Sunday, 28 March 2021

जब तक हम खुद के व इस संसार के वास्तविक स्वरूप को नहीं जान पाएंगें तब तक , हमारा कौन? यानि भगवान को पाने की प्यास , तरप पैदा हो हीं नहीं सकती ।

जब तक हम खुद के व इस संसार के वास्तविक स्वरूप को नहीं जान पाएंगें तब तक , हमारा कौन? यानि भगवान को पाने की प्यास , तरप पैदा हो हीं नहीं सकती ।
और "मैं और मेरा कौन " को जानने के लिए एक मात्र श्री कृपालु महाप्रभु के हीं शरण में जाना होगा , और दुसरा रास्ता हैं हीं नहीं हैं । 
अपनी‌ दो अंगुली की खोपड़ी के बल पर हम खुद को कभी नहीं जान सकते तो संसार और भगवान को जान पाना तो सर्वदा असंभव है । अनेकों ग्रंथों के पढ़ने और साधना के पश्चात भी संभव नहीं है । 

क्योंकि बिना समर्थ गुरू के विनिर्गत व स्मृत ग्रंथ ( वेद पुराण , भागवद् , रामायण, गीता आदि) की तो छोड़िए, एक साधारण मनुष्यों द्वारा भी लिखा साधारण भाषा ( सरल हिंदी ) में लिखा पुस्तक ( कृत ग्रंथ ) को पढ़कर हम गलत धारणा बना लेते हैं । क्योंकि हम वहीं समझते हैं जो हमारी खुद की अवधारणा है ।

एक डौक्टर बनने के लिए मेडिकल कौलेज में जिस प्रकार दाखिला आवश्यक है ,‌कोई खुद से तमाम मेडिकल की पुस्तकों को पढ़ कर भी डौक्टर नहीं बन सकता , ठीक उसी प्रकार जबतक हम वास्तविक संत महापुरुषों के शरण में जाकर उनको अपना गुरू मानकर उनसे नहीं समझेंगे तब तक अज्ञानता हमारे ऊपर हावी हीं रहेगी और गलत समझ लेगें । 
और जब तक अज्ञानता हावी रहेगी तबतक हम विप्रलिप्सा , भ्रम , प्रमाद और कर्णपाटव का शिकार रहेंगे । 
और यही अवगुण हमें वास्तविक तत्वज्ञान से दुर रखेगा । 
अतः खुद का सदा के लिए कल्याण चाहते हैं तो सब पिछला तमाम संग्रहित ज्ञान को त्याग कर भोले बालक बन कर एक मात्र हरि गुरू के शरण में जाना होगा ।

 ( फिजिकल कहीं जाने की जरूरत नहीं , मन हीं मन किसी भी वास्तविक संत को अपना मान कर उनकी बतलाई साधना करनी होगी व उनके पुस्तकों को श्रद्धा और विश्वास के साथ बार बार ध्यान से पढ़ना होगा , तब जाकर उनकी कृपा से काम बन जाएगा ) 

वास्तविक संत स्थूल जगत से स्थूल शरीर को त्यागने के बाद और भी व्यापक रूप से अपने शरणागत साधक शिष्य के साथ प्रत्येक क्षण रहते हैं । यह प्रत्यक्ष अनुभव में तभी आएगा जब हम उन पर अटूट अनन्य श्रद्धा और विश्वास के साथ उनको अपना मान लेंगे और उनके तमाम आदेशों का पालन करते हुए उनके बतलाए एकमेव रास्ते का अनुगमन करेंगें ।

हरि गुरू जैसा अपना कोई नहीं । एक बिल्ली या ब्याघ्र जिस प्रकार अपने बच्चे को अपने खुंखाड़ दांतों से उठा कर सुरक्षित रखती है ठीक उसी प्रकार हमारा गुरू और हमारे इष्ट हर क्षण अपने शरणागत को संभालते रहते हैं ।

पर जो ज्ञानी , ध्यानि , योगी , जपी , तपी, कर्मी , कर्मकांडी अपने बल पर उनके पुस्तकों को और उनको समझना चाहता है उसको वो कभी नहीं मिलते हैं । 
ऐसे ज्ञानी , ध्यानि , योगी , जपी , तपी, कर्मी को भगवान बंदर के बच्चे के तरह रखते हैं । बंदर का बच्चा अपने मां से खुद के बल पर चिपका रहता है । इस प्रकार कई दुर्घटना में मां से छुट कर गिर कर समाप्त भी हो जातें हैं ।
पर बिल्ली का बच्चा अपने मां के जबड़े में बिना हिले डुले लटका रहता है , वो कभी नहीं गिरता । 

ठीक उसी प्रकार भक्त का पतन कभी नहीं होता क्योंकि भक्त को भगवान बिल्ली के बच्चे के तरह संभालते रहतें हैं ।
पर वहीं ज्ञानी , ध्यानि , योगी , जपी , तपी, कर्मी का पतन अवश्य हो जाता है । 
क्योंकि इनको अपने बल का अहंकार होता है ।
श्री राधे , जय जय श्री राधे ।
:- गुरू देव के कृपा से प्राप्त ज्ञान का आधार ।

Friday, 26 March 2021

भक्ति में अष्ट सात्विक भाव का लक्षण अति विशिष्ट संतों में हीं होता है जो श्री कृपालु महाप्रभु जी में था ।

स्तंभ: स्वदोऽथ रोमांच: स्वरभेदोऽथ वेपथु: |
वैवर्ण्यमश्रुप्रलय इत्यष्टौ सात्विका: स्मृता: ||
(भ.र.सि.)
अर्थात प्रेमास्पद की याद में वृक्ष के समान स्थिर सामाधिस्थ हो जाना , पसीना निकलना , रोंगटे खड़े हो जाना , आवाज बदल जाना , शरीर काँपना , चेहरे का रंग बदल जाना , आँसू निकलना , मूर्च्छित हो जाना |
उपर्युक्त अष्ट सात्विक भावों का एक साथ उद्रेक अगाध दिव्य प्रेम का परिचायक है | श्री महाराज जी के अन्दर ये सभी सात्विक भावों का जब उद्रेक होता है , सम्पूर्ण वातावरण भक्ति -रस से ओत प्रोत हो जाता है | एक-एक अंग से शोभाश्री की ऐसी सुधा धारा प्रवाहित होती है जो सभी अंग प्रत्यंग में अमृत का संचार कर देती है | भक्तवृंद आह्लाद सुधा सरिता में बह जाते हैं | सभी का ह्रदय अपार आनंद से भर जाता है परमानिर्वचनीय रसमत्तता में डूब जाते हैं |
हरि हरि बोल , बोल हरि बोल
हरि हरि बोल , बोल हरि बोल
हरि हरि बोल , बोल हरि बोल
बोल हरि बोल , बोल हरि बोल
हरि हरि बोल , बोल हरि बोल......... पुज्यनियां मां रासेस्वरी देवी जी।

Thursday, 25 March 2021

तेरहवा प्रश्न - माया बद्ध देवी देवता माया से परे भगवान के लोक में कैसे प्रवेश कर पाते हैं ?

तेरहवा प्रश्न - माया बद्ध देवी देवता माया से परे भगवान के लोक में कैसे प्रवेश कर पाते हैं ? 
उत्तर - स्वर्ग के देवी देवता माया बद्ध होते हुए भी भगवान से मिल लेते हैं , साक्षात उनका दर्शन और वार्तालाप कर लेते हैं , उनसे अपने स्वर्ग लोक की रक्षा के लिए सहायता प्राप्त कर पाते हैं । विरजा नदी पार कर वैकुंठ लोक, भगवान के लोक में जाकर भगवान और श्री विष्णु ,‌शंकर जी आदि से मिल पातें हैं -
पहला कारण - स्वर्ग के देवताओं का शरीर सूक्ष्म है और दिव्य हैं , उनके शरीर में मनुष्यों के शरीर के तरह विकार , दुर्गंध आदि नहीं है। मनुष्य का शरीर पंचभूत का बना है। मनुष्य के शरीर मे़ं कफ-पित-वात , अस्थि, मज्जा, हार , मांस और दुर्गंधयुक्त है । मनुष्य का यह शरीर तो स्वर्ग में प्रवेश के लायक भी नहीं है भगवान के लोक जाने का प्रश्न हीं नहीं उठता है । 
लेकिन देवताओं के शरीर में ये सारे दोष नहीं है , उनका शरीर दिव्य है , सूक्ष्म है , उनके शरीर से दिव्य सुगंधी निकलता रहता है । 

नंम्बर दो और महत्त्वपूर्ण कारण - देवताओं के पास बहुत हीं अधिक मात्रा में उनके संचित पुण्य का भंडार है । और उनके पुण्य बल का तेज है । उनका शरीर तेजमयो हैं , प्रकाशमयों है ,‌दिव्य है । वे प्रकाश के गति से कहीं भी आजा सकतें हैं। ये विशेषाधिकार उनके अपने पुण्य के बल पर उनको मिला है । 

अत: स्वर्ग के देवी देवता अपने अत्याधिक पुण्य और तेज के वल पर विरजा नदी पार करके भगवान व वैकुंठ लोकादी में भ्रमण करते हैं , किसी विशेष कार्य हेतु भगवान के लोक जाकर उनसे मिलते हैं अपनी रक्षा आदि के लिए ।
लेकिन जितनी वार वो अपने पुण्य के तेज के बल से भगवान के लोक जाकर या कहीं भी भगवान का आवाहन कर मिलतें हैं तो हरवार उनके पुण्य का तेज उतनी हीं अधिक मात्रा में समाप्त होते जातें है । खत्म होतें जातें हैं । क्षीण होते जातें हैं ।

