Monday, 24 May 2021

हमारा जीवन = हमारा लक्ष्य = हमारा कर्म एक सफल इंसान वो होता है जो दुसरों के लिए जिता है

हमारा जीवन = हमारा लक्ष्य = हमारा कर्म 
एक सफल इंसान वो होता है जो दुसरों के लिए जिता है , जो सिर्फ और सिर्फ खुद के लिए या केवल अपने परिवार के लिए जिता है, जिविका कमाता है, वो परमस्वार्थी होता है और समाज के लिए बोझ होता है एवं असफल जीवन जीने वाला कहलाता है ।

आत्मविश्वास का संबंध सही सही ज्ञान, अनुभव, विवेक से है। सत्य ज्ञान, अनुभव और विवेक आत्मविश्वास पैदा करता है। अव्यवहारिक ज्ञान अहंकार पैदा करता है ।

क्या हम सवाल करते हैं कि कल सूर्य उदय होगा या नहीं? या क्या हमारे आपके लिए साँस लेने के लिए पर्याप्त हवा उपलब्ध होगी या नहीं ? सुबह होगी या नहीं ?
 क्योंकि हम जानते हैं कि ये चीजें कल इसी तरह ही होंगी, जैसा कि वे आज हैं। ऐसी हीं सत्य का अनुभव हमारे स्वभाव में, हमारी देखभाल करने की क्षमताओं में और हमारे द्वारा की गई सैकड़ों अन्य उधमों के प्रति आत्मविश्वास को पैदा करता है। हम जितनी जागरूकता से जानेंगे समझेंगे अनुभव करेंगें किसी बिषय और बस्तु के बारे में उतना आत्मविश्वास पैदा होगा ।

जब हम सब अपना अपना ध्यान अपने शरीर के उन अंगों पर केंद्रित करतें हैं तो हम यह पातें कि हमारे शरीर का प्रत्येक आंतरिक अंग हमारे जानने या हमारे हस्तक्षेप के बिना हमारे लिए कैसे लगातार काम करती रहती है।

 ध्यान से देखें कि श्वसन क्रिया अपने आप से कैसे होती रहती है, हमारी पलके बिना हमारी आज्ञा के कैसे झपकती रहती हैं, हमारा हृदय कैसे अनायास रक्त प्रवाह को बनाए रखता है लगातार ? हमारे चाहे बिना, हमारा शारिरिक प्रक्रिया हमारी देखभाल करती रहती है। चाहे वह खरोंच हो, हमारे शरीर पर , एक कट, एक फोड़ा या फ्रैक्चर हो क्यूं न हो जाए , ध्यान दें कि एक उच्च प्रणाली भगवान का चमत्कार कैसी होती है जो ठीक ठीक काम करती है रहती है जो हमारे हित में आवश्यक कार्रवाई के साथ हमारे शरीर के प्रत्येक अंग को स्वत: कैसे ठीक करती है रहती है । किंतु हम उसमें गलत खान पान , बिचार‌ व्यवहार , सोच से उसमें हीं नहीं वल्कि प्रकृति के कार्य में भी व्यवधान पैदा करते रहते हैं । 

आत्म विश्वास विकसित करने के लिए, हमें भरोसा करने की आवश्यकता है ईश्वर पे , श्रोत्रिए एवं ब्रह्मनिष्ठ गुरू पे और खुद पे । भरोसा रखें कि हम ठीक होंगे चाहे कैसी भी बाधा हो । फिर हम जीतते हैं । हम खुश हैं, या अवसाद की गहराईयों में हैं। हम सुर्खियों में हैं, या अंधेरे अकेलेपन में हैं। अगर हम जानते हैं कि हम ठीक होंगे तो हम ठीक होते हीं है हमेशा । बस हमें पूर्ण भरोसा करना होगा भगवान पर व अपने सद्गुरू पर, पूर्ण विश्वास करना होगा ।
हमें अपने सुबिधा जनक परिधि से बाहर आने से नहीं डरना होगा । 
जिंदगी की सफलता और सुख , सांसारिक पद् प्रतिष्ठा , पद्वी , पोजिशन , सत्ता और केवल अत्यधिक पैसा कमाने का नाम नहीं है ।
हम अपना लक्ष्य कैसा चुनते हैं इस पर निर्भर करता है ।
धन दौलत की अत्यधिक चाहत और इस चिजों के लिए अगर हम अपना सेहत खो दें और समाज से, देश से सिर्फ और सिर्फ लेने का लक्ष्य को लेकर काम करतें हैं तो हम सफल नहीं घोर स्वार्थी कहलाऐंगें ।
समाज से , देश से हमें उतना हीं लेना चाहिए जितना जीने के लिए जरूरी हैं । 
हमें समाज को , देश को कुछ देने का लक्ष्य भी बना कर काम करना चाहिए । हमारे संविधान में पहले हमारा देश के प्रति मौलिक कर्तव्यों का निरूपण है और आज्ञा है और उसके उपरांत मौलिक अधिकारों का । 
पर दुख इस बात का है कि हम सभी हर जगह केवल अपने अधिकारों के प्रति सचेत होते हैं अपने कर्तव्यों को भुल जातें हैं । 

केवल लेने की सोचना असफलता का मुख्य कारण ह
 हैं । हमें लेने से ज्यादा देने की सोचना और करने की लक्ष्य लेकर चलना होगा , वर्णा समाज , देश समझ जाएगा कि हम सिर्फ स्वार्थी हैं ,‌एवं एक दिन की हम बोझ समझे जाऐंगें , और इस प्रकार हम एक न एक दिन त्याग दिए जाऐंगें । यह त्याग कि प्रक्रिया सबसे पहले अपने पति या पत्नी , फिर बच्चे , फिर समाज और फिर देश के द्वारा की जाती है ।
फिर जीवन में सबकुछ होते हुए हमारा जीवन बोझ लगेगा । निराशा होगी , असफल जीवन लेकर दुनियां से रूखसत होना हम अपने नसीब में खुद लिखेंगें ।

इसलिए दान करना चाहिए , दान केवल धन का हीं नहीं होता , 
दान , श्रम का , तन का , ज्ञान का , बुद्धि का , महत्वपूर्ण होता है । 
जैसे गरीब बच्चों को पढ़ाना , एडल्ट एजूकेशन , समाज में अच्छी चींजों के लिए जागरूकता पैदा करना , सड़क , मुहल्ले आदि के साफ सफाई के लिए काम करना , अन्य जीवों के हितों के लिए काम करना , 
पेंड़ पौधे लगाने का काम , प्रकृति की रक्षा के लिए काम , बेजुवान जानवरों के हित के लिए काम , अनाथ बच्चों को शिक्षित करने का लक्ष्य आदि , कुछ भी हम चुन सकतें हैं ।
मेरा आज का लेख - संजीव कुमार 
श्री राधे।।

जब भगवान ने अपने भक्त को सताने बाले को दंड दिया ।

श्री महाराज जी के श्री मुख से :-
एक बार एक शिष्य नदी पार कर अपने आश्रम जा रहा था । नाव में उसके साथ अनेक यात्री बैठे थे । उनमें कुछ युवक भी थे । शिष्य की धोती एवं शिखा देख सभी युवक उसका उपहास कर रहे थे । किन्तु वह कुमार अत्यंत धीर - गम्भीर हो बैठा था ।
अन्य सभी यात्री भी युवकों की शरारतपूर्ण बातों को सुन मुस्कुरा रहे थे ।
न उस शिष्य ने , न ही अन्य किसी यात्री ने उन युवकों का विरोध किया । युवक इससे उत्साहित हो उस शिष्य को और अधिक चिढ़ाने लगे । किसी ने उसकी शिखा खींची , तो किसी ने उसकी धोती का मजाक बनाया , 
पर वह शिष्य अत्यंत शान्त हो बैठा रहा । किसी प्रकार का प्रतिवाद उसने नही किया । यहां तक कि एक युवक उसे पत्थर फेंक कर मारा , जिससे उसके माथे से रक्त निकल आया । फिर भी वह उसी शांत और स्थिरता के साथ बैठा रहा । कोई विरोध न किया । अब किनारे आ गया । शिष्य वहाँ उतर गया और नाव आगे बढ़ी ।

नाव अभी बीच में हीं पहुँची थी कि पलट गई , सारे यात्री नदी में डुबने लगे , शिष्य का मजाक उड़ाने वाले से लेकर मजा लेने वाले और चुपचाप देखने वाले , लुत्फ उठाने वाले भी , सारे के सारे डुबने लगे । 
पर वह शिष्य बहुत दु:खी हुआ । उसने भगवान से कहा - प्रभु ! यह आपने क्या किया ?
भगवान ने उत्तर दिया - पुत्र ! तुम्हारे अति दीन स्वभाव को देखकर मुझसे रहा न गया , अतएव मुझे ही उन्हे, दण्ड देना पड़ा । यदि तुम उनका जरा भी प्रतिकार करते, तो मैं उन्हे दण्ड न देता , किन्तु तुम पूर्णत: शरणागति हो और मैं शरणागत की रक्षा करता हूँ । मेरे शरणागत भक्त को कोई सताए तो मैं उसको स्वयं कठोर दण्ड देता हूँ यह मेरा विधान है ।
- श्री महाराज जी 
महाराज जी ने इसिलिए बार-बार कहा है - तुम्हारी कितनी प्रगति हुई है , इसे मापा जा सकता है यह देखकर कि तुम्हारे अन्दर कितनी दीनता है । दीनता- सहनशीलता भक्ति के आभूषण हैं ।।

Sunday, 23 May 2021

वैदिक_घड़ी

वैदिक_घड़ी 

देखिये, जानिए और समझिए कि भारत के सभी वस्तुओं को कैसे-कैसे नष्ट किया गया, पूरा अवश्य पढ़ें......

◆ 12:00 बजने के स्थान पर आदित्या: लिखा हुआ है, जिसका अर्थ यह है कि सूर्य 12 प्रकार के होते हैं.

अंशुमान,अर्यमन, इंद्र, त्वष्टा, धातु, पर्जन्य, पूषा, भग, मित्र, वरुण, विवस्वान और विष्णु। 

◆ 1:00 बजने के स्थान पर ब्रह्म लिखा हुआ है, इसका अर्थ यह है कि ब्रह्म एक ही प्रकार का होता है।

एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति

◆ 2:00 बजने की स्थान पर अश्विनौ लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य यह है कि अश्विनी कुमार दो हैं।

◆ 3:00 बजने के स्थान पर त्रिगुणा: लिखा हुआ है, जिसका तात्पर्य यह है कि गुण तीन प्रकार के हैं।

सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण।

◆ 4:00 बजने के स्थान पर चतुर्वेदा: लिखा हुआ है, जिसका तात्पर्य यह है कि वेद चार प्रकार के होते हैं। 

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।

◆ 5:00 बजने के स्थान पर पंचप्राणा: लिखा हुआ है, जिसका तात्पर्य है कि प्राण पांच प्रकार के होते हैं। अपान, समान, प्राण, उदान और व्यान। 

◆ 6:00 बजने के स्थान पर षड्र्सा: लिखा हुआ है, इसका तात्पर्य है कि रस 6 प्रकार के होते हैं।

मधुर, अमल, लवण, कटु, तिक्त और कसाय। 

◆ 7:00 बजे के स्थान पर सप्तर्षय: लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि सप्त ऋषि 7 हुए हैं।

कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ। 

◆ 8:00 बजने के स्थान पर अष्ट सिद्धिय: लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि सिद्धियां आठ प्रकार की होती है।

अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्व और वशित्व।

◆ 9:00 बजने के स्थान पर नव द्रव्यणि अभियान लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि 9 प्रकार की निधियां होती हैं।

पद्म, महापद्म, नील, शंख, मुकुंद, नंद, मकर, कच्छप, खर्व। 

◆ 10:00 बजने के स्थान पर दशदिशः लिखा हुआ है, इसका तात्पर्य है कि दिशाएं 10 होती है।

पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, नैऋत्य, वायव्य, आग्नेय, आकाश, पाताल। 

◆ 11:00 बजने के स्थान पर रुद्रा: लिखा हुआ है, इसका तात्पर्य है कि रुद्र 11 प्रकार के हुए हैं।

कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, अहिर्बुध्न्य,शम्भु,चण्ड और भव ।

असली संतों , वास्तविक संतों के पास अपेक्षाकृत कम लोग क्यों जातें हैं ?

असली संतों , वास्तविक संतों के पास अपेक्षाकृत  कम लोग क्यों जातें हैं ? क्योंकि असली संत मुख देखा बात नहीं करते , झूठा आशिर्वाद नहीं देते । असली संत कटु सत्य सामने रखते हैं , वे वेद् , शास्त्र सम्मत वास्तविक बात और उसका असली अर्थ बतातें हैं एवं हमेशा सही एवं उचित मार्ग दर्शन करतें हैं दिर्घकालिक परम कल्याण हेतु लोगों का । जो बहुतों को अच्छा नहीं लगता है आज के युग में। 

 किसी भी संस्कृति में सभी लोग बुरे नहीं होते ।सभी संगीतकार और फिल्मी संगीत ग़ज़ल ,‌शेरो शायरी बुरे नहीं होते , चाहे वो किसी भी भाषा में क्यूं ना हो । कुछ भटके हुए इंसानों को देखकर  , सभी को एक तराजु में तौल देना , यह अच्छे लोगों का , विद्धानो ( सही सही ज्ञानी Real literate people ) का काम नहीं है । 
In this world nothing is perfect except real Sant . Every things has  two side like coin , one side  is good second is evil . So every things has composition of good and evil except  God and real Sant .

