Tuesday, 29 June 2021

मेरा संस्मरण ,

मेरा संस्मरण :- 
किस प्रकार सदगुरू जीव को उसके जन्म से पहले और फिर उसके बाद अपने शिष्य को संभालते हैं प्रेरणा देते हैं और दिलवाते भी हैं संसार के महान जीवों के द्वारा भी !
किस प्रकार गुरू अपने लीला संवरण के बाद सर्वव्यापक होकर सबका कल्याण करतें हैं !

युवाओं को और हमारे भाई बहनों को मैं वहीं कहना चाहता हुं जो मुझे 1988 में बाबा आमटे ने विवेकानन्द पुरम कन्याकुमारी में कहा था ।

 उस दिन से मेरी उच्श्रृखंलता, चंचलता समाप्त हो गई और मैं अपने कोर्स के अलावा अच्छी अच्छी पुस्तकों को पढ़ने का आदत शामिल कर लिया अपने जीवन में । और करीब लगभग दो हजार से उपर पतली व मोटी पुस्तके/पत्रिकाएं पढ़ी है आज तक , इसमें मेरे गुरूदेव की चालिस से अधिक पुस्तकें और लगभग साठ से उपर पत्रिकाएं भी शामिल है ।
यह कैसे हुआ तो बाबा आमटे और डॉ सुब्बाराव साहब ( भाई जी कहतें है सभी इनको ) के प्रेरणा से । और इनकी प्रेरणा ने संसार में मेरे जीवन की दिशा बदल दी थी । मैं जीवन को एक गंभीर अध्ययन बना लिया , दुसरे को सिखाने के लिए नहीं वल्कि खुद को पहले संवारने के लिए । वर्णा मेरा भी जीवन आम हो जाता , मजाक हो जाता , फुहर हो जाता ।
दुसरा सबसे बड़ा आत्मिक और मानसिक , बैचारिक या आध्यात्मिक परिवर्तन श्री कृपालु जी महाप्रभु एवं पूज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी से मिलने के बाद हुआ । 
ऐसा लगता है कि मेरा जीवन भी जन्म से पहले ही विल्कूल प्रोग्राम्ड था श्री कृपालु जी महराज जी द्वारा ।

श्री कृपालु महाप्रभु श्री गुरूदेव हीं मेरे जीवन का पुरा रोड मैप पहले से तैयार कर रखा था और अपने मिलाने से पहले मुझे अध्ययन के मामले में एकाकी बनाया , हर तरह के अच्छी से अच्छी शिक्षा , पुस्तकों द्वारा हीं नहीं वल्की संसार में भी महान लोगों के सानिध्य के द्वारा और फिर बाद अपने तत्वज्ञान से ओतप्रोत कर दिया ।
इसलिए यह महसूस करता हुं कि गुरू का संबंध एक जन्म का नहीं होता , यह रिस्ता जन्म जन्मांतर का होता है । 
 मैं विवेकानन्द पुरम में कुछ दिन प्रत्येक शाम समुद्र के किनारे बाबा आम्टे के साथ टहलता था ।
एक शाम टहलते हुए उन्होंने मुझसे कहा था उस समय मै छात्र था कौलेज में , एन एस एस में था । " अच्छी अच्छी पुस्तकें पढ़ने की आदत डालो , इससे सोंच अच्छी और उदार होगी , चरित्र और संस्कार का निर्माण होगा, जीवन को सही दिशा मिलेगा, सही दृष्टिकोण बनेगा , वृत्ति शुद्ध होगी जिससे प्रवृत्ति उदार और संयमित होगा । भोगवादी संस्कृति से उपर उठोगे और अपने जीवन को शांती मय बना पाओगे "
" इससे आचरण बदलेगी, और खुद बदल जाओगे ,आचरण बदलेगा तो तुम्हारे कथनी और करनी में फर्क नहीं दिखेगा । इससे परिवार अच्छा होगा , परिवार अच्छा होगा तो समाज भी अच्छा होगा और समाज अच्छा होगा तो राष्ट्र बदलेगा, और फिर दुसरे युवा को भी प्रेरित करो " 

उन्होंने कहा था कि जीवन के अंतिम समय तक स्वध्याय करते रहना चाहिए अच्छी अच्छी पुस्तकों का । लोग सोचते हैं क्या होगा उम्र गुजर गई । अब तो मरना है !

नहीं ऐसा नहीं सोचना चाहिए । जीवन के अंतिम समय में अच्छी अच्छी पुस्तकों का अध्ययन , ध्यान और साधना और बढ़ा देना चाहिए । जिससे अंत गति अच्छी होती है और एक नया बढ़िया शरीर मिलता है एक अच्छे संस्कारों के साथ नया जीवन मिलता है । आत्मा दुसरा शरीर धारण कर लेता है और यह एक युग पुरूष के निर्माण की प्रक्रिया है इसमें कई जन्म लेने परतें हैं अध्ययन शील साधक को । 

अब तो श्री कृपालु महाप्रभु के पुस्तकों के अध्ययन बार बार और साधना में हीं मन लगता है संसार के काम के बाद और संसार के काम के दौड़ाने भी गुरूदेव हीं हमेशा साथ रहतें हैं । लेकिन इसके लिए जीवन की चंचलता उच्श्रृखंलता को समाप्त करना होता है । नहीं तो ध्यान साधना में ऐसे लोगों को मन नहीं लगता चाहे कितना भी प्रयास कर लें । अंदर से शांत होना होता है गंभीर होना होता है तब सहज ज्ञान उतारा जाता है गुरूदेव के द्वारा अंत:करण में , फिर रूपध्यान सहज बनता है ।

 व्यक्ति केवल हाड़ मांस का पुतला नहीं है वल्कि विचारो का भंडार है । अच्छे विचारों का भंडार होने के लिए, बहुत अच्छे अच्छे विचारकों और महापुरूषों के पुस्तकों का अध्ययन लगातार करना होता है , साधना एवं उनका संग करना परता है । फिजिकल संग ना हो कोई बात नहीं । 
महापुरुषों का पुस्तक हीं उनका विचार होता है उनका निज स्वरूप होता है । उनकी पुस्तकें हीं उनका साकार रूप होता है उनके जाने के बाद ।
 इसलिए उनके पुस्तकों का संग हीं , अध्ययन हीं और उनके बतलाए सिद्धांतों का अनुसरण हीं उनका वास्तविक संग है । वर्णा तो लोग उनके भौतिक स्वरूप के संग होते हुए भी संग नहीं होते वास्तव में , लाभ नहीं ले पाते हैं । 
इसलिए महापुरुष अपने लीला संवरण के बाद और भी व्यापक हो जातें हैं कडोरों को वास्तविक संग देने के लिए अपना विस्तार कर लेतें हैं । जिससे बहुतों का कल्याण होता है । 
आज हमारा सौभाग्य है कि श्री महाराज जी की दो सौ से अधिक पुस्तकें साधकों के लिए उपलब्ध है । और फिर वार्षिक पत्रिकाएं भी है । हम साधकों के लिए बहुत है । और बांकी लोगों के लिए , बहुत से महापुरुषों के पुस्तके हैं ।‌ पढना चाहिए ।
यह मेरा निजी अनुभव है जो चल रहा है लगातार ।
श्री राधे 
 मैंने अपना अनुभव शेयर किया । धन्यवाद ।🙏❤️🙏

मेरी कविता

तुम चले गए इस धराधाम से
पर तुम जा नहीं सकते मेरे अन्तर्मन से 
अटुट प्रेम का सागर उड़ेल कर 
मेरे तन मन में अपना खुशबु उड़ेल कर 
वोलो प्रिय फिर कब आओगे ?
कब फिर मेरे प्राण लौटाओगे ?

सार जगत का मुझको समझाकर ,
अपने निज शीतल स्वरूप दिखला कर 
अलक्षित हो गए तुम जहान से ‌,
पर कैसे जाओगे मेरे अंतर्मन से 

नस नस में विरह की अग्नी बुझाने 
वोलो प्रिय फिर कब आओगे ?
या तो अपने पास बुला लो 
या प्रिय तुम खुद हीं आ जाओ ,

श्री राधे जय जय श्री राधे , बोलो प्रिय तुम कब आओगे ?
( मेरी रचना )

Sunday, 27 June 2021

विश्वास और श्रद्धा को दृढ़ करने का आधार है तत्वज्ञान,

विश्वास और श्रद्धा को दृढ़ करने का आधार है तत्वज्ञान, 
हम लोग इट और कंक्रीट का घर बनाते हैं । तो हम सभी लोग क्या करते हैं छत ढालते समय ? तो सबसे पहले निचे से बांस बल्ला आदि लगा कर सेंट्रीग तैयार करते हैं छत ढालने से पहले , मजबुत सेंट्रींग होना चाहिए जो छत ढालने में कंक्रीट व छड़ के भार को ठीक तरह से संभाल कर उसको नीचे धंसने नहीं दे ।
अब "इक्कीस दिन" बाद जब सिमेंट और क्रंक्रीट का छत मजबुत हो जाता है तब क्या करते हैं । चेक करते हैं कि अब छत इतना मजबुत हो गया है कि वो दुसरे महले का भार भी उठा लेगा या नहीं । तब जाकर उस ढले छत के नीचे बाला बल्ला जो अपने आप ढीला हो जाता है उसको हटा देते है और सेंट्रींग भी निकाल देते हैं । 
क्योंकि अब छत को सहारे का जरूरत नहीं ।

ठीक उसी प्रकार भगवान और गुरू पर दृढ़ विस्वास रूपी छत को पक्का करने के लिए , मजबुत करने के लिए तत्वज्ञान रूपी बांस बल्ले और सेंट्रींग की बहुत आवश्यकता है । 
जब गुरू और भगवान पर श्रद्धा और विश्वास रूपी छत जम जाए , मजबुत हो जाती है तब ज्ञान रूपी बांस बल्ले और सेंट्रींग की जरूरत नहीं होती ।
तक वो कंक्रीट रूपी दृढ़ विश्वास, ‌‌श्रद्धा रूपी सिमेंट के साथ इतना मजबूत हो जाता है कि उसको अब ज्ञान रूपी बांस और सेंट्रींग रूपी पुस्तकों का जरूरत नहीं परती । 
तब मजबुत छत पर प्रेम रस अनुभव होने लगता है थोड़ा थोड़ा , फिर प्रेम रूपी अनेक महला खड़ा होने में देर नहीं लगता । श्री राधे । 🙏❤️🙏 आपका संजीव कुमार रांची ।( मेरे ब्लौग से )

Wednesday, 23 June 2021

”मुजरिम कौन ?"एक बार सत्संग के दौरान एक आदमी ने खड़े होकर एक संत से विनती करते हुए अपनी किसी भूल की क्षमा माँगी ।

”मुजरिम कौन ?"
एक बार सत्संग के दौरान एक आदमी ने खड़े होकर एक संत से विनती करते हुए अपनी किसी भूल की क्षमा माँगी । अपनी दीनता को दर्शाते हुए उसने अपने गले में जूतों की माला डाल रखा था । संत ने उससे पूछा कि शरीर को सज़ा देने का क्या फ़ायदा अगर असली मुजरिम मन, आज़ाद घूमता फिरे ? 
अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए संत ने यह कहानी सुनाई ।

एक स्त्री ने एक बकरा और एक बन्दर पाल रखा था और उन दोनों को उसने घर के पास बाँधा हुआ था । एक दिन उसने बड़े प्रेम के साथ खाना बनाया और दही लेने के लिए बाज़ार चली गई । बन्दर ने अपने हाथों से अपनी रस्सी खोलकर, रोटियाँ खाकर बकरे की रस्सी खोल दी और अपने गले में उसी तरह अपनी रस्सी डाल ली । जब वह स्त्री वापस आयी तो देखा कि खाना नहीं है और बकरा खुला फिर रहा है । लगी बकरे को मारने । कोई सज्जन यह सब देख रहा था । उसने कहा कि यह बकरा बे-क़सूर है, सारा क़सूर उस बन्दर का है ।

सो अपनी कामना पूरी करने के लिए यह मन-रूपी बन्दर सबकुछ कर लेता है ।
असली क़सूर तो मन का होता है लेकिन सज़ा बेचारे शरीर को भुगतनी पड़ती है ।

मन लज्जत का आशिक़ है । जब इसे पहले से कोई अच्छी चीज़ मिल जाये तो यह 
पहली को छोड़ देगा, और दूसरी के पीछे दौड़ेगा....
इसे चाहे दुनिया की करोड़ों लज्ज़ते दे दें
पर मन फिर भी वश में नहीं आता ।
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तो अगर जीवन में शांती और शकुन चाहिए तो...संतोषम् परम सुखम का मार्ग अपनाना होगा मन को शांत करके । 
भगवान से भी किसी भी कामना का पूर्ण त्याग करना होगा । 

