रखें , मेरी सेवा करें , अब यह मेरा स्वार्थ पुरा करें ! ऐसा कोई स्वार्थ जानवर माता पिता में नहीं है । इस दृष्टि से जानवर का अपने बच्चे से निस्वार्थ प्रेम कहा जाएगा ।
तो मनुष्य में तो ऐसा एक भी माता पिता नहीं मिलेगा संसार में जो निस्वार्थ प्रेम करें अपने संतान से और उसकी संतानें भी निस्वार्थ प्रेम करें अपने मां बाप से ।
मनुष्य में संसारिक प्रेम केवल स्वार्थ पर टीका होता है, संसार में जबतक एक दुसरे से स्वार्थ पुरा हो रहा है तथा भविष्य में भी पुरा होने कि संभावना है , उम्मीदें हैं , अपेक्षा है , आशा है तब तक प्रेम है , स्वार्थ खत्म प्रेम खत्म ।
इस ब्रह्यांड में केवल महापुरूष और भगवान हीं जीव से निस्वार्थ प्रेम करता है और जीव से भी यही अपेक्षा करता है कि वो भी उनसे निस्वार्थ प्रेम करें । निष्काम प्रेम करें ।
भगवान ने बिना किसी स्वार्थ के बिना किसी भेद भाव के संसार के तमाम जीवों के लिए हवा , पानी , पृथ्वी , भोजन कि व्यवस्था कर दिया , जन्म लेने के लिए शरीर दिया, मां का गर्भ बनाया , उसके लिए मां के स्तन में दूध बना दिया समय पर इस प्रकार तमाम उपकार है हमारे उपर भगवान का, वो भी बिना किसी स्वार्थ के ।
उसी प्रकार एक शरणागत शिष्य के कल्याण के लिए बिना किसी स्वार्थ के गुरू क्या क्या भगीरथ प्रयास करता है वो तो भगवद् प्राप्ति के बाद हीं जीव को पता चलता है ।
आप क्या देते हैं गुरू को ? जो देते हैं वो सब मायिक वस्तूए है , उसकी कोई जरूरत नहीं, उपयोग नहीं किसी वास्तविक महापुरूष को , फिर भी वो आपसे इस हाथ लेकर उस हाथ से आपके हीं निम्मित खर्च कर देता है और आपके ही लाचार भाई बंन्धूओं के सेवा में लगा देता है ।
लेकिन महापुरूष आपको जो देता है उसका मुल्य तो कभी आप चुका हीं नहीं सकते । चाहे वो आप स्वर्ग सम्राट बन कर स्वर्ग का भी दान कर दो ! गुरू और भगवान के ऋण को कोई नहीं चुका सकता ।
श्री महाराज जी के एक प्रवचन श्रृंखला का सार, पुर्व सुने हुए मेमोरी के आधार पर । :- संजीव कुमार
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