So man of learned always thinks according to good side of coin . 
Where evil always  thinks according to bad insight  .
आज  व्यास पीठ पर बैठने वाले कुछ दो चार कथा बाचक  तत्वज्ञानी तो क्या संसार का भी उनको ठीक से ज्ञान नहीं है । कथा बांचना एक साधारण पेशा बना दिया गया है  । 

क्षूद्र लोकेशना ( घटिया लोकप्रियता ) की मंशा से  और स्वार्थ हेतु धन कमाने की लालसा से ग्रसित व्यक्ति  फुहर लोकरंजन का समावेश व्यासपीठ पर बैठकर अपने कथा में करतें है । लोग अज्ञानतावस, शास्त्रों से दुर होने के कारण, जल्दी इनके झांसे में आ जातें हैं । क्योंकि इनको झूठ के बुनियाद पर आधारित गलत दिलासा भगवान के नाम पर दिया जाता है । भोगवादी कथा कहानियों का समावेश  आजकल ऐसे कथाकार अपने कथा में खुब करतें हैं। 
घटिया फिल्मी गानों पर घटिया फिल्मी डांस का नूमाईस कुछ कथाकारों द्वारा खुब हो रहा है। जबकि फिल्मों में भी भावयुक्त भक्ति गाने हैं और भक्ति में भावयुक्त क्लासिकल नृत्य का समावेश किया जा सकता है  ।

पर कुछ लोग सही सही भक्ति भावयुक्त  फिल्मी भक्ति संगीत का भी चुनाव नहीं करतें हैं । 

गलत गानों को अपनातें है ताकी उसपर फुहर ठुमका अच्छे से लग सके  और लोग भी उसी स्टाइल में इनके  प्रवचनों में खुब ठुमके लगा लगा कर अपने को बहुत बड़ा भक्त मान बैठतें हैं , दिखातें हैं ।   वो उछल कुद भक्ति नहीं हैं । धोखे में हैं ।
हरेक धर्म में ऐसे लोग हैं । कोई गला फार फार कर हितोपदेश दे रहें हैं । तो कोई ऊंची ऊंची मिनार पर लाउडिसपिकर से जोर जोर से वाग दे रहें है । ऐसे कथावाचक  कुछ संस्कृति में कम तो कुछ में बहुत ज्यादा है ।
 दु:खी लोगों को भगवान, ईश्वर , खुदा , अल्ल्लाह, जीसस आदि  के नाम पर आए दिन  हाथ की सफाई से जादुई चमत्कार दिखा कर  ठगा जाता है , खुब गुमराह किया जा रहा है । और अनपढ़ हीं नहीं वल्कि तथाकथित पढ़ें लिखे लोग ( कुशिक्षित  लोग ) भी इनके पास दौड़ लगातें हैं , यहां खुब भीड़ जुटती है ।
अभाव ग्रस्त लोग , दु:खी जीव अपने स्वसांत्वना हेतु इनका हांथ अपने सर पर रखवाना चाहतें हैं, इसलिए झांसे में आकर लोभ और लालचबस , दु:ख निवृति की आकांक्षा से ऐसे लोगों का चरण छुते हैं और वेचारे के हांथ कुछ नहीं लगता है , उल्टे बरबाद होकर वापस लौटते हैं और फिर इल्जाम लगाते हैं कि फलाने ने मेरी अस्मिता लुट ली , तो धन लुट ली । अपनी गलती नहीं मानतें हैं । शौर्ट कट दु:ख निवृति और सुख की प्राप्ति के लालसा में अंधे होकर पहले तो ए लोग उनके पीछे दौड़तें हैं फिर अपना सबकुछ लुटने के बाद बाप-बाप करते हुए कोर्ट और कचहरी के चक्कर लगातें है और फायदा होता है मिडिया को ,‌वकिलों को , तो राजनैतिक पार्टी को । और यह कहानी बन जाता है लोकरंजन के लिए । वांकी लोग बड़े मजे से ऐसे ऐसे कहानी को मिडिया एवं  सोसल मिडिया में डालकर खुब लाईक और टी आर पी पाकर सस्ती और घटिया प्रसिद्धि पाने चेष्टा करतें हैं । यही चल रहा है आज कलयुग में । 
 जय जय जय श्री राम ।

आज हमारा व्यवहार विरोधी‌ है प्रतिकुल है पर इच्छा अपेक्षा , कामना अनुकूल है । फिर संसारिक दु:ख कैसे ना मिले ?

आज हमारा व्यवहार विरोधी‌ है प्रतिकुल है  पर इच्छा अपेक्षा , कामना अनुकूल है । फिर संसारिक दु:ख कैसे ना मिले ?
आज कलयुग के हममें से ज्यादातर जीवों की वास्तविक स्थिति,  हमारी कर्तव्य परायणता कैसी है ? पर हमारी इच्छा , अपेक्षा कैसा है ? यह विरोधाभास हीं हमारे संसारिक दु:खों का मूल कारण है। 
१.हम गुरू के आदेशों को, सिद्धांतों को नहीं मानतें‌ हैं , या  केवल उसी आदेशों व ऊपदेशों को मानेतें हैं , जो हमारे अनुकूल हो , हमारे मन लायक हो ,  जिसमें हमारी सुविधा हो । किन्तु  अपेक्षा है कि गुरू कृपा हम पर पुरा पुरा हो । कैसे संभव है ? 

२. हम भगवान का,  हरि का सही सही सच्ची भक्ति नहीं करेंगें । केवल जल चढ़ा कर दो-चार अगरवत्ती जला कर धूप दीप दिखा कर अपनी सुविधा के अनुसार चढ़ावा चढ़ाकर और जहां मंदीर,  मस्जिद , गुरूद्वारा , गिरिजाघर आदि मिले उसके सामने केवल सर झुका कर , मन को नहीं , केवल तन झुकाकर  औपचारिकता पुरा करेंगें । लेकिन जो हम चाहते़ं हैं,  इच्छा रखतें हैं वो भगवान , ईश्वर , खुदा , अल्ल्लाह , जीसस पुरा जरूर करें क्योंकि हमारी इच्छा की पूर्ति हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है ! अरे हम भगवान से चारसौबीसी करतें हैं तो वो सबके बापों के बाप है वो आठसौबीसी तो करेंगें हीं हमारे साथ । 

३. हम समाज में परिवार में बड़े बुजुर्गों को , योग्य शिक्षकों को और दुसरे किसी का भी अपमान करें पर हमारी अपेक्षा है कि सभी मेरा सम्मान करें हमेशा !

४. हम मां बाप के छत्र छाया में संरक्षण और साधन पर कमाऊ बन जाने पर, थोड़ा काबिल बन जाने पर  अपने माता पिता को ना पुछे , उनको बुढ़ापे में साथ छोड़ दें , उनके लालन पालन ,‌स्नेह को भुल जाएं पर उनके बशियत पर , संपत्ति पर हमारा हीं पुर्ण अधिकार हो । 

५. हम अपने बड़े भाई को , ताऊ ,चाचा चाची का अपमान करें पर ये लोग हमेशा मेरा सहयोग करें , फेवर करें , हमारा खयाल रखे। हम लक्षुमण ना बने पर मेरा भाई राम जैसा हो । कुछ मां बाप भी पैदा करके छोड़ देतें हैं पर अपेक्षा होती है वेटा राम की तरह हो । बहन सुभद्रा जैसी ना हो पर भाई श्री कृष्ण जैसा चाहती है तो भाई बलदेव जैसा ना हो पर बहन सुभद्रा जैसी हो । हम राम जैसा ना हो पर पत्नी सीता जैसी चाहतें हैं । 

६. हम समाज के लिए कुछ ना करें पर समाज मेरे लिए सबकुछ करें ।

७. हम देश के लिए कोई भी मौलिक कर्तव्य का पालन ना करें लेकिन देश का संविधान में निहित मौलिक अधिकार के अनुसार देश से हमको सबकुछ मिले ।

८. हम जनमानस में नफ़रत का जहर घोलें लेकिन जनमानस हमेशा मेरा सम्मान करें ।

९. हम शरीर को स्वस्थ रखने के लिए उचित  पौस्टिक आहार को ना ले  और गलत आहार जैसे मांस , मदिरा , शराब , कबाब , जंक फुड , मैदा से बना सामान जैसे पिज्जा , बर्गर , पेस्ट्रीज , नुडल्स , चाऊमीन , खुब तला हुआ  मसालेदार चटपटा खुब खाएं पर अपेक्षा है कि हमारा शरीर बीमार ना परे कभी । शरीर हरवक्त हमारे मनोनुकूल चले। खुब मोबाईल कंप्युटर आदि इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट्स  का ग़लत इस्तेमाल करें दिन भर पर आंख हमारी कमजोर ना हो। ऊंचे आवाज में डीजे सुने पटाखा फोड़े पर कान सलामत रहें ! आदि । खुब रफ तरिके से गाड़ी चलावें पर दुर्घटना ना हो कभी ।

१० . हम प्रर्यावरण , प्रकृति का खुब नूकसान करें पर प्रकृति हमारे अनुकूल रहें हमेशा ! हम दुसरे जीव को दु:ख दे , मारे , काटे पर हम उससे सुख की अपेक्षा करतें हैं । क्या यह सही है ? 
हमारी यही विरोधाभासी कामना जब पुरा नहीं होता तो हम अत्यधिक दु:खी होतें हैं संसार में । हम जब अपने कर्त्तव्यों के प्रति सचेत ना होकर केवल अपने कामना की पूर्ति  की इच्छा करते हैं अधिकार स्वरूप समझते हैं संसारी सुखों को  तो भगवान का संविधान कानुन हमें रोग, शोक , संसारिक दु:ख देता है । चाहे आज मिले या कुछ काल बाद । इसमें आश्चर्य कैसा ?

निश्कर्ष :- हम बोतें हैं पेड़ बबूल का और अपेक्षा करतें हैं स्वादिष्ट गुद्देदार आम का , जो कदापी संभव नहीं‌ है  ।

आज के परिदृष्य में , दुष्ट व्यक्ति ( जिसके अंत:करण में विष हीं विष भरा है ) , दुष्ट समाज , दुष्ट राष्ट्राध्यक्ष को उत्तम ज्ञान देकर समझाना बहुत बहुत मुश्किल हैं ।

आज के परिदृष्य में , दुष्ट व्यक्ति ( जिसके अंत:करण में विष हीं विष भरा है ) , दुष्ट समाज , दुष्ट राष्ट्राध्यक्ष को उत्तम ज्ञान देकर समझाना बहुत बहुत मुश्किल हैं । कारण है मोराल क्राइसिस , नैतिक पतन । आज के प्रदुषित परिवेश में अपने बुद्धि पर बल देने वाले बहुत कम लोग हैं । अतिशय स्वार्थ सिद्धि के लिय छल प्रपंच का सहारा लोग लेतें है। कुछ शैतान मौलवी , मुल्ला, साधु और पादरी के भेष में घुमतें हैं । अयोग्य व्यक्ति महत्त्वपूर्ण पदों पर कई जगह बैठे हैं । देश, कलुषित मानसिकता वादी स्वार्थी तत्वों से परेशान है। कुछ लोग अपने ही परिवार का घातक है( दारू पीकर दंगा करते हैं घर में) , कुछ लोग अपने हीं जाति ( मानव जाति) , धर्म , समाज और देश का दुश्मन हैं वो भला निरीह बेजूवान और निर्बल को कैसे जीने देगा ? सत्ता कैसे भी किसी तरह भी हांथ में आ जाए इस उद्देश्य की राजनीति होती है । 

आज का हालात त्रेता युग के उस काल से जिसमें भगवान को रावण बद्ध करना पड़ा और द्वापर के अंतिम काल से भी काफी नीचे गिर गया है , दूषित हो गया है जिसमें रावन जैसा पंडित , ज्ञानी भी भगवान राम के उपदेशों को नहीं समझ सका , और दुर्योधन और उनके पिता धृतराष्ट्र को भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं समझाया ,‌शांति प्रस्ताव लेकर गए स्वयं भगवान । 
जरा सोचिए की स्वयं भगवान शांती संदेश लेकर गए , और दुर्योधन के धृष्टता पर अपना चक्र दिखा कर , तमाम सभा में अपने मुल स्वरूप का एक झलक भी दिखाया , ताकी शांती संदेश का प्रस्ताव स्वीकार हो डर के मारे भी और युद्ध टल जाए पर कोई प्रभाव नहीं हुआ । और अंत में एक युद्ध का विकल्प हीं बचा दोनों काल में । 
आज उससे भी बदतर स्थिति है । 
सनातन धर्म में वेद में इसलिए साम , दाम , दंड, भेद का भी विधान है । 
सनातन पहले तो शांति पसंद करता है । नहीं मानने पर दाम से शांती कायम करना चाहता है । फिर भी नहीं तो भेद , विभेद द्वारा विरोधी को खंडित करके शांती स्थापित करता है और फिर भी नहीं समझा तो फिर धर्मयुद्ध द्वारा दुष्टों को दंड देने का विधान है । 
अतः अब आजकल जो दुष्ट लोग , देश , समाज शांती का पाठ नहीं समझता और उस पर साम ,दाम एवं भेद का भी कोई असर नहीं होता है , उसको धर्मयुद्ध द्वारा दंड देने का अंतिम विकल्प हीं शेष बचता है । 
 :- जय जय जय श्री राम ।

