Saturday, 15 May 2021

"भक्ति की शक्ति "

"भक्ति की शक्ति " 
मैं तो बल हीन हुंँ , धन हीन हुंँ , निर्बल हुंँ , ज्ञान हीन हुंँ पतित हुंँ , फकीर हुंँ पर फिर भी मैं राजा हुंँ , आनंद है मेरे पास । कैसे भाई  सब तरह से दीन हुंँ फिर भी राजा ? 
हांँ राजा हुंँ क्योंकि मैं अपने ईष्ट और गुरू का दास हुंं । 
एक भक्त कहता है अपने गुरू से कि :- 

उसके दर की गुलामी बादशाहत मेरी 
हुकुमे़ खुदा पर टिकी हुकूमत मेरी 
उसके नखड़े उठाऊं ये इबादत मेरी 
उसकी इताअत बन गई अब आदत मेरी 
बस सलामत रहे ये इरादत मेरी 
ये गुलामी मेरी और बादशाहत तेरी ।।

मैं हर तरह से लकीर का फकीर हुंँ पर मेरे पास तेरा बल है । तेरे कृपा का बल है , ए मेरे खुदा मेरे गुरू , ए मेरे हमनवां , ऐ मेरे दिल के बादशाह मैं तो बस एक तेरी ही दासता करता हुं । मेरे ह्रदय में मैं भी नहीं हुँ सिर्फ तू ही तू है । फिर मैं राजा कैसे नहीं ? 
तेरा ज्ञान रूप में मेरे पास ज्ञान का सागर है , तू प्राण रूप में मेरी उर्जा है , तुम षठसंपत्ति रूप में मेरी संपत्ति हो , तुम मेरी आत्म रूप में मेरा आत्म बल और आत्म विश्वास है । मैं तेरा सेबक हुंँ, तेरे भक्ति की तिजोड़ी जो तूने मुझ पर भरोसा करके दिया है तू मेरा है , मैं सिर्फ तेरा हुं और तेरा हीं रहुंगा हमेशा तो मैं बादशाह कैसे नहीं ! 
रहमत तेरी है सजदा मेरा , ये जो सजदा भी मैं तेरा करता हुं वो भी तेरे बल से हीं , तेरे बल से हीं पांचों पांडव बलवान हो कर कौरवों को मिटाया , अधर्म पर धर्म की विजय हुई , वो कौरव जिसको तूने अपनी सत्रह अक्छ्वनी सेना भी दे दी थी  , और जिसके पाले में भीष्म पितामह जैसे महारथी , द्रोण जैसे शास्त्रज्ञ शस्त्रज्ञ और पांडवों के भी गुरू थे व जिनके पास ब्रह्मास्त्र जैसा पृथ्वी नाशक शस्त्र था , कूल गुरू कृपाचार्य जैसे नितिज्ञ , कर्ण जैसा सूर वीर धनुर्धर , अस्वथामा जैसा रथी , तमाम शक्तियों के बाद भी समाप्त हो गए । 
यह है तेरी भक्ति की शक्ति ।

तुम ही कहते हो कि मैं उस समय भी था जब महाभारत हुआ , मैंने देखा था और तेरी कृपा से समझा की तुमने युद्ध से पहले ही हार मान कर धनुष-बाण छोड़ कर निराश बैठे , मोह ममता रूपी दल दल में फंसे अर्जूण को सतरह अध्याय तक तत्व ज्ञान दिया फिर भक्ति सिखाई यह कह कर सिखाई कि :- 
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।66।।
फिर कहा कि :- 

तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर यथाशास्त्रम्।
 युध्य च युद्धं च स्वधर्मं कुरु। 
मयि वासुदेवे अर्पिते मनोबुद्धी यस्य तव स त्वं मयि अर्पितमनोबुद्धिः 
सन् मामेव यथास्मृतम् एष्यसि आगमिष्यसि असंशयः न संशयः अत्र विद्यते।।किञ्चत

तो अंत में तुमने कहा कि हे अर्जूण  सभी कर्म धर्म ज्ञान विज्ञान पाप पुण्य के भय  को त्याग कर एक मात्र मेरी शरण में आ जाओ , और केवल मुझमें अपना मन बुद्धि चित्त लगाओ और फिर मेरी आज्ञा से , यानि आप भगवान की आज्ञा से प्राप्त बल से युद्ध करो । 
तो मैं आपकी कृपा से समझा प्रभु की  मैं अपने  शस्त्र , और शास्त्र और शारीरिक बल से , मोह माया से भरे निर्बल मन से कभी युद्ध कर ही नहीं सकता  और विजय तो दुर की कौड़ी था  ।
इसलिए आपने  शास्त्र का ज्ञान द्वारा तत्वज्ञान दिया , तत्व ज्ञान से अपनी भक्ति की तरफ प्रेरित किया पहले , और फिर मेरी माया चली गई , फिर मेरे ह्रदय में मेरा सारथी यानि गुरू बन कर ( गुरू सारथी ही होता है जो शिष्य को सर्वोच्य भक्ति की मार्ग पर ला दे , अंधकार से प्रकाश में ला दे , अंधेरा दुर कर दे मन का और फिर चित्त शुद्धि कराके विशुद्ध भक्ति प्रदान करें   ) मुझे भक्ति सिखाया । फिर आपके बल से इतनी बड़ी कौरव सेना को और बड़े बड़े महारथी को धुल चटा दिया प्रभु ।

आपने हीं मुझसे कहा था प्रभु की हे अर्जुन मैं तो इन सभी को पहले ही मार चुका हुं , जब ए सभी मेरे सनातन धर्म के विरुद्ध कर्म करना शुरू किए थे तभी इनका तेज समाप्त चुका था , इनकी आत्म बल बुद्धि , सब मैं क्षीण कर इनको निष्प्राण बना चुका था , तुमको तो मैं तत्वज्ञान देकर भक्ति की शक्ति प्रदान करके युद्ध के मैदान में खड़े इन शवों को लेटाने कि प्रेरणा दी है ।