देवता अपने दिव्य शरीर , दिव्य इंद्रीयादी,‌ दिव्य ज्ञान, बुद्धि एवं अपने निज सर्वाधिक पुण्य के वल पर भगवान को उनके वास्तविक स्वरूप में देख पातें हैं , बातें कर पातें हैं , उनसे दिव्यास्त्रादी प्राप्त कर पाते हैं , उनके धाम में जा पातें हैं ।
लेकिन वो भगवद् प्रेम प्राप्त नहीं कर पाते क्योकिं वो मनुष्य के तरह कर्म करने का अधिकारी नहीं हैं,‌ देवता एक भोग योनि हैं जो अपने पुण्य के वल से स्वर्ग के सुख को भोगते हैं और जिस दिन उनके सारे पुण्य क्षीण हो जातें हैं तो पुण्य के अत्यंताभाव के कारण अन्य योनि में भेज दिए जातें हैं , उन्हे स्वर्ग से गिरने के बाद मनुष्य का शरीर भी नहीं मिलता । इसलिए स्वर्ग को पाना महान मूर्खता है , और यही कारण है कि स्वर्ग की कामना , भुक्ति की कामना एक महान भुल है । 
 वो देवता हम मनुष्यों के जैसे भक्ति नहीं कर सकते हैं , क्योंकि शरीर है हिं नहीं उनके पास , इसलिए भगवान के प्रेम में या विरह में आंसु नहीं बहा पातें , भगवान के प्रति प्रेम भाव जागृत नहीं कर पाते , और तद्नुसार भगवान भी उनको वो सर्वदुर्लभ अपना निजी धन -भगवद् प्रेम नहीं दे पाते हैं जो मनुष्य के लिए सर्वसुलभ है, मनुष्य भक्ति कर उनसे प्रेम का भीख मांग लेते हैं ,‌लेकिन देवता ऐसा नहीं कर सकते ।
इसलिए हमे भगवान की निष्काम भक्ति करने का पाठ हमारे प्यारे गुरूदेव श्री महाराज जी ने सुझाएं हैं , और निष्काम भक्ति करने का आदेश दिए हैं । 
- पूज्यनियां मां । श्री राधे

Wednesday, 24 March 2021

ज्ञानी किस प्रकार मौक्ष प्राप्त करते हैं ?

बारहवां प्रश्न - ज्ञानी किस प्रकार मौक्ष प्राप्त करते हैं ?

उत्तर - ज्ञानी पंचकोश को विद्यामाया के द्वारा भष्म कर देंतें हैं , ये स्वरूपावरी का माया को तो समाप्त कर देतें हैं लेकिन गुणावरी के माया को समाप्त नहीं कर पाते हैं ।

  यानि अविद्या माया को विद्या माया द्वारा समाप्त कर देतें हैं लैकिन विद्या माया  को समाप्त नहीं कर पाते हैं  ।
ये ज्ञानी लोग अविद्या को समाप्त कर  पंचकोश ( अन्नमयकोश, प्राणमयकोश,‌ मनोमयकोश, विज्ञानमय कोश , आनंदमय कोश) के अंतिम कक्षा आनंदमय कोश के परे चले जातें हैं और उसको भी भष्म कर लेते़ है , अब वहां  उन्हें ध्यान में भगवान का केवल आभास होता है वो भी ध्यान में  केवल,  लेकिन साक्षात्कार नहीं हो पाता है । वो इसी आनंदमय कोश के परे  जाकर आनंद का अनुभव करके भ्रम में आ जातें हैं कि आनंद मिल गया । 
,वो महान यानि महत् तत्व और प्रकृति को लांघ नहीं पातें हैं ।   इसलिए मायाबद्ध ही रहतें हैं , इनकी माया समाप्त नहीं होती ।
 फिर इन्हे भी सगुण साकार भगवान श्रीकृष्ण की हीं भक्ति करनी परती है । तब जाकर कैवल्य , मौक्ष की चाह रखने वाले ज्ञानी को मौक्ष मिल जाता है ‌। बस खत्म, छुट्टी । अब वो अपने दिव्य इंद्रियों से परमानंद का अनुभव नहीं कर पातें हैं । वो स्वयं आनंद में लीन हो जातें हैं । जैसे मीठी पानी की नदी समुद्र में मिल कर अपना अस्तित्व खो देती है और स्वयं खारा जल हो जाता है ।
श्री राधे ।

Cospondencial and marginal growth theory -

Cospondencial and marginal growth theory -
एक बार मुगल बादशाह अकबर और उनका प्रिय मंत्री बीरबल दोनों शतरंज खेलने बैठे, और यह शर्त लगी कि जो भी शतरंज की यह बाजी हारेगा, उसे जीतने वाले की इच्छा के अनुसार जुर्माना चुकाना होगा। इसी क्रम में पहले बीरबल बोला 'जहांपनाह यदि आप जीत गए और मैं हार गया तो हुकुम फरमाएं कि मैं आपको क्या जुर्माना चुकाऊंगा?' बादशाह ने जवाब दिया बीरबल यदि यह बाजी मैं जीता और तुम हारे तो तुम्हें, जुर्माना स्वरूप मुझे सौ स्वर्ण मुद्राएं सौंपनी होगी। अब बारी बीरबल की थी, वह बोला - 'जहांपनाह यदि इस बाजी में आप हारे और मैं जीता तो आप मुझे जुर्माने के रूप में शतरंज के 64 खानों में गेहूं के दाने रखकर चुकाएंगे‌ लेकिन इसमें मेरी एक छोटी सी शर्त यह रहेगी कि आपको शतरंज के पहले खाने में गेहूं का एक दाना रखना होगा, दूसरे खाने में पहले के दुगने दो दाने, तीसरे खाने में दो के दुगने चार दाने, चौथे खाने में चार के दुगने आठ दाने, पांचवें खाने में आठ के दुगने सोलह दाने। ऐसे करते हुए शतरंज के सभी चौसठ खानों में गेहूं के दाने रख कर वे सारे गेहूं के दाने जुर्माना स्वरूप मुझे सौंप दें। बस यही मेरी शर्त है।' बीरबल की इस छोटी सी मांग को सुनकर बादशाह अकबर ने जोरदार ठहाका लगाया और बोला 'बीरबल मुझे तुम्हारी यह शर्त मंजूर है।' इसके बाद शतरंज का खेल शुरू हुआ। अब संयोग देखिए कि शतरंज की उस बाजी में बीरबल जीत गया और बादशाह अकबर को हार का मुंह देखना पड़ा। हारने वाले अकबर बादशाह ने बड़े ही अहंकार के साथ अपने खजांची को हुकुम दिया कि वह बीरबल को शर्त के अनुसार शतरंज के चौसठ खानों में गेहूं के दाने रख कर कुल दाने चुका दें। बीरबल की इस शर्त को पूरी करने के दौरान अकबर बादशाह का खजांची थोड़ी ही देर में पसीने-पसीने हो गया। फिर वह अकबर बादशाह के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला जहांपनाह हम हुकूमत का सारा खजाना खाली कर लें तो भी बीरबल की इस शर्त को पूरी नहीं कर पाएंगे। अकबर याने सुल्तान-ए-हिन्द को खजांची की बात पर विश्वास नहीं हुआ लेकिन जब खुद उसने 64 खानों की जोड़ लगाई तो उसका मुंह खुला का खुला रह गया।
     आप भी शायद मेरी बात से इत्तेफाक नहीं रख रहे हैं। चलिए मैं आपको समझाता हूं। बीरबल की शर्त के अनुसार जहां शतरंज के पहले खाने में गेहूं का केवल एक दाना, दूसरे खाने में दो दाने, तीसरे खाने में चार दाने ऐसे रखे गये थे वहीं शतरंज के सबसे आखिरी अकेले चौसठवें खाने में गेहूं के 9223372036854775808 दाने रखने पड़ रहे थे और एक से लगा कर चौसठ तक के सभी खानों में रखे जाने वाले गेहूं के कुल दानों की संख्या हो रही थी 18446744073709551615. जिनका कुल वजन होता है 1,19,90,00,00,000 मैट्रिक टन जो कि वर्ष 2019 के सम्पूर्ण विश्व के गेहूं के उत्पादन से 1645 गुणा अधिक है।
     साथियों, *वृद्धि दो तरह की होती है। पहली संख्यात्मक वृद्धि और दूसरी होती है गुणात्मक वृद्धि*। यदि शतरंज के चौसठ खानों में क्रमशः 1, 2, 3…..62, 63, 64 कर के प्रत्येक खाने में उसकी संख्या के अनुसार गेहूं के दाने रखे जाते तो सभी 64 खानों में रखे गेहूं के कुल दानों का योग होता मात्र 2080 दाने और यह कहलाती है संख्यात्मक वृद्धि जबकि बीरबल के द्वारा बताई गई गणना कहलाती है गुणात्मक वृद्धि। *जहां संख्यात्मक वृद्धि में 64 खानों का योग मात्र 2080 दाने होते हैं वहीं गुणात्मक वृद्धि में तो मात्र 11 खानों का योग ही 2047 दाने हो जाता है*।
हम बीरबल वाले देश हैं । - आपका संजीव । हम हारने वाले नहीं ।

भगवान मनुष्य के आत्मा के साथ सायुज्य सखा के रूप में ह्रदय मे़ सदा विद्दमान रहते़ हैं।

एगारहवां प्रश्न - भगवान मनुष्य के आत्मा के साथ सायुज्य सखा के रूप में ह्रदय मे़ सदा विद्दमान रहते़ हैं। और मनुष्य के मन में उठे संकल्पों को नोट करतें हैं और फल देतें हैं । दो काम करतें हैं । तो भगवान जब अन्य भोग योनि के जीव के कर्मों को नोट नहीं करतें हैं तो वो अन्य भोग योनि के जीवात्मा के साथ रहकर क्या करतें हैं ?