Wednesday, 19 May 2021

मेरी कविता :- " रोता हूँ जब तेरी यादो में तुम ही आंसु बन जाते हो |

मेरी कविता :- 
" रोता हूँ जब     तेरी यादो में 
   तुम ही आंसु   बन जाते हो |

  लिखता हुँ जब कोई गीत तुझे 
  तुम छन्द बन      छा जाते हो |

  बन कर  बसंत तुम पतझर  में 
  हर गुलशन को   महकाते   हो |
 
  बन कर कभी राधा की करुणा 
  भक्तो  पर      प्रेम  लुटाते   हो ||

  घनघोर   निशा   की बेला   में 
  तुम ही   चन्द्रमा बन जाते  हो |
 
 बन कर  गोपी का   गीत   प्रभु 
 कृष्ण को  तुम ही रीझाते    हो |

बन धुन वंशी कभी  कान्हा   की
भक्ति का     गीत    सुनाते   हो |

  बन कर कभी राधा की करुणा 
  भक्तो  पर      प्रेम  लुटाते   हो ||

   मेरे   इस     निरस   जीवन  में
  तुम   बहार     बन  जाते    हो |

  बन कर   घटा घन   घोर  प्रभु 
  बन मोर  नाचते     मधुवन में   |
  
  छा जाते बन हरियाली ब्रज में
  तब तुम ही कृष्ण  बन जाते हो |

  बन कर कभी राधा की करुणा 
  भक्तो  पर      प्रेम  लुटाते   हो ||

  कभी घनन घनन कभी छनन छनन 
  तुम वंशी मधुर बजाते हो 
  तुम वंशी मधुर बजाते हो ||"
  
  ( मैं ए गीत गुरुदेव  आपके  प्रेरणा ही से लिखा है और आपको समर्पित-संजीव आपका चरणानुरागी )

Tuesday, 18 May 2021

अत्यंत महत्वपूर्ण शब्जेक्ट :- गोपनियम गोपनियम गोपनियम , यह तीन शब्द संतों , शास्त्रों ने , महापुरूषों ने जो कहा है उसका समझ मुझे पुज्यनिया मां से पता चला था ।

अत्यंत महत्वपूर्ण शब्जेक्ट :- 
गोपनियम गोपनियम गोपनियम , यह  शब्द तीन बार  संतों , शास्त्रों ने , महापुरूषों ने जो कहा है उसका समझ मुझे पुज्यनिया मां से पता चला था ।

तो यह गोपनियम गोपनियम गोपनियम शब्द के अर्थ का लोग अनर्थ करके दूसरे को ज्ञान देते लोग मिल जाएंगे की भगवान से संत से अपने प्रेम को छुपाओ ।
हां विल्कूल सही है और विल्कूल छुपाना चाहिए ।
कौन से प्रेम को छुपाना चाहिए लोग यह नहीं समझते । इसलिए यह पोस्ट लिखना परा आज ।

तो अब इसको संसारी उदाहरण देकर समझते हैं । सभी संत संसारिक उदाहरण द्वारा ही समझाते हैं ‌। कारण हम लोग दिव्य शब्दों को तो ना सुन पाएंगें और समझना तो दुर की बात है । 
जैसे नीम के किड़े को गुड़ के स्वाद समझाना मुश्किल है क्योंकि वो गुड़ का स्वाद कभी चखा हीं नहीं तो उसको कैसे समझाया जाए,  तो उस किड़े को उसी के खुद के संसार की बातों का उदाहरण देकर समझाते हैं संत आदि की,  हे नीम के किड़े तुमको जो निंब की निबौरी में जो रस मिलता है उसका हजार गुना ज्यादा रस में उस गुड़ में है,  तो फिर वो कुछ कुछ समझ जाता है ।
इसी प्रकार हम लोगों का हाल है बिना संसारिक उदाहरण के हमको दिव्य ज्ञान , आदेश आदि समझ में नहीं आता है और हम उसका कोई और अर्थ लगा लेतें हैं , और यही कारण है कि इतने सालों साल सुनते रहे संतों का , मुंडी भी हिला दी पर उनके एटोमिक वाक्य का कोई और अर्थ लगा लिए ओर गलतफहमी का खुद शिकार रहे और उसी गलत समझ से दुसरे को भी समझाने का अपराध कर बैठते हैं ।
ना शास्त्र की समझ हुई और ना शास्त्र युक्ति में निपुणता ,यानि उसका व्यावहारिक उपयोग भी नहीं जानते , और फिर गलत जगह सही बात और सही जगह गलत बात इस्तेमाल करते पाए जाते है । जैसे  दुध में नमक और दही में सकक्कड़ मिलाना समझ  लिए । और दही में सकक्कड़ तो स्वाभाविक है स्वास्थ्य के लिए सही नहीं और दुध में नमक का उपयोग  तो पागलपन है हीं ।
तो हम संसारिक उदाहरण से ही समझ सकते हैं क्योंकि हम उसी  नीम के किड़े की तरह है  ।

तो उदाहरण - संसार में पति पत्नी को लेते हैं और उसके बीच प्रेम और और गहरा रूप रति क्रिया को लेतें हैं ।
जिस प्रकार पति पत्नी अपनी रति जो पत्नी पति से और पति पत्नी से जो वार्तालाप करती है रति क्रिया करती है उसको संसार में वो गोपनीय रखती है । उसका प्रदर्शन खुले आम नहीं करती और ना करना चाहिए । 

पर वो अपने पति के प्रति बाहर संसार में  अपशब्द का या ऐसा नहीं है कि वो बाहर बोले कि मैं तो आपको जानती नहीं ।
अरे शब्दों में तो वो अपने पति को सम्मानजनक शब्दों के संबोधन का इस्तेमाल अपने बच्चों के सामने या अपने सास ससुर मित्र के सामने करती ही है । और करना भी चाहिए । नहीं तो परिवार के लोग गलत अर्थ लगा लेगें की इसको अपने पति से पटता नहीं । और फिर सभी परिवार के लोग दुखी रहेगें ।
ठीक उसी प्रकार एकांत साधना में हरि गुरू के प्रति असली प्रेम भाव को छुपाने के लिए गोपनियम का आदेश है शास्त्रों में । 
ना की उनके प्रति सम्मान का भावो शब्दों में प्रकट करने को या छुपाने के लिए कहा गया है ।

हम साधकों को अपने साधना में अनुभव अपने अंतरंग अनुभव को छुपाने के लिए कहा गया है ।
ना की उनके प्रति सम्मान प्रेम , को शब्दों में व्यक्त करने , गाने , उसका प्रचार करने से मना किया गया है ।

सामुहिक किर्तन में भी भाव प्रकट करने का दंभ करना पाप कहा गया है । जैसे दुसरो को दिखाने के लिए जबदस्ती आंसु बहाने का एक्टींग करना , जोड़ जोड़ से अठ्ठास करने का झूठा एक्टिंग , दुसरे को दिखाने के लिए झूठ मुठ के दम साध कर बेहोशी का मूर्क्षा का एक्टिंग करना पाप है ।
अष्ट सात्विक भाव भगवान के श्री चरणों में रति की अतिशयता के परिणामस्वरूप स्वरूप शरीर में हुए दिव्य दिव्य परिवर्तन भावावेश का प्रारूप है । जैसे कंप , प्रकंम , जड़ता , अठ्ठाहस , रोमांच , बेचैनी , आंखों में अनवरत बहता आंसु  अतः इन अष्ट सात्विक भाव को छुपाने का " यदा संभव" कोशिश करने के लिए कहा गया है । पर यह भी जब वास्तविक रूप से कंट्रोल से बाहर हो जाए और व्यक्त हो जाए तो पाप नहीं हैं । 
अब कोई भावावेश में सचमुच मूर्क्षित हो जाए तो यह तो किसी के बस में नहीं है कि वो वेहोश क्यों हो गया  । मुर्छा तो उसके बस की बात नहीं कब हो जाए साधना में , रूम में एकांत साधना में या सामुहिक किर्तन में ?
जिस प्रकार एक पति पत्नी  रति क्रिया छुपाती है उसी प्रकार एक साधक को भगवान से दिव्य रति क्रिया ( शारीरिक नहीं , मानसिक ) में उठे शारीरिक भावावेश एवं अनुभव को छुपाने के लिए गोपनियता का फरमुला बतलाया गया हैं ।
देखिए इसलिए बार बार और हजार बार मैंने लिखा है ।
जबतक वास्तविक रूप में हरि गुरू में श्रद्धा और प्रेम नहीं होगा हमारा । उनके दिय तत्वज्ञान को हमलोग रट लेगे पर समझेगें कभी नहीं है ये मेरा भी चैलेंज है और संतों का तो हैं हि है । 
शास्त्रों के शब्दों को रट लेंना और उसका नकल करके यानि कौपी पेस्ट करके लिख देना , याद करके बोल देना किसी दुसरे को बड़ा आसान है पर उसको समझना पहले फिर व्यवहार में सही सही उतारना फिर अनुभव करना  , यह विरले हीं कर पाते हैं ‌ हम जैसे खुद को समझदार समझने के भ्रम में रहने वाले मुर्ख नहीं । :- संजीव कुमार , रांची ।

Monday, 17 May 2021

चार बाते करो और कुछ ना करो :- श्री कृपालुजी महाराज ।।

श्री महाराज जी : प्रवचन ,
आप लोग बस केवल चार बाते याद रखे और अमल करे , माने और लागु करे अपने जीवन में , केवल चार बाते , आपको लक्ष्य की प्राप्ति हो जाएगी , बाकी सब ज्ञान की बातें है , सबको दिमाग मे नही रख सकते , क्योंकि भुलने की बीमारी है . 

हां तो वे चार बाते है  :- पहला -  हरि और गुरु की भक्ति , दुसरा - नित्य  , तीसरा - अनन्य , चौथा - निष्काम भक्ति ,

अब भक्ति किसकी करनी है तो हरि और गुरु की , भक्ति का मतलब तो आपलोग समझ ही गय होंगे , 
मन का अटैचमेंट हरिगुरु मे ही हो , मन का अटैचमेंट क्युँ ? क्युँकी भक्ति मन को ही करनी है , अन्य इन्द्रियों की भक्ति का कोई फल नही है , क्युँकि भगवान मन मे उठे संकल्पो को ही नोट करते है . वे अन्य इन्द्रियादी कर्मो को नोट नही करते , क्युँ क्युँकि सबसे पहले आप मन मे ही संकल्प करते है उसके बाद ही मन के अनुसार इन्द्रियादी अपना कर्म करती है क्युँकि सभी इन्द्रियादी मन के हीं दास होते है अत: भगवान मन के संकल्पो को ही नोट करते है , वो इन्द्रियादी कर्मो के तरफ देखते भी नही , आपका प्राइभेसी यहां नही काम करेगा , आप बुरा सोचे किसी के लिय , भगवान नोट कर लिय , कोइ चालाकी या प्राइभेसी नही चलेगा , क्युँकि भगवान सर्वान्तर्यामी है और वो हमारे ह्रदय मे वैठ कर सब आइडियाज को , हर पल हर क्षण के आइडियाज को नोट करते रहते है और तदनानुसार फल देते हैं 
अत: मन का अटैचमेंट हमेशा हरि और और गुरु मे हीं हो ,
और ध्यान दो ...... और हर क्षण हो कि श्याम सुन्दर हमारे अन्दर बैठे है , 

और नित्य हो , मतलब ये नही की हर दिन केबल आधा घन्टा का भक्ति कर लिय हो गया , नही नही 
ऐसा नही चलेगा हर समय अपना काम करते हुए याद करें कि हमारे मन का अटैचमेंट हरिगुरु मे ही है .
नही तो एक घन्टा के लिय साधना किया और २३ घन्टा संसार मे लगाए रखे , इस तरह तो कपड़े को एक बार साफ पानी मे साफ कर दिया और बाकी सारे समय गंदे पानी मे डुबाते रहे , इस तरह कपड़ा कभी साफ होगा ही नही , गंदा का गंदा ही रहेगा ,
इस तरह समझो की कमाए केवल १०० रु और प्रतिदिन खर्च कर दिया २३०० रु फिर क्या होगा आपलोग जानते हैं |
इसलिय कही भी काम करते हुए या तो आफिस मे या दुकान मे संसार मे काम करते हुए हरेक आधे घन्टे मे कम से कम ए सोचो की भगवान श्री कृष्ण हमारे अन्दर बैठे है आपका काम बन जाएगा |

तीसरा - भक्ति अनन्य हो हरि और गुरु का ही हो , ऐसा नही की कुछ देर हरिगुरु मे मन का अटैचमेंट कर लिया और वांकी समय , माया बद्ध संसार को मन मे ले आए , माया बद्ध मां के लिय , वाप के लिय , भाइ के लिय , मित्र के लिय या अन्य संसारी लोगो के लिय , राग , द्वेश , घृणा , क्रोध ,  राजसीक या तामसीक भक्ति करते रहे  या सोचते रहे !
या अन्य माया बद्ध देवी , देवता की सात्विक भक्ति करते रहे , ये स्वर्ग लौक ,  देवी देवता ईंद्रादि  भी माया बद्ध ही है इनकी माया समाप्त नही हुई है | 
अत: एक तरफ इनकी भक्ति कर लिय इनको भी मन मे रखे हुए है और हरि और गुरु की भी भक्ति कर रहे है ,यह अनन्य भक्ति नही हुआ , क्युकि मायाधिन की भक्ति करोगे तो माया नही जाएगी और जब तक माया नही जाएगी तो भक्ति का फल नही मिलेगा , काम नही बनेगा , लक्ष्य की प्राप्ति नही होगी , 
देखो जिसकी बात सोचते रहोगे उसका कार्मिक दोष भी तुम्हारे अंदर आ जाएगा , आप कहोगे अरे हम तो कुछ नही किय , अरे नही किए लेकिन सोंचे तो , यही तो गरवड़ कर दिए , भगवान तो मन मे उठे विचारो को ही नोट कर लिय ,
अरे ए मन ही तो है जो आपसे पाप कर्म करवाते है ,
कइ जन्मो से करवा रहा है 
इसलिय कभी भी मन मे मायाबद्ध जीवों या देवी देवता के प्रति राग और द्वेश भाव उठे तो हरिगुरु का भजने करने  लगो मन हीं मन .  और सोंचो की ए मन बहुत गंदा है जबतक भगवत् प्राप्ति नही हो जाएगी यह हमे इसी तरह परेशान करता रहेगा , 
मन मे जैसे ही किसी के प्रति दोष भाव आए तुरत लाइन काट दो , मन का अटैचमेंट हरिगुरु मे कर दो,

देखो कपड़े मे आग पकड़ा तो आग पकड़ते ही आप बुझा देते हो न,
देखो खाते समय मुहं मे कंकड़ आ गया कैसा मुह बनाते हो , तुरत बाहर निकाल देते हो , उसी प्रकार जैसे ही मन का अटैचमेंट संसार मे होने लगे और राग , द्वेष , क्रोध आदि दोष उत्पन्न हो डिसकनेक्ट करके मन को हरिगुरु मे लगा दो , हरिनाम , गुण , लीला , धाम , उनके सन्त के तरफ कर दो मन को  .
काम बन जाएगा , भगवान फिर बुरे भावों को नोट नही करेंगे ,

अत: भगवान के रुप , गुण लीला , धाम और उनके सन्त मे ही मन का लगाव हो , ध्यान दो मन मे हीं, का मतलव सिर्फ भगवान के रुप , गुण लीला , धाम और उनके सन्त मे ही मन का लगाव हो अन्यत्र कही नही ,
इसी को अनन्यता कहते है .

