हरि के जो वल्लभ है , दुर्लभ भुवन मांझ ,
तिनहिं के पद् रेनु , आसा जिए करिहें ।
जोगी , जपि, तपि जासों मोको कछु काम नाहिं
प्रीति परतिति , रिति मेरी मति हरीहें ।।
हरि के जो वल्ल्भ हैं , मतलव जिनको खुद भगवान श्रीकृष्ण अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करतें हैं । जिनके पीछे पीछे स्वयं भगवान चलते हैं । ऐसे संत बहुत दुर्लभ होतें हैं , बहुत हीं दुर्लभ ।
हरि जिनके वल्लभ हैं ऐसे संत तो बहुत मिल जायेगें संसार में ।
लेकिन ऐसे रसिक संत बहुत हीं दुर्लभ होतें हैं जगत में जिसके पीछे-पीछे स्वयं हरि चले ।
ऐसे हीं रसिक संतों में अग्रगण्य रसिक सिरोमणी संत , कृपावतार स्वयं हमारे गुरूदेव , श्रीमत्पदवाक्यप्रमाणपारावारीण,वेदमार्गप्रतिष्ठापनाचार्य,निखिलदर्शनसमन्वयाचार्य,सनातनवैदिकधर्मप्रतिष्ठापनसत्संप्रदायपरमाचार्य,भक्तियोगरसावतार,भगवदनन्त श्रीविभूषित , पंचम मुल जगद्गुरूत्तमई , १००८ स्वामि श्री कृपालु जी महाराज हैं, जो इस कलिकाल में हम कलिमल ग्रसित जीवों के कल्याण हेतु इस धराधाम पर अवतार लेकर युगलसरकार के ब्रज रस का वितरण हम सभी के मध्य किए । ऐसे कृपावतार विरले हीं संसार में आतें हैं ।
जिनकी पद रेणु भगवान चाहते हैं अपने माथे से लगाते हैं । और इन्ही के पद रेनु की चाहत व लक्ष्य हमारा है ।
भक्ति मार्गी , प्रेम मार्गी , प्रेमीजन इन योगी , जपी , तपी , ध्यानी आदि से बहुत दुर रहतें हैं ।
क्यों दुर रहतें हैं , तो इसलिए कि जो हरि के वल्लभ है, ऐसे दुर्लभ, प्रेमी रसिक संत का हमने संग किया है और उन्ही को हम भजते हैं , उन्ही का संग करते हैं , सत्संग करते हैं ।
हमारे गुरूदेव ने तो हमें ऐसे प्रेमरस का पथिक बनाया है, जो बड़े बड़े बृहस्पति , सरस्वती , और ब्रह्मा के लिए भी दुर्लभ है । हम युगलसरकार के निजधन , प्रेमरस के पथिक है । उनके प्रेम , प्रीति परतिति की रिति ने तो हमारी मति सदा के लिए हर लिया है ।
हमें , अष्टांग योगी , षठ् सम्पत्तिवान , और साधन चातुष्ट्य सम्पन्न जीव , ज्ञानि ध्यानी की कोई आवश्यकता नहीं है ।
हम भगवद् प्रेमिजन इन सभी से कोसों दुर रहते हैं ।
हम सब भक्ति मार्गी है और भक्ति को अष्टांग योग आदि की कोई जरूरत नहीं ।
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता ।। ( रामचरितमानस)
" यज्ञ, दान , व्रतादि में जो त्रुटि रह जाती है,
जब भक्ति ही उसे पुरा करती है , तब भला भक्ति को उन कर्मों की क्या अपेक्षा हो सकती है |"
"ज्ञान, विज्ञान, तपस्या , योग , यज्ञादि का जो कुछ भी फल हो सकता है, वह सब भक्ति से अनायास ही प्राप्त हो जाता है | किंतु भक्ति का फल किसी भी कर्म से नही प्राप्त हो सकता |"
" अन्त:करण शुद्धि हेतु एक मात्र भगवद्भक्ति ही साधन है, अन्य कोई मार्ग नही "
" भक्ति के अनेक भेद हैं | किंतु श्रवण, कीर्तन, एवं स्मरण तीन ही प्रमुख हैं |„
" सर्वप्रमुख स्मरण भक्ति ही है, अन्य इन्द्रियादिकों की भक्ति हो या न हो |„
- कृपालु बचनामृत , पेज ५९, ६०,६१„ ६२ एवं ६३
:- पूज्यनियां मां रासेस्वरी देवी जी के प्रवचन से ।।
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