***********भोजन और भजन *************
नारद भक्ति दर्शन में नारद जी ने एक सूत्र बनाया-
निरोधस्तु लोक वेद व्यापारन्यासः।
निरोध किसे कहते हैं? 'लोक वेद व्यापारन्यासः' लौकिक वैदिक दोनों प्रकार के कर्मों का न्यास। न्यास क्या है ? तो न्यास कहते हैं 'भगवति समर्पणं न्यासः ।' न्यास शब्द का एक अर्थ तो आप लोग जानते ही होंगे - त्याग, संन्यास। सम् उपसर्ग है और न्यास शब्द है। संन्यासी लोग घर-वर सब छोड़ देते हैं। तो न्यास माने त्याग - लौकिक-वैदिक कर्मों का त्याग कर देना। ये है निरोध। लौकिक-वैदिक कर्म का त्याग हो जाय, उसकी कामना ही गई।
लौकिक कर्म भी, वैदिक भी। लौकिक कर्म से संसार के विषयों की कामना हम करते हैं और वैदिक से स्वर्गादि लोकों की कामना करते हैं। यज्ञ करो, स्वर्ग मिलेगा। ये करो तो स्वर्ग मिलेगा। तो लौकिक भी, वैदिक भी, दोनों कर्मों का त्याग हो जाय ।
लेकिन, कुछ तो कर्म करने पड़ेंगे। कौन-सा ऐसा भक्त और ज्ञानी है जो कर्म रहित हो जायेगा ? साँस लेगा? हाँ। देखेगा ? हाँ। चलेगा-फिरेगा ? हाँ-हाँ, हाथ-पैर होगा तो चलेगा-फिरेगा। कुछ खायेगा-पीयेगा ? अरे साहब! खाता तो परमहंस भी है। 'पश्वादिभिश्चाविशेषात्।' ब्रह्मसूत्र बनाया गया है वो। तो जैसे पशु वगैरह के लिए खाना आवश्यक है ऐसे ही परमहंस के लिए भी खाना आवश्यक है, शरीर जब तक रखेगा तब तक उसको शरीर सम्बन्धी सामान देना होगा। सब विटामिन प्रोटीन । अगर कहीं गड़बड़ किया तो नेचर दण्ड देगा फिर हरे राम की जगह हरे सिर, हरे पैर, हरे पेट बोलेगा। अरे, कष्ट होगा शरीर में तो फिर उसका चिन्तन करेगा। अरे दो दिन, चार दिन, दस दिन, बीस दिन धींगा-मुश्ती चल जायेगी, हमेशा थोड़े चलेगी।
एक बार गौतम बुद्ध निराहार होकर के ध्यान कर रहे थे, निराहार। कई दिन हो गये तो चक्कर आने लगे। तो कुछ गाँव की स्त्रियाँ गाती हुई जा रही थीं- गाना। उस गाने का आशय ये था कि तानपूरे के तारों को कस कर बजाओ। आप लोगों ने देखा होगा, तानपूरा। उसको कसने को खूँटियाँ लगी होती हैं। गवैये लोग काफी देर तक कस के पहले उसका स्वर- वर मिलाते हैं। अगर वो ढीला रहेगा और आप उँगली चलायेंगे तो आवाज ही नहीं आयेगी। तो तार को कसो लेकिन इतना न कसो कि तार टूट जायें- ये गाना था। तो महात्मा बुद्ध के कान में वो शब्द पड़े तो उन्होंने कहा- ये बेपढ़ी-लिखी गँवार स्त्रियाँ भी कितनी बढ़िया बात कह रही हैं कि बिना कसे ना बजाओ लेकिन इतना न कसो कि तार ही टूट जाय यानी -
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ (गीता ६.१६)
इसी बात को गीता में भगवान् ने अर्जुन से कहा कि अनाप शनाप खाने से भी साधना नहीं होगी और खाना एकदम छोड़ दोगे, इससे भी साधना नहीं होगी
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ (गीता ६.१७)
आगे नारद जी भी एक सूत्र लिखे हुए हैं इसी के लिए,
बाकायदा-
लोकोऽपि तावदेव किन्तु भोजनादिव्यापारस्त्वाशरीरधारणावधि । (नारद भ. सू. १४)
तो निरोध ये कि लोक-वेद दोनों प्रकार के फल देने वाले जो भी कर्म हैं, उनको हम त्याग दें, लेकिन कुछ कर्म ऐसे हैं शारीरिक कर्म जिसे कहते हैं वो करने पड़ेंगे। सबको करने पड़ेंगे -