अब आइए भक्ति निष्काम हो , यानी हम उनसे उनके सुख की ही कामना करें , 
संसार नही मांगोगे तो भी मिलेगा  क्युँकि संसार तो अपने अपने प्रारब्द्ध के अनुसार अपने अपने असंख्य जन्मों के कर्म के अनुसार मिल ही रहा है और मिलेगा ही , नही चाहोगे तो भी मिलेगा , तबतक मिलता रहेगा जबतक माया नही जाएगी , और माया तबतक नही जाएगी जबतक भगवत् प्राप्ति नही होगी .
क्युँकि जबतक भगवान अपनी माया को नही कहेगे की ऐ इसे छोड़ दो जी , ए हमारा हो गया अब , तबतक माया नही जाएगी .

और कही संसार मांगे और मान लो मिल भी गया तो लक्ष्य से भटक जाओगे . तुम संसार मे रम जाओगे और परमानंद से हमेशा के लिय बंचित होकर फिर चौरासी लाख के चक्की मे पिसने के लिय तैयार रहना ।
इसलिय केवल हरि और हरि गुरु का हीं भक्ति हो नं एक 
, नं दो भक्ति नित्य हो , नं तीन भक्ति अनन्य हो ( हरि और गुरु के नाम रुप , लीला , गुण , उनके नाम और उनके संत मे ही सदा मन का अटैचमेंट हो )
और नं चार निष्काम भक्ति हो ,
केवल ए चार काम करो आपका काम बन जाएगा ।

:- जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Saturday, 15 May 2021

"भक्ति की शक्ति "

"भक्ति की शक्ति " 
मैं तो बल हीन हुंँ , धन हीन हुंँ , निर्बल हुंँ , ज्ञान हीन हुंँ पतित हुंँ , फकीर हुंँ पर फिर भी मैं राजा हुंँ , आनंद है मेरे पास । कैसे भाई  सब तरह से दीन हुंँ फिर भी राजा ? 
हांँ राजा हुंँ क्योंकि मैं अपने ईष्ट और गुरू का दास हुंं । 
एक भक्त कहता है अपने गुरू से कि :- 

उसके दर की गुलामी बादशाहत मेरी 
हुकुमे़ खुदा पर टिकी हुकूमत मेरी 
उसके नखड़े उठाऊं ये इबादत मेरी 
उसकी इताअत बन गई अब आदत मेरी 
बस सलामत रहे ये इरादत मेरी 
ये गुलामी मेरी और बादशाहत तेरी ।।

मैं हर तरह से लकीर का फकीर हुंँ पर मेरे पास तेरा बल है । तेरे कृपा का बल है , ए मेरे खुदा मेरे गुरू , ए मेरे हमनवां , ऐ मेरे दिल के बादशाह मैं तो बस एक तेरी ही दासता करता हुं । मेरे ह्रदय में मैं भी नहीं हुँ सिर्फ तू ही तू है । फिर मैं राजा कैसे नहीं ? 
तेरा ज्ञान रूप में मेरे पास ज्ञान का सागर है , तू प्राण रूप में मेरी उर्जा है , तुम षठसंपत्ति रूप में मेरी संपत्ति हो , तुम मेरी आत्म रूप में मेरा आत्म बल और आत्म विश्वास है । मैं तेरा सेबक हुंँ, तेरे भक्ति की तिजोड़ी जो तूने मुझ पर भरोसा करके दिया है तू मेरा है , मैं सिर्फ तेरा हुं और तेरा हीं रहुंगा हमेशा तो मैं बादशाह कैसे नहीं ! 
रहमत तेरी है सजदा मेरा , ये जो सजदा भी मैं तेरा करता हुं वो भी तेरे बल से हीं , तेरे बल से हीं पांचों पांडव बलवान हो कर कौरवों को मिटाया , अधर्म पर धर्म की विजय हुई , वो कौरव जिसको तूने अपनी सत्रह अक्छ्वनी सेना भी दे दी थी  , और जिसके पाले में भीष्म पितामह जैसे महारथी , द्रोण जैसे शास्त्रज्ञ शस्त्रज्ञ और पांडवों के भी गुरू थे व जिनके पास ब्रह्मास्त्र जैसा पृथ्वी नाशक शस्त्र था , कूल गुरू कृपाचार्य जैसे नितिज्ञ , कर्ण जैसा सूर वीर धनुर्धर , अस्वथामा जैसा रथी , तमाम शक्तियों के बाद भी समाप्त हो गए । 
यह है तेरी भक्ति की शक्ति ।

तुम ही कहते हो कि मैं उस समय भी था जब महाभारत हुआ , मैंने देखा था और तेरी कृपा से समझा की तुमने युद्ध से पहले ही हार मान कर धनुष-बाण छोड़ कर निराश बैठे , मोह ममता रूपी दल दल में फंसे अर्जूण को सतरह अध्याय तक तत्व ज्ञान दिया फिर भक्ति सिखाई यह कह कर सिखाई कि :- 
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।66।।
फिर कहा कि :- 

तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर यथाशास्त्रम्।
 युध्य च युद्धं च स्वधर्मं कुरु। 
मयि वासुदेवे अर्पिते मनोबुद्धी यस्य तव स त्वं मयि अर्पितमनोबुद्धिः 
सन् मामेव यथास्मृतम् एष्यसि आगमिष्यसि असंशयः न संशयः अत्र विद्यते।।किञ्चत

तो अंत में तुमने कहा कि हे अर्जूण  सभी कर्म धर्म ज्ञान विज्ञान पाप पुण्य के भय  को त्याग कर एक मात्र मेरी शरण में आ जाओ , और केवल मुझमें अपना मन बुद्धि चित्त लगाओ और फिर मेरी आज्ञा से , यानि आप भगवान की आज्ञा से प्राप्त बल से युद्ध करो । 
तो मैं आपकी कृपा से समझा प्रभु की  मैं अपने  शस्त्र , और शास्त्र और शारीरिक बल से , मोह माया से भरे निर्बल मन से कभी युद्ध कर ही नहीं सकता  और विजय तो दुर की कौड़ी था  ।
इसलिए आपने  शास्त्र का ज्ञान द्वारा तत्वज्ञान दिया , तत्व ज्ञान से अपनी भक्ति की तरफ प्रेरित किया पहले , और फिर मेरी माया चली गई , फिर मेरे ह्रदय में मेरा सारथी यानि गुरू बन कर ( गुरू सारथी ही होता है जो शिष्य को सर्वोच्य भक्ति की मार्ग पर ला दे , अंधकार से प्रकाश में ला दे , अंधेरा दुर कर दे मन का और फिर चित्त शुद्धि कराके विशुद्ध भक्ति प्रदान करें   ) मुझे भक्ति सिखाया । फिर आपके बल से इतनी बड़ी कौरव सेना को और बड़े बड़े महारथी को धुल चटा दिया प्रभु ।

आपने हीं मुझसे कहा था प्रभु की हे अर्जुन मैं तो इन सभी को पहले ही मार चुका हुं , जब ए सभी मेरे सनातन धर्म के विरुद्ध कर्म करना शुरू किए थे तभी इनका तेज समाप्त चुका था , इनकी आत्म बल बुद्धि , सब मैं क्षीण कर इनको निष्प्राण बना चुका था , तुमको तो मैं तत्वज्ञान देकर भक्ति की शक्ति प्रदान करके युद्ध के मैदान में खड़े इन शवों को लेटाने कि प्रेरणा दी है ।

युद्ध जीतने के बाद प्रभो मुझे अहंकार हो गया था , कि यह युद्ध मैंने जीता है । तो आपने भक्त बरवरीक के द्वारा मुझे फिर सचेत किया , बरवरिक का कटा सिर ने हंसते हुए  मुझसे कहा की युद्ध तो आप कर रहे थे । मुझे तो आपने निमित्त बनाया था केवल । 
तो इस प्रकार मैं जान गया हुं प्रभो कि कोई जीव अपने बल और कर्मो से  कभी किसी  दुष्टों को , राक्षसों को कभी नहीं समाप्त कर पाया है और ना कर पाएगा , एक मरेगा हजार पैदा होगा  । इतिहास गवाह है । शास्त्र गवाह है । 
दंडकारण्य के तमाम ऋषि मुनियो के पास उनके जप तप  योग का बल था और अनेकों दिव्यास्त्र था फिर भी वो रावण और उसके साम्राज्य को नहीं मिटा पाय खुद । आपको ही राम रूप में आना परा , उसी प्रकार पराक्रमी कंस को मात्र  एक मुक्का से समाप्त कर अपना लोक दे दिया आपने ।
आपने हिरण्यकशिपु। हिरण्याक्ष का बद्ध किया , रावण और कंस को आपने ही समाप्त किया और उनके शरीर से अपने जय विजय पहरेदार को मुक्त करके अपना लोक फिर से दे दिया । आपके सुरक्षा प्रहरी को भला कौन मार सकता था आपके सीवा प्रभु ? 

हां कौरव आदि को समाप्त करने के लिए मुझे निमित्त बनाया । क्योंकि वो सनातन का विद्रोही जीव था , धर्म से विमुख गुरू द्रोण , कृपाचार्य , भीष्म पितामह, अस्वथामा , दुर्योधन को मारने के लिए मुझे निमित्त बनाया क्योंकि उनको अपना लोक नहीं देना था आपको  , और तुक्ष लोक स्वर्ग भेज दिया आपने भीष्म पितामह , आदि को  ‌, और बांकी द्रोहियों को कौरवों को रौरव नरक दे दिया । 
अगर आप डाइरेक्ट मारते तो उनको भी आपको अपना लोक गोलोक देना परता , इसलिए यह काम अपनी भक्ति के द्वारा प्रदान शक्ति से आपने मुझसे करवाया ।

हे प्रभु आज भी वही आसुरी शक्ति आतंक बाद के रूप में उग्रवाद के रूप में फिर से विश्व में पनप रहा है ।‌
हे प्रभु मैं जानता हुं यह विधर्मी बिचार धारा रूपी आसुरी शक्ति है । इसका दमन कुछ देश , मिलिट्री , आदि थोड़ी देर के लिए कर सकता है पर ये समाप्त नहीं होने वाले ।
कारण आज बहुत से हम सनातनी खुद नहीं जानते , कि हमारा धर्म क्या है । हम सनातन धर्म रूपी भैल्यूज को खो चुके हैं , हिन्दु संस्कृति रूपी सिद्धांतों को भुल चुके हैं । हम मांस भक्षी हो गय। हम अपना संस्कार को भुल चुके । 
हम लगभग वस्त्र हीन हो चुके हैं हम सनातनी कबाबी ,‌जुआरी व्यभिचारी हो रहें हैं । हमारी माता बहने बेटा ,बेटी लगभग वस्त्र हीन सभ्यता अपना चुंके है । सिगरेट और शराब और दारू खाना हमारा मंदिर बन चुका है । संतो में , महापुरूषों में शास्त्रों में हमारी श्रद्धा ना रही , 
हम घटिया तामसिक किताब और विडियो और फिल्म देखने लगे हैं । फिल्म की कुछ विचित्र वस्त्र पहने लगभग वस्त्र हीन अभिनेता , अभिनेत्री हमारा रोल मोंडल बन गया है और हम उसके प्रवचनों को सुनने और विश्वास करने लगे हैं । हम ढोंगी साधु चमत्कार दिखाने बाले के शरण में जाने लगे हैं । हम असंगठित हैं । हम अपने ही धर्म से च्यूत हो रहे हैं । इन दुर्गुणों के कारण मैं तेज़ हीन हो गया हुं । मेरा अंत:करण बहुत गंदा हो चुका है ।
और फिर भी हम अहंकार करने लगे हैं कि हम अपने क्षूद्र बिद्या बल बुद्धि के बस में आकर जोश में उछल‌ कर बाते बना कर   हम उस बिचार‌धारा को समाप्त कर देगें ।‌

नहीं प्रभु , नहीं  मैं जानता हुं यह सम्भव नहीं है । 
हम आपके शरण में हैं प्रभु आप अपनी सनातन की चिंता करो फिर से , आप अपने जन कि चिंता करो फिर से । हे प्रभु मैं तो केवल आपके सेवक हुं , भक्ति के सिवा‌ आपने हमें कुछ भी करने को नहीं कहा है । मैं तो भक्ति हीं करूंगा । और कुछ भी नहीं प्रभु । 
आपने हीं कहा है गुरू देव - 
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
" हर समय मन ही मन हरि गुरू को स्मरण करते हुए युद्ध , युद्ध कुसंग से , कुविचारों से बचना और आपको भजना मन ही मन  " हरिगुरू रक्षा कर रहें हैं । करेंगें , यह दृढ़ विश्वास "
:-आपका नित्य दास संजीव कुमार , रांची। आज तारिख 16 मई ।