उत्तर - बड़ा सुन्दर प्रश्न है ।
भगवान सभी जीवात्मा के सायुज्य सखा के रूप में उसके ह्रदय में निराकार रूप में सदा रहते हैं, कभी अकेला नहीं छोड़ते हैं और जीव जहां जहां जिस जिस योनि में जाता है भगवान भी उसके साथ जाते हैं । 
अब भगवान अपनी जीव शक्ति मनुष्य के लिए दो नहीं तीन काम करतें हैं ।
पहला - भगवान महाचेतन है वो मनुष्य के ह्रदय में अपने अंश जीवात्मा के साथ रहकर जीवन शक्ति प्रदान करते रहते हैं । दुसरे शब्दों में भगवान जीव को चेतन बनाए रखने का काम करते हैं । और शक्ति प्रदान करतें हैं ।
यहीं पहला काम वो भोग योनि के जीवों के लिए भी करतें हैं ।
नहीं तो कोई भी जीव चेतन नहीं रह सकता कभी ।
इस लिए अन्य भोग योनी में भगवान केवल यही पहला काम करते हैं अन्य दो काम नहीं करते , लेकिन केवल मनुष्य जो की कर्मप्रधान योनि है में दो काम और करतें हैं जो निम्नलिखित हैं ।

दुसरा - मानव के मन में उठे संकल्पों को नोट करना ।

और तीसरा काम - उस मन में उठे संकल्पों के आधार पर फल प्रदान करना । 
इस प्रकार भगवान मानव के ह्रदय में निवास करके उपर वाले तीनों काम करतें हैं ।
लेकिन भोग योनि के सभी जीवों में केवल उपर का पहला काम करते हैं अन्य दो काम नहीं करतें हैं ।

 इसलिए केवल और केवल मानव योनि एक मात्र अति उत्तम योनि हैं । केवल मनुष्य पुरूषार्थ करके , गुरू की शरणागति करके भगवान के नीज धाम को प्राप्त करके सदा के लिए आनंदमय हो सकता हैं । इसलिए मनुष्य योनि को गंवाना एक महान भूल है । इसिलिए देवता भी मानुष तन प्राप्त करने के लिए सदा लालायित रहते हैं। 

श्री राधे ।

एक मनुष्य जब एक जानवर ब्याघ्र ( बाघ) को मार देता है तो क्या यह पाप कर्म है ? और एक बाघ जब एक जीव को मार देता है तो क्या यह पाप नहीं है

दसवां प्रश्न - एक मनुष्य जब एक जानवर ब्याघ्र ( बाघ) को मार देता है तो क्या यह पाप कर्म है ? और एक बाघ जब एक जीव को मार देता है तो क्या यह पाप नहीं है ?

उत्तर - बाघ ( एक हिंसक जानवर ) एक भोग योनि हैं 
उसे कर्म करने की स्वतंत्रता नहीं हैं , उसे संकल्प करने की स्वतंत्रता नहीं हैं , हिंसा उसकी स्वभाविक वृति है पेट भरने के लिए , जब वह भुखा रहता है तभी जीव की हत्या करता है अपने निहित सहज बुद्धि से । 
वह केवल भोग भोगता है , इसलिए भगवान उसके किसी कर्म को नोट नहीं करतें हैं । और जब नोट नहीं करतें हैं तो फल देने का सवाल हीं नहीं हैं । भगवान मनुष्य को छोड़ कर अन्य किसी भी जीव के कर्मों को नोट नहीं करतें , यहां तक कि देवता ( यानि इंद्र, वरूण , कूबेर आदि) का भी नहीं । देवता भी एक भोग योनि हीं है । 

लेकिन एक मनुष्य जो की कर्म प्रधान योनी है । भगवान ने केवल मनुष्य योनि को कर्म करने की स्वतंत्रता और शक्ति प्रदान किए हैं । मनुष्य किसी कर्म का संकल्प करने , डिसिजन लेने में स्वतंत्र है । और उस कर्म को करने में भी स्वतंत्र है , भगवान इंटरफेयर नहीं करते हैं । 
लेकिन फल पाने में स्वतंत्र नहीं हैं । इसलिए भगवान मनुष्य के हर संकल्पों को नोट करतें हैं और उसी का फल प्रदान करतें हैं । इसलिए एक मनुष्य जब किसी भी जीव का नुक़सान करता है तो भगवान उसके इस कर्म को नोट करतें हैं और उसी के अनुसार फल देतें हैं ।

अपवाद - भगवान हरि-गुरू के शरणागत जीव के किसी कर्म को नोट नहीं करतें हैं , वो अपने शरणागत जीव को अपने लोक में अपना पार्षद बना लेतें है । जैसे अर्जून आदि ने भगवान के शरणागत होकर लाखों मडर किए , भगवान उसे नोट नहीं किए और उसे अपना पार्षद बना कर अपना‌ लोक दे दिए । श्री राधे ।

हंस और परमहंस में क्या अंतर है ?

नौवां प्रश्न - हंस और परमहंस में क्या अंतर है ?

उत्तर - हंस और परमहंस एक विशिष्ट अवस्था का नाम है ।

हंस - एक दिव्य महापुरूष के सानिध्य में उनके द्वारा बताए साधन भक्ति द्वारा एक जीव जब ज्ञान , वैराग्य प्राप्त करके संसार से अनासक्त हो जाता है तो हंसा अवस्था प्राप्त कर लेता है ऐसे साधन सिद्ध जीव को हंस कहतें हैं - जैसे स्वामी विवेकानंद , योगदानंद , युक्तेस्वरानंद आदि । ये जीव साधन सिद्ध होतें हैं। ये भगवान‌ श्रीकृष्ण के जीवशक्ति के अंश होतें हैं । और ये जीव ध्यान , समाधी द्वारा भगवद् दर्शन करते हैं ।

परमहंस - बहुत उच्च कोटी के समाधी के अवस्था का नाम है । जो जीव नित्य सिद्ध होते है और संसार से सदा से अनासक्त होते हैं , हर समय समाधी की अवस्था में रहतें हैं, बहुत थोड़े समय के लिए समाधी से बाहर आते हैं दिव्य प्रयोजन मात्र के लिए , ए एक अवतार होतें हैं । 
ए भगवान के स्वरूपशक्ति के अंश होते हैं ।

पृथ्वी पर कुछ जीवों के उद्धार के लिए आतें हैं । एक विशेष दैविक प्रयोजन के लिए भगवान के आदेश से पृथ्वी पर अवतार ले कर आते‌ हैं , अपना भगवद् कार्य करतें हैं और फिर अपने दिव्य लोक चले जाते‌ है ऐसे महापुरूषों को परमहंस कहते हैं । जैसे रामकृष्ण परमहंस , शुकदेव परमहंस , बुद्ध , महावीर आदि परमहंस धरा धाम पर आएं हैं ।
श्री राधे ।:- गुरूदेव के द्वारा दिया ज्ञान से । :- संजीव 

गुरू और सद्गुरू में क्या अंतर है ? भगवदिय क्षेत्र में चलने वाले जीव को शुरूआत मे़ं कभी कभी कष्ट क्यों आता है ?

आठवां और सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न - गुरू और सद्गुरू में क्या अंतर है ? भगवदिय क्षेत्र में चलने वाले जीव को शुरूआत मे़ं कभी कभी कष्ट क्यों आता है ? 