और केवल अपने गुरू से प्रेम करना होगा "निष्काम प्रेम "। तभी आध्यात्म भी सही होगा और संसार भी । 
ये सब पीछला जन्म और अगला जन्म की चिंता से मुक्त होना होगा । जितना बन परे परोपकार के लिए दान कर दिजिए अगर है तो, नहीं है तो दान ले लिजिए। छिनिए नहीं किसी से , घुस नहीं , डकैती नहीं , किसी का शोषण नहीं , किसी के हक को मारना गंभीर पाप है । 
ऐसे भी संसार में जितना भी धनार्जन वाले हैं वो सब दान से प्राप्त धन से हीं अपना निर्वाह करतें हैं , यहां तक तो ठीक है, यह धनोपार्जन जीवन के लिए जरूरी है , पर जो व्यापारी अपने व्यापार द्वारा या नौकरी में जो गृहस्थ अनैतिक रूप से धन अर्जित करते हैं इनकी अंत गति अच्छी नहीं होती ।
अब नौकड़ी या व्यापार करने वाला कहेंगें की नहीं भाई हम तो मेहनत करते हैं , हमारी अपनी काबिलियत है , योग्यता है , हम अपने कर्म से कमाते हैं । हां आप कह सकतें हैं पर यह सच नहीं हैं । आप कर्म और कुकर्म में अपने जमीर के तौर पर समीक्षा करेंगे तब समझ जाएगें। 

अब अगर आप यह कहतें हैं कि आप अपनी योग्यता से कमातें हैं तो फिर आप यह कैसे सोंच सकतें हैं कि हम संत के निमित्त भगवान के निमित्त दान करतें हैं ।  
फिर तो मेहनत तो सबसे ज्यादा संत करतें हैं वो भी अपने लिए नहीं परोपकार के लिए और यह उनकी योग्यता है आपसे अनंत गुणा अधिक । वो अपने उपर कुछ भी खर्च नही करतें वल्कि अपना भी लुटा देतें हैं । वो अपनी योग्यता से आपको मोटिभेट करतें हैं, परोपकारी बनाते हैं । दयालु बनातें हैं मानव बनाते हैं । तो यह तो उनका कमाल है आपका नहीं ।
असली कर्मी और महादानी परोपकारी संत होतें हैं पराकाष्ठा का , जैसे श्री कृपालु महाराज जी , भगवान का साकार स्वरूप । A real philanthropist . जिन्होंने अपना सबकुछ दान कर दिया जीव हित के लिए । एक बैंक एकाउंट तो क्या एक लकड़ी का डब्बा भी उनके नाम से नहीं हैं । यहां तक की अपने निज जन यहां तक की तीनों पुत्रियों को भी जीव कल्याण में लगा दिया । इससे बढ़कर और मिशाल क्या हो सकता है भला ??
  🙏🏽☝🏽🙏🏽 पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी ।।

कर्मयोग करें और फल ईश्वर पर छोड़ दें वो भी पूर्ण निष्काम भाव से फिर आप हर समस्या और परिस्थितियों में खुशहाल रह पाएँगे......

कर्मयोग करें और फल ईश्वर पर छोड़ दें वो भी पूर्ण निष्काम भाव से फिर आप हर समस्या और परिस्थितियों में खुशहाल रह पाएँगे......

यह शरीर चाहे कितना भी सुन्दर हो, पत्नी चाहे कितनी भी मनमोहिनी हो, धन चाहे कितना भी सुमेरु पर्वत के सामान असीम हो, चाहे संसार में नाम कितना भी प्रसिद्द हो चूका हो , लेकिन जब तक जीवन प्रदान करने वाले भगवान् श्री हरि के चरणकमलो में मन नहीं लगा... तब तक क्या प्राप्त किया? क्या पाया ? अर्थात भगवान् श्री हरि से विमुख होकर, समस्त संसार की धन-सम्पदा, सुन्दरता, सभी भौतिक सुख प्राप्त हो जाए, फिर भी व्यर्थ ही है|

एक राजा बहुत दिनों से विचार कर रहा था कि वह राजपाट छोड़कर अध्यात्म (ईश्वर की खोज) में समय लगाए । राजा ने इस बारे में बहुत सोचा और फिर अपने गुरु को अपनी समस्याएँ बताते हुए कहा कि उसे राज्य का कोई योग्य वारिस नहीं मिल पाया है । राजा का बच्चा छोटा है, इसलिए वह राजा बनने के योग्य नहीं है । जब भी उसे कोई पात्र इंसान मिलेगा, जिसमें राज्य सँभालने के सारे गुण हों, तो वह राजपाट छोड़कर शेष जीवन अध्यात्म के लिए समर्पित कर देगा ।
गुरु ने कहा, "राज्य की बागड़ोर मेरे हाथों में क्यों नहीं दे देते ? क्या तुम्हें मुझसे ज्यादा पात्र, ज्यादा सक्षम कोई इंसान मिल सकता है ?"
राजा ने कहा, "मेरे राज्य को आप से अच्छी तरह भला कौन संभल सकता है ? लीजिए, मैं इसी समय राज्य की बागड़ोर आपके हाथों में सौंप देता हूँ ।"
गुरु ने पूछा, "अब तुम क्या करोगे ?"
राजा बोला, "मैं राज्य के खजाने से थोड़े पैसे ले लूँगा, जिससे मेरा बाकी जीवन चल जाए ।"
गुरु ने कहा, "मगर अब खजाना तो मेरा है, मैं तुम्हें एक पैसा भी लेने नहीं दूँगा ।"
राजा बोला, "फिर ठीक है, "मैं कहीं कोई छोटी-मोटी नौकरी कर लूँगा, उससे जो भी मिलेगा गुजारा कर लूँगा ।"
गुरु ने कहा, "अगर तुम्हें काम ही करना है तो मेरे यहाँ एक नौकरी खाली है । क्या तुम मेरे यहाँ नौकरी करना चाहोगे ?"
राजा बोला, "कोई भी नौकरी हो, मैं करने को तैयार हूँ ।"
गुरु ने कहा, "मेरे यहाँ राजा की नौकरी खाली है । मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे लिए यह नौकरी करो और हर महीने राज्य के खजाने से अपनी तनख्वाह लेते रहना ।"
एक वर्ष बाद गुरु ने वापस लौटकर देखा कि राजा बहुत खुश था । अब तो दोनों ही काम हो रहे थे । जिस अध्यात्म के लिए राजपाट छोड़ना चाहता था, वह भी चल रहा था और राज्य सँभालने का काम भी अच्छी तरह चल रहा था । अब उसे कोई चिंता नहीं थी ।
इस कहानी से समझ में आएगा की वास्तव में क्या परिवर्तन हुआ ? कुछ भी तो नहीं! राज्य वही, राजा वही, काम वही; दृष्टीकोण बदल गया ।
इसी तरह हम भी जीवन में अपना दृष्टीकोण बदलें । मालिक बनकर नहीं, बल्कि यह सोचकर सारे कार्य करें की, "मैं ईश्वर कि नौकरी कर रहा हूँ" अब ईश्वर ही जाने । और सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दें । तब ही हम हर समस्या और परिस्थिति में खुशहाल रह पाएँगे । आपने देखा भी होगा की नौकरों को कोई चिंता नहीं होती मालिक का चाहे फायदा हो या नुकसान वो मस्त रहते हैं । सब छोड़ दो वही जानें!!!!
श्री राधे ।

Wednesday, 16 June 2021

दुसरा प्रश्न था आप सभी से कि :- त्रेता में भगवान राम अन्य राक्षसों को लक्षमण जी द्वारा , हनुमान जी , जामबंत जी , सुग्रीव जी द्वारा और अपने नर बानर सेना आदि से मरवाए पर रावण और कुंभकरण को स्वयं मृत्यु दे करके अपना लोक प्रदान कर दिए, इसके पीछे क्या कारण हैं ? ( वो दोनों जय विजय उनका द्वारपाल थे इसके अलावे उत्तर चाहिए ) श्री महाराज जी के तत्वज्ञान के आधार पर उत्तर दिजिए ।

अब दुसरे प्रश्न का उत्तर :-
दुसरा प्रश्न था आप सभी से कि :- त्रेता में भगवान राम अन्य राक्षसों को लक्षमण जी द्वारा , हनुमान जी , जामबंत जी , सुग्रीव जी द्वारा और अपने नर बानर सेना आदि से मरवाए पर रावण और कुंभकरण को स्वयं मृत्यु दे करके अपना लोक प्रदान कर दिए, इसके पीछे क्या कारण हैं ? 
( वो दोनों जय विजय उनका द्वारपाल थे इसके अलावे उत्तर चाहिए ) 
श्री महाराज जी के तत्वज्ञान के आधार पर उत्तर दिजिए । 

उत्तर :- दो चार भाई और बहन ने तत्वज्ञान के दृष्टिकोण से उत्तर दिय थे सही था , बस उसको और थोड़ा गहराई से मैं उत्तर लिख देता हुं । श्री महाराज जी के कृपा से । जो निम्नलिखित हैं :- 
तत्वज्ञान के दृष्टि से पहले समझते हैं :- भगवान जब भी धरा धाम पर अवतरित होते हैं अपने परकीया लीला ( व्यवहारिक लीला) में तो उसका बहुत बड़ा उद्देश्य और हर लीला का अलग अलग प्रकार होता है । और उनके आने से पहले उनका खास परिकर आ जाते हैं उनके लोक से , कोई निगेटिव रोल के लिए तो कोई पौजिटीव रोल के लिए । नहीं तो लीला होगी हीं नहीं । और यह लीला संसार के लोगों को राजयोग , ज्ञानयोग और भक्तियोग का व्यवहारिक सिद्धांत सिखाने के उद्देश्य से होता हैं ‌ , जिससे अलग अलग प्रकार के भाव वाले को उनके अपने अपने मार्ग के हिसाब से ज्ञान मिल जाए । रास्ता मिल जाए ।

तो भगवान श्री राम के रूप में अवतार लिए । उनको मर्यादा भी स्थापित करना था संसार में । मर्यादा पुरुषोत्तम बन कर आए । उच्च आदर्श जैसे आदर्श पति , बेटा , भाई , राजा आदि की स्थापना ।

तो अब उनके परम प्रिय भक्त आदि, जो उनके साथ उनके लोक को प्राप्त कर चुका भक्त , जो उनके सेवा में वहां रहते हैं उनको ही नीचे भी अलग अलग रोल निभाने का सेवा मिलता है । उनके सभी ऐसे भक्तों में तत्वज्ञान भरा रहता है चाहे वो किसी भी रोल में आए और जाए पृथ्वी पर उनके लीला में सहायता करने ।

अब रामावतार में भगवान स्वयं ही सीता बन गए । और स्वयं हीं तीनों भाई बन कर आ गए ।

"एकं सत् विप्रा बहुधा बदंती " एक भगवान अनके बन कर आ गए ।

१.स्वयं भरत रूप में निस्वार्थ भक्ति की पराकाष्ठा रूपी भक्ति करने का तरिका सिखाए भक्ति मार्गी जीव को कि निष्काम भक्त कैसा होता है कैसे करना चाहिए ।
२. खुद लक्ष्मण रूप में छोटे भाई बन कर दास भाव भक्ति अंगिकार किया और सिखाए दास भाव भक्ति मार्गी को कि कैसे किया जाता है ।
३. स्वयं सीता बन गए और समर्था रति का भक्ति सिखाया संसार को ।
४. स्वयं शत्रूघ्न बन कर आए , सबसे छोटे भाई के रूप में और सिखाया की कैसे आदेश का पालन करके भरत जैसे भक्त का भी दास यानि दास का भी दास कैसा होना चाहिए ?