हमें अगर अपने भगवान श्री कृष्ण पर भरोसा है तो फिर हम सनातनी इतना बैचैन क्यूं हैं कि कोई सनातन धर्म को समाप्त कर देगा ? ऐसा सोचने बाला अगर कोई सनातनी भी है तो गलत है। फुल मैड है ।

हमें अगर अपने भगवान श्री कृष्ण पर भरोसा है तो फिर हम सनातनी इतना बैचैन क्यूं हैं कि कोई सनातन धर्म  को समाप्त कर देगा ? ऐसा सोचने बाला अगर कोई सनातनी भी है तो गलत है। फुल मैड है ।

सनातन धर्म का उद्भव और अंत ।। ( एक सत्य चिंतन )

जीस प्रकार भगवान अनादि है उसी प्रकार हमारी आत्मा अनादि है और ठीक उसी प्रकार सनातन धर्म ( हिन्दु संस्कृति ) आनादि है । 
हम कब से ? जब से भगवान , भगवान कब से ? जब से हम । भगवान और हम कब से जब से सनातन धर्म । 
तो हम तीनो का तीनों सनातन है । सनातन मतलब सदा से है ‌। तीनों की उत्पत्ति नहीं होती । न जन्म होता है । 
सिर्फ प्रकटी करण होता है । यानि भगवान श्री कृष्ण के संकल्प मात्र से सृष्टि होती है और उसी के साथ साथ सनातन धर्म ब्रह्मा जी के साथ साथ प्रकट हो जाते हैं ।
और इन तीनों को अंत भी नहीं है । यानि भगवान , हमारी आत्मा और सनातन तीनों अजन्मा हैं ।
और इन तीनों को कोई भी समाप्त भी नहीं कर सकता । स्वयं भगवान भी नहीं । 

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
 न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।।२३।। गीता ।

तो इसका भावार्थ तो सब लोग  जानते हैं कि आत्मा हो या परमात्मा इसको किसी भी बिधि कोई समाप्त नहीं कर सकता है स्वयं भगवान भी नहीं  । 

तो यह स्वत: सिद्ध है कि तीनों का जन्म नहीं होता , तीनों का अंत किसी भी विधि नहीं हो सकता । 
तो तीनों को समाप्त करने का कोई सोचें अगर तो वो फुल मैड है । थोड़ा या हाफ नहीं फुल मैड । 

तो फिर हम सनातनी इतना बैचैन क्यूं हैं कि कोई सनातन धर्म  को समाप्त कर देगा ? ऐसा सोचने बाला अगर कोई सनातनी भी है तो गलत है , जो आजकल कहते रहते हैं कि फलां फलां धर्म बाले , अपना जनसख्यां विस्फोट करके पुरे धरती पर फ़ैल जाएंगे और सनातन एक दिन खत्म हो जाएगा , मैं कहता हुं वो भोले हिन्दु है जो ऐसा सोचता है  । उनको खुद पे अपने सनातन धर्म पे और अपने ईष्ट पर भरोसा विल्कूल नहीं है । यह उनके खुद की  बात और चिंता साबित करती है । 

सनातन धर्म अजन्मा है और अमर है । जैसा परमात्मा और हमारी आत्मा अमर है । 
हां हां आत्मा भी अजन्मा है और अमर है क्यों क्योंकि आत्मा का अंशी भगवान है । अतः यह भी अपने अंशी के जैसे अविनाशी है :-

"सुनहु तात यह अकथ कहानी। 
समुझत बनइ न जाइ बखानी॥ 
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। 
चेतन अमल सहज सुख रासी॥1॥" - उत्तरकांड 7.117

और उसी प्रकार सनातन धर्म भी अजन्मा है और अविनाशी है । स्वयं भगवान भी स्वयं को , किसी  भी आत्मा को और ना सनातन धर्म का विनाश कर सकते हैं । तो फिर कुछ भोले सनातनी इतना हाय तोबा , चित्कार क्यूं कर रहें हैं मुझे समझ में नहीं आता ?

भगवान सर्व समर्थ  है । वो अपनी सत्ता की रक्षा स्वयं करते हैं । वो किसी भी  जीव और महापुरुष को भी यह अधिकार नहीं देते । 
वाकी सब शक्ति अपने संत अपने जन और महापुरूषों को दे देते हैं , पर दो कार्य सदा अपने पास रखते हैं ‌ ।
पहला -अपने सत्ता की रक्षा करना और दुसरा अनंत ब्रह्माण्ड के अनंत जीवों के मन में उठे संकल्पों को नोट करना । याद करिए श्री कृपालु महाप्रभु जी का दिया तत्वज्ञान ।
और अप्लाई किजिए मेरे इस चिंतन में ।
तो जब भगवान अपनी सत्ता , मतलब सनातन धर्म यानि नियम , यानि उनका संविधान यानि वेद् पुराण उपनिषद आदि सब की रक्षा वो स्वयं करते हैं । और अपने जन खुद पर भरोसा करने वाले , आस्था रखने वाले सज्जनों की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं । और जिस बसुंधरा पर अवतरित होते हैं उस भारत देश की रक्षा भी वही करते हैं तो चिंता कैसी ?
उन्होंने स्वयं कहें है :- 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ :- गीता ।

उनका उद्घोष है - वो सनातन धर्म , ( हिन्दु संस्कृति ) और इनमें और भगवान में दृढ़ आस्था रखने वाले साधु जन , सज्जन की रक्षा वो स्वयं करते हैं ।

 दुष्ट कुधर्मी , व्यभिचारी , राक्षसों , असुरों का उत्पात जब जब लिमिट से बढ़ जाता है तो वो खुद इन सबका एक साथ काम तमाम कर देतें हैं । 
और किए भी है । हम सभी जानते हैं । हिरण्यकशिपु का का और उसके साम्राज्य का , हिरण्याक्ष का और उसके साम्राज्य  से लेकर  त्रेता में रावण और उसके साम्राज्य लंका से लेकर द्वापर में कंश आदि सब का बजूद मिटा दिए ।
तो फिर हम सनातनी इतना भयभीत क्यों ?
भय का मतलब की हमें अपने भगवान पर , अपने इष्ट पर अपने सनातन हिन्दु धर्म पर भरोसा नहीं । 

सभी जानते हैं कि एक सनातन धर्म ही अजन्मा है और इसका अंत कभी नहीं हो सकता । 
और वांकी सभी बिचार धारा है जिसका जन्म हुआ है अलग अलग समय में  किसी के बिचार के कारण पीछले हजार दो हजार तो ढाई हजार साल में । और जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यू भी निश्चित है ।

और फिर सभी बिचार धारा उसी सनातन धर्म रूपी मूल( जड़ ) से जिसका मूल तना हिन्दु है और वांकी‌ सब  शाखा हीं तो  है ।
अब कोई बिचार धारा यह सोचे , कोई शाखा यह सोंचे की अपने हीं मूख्य तना और जड़ को समाप्त कर देंगे तो वो फुल मैड है । फुल मैड । वो खुद ही समाप्त हो जाएगा ।

और फिर भी नहीं माना तो भगवान तो कहें है की
 यदा यदा हीं धर्मस्य ..... 

तो होना ही है कल्कि अवतार और फिर एक बार असुर और उनका साम्राज्य समाप्त होगा । 
और वो भी नहीं बचेंगे जो हिन्दु में जन्म लेकर अपने ही जड़ में जहर घोलने का प्रयास कर रहें हैं , जैसे कौरव समाप्त हो गए जो सनातन धर्म के विधान के विरूद्ध काम किया । भगवान कृष्ण के विरूद्ध खड़ा हो गया था दुर्योधन , वो भी समाप्त हो गया । 

तो मेरी आप सभी हमारे सनातन धर्मावलंबी भाइयों से प्रार्थना है कि चिंता ना करें , विधर्मियों से उलझे नहीं । अपने भगवान की भक्ति करें , अपने महापुरुषों और संतों का , देश भक्तों का सम्मान करें । और दृढ़ आस्था रखें । दूसरे की बुराई ना करें । अपने सनातन का प्रचार करें , अपने असली संतों के बारे में और भगवान ईष्ट की चर्चा करें । सत्संग करें । 
और अपने शरीर के लिए जिविका के लिए सनातन धर्म के पथ पर चल कर कर्म करें । 
आपका भाई संजीव कुमार आज का तारिख 15 मई 2021 ( यह मेरे भगवद् चिंतन और गुरू देव से प्रदत्त तत्वज्ञान है श्री राधे )

Wednesday, 12 May 2021

जीव का कल्याण तभी संभव है जब संत महापुरुष के शरण में जाकर तत्वज्ञान प्राप्त करें ।

यह महत्वपूर्ण बात उनकी सहायता के लिए जो असली संतों के वारे में शंका करते हैं , उनको जानने से समझने से पहले अपनी क्षुद्र बुद्धि से बहुत तरह का सवाल खड़ा करते हैं :- 

सही संत और वास्तविक महापुरूषों के पास लौकिक परलौकिक दोनों प्रकार का ज्ञान होता है, वो ईश्वर के तरह अन्तर्यामी होते हैं। भगवान की योगमाया शक्ति उनके पास उतना ही है जितना सच्चिदानंद श्री कृष्ण के पास । 
संत व महापुरूष अपने इन शक्ति से कोई चमत्कार नहीं दिखाते कभी , वो तो भगवान से प्राप्त शक्ति का सदुपयोग जीव कल्याण के लिए करते हैं , जीव को तत्वज्ञान देकर जीव के अनंता अनंत जन्म के मैल से दूषित मन को निर्मल बनाते हैं । पर इसके लिए जीव के  मन में संत के प्रति श्रद्वा और विश्वास हो , और इस श्रद्धा और विश्वास की उत्पत्ति उनके संग से सत्संग से होता है । वास्तविक संतो के ह्रदय में पतितो के उद्धार की अधिक चिंता होती है । कारण दयालु स्वभाव के होने के कारण उनसे जीव का दुख नहीं देखा जाता है । 
संसार में भी एक सात्विक मां बाप अपने बिगरैल बच्चे के सुधरने की कामना करती रहती है ।  भगवान से प्रार्थना करती रहती है , ठीक उसी प्रकार हमारे गुरू को माता सम कहा गया है , वो पतितो के मल को धोकर भगवान के भक्ति के काबिल बनाते हैं ।
पर जो जीव संत के पास जाएं ही नहीं , उनका सत्संग करें ही नहीं । 
उनको और उनके सिद्धांत को ठीक से समझने के बदले अपने अनंत जन्म के दूषित ज्ञान से तरह तरह का सवाल करे पहले , अपनी दुषित बुद्धि से शक करें , अपनी बिगड़े दिमाग से किसी संसारी के लिखे किताब से प्राप्त ज्ञान से संत से बहस करें उनके अनुयायियों से बहस करें तो उसका भला कैसे हो ।
इसलिए नियम है कि संत के पास जाने से पहले अपनी खोपड़ी से पिछला सभी ज्ञान को शून्य मानना होगा । चाहे हम कितने बड़े संसारिक विद्वान हो , शास्त्रों को भले रट लिया है , गलत अर्थ खोपड़ी में डाल लिया है , अहंकार त्याग कर दीन बन कर , पिछला अर्जित सभी ज्ञान शून्य होकर किसी वास्तविक संत के शरण में जाकर पुरे ध्यान से उनको सुनना होगा । 
जब तक हम उनके मुख से उनकी बाणी सुनेंगे नही, उनके प्रवचन के संकलन रूपी पुस्तकों को पुर्ण ध्यान लगा कर , समाहित चित्त से पढ़ेंगे नहीं और जहां नहीं समझ में आए तो उनसे या वो उपलब्ध ना हो तो  उनके मूल प्रचारक से समझेंगे नहीं , परिप्रश्न नहीं करेंगें और अपनी खोपड़ियां लगाएंगे तो कल्याण कैसे होगा ? 