उत्तर - जो जीव को संसार देता है वो गुरू है, और जो संसार छिन कर ( यानी संसार से आसक्ति खत्म कर ) भगवद् प्रेम देता है , हरि उन्मुख कराता है । माया से मुक्त करवाता है वो सदगुरू हैं ।

 डिटेल्स :- गुरू वो कहलाते हैं जो भौतिक शिक्षा अपने शिष्यों को देकर संसारिक पदार्थ प्राप्त करने में सहायता करतें हैं । तो माया में आसक्त जीव माया की प्राप्ती के लिए गुरू से ज्ञान हासिल करते हैं । आजकल के विद्धान शिक्षक हीं गुरू हैं । यह माया संबंधित , माया की प्राप्ती करने के लिए माईक शिक्षा देतें हैं ।
 जैसे डाक्टर , इंजिनियर , मजिस्ट्रेट , व्यापारी बनने की शिक्षा देने वाले गुरू कहलाते हैं , यह कर्मबंधन की शिक्षा प्रदान करातें हैं । ए गुरू स्वयं माया में आसक्त होते हैं ।

किन्त सद्गुरू वो होते हैं जो स्वयं भगवद् प्राप्त होते हैं माया से परे होते हैं , माया से सदा से अनासक्त होतें हैं । भगवान के प्रेम को प्राप्त किए होते हैं । भगवान का साक्षात दर्शन किए होते हैं । समस्त माईक विकारों जैसे काम , क्रोध , मत ,मातषर्य , ईर्ष्या ,द्वेष , लोभ आदि से मुक्त होतें हैं । भगवदिए ज्ञान का भंडार होतें हैं , भगवान और उनके प्रेम में विभोर होतें हैं । अपने भगवदिए स्वरूप शक्ति में लीन होते हुए , शरणागत जीव को अपनी कृपा से माया से अनासक्त कराकर , संसार से अनासक्त कराकर श्री हरि ओर उन्मुख करातें हैं ।

 बहिर्मुख जीव यानी संसार में आसक्त जीव को भगवान और उनके अनंत प्रेम प्राप्त करने का साधन बताकर साधना करवातें हैं , बहिर्मुख जीव यानी भगवान के तरफ पीठ किए जीव जो संसार की ओर उन्मुख है को भगवान की ओर उन्मुख कराते हैं । 

संसार में आसक्त किसी जीव पर जब श्री हरि की कृपा होती है तो जीव को सद्गुरू मिलतें हैं । और जीव जैसे जैसे अपने सद्गुरू पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास करने लगता है तैसे तैसे सर्व समर्थ सदगुरू जो साक्षात भगवद् प्राप्त है, यानी खुद भगवान का स्वरूपशक्ति हैं जीव पर करूणा लुटाते़ हैं , जीव की रक्षा करतें हैं , अपने शरणागत जीव का योगक्षेम बहन करतें हैं और संसार से आसक्ति समाप्त करवाकर जीव को श्रीहरि से मिलवा देते हैं ।
जीव जब माया से विमुख होकर सद्गुरू की कृपा बल से श्री हरि की ओर उन्मुख होता है वैसे हीं प्रारंभीक अवस्था में माया ( काम , क्रोध , लोभ , मोह आदि माईक राक्षस ) जीव पर हावी होने लगती है । माया का यही अटैक भगवद् प्राप्ती के रास्ते में होने वाला कष्ठ कहलाता है । 

माया यह सोचती है कि यह हमें छोड़ कर भगवान की तरफ जा रहा हैं इसलिए माया अपने माईक गुणों के स्वभावगत जीव की परीक्षा लेनी शुरू कर देती है ।

लेकिन जो जीव सद्गुरू के कृपा बल से इस परीक्षा में पास करते जाता है वो एक दिन माया से परे होकर श्री हरि उन्मुख हो जाता है और परमानंद की प्राप्ती कर आनंदमय हो जाता है ।
अत: भगवद् क्षेत्र में उन्मुख जीव जो सद्गुरू को प्राप्त कर लिया है को आने वाले माईक कष्ट से घबराना नहीं चाहिए । इस समय हरि गुरू पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखकर अपने गुरू का शरणवरण करना चाहिए ।
सदगुरू सब संभाल लेते हैं और जीव माया से उतीर्ण हो जाता है । क्योंकि ऐसे शरणागत जीव का योगक्षेम स्वयं भगवद् अनंत , सर्वभगवदिए गुणों से परिपूर्ण और विभुषित सर्व समर्थ सद्गुरूदेव वहन करतें हैं ।
हमारे कृपालु महाप्रभु ऐसे हीं समस्त भगवदिए शक्तियों से युक्त सद्गुरू हैं ।

अत: जो संसार देता है वो गुरू है और जो संसार छिन कर ( यानी संसार से आसक्ति खत्म कर ) भगवद् प्रेम देता है वो सदगुरू है श्री राधे ।

प्रश्न: जब हम अपने दोस्त,रिश्तेदार आदि को भगवद विषय समझाने का प्रयत्न करते हैं तब समझने के बजाय कभी-कभी वे और अकड़ जाते हैं। इससे हमे बहुत दुख होता है। ऐसे में हम क्या करें?

श्री महाराजजी से साधक का प्रश्न: जब हम अपने दोस्त,रिश्तेदार आदि को भगवद विषय समझाने का प्रयत्न करते हैं तब समझने के बजाय कभी-कभी वे और अकड़ जाते हैं। इससे हमे बहुत दुख होता है। ऐसे में हम क्या करें?

श्री महाराजजी द्वारा उत्तर: 
अश्रद्धालु एवं अनाधिकारी से अपने मार्ग अथवा साधना आदि के विषय में वाद-विवाद करना भी कुसंग है,क्योंकि जब अनाधिकारी को सर्वसमर्थ महापुरुष भी आसानी के साथ बोध नहीं करा पाता,तब साधक भला किस खेत की मूली है।

 यदि कोई परहित की भावना से भी समझाना चाहता है,तब भी उसे ऐसे नहीं करना चाहिए,क्योंकि अश्रद्धालु होने के कारण उसका विपरीत ही परिणाम होगा। साथ ही अश्रद्धालु के न मानने पर साधक का चित्त अशांत हो जाता है। 

शास्त्रानुसार भी भक्तिमार्ग को लेकर वाद-विवाद करना घोर पाप है। अतएव न तो वादविवाद सुनना चाहिए,न तो स्वयं करना चाहिए। 

यदि अनाधिकारी जीव इन विषयों को नहीं समझता ,तो इसमें आश्चर्य या दुख भी नहीं होना चाहिए,क्योंकि कभी तुम भी तो नहीं समझते थे। यह तो परम सौभाग्य महापुरुष एवं भगवान की कृपा से प्राप्त होता है कि जीव भगवदविषय को समझकर उसकी और उन्मुख हो। 

अनाधिकारी को भगवदविषयक कोई अंतरंग रहस्य भी न बताना चाहिए,क्योंकि वर्तमान अवस्था में अनुभवहीन होने के कारण अनाधिकारी उन अचिंत्य विषयों को नहीं समझ सकता। उलटे अपराध कमाकर अपनी रही सही अस्मिता को भी खो बैठेगा। साथ ही अंतरंग रहस्य बताने वाले साधक को भी अशांत करेगा।

सतयुग , त्रेता , द्वापर , कलयुग में क्या क्या परिवर्तन हुआ ? पढीए

सतयुग - सतयुग में लोग सतोगुणी थे, सच्चाई पर, सत्य के राह पर चलने वाले लोग थे, देवता थे, तपस्वी थे, ऋषी मुनी थे, राक्षस नहीं था। हर तरफ शांती था, लोग दैवी गुणो से युक्त थे, देव दर्शन, भगवान का दर्शन सुलभ था। मनुष्य की ऊँचाई 21 हाथ, यानी 28 fit का था, लोगों की आयु लाखों बर्ष की थी। मानव शरीर से सुगन्ध निकलता था। चारो तरफ प्रकृति में सुगन्ध युक्त फुल खिलते थे। चारो तरफ सुगन्ध युक्त हवाएं बहती थी। धर्म, अर्थ, काम, ज्ञान, वैराग्य, सुलभ था। लोग परमार्थी थे। घरो में जंजीरे नहीं लगती थी। गाय दुध बहुत देती थी।

त्रेता - फिर त्रेता आया लोग सतोगुणी और रजोगुणी हूए, मनुष्य की ऊँचाई छिन हूई, लोग 14 हाथ, यानी 18 fit के आस पास थे, कुछ लोगों के चरित्र का थोड़ा सा पतन हुआ, केवल सतोगुणी लोगों के शरीर से सुगन्ध निकलता था। लोगों का उम्र लाखों बर्ष से घट कर हजोरो बर्ष की हो गई, ज्यादा तर लोग साधुवृति के थे, योगी थे, जपी- तपी थे, तपस्वी थे, तप के वल पर दैवी शक्ति हासील करना आसान था, देवता देव लोक मे रहने लगे, इसी युग में अलग राज्य में बड़े बड़े राक्षसों का जन्म हुआ जैसे हिरणकश्प, हिरण्याक्ष आदि, श्री लंका जैसे अलग प्रदेश में राक्षस कुल का प्रादुर्भाव हुआ, रावन, कुम्भकरन, मेघनाथ, जैसा प्राक्रमी राक्षसों का जन्म हुआ। राक्षस जप और तप के वल पर भगवान से शक्ति, आशिर्वाद व वरदान प्राप्त कर मानवता का दुश्मन हो गय, देव, गंधर्व, किन्नर, बडे बड़े ऋषी मुनियों को सताने लगे। फिर भगवान को राम रुप में आना परा और राक्षसों का बिनाश करके फिर से राम राज्य की स्थापना करनी परी, यानी मानवता की स्थापना करनी परी। घरों में जंजीरे नहीं थी, चोरियां नहीं थी। गाय की दुध थोड़ी कम हो गई। रोग शोक नहीं था।

