और "मैं और मेरा कौन " को जानने के लिए एक मात्र श्री कृपालु महाप्रभु के हीं शरण में जाना होगा , और दुसरा रास्ता हैं हीं नहीं हैं ।
अपनी दो अंगुली की खोपड़ी के बल पर हम खुद को कभी नहीं जान सकते तो संसार और भगवान को जान पाना तो सर्वदा असंभव है । अनेकों ग्रंथों के पढ़ने और साधना के पश्चात भी संभव नहीं है ।
क्योंकि बिना समर्थ गुरू के विनिर्गत व स्मृत ग्रंथ ( वेद पुराण , भागवद् , रामायण, गीता आदि) की तो छोड़िए, एक साधारण मनुष्यों द्वारा भी लिखा साधारण भाषा ( सरल हिंदी ) में लिखा पुस्तक ( कृत ग्रंथ ) को पढ़कर हम गलत धारणा बना लेते हैं । क्योंकि हम वहीं समझते हैं जो हमारी खुद की अवधारणा है ।
एक डौक्टर बनने के लिए मेडिकल कौलेज में जिस प्रकार दाखिला आवश्यक है ,कोई खुद से तमाम मेडिकल की पुस्तकों को पढ़ कर भी डौक्टर नहीं बन सकता , ठीक उसी प्रकार जबतक हम वास्तविक संत महापुरुषों के शरण में जाकर उनको अपना गुरू मानकर उनसे नहीं समझेंगे तब तक अज्ञानता हमारे ऊपर हावी हीं रहेगी और गलत समझ लेगें ।
और जब तक अज्ञानता हावी रहेगी तबतक हम विप्रलिप्सा , भ्रम , प्रमाद और कर्णपाटव का शिकार रहेंगे ।
और यही अवगुण हमें वास्तविक तत्वज्ञान से दुर रखेगा ।
अतः खुद का सदा के लिए कल्याण चाहते हैं तो सब पिछला तमाम संग्रहित ज्ञान को त्याग कर भोले बालक बन कर एक मात्र हरि गुरू के शरण में जाना होगा ।
( फिजिकल कहीं जाने की जरूरत नहीं , मन हीं मन किसी भी वास्तविक संत को अपना मान कर उनकी बतलाई साधना करनी होगी व उनके पुस्तकों को श्रद्धा और विश्वास के साथ बार बार ध्यान से पढ़ना होगा , तब जाकर उनकी कृपा से काम बन जाएगा )
वास्तविक संत स्थूल जगत से स्थूल शरीर को त्यागने के बाद और भी व्यापक रूप से अपने शरणागत साधक शिष्य के साथ प्रत्येक क्षण रहते हैं । यह प्रत्यक्ष अनुभव में तभी आएगा जब हम उन पर अटूट अनन्य श्रद्धा और विश्वास के साथ उनको अपना मान लेंगे और उनके तमाम आदेशों का पालन करते हुए उनके बतलाए एकमेव रास्ते का अनुगमन करेंगें ।
हरि गुरू जैसा अपना कोई नहीं । एक बिल्ली या ब्याघ्र जिस प्रकार अपने बच्चे को अपने खुंखाड़ दांतों से उठा कर सुरक्षित रखती है ठीक उसी प्रकार हमारा गुरू और हमारे इष्ट हर क्षण अपने शरणागत को संभालते रहते हैं ।
पर जो ज्ञानी , ध्यानि , योगी , जपी , तपी, कर्मी , कर्मकांडी अपने बल पर उनके पुस्तकों को और उनको समझना चाहता है उसको वो कभी नहीं मिलते हैं ।
ऐसे ज्ञानी , ध्यानि , योगी , जपी , तपी, कर्मी को भगवान बंदर के बच्चे के तरह रखते हैं । बंदर का बच्चा अपने मां से खुद के बल पर चिपका रहता है । इस प्रकार कई दुर्घटना में मां से छुट कर गिर कर समाप्त भी हो जातें हैं ।
पर बिल्ली का बच्चा अपने मां के जबड़े में बिना हिले डुले लटका रहता है , वो कभी नहीं गिरता ।
ठीक उसी प्रकार भक्त का पतन कभी नहीं होता क्योंकि भक्त को भगवान बिल्ली के बच्चे के तरह संभालते रहतें हैं ।
पर वहीं ज्ञानी , ध्यानि , योगी , जपी , तपी, कर्मी का पतन अवश्य हो जाता है ।
क्योंकि इनको अपने बल का अहंकार होता है ।
श्री राधे , जय जय श्री राधे ।
:- गुरू देव के कृपा से प्राप्त ज्ञान का आधार ।