इसलिए प्रत्येक जीव जो अपना कल्याण चाहता है उनको पहले के सभी ज्ञान वान को , अहंकार को त्याग कर , अपने दिमाग को पिछला सभी ज्ञान से रिक्त करके उनके द्वारा दिया गया तत्वज्ञान सुनना और उनसे ही समझना होगा , तब श्रद्धा और विश्वास दृढ़ होगा उनपर और जब एक बार श्रद्धा और विश्वास ह्रदय में आ गया फिर क्ल्याण पथ पर जीव अग्रसर हो जाता है , फिर आगे का रास्ता स्पष्ट होने लगता है और असली तत्व ज्ञान बड़ी तेजी से संत के कृपा बल से जीव के निर्मल चित्त में ठीक ठीक उतरने लगता है वेतार की तरह , माध्यम की कोई आवश्यक्ता नहीं रहती , जीव का तार अदृश्य रूप से अपने गुरू से जुड़ जाता है सदा के लिए । 
यह तार ऐसा नहीं की आंधी में टूट जाए और फिर जोड़ने का उद्धम करना परे , न न ऐसा नहीं होता , यह तार दिव्य तार होता है, और हां हरिगुरू अपनी कृपा से जीव को तत्वज्ञान समझने कि शक्ति भी दे देते हैं , जीव को बिना संस्कृत पढ़ें संस्कृत के श्लोक समझ में आने लगता है , फिर भाषा का अवरोध नहीं होता है । 
वास्तविक गुरू अपना हाथ किसी के माथे पर नहीं रखते अन्य के जैसे । उनका आशिर्वाद उनके ह्रदय का दिव्य तरंग है जो अपने शिष्य को हमेशा आलोकित करता रहता है , उनके ह्रदय से निकले एक दिव्य उर्जा , एक दिव्य शक्ति हमेशा शिष्य को चारों तरफ से सुरक्षा प्रदान करती रहती है , फिर वो शिष्य कभी भटक नहीं सकता और उस पर कुसंग हावी नहीं हो सकता कभी । 
चाहे वो कितना भी गहरा कुसंग के वातावरण में पर जाएं । गुरू का सुरक्षा चक्र उसकी रक्षा करता रहता है ।
मेरा निज अनुभव है यह ।
मैं बहुत नहीं खोलुंगा । 
शिष्य को ह्रदय में गुरू के ह्रदय से प्राप्त हो रहे दिव्य तरंग अतुलित आनंद का एहसास कराना शुरू कर देता है । पर इसके लिए भीतर से गुरू के प्रति सच्चा अनुराग होना जरूरी है और इसके लिए शुरू शुरू में एकांत साधना की आवश्यकता है । फिर यह साधना हमेशा होती रहती है , चाहे अपना संसारिक कर्म करते रहिए या कहीं भी रहीए । गुरू सतत ह्रदय में विराजमान होतें हैं । यह है राज की बात , अनुभव की बात ।

 सुरदास , कबीर , मीरा , रै दास , तुलसी , रामकृष्णपरमहंस , रबीदास , तुकाराम ,  बिद्यापति आदी उदाहरण हैं , वास्तविक गुरू  के पैर परके , इनके चरण शरण से  ही तो अनेकों जीव तर गए , और हम  जैसे संसारी अधम पतित जीवों का कल्याण तो श्री कृपालु महाप्रभु द्वारा हीं सुनिश्चित हुआ जो स्वयं युगल सरकार है  यह कहने कि बात अब नहीं रही , यह अनुभव की बात अब हो गई है ।
. . मैकोले की शिक्षा में दम कहां जो एक मानव को मात्र इंसान बना दे | यह शिक्षा ही तो भारतियों के चरित्र के पतन का कारण है हम लोग तो सच्चे दरवार में जाने के काबिल भी थे ? चाहे वो आज का हाईयर क्वालिफाईड व्यक्ति हीं क्युं नही ! 
वो तो वास्तविक संत की कृपा है की वो हमलोगों के अनंत जन्मों के अनंत पाप को देखकर भी करुणावश सारे पापों को नज़र अंदाज करके अपनातें हैं भाई ।
उनके कौलेज में हाई मार्क्स की जरूरत नहीं ।
उनके कौलेज में युनिवर्सिटी में तो फेल का ,‌शून्य नंबर बाले अति विचित्र पतित का पहले एडमिशन हो जाता है ।
पर इसके लिए एक ही योग्यता है एडमिशन के लिए , सर्व अहंकार ज्ञान शून्य , तृण से बढ़ कर दीन और बृक्षों लताओं से बढ़ कर सहिष्णुता ।
फिर वो एडमिशन ले लेते हैं ।

 संसारिक बिषय भोगों के ज्ञान की जरुरत ढ़ोगी साधु संन्यासियों को परती है |
और इंसान अज्ञानताबश उसके द्वारा ठगे जाता है | जिस कारण सही संतों के पास भी जाने से हिचकते हैं ।
इसलिए हमें यह सब समझना होगा ।और वास्तविक संत को अपना गुरू स्वीकार करके उनका संग करना होगा । 

अब कोई चकाचौध से प्रभावित होकर किडनी निकाल कर बेचने वाले डाक्टर के अस्पताल में जाकर अपना सबकुछ गवां ले तो सारे सच्चे और चरित्रवान डौक्टर का क्या दोष , सब डौक्टर तो गलत नही है |
ठीक उसी प्रकार सारे संत तो गलत नही होते है न भाई | इसलिए आई क्यू का इस्तेमाल करके सारा पिछला कुड़ा कबाड़ा दूषित ज्ञान जो इधर से उधर से , पढ़ कर दिमाग में इक्ट्ठा किया है उसको त्याग कर असली संत के शरण में जाना होगा । अन्यथा अनंत काल तक दुख भोग ही मिलेगा । चाहे कितना पूजा पाठ , जप तप , हवन , कर्म कांड , तिरथ विरथ , मुख से बजारू भजन लेखक और  गायक के साथ किर्तन करते रहें हम । 
जय जय श्री राधे :- आपका  संजीव ।

Tuesday, 11 May 2021

प्रत्येक दिन सभी भगवान का है । सब एक हीं भगवान श्री कृष्ण का स्वांस है ।

मेरा उन सबसे बहुत प्रार्थना है जो हर दिन , दिन के हिसाब से अलग भगवान के मंदिर में मत्था टेकते हैं और अलग अलग दिन अलग अलग भगवान का फोटो  मुझे भेजते हैं ,‌वे सभी कृप्या मुझे प्रमाण दे उन मुल विनिर्गत ग्रथों या स्मृत ग्रंथों शास्त्रों का केवल जिसमें लिखा हो कहीं पर भी  कि सोमवार भगवान शंकर का है , मंगलवार भगवान बजरंगबली का है , बुधवार गणेश जी का है आदि आदि मुर्खतापूर्ण बातें ।
पर ध्यान रहे मुझे यह प्रमाण केवल भागवद् गीता , वेद ,रामायण से ही चाहिए या पांचों मूल जगद्गुरू के लिखे किसी भी ग्रंथों से , या भगवद् प्राप्त प्रैक्टिकल दिव्य महापुरुष जिन्होंने भगवान को देखा है साक्षात , सुना है गले लगाया है , (सपने में या आभासिय नहीं , साक्षात सामने से देखा है ) जैसे तुलसीदास सुरदास , रै दास ,रविदास , मीरा , बिद्यापति , तुकाराम , नरहरि , गुरू नानक देव आदी वास्तविक भगवद् प्राप्त संतों के कथन और पुस्तकों को छोड़ मैं किसी का नहीं मानूंगा । 
पोंगा पंडित , गद्दी धारी शंकराचार्य , या स्वघोषित जगद्गुरूओं और वाकी किसी भी शास्त्रों को मैं प्रमाण नहीं मानुंगा ।

मुझे हर रोज  काफी पढ़ें लिखे लोग हर रोज के अलग अलग भगवान का फोटो भेजते हैं । इतना पढ़ें लिखे होकर भी नहीं समझते की प्रत्येक दिन प्रत्येक क्षण ,प्रत्येक बस्तु में एक हीं भगवान श्री कृष्ण है और सभी भगवान उनका हीं स्वांस है ।
हम आदमी को प्रायः  संप्रदाय , जाति  समुदाय में बांट दिए नादान क्षुद्र लोगों के बहकावे में आकर । 
और कहते हैं अंग्रेज डिभाइड रूल सिखाया ।

नहीं जी आपलोगों ने जो अंग्रेजों को सिखाया वहीं हमारे देश पर लागु किया हमसे हीं सिख के वो ।

हमारे देश में सनातन धर्म में वर्ण व्यवस्था और जाति कर्म पर आधारित था पर पोंगा पंडितों ने अपने स्वार्थ के हित के लिए यह सब किया ।
दिन भी वांट दिया , भगवान में भी भेद सिखा दिया ।
वो सोमवार को शंकर जी को जल , रविवार को सूर्य भगवान को जल , शनिवार को शनिदेव को तेल , वो बुधवार को किसी अन्य भगवान को देखना भी‌ नहीं गणेश जी को छोड़ कर , बृहस्पतिवार बार को केवल विष्णु की आराधना करना , और शुक्रवार को कोई भगवान नहीं मिला तो नया भगवान गढ़ लिए संतोषी माता । छी , छी, छी , ।
भाई साहब घर में भी क्यों नहीं बांट‌ लेते हैं आप लोग , 
सोमवार को अपने पिता को पुजेगे़ , मंगलवार को अपने छोटे ब्रह्मचारी भाई को , बुधवार को अपने बड़े भाई को बृहस्पतिवार को अपने चाचा को , शुक्रवार को अपने चाची को , रविवार को अपने नाना को । यह भी कर लिजिए ।
हमलोग पढ़ें लिखे हैं ‌। हमलोग वांकी बातों में तो बड़ा वैज्ञानिक बनते हैं और कहते हैं विज्ञान से साबित करो । प्रमाण मांगते हैं यहां कहां चला जाता है यह बात , अंधविश्वास को मानते हैं यहां और अपने अगले पिढी को भी यही सौपतें है , इसलिए तो पुजा पाठ का फल तो दुर उल्टा नुकासान होता है सबको ।
तो इसमे हम कैसे मान लेतें है विना असली शस्त्रों के प्रमाण को देखें समझे और जाने ???

प्रमाण देखना चाहिए हमको  वो भी पोंगा पंडितों या थ्योरिटिकल मैंन व स्वघोषित तथा कथित विद्वानों का कहा और उसके लिखे शास्त्रों का नहीं ।

हमें मांगना चाहिए प्रमाण केवल वेद , भागवद् , गीता , रामायण आदि विनिर्गात शास्त्र और श्रौत्रिए ब्रह्मनिष्ट महापुरूषों का कहा और उनका लिखा पुस्तकों का केवल । दिखा दिजिए प्रमाण तो हम मानेंगे ,‌नही तो हम पाप नहीं करेंगें । 
वो छुटभैय्ए ज्योतिषि और उनके मिलावटी शास्त्रों को प्रमाण मैं नहीं मानुगां ।

काल कर्म में पुराणों , उपनिषदों और अन्य शास्त्रों में खुब मीलावट हुआ है तथाकथित क्षुद्र स्वघोषित विद्वानों द्वारा । इसलिए इनको प्रमाण कभी नहीं मानूंगा ।

पर वेद , श्रीमदभगावद् , रामायण एवं गीता अभी भी पु्र्णत: निष्कलंक है और  पुनदोष पंक रहित है इसलिए इन्हीं शास्त्रों और पांचो मूल जगद्गुरूओं के लिखे शास्त्रों और उनके कथन और भगवान के निज जन यानि हरि का जन , यानि हरिजन जैसे तुलसी सुर मीरा , कबीर , रै दास ,रविदास, विद्यापति रसखान , तुकाराम , नरहरी , हरिदास , हित हरिवंश , चैतन्य महाप्रभु रामानंदाचार्य  , अष्ट गोस्वामी आदि  जैसे जीव  गोस्वामी सनातन गोस्वामी का प्रमाण दिजिए ।
मुझे अन्य मिलावटी  ग्रंथों और किसी के भी तर्क कुतर्क का प्रमाण नहीं चाहिए । 

अंत में यही कहुंगा सनातन का मूल कोई भी शास्त्र इन सब अंधविश्वासों का कभी समर्थन और सिद्ध नहीं करता , सनातन कि बदनामी पढ़ें लिखे मुर्ख करवाते हैं और खुद तो पाप करते हैं और अंधविश्वासों को भी बढ़ावा देकर पुरे विश्व  में सनातन को बदनाम करवाते हैं , पाखंड और पाखंडियों से बचें ।
जिस भगवान में श्रद्धा हो , आपने उनको अपना  एक मात्र इष्ट माना है जिन भगवान को उनको हीं  प्रत्येक दिन , हर क्षण , हरेक समय  तीन सौ पैंसठो दिन भक्ति करिए । नहीं तो लाभ के बदला हानी सुनिश्चित होगा ।‌ सम्मान सभी भगवान का करना चाहिए पर प्रेम एक से हीं ।‌
"एक हीं साधे सब सधै , सब साधे सब जाए "
आपका भाई संजीव । श्री राधे ।

Saturday, 8 May 2021

हम भगवद् प्रेमिजन इन सभी से कोसों दुर रहते हैं । हम सब भक्ति मार्गी है और भक्ति को अष्टांग योग आदि की कोई जरूरत नहीं ।

हरि के   जो   वल्लभ है ,  दुर्लभ  भुवन   मांझ ,
तिनहिं  के  पद्  रेनु ,    आसा   जिए    करिहें ।
जोगी , जपि, तपि  जासों मोको कछु काम नाहिं
प्रीति    परतिति ,   रिति     मेरी    मति   हरीहें ।।

हरि के जो वल्ल्भ हैं , मतलव  जिनको खुद भगवान श्रीकृष्ण  अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करतें हैं । जिनके  पीछे पीछे  स्वयं भगवान चलते हैं । ऐसे संत बहुत दुर्लभ होतें हैं , बहुत हीं दुर्लभ ।

 हरि जिनके वल्लभ हैं ऐसे संत तो बहुत मिल जायेगें संसार में । 
लेकिन ऐसे रसिक संत बहुत हीं दुर्लभ होतें हैं जगत में जिसके पीछे-पीछे स्वयं हरि चले । 
ऐसे हीं रसिक संतों में अग्रगण्य रसिक सिरोमणी संत ,  कृपावतार स्वयं हमारे गुरूदेव , श्रीमत्पदवाक्यप्रमाणपारावारीण,वेदमार्गप्रतिष्ठापनाचार्य,निखिलदर्शनसमन्वयाचार्य,सनातनवैदिकधर्मप्रतिष्ठापनसत्संप्रदायपरमाचार्य,भक्तियोगरसावतार,भगवदनन्त श्रीविभूषित , पंचम मुल जगद्गुरूत्तमई , १००८ स्वामि श्री कृपालु जी महाराज हैं,  जो इस कलिकाल में हम कलिमल ग्रसित जीवों के कल्याण हेतु इस धराधाम पर अवतार लेकर युगलसरकार के ब्रज रस का वितरण हम सभी के मध्य किए । ऐसे कृपावतार विरले हीं संसार में आतें हैं । 
जिनकी पद रेणु भगवान चाहते हैं अपने माथे से लगाते हैं । और इन्ही के पद रेनु की चाहत व लक्ष्य हमारा है ।