द्वापर - फिर आया द्वापर, द्वापर में लोगों की ऊँचाई 11 हाथ यानी 14 से 15 fit का रह गया, मानव उम्र 100 से 150 वर्ष के आस पास रह गया, लोगों का नैतिक पतन होने लगा, चरित्र गिरने लगा, लोग रजोगुणी तथा तमोगुणी होने लगें, स्वार्थी होने लगे सतोगुणी की संख्या तेजी से घटने लगी, लोग रोग, शोक, कफ, पीत आदि और आपसी संघर्ष का शिकार होने लगे। किड़े मकोड़े जन्म लेने लगे पर संख्या कम थी। शरीर से सुगन्ध निकलना बन्द हो गया। अब इस युग में राक्षस कहीं अलग प्रदेश में न पैदा होकर मानव समुदाय समाज के बीच जन्म लेने लगें, राज करने लगें, क्योंकि मानवता समाप्त होने लगी, सतोगुणी की संख्या घटने लगी, राक्षसी प्रवृती और राक्षसों का साम्राज्य बढ़ने लगा। जैसे कंस, जरासंघ, पुतना, अघासुर, वकासुर आदि, इसके साथ साथ ही मानवता समाप्त होने लगी, राजा, शिक्षक, स्वार्थी होने लगें, धर्म और कर्म घटने लगा। घरों में जंजीरे लगने लगी। अनाचार बढने लगा, फिर इसी काल में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण आय और अधर्म और अधर्मी का विनाश करके धर्म को पुणर्स्थापित किए।
कलयुग - ( चार साल पहले के पोस्ट से)(आजकल कलयुग में नय नय वायरसों ने जन्म लेना शुरू कर दिया ) 
फिर आया कलयुग, जैसा की हम आप देख रहें है, लोगों की ऊँचाई मात्र साड़े तीन हाथ यानी 5 फीट रह गया। औसत उम्र आजकल 60 से 70 बर्ष। 90 ℅ लोग तमोगुणी है। शरीर से दुर्गन्ध ही निकलता है। 

फुलों की खुशबु भी कमतर हो गई। अन्न का उत्पादन एक कट्टे में एक चौथाई रह गया। 
गाय का दुध कम तर तथा कम पौस्टिक हो गई, किड़े मकोड़े की संख्या तीव्र गति से बढ़ती जा रही हैं, ।

नय नय बिमारियां महामारी लोगों को, जीवो को काल के गाल में भेज रही हैं। चारो तरफ झुठ है। घरो में ताले का भी वैल्यू नहीं हैं। अशांती हैं। 

नैतिकता, सच्चाई, ईमानदारी, मानवता, नेकी, पुण्य, धर्म, कर्म, चरित्र केवल किताबों में मिलते हैं। आज राक्षस बाहर कही नहीं हैं। आज राक्षसों को भी शर्म महसुस होती है अलग राज्य में जन्म लेने में। इसलिय ये सभी राक्षस हमारे आपके मन को, ह्रदय को, चेतना को ही अपना घर बना चुके हैं, उनके लिय आसान हो गया हमारे मन, मस्तिष्क पर कब्जा करने में, आज आप जानते है वे राक्षस कौन कौन हैं ?

 हाँ तो जानते हैं आप सब, वे हैं, काम, क्रोध, मद्, मोह, लोभ, घृणा, द्वेश, ईर्श्या, अहंकार, कुबूद्धि, दुर्बुधि आदि, जो हमारे अंदर ही बैठ कर, डेरा जमाकर हमारा लगातार पतन कर रहें हैं। 
चुँकि आज कलयुग में चारो तरफ अधर्म का बोलबाला हैं, झुठ का साम्राज्य हैं, चोरों का राज्य हैं। चोर जोर जोर से चिल्ला कर सच्चाई को दवा रहा हैं, धर्म के आर में ढोंगीयों का बाढ़ आ गया हैं इसलिय कलयुग में न धर्म है, न कर्म, न कर्मकांड, न जप, न तप और न वैराग्य। केवल भक्ति ही शेष और सक्षम है प्रभु को प्राप्त कर इस मृत्यु लोक को छोड़ कर उनके धाम को प्राप्त कर हमेशा के लिय राक्षसों से मुक्त होकर प्रभु चरणों में निवास करने के लिय। 

अब भगवान आते है केवल सद्गुरु रुप में, जैसे हमारे महाराज जी आय और अपने प्यारो को समझा बुझा कर, मार्ग दर्शन करके चले गये, अपने लोक में आने का मार्ग बता दिया। 

अब यह हमारे उपर है। भगवान ने दो कृपा कर दी - पहले हमें मानव तन दे दिया भक्ति के लिय, दुसरा खुद गुुरु रुप में आकर हमारा मार्ग दर्शन किया, शास्त्रो के, वेदों के सही अर्थो को समझाया। अब तीसरी कृपा हमें खुद को करना है अपने उपर, उनके बताए हुए मार्ग पर चलकर अपने ह्रदय को निर्मल बनाना होगा। 

यानि गुरु को, भगवान को अपने ह्रदय में धारण करके अपने मन के अन्दर ह्रदय के अन्दर बैठे काम, क्रोध आदि राक्षसों को भगाना होगा, गुरु का शरण ग्रहण करने मात्र से हमारे पापों का राक्षसों का, राक्षषी प्रवृती का समन होगा, फिर ह्रदय शुद्ध होगा, निर्मल होगा, तब जाकर हमारे गुरु अपनी अंतिम कृपा करेंगें, वो है प्रेम दान, हमारे महाराज जी प्रेम दान देकर सदा के लिय भगवान का लोक देकर, उनकी सेवा दे कर मालोमाल कर देंगें। अब अपना कल्याण खुद को करना हैं नहीं तो फिर मानव तन कब मिलेगा पता नहीं। यह मानव तन छिन लिया जाएगा, रोग, शोक, और असामायिक मृत्यु के द्वारा। जैसे जैसे कलयुग बीतेगा। पृथ्वी पर मानव मानव को मार कर खाऐगें। सूर्य का ताप, ठंडी गरमी, बाढ़, माहामारी तथा भयावह रोगों की संख्या बढती जाएगी। इसलिय समय रहते हमे अपना कल्याण करना होगा। राधे राधे श्री राधे । 
पुराणों से निर्गत :- संजीव कुमार 


Tuesday, 23 March 2021

आत्मा और मन दोनों एक हैं या अलग ?

सातवां प्रश्न :- आत्मा और मन दोनों एक हैं या अलग ?

उत्तर :- मन माया का बना है । मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार चार चिज मिलकर अंत:करण कहलाता हैं ।
 यह सूक्ष्म शरीर का भाग है । सूक्ष्म शरीर भी माया का बना है , और नश्वर है ।
जबकि आत्मा नित्य है , चेतन है और दिव्य है ।

मरने के बाद पंच महाभुत का यह स्थूल शरीर अपने पंचतन्मात्रा में मिल जाता हैं । लेकिन सुक्ष्म शरीर पंचभुत शरीर से निकल कर दूसरी यात्रा पर चली जाती हैं ।
सूक्ष्म शरीर में कारण शरीर व आत्मा रहती हैं ।
मनुष्य जब भगवान को प्राप्त कर लेता है तब सूक्ष्म शरीर से आत्मा निकल कर दिव्य लोक में चली जाती है ।

या मौक्ष प्राप्त करने वाले की आत्मा ब्रह्म में लीन हो जाती है ।
इसी को मौक्ष कहते हैं । 
जब तक मौक्ष नहीं मिलती या भगवान की प्राप्ती नहीं होती तब तक आत्मा सूक्ष्म शरीर के साथ एक शरीर से दुसरे शरीर की यात्रा करता रहता है ।
इसी को कहतें हैं पुनर्पि जननम , पुनर्पि मरनम । इसी को कहतें हैं आवागमन ।

इसलिए मरने के बाद सूक्षम शरीर मन , बुद्धि , चित् , अहंकार , और पांच कर्म इंद्रियां , पांच ज्ञान इंद्रियां और पंच प्राण के साथ दुसरा शरीर धारण करता है । यह शरीर अपने कर्म के अनुसार चौरासीलाख योनि में कोई भी शरीर प्राप्त करता है और उसी शरीर के अनुसार वृति बदल जाती है , पीछले सारी बातों को भूल जाता हैं ।
यूं समझिए , कि यह शरीर हार्डवेयर हैं तो सूक्ष्म शरीर सौफ्टवेयर है । और आत्मा पावर हाउस भगवान का एक अंश का पावर हैं इनर्जी है , करेंट है । अगर हम १००००० वोल्ट को भगवान मान लें थोड़ी देर के लिए तो उसी करेंट का एक हिस्सा यानी २२० वोल्ट आत्मा है । श्री राधे ।

Saturday, 20 March 2021

अध्यात्मिक गुरु हमारे अध्यात्मिक चेतना के स्तर, चरित्र को, सोंच को इतना ऊचा उठा देता है कि-

अध्यात्मिक गुरु हमारे अध्यात्मिक चेतना के स्तर, चरित्र  को, सोंच  को इतना ऊचा उठा देता है कि व्यक्ति हर तरफ , हर वस्तु मे , हर व्यक्ति मे ईश्वर को महसुस करता है, उसके ह्रदय मे हर किसी के लिय दिव्य प्रेम और करुणा का भाव उतर जाता है. सारे दोष दुर हो जाते है. ईर्श्या द्वेश , घृणा,  क्रोध , लोभ , अपना , पराया , तेरा मेरा का भाव दोष समाप्त हो जाता है. दिव्य गुरु संसारिक वस्तु या संसारिक वस्तु के लिय आशिर्वाद नही देते , और न संसारिक वस्तु मांगना उचित है. 