अब आइए उनका सेबक , द्वारपाल जय विजय को मिला निगेटिव रोल निभाने का आदेश ।
पौजीटिव रोल निभाना तो फिर भी आसान है लेकिन निगेटिव रोल निभाना, वो भी उनके अनन्य दास के लिए कितना पीड़ा दायक होगा इसकी कल्पना हम आज भी नहीं कर सकते ।
हम लोग जीरो वाला भक्त हैं तो जरा सा कोई दो बात बोल देता है आज , अपमान कर देता है तो तिलमिला जाते हैं । कोई तत्वज्ञान पर बात भी करता है सही सही , तो उससे जलन होता है । नोचने दौड़ते हैं उसको । पर सोचिए जय विजय को यह रोल निभाने में कितनी पीड़ा हुई होगी ? 
पर असली भक्त तो भगवान के आदेशों के पालन के लिए नरक का भी वरण करने को तैयार रहता है ।
जय विजय जानता था कि पुरा विश्व अनंत काल तक उसको गाली देता रहेगा । पर फिर भी वो दोनों भगवान के सुख के लिए रावन और कुंभकरण के रूप में अवतार लिया त्रेता में । हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के रूप में सतयुग के अंत में , और शिशुपाल एवं कंस के रूप में द्वापर में धरा धाम पर आया ।

अब आप पुछेंगे कि भगवान अपने जन को राक्षस का लीडर बनने का आदेश क्यों दिए । तो उत्तर है कि राक्षसों का , दुष्टों के विनाश के लिए । संपुर्ण राक्षसों के विनाश के लिए ।
आप ध्यान से समझिए , रावन तत्वज्ञानी था । एक बार जिसको भगवद् प्राप्त हो जाता है तो उसपर माया कभी फिर अधिकार नहीं कर सकती है और वो दोनों तो सदा से माया से परे उनका द्वारपाल सेवक था । इसलिए दोनों भाई सब जानता था । उस दोनों को भगवान से अनंत प्रेम था ।
 नफरत नहीं था और ना द्वेष था उस रूप में भी । 
सदा से भगवान के लोक में उनका दास बन कर रहने वाले तो हमेशा से माया से परे होते हैं तो उनको भला फिर माया कैसे लग सकती है ? 
और जब वो माया से परे हैं तो उनको माइक दुर्गुणें कैसे लग सकती है । और जब नहीं तो वो काम क्रोध , मद मोह लोभ ईर्ष्या द्वेष कैसे कर सकता है भला । बोलिए आप ही ! 

कुछ लोगों ने अपने उत्तर में लिखा द्वेष था उसको । नहीं नहीं , ऐसा नहीं था दोनों के ह्रदय मे, दोनों के ह्रदय में भगवान राम से केवल और केवल अनन्य प्रेम था, निष्काम प्रेम था । कोई द्वेष नहीं था ।
रावण सब जानता था अंदर से कि सीता जी कौन है और वो एक्टिंग में जिस सीता को हर लाया है वो अग्नी पुत्री हैं ।

आप लोग श्री महाराज जी के बहुत से किताब और सभी प्रवचन को नहीं सुना और सुना भी है तो भुल जाते हैं । और विडियो डालने पर उसको ध्यान से नहीं सुनते , उनके सभी किताब खरिदते नहीं । और लंबा पोस्ट पढ़ते नहीं । केवल लाईक और शेयर ,बस यही हमारा काम है यहां । खुद समझे नहीं पर दुसरे को जनाने की जल्दी है । दुख होता है यह देख कर । और कोई समझाता है तो उसको व्यंग करने लग जाते हैं उल्टे , हम लोग खुद को बड़ा ज्ञानि साबित करने में लगे रहते हैं । यह अहंकार है कि मैं तुमसे बहुत पहले से जुड़ा हुआ पुराना साधक हुं , वो सब समझ गया , सब जानता हुं । अहंकार भरा जा रहा है उल्टे हमलोगो में । कोई एक प्रश्न पुछ दे तो टांय टांय फीस । 
और जब कोई सही उत्तर दे देता है तो कहते हैं कि हम तो पहले से जानते थे । जब जानते थे तो उत्तर पहले क्यों नही । और फिर बाद में क्यु जनाते है हम कि हम तो जानते थे जी । 
कितना गलत आदत है हमारा ? मैं उनलोगो को साधुवाद देता हुं जिन्होंने कुछ प्रतिशत सहित हीं सही उत्तर दो दिया । इस प्रश्नोत्तरी से कुछ एक दो असली जिज्ञासुओं को लाभ तो होगा कम से कम । 

गलती से जो संसार समझता है वहीं समझ लिया आप भी कि रावण आदि को द्वेष था राम से , इसलिए राग द्वेष बाला फार्मुला बता दिया आप , यह फार्मुला हम घोर मायाधिन संसारी के लिए लागु है । महापुरूषों के लिए नहीं । महापुरुष लोग केवल प्यार करते हैं उनसे । राग द्वेष का फार्मुला उनके लिए भी लगा देना पुरा गलत है । दो जोर दो ही पांच हो गया है आप से तो आगे सब उत्तर गलत ही होगा । स्वाभाविक है ।

वो तो द्वेष का नाटक किया था रावण कुंभकर्ण दोनों ने , हमको आपको दिखाने के लिए , और सबसे बड़ी बात लंका के सभी राक्षसों के विनाश करवाने में भगवान के अवतार के उद्देश्य को पुरा करने के लिए वो नाटक किया , जो रोल दिया भगवान ने वो निभाया उन दोनों ने ।
अगर वो नाटक करने के दौरान शरेंडर कर देता या खुद पहले आ जाता मरने तो तमाम राक्षसों का विनाश कैसे होता । इसलिए वो सभी को मरवा दिया पहले ।
और देखिए जानबुझ कर विभिषण को लात मार कर राज्य से मुक्त कर के भगवान के पास भेज दिया क्योंकि वो धर्मराज का अवतार भगवान का भक्त विभिषण था । 
अगर वो लात नहीं मारता भरी सभा में और बोल देता कि हे मेरे‌ प्यारे भाई मैं और तुम तो जानते हैं कि तुम भगवान का भक्त हो , यहां से निकल जाओ , उनके शरण में चले जाओ तो फिर उसका पुत्र आदि मेघनाथ असुर आदि सचेत हो जाता और भाग जाता । 
पर रावण को तो तमाम असुरों के विनाश के बाद श्री लंका में विभिषण के रूप में धर्म राज के शासन के स्थापना के उद्देश्य में भगवान का मदद करना था ।

इसलिए महापुरुष था रावण और कुंभकरण व विभिषण, मंदोदरी आदि । 
इसलिए यह सब नौटंकी करना परा उन सभी को ।

अब आइए मेघनाथ जो भक्त नहीं था , महापुरूष नहीं था , कर्मकांडी में महान था वो सब का विनाश लक्ष्मण जी आदि से हुआ । 
पर एक परम भक्त को कोई दुसरा परम भक्त कैसे मार सकता है भला । यह नियम नहीं है भगवन के यहां ।
इसलिए रावण कुंभकर्ण को भगवान स्वयं मारे । 
क्योंकि सभी भक्त महापुरुष भगवान से अनन्य निष्काम प्रेम करता है ‌जो उनके लोक से आता है । माया से परे होता है अंदर से और वो भी भगवान की शक्ति योगमाया से हीं काम करता है अवतार काल में ।

अब आइए व्यवहारिक पहलु पर भी ध्यान देते हैं ।
तो चुंकि भगवान का रामवतार संसार के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम अवतार था ।
इसलिए उनको युद्ध के मैदान में मर्यादा धर्म का भी पालन करते हुए श्री लंका के राजा को , संसार के सामने मृत्यु दंड देने का विधान रूपी फर्ज भी स्वय निभाना था ।

राम के चरण पादुका अयोध्या के गद्दी पर आसीन था । इसलिए वो वनवासी होने के बाबजूद भी राजा भी थे ।
एक राजा को वो भला अपने दास भाव के भक्त लक्ष्मण जी के हाथों कैसे मृत्यु देते और अपना लोक भेजते । यह मर्यादा के खिलाफ था ।
इसलिए उनको दोनों दृष्टियों से लीला करना था ।
यही कारण था ।

मैने भी विना किसी कि सहायता लिए यह उत्तर दिया है पहले से दिमाग में भर दिए हैं श्री महाराज जी । जो श्री महराज जी कि कृपा से प्राप्त तत्वज्ञान है उसके आधार पर मैंने लिखा । श्री महराज जी साक्षी है । इसका उत्तर देने में मैंने किसी से कोई सहायता नहीं लिया है । श्री महाराज जी का चिंतन से प्राप्त कृपा बल से मैं लिखा । किसी प्रकार के त्रुटि के लिए क्षमा करेंगें । आप सभी के चरणो में नमन । 
श्री राधे । 
आपका संजीव कुमार ।


Tuesday, 15 June 2021

अगरबत्ती जलाना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी खतरनाक और सनातन धर्म शास्त्रों में पुरी तरह बर्जित है सनातन धर्म पुरी तरह वैज्ञानिक हैं । तो फिर इसका उपयोग क्यों ?

अगरबत्ती जलाना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी खतरनाक और सनातन धर्म शास्त्रों में पुरी तरह बर्जित है सनातन धर्म पुरी तरह वैज्ञानिक हैं । तो फिर इसका उपयोग क्यों ? 
तो बड़े बड़े पंडित ज्योतिषों , मंदीर प्रशासनों का यह धर्म नहीं कि इसको जलाने से रोके लोगों को जागरूक करें । 
सभी मंदीरो में बड़ा बड़ा बोर्ड लगा दें कि हमारा शास्त्रों में अगरबत्ती निषिद्ध है । 

बांस को जलाने से हो सकता है यह बड़ा नुकसान, जान लीजिए धार्मिक और वैज्ञानिक कारण :- 
आप सब सभी तरह के लकडियों को जलते हुए देखा होगा, लेकिन क्या कभी बांस को जलते हुआ देखा है? हां, तो सिर्फ दुघर्टनाओं में। वह इसीलिए, क्योंकि भारत में बांस को जलाया नहीं जाता है। धार्मिक कारण के चलते वैसे तो बांस को नहीं जलाते है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा वैज्ञानिक कारण भी है। हम अक्सर शुभ और अशुभ कामों के लिए विभिन्न प्रकार के लकडियों को जलाने में प्रयोग करते है लेकिन क्या आपने कभी किसी काम के दौरान बांस की लकड़ी को जलता हुआ देखा है। जिसके कारण क्या हैं, आप जानेंगे।

भारतीय संस्कृति, परंपरा और धार्मिक महत्व के अनुसार, हमारे शास्त्रों में बांस की लकड़ी को जलाना वर्जित माना गया है। यहां तक की हम अर्थी के लिए बांस की लकड़ी का उपयोग तो करते है लेकिन उसे चिता में जलाते नहीं।

 हिन्दू धर्मानुसार बांस जलाने से पितृ दोष लगता है वहीं जन्म के समय जो नाल माता और शिशु को जोड़ के रखती है, उसे भी बांस के वृक्षो के बीच मे गाड़ते है ताकि वंश सदैव बढ़ता रहे।

बांस को क्यों नहीं जलाते, ये है वैज्ञानिक कारण:-
धार्मिक मान्यता के अलावा बांस को न जलाने की एक बड़ी वैज्ञानिक मान्यता भी है। वैज्ञानिकों के रिसर्च के अनुसार बांस में लेड व हेवी मेटल प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। लेड जलने पर लेड ऑक्साइड बनाता है जो कि एक खतरनाक नीरो टॉक्सिक है। हेवी मेटल भी जलने पर ऑक्साइड्स बनाते हैं। लेकिन जिस बांस की लकड़ी को जलाना शास्त्रों में वर्जित है यहां तक कि चिता मे भी नहीं जला सकते। हम हमेशा अंधानुकरण ही करते है और अपने धर्म को कम आंकते है। जब कि हमारे धर्म की हर एक बातें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार मानवमात्र के कल्याण के लिए ही बनी है। अत: कृपया सामर्थ्य अनुसार स्वच्छ धूप का ही उपयोग करें।

बांस से बनी अगरबत्ती जलाने में भी नुकसान
हम उस बांस की लकड़ी को हमलोग रोज़ अगरबत्ती में जलाते हैं। अगरबत्ती के जलने से उतपन्न हुई सुगन्ध के प्रसार के लिए फेथलेट नाम के विशिष्ट केमिकल का प्रयोग किया जाता है। यह एक फेथलिक एसिड का ईस्टर होता है जो कि श्वांस के साथ शरीर में प्रवेश करता है, इस प्रकार अगरबत्ती की तथाकथित सुगन्ध न्यूरोटॉक्सिक एवम हेप्टोटोक्सिक को भी स्वांस के साथ शरीर मे पहुंचाती है। इसकी लेश मात्र उपस्थिति केन्सर अथवा मष्तिष्क आघात का कारण बन सकती है। हेप्टो टॉक्सिक की थोड़ी सी मात्रा लीवर को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। शास्त्रो में पूजन विधान में कही भी अगरबत्ती का उल्लेख नही मिलता । सब जगह धूप ही लिखा है हर स्थान पर धूप, दीप, नैवेद्य का ही वर्णन है। 