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । (गीता १८.११)
सारे कर्मों का त्याग कोई देहधारी नहीं कर सकता। तो जितने कर्म कम से कम आवश्यक हैं, उतने कर्म आप कीजिये लेकिन थोड़ा-सा उसमें करेक्शन कर दीजिये। ये कर्म जो आप कर रहे हैं ये भगवान् को अर्पण करके प्रसाद रूप में स्वीकार कीजिये ।
चलो, सबसे जो बेकार का कर्म है, उसकी बात करते हैं। नींद आ रही है, सोना चाहिये। सोना चाहिये ? ये सोना एक कर्म है, नींद लेना एक कर्म है। अब हम सोने चले, अपने सुख के लिये ? नहीं। होशियार हो जाओ यहीं पर, अपने सुख के लिये नहीं। नींद आयेगी तो सपना होगा तो श्यामसुन्दर मिलेंगे, उनकी लीलाएँ देखेंगे। हे श्रीकृष्ण ! आज ऐसी कृपा करना, नींद में तुम खूब हमको दिखाई पड़ो। ये सोच के सो जाओ। ये आपका सोना भी हो गया स्पिरिचुअल अथवा ये सोच लो- जल्दी सो जायें ताकि सबेरे ब्राह्म मुहूर्त में उठकर श्रीकृष्ण भक्ति करें और अगर सोयेंगे नहीं तो फिर शरीर ठीक नहीं रहेगा तो फिर श्रीकृष्ण सेवा वाली बात हमारी बिगड़ जायेगी। चलो, ऐसा सोच लो, यानी अपने प्रत्येक कार्य भगवान् को अर्पित करो फिर प्रसाद लो। उद्धव सरीखे ज्ञानी परमहंस ने कहा श्रीकृष्ण से
त्वयोपभुक्तस्रग्गंधवासोऽलंकारचर्चिताः ।
उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेमहि ॥ (भागवत ११.६.४६)
आपका उच्छिष्ट सब सामान मालायें, वस्त्र, आभूषण, इत्र, सबका सेवन करेंगे। आपको चढ़ाकर, देकर, समर्पित करके प्रसाद रूप में उसको ग्रहण करेंगे तो वो हानिकर तो होगा ही नहीं अपितु इतना लाभकर हो जाएगा कि 'तव मायां जयेमहि।' चैलेंज कर रहे हैं उद्धव परमहंस, आपकी माया जो आपकी पॉवर के बल पर अकड़ा करती है । -
शिव चतुरानन देखि डेराहीं
उस पर विजय प्राप्त कर लेंगे हम महाराज ! केवल प्रसाद सेवन से, यानी समर्पित किया और फिर सेवन किया। हर क्रिया में। खुजली हो रही है, अब खुजलाने चले। ध्यान रखो, अपने सुख के लिये न खुजलाओ। खुजा रहे हैं। हँ ऽ वो खड़े हैं, उनको हँसी आ रही है, हँसो हम खूब खुजा
लेंगे और हँसो। किसी न किसी बहाने से हम उनको सामने खड़ा रखें। कोई भी क्षण हमारे लिए कोई कर्म का ऐसा न हो कि उनको माइनस करके हम कर्म कर अकेले कर्म किया कि बँध गये, मरे। हर कर्म में। हैं। बस,
इस सूत्र का एक अर्थ और भी कुछ महात्माओं ने किया है। वो कहते हैं - लौकिक कर्म भी करो, वैदिक कर्म भी करो लेकिन वो जो यहाँ न्यासः कहा गया है, तो वो कहते हैं भगवान् को समर्पित कर दो। जैसे- हम रागानुगा भक्ति के अनुसार आपको बता रहे हैं कि जितने में काम चल जाय ऐसे शारीरिक कर्म करो लेकिन उसको भी समर्पित करके प्रसाद रूप में। और वे लोग जो इस सूत्र का अर्थ करते हैं, कर्मयोगी लोग, वो कहते हैं कि वेद के अनुसार और लोक के अनुसार कायदे-कानून से सब कर्म करो लेकिन भगवान् को अर्पित करके करो। उनको अर्पित करो यानी हर कर्म के समय उनका स्मरण हो। अपने में कर्तृत्व की बुद्धि न आने पाये। मैं कर्ता हूँ, ऐसी फीलिंग न हो।
No comments:
Post a Comment