संसारिक वस्तु जैसे - धन , मकान , दुकान , व्यापार नौकरी  आदि  को पाने कि योग्यता दिलाने , दक्षता , निपुनता दिलाने का काम तो संसारिक शिक्षक का है.  उसमे भी एकेडमिक शिक्षा हासिल करने को लिय समय सीमा की आवश्यक्ता है, वर्णा स्कुल कौलेज मे एडमिशन नही होता. संसारिक शिक्षको का काम भी  केवल हमको दक्ष बनाना , स्किल तैयार करना ही है . ये शिक्षक भी किसी को व्यापार नही करा सकता, नौकरी नही दिलवा सकता है वे तो केवल ज्ञान दे सकता है. दक्ष बना सकता है. अर्थ के लिय प्रयास, मेहनत, श्रम खुद को करना परता है. 
इसलिय संसारी शिक्षक केवल योग्यता प्रदान करता है वो भी जो जीतना ध्यान देकर पढ़ेगा वह उतना दक्ष होगा, निपुन होगा.
किन्तु कोई भी संसारिक शिक्षक  या ज्ञानी , कमाय हुय धन से सुख प्राप्त होगा कि नही , इसका लेस मात्र भी उपाय नही बताता या गारंटी नही देता,

 इसलिय आज कितनो के पास इतना धन है कि उसको पता ही नही है. प्रन्तु उसके पास सुख, आनन्द विल्कुल नही है,  वो तो दुसरे के सामने सुखी दिखने का नाटक करता है दिखावा करता है ताकी लोग उसका सम्मान करे , उसके हुजुरी मे खड़ा रहे. उसके अहम का तुष्टि हो.

इसलिय वास्तविक सुख का उपाय केवल सर्व समर्थ दिव्य अध्यात्मिक गुरु के पास  हीं है. 

जब किसी व्यक्ति को हरि कृपा से दिव्य गुरु मिलता है और व्यक्ति पुरी निष्ठा से उनके वताए मार्ग पर चलता है तो उसको फकिरी मे भी परम आनन्द का अनुभव होता है जैसा बहुतो को हुआ है (जैसे विवेकानंद आदि . इतिहास भरे परे है ऐसे महान लोगों के कहानियों से,)

क्योकि अध्यात्मिक गुरु दिव्य ज्ञान, दिव्य शक्ति प्रदान कर देते है , किन्तु इसके लिय अपने गुरु पर पुरा विश्वास, पुर्ण समर्पण , पुरी निष्ठा और अक्षरस उनके आदेशो का पालन करना नितातं आवश्यक है वर्णा जितनी मात्रा मे वो पालन करेगा उतनी ही मात्रा मे उसको उतना ही अनुभव होगा. 

मैने अपने एम वी ए [ SIBM] के एक फैकेल्टी से पढ़ा था कि  - " सेना मे जब किसी का सैलेक्सन होता है तब उसका ट्रेनिगं होता है और ट्रेनिंग के दौरान उसके पुराने आदतो को, सोंच को पहले तोड़ा जाता है , जिसमे उस व्यक्ति को शुरु शुरु मे अति कष्ट होता है क्योकि वह अपने स्टुडेन्ट लाइफ मे आरामतलभी होता है बिना डिसीप्लिन के होता है , और उसका सोच  भी (९९% का) देश सेवा की नही होकर केवल पद प्रतिष्ठा , नौकरी और धन प्राप्त करने की होती है जिसको लेकर वह सेना मे भर्ती होता है , प्रन्तु वहां जाकर ऐसा ट्रेनिगं होता है कि उसके अंदर देश सेवा प्रार्थमिक हो जाता है या युँ कहु की देश सेवा ही केवल उद्धेश्य रह जाता है , वाँकी की लालसा वह भुल जाता है या छोड़ देता है या यु कहे की धन , पद, प्रतिष्ठा की चाह समाप्त हो जाती है या सेकेण्डरी हो जाता है और देश पर मर मिटने की इक्छा सर्बोपरि हो जाता है. इसिलिए तो सैनिक देश के लिय शहिद हो जाते हैं उनको पद, धन परिवार की चिन्ता समाप्त हो जाती है , यह सब तो उसको मिलता ही मिलता रहता है , यह देश का कानुन है कि मरने के बाद भी शहिदो को  सम्मान , अर्थ इज्जत , सोहरत , परम वीर चक्र सब मिले .

अत: सैनिको के इस ट्रेनिगं पद्धती का नाम है " unfreezing and refreezing, 

इस ट्रेनिगं मे युवा के पुराने गलत संस्कारो को तोड़ा जाता है unfreez किया जाता है जिसमे बहुत तकलिफ होता है पर ट्रेनिगं देने बाले को दया नही करके ट्रेनिगं देना परता है नही तो पुराने संस्कार  ,आदते नही टुटेगें और जबतक पुराने संस्कार , आदत सोंच नही टुटेगे तबतक नए नही समाहीत होगें ,अत: नए संसकार को समाहीत करने के प्रोसेस को refreezing कहते है . इस ट्रेनिगं मे बहुत कष्ट होता है , कइयक तो ट्रेनिगं छोड़ कर भाग जाता है फिर से और अवारा वन कर धुमता है समाज मे.

उसी प्रकार दिव्य गुरु अपने शिष्य के पुराने , गलत ज्ञान , गलत आदत , गलत संस्कार को तोड़ता है , जिसमे व्यक्ति को  कष्ट का अनुभव होता है क्योकि वह संसार मे इतना आसक्त होता है कि वह इसी को अपना सर्वस्व मानता है. जबकी वह न तो सच्चा हितैषी खुद का होता है न देश का न समाज का न बाल बच्चे का और न परिवार का , उसे तो केवल सच्चा हितैषी होने का भ्रम मात्र होता रहता है. जो सबसे बड़ा दोष है भ्रम है. 
अत: हमे अगर अध्यात्मिक मार्ग मे कष्ट मिले तो समझ लो कि हमारा unfreezing हो रहा है और तुम्हारा गुरु दिव्य ज्ञान रुपी हथौड़ी से तुम्हारे गलत संस्कारो को तोड़ रहे है और अब refreezing होने ही वाला है जिससे हमे, उस सैनिक की तरह  ( जो देश प्रेमी हो गया ट्रेनिगं के बाद) हरिप्रेम मिलने वाला है और जिसको हरिप्रेम मिल गया तो दोनो दुनिया की सारी खुशी  भी उसको मिल जाएगी , देश के कानुन की तरह और उससे बड़ा हरि का कानुन है , जिसका निर्माता हरि और दातार गुरु है . 

यही तो हुआ था भक्त ध्रुव के साथ , वह वालक गया तो था तपस्या करने पिता से भी बड़े राज्य पाने के लिय किन्तु जब उसका unfreezing and refreezing हुआ तो वह संसार न मांग कर हरि से हरि को मांग बैठा और हरि को पा गया , साथ मे हरि आदेश को प्राप्त कर १००००० बर्ष शासन किया और  विन चाहे विन मांगे वो मिल गया (हरि प्रेम) जो सोचा भी नही था  , क्योकि यह हरि गुरु का कानुन है इश्वर का कानुन है कि उसको जो गुरु का प्रेम पा लेता है वह सब कुछ पा जाता है मांगने की लालसा नही रहती .
अत: इसलिय 'कृपालु ' महाप्रभु कहते है कुछ मत मांगों और न मांगने की सोचो . न किसी चीज की कामना करो . अपने को समर्पित कर दिजिए गुरु को,  गुरु फिर सब कर देगा जो हमारे लिय कल्यानकारी होगा. - गुरु कृपा एवं उनकी ही प्रेरणा से  आपसे शेयर कर रह हुँ मेरी धृष्टता के लिय मुझे क्षमा करेगें - आपका संजीव

इस देश से बुराई कैसे समाप्त होगी ?

एक क्वीज प्रोग्राम में मुझसे पुछे गए प्रश्नो का मेरा उत्तर।

पहला प्रश्न - इस देश से बुराई कैसे समाप्त होगी ?

उत्तर- हरेक व्यक्ति जिस दिन से यह रियलाइज कर लेगा , मान लेगा कि हम शरीर नहीं 'आत्मा' हैं और हमारे ह्रदय में ' मैं ' यानि आत्मा और परमात्मा यानि भगवान एक साथ सायुज्यसखा के रूप में निवास करतें हैं एवं हमारे मन में उठे प्रत्येक छण के प्रत्येक संकल्पों को प्रतिक्षण नोट करतें हैं तथा ( सोंचें गलत और पाप हो गया ) उसी का फल प्रदान करतें हैं उस दिन से हम गलत सोचना छोड़ देंगें , किसी का भी बुरा करने कि तो छोड़ , सोचना भी बंद कर देंगें।

उसी दिन से देश में बुराई अपने अाप समाप्त हो जाएगी ।

हमारी आत्मा एक दिव्य ईनर्जी है यह ईनर्जी भगवान यानी पावर हाउस भगवान श्री कृष्ण के जीवशक्ति का अंश हैं ।

भगवान कर्म को नोट नहीं करतें ,‌वो कर्म से पहले मन में उठे संकल्पों को हीं नोट करतें हैं और उसी का फल प्रदान करतें हैं ।

नहीं तो लंगरा , लूला , अंधा कहता भगवान से कि मैं तो कर्म नहीं कर सकता क्यूंकि मेरे तो हाथ पैर नहीं हैं !