अगरबत्ती का प्रयोग भारतवर्ष में इस्लाम के आगमन के साथ ही शुरू हुआ है। इस्लाम मे ईश्वर की आराधना जीवंत स्वरूप में नही होती, परंतु हमारे यहा होती है। मुस्लिम लोग अगरबत्ती मज़ारों में जलाते है, उनके यंहा ईश्वर का मूर्त रूप नही पूजा जाता।
इसलिए हमारे सनातन धर्म के हरेक मंदीरों में अगरबत्ती जलाना पुरी तरह बंद होना चाहिए । 
सब को जागरूक करना हरेक सनातनी का काम है ।

ऐसे नकली घी तेल कपुर के उपयोग से लक्ष्मी आएगी नहीं , उल्टे जाएगी आपके यहां से डौक्टर के घर । अब हम बात करते हैं घी के बारे में या ( कपुर ) कैम्फर के बारे में ।

ऐसे नकली घी तेल कपुर के उपयोग से लक्ष्मी आएगी नहीं , उल्टे जाएगी आपके यहां से डौक्टर के घर । 
अब हम बात करते हैं घी के बारे में या ( कपुर ) कैम्फर के बारे में । 
मैं आप हीं सब से पुछता हुं । क्या आप अपने मां पिता या बच्चे के कमरे में नकली घी का दीपक जला कर रख सकते हैं ? 
आपका ज़बाब होगा विल्कूल नहीं । कारण की नकली घी में खतरनाक केमिकल होता है । उसी प्रकार ओरिजनल कपुर नौ सौ से हजार रूप्या किलो है ।
नकली कपुर में खतरनाक केमिकल मिला होता है , जिसके जलने पर बड़ी मात्रा में जहरीली गैस निकलती है।
 जिससे घर के सभी लोगो को भारी नूकसान होता है ।
आज 90% लोग अपने घर के मंदीरों में या सार्वजनिक मंदीरों में खुब नकली घी , नकली कपुर नकली तील के तेल का इस्तेमाल करके दीपक जलाते हैं ।
मंदीर में अनेको लोग आते हैं उनको बहुत नुक्सान होता है । 
जब आप अपने मां बाप के कमरे में , या अपने बच्चे के रूम में ऐसा दीपक नहीं जला सकते तो फिर भगवान के प्रति आपकी कैसी श्रद्धा है ? उनके आगे नकली घी नकली कपुर, तेल । घटिया अगरवत्ती , धूप बत्ती जलातें है हर दिन ।
क्या हमें अपने ईष्ट से प्यार नहीं ? अरे मंदीर में हजारों लोग आते हैं प्रति दिन , लाखों लोग आते हैं । वहां के वातावरण को क्यों प्रदुषित करते हैं आप लोग ? पांच सौ प्रति लीटर से उपर आता है तिल का तेल । अच्छा घी छ सौ प्रति किलो है । पक्का घी नौ सौ प्रतिकिलो है ।

पर आप शनी देव के पत्थर पर क्यों नकली तेल चढ़ाते हैं? । दस ग्राम ही चढ़ाइए ओरिजनल तेल ना मिले तो पिसवा कर चढ़ाइए । जरूरी है क्या एक एक किलो चढ़ाना उनको नकली तेल ।‌ नकली दुध , नकली शहद , आदि से भगवान के प्रतिमा का अभिषेक करना महापाप है । जरूरी है क्या एक सौ आठ दीपक नकली तेल घी का जलाकर कर्मकांड के नाम पर गलत करना ? एक हीं जले शुद्ध जले । वाकी बचा पैसा‌ दान करदें ।‌ भाव जरूरी है । कर्मकांड बिना‌ भक्ति भाव के अभिषाप है । वरदान नहीं । 

नकली चीजों के इस्तेमाल से सार्वजनिक मंदीर हीं नहीं आपके घर के मंदीर से उठा धुआं बहुत जहरीली होती है । यह आप सबके स्वास्थ्य को बर्बाद करता है । 
आप फिर डौक्टर को फीस और दवा में खर्च करके दस गुणा नुकसान में हैं । ऐसे नकली घी तेल कपुर के उपयोग से लक्ष्मी आएगी नहीं , उल्टे जाएगी आपके यहां से डौक्टर के घर । 

उससे बढ़िया है मंदीर में खाने से भी ज्यादा शुद्ध घी , तेल , अपुर , शहद आदि का इस्तेमाल करना चाहिए हमें ।
अगरबत्ती में तो और खतरनाक जहर होता है ।

हमारा सनातन धर्म पुरी तरह वैज्ञानिक हैं ।
ओरिजनल चीज का इस्तेमाल से वातावरण शुद्ध होगा घर का , मंदीर का । अच्छा वातावरण से मन शांत होगा और मन लगेगा ध्यान में ।
एक बार ओरिजनल तेल घी कपूर को हाथ में लेकर सुंघिए पहले फिर पता चलेगा उसको जलाने का महत्व ।
ऊसका लाभ । बहुत सुंदर महक से घर , मंदीर सब भर झाऐगा । इससे वैक्टिरिया आदी सब मर जाएगा घर का , मंदीरो का । 
कम इस्तेमाल भले किजिए पर बाजार से आरती और मंदीर बाला घी , तेल अगरवत्ती ,‌शहद , फौर्मलीन मिला , हाईड्रोजन पैराक्साइड बाला , कास्टिक सोडा मिला नकली दुध भगवान को ना चढ़ाएं । ध्यान रहे वो हमारे सनातन पिता है। हमे उनका अपमान नहीं करना चाहिए । ना अपने स्वास्थ से और ना दुसरो के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करना चाहिए हमें ।
बढ़िया से बढ़िया ओरिजनल बस्तु का इस्तेमाल से वातावरण शुद्ध होता है । मंदीर के आस पास पाखंडी पंडितों का दुकान होता है । मोटी कमाई के लिए वो सब लालची कुछ पंडित लोग दुकान लगा कर नकली सामान बेचते हैं ‌ बचिए उनसे ।
श्री राधे :- आपका संजीव कुमार ।

श्री महाराज जी कहते हैं हम कर्मयोग करें चाहे कोई भी काम हो भगवान को ह्रदय में जान कर मान कर अपना अच्छा कर्म करना , यहां तक की आताताईयो के विरुद्ध खड़ा होना भी कर्मयोग से हो सकता है । और अपने द्वारा हर किए गय प्रत्येक अच्छे कार्य का श्रेय एक मात्र भगवान और गुरू को देना चाहिए ।

भगवान व श्री महाराज जी  यह नहीं कहें है  कभी की  तुम अकर्मण्य बन जाओ और सारा काम मुझे पे छोड़ दो । 
श्री महाराज जी कहते हैं हम कर्मयोग करें चाहे कोई भी काम हो भगवान को ह्रदय में जान कर मान कर अपना अच्छा कर्म करना , यहां तक की आताताईयो के विरुद्ध खड़ा होना भी कर्मयोग से हो सकता  है । और अपने द्वारा हर किए गय प्रत्येक अच्छे कार्य का श्रेय एक मात्र भगवान और गुरू को देना चाहिए । 
वो यह नहीं कहते की तुम कर्महीन बन जाओ ।
कोरोना हो जाए और डौक्टर के पास जाओ हीं ना ।

वो तो कहें है जो मैं समझा हुं कि तुम घबराओ नहीं बिमारी से , निडर बनो ,  मुझे अपने ह्रदय में मान कर , बिठा कर डौक्टर से इलाज करो , अपना कर्मयोग करो ।
उसके बाद सब भगवान और गुरू की इच्छा , मर्जी पर छोड़ो ।  फिर मुझे जो करना है सो करूंगा । मुझ पर दृढ़ विश्वास रखकर अपना काम करो । तुम कर्म करने के अधिकारी हो । फल क्या होगा , मत सोचो , फल तुम्हारे हाथ में नहीं है ।  अब तुम कर्म हीं करना छोड़ दोगे तो मरोगे हीं ।
वो कर्म करने के बाद फल को उनकी इच्छा पर छोड़ने के लिए बोले है । ( पर लोग कल मुझे सिखा रहे थे कि कर्म ही मत करो , कर्म करने से पहले ही उनकी इच्छा पर छोड़ दो , यही समझा है श्री महाराज जी के तत्वज्ञान को , मुझे नहीं समझना उनलोगों से ) 

 वो तो हजार बार कहें है  कि "मनुष्ययोनि कर्म प्रधान, ज्ञानप्रधान  योनि के साथ साथ भोग योनि भी है , मत भुलो , कर्मयोग करने से कोई कर्म नोट नहीं होगा । " 

तो मैंने तो उनका लगभग सभी विडियो  सभी किताब पढ़ चुका हुं और उनके कृपा से समझ चुका हुं और मस्तिष्क में भी ऐसा बैठ गया है कि प्रैक्टिकल युक्ति करने में कोई परेशानी नहीं है । 

मुझे वहीं लोग समझाए जिनके ह्रदय में दंभ कपट छल छिद्र और माया नहीं है । खुद श्री महाराज जी के बतलाए से पचास प्रतिशत भी अपने स्वयं के जीवन में सच सच उतार चुके हैं । उनका मैं दास हुं । 🙏❤️🙏 और हां मुझे मेरे कर्मयोग करने से कोई रोके ना । मैं गलत का पुरा विरोध करूंगा हीं । जितना लोग मेरा विरोध करेंगे उतनी ही मेरी शक्ति बढ़ेगी । मेरा बल मेरा राम हैं मेरा गुरू हैं ।

आपसबको सावधान कर रहा हुं । शनी देव के प्रतीक पत्थर पर तेल ना चढ़ा कर उनके नाम पर जरूरत मंदो को दान कर दिजिए तेल । शनी देव खुश होते हैं । वो उ़नके मंदीर में तेल चढाने बाले यह नहीं जानते की वहीं चढ़ा तेल फिर से बाजार में ले जाकर लालचियों के द्वारा फिर बेचा जाता है ‌। वो भी नकली तील का तेल होता है मोविल मिलाया , नकली घी आदि ।

आपसबको सावधान कर रहा हुं । शनी देव के प्रतीक पत्थर पर तेल ना चढ़ा कर उनके नाम पर जरूरत मंदो को दान कर दिजिए तेल । शनी देव खुश होते हैं । वो उ़नके मंदीर में तेल चढाने बाले यह नहीं जानते की वहीं चढ़ा तेल फिर से बाजार में ले जाकर लालचियों के द्वारा फिर बेचा जाता है ‌। वो भी नकली तील का तेल होता है मोविल मिलाया , नकली घी आदि । 

शनी देव और कुपित होते हैं इस करनी से ।
शनी देव भगवान श्री कृष्ण का अनन्य भक्त हैं । किसी के इष्ट को , स्वामी को , पिता को भजने से, भक्ति करने से स्वाभाविक है कोई भी भक्त खुश होगा ।

कोई राधे नाम बोलता है तो आपको कितना अच्छा फील होता है , और उसको दोस्त बना लेते है आप , फेस बुक पर भी । तो सोचिए वो तो उन्हीं का भक्त शनीदेव है , वो आपसे कितने खुश होते होंगे ? 