भक्ति मार्गी , प्रेम मार्गी , प्रेमीजन इन योगी , जपी  , तपी , ध्यानी आदि से बहुत दुर रहतें हैं । 
 क्यों दुर रहतें हैं , तो इसलिए कि जो हरि के वल्लभ है,  ऐसे दुर्लभ, प्रेमी रसिक संत का हमने संग किया है और उन्ही को हम भजते हैं , उन्ही का संग करते हैं , सत्संग करते हैं । 
 हमारे गुरूदेव ने तो हमें ऐसे  प्रेमरस का पथिक  बनाया है,  जो बड़े बड़े बृहस्पति , सरस्वती , और ब्रह्मा के लिए भी दुर्लभ है । हम युगलसरकार के निजधन , प्रेमरस के पथिक है  । उनके प्रेम , प्रीति  परतिति की रिति ने तो हमारी मति सदा के लिए हर लिया है । 

हमें , अष्टांग योगी , षठ् सम्पत्तिवान , और साधन चातुष्ट्य सम्पन्न जीव ,  ज्ञानि ध्यानी की कोई आवश्यकता नहीं है ।
 हम भगवद् प्रेमिजन इन सभी से  कोसों दुर रहते हैं । 
हम सब भक्ति मार्गी है और भक्ति को अष्टांग योग आदि की कोई जरूरत नहीं ।

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता ।। ( रामचरितमानस)

" यज्ञ, दान , व्रतादि में जो त्रुटि रह जाती है, 
जब भक्ति ही उसे पुरा करती है , तब भला भक्ति को उन कर्मों की क्या अपेक्षा हो सकती है |" 

"ज्ञान, विज्ञान, तपस्या , योग , यज्ञादि का जो  कुछ भी फल हो सकता है, वह सब भक्ति से अनायास ही प्राप्त हो जाता है | किंतु भक्ति का फल किसी भी कर्म से नही प्राप्त हो सकता |" 
" अन्त:करण शुद्धि हेतु एक मात्र भगवद्भक्ति ही साधन है, अन्य कोई मार्ग नही " 
" भक्ति के अनेक भेद हैं | किंतु श्रवण, कीर्तन, एवं स्मरण तीन ही प्रमुख हैं |„
" सर्वप्रमुख स्मरण भक्ति ही है, अन्य इन्द्रियादिकों की भक्ति हो या न हो |„
 - कृपालु बचनामृत , पेज ५९, ६०,६१„ ६२ एवं ६३

 :- पूज्यनियां मां रासेस्वरी देवी जी के प्रवचन से ।।

हमारे वेद् शास्त्र , वास्तविक संत , महापुरूषों ने केवल उन्हीं मां बाप की पुजा करने के लिए कहते है, जो भगवान श्री कृष्ण का भक्त हैं ।

हमारे वेद् शास्त्र , वास्तविक संत , महापुरूषों ने केवल उन्हीं मां बाप की पुजा करने के लिए कहते है, जो भगवान श्री कृष्ण या कोई भी भगवान या उनके नीज जन  यानि परम भक्त यानि वास्तविक संतो को गुरू मान कर  ( सभी भगवान श्री कृष्ण की हीं स्वगत् भेद शुन्य शक्ति है जैसे दुर्गा जी , बजरंग बली , शंकर पार्वती जी , गणेश जी , विष्णु लक्ष्मी जी या उनके संत ) उनका भक्ति करतें हैं । 
वैसे को नहीं जो खुद शराब व मांस भक्षण करतें हैं और अपने बच्चे को भी करने के लिए प्रेरित करतें हैं, घर परिवार और समाज में ही दुसरो से दुर्भावना रखते हैं और बच्चों में कुसंस्कार भरते हैं, वो खुद अपने सास ससुर और बड़ों  का कभी ख्याल नहीं रखते  और भगवान में उन्हे जरा भी श्रद्धा और रूची नहीं, ऐसे मां बाप हिरण्यकशिपु की तरह त्याज्य हैं । 
भगवान से विमुख करने वाले कैकई को भरत त्याग दिए और हमें सिखाया  । भगवान से बैर करने बाले बड़े भाई रावण को विभिषण त्याग दिया, अतः ऐसे दुष्ट माता पिता जो अपने बच्चे को भगवान की तरफ प्रेरित ना करें , और ना खुद भगवद् प्रेमी हो उनसे भीतर से  सदा उदासीन रहकर उनके जरूरत को यथा शक्ति पुरा करने के अलावा कुछ नहीं करना चाहिए । 
माता पिता श्रवण के माता पिता जैसा भगवान् का भक्त होना चाहिए फिर श्रवण कुमार ने अपने माता पिता की भक्ति की । 
कहने का मतलब जो भगवान का बैरी हो उनसे दुर रहना श्रेयकर है । चाहे वो अपना मां बाप , भाई बहन , पत्नी पुत्र या पति ही क्यूं ना हो । यह शास्त्र का उद्घोष है । श्री राधे ।

एक साधिका दीदी का प्रश्न - Jo sadhak hai pr abhi bhav bhakti pr abhinhi hai use mrne ke baad turnt manusya sarir mil jatta hai ya sukshm sarir me bhog bhogna padta hai

एक साधिका दीदी का प्रश्न - Jo sadhak hai pr abhi bhav  bhakti pr abhinhi hai use mrne ke baad  turnt manusya sarir mil jatta hai ya sukshm sarir me bhog bhogna padta hai

उत्तर - Radha Rani दीदी सुक्ष्म शरीर और कारण शरीर से मुक्ति वास्तविक मौक्ष के पश्चात् ही होती है । इधर मौक्ष हुआ उधर जीव तीनों शरीर - स्थूल , सूक्ष्म और कारण शरीर से निकल कर ब्रह्म में लय हो जाता है ।
पर भगवान को और उनकी सेवा की कामना वाला  साधक जब भगवद् प्राप्त कर लेता है तो उसका सुक्ष्म शरीर और कारण शरीर दोनों दिव्य हो जाता है । 
इधर भगवद् प्राप्ति हुआ और उधर शरीर दिव्य हुआ । 
आत्मा बिना बर्तन का एक पल भी नहीं रह सकता है । 
मौक्ष पाने वाले का भी आत्मा जिस क्षण मुक्त होगा उसी क्षण में ब्रह्म में लय हो जाता है । यह बड़ा टेक्निकल है । यानि इधर निकला उधर लय हुआ । 

पर हमारे महाराज जी पांचों मुक्ति को पिशाचनी कहें है । तो फिर भगवद् प्राप्ति बाले का क्या होगा ?
तो हम लोग भगवान की सेवा चाहते हैं केवल  ।
"नित सेवा मांगु श्यामा श्याम तेरी 
ना मैं मुक्ति ना ही मुक्ति मांगु मैं " - श्री महाराज जी ।

तो केवल भगवद् प्राप्ति की कामना रखने वाला साधकों का कारण शरीर में एक हीं वासना होती है कि उसको गोलोक में  भगवान कि सेवा मिल जाए । 
कारण शरीर का मतलब हमारे वासना का शरीर ।
चाहे वो  वासना संसार को पाने का हो यानि भुक्ति का हो तो भोग के कामना रूपी करण शरीर - नंबर वन ।

नंबर टु मौक्ष की प्राप्ति की हो तो मौक्ष के कामना का कारण शरीर । यहां यह समझना होगा की संसार को पाने की कामना और मौक्ष की कामना दोनों एक साथ कभी नहीं हो सकती है । आग और पानी दोनों एक साथ नहीं रह सकता कभी ।
मौक्ष की कामना होगी तो संसार की कामना स्वत: समाप्त हो जाती है ध्यान साधना से । 

नंबर तीन । श्री महाराज जी के साधकों को मुक्ति और भुक्ति दोनों की कामना को त्यागना होता है  , उनको  केवल भगवान और भगवान के धाम को प्राप्त कर उनके सेवा की कामना रहती है । इसलिए यहां उसका कारण शरीर उसी दिव्य कामना के परिणामस्वरूप गुरू द्वारा  दिव्य बना दिया जाता  है । यह अंतर है । 
यहां भी वांकी दो कामना यानी मुक्ती या भुक्ति दोनों की कामना समाप्त होने के बाद ही भगवान के सेवा की कामना ठहर सकती है । तीनों या दो अन्य कामना कभी एक साथ नहीं ठहर सकती है । 

तो साबित हुआ की कारण शरीर केवल‌ और केवल तीन प्रकार का ही होता है ।
जिसमें एक माईक और दो दिव्य ।
माइक उसका जिसको संसार के सुख पाने‌ की और भोगने की कामना  यानि भुक्ति की कामना ।

दुसरा - मौक्ष की कामना का कारण शरीर , यह भी दिव्य बना दिया जाता है मौक्ष मार्गी  गुरू द्वारा ।

तीसरा - ऐसा जीव जिसको सगुण साकार भगवान श्री कृष्ण को और उनके धाम को प्राप्त करने कि कामना शेष बच जाती है वाकी दोनों कामना समाप्त हो जाती है तो उनका  कारण शरीर और सुक्ष्म शरीर दोनों दिव्य बना दिया जाता है श्री महाराजजी जैसे उच्च कोटी के रसिक संत और गुरू द्वारा ।। 

अब इसके अलावा भी एक चौथे प्रकार का कारण शरीर होता है जो पूर्णत: निष्काम‌ का  होता है । उपर्युक्त तीनों कामना का आभाव होता है इनमें । यह है गोपी महाभाव कारण शरीर  । जिसमें जीव हमेशा अपने प्रेमास्पद की सुख की कामना रखता है । यानि वो भगवान से कहते हैं कि तुम मुझे प्रेम दो या ठुकरा दो । हर हाल में मैं तुम्हारे सुख में ही सुख अनुभव करता हुं । यह केवल नित्य सिद्ध भगवान तुल्य  महापुरूषों के होता है जैसे श्री महाराज जी , गौरांग महाप्रभु ,  ललिता आदि । यह रेयर है ये स्वयं भगवान ही है । । 
 
तो साधक को जब भगवद् प्राप्ति होती है तो उसका कारण शरीर , सुक्ष्म शरीर दोनों दिव्य हो जाता है उसी क्षण । याद रखिय पहले ही बतलाया  गया है कि आत्मा बिना बर्तन के एक पल भी नहीं रह सकती । 

अब आपके दुसरे सबाल का ज़बाब तो याद किजिए श्री महाराज जी का दिया तत्व ज्ञान,  साधक को अपने साधना के स्तर के अनुसार उसको मानव शरीर मिल जाता है फिर से वहां से , जहां तक कमाई किया था पिछले मानव शरीर में वहां तक फिर मिल जाता है और फिर वहां से आगे शुरूआत होती है साधना की । 
जैसे कोई इस जन्म में मैट्रिक कर गया और मर गया तो फिर अगले शरीर में वो इंटरमीडिएट से शुरू करेगा । यह होता है साधको के साथ । श्री राधे ।- संजीव 

एक व्यवहारिक बात या कहिए की स्व अनुभव ।यह दृढ़ सत्य है , अटल सत्य है कि हमारा जिस विषय में गहरा रूची होता है , जिससे गहरा प्रेम होता है उसके बातों को हमेशा याद रखते है और व्यवहार में भी लाते हैं ।

एक व्यवहारिक बात या कहिए की स्व अनुभव ।
यह दृढ़ सत्य है , अटल सत्य है कि हमारा जिस विषय में गहरा रूची होता है , जिससे गहरा प्रेम होता है उसके बातों को हमेशा याद रखते है और व्यवहार में भी लाते हैं ।
संसार में भी जब हमलोग अपने पिता या माता या बहन या किसी से भी सच्चा  प्रेम करते हैं, श्रद्धा और विश्वास करते हैं  तो उनकी बातों को हमेशा याद रखते हैं और व्यवहार में भी लातें है ।
यानि संसार में भी जिस तरह  हमलोग  जितना जिस व्यक्ति , बिषय , बस्तु ,‌स्थान से प्रेम करते हैं उतना‌ ही वो याद रहता है हमेशा । या वास्तविकता तो है कि याद रखने की और व्यवहार में लाने का श्रम भी नहीं करना‌ परता , यह अपने आप याद रहता है और व्यवहार में भी आ जाता है अपने आप । बस एक हीं आधार है प्यार व प्रेम की गहराई अपने प्रेमास्पद से । 
ठीक उसी प्रकार अगर हम वास्तव में दिलों‌ जान से अपने गुरू और इष्ट से प्यार करते हैं तो उनका एक एक बात व्यवहार , आदेश , तत्त्वज्ञान , आदि उनसे प्रेम के मात्रा के अनुसार और बराबर मात्रा में याद रहता है हि रहता है और व्यवहार में भी अपने आप आता रहता है । 
भुलने का मतलब हमारा प्रेम कम है ।

जब हम किसी बात को आत्म शात कर लेतें है ठीक से तो जागते हुए हीं नहीं सोते हुए भी हमलोग उन बातों को कभी नहीं भुल सकते । और ना भुलते हैं।