अरे हांथ पैर नहीं , मन तो है ना अब मन सोचता है भला बुरा और संकल्प करता हैं तभी ईंद्रियां कर्म करती हैं । अत: भगवान तो अंदर बैठे हैं, वो मन में उठे संकल्पों को हीं नोट करतें हैं और उसी के अनुसार फल देतें । 
ये जो हम लोग सोंचतें हैं कि प्राईभेसी हैं । हम जो सोंचतें हैं कोई जान नहीं सकता । 
यह गलत हैं ।

भगवान हमारे अंत:करण में बैठे हैं । ठीक वहीं पर जहां हमारी आत्मा हैं । और मन में किसी के बारे में कुछ भी बिचार आया ,‌नोट कर लिए । और इसी का फल हर मानव को मिलता हैं । कोई प्राईभेसी नहीं चलेगी ।

भगवान सर्वांतर्यामी , सर्वशक्तिमान, सर्वेश्वर , सर्वद्रष्टा , सर्वश्रष्ठा , सर्वसुह्रत , सर्वव्यापक , सर्वसंपन्न , सर्वसुंदर हैं । ऐसे सभी गुण हैं उनके ।
इस प्रकार यह रियलाइज करें की हम शरीर नहीं हैं ।

 ये हम कहतें हैं न कि मेरा शरीर दर्द कर रहा हैं । ' मेरा शरीर ' तो यह" मैं" जो हुं वो आत्मा है । और यह शरीर मुझे मिला है अच्छा संकल्प करके अच्छे कर्म करें । यह शरीर मिला है भगवान को , उनके प्रेम को पाने के लिए ।

अत: अपने आत्मा और भगवान श्रीकृष्ण पर पूर्ण निष्ठा , श्रध्दा , और विश्वास के साथ हम प्रति पल यह सोंचें कि वो भगवान हमारे ह्रदय में हैं । ये हम क्या कर रहें हैं , गंदी बात सोंच रहें हैं ,‌वो नोट कर लेंगें । तो हम कुछ दिन की प्रैक्टिस से सुधर जाऐंगे और इस प्रकार हमारा ट्रासंफौरमेशन हो जाएगा ।
और हम एक भला मनुष्य बन जाऐंगें।
श्री राधे ।

आधुनिकता के साथ साथ अपराध क्यों बढ़ रहा हैं ?

एक संगोष्ठी में मुझसे पुछे गए प्रश्नो का मेरा उत्तर। 
 प्रश्न - आधुनिकता के साथ अपराध क्यों बढ़ रहा हैं ?
उत्तर - आधुनिक समय में लोग, केवल भौतिक विकास का हीं पक्षधर होते जा रहें हैं । हम लोग खुद को आत्मा ना मानकर शरीर मानने लगें हैं । भगवान पर विश्वास धीरे धीरे समाप्त हो रहा हैं,  लोग उच्छृंखल हो रहें हैं इस लिए अपराध बढ़ रहा है ।
आध्यात्मिक विकास आधार है भौतिक विकास का , लेकिन लोग आध्यात्म से दुर हो रहें हैं धीरे धीरे  और भौतिक समृद्धि को ही सफलता का प्रतिक मानने लगे हैं । इसलिए किसी भी उपाय से धन कमाना है और भौतिक सामान इकट्ठा करना चाहते हैं । उनको लगता है कि सुख और आनंद भौतिक संसाधनों में हीं है । इसलिए अपराध करने में भी नहीं हिचकिचाते । 

उदाहरण - चाकु भौतिक विकास का परिचायक है तो उसका सही उपयोग  अध्यात्मिक विकास का प्रतिफल है ।
अब एक आध्यात्मिक व्यक्ति जो आत्मा और परमात्मा में विश्वास करता है वो चाकु से सब्जी काटेगा । निर्माणकारी काम करेगा । वहीं अध्यात्म से दूर व्यक्ति चाकु का इस्तेमाल कत्ल , लुट , मार , डकैती के लिए करता हैं ।

अत:  आध्यात्म से दूर व्यक्ति अपराध के तरफ बढ़ता हैं और अपने भौतिक समृद्धि का दुरुपयोग करके अपराध करता रहता है  ।

कुछ लोग,  अध्यात्म के आर में भी गलत काम कर रहें हैं , हकिकत यह है कि वो अध्यात्मिक हैं नहीं । वो अध्यात्म को स्वीकार करना तो दुर , अध्यात्म क्या है यह जानतें तक नहीं ।  लोग पुजा पाठ , मंदीर मस्जिद ,चर्च गुरूद्वारा गंगा स्नान , तिरथ आदि करने वाले को आध्यात्मिक मानते हैं । 

संक्षिप्त और सरल परिभाषा है अध्यात्मिकता का :-
जो लोग खुद को आत्मा मानतें हैं , शरीर नहीं , और साथ साथ यह पक्का रियलाइज करतें हैं कि भगवान हमारे अंदर बैठे हैं हमारे साथ ,‌वही अध्यात्मिक हैं ।
वह अपराध कभी नहीं करेगा ।

लेकिन जो इस भौतिक शरीर को हीं "मैं " मानता हैं वो दरअसल केवल भौतिकबादि होता है   और वह अपराध हीं करेगा ।अपराध छोड़कर कुछ कर हीं नहीं सकता । 

 अपनी आत्मा और अपने  अंशी भगवान , जीव  एवं माया का  शासक परमात्मा पर पक्का विश्वास हीं अध्यात्मिक होना हैं । 

जिसमें करूणा , त्याग , दया , क्षमा , दान ( चाहे धन का है , ज्ञान का हो या श्रम का दान हो दुसरे के हित के लिए ) न्याय आदि दैविक गुण है वहीं आध्यात्मिक है । 

इसके उलट जिसके मन में ईष्या , द्वेष , घृणा , पक्षपात , छल,  कपट ,  काम,  क्रोध आदि माइक दुर्गुणें है तथा जिसको वास्तविक संतो , महापुरूषों पर भी आस्था और विश्वास नहीं है ऐसा जीव कभी आध्यात्मिक हो ही नहीं सकता । चाहे बड़ा से बड़ा यज्ञ या धर्म कर्म करलें । 

श्री राधे ।
:-संजीव कुमार ।

हम संसार में क्यों भेजे गए हैं ? मानव जीवन का असली उद्देश्य क्या है ?

एक क्विज प्रोग्राम में मुझसे पुछे गय प्रश्न का मेरा उत्तर 

तीसरा प्रश्न :- हम संसार में क्यों भेजे गए हैं ? मानव जीवन का असली उद्देश्य क्या है ?

उत्तर - मानव जीवन का असली उद्देश्य आनंद की प्राप्ति हैं । यह आनंद भगवान को , उनके प्रेम को प्राप्त किए बिना हांसील नहीं हो सकता ।
हम दुनियां में कर्म करने के लिए भेजे गए हैं। मनुष्य मात्र एक कर्म योनि है और साथ साथ भोग योनि भी हैं। लेकिन मनुष्य कर्मप्रधान योनि हैं। हमारा कर्म शरीर को स्वस्थ रखते हुए ईश्वर, यानि भगवद् प्रेम प्राप्ति के लिए होना चाहिए। 
शरीर का सुख वास्तविक सुख नहीं है। हम शरीर नहीं हैं। हम आत्मा है। यह शरीर मनुष्य को मिला है परमात्मा के प्रेम को प्राप्त करने के लिए। 
यह शरीर नश्वर है, एक कपड़े की तरह है। जो बदलता रहता है। शरीर के माता पिता एक शरीर हीं है जो बदलते रहतें हैं हर जनम। पर हमारे वास्तविक माता पिता भगवान श्री कृष्ण हैं। 
केवल और केवल वही हमारे साश्वत और सनातन माता पिता, भ्राता, सखा, आदि सबकुछ हैं।
 हम भुल जातें हैं कि हम आत्मा हैं, हम शरीर को हीं 'मैं' मान लेतें हैं जो एक बड़ा धोखा है। 
इस संसार में हमें शरीर मिला है इसका सदुपयोग करके भगवान को पाना, सगुन साकार श्री कृष्ण से साक्षात मिलन हीं हर जीव का अंतिम और आखरी लक्ष्य है। 

पर हम खुद को एक शरीर मान कर तमाम मानव जीवन गमा देतें हैं भोग और विलाश में, जो गलत हैं। 
शरीर एक साधन है भगवान श्रीकृष्ण को पाने के लिए, लेकिन हम भौतिक सुख को हीं सुख मान कर जीतें हैं और दु:ख पाते हैं। 
प्रत्येक जीव आनंद हीं चाहता है लेकिन हम आनंद संसार की बस्तुओं में, भौतिक बस्तुओं की प्राप्ति और उपभोग में ढुंढतें रहते हैं और अंत में दु:ख हीं पातें हैं। 
इसलिए आज तमाम लोग जो शिखर पर हैं वो भी अंतत्वोगत्वा दु:खी हैं। 
क्योंकि वास्तविक सुख क्या है यह जाना हीं नहीं हैं। 
वास्तविक सुख आत्मा का सुख है। आत्मा का सुख परमात्मा की प्राप्ति में हैं। 
वास्तविक सुख वह होता है जो प्रति क्षण बढ़ता जाए कभी समाप्त ना हो, नित नित बढ़ता जाए सुख अनंत काल तक, अनंत मात्रा का सुख वही सुख वास्तविक सुख हैं। 
यह सुख संसार में नहीं हैं। यह आध्यात्मिक सुख हीं वास्तविक सुख है। 
संसार का सुख प्रतिक्षण घटमान हैं, समाप्त होने वाला फिर अंत में दुख देने वाला हैं। 