युद्ध जीतने के बाद प्रभो मुझे अहंकार हो गया था , कि यह युद्ध मैंने जीता है । तो आपने भक्त बरवरीक के द्वारा मुझे फिर सचेत किया , बरवरिक का कटा सिर ने हंसते हुए  मुझसे कहा की युद्ध तो आप कर रहे थे । मुझे तो आपने निमित्त बनाया था केवल । 
तो इस प्रकार मैं जान गया हुं प्रभो कि कोई जीव अपने बल और कर्मो से  कभी किसी  दुष्टों को , राक्षसों को कभी नहीं समाप्त कर पाया है और ना कर पाएगा , एक मरेगा हजार पैदा होगा  । इतिहास गवाह है । शास्त्र गवाह है । 
दंडकारण्य के तमाम ऋषि मुनियो के पास उनके जप तप  योग का बल था और अनेकों दिव्यास्त्र था फिर भी वो रावण और उसके साम्राज्य को नहीं मिटा पाय खुद । आपको ही राम रूप में आना परा , उसी प्रकार पराक्रमी कंस को मात्र  एक मुक्का से समाप्त कर अपना लोक दे दिया आपने ।
आपने हिरण्यकशिपु। हिरण्याक्ष का बद्ध किया , रावण और कंस को आपने ही समाप्त किया और उनके शरीर से अपने जय विजय पहरेदार को मुक्त करके अपना लोक फिर से दे दिया । आपके सुरक्षा प्रहरी को भला कौन मार सकता था आपके सीवा प्रभु ? 

हां कौरव आदि को समाप्त करने के लिए मुझे निमित्त बनाया । क्योंकि वो सनातन का विद्रोही जीव था , धर्म से विमुख गुरू द्रोण , कृपाचार्य , भीष्म पितामह, अस्वथामा , दुर्योधन को मारने के लिए मुझे निमित्त बनाया क्योंकि उनको अपना लोक नहीं देना था आपको  , और तुक्ष लोक स्वर्ग भेज दिया आपने भीष्म पितामह , आदि को  ‌, और बांकी द्रोहियों को कौरवों को रौरव नरक दे दिया । 
अगर आप डाइरेक्ट मारते तो उनको भी आपको अपना लोक गोलोक देना परता , इसलिए यह काम अपनी भक्ति के द्वारा प्रदान शक्ति से आपने मुझसे करवाया ।

हे प्रभु आज भी वही आसुरी शक्ति आतंक बाद के रूप में उग्रवाद के रूप में फिर से विश्व में पनप रहा है ।‌
हे प्रभु मैं जानता हुं यह विधर्मी बिचार धारा रूपी आसुरी शक्ति है । इसका दमन कुछ देश , मिलिट्री , आदि थोड़ी देर के लिए कर सकता है पर ये समाप्त नहीं होने वाले ।
कारण आज बहुत से हम सनातनी खुद नहीं जानते , कि हमारा धर्म क्या है । हम सनातन धर्म रूपी भैल्यूज को खो चुके हैं , हिन्दु संस्कृति रूपी सिद्धांतों को भुल चुके हैं । हम मांस भक्षी हो गय। हम अपना संस्कार को भुल चुके । 
हम लगभग वस्त्र हीन हो चुके हैं हम सनातनी कबाबी ,‌जुआरी व्यभिचारी हो रहें हैं । हमारी माता बहने बेटा ,बेटी लगभग वस्त्र हीन सभ्यता अपना चुंके है । सिगरेट और शराब और दारू खाना हमारा मंदिर बन चुका है । संतो में , महापुरूषों में शास्त्रों में हमारी श्रद्धा ना रही , 
हम घटिया तामसिक किताब और विडियो और फिल्म देखने लगे हैं । फिल्म की कुछ विचित्र वस्त्र पहने लगभग वस्त्र हीन अभिनेता , अभिनेत्री हमारा रोल मोंडल बन गया है और हम उसके प्रवचनों को सुनने और विश्वास करने लगे हैं । हम ढोंगी साधु चमत्कार दिखाने बाले के शरण में जाने लगे हैं । हम असंगठित हैं । हम अपने ही धर्म से च्यूत हो रहे हैं । इन दुर्गुणों के कारण मैं तेज़ हीन हो गया हुं । मेरा अंत:करण बहुत गंदा हो चुका है ।
और फिर भी हम अहंकार करने लगे हैं कि हम अपने क्षूद्र बिद्या बल बुद्धि के बस में आकर जोश में उछल‌ कर बाते बना कर   हम उस बिचार‌धारा को समाप्त कर देगें ।‌

नहीं प्रभु , नहीं  मैं जानता हुं यह सम्भव नहीं है । 
हम आपके शरण में हैं प्रभु आप अपनी सनातन की चिंता करो फिर से , आप अपने जन कि चिंता करो फिर से । हे प्रभु मैं तो केवल आपके सेवक हुं , भक्ति के सिवा‌ आपने हमें कुछ भी करने को नहीं कहा है । मैं तो भक्ति हीं करूंगा । और कुछ भी नहीं प्रभु । 
आपने हीं कहा है गुरू देव - 
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
" हर समय मन ही मन हरि गुरू को स्मरण करते हुए युद्ध , युद्ध कुसंग से , कुविचारों से बचना और आपको भजना मन ही मन  " हरिगुरू रक्षा कर रहें हैं । करेंगें , यह दृढ़ विश्वास "
:-आपका नित्य दास संजीव कुमार , रांची। आज तारिख 16 मई ।

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