संसार में पढ़ाई के दौरान गणित , भौतिकी , इतिहास भुगोल , या कोई भी शब्जेक्ट हो हम पढ़ते हैं प्रैक्टिस और व्यवहार में जब लातें है बार बार तो सोते हुए भी नहीं भुलते । वसरर्ते वो सब्जेक्ट हमारे मन को भाए । उसमें पुरा इंटरेस्ट हो और प्रैक्टिकल भी हो । 
इसलिए संसार में संसारिक ज्ञान को भी हम सोते हुए भी याद रखते है तो श्री महाराज जी के सिद्धांत को कैसे नहीं 24 सो घंटा याद रख सकते हैं । भुलने का मतलब प्यार में कमी हैं पसंद में कमी है , इंटरेस्ट में कमी है। 
उदाहरण =बचपन में प्रैटीस किया 2+2 =4 होता है तो यह बात आज तक याद है और उसको व्यवहार में लाते हैं जब कोई हिसाब करते हैं तो । किसी सोते को अचानक उठा कर पुछिए वो दो प्लस दो चार ही बोलेगा ।
पांच या छः नहीं बोलेगा कभी ।
हां जिसका प्रैटीस कच्चा है बचपन से , वो तो गलती करेगा ही जागते हुए भी । 
इसी प्रकार श्री महाराज जी के दिए गय तत्वज्ञान का प्रैक्टीस , बार बार रीभिजन और उसके बाद प्रैक्टिकल करने के बाद वो हमेशा याद रहता है । इसी प्रैक्टीकल प्रैक्टिस को साधना कहते हैं । श्री महाराज जी के सिद्धांत पर गहरा चिंतन करने से वो दिमाग में दृढ़ हो जाता है । 
हम जिससे प्यार दिल से करते हैं संसार में भी तो उसके बातों को , उसके आदत को उसके कहने बोलने के स्टाइल को हमेशा याद रखते है। 

फिर वो तो हमारे परम पिता है , वो तो हमारे ऐसे पिता है जिनको हम दिलों जान प्राण से प्यार करते हैं । तो उनके एक एक बात को कैसे ना दिमाग दृढ़ करके याद रखें भला ।
महाराज जी ने हीं कहें है कि साधकों को बार बार रीभिजन के द्वारा तत्त्वज्ञान के द्वारा दृढ़ करना चाहिए , जब यह दृढ़ हो जाएगा तो शास्त्रोक्ति यानि तत्त्वज्ञान में निपुणता से साथ शास्त्र युक्ति में भी निपुणता हासिल हो जाएगी यानि तत्वज्ञान को व्यवहार में लाने की आदत हो जाएगी । फिर होश में  तत्त्वज्ञान को कभी भुलना तो दुर वेहोशी में यानी सुसुप्ति में भी हम हमेशा याद रखेंगे और उससे अलग सोचेंगे नहीं कभी ।
तो यह तो तभी हो सकता है कि हम अपने गुरू के द्वारा दिया गए तत्वज्ञान को कितना आत्मसात किया ।
और मेरा खुद का अनुभव है कि श्री महाराज जी और अपने प्रीतम से जितना प्यार होगा हम उतना हीं उनके बातों को आत्मसात् करते हैं ।
संसार में भी देखते हैं ना आप जिससे प्यार करते हैं तो वो अगर आपके विपरीत बात बोल दे तो आप कहते हैं न कि दुनिया चाहे कुछ भी कहे तुम कुछ ऐसा वैसा बोल देते हो तो हमको बुरा लगता है ।
बस यही फार्मुला यहां भी काम करता है हम जितना जिससे प्यार करते हैं उतना हीं उसके कहे बातों को मानते हैं और हमेशा याद रखतें हैं । भुलने का मतलव‌ प्यार कच्चा है । और थोडा बहुत याद रखने का मतलब थोड़ा प्यार है । और पुरा भुलने का मतलब प्यार , श्रद्धा और विश्वास की पुरी कमी ।
श्री राधे । :- संजीव ।।

भक्ति से सब शुलभ हैं , अष्टांग योग के बड़े बड़े नियम है ।

ये साधनचतुषट्य , षठ्सम्पत्ति मार्गी, अष्टांगयोगादियों की बात करने वाले इन चीजों को हीं सबसे उपर, अच्छा और महत्त्वपूर्ण बता देतें हैं और भक्ति को इसका एक मात्र अंग, जबकि भक्ति को इन साधनों की आवश्यकता कभी नहीं है  !  ए  क्यों भुल जातें हैं कि इसी कलयुग में भक्ति मार्गी मीरा कब इन सभी का सहारा लिया ??
रविदास , सुरदास , तुलसीदास , कबीरदास, कालिदास , रैदास , हितहरिवंश , श्रीहरिदास ,  तुकाराम , संत ज्ञानेस्वर , सखुबाई , रसखान  , बिद्यापती  आदी ने तो कभी योग तोग , जप , तप , अष्टांगयोगादि का सहारा नहीं लिया । ए  केवल भगवान और संतों  की सीधी सादी एवं सरल भक्ति हीं किए  , अपने गुरू एवं भगवान की शरणागति किया और अपने आंसुओं द्वारा उनको रिझाकर  उनको एवं उनके दिव्यप्रेम रस को प्राप्त किया । 
इसी कलयुग में षठ्गोस्वामीं जैसे सनातन गोस्वामीं , जीव गोस्वामी आदि ने आज से पांच सौ साल पहले कौन से योगादि का सहारा लिया था ? 

भगवान श्रीकृष्ण ने तो स्वयं कहें हैं अंबरीश कांड में  दुर्वासा जी को , कि 
अहं भक्त पराधीनो ह्यस्वतंत्र इव द्विज ।
साधूभिर्ग्रस्तहृदयों भक्तैर्भक्तजनप्रियः ।।

भावार्थ :- "भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा- दुर्वासा जी से  ! मैं पूरी तरह से भक्तों के अधीन हूँ, मेरे वश में कुछ भी नहीं है । मेरे सीधे-सादे सरल भक्तजन अपने उदार ह्रदय से विनम्रता पूर्वक मेरी भक्ति करते हैं, तो मैं स्वतः उनके वशीभूत हो जाता हूँ, और उनसे प्यार करने लगता हूँ, अब वो जो कहें वही होता है, मेरे कहे अनुसार कुछ होता ही नहीं, अत: मैं आपकी मदद नहीं कर सकता ।।"

भगवान‌ ने तो कभी नहीं कहा कि - 
अहं योगी पराधीनो या अहं ज्ञानि पराधिनों  ???

तुलसी दासजी ने भी भक्ति को स्वतंत्र हीं माना है :- 
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता ।। ( रामचरितमानस)

त्रेता में भी भक्ति की महारानी शबरी आदि का उदाहरण है जो यहां तक नहीं जानती थीं कि उनमें नवधा भक्ति कुट कुट कर भरी हुई है । यह तो भगवान राम के मिलन के पश्चात्  उनको , नवदा भक्ति उनमें है ऐसा पता चला । 

द्वापर में लाखों गोपियां कब योग तोग का सहारा लिया ??? निष्काम भक्ति कि परमाचार्या गोपियां तो योग , ध्यानादि मार्गी श्री उद्ध्व जी को भी यह सब भुलवाकर भक्ति मार्ग का पथिक बना दिया था । 

यहां तक की प्रथम जगद्गुरु स्वामी श्री शंकराचार्य जी ने भी अंत में सगुण साकार भगवान श्रीकृष्ण की हीं भक्ति किए थे । यह जग जाहिर है ।

कहां तक कहा जाय ! 
श्री रामकृष्ण परमहंस जी ने भी मां काली की आज्ञानुसार  वृन्दावन धाम जाकर श्रीकृष्ण की भक्ति किए । मां काली ने वृन्दावन में हीं  श्रीकृष्ण का दर्शन करा कर उनको प्रेमाभक्ति प्रदान किए ।
और तो और उन्होने भी अपने शिष्य  विवेकानंद जी ( नरेंद्र) को  वृन्दावन भेज कर श्रीकृष्ण की हीं भक्ति कराकर भगवत् प्रेम रस प्रदान करवाया । 
इसलिए यह साबित है कि बड़े बड़े ज्ञानियों , ध्यानियों को भी सगुण साकार भगवान श्रीकृष्ण की हीं भक्ति और शरणागति करनी परती है और भक्ति एवं भगवान  के शरणागति  के पश्चात हीं अपने लक्ष्य की प्राप्ति होती है । वर्णा पतन हो जाता है । 
अतः हमें सदा अपने हरि गुरू की हीं शरणागति करना चाहिए ।
: -अपने गुरूदेव के दिए तत्त्व ज्ञान से ।

Thursday, 6 May 2021

भगवान बुद्ध के बारे में जरूरी जानकारी :-

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आप सभी को भगवान बुद्ध जयंती की शुभकामनाएं ।
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भगवान बुद्ध के बारे में जरूरी जानकारी :- 
भगवान बु्द्ध , भगवान राम के हीं वंशज थे । वो भगवान राम के पुत्र कुश के वंश में आगे जन्म लिए । यह बहुत कम लोग हीं जानते हैं । इसलिए सारे धर्म की जननी सनातन धर्म हीं है । सारे धार्मिक विचार धारा सनातन धर्म की हीं शाखा है । शाखा का अस्तित्व अपने मुल तना से होता है । और मुल तना का आधार बृक्ष का मुल होता है । डिटेल्स के लिए पढ़ीए :- 
श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णुपुराण में हमें शाक्यों की वंशावली के बारे में उल्लेख पढ़ने को मिलता है। कहते हैं कि राम के 2 पुत्रों लव और कुश में से कुश का वंश ही आगे चल पाया। कुश के वंश में ही आगे चलकर शल्य हुए, जो कि कुश की 50वीं पीढ़ी में महाभारत काल में उपस्थित थे। इन्हीं शल्य की लगभग 25वीं पीढ़ी में ही गौतम बुद्ध हुए थे। इसका क्रम इस प्रकार बताया गया है।
 
 
शल्य के बाद बहत्क्षय, ऊरुक्षय, बत्सद्रोह, प्रतिव्योम, दिवाकर, सहदेव, ध्रुवाश्च, भानुरथ, प्रतीताश्व, सुप्रतीप, मरुदेव, सुनक्षत्र, किन्नराश्रव, अंतरिक्ष, सुषेण, सुमित्र, बृहद्रज, धर्म, कृतज्जय, व्रात, रणज्जय, संजय, शाक्य, शुद्धोधन और फिर सिद्धार्थ हुए, जो आगे चलकर गौतम बुद्ध कहलाए। इन्हीं सिद्धार्थ के पुत्र राहुल थे। राहुल को कहीं-कहीं लांगल लिखा गया है। राहुल के बाद प्रसेनजित, क्षुद्रक, कुलक, सुरथ, सुमित्र हुए। इस तरह का उल्लेख शाक्यवंशी समाज की पुस्तकों में मिलता है। शाक्यवार समाज भी ऐसा ही मानता है। 

बुद्ध के प्रमुख गुरु गुरु विश्वामित्र, अलारा, कलम, उद्दाका रामापुत्त थे जबकि बुद्ध के प्रमुख दस शिष्य- आनंद, अनिरुद्ध (अनुरुद्धा), महाकश्यप, रानी खेमा (महिला), महाप्रजापति (महिला), भद्रिका, भृगु, किम्बाल, देवदत्त, और उपाली (नाई) थे। दूसरी ओर बौद्ध धर्म के प्रचारकों में प्रमुख रूप से अंगुलिमाल, मिलिंद (यूनानी सम्राट), सम्राट अशोक, ह्वेन त्सांग, फा श्येन, ई जिंग, हे चो, बोधिसत्व या बोधिधर्मा, विमल मित्र, वैंदा (स्त्री), उपगुप्त (अशोक के गुरु), वज्रबोधि, अश्वघोष, नागार्जुन, चंद्रकीर्ति, मैत्रेयनाथ, आर्य असंग, वसुबंधु, स्थिरमति, दिग्नाग, धर्मकीर्ति, शांतरक्षित, कमलशील, सौत्रांत्रिक, आम्रपाली, संघमित्रा आदि का नाम लिया जाता है।

भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं के आग्रह पर उन्हें वचन दिया था कि मैं 'मैत्रेय' से पुन: जन्म लूंगा। तब से अब तक 2500 साल से अधिक समय बीत गया। कहते हैं कि बुद्ध ने इस बीच कई बार जन्म लेने का प्रयास किया लेकिन कुछ कारण ऐसे बने कि वे जन्म नहीं ले पाए। अंतत: थियोसॉफिकल सोसाइटी ने जे. कृष्णमूर्ति के भीतर उन्हें अवतरित होने के लिए सारे इंतजाम किए थे, लेकिन वह प्रयास भी असफल सि‍द्ध हुआ। अंतत: ओशो रजनीश ने उन्हें अपने शरीर में अवतरित होने की अनुमति दे दी थी। उस दौरान जोरबा दी बुद्धा नाम से प्रवचन माला ओशो के कही थी । देह छोड़ने के पूर्व बुद्ध के अंतिम वचन थे 'अप्प दिपो भव:...सम्मासती। अपने दीये खुद बनो...स्मरण करो कि तुम भी एक बुद्ध हो।

बुद्ध अनेक हो चुके हैं। वाल्मीकि रामायण में भी बुद्ध का उल्लेख मिलता है, वाल्मीकि जी भगवान राम के समकालिन एक महान ऋषि थे, जिन्होने रामावतार से पहले हीं रामायण लिख दिया था। अत: बुद्धत्व एक दिव्य सिद्धा अवस्था का नाम है जो समय समय पर अनेकों महामानवों में उत्पन्न हुआ।
अंतिम पुर्ण बुद्धत्व सिद्धार्थ में प्रकट हुआ जो भगवान राम के पुत्र कुश के वंशज हीं थे।

भगवान गौतम बुद्ध का सम्यक दर्शन अवैदिक था । इन्होंने सामयिक परिस्थितियों के अनुसार बुद्ध दर्शन का प्रतिपादन और प्रचार किया था ।

भगवान गौतम बुद्ध का सम्यक दर्शन अवैदिक था । इन्होंने सामयिक परिस्थितियों के अनुसार बुद्ध दर्शन का प्रतिपादन और प्रचार किया था ।