और हजारों दीपक पीपल के पेड़ के नीचे जलाने से कोई लाभ नही‌। किसी गरीब के घर दीपक दान कर दें । उसके घर में रौशनी होगा तो भगवान आपका का घर भी रौशन करेंगें । 
जानिए भाई अंध विश्वासों से उपर उठीए ।

असली ज्योतिष, बढ़िया ज्योतिष आपको गरीबों को, गरीब पंडितों को तेल दान , चावल दान , किमती पत्थर दान , वस्त्र दान, अन्न दान , स्वर्ण दान करने की बात बतलाएगा ।
लालची ज्योतिष आपसे बड़ा रकम फीस के रूप में लेगा,

 सालों भर वो खुद हरेक शहर के होटलों के महंगे कमरे में रूकेगा, मुर्गा मांस ,‌शराब सेवन करेगा आपके पैसे से , और आपको उपाय के नाम पर , हवन , पत्थर , सोने में पहनने के लिए बोलेगा । आप उससे महंगा पत्थर सोना मिलावट वाला में बना अंगुठी खरिदोगे । वेरोजगारी में आप का धन और लुटवा देगा ।

पर बढीया ज्योतिष आपको अच्छे से देख कर आपको भगवान के तरफ प्रेरित करेगा । आचरण को ठीक करने को बतलाएगा , सुपात्र को दान करने के लिए बोलेगा । खुद दान नहीं लेगा , केवल अपना फीस लेगा । वो आपको सन्मार्ग में चलने की प्रेरणा देकर आपसे पुरूषार्थ करवाने पर जोर देगा । आपको डराएगा नहीं , आपके उत्साह को बढावेगा ।

सावधान रहीए , ढोंगी ज्योतिषों से । सब गलत गलत मनगढ़ंत शास्त्र के नाम पर आपको गुमराह करेगा नकली ज्योतिष । डराएगा । डर बेच कर कमाएगा । 

इससे अच्छा है किसी ऐसे संत , महापुरूषों को दान दिजिए जो भगवद् प्राप्त हो । जो श्रोत्रिए और ब्रह्मनिष्ट हो । जो दान का पुरा पैसा समाज के कल्याण के लिए खर्च करता हो । 
उनको उनके द्वारा नियुक्त उनके मूल प्रचारकों को दान दिजिए । उनके प्रचारक उनके प्रति समर्पित होते हैं । वो आपके दान का ९९.% उनको पहुंचा देते हैं । केवल 1% से अपना जीवन जीते हैं या आश्रम बासियों का पेट भरते हैं भरण पोषण करते हैं । उन आश्रम बासियो का जो गुरू भगवान का सेवक है । श्रद्धा के पात्र हैं । वो भी हम जैसे गृहस्थों पर निर्भर है अपने अति आवश्यक आवश्यकता की पूर्ति के लिए ।
यह सब दान से भगवान के घर में जो आपका कार्मिक एकाऊंट है वो भरेगा, उससे भाग्य बनेगा , बढीया प्रारब्ध बनेगा , कष्ट मिटेगा आपका । । संसार हीं नहीं परलोक भी बनेगा । पढ़ें लिखे हैं आप लोग । गलत ज्योतिषों ,तांत्रिकों के चक्कर में मत फसिए । उल्टा लोक परलोक दोनो की हानी होगी । 🙏❤️🙏

पीपल का परिक्रमा करने और उसके नीचे दीपक जलाने व पीपल के पेड़ आदि की पुजा करने का आध्यात्मिक विज्ञान क्या है , और आज का वैज्ञानिक साक्ष्य क्या है समझिए ।

बहुत जरुरी बात , अंत तक पढ़े और खुद को बचावें :- 
सनातन वैदिक धर्म में ज्योतिषी शास्त्र में पीपल का परिक्रमा करने और उसके नीचे दीपक जलाने व पीपल के पेड़ आदि की पुजा करने का आध्यात्मिक विज्ञान क्या है , और आज का वैज्ञानिक साक्ष्य क्या है समझिए । 

आजकल  के समय में  पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना बड़ी संख्या में खतरनाक है क्यों ? अब दीपक जलाने से कोई लाभ नहीं ।
वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों पहलुओं से समझते है और अंध विश्वासों को दुर करते हैं ।

सबसे पहले वैज्ञानिक पहलुओं का चर्चा करते हैं :- 
पीपल का पेड़ , अर्जुन का पेड़ चौबिसों घंटे कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करती है और उसको आक्सीजन में तब्दील करके  बाहर छोड़ती है । यह वैज्ञानिक शोधौ द्वारा साबित है , सब जानते हैं इस जेनरल नौलेज को ।

तो पुराने जमाने में दो हजार से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक भारत का हीं नहीं विश्व का पौपुलेशन पचास लाख भी नहीं था वन्य प्राणी और मनुष्य से उतना कार्बन-डाई-ऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं होता था , और इस कारण कार्बन उत्सर्जन हजारों गुणा कम था । कोई मोटर गाड़ी , कल कारखाना आज के जैसा नहीं था जो भयानक कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न करता हो ।

अब अधिक जंगलों के कारण और कम कार्बन उत्सर्जन के कारण पेड़ पौधों को जीवित रहने के लिए बहुत मात्रा में कार्बन-डाई-ऑक्साइड की आवश्यकता होती थी स्वाभाविक है ।

पीपल , बड़गद,  नीम , अर्जुन , तुलसी के पेड़ में अनेकों औषधिय गुण है सबकी चर्चा करना संभव नहीं इस पोस्ट में । आप में से बहुत लोग जानते हैं ।
जब वातावरण में कार्बन-डाई-ऑक्साइड की मात्रा कम थी पुराने जमाने में , या वैलेंस थी तो,  पीपल आदी को अधिक कार्बन-डाई-ऑक्साइड मिले जिससे उसमें वृद्धि हो, पौधा स्वस्थ रहें  तो हमारे वैज्ञानिक ऋषि मुनि किसानो को, गृहस्थों को  इन पेड़ों के नीचे कर्मकांड बना कर इसकी पुजा और दीपक जलाने का विधान बना दिया । जिससे वो पेड़ कार्बन-डाई-ऑक्साइड ले और औक्सिजन बना कर आस पास के वातावरण को शुद्ध करे ।
उन्होंने लोगों को उस पेड़ की परिक्रमा का विधान भी बना दिया , उस समय पीपल बरगद आदी के पेड़ के मोटाई की व्यास कईयक मीटर की होती थी तो जब लोग उसका सात परिक्रमा , एक सौ आठ परिक्रमा करता था तो पेड़ के नीचे शुद्ध औक्सिजन और वातावरण के कारण मानव के फेफड़ों व स्वास्थ पर उसका अच्छा प्रभाव पड़ता था । मन मस्तिष्क स्वस्थ होकर अच्छा विचार उत्पन्न करता था , जिससे आचरण और कर्म बढीया हो जाता था और अच्छे भाग्य का निर्माण होता था महिलाओं और पुरुषों दोनों को ।

आध्यात्मिक पहलुओं पर ध्यान देंगे तो जहां का वातावरण शुद्ध होता है वहां भगवान , देवता का निवास होता है ,  हमारे वेद के अनुसार महाचेतन भगवान जड़ यानि माया , अपरा में और चेतन यानि पराशक्ति दोनों में विद्यमान है तो जाहिर है कि औषधिय गुणों वाले पेड़ पौधो में ज्यादा अनूभुत हैं ।
इसलिए इन पेड़ों में भगवान का बास कहा गया है हमारे  सनातन धर्म में ।
आज से ढाई हजार  वर्ष  पहले भगवान बुद्ध को गया जी में पीपल ( जिसे बौधिक वृक्ष कहा जाता है ,) के पेड़ के नीचे के अति शुद्ध वातावरण में दैविक ज्ञान प्राप्त हुआ था । पीपल , बडगद आदि का पेड़ चुंकि बड़ा विशाल होता है इसलिए यह ध्वनी प्रदुषण को भी शोख कर शुन्य कर देता है , उस पर शुद्ध औक्सिजन के कारण बने शुद्ध बातवरण के कारण शरीर से उर्जा का क्षय बहुत कम होगा तो स्वाभाविक है बहुत दिनों तक अन्न की जरूरत भी नहीं पड़ेगी और ध्यान अच्छा लगेगा ।

पर आज उसी कर्मकांड के नाम पर ज्योतिष लोग पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाकर भाग्य बदलने का नाम देते हैं मुर्खतापूर्ण बुद्धि के कारण ।

अब आजकल के प्रदुषित काल में यह दीपक जलाने का कोई लाभ नहीं । कारण कि आज वातावरण में जरूरत से कहीं ज्यादा  कार्बन-डाई-ऑक्साइड पहले से मौजूद हैं उपर से हजारो की  संख्या में लोग एक हीं पेड़ के नीचे हजारों की संख्या में दीपक जलाकर परिक्रमा करते पाए जाते हैं । जिससे उसी दीपक के गैस को और ईन्हेल खुद कर लेतें हैं जिससे भाग्य बदलना तो दुर ओक्सीजन के कमी से डिप्रेशन , एंजाइटी बढ़ जाता हो और फिर किस्मत और खड़ाब हो जाता है । 
तो हम लोग पढ़ें लिखे हैं समझना चाहिए और बचना चाहिए इससे ।

और हद तो तब है हंसी लगता है मुझे अब शहरीकरण के कारण सोसाइटी में गमले में लगे पीपल बरगद  आदि के छोटे से पेड़ के नीचे अनेकों लोग अनेको दीपक जलाकर दो कदम भर में सट कर परिक्रमा करके सोचते हैं कि धार्मिक कर्मकांड के फर्ज को पुरा करके देवता को खुश करके अपना भाग्य बना लेंगे ।
अरे और ज्यादा कार्बन-डाई-ऑक्साइड पी कर अपना फेफड़ा भी खड़ाब कर लोगे । और एंजाइटी आदी का शिकार होकर किस्मत और खड़ाब कर लोगे । :- 
यह मेरा अपना लेख है ‌वैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रमाण पर आधारित है । और यथार्थ है आपके लाभ के लिए डाला है आज , किसी का , कहीं का कौपी पेस्ट नहीं है । :- संजीव कुमार ।
आगे तील के तेल और अंगुठी में पत्थर के मिथक पर बात करूंगा फिर कभी ।

शनी देव के ग्रेनाईट के काले पत्थर के प्रतीक के ऊपर तील के तेल चढ़ाने का चलन के पीछे इतिहास :-

शनी देव के ग्रेनाईट के काले पत्थर के प्रतीक के ऊपर तील के तेल चढ़ाने का चलन के पीछे इतिहास :- 

सबसे पहले यह जानना जरूरी है तब समझ पाएंगे तिल के तेल का चढाने के पीछे का कहानी‌:- 
राजा भोज स्वयं बहुत बड़े विद्वान थे और कहा जाता है कि उन्होंने धर्म, खगोल विद्या, कला, कोशरचना, भवननिर्माण, काव्य, औषधशास्त्र आदि विभिन्न विषयों पर पुस्तकें लिखी हैं जो अब भी विद्यमान हैं। इनके समय में कवियों को राज्य से आश्रय मिला था। उन्होने सन् 1000 ई. से 1055 ई. तक राज्य किया। इनकी विद्वता के कारण जनमानस में एक कहावत प्रचलित हुई- कहाँ राजा भोज, कहाँ गांगेय, तैलंग। धार में भोज शोध संस्थान में भोज के ग्रन्थों का संकलन है। भोज रचित 84 ग्रन्थों में दुनिया में केवल 21 ग्रन्थ ही शेष है। भोज बहुत बड़े वीर, प्रतापी, और गुणग्राही थे। इन्होंने अनेक देशों पर विजय प्राप्त की थी और कई विषयों के अनेक ग्रन्थों का निर्माण किया था। ये बहुत अच्छे कवि, दार्शनिक और ज्योतिषी थे।
भारत में अकाल का बहुत पुराना इतिहास रहा है। 1022-1033 के बीच कई बार अकाल पड़ा। सम्पूर्ण भारत में बड़ी संख्या में लोग मरे थे।

हमारे उपनिषदों से पता चलता है कि शनी‌ देव और हनुमान जी‌ में युद्ध हुआ । इस पर टीवी धारावाहिक भी‌ बना है ,‌जो देखेंगे होंगे वो जानते होंगे । इसलिए अति संक्षेप कर रहा हुं । 
अब इस युद्ध में शनी देव को चोट लगा । हनुमान जी ने उनको बंदी बना लिया । भगवान राम के निकट ले गए 
‌शनी देव को जीवन दान मिला भगवान से और वो भगवान के दया और करुणा को देख भाव भक्ति में खो गय । उनको भगवद् प्रेम मिल गया । इसका आभार उन्होंने हनुमान जी को‌ व्यक्त किया और बोला जो भी आपको भजेगा । उसको मैं कष्ट से मुक्ति दे दुंगा खराब प्रारब्ध को मिटा दूंगा । और जो प्रभु श्री राम को अपने ह्रदय में धारण करेगा उसका तो अनंत जन्म ठीक हो जाएगा हीं । 
हनुमान जी ने भी उनके चोट पर तील के तेल का लेप किया और कहा जो आपको यह तील के तेल का लेप भाव भक्ति से चढ़ाएगा उसको मैं उसका सब कष्ट हर लुंगा ।
अब यह बात शुरू हुआ । श्रद्धालु उनको थोड़ा सा , बस थोड़ा सा तील का लेप चढ़ाने लगे और यह ज्योतिष शास्त्र के उपाय के नाम पर एक विकराल रूप ले लिया ।

अब राजा भोज के समय आकाल परा । उनके राज्य में तेलहन मुख्य लाभकारी नगदी फसल था । जिससे राज्य को बहुत सा टैक्स मिलता था । तेलहन की काफी कमी हो गई । पर जब अकाल मिटा तो फिर इतना तेलहन हुआ की उसके उत्पाद को कोई खरिदने वाला नहीं था । मुफ्त में देने पर भी कोई लेवाल नहीं था ।

उनके राज्य के किसान अपने मुख्य फसल का लागत तक नहीं वसूल पा रहे थे , भूखे मरने लगे अकाल समाप्त होने के बाद भी । राजा भोज विद्वान तो थे ही । अर्थशास्त्री भी थे । 
उन्होंने पंडितों , ज्ञानियों , ज्योतिषों के रूप में अपने नवरत्नों के साथ फैसला लिया और ज्योतिषों के और पंडितों के द्वारा पुरे भारत में शनी‌ देव को भर भर क्विंटल तेल चढाने का ज्ञान बांट दिया । फिर क्या था अचानक तील के तेल का डिमांड पुरे भारत के अनेक राज्यों से आने लगी और किसानो को और राज्य को बहुत सा धन मिला ।
तो उस समय फिसकल डेफिसिट को पुरा करने का यही तरिका था । जो उन्होंने सही किया । 
वही प्रथा शास्त्रो में जगह लेकर आज तक कायम है । पर आज बिना भक्ति भाव के नकली तेल हजारों टन चढ़ रहा है । उपाय के नाम पर अधर्म व्याप्त है । 
तेल के छोटा सा लेप के जगह पर टनों नकली तेल !
 
