Saturday, 8 May 2021

एक साधिका दीदी का प्रश्न - Jo sadhak hai pr abhi bhav bhakti pr abhinhi hai use mrne ke baad turnt manusya sarir mil jatta hai ya sukshm sarir me bhog bhogna padta hai

एक साधिका दीदी का प्रश्न - Jo sadhak hai pr abhi bhav  bhakti pr abhinhi hai use mrne ke baad  turnt manusya sarir mil jatta hai ya sukshm sarir me bhog bhogna padta hai

उत्तर - Radha Rani दीदी सुक्ष्म शरीर और कारण शरीर से मुक्ति वास्तविक मौक्ष के पश्चात् ही होती है । इधर मौक्ष हुआ उधर जीव तीनों शरीर - स्थूल , सूक्ष्म और कारण शरीर से निकल कर ब्रह्म में लय हो जाता है ।
पर भगवान को और उनकी सेवा की कामना वाला  साधक जब भगवद् प्राप्त कर लेता है तो उसका सुक्ष्म शरीर और कारण शरीर दोनों दिव्य हो जाता है । 
इधर भगवद् प्राप्ति हुआ और उधर शरीर दिव्य हुआ । 
आत्मा बिना बर्तन का एक पल भी नहीं रह सकता है । 
मौक्ष पाने वाले का भी आत्मा जिस क्षण मुक्त होगा उसी क्षण में ब्रह्म में लय हो जाता है । यह बड़ा टेक्निकल है । यानि इधर निकला उधर लय हुआ । 

पर हमारे महाराज जी पांचों मुक्ति को पिशाचनी कहें है । तो फिर भगवद् प्राप्ति बाले का क्या होगा ?
तो हम लोग भगवान की सेवा चाहते हैं केवल  ।
"नित सेवा मांगु श्यामा श्याम तेरी 
ना मैं मुक्ति ना ही मुक्ति मांगु मैं " - श्री महाराज जी ।

तो केवल भगवद् प्राप्ति की कामना रखने वाला साधकों का कारण शरीर में एक हीं वासना होती है कि उसको गोलोक में  भगवान कि सेवा मिल जाए । 
कारण शरीर का मतलब हमारे वासना का शरीर ।
चाहे वो  वासना संसार को पाने का हो यानि भुक्ति का हो तो भोग के कामना रूपी करण शरीर - नंबर वन ।

नंबर टु मौक्ष की प्राप्ति की हो तो मौक्ष के कामना का कारण शरीर । यहां यह समझना होगा की संसार को पाने की कामना और मौक्ष की कामना दोनों एक साथ कभी नहीं हो सकती है । आग और पानी दोनों एक साथ नहीं रह सकता कभी ।
मौक्ष की कामना होगी तो संसार की कामना स्वत: समाप्त हो जाती है ध्यान साधना से । 

नंबर तीन । श्री महाराज जी के साधकों को मुक्ति और भुक्ति दोनों की कामना को त्यागना होता है  , उनको  केवल भगवान और भगवान के धाम को प्राप्त कर उनके सेवा की कामना रहती है । इसलिए यहां उसका कारण शरीर उसी दिव्य कामना के परिणामस्वरूप गुरू द्वारा  दिव्य बना दिया जाता  है । यह अंतर है । 
यहां भी वांकी दो कामना यानी मुक्ती या भुक्ति दोनों की कामना समाप्त होने के बाद ही भगवान के सेवा की कामना ठहर सकती है । तीनों या दो अन्य कामना कभी एक साथ नहीं ठहर सकती है । 

तो साबित हुआ की कारण शरीर केवल‌ और केवल तीन प्रकार का ही होता है ।
जिसमें एक माईक और दो दिव्य ।
माइक उसका जिसको संसार के सुख पाने‌ की और भोगने की कामना  यानि भुक्ति की कामना ।

दुसरा - मौक्ष की कामना का कारण शरीर , यह भी दिव्य बना दिया जाता है मौक्ष मार्गी  गुरू द्वारा ।

तीसरा - ऐसा जीव जिसको सगुण साकार भगवान श्री कृष्ण को और उनके धाम को प्राप्त करने कि कामना शेष बच जाती है वाकी दोनों कामना समाप्त हो जाती है तो उनका  कारण शरीर और सुक्ष्म शरीर दोनों दिव्य बना दिया जाता है श्री महाराजजी जैसे उच्च कोटी के रसिक संत और गुरू द्वारा ।। 

अब इसके अलावा भी एक चौथे प्रकार का कारण शरीर होता है जो पूर्णत: निष्काम‌ का  होता है । उपर्युक्त तीनों कामना का आभाव होता है इनमें । यह है गोपी महाभाव कारण शरीर  । जिसमें जीव हमेशा अपने प्रेमास्पद की सुख की कामना रखता है । यानि वो भगवान से कहते हैं कि तुम मुझे प्रेम दो या ठुकरा दो । हर हाल में मैं तुम्हारे सुख में ही सुख अनुभव करता हुं । यह केवल नित्य सिद्ध भगवान तुल्य  महापुरूषों के होता है जैसे श्री महाराज जी , गौरांग महाप्रभु ,  ललिता आदि । यह रेयर है ये स्वयं भगवान ही है । । 
 
तो साधक को जब भगवद् प्राप्ति होती है तो उसका कारण शरीर , सुक्ष्म शरीर दोनों दिव्य हो जाता है उसी क्षण । याद रखिय पहले ही बतलाया  गया है कि आत्मा बिना बर्तन के एक पल भी नहीं रह सकती । 

अब आपके दुसरे सबाल का ज़बाब तो याद किजिए श्री महाराज जी का दिया तत्व ज्ञान,  साधक को अपने साधना के स्तर के अनुसार उसको मानव शरीर मिल जाता है फिर से वहां से , जहां तक कमाई किया था पिछले मानव शरीर में वहां तक फिर मिल जाता है और फिर वहां से आगे शुरूआत होती है साधना की । 
जैसे कोई इस जन्म में मैट्रिक कर गया और मर गया तो फिर अगले शरीर में वो इंटरमीडिएट से शुरू करेगा । यह होता है साधको के साथ । श्री राधे ।- संजीव 

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