आपके घाव पर आपके सगे आकर सब मिलकर आपको नकली तील के तेल में डुबा दे कैसा लगेगा आपको ?
माना की तील के तेल में फंगस रोधी गुण है इसका मतलव यह थोड़े है कि आपको नकली तेल में डूबा दिया जाए ‌। 

देखिय मैने हकीकत लिखा है । जिसको पसंद है माने जिनको गलत तरिका रूपी अंधविश्वास पसंद है वो उसी को माने । वर्णा हमारे लिए हमारा सनातन धर्म बहुत वैज्ञानिक हैं कोई अंध विश्वास नहीं । हमारे सनातन में पाखंडियो द्वारा जबरदस्ती घुसरे गए इन्हीं तरह के गलत ज्ञान रूपी अंधविश्वासों के कुछ कारणों से विरोधियों को मौका मिल जाता है सवाल खड़ा करने का ।
जबकि उनके वहां भी अंधविश्वासों का कमी नहीं ।
पर हमें तो खुद को खुद के धर्म के अंधविश्वासों को समाप्त करने का प्रयास करना है, गलत तरिका रूपी व्याप्त कर्मकांड के बारे में लोगों को जागरूक करना है । दूसरे को तो हम कभी बदल नहीं सकते । 🙏❤️🙏

Monday, 14 June 2021

प्रश्न था : -महाभारत में भगवान श्री कृष्ण ने अपने हाथ‌ में एक भी अस्त्र , शस्त्र न उठाने का प्रण लिया । युद्ध में खुद सारथी बने, धर्म युद्ध करने के लिए जीवों को ही प्रेरित किए । यहां तक की शिखंडी को भी युद्ध में शामिल करवाया आदि । भगवान श्री कृष्ण अगर चाहते तो एक मिनट में खुद अपने हाथों से तमाम कोरवो का विनाश कर देते । पर उन्होंने ऐसा नहीं किया । क्यों ? इसका उत्तर के सार को आपको गीता के कुछ श्लोक के द्वारा सिद्ध करना होगा । यहां तक की अपनी सोलह अक्छ्वनी सेना भी कौरवों को दे दी , खुद अस्त्र शस्त्र नहीं उठा कर क्या संदेश दे रहें हैं हम लोगों को ?

प्रश्न था :  -महाभारत में भगवान श्री कृष्ण ने अपने हाथ‌ में एक भी अस्त्र , शस्त्र न  उठाने का प्रण लिया । युद्ध में खुद सारथी बने, धर्म युद्ध करने के लिए जीवों को ही प्रेरित किए । यहां तक की शिखंडी को भी युद्ध में शामिल करवाया आदि । भगवान श्री कृष्ण अगर चाहते तो एक मिनट में खुद अपने हाथों से तमाम कोरवो का विनाश कर देते । पर उन्होंने ऐसा नहीं किया । क्यों ? इसका उत्तर के सार को आपको गीता के कुछ श्लोक के द्वारा सिद्ध करना होगा ।  यहां तक की अपनी सोलह अक्छ्वनी सेना भी कौरवों को दे दी , खुद अस्त्र शस्त्र नहीं उठा कर क्या संदेश दे रहें हैं हम लोगों को  ? 

मेरा उत्तर -   तत्वज्ञान और व्यवहारिक सिख के आधार पर मेरा उत्तर यह है :- 
तत्वज्ञान के आधार पर :- आप सभी जानते हैं कि भगवान केवल अपने से राग (प्रेम के कारण ह्रदय मे़ रखना ) या द्वेष ( अति दुश्मनी के कारण हर क्षण स्मरण ) वाले जीव को अपना लोक देते हैं स्वयं मार कर । भक्त के पराधिन होते हैं । और अपने अवतरण काल में अपने खिलाफ निगेटीभ ( विलेन का रोल )  भुमिका वाले को स्वयं  मार कर अपना लोक दे देते हैं । उन्होंने पुतना , अघासुर वकासुर कंस , शिशुपाल आदि को स्वयं मृत्यु देकर अपना लोक दे दिए । पर कौरवों में और उसको साथ देने वाले सगे संबंधियों में एक भीष्म पितामह को छोड़ कर कोई उनका प्रेमी , भक्त नहीं था । 
कौरवो में धृतराष्ट्र , गंधारी , द्रोणाचार्य का अटैचमेंट मोह अपने पुत्रों में था तो 99 भाइयों का मोह दुर्योधन में था । दुर्योधन की कामना  राज्य पाने का था । और पांडवों से नफ़रत था उसे , नहीं तो पांच गांव देकर राज्य पा लेता ।
इसलिए भगवान इन किसी को भी अपने विधान के अनुसार अपना लोक नहीं देना था स्वयं के हाथो मार कर । 

दुसरा यह ज्ञान देना था तमाम आगे विश्व के हम तमाम जीवों को की अपना कर्म खुद करो बिना फल की कामना किए  , भगवान के भरोसे मत बैठे रहो की तुम्हारा काम भगवान कर देंगे आकर । 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन........ गीता ।

भगवान को अपने ह्रदय में रखो , धारण करो , उनपर पुर्ण विस्वास करो , और कर्मयोग की शिक्षा दी । नहीं तो हम लोग अकर्मण्य हो जाते । इसलिए प्रण किया उन्होंने अपने व्यवहारिक युद्ध लीला में की वो शस्त्र नहीं उठाएंगे । 

अब व्यवहारिक युद्ध  लीला में भुल जाईए थोड़ी देर के लिए की वो भगवान थे । तब समझेंगे । 
तो उन्होंने हमें यह शिक्षा दी की गुरू हमारा मार्गदर्शन करेगा केवल , साधना खुद करनी होगी और कर्मयोग के द्वारा गलत का विरोध एवं अपने संसार का काम स्वयं करना होगा , । संसार में भी आज अनुभवी लीडर स्वयं काम नहीं करते, वो तो थ्योरिटिकल और प्रैक्टिकल सब करके लीडर बना है । गाईड बना है। वो तो काम,  कर्म करना सिखाता है अपने अनुगत शिष्यों को ।
 श्रीकृष्ण भी युद्ध में भी इसी गाईड , लीडर , गुरू की भुमिका में है । अगर लीडर स्वयं काम करने लग जाए तो फिर सब निकम्मा होकर , अकर्मण्य होकर बर्बाद हो जाएगा । और डिपेंडेंट हो जाएगा लीडर पर हीं । इसलिए खुद हथियार नहीं उठाए ।
दुसरा :- उन्होंने अपनी सोलह अक्छ्वनी सेना दूर्योधन को दे दी । मतलव सही मार्ग, धर्म मार्ग , न्याय मार्ग , भक्ति मार्ग  पर चलने के लिए अधिक साधन की आवश्यकता नहीं । 
 दुश्मन से नफ़रत भी नहीं करना चाहिए , पुरी शक्ति से उसका विरोध करना है दुष्टो के कुकर्म का बिना उससे राग या द्वेष किए , नहीं तो स्वयं का नुकसान होगा , वो ह्रदय में आ जाएगा  और विधान के अनुसार अगले जन्म में हम उसी दुष्ट के यहां जन्म लेने को बाध्य होंगे , इसलिए दुष्ट से नफ़रत नहीं वल्कि उसके दुष्कर्मो का विरोध करना चाहिए  ।

 वो दुष्ट  तो ऐसे हीं मर चुका  है अधर्म पथ  पर पैर देने के कारण ,जमीर मर चुका है केवल शरीर चल रहा है उसका , सब उसी समय मर गया जब पाप अधर्म के कारण आत्म शक्ति चली गई उन सबकी  । जो झूठ बोलता है , दुष्कर्म करता है, क्रिमिनल है । दुसरे का हक मारता है । अन्याय करता है समाज में । वो केवल हथियार और बौडी गार्ड के बल पर शेर बनता फिरता है,  जबकी इन गलत कर्मो के करण उसका साथ भगवान छोड़ देते हैं स्वयं कब का  । उनका साथ छोड़ते ही उसकी आत्म शक्ति समाप्त हो जाती है । वो जिंदा लाश बन जाता है और अपने सैनिक , बौडी गार्ड और हथियार के बल पर रोव झाड़ता है रहता है समाज में । और एक दिन टें बोल जाता है किसी के द्वारा । मौत बड़ा दुर्दाई होता है उसका , उसका साथ देने बाले उसके संबंधी और साथी भी दर्दनाक विनाश का भागी बनता है समय आने पर । उसका वंश समाप्त हो जाता है एक दिन , कोई नहीं बचता उसके वंश में उसके अन्याय से अर्जित धन और राज्य को भोगने वाला ।

रहा न कुल कोई रोवन हारा ..... 
आंसु बहाने वाला भी नहीं बचता उसके मौत पर , अग्नी देने वाला तो बहुत दुर की बात है ।

और भगवान ने यह भी अनुभव कराए कि समाज में 99%  लोग अधर्मी का ही साथ देते हैं । महाभारत में यही हुआ पांडव के पक्ष में भगवान थे और एक दो राजा थे , बस । पर इस विश्वयुद्ध में पांडवो का अपना संबंधी भी उसी अधर्मी दुर्योधन के पक्ष में लड़े और मारे गए।

इसलिए याद रखिय धर्मयुद्ध में आपका साथ कोई नहीं देगा आपका साथ भगवान देंगे केवल और आपका गुरू देगें , एक उनका साथ हीं सब पर भारी पड़ेगा , चिंता नहीं करना है । आपकी जीत होगी एक दिन ।

तीसरा :- लिमिटेड रिसोर्सेज ( साधन )ही होगा आपके पास कर्मयोग के लिए ,  उसी लिमिटेड रिसोर्सेज से लक्ष्य हासिल करना होगा ।‌

चौथा :- धर्म युद्ध में धर्म में साथ चाहे वो शिखंडी ही क्यूं ना हो आपका साथ दे रहा है तो उसका सम्मान करना चाहिए । एक कमजोर गलिहरी भी आपका साथ दे रहा है तो उसका भी सम्मान करना चाहिए ।  कोरोना से युद्ध के समय केन्या जैसा देश भी आपका साथ दे तो उसको ठुकराना नहीं चाहिए वल्कि उसके उपहार को सम्मान के साथ स्वीकार्य करना चाहिए । नहीं तो अधर्म होगा । और आपका साथ भगवान वहीं छोड़ देंगे ।

पांचवां :- अधर्म का साथी अगर आपका सबसे प्यारा भीष्म जैसा ताऊ भी दुर्योधन जैसा जीव के पक्ष में खड़ा हो जाए तो उनसे मोह ममता त्याग देना चाहिए और पीछे नहीं हटना चाहिए । वल्कि अधर्म को साथ देने वाला , समाज में चीर हरण के समय खामोश होकर देखने वाला भीष्म , द्रोण जैसा शिक्षक , अधर्म के साथ देने वाले का बद्ध सबसे पहले करना चाहिए उसके बाद अंत में मुख्य दुराचारी को । कि देख तुम्हार साथ देने वाला कोई नहीं बचा । तुम्हारा सब समाप्त हो गया तुमसे पहले।अब भी शरेंडर कर दो। पर दुराचारी शरेंडर भी नहीं करता अंत में चुल्लू भर पानी में मुंह छूपाना परता है उसको ।
दुर्योधन भी यही किया । एक छोटा तालाब में जाकर छिप गया । उसके नफ़रत का आग उसी को जलाने लगा था । 

इसलिए भगवान ने स्वयं हथियार नहीं उठाकर पांडवों को ज्ञान देकर उसके मोह ममत्व को समाप्त कर यह कहा अंत में कि
सर्वधर्मान्परित्यज्य माम् एकं शरणं ...... 
सर्वेषु कालेषु माम् मनुष्मर युद्ध च ......
कर्मयोग की शिक्षा देते हुए अंत में भक्त बर्बरीक के द्वारा यह भी सिखा दिया कि अपने कर्मयोग का भी श्रेय अपने गुरू को दो,  खुद को नही। गलत फहमी में मत रहो , अहंकार मत करो की यह शुभ काम तुमने अपने स्वयं के बाहुबल से किया है । हर अच्छे काम का श्रेय भगवान और गुरू को दो ‌। नहीं तो अहंकार ह्रदय में आकर बैठ जाएगा और तुम भी दुर्योधन की तरह हो जाओगे एक दिन । 
मैं तो अपने श्री गुरूदेव श्री कृपालु महाप्रभु जी के कृपा से जो तत्वज्ञान और व्यवहारिक शिक्षा पाई है साधना से उनके बल से वही लिखा है । कोई त्रुटी हो तो क्षमा करेंगें ।:- संजीव कुमार , रांची । 🙏❤️🙏

Saturday, 5 June 2021

माया के तीन गुणों के अधीन जीव, चाहे वो संसार में आज बड़ा नाम बाला क्यूं ना हो , वो क्या भगवान का वास्तविक संत का महापुरुषों का गुण गान करेगा भला !

माया के तीन गुणों के अधीन जीव, चाहे वो संसार में आज बड़ा नाम बाला क्यूं ना हो , वो क्या भगवान का वास्तविक संत का महापुरुषों का गुण गान करेगा भला ! अरे लोक व्यवहार के नाते दो सुंदर संसारिक शब्द बोल देगा वो भी बिना भाव के , और उसके ह्रदय में क्या है आप हम कैसे जानेगे ? अंतर्यामी तो है नहीं हम आप ?? वो बोलने बाला अभी मायाधिन है हमारे आपके तरह, न उसका पंचकोस भष्म हुआ ना त्रिगुण से मुक्त हुआ , ना उसका पंचक्लेश गया और ना उसको भगवान मिले । 

त्रिताप में जलता हुआ उस आदमी पर सतोगुण हावी है तो भगवान के बारे में हमारे व आपके गुरू के बारे में अच्छा बोल देगा , वो भी लोकव्यवहार , लोकलाज और अपने न्यस्त स्वार्थ के लिए , स्वलाभ हेतु कि लोग मुझे भी अच्छा समझे ।

 वही जीव जब रजोगुण से युक्त होगा जिस समय तो वो राजा का बड़ाई करेगा , प्रधानमंत्री , संतरी का गुण गाएगा । समाज में उसको रहना है , सत्ता से हित साधना है । दुनिया दारी है बुद्धिमानी है , उसके हित में हैं ।

और जब वही तमोगुण के प्रभाव में आया तो भगवान को असली संतों को भी नहीं छोड़ेगा , उल्टा पुल्टा उसी अपने स्टेज से बोलने लगेगा । कल हमारे आपके गुरू को अच्छा बोला , उसका दो चार हजार फोलोवर जैसे हीं वहां से खिसका , ऐसा लगा उसको , वो वास्तविक संतों के खिलाफ , भगवान के खिलाप बोलने लगेगा।
खुब होता है दुनियां में आजकल ।
और बहुत से बहुत अनुकूल भी बोलेगा तो क्या बोलेगा । हां हां वो बड़े ज्ञानि है , बड़े बुद्धिमान हैं बड़ा भक्त हैं रसिक सिरोमणी हैं , उनके जैसा मेमोरी किसी का नहीं आदि आदि । यही दो चार गढ़ा हुआ शब्द बोल देगा और क्या बोल सकता है वो ।

भगवान का उनके जन का कोई संसारी जीव भला संसारिक शब्दो में हीं तो गुणगान करेगा । वो भी अंदर क्या है उसके यह तो भगवान और असली संत हीं जान सकता है । हम आप भोले लोग तो नहीं जान सकते ।
अब जो असली शिष्य है उसकी श्रद्धा , विश्वास किसी के कहने और सुनने के आधार पर नहीं है अपने गुरू के प्रति । असली शिष्यों को इन सब बातों से कोई मतलव नहीं कि कौन क्या कहता है उसके गुरू के बारे मे ।
उसकी अपनी निष्ठा , श्रद्धा ,विश्वास इतना प्रबल होता है कि कोई कुछ भी बोले (अच्छा बोले या बुरा बोले ) कोई फर्क नहीं पड़ता है ।
वो संसार बालों के लिए है , कमजोर शिष्य के लिए है कि वो फलाना बाबा हमारे गुरू के लिए ऐसा इतना बढ़िया बातें की अब वो उसके इस बात को सबसे कहता फिरता है कि फलाना बाबा बड़ा अच्छा है वो मेरे गुरूदेव के लिए बहुत अच्छा बोला है अच्छा कहा है , वो बाबा बड़ा अच्छा बाबा है ।

ये ल् लो । हम आप उस बाबा का गुण गाने लगे , उस बाबा का स्टेटमेंट घुमाने लगे चारों तरफ सब शरणागति , छोड़ वोड़ कर , कई दिन तक वो हमारे आपके ह्रदय में आ गया । उसका भी चिंतन होने लगा । उसके लिए हमारे आपके दिल में सम्मान‌ चुपचाप पैदा हो गया । 
हमारी आपकी सहानुभूति उसके साथ भी हो गई । 
तो यह सब कमजोर शिष्य का निशानी है । वो शिष्य है भी नहीं दरअसल जिसका विश्वास अपने गुरू के प्रति दूसरे के कहने के आधार पर टिका है । 
वो आज अनुकूल बोल दिया तो हमने, आपने मन हीं मन में वास्तविक संत के साथ साथ उसको भी अच्छा मान लिए । 

और कल वो दो विरोधी बातें बोल देगा तो हमारा आपका विश्वास धड़ाम । अरे आजकल बड़े लोगों को छोड़ दो वो तो कोई साधारण संसारी जीव भी आपके गुरू के खिलाफ हो जाए , खिलाफ बातें कर दे , लिख दे , विडियो बना कर डाल दें तो बहुतों का विश्वास क्षण भर में डबांडोल हो जाता है । 
ऐसा है हमारा आपका विश्वास । इतना कमजोर हैं आपका विश्वास और श्रद्धा आदि ।

लेकिन जो सही शिष्य है वो हर हाल में दृढ़ है , उसका विश्वास दृढ़ है । वो कभी किसी भी हाल में नहीं टुटता और ना उसका विश्वास कम होता वल्कि उसका विश्वास और मजबूत होता है कारण कि भगवान और गुरू आपकी परीक्षा के लिए ऐसा विपरित और अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण खुद करतें हैं । 
यह आपको जनाने के लिए कि आप कहां खड़े हैं आपको ज्ञान हो जाए ।
नहीं तो हम आप कहां खड़े हैं? अपना गुरू अच्छी तरह जानतें है । लेकिन हमारे आपके आंतरिक भाव गुरू के द्वारा जानने से हमारा आपका काम नहीं बनेगा । इसलिए दुसरों को माध्यम बना कर हमारी आपकी परीक्षा ली जाती है जिससे हम आप अपनी कमी जानकर खुद को ठीक करें ।

हम आप असली शिष्य हैं तो आप किसी के कहने में नहीं जाएगें । ना अच्छा कहा उससे मतलव और ना बुरा से मतलव है । 
अब वो संसारी बड़ा आदमी , बाबा आ गया आपके आश्रम में , आपके गुरू के सामने हांथ जोड़ा , आपका गुरू भी लोक व्यवहार के नाते हाथ जोड़कर उसका अभिवादन स्वीकार किया । वो एक्टिंग कर लिया , गुरू भी एक्टिंग कर दिया । वो जाने लगा तो आपका गुरू आपके चार पांच साधक भाई बहनों को इशारा किया उनको दरबाजे तक छोड़ आओ , लोक व्यवहार है , कटसी है । लेकिन आप में से बहुत लोग उठ कर उसके साथ साथ उसको छोड़ने चल दिए अापका गुरू प्रवचन दे रहा है किर्तन करा रहा है आप चल दिए उसके साथ । यह करते हैं आप सब । 
श्री राधे ।

Friday, 4 June 2021

जब रजनिश उर्फ ओशो ने भी उसी रसो वै स: ब्रह्म श्री कृष्ण के शरणागत हुए अपने उतर्रार्ध समय में सब कुछ छोर कर ।

बहुत बढ़िया बात, एक ज्ञान मार्गी कैसे भक्ति मार्गी हो कर अपना कल्याण कर लिया जीवन के उतर्रार्ध में , अंत तक एक बार पढ़ना ही होगा :- 
जब रजनिश उर्फ ओशो ने भी उसी  रसो वै स: ब्रह्म श्री कृष्ण के शरणागत हुए अपने उतर्रार्ध समय में  सब कुछ छोर कर । 
ओशो भी अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में यह दृष्टि पाया तो एहसास किया और सत्य को स्वीकारा की वहीं निराकार ब्रह्म अपने पुर्णता में श्री कृष्ण हीं है ।

 ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते, 
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते। 

ओशो को भी यह वेद मंत्र स्वीकार्य हो गया तब  :- 

"रसों वै सः।
रसं ह्येवायं लव्दानन्दी भवति। को ह्येवान्यात् व्य प्राण्यात्।
यदव आकाश आनन्दो न स्यात्। एव ह्येवानन्दयाति।" 

और यह वेद मंत्र भी :- 

"आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।। आनन्देन जातानि जीवन्ति।। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति" 

और जब उनको यह आत्म दर्शन हुआ की जब एक हमारी आत्मा भी जब हमारे शरीर में प्रवेश करके सगुण साकार हो सकता है । 
तो फिर वो निर्गुण निराकार भगवान श्री कृष्ण रूप में , राम रूप में , विष्णु रूप में , बुद्ध रूप में क्यों नहीं रूप धारण कर सकता है ।
अपने इस भुल को सुधारने के  बाद रजनीश जी  रो रो कर भगवान श्री कृष्ण से प्रेम की भिक्षा मांगा । 
और अंत में  जब अमेरिका में उनको जहर दिया गया किसी दुष्ट द्वारा  तो उन्हीं भगवान श्री कृष्ण को याद करते करते देह त्याग किया , कहते हैं कि  भगवान श्री कृष्ण उनको दर्शन भी दिए मृत्यू के ठीक पहले  और उनसे  पुछा की अभी तुम रहना चाहते हो  इस मृत्यू लोक में तो मांगों । मैं तुम को बिष के प्रभाव से मुक्त कर दुंगा ।
पर रजनीश जी ने मौक्ष मांग लिया । 
ओशो जी ने कहा है " सबसे पहले अपने अंत:करण को शुद्ध करो । खुद को ठीक करो , दुसरो में दोष ढुढ़ने में जीवन बीत जाएगा । 
अपना दृष्टिकोण को ठीक करो , वो कहते हैं जब तक अपने दोष को मिटाने में सफल नहीं हो जाते तबतक दृष्टि अशुद्ध रहेगी , और तुम्हारा खुद का दोष ही दुसरे में दृष्टिपात होती रहेगी ।
वो आगे कहते हैं कि जैसा पिलिया ( जौंडिस के रोगी ) के रोगी को हर वस्तु पीला नजर आता है ठीक उसी प्रकार तुम्हारा खुद के दोष के कारण संसार में हर बिषय वस्तु दोषपूर्ण नजर आएगा ।
वो कहते हैं अपने दृष्टिकोण को शुद्ध करने के लिए साधना करो । तब हर तरफ दोष नहीं , प्रेम हीं प्रेम नजर आएगा ।
प्रेम स्वयं तुममें उतरने लगेगा , पहले खुद पर फोकस करो  , खुद के चेतना को शुद्ध करो , नहीं तो तमाम जीवन भटकते रहोगे , थक जाओगे, निराशा आयगी , जीवन बोझ बन जाएगा । दुसरे में दोष देखना सबसे बड़ा दुख का कारण है,अशांति का मुख्य कारण है । 
याद रखना प्रेम कांटों के बाड़े से घीरे ह्रदय में कभी नहीं
उतरता , 
ईर्ष्या द्वेश , नफ़रत से भरे ह्रदय में परमात्मा का प्रेम नहीं ठहरता कभी , प्रेम दिव्य है , नफ़रत ईर्ष्या द्वेष , घृणा जहां होगी वहां प्रेम कभी नहीं उतरेगा , दोनों विरोधी‌ स्वभाव के हैं , विजातिय है  । 
जहां त्याग , दया , करूणा ,  निष्काम सेवा का भाव होता है प्रेम वहीं उतरता है क्योंकि ये सभी  सजातिय है । 
परमात्मा का दिव्य प्रेम फुलों से भरे  बगीचे में ही उतरती है । इसलिए अपने ह्रदय को फुल का बगीचा बनाओ ।

तुमको भी तो फुलों का बगीचा हीं पसंद है । कांटों का बाड़ा नहीं । क्योंकि तुम भी उसी का अंश हो । स्वाभाविक गुण में स्थिर हो जाओ, प्रेम उतरने लगेगा  । 
इसलिए किसी दुसरे में दोष मत देखो । 
 :- ओशो वाणी । 🙏🙏

Thursday, 3 June 2021

इन्हीं संतों के कृपा से हमारा देश और हमारा संस्कार‌ और संस्कृति जीवित है अमीट है ।

( मेरे अपने पोस्ट से- 28जनवरी 2019)
इन्हीं संतों के कृपा से हमारा देश और हमारा संस्कार‌ और  संस्कृति जीवित है अमीट है  । 
और ऐसें हीं संतों के कृपावल से ,  हमारे देश का अस्तित्व अमीट है । हम इन सबका ह्रदय से सम्मान करतें हैं । और अपने भावी पीढ़ी को शिक्षा देतें हैं कि हमेशा संतों का सम्मान करना , चाहे दुनिया कुछ भी कहे । किसी में दुर्भावना मत करना । 
इनके चरण रज को अपने मस्तक पर लगाना । 
जो एक वार भी ह्रदय से राधा नाम लेता है । हम उनके सेवक हैं । हमें अपने संतों पर नाज हैं । हम अपने सदगुरू देव कृपालु महाप्रभु का भक्त हैं‌। और उनकी हर आज्ञा हमारे लिए सिरोधार्य है । हम  संतों का अति सम्मान करतें हैं , उनके भक्तो का सेबक हैं । उनके जनों का दास हैं । यह हमारी भारतीए संस्कृति हैं । वैदिक संस्कृति और वैदिक आज्ञा का पालन करना हमारा आत्मीक कर्तव्य है । 
सियाराम मय सब जग जानी 
करहु़ं प्रणाम जोरी जुग पाणी ।।

अगर हम किसी संसारी के अपने प्रति या किसी भी दुसरे जीव के प्रति रूखे व्यवहार का विरोध करें , तो वो भी शालीनता से , संयमित और मर्यादित भाषा का प्रयोग से , सहजता , दीनता , सहिष्णुता पहले हमें खुद अपनाने के लिए हमारे गुरूदेव ने कहा हैं । लेकिन कोई अगर गलत भाषा का, आपत्तिजनक वाक्य का इस्तेमाल किया है तो उसके साथ कठोर वाक्य का इस्तेमाल से भी नहीं हिचकना चाहिए एक बात के ध्यान के साथ कि अंदर दुर्भावना ना हो । 

राष्ट्र के नागरिक होने का फर्ज कैसे पुरा किया जाता है । यह भी हमारे गुरू देव ने मिशाल पेश किए हैं और अब दीदी लोग और मां कर रहीं हैं तिरंगा लहराकर और उसी सेवा को और आगे बढ़ा कर । केदार नाथ , कोशी बाढ़ पीड़ितों कि सहायता करना , तीन तीन होस्पिटल गरीबों के लिए, नी:शूल्क स्कूल , कौलेज आदि का निर्माण और संचालन उनके जन सेवा का परिचायक है , गौशाला आदि  मिशाल तो  है हिं परन्तु सबसे बड़ी सेवा है उनकी हम सभी को भगवद् संबंधी ज्ञान का दान करके हमारा परम कल्याण करना । 

देश का सम्मान , देश के शहिदों का सम्मान , और देश के प्रति हमारे  फर्ज निर्वहन , निरीह जीवों के लिए , साधु संतों के लिए , गरीवों की सेवा के लिए हमारे कृपालु महाप्रभु का योगदान समुचे भारत के बुद्धिजीवियों के लिए मिशाल हैं ।
प्रेम मंदीर ,  प्रेम भवन , कीर्ति मंदीर , भक्ति मंदीर , भक्ति भवन आदि उनका देन है हमें प्रेरणा देने के लिए कि हरि गुरू की सेवा और उन्हीं से प्रेम करना हमारा अंतिम और सर्वोपरि लक्ष्य है।

श्री महाराज जी ने यह सब करके विश्व सेवक होने का एहसास हमें कराया है ठीक श्री कृष्ण की तरह । 
यह श्री कृष्ण के सीवा और कोई नहीं कर सकता , ममता की अपार समुद्र श्री महाराज जी में ऐसे हैं जैसे साक्षात राधारानी की करूणा बरसती है । वहीं गुण उन्होंने तीनों दिदियों और पुज्यनियां हमारी मां रासेस्वरी देवी जी को दिए हैं ।
हमने ऐसा गुरू पाया है । कि जो जीव उनको अपने ह्रदय में सच्ची निष्ठा से जैसे हीं धारण करना शुरू करता हैं , ह्रदय भगवद् प्रेम से भर कर अंखियां हरि दर्शन के लिए तरप उठती है । यही उनकी कृपा है , कृपा हो गयी , अब पाना क्या शेष है !
श्री राधे ।

तन से और धन से केवल भक्ति होती तो धनवान और बलशाली के लिए भक्ति की प्राप्ति एक क्षण की बात होती । धनवान और बलशाली का एकाधिकार भगवद् प्राप्ति पर भी हो जाता ।

तन से और धन से केवल भक्ति होती  तो  धनवान और बलशाली के लिए भक्ति की प्राप्ति  एक क्षण की बात होती । धनवान और बलशाली का एकाधिकार भगवद् प्राप्ति पर भी हो जाता ।  
वो चालिस पचास साल से लगें हैं महाराज जी के साथ , खुब नौटंकी किया , दिखाबा किया , दान किया , तन भी दिया पर मन नहीं दिया , वो सब समझते हैं । बाहर से बड़े शालिन है । बाहरी तौर पर ढोंग करना सीख लिया , अध्यात्म में चापलुसी सीख लिया संसार की तरह वहां भी , वो संसार बाले चापलुसी पसंद करेंगें , भगवान और संत नहीं । अंदर क्या है झूठ और फरेब , सब वो जानतें हैं ।
 मैं तो कडुबा हुं अपने गुरू की तरह खड़ा बोलता हुं किसी को धोखा नहीं देता और चापलूसी नहीं करता । सत्य को सत्य कहुंगा जो लगातार सेवा कर रहा है मैं उन लोगों का तारिफ दिल से ह्रदय तल से करता हुं और करता रहुंगा  ।

 किसी को अच्छा लगे ना लगे , जा सकता है। मुझे छोड़ कर ।  प्रार्थना है कोई अपने उपर ना ले मेरे इस पोस्ट को ।  मुझे कोई लोभ नहीं मुझे दोस्तों के लिस्ट की । दोस्त दो-चार हीं रहे  श्री महाराज जी के सिद्धांत के अनूकूल रहे जिससे मुझे और ज्ञान भगवद् चर्चा सही सही हो । शांती रहेगा । अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में आसान होगा । 

भक्ति अंदर की चीज है , ह्रदय और अंत:करण का वर्क है । अंत:करण की शुद्ध जरूरी है। वो शरीर की शुद्धि बाहरी शुद्धि , दिखावा , फिजिकल ड्रिल बाहरी तौर पर व्यवहार क्रिया से कोई मतलब नहीं । 

एक जल्लाद का दृष्टांत है एक क्या अनेक सत्य घटना है ।
एक जल्लाद जीव हत्या कर मांस का व्यापार करने बाला था । वो शालिग्राम के शिला से मांस तौल कर बेचता था और अंदर से भगवान की भक्ति करता था , हर पल नाम लेता था , एक क्षण भी नहीं भुलता था ।  एक पंडित मना किया उसको और वो उसका शालिग्राम ले लिया ।

 भगवान ने उस पंडित को फटकार लगाई और कहा " ए शालिग्राम शिला उसको वापस कर दें । और एक दिन उसी जल्लाद ने भगवद् प्राप्त किया । 
लोग पता नही ऐसा कहानी पढ़ कर क्या सिखतें हैं ? शिक्षा ग्रहण करतें है भी या नहीं ? आत्मसात किया या ऊपरे ऊपरे स्वाहा ?? या रंजन के दृष्टि से कथा पढ़ लिए सत्यनारायण कथा जैसे सिर्फ । ना चिंतन है ना मनन है ना प्रभाव है , पढ़ो और भुलो बस । क्या फायदा ??? 
वो पढ़ा और तराक कौपी पेस्ट , क्या तो दुसरे को दिखाना है और लाईक पाना है । मतलव नहीं आत्मसात करने से । वो दुसरा धराक से फिर कौपी पेस्ट , सब लगा है कौपी पेस्ट और पोस्टर की फैक्ट्री बनाने में । कोई मतलव नहीं खुद के मन को समझाने और अपनाने से । छी छी छी । 

इतिहास पुराण श्री महाभारत दृष्टांत है ,  हमारे इष्ट श्रीकृष्ण ने अपने परम भक्त अर्जुन को गीता का ज्ञान, हमारे दृष्टांत के लिए देकर  राष्ट्रहित में युद्ध का आदेश दिया था । वर्णा श्री अर्जुन तो पहले से हीं उनका बहुत बड़ा भक्त और सारे लौकिक एवं पारलौकिक ज्ञानों का स्वामी था । 

मन्मना भव मद्धक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ (गीता १८-६५)

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।66।। ( अध्याय 18 )

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।।8.7।। (गीता )

आओ अर्जुण मेरे शरण में आ जाओ अपनी मन व बुद्धि दोनों मुझे दे दो और गलत का विरोध करो , मारो इन सबको जो अधर्म के साथ है ।
व्यवहारिक ज्ञान दिया और प्रैक्टिकल भी कराया , 
लेकिन लोग गीता का यह सब श्लोक रटतें है मुंह से केवल और कहते हैं गलत का विरोध ना करो समाज में चाहे कोई समाज को प्रदुषित कर दे , आपका जमीन जोत ले , आपकी बहु बेटी पर गलत नज़र रखे , पर उस निंदनिय का विरोध मत करो , बाहरी तौर पर चुप रहो । ख़ामोश रहो । यही भक्ति सिखा है क्या लोग ?? 
क्या श्री महाराज जी कहतें है कि कुछ मत करो ? चुप रहो ????
उन्होंने तो कहा है सब जरूरी काम करो और मन भगवान को दे दो तो तुम्हारा कर्म नोट नहीं करूंगा । तुमने कुछ नहीं किया , ए मैं लिख लुंगा । 
संसार में कौन यह कह सकता है कि उसका कर्म शुद्ध है आज कलयुग में , चाहे नौकड़ी हो या व्यापार , बिना घपड़-सपड़ के अर्थ कमा लेगा लोग ? तो फेसबुक पर नैतिकता और चिकना-चुपड़ा और दिखावा, बढ़ीया बनने का और गलत का विरोध नहीं करने का दिखावा से भगवद् प्राप्ति हो जाएगा तो मुबारक हो उनको । 

क्या भक्ति का दिखावा भक्ति है ? क्या फिजिकल ड्रील भक्ति है ? 
अगर यही भक्ति आपके लिए है तो करिए ऐसा भक्ति , मेरे लिए यह सब बाहरी नाटक है , मैं तो अंदर शुद्धि बाहर कितना भी गडबर हो का , बात  समझ लिया, जान लिया और मान भी लिया ,कोई चिंता नहीं यह जान लिया और मान भी लिया । 
 
जिसको बाहर से चिकना बनना है , भक्त कहलबाना है केवल,  बनना नहीं है । शौ औफ करना है , बाहर से अच्छा बनना है वो चिकना बने , मुबारक है उनको । मैं गलत हीं सही ,  मेरा भला बुरा मैं अपना समझता हुं ।

वो कहावत है " मन मलिन तन सुन्दर कैसे "??
       
" भगवान का भक्त कभी कायर नहीं होता और डरपोक कभी भक्त हो हीं नहीं सकता है । क्योंकि भक्त के पास अपने गुरू और भगवान का विशेष बल होता है। और भगवान और गुरू का आशिर्वाद होता है उसके माथे पर हमेशा । "