उदाहरण- एक व्यक्ति को रसगुल्ला बहुत पसंद हैं, कई दिनों से वह रसगुल्ला नहीं खाया, अब उसको रसगुल्ला खिलाइए। 
पहले रसगुल्ले में उसे बहुत सुख मिलेगा, दुसरे में उससे कम, अब एक समय ऐसा आएगा की उसे रसगुल्ला जबरदस्ती खिलाऐंगें तो वो मारने दौड़ेगा। 
कहां गया सुख? इस लिए संसार के किसी बस्तु में सुख नहीं हैं और ना हीं दु:ख है। 
संसारी सुख और दु:ख हमारे अज्ञानी दिमाग और मन का भाव है, भ्रम है , धोखा है ।
किंन्तु आत्मा का सुख वास्तविक सुख है। 
और वह है ईश्वर की प्राप्ति। यह सुख हीं मानव जीवन का लक्ष्य या उद्देश्य हैं। 
संसार से प्रेम करोगे दु:ख पाओगे हीं। अत: श्री हरि, श्री कृष्ण से प्रेम करोगे तो अनंत मात्रा का सुख पाओगे। 
जैसे इसी कलयुग में तमाम महापुरूषों ने पाया है। सगुण साकार भगवान को देखा है, छुआ है, उनसे बातें की हैं। उनका आलिंगन किया है और आज भी हमारे भारत में ऐसे वास्तविक संत और महापुरूष हैं जो उनको देखतें हैं सुनतें हैं। 
इसी कलयुग में तुलसी, सूर, मीरा, नरहरि, कबीर, रै दास, रवि दास, कालीदास, विवेकानंद, तुकाराम, नरसी मेहता, विद्यापति आदि भक्त हुए हैं जिन्होने सगुन साकार भगवान को अपनी आंखों से देखा हैं अंगुली से छुआ हैं उनका दर्शन किया और अनंत मात्रा का वास्तविक सुख को पाया है। और हमारे देश में अभी तक पांच मूल जगद्गुरू हुए हैं वो तो स्वयं और कोई नहीं , श्री हरि हीं हैं , जैसे हमारे गुरूदेव , ' श्री महाप्रभु कृपालु " जो पंचम मूल जगद्गुरू उत्तमई हैं स्वयं श्रीराधाकृष्ण के युगल अवतार हैं । 
भगवान सत् चित् आनंद , सच्चिदानंद हैं। यहीं सत्चित्आनंद की प्राप्ति वास्तविक सुख है। लेकिन हम मनुष्य अपने शरीर को मैं मान कर व्यर्थ मानव शरीर गमा देतें हैं और दु:ख के भागी बनतें हैं। 
श्री राधे।:- संजीव कुमार ।

मनुष्य के जीवन में सुख-दु:ख , अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियां क्यों आतें हैं । हमें ऐसे समय को कैसे झेलना चाहिए ?

क्वीज का चौथा प्रश्न - मनुष्य के जीवन में सुख-दु:ख , अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियां क्यों आतें हैं । हमें ऐसे समय को कैसे झेलना चाहिए ?

उत्तर - मनुष्य एक भोग योनि के साथ साथ कर्मप्रधान योनि हैं । 
ईश्वर ने कृपा करके हमें मानव शरीर दिया है और इस शरीर द्वारा हमें कर्म करने कि स्वतंत्रता प्रदान की है । हम पुरूषार्थ करके अपने खड़ाब प्रारब्ध के तीव्रता को कम कर सकतें हैं और अपने नए प्रारब्ध का निर्माण भी करतें रहतें हैं ।

हमारे अनंत जीवन के संचित कर्मों के फलों का एक हिस्सा हमारा प्रारब्ध कहलाता है । साथ साथ क्रियामान कर्म भी हमारे साथ हैं । 
अत: हमारे खड़ाब तथा अच्छे प्रारब्ध एवं इस जन्म का क्रियामान कर्म का मिक्सचर हीं हमें हमारे इस जीवन के भौतिक सुख के साथ साथ आध्यात्मिक सुख को भी प्रभावित करता है ।
भौतिक सुख ,‌लौकिक जगत का सुख और दुख हमारे अपने कर्मों का हीं फल है ।
आध्यात्मिक सुख लाभ के लिए स्वस्थ मानव शरीर परमावश्यक है। नहीं तो हम भक्ति ठीक से नहीं कर पाएंगें ।
जब हमारा खड़ाब प्रारब्ध आता है तो जीवन काफी संघर्ष मय हो जाता है ।

अत: संसारिक सुख या अनुकूल परिस्थिति जब भी हो तो हमें उच्छृंखल नहीं होना चाहिए , संयमित रहना चाहिए, इस अनुकूल समय में , सुख के समय हमें संयमित होकर हरिगुरू का ध्यान , मनन , स्मरण जरूर करना चाहिए ।
हरि गुरू हीं हमारे है और उनका सुख हीं हमारा सुख है यह हमेशा ध्यान होना चाहिए ।

और जब भी विपरित परिस्थितियां आए तो हमें धैर्य से काम लेना चाहिए , विचलित नहीं होना चाहिए । ऐसे समय में भी हरिगुरू को अपना संरक्षक मानकर हमें हर हाल में हरि गुरू पर अटूट श्रध्दा और विश्वास करके अपने खड़ाब प्रारब्ध को , प्रतिकूल समय को धैर्य के साथ काटना चाहिए ।
अत: लौकिक सुख दु:ख , में अनुकूल या प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में हमें संयमित और धैर्यवान होकर हरिगुरू में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखकर जीवन जीना चाहिए । अच्छा समय और बुरा समय हमारे अपने प्रारब्ध और क्रियामान कर्म का फल हैं । और दोनों समय स्थाई नहीं हैं । 
अत: खड़ाब प्रारब्ध जब भी आय तो बिना विचलित हुए हमें अपने क्रियामान कर्म को अच्छा रखना चाहिए ।
जिससे यह समय भी निकल जाऐगा ।
और अच्छा समय आय तो दैविय गुणों को , अध्यात्मिक मूल्यों को नहीं भूलना चाहिए । संयमित होकर हरिगुरू का ध्यान करते हुए हर हाल में अच्छे सोंच के साथ अच्छे कर्म करना चाहिए । अहंकार विल्कूल नहीं करना चाहिए । जिससे प्रतिकूल समय की तीव्रता विल्कूल कम हो जाती है या टल भी जाती है, ए पक्का है ।

"दु:ख में सुमिरन सब करे ,। सुख में करे न कोई ।
ज्यो सुख में सुमिरन करे , तो दु:ख काहे को होई ।।"

किसी से झूठ बोलना , गलत काम करना , किसी से ईश्या , द्वेश करना , किसी को तकलिफें देना , बुरा सोचना, गलत कर्म हीं खड़ाब प्रारब्ध के साथ मिलकर जीवन में कठीन और प्रतिकूल परिस्थितियों का निर्माण करती है । 
अत: हमें गलत कर्म नहीं करना चाहिए , अच्छे कर्मों से खड़ाब प्रारब्ध की तीव्रता काफी कम हो जाती है ।
और सबसे अच्छा कर्म है हरिगुरू की शरणागति , उनकी सेवा , उनका चिंतन और मनन के साथ साथ हम अपना संसारिक कर्म करतें रहे़ं। गलत काम कभी ना करें ।

घबराय नहीं । अनुकूल और प्रतिकूल, दोनों परिस्थितियां हमारे व्यक्तित्व के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाते हैं ।
एक अच्छे व्यक्तित्व के निर्माण के लिए अच्छे कर्म आवश्यक हैं , हरिगुरू पर अटूट श्रद्धा और पूर्ण विश्वास आवस्यक है । :- संजीव कुमार ।

श्री राधे । 
श्री राधे ।

Wednesday, 17 March 2021

How to remove stress ?

How to remove stress ?
Give your best always and give up all worries for ever . Do your job with honesty. Do good deeds always fearlessly and leave every thing on God . Trust fully on God .
Be relaxed and stay connected with God always .
Always Remember it ' you have right to give your best but you don't have right on fruits as per your desire or as you wish or as you aspect or any body else . 
Don't get into the fear of situation and circumstances , be positive always .
Minimise your needs and be far from luxury, stay simple .

Always give up affection , hate , anger ego and envy . Don't believe in revenge. Adopt the habit to forget and forgive . 
For unethical and iligeal thing or deeds stricktly say to ' NO' . 
Our ultimate goal is to find the love of God . 
Worldly duty is only for this body and nature .:- Sanjeev Kumar 

Monday, 15 March 2021

क्या आप एक सफल इंसान बनना चाहते हैं? यदि हाँ, तो ये article आपके लिए है|

लक्ष्य- सफलता का सूत्र:-

क्या आप एक सफल इंसान बनना चाहते हैं? क्या आप चाहते हैं क़ि दुनिया में आपकी भी एक पहचान हो? यदि हाँ, तो ये article आपके लिए है| सबसे पहले आपसे एक सवाल क्या आपने कोई लक्ष्य बनाया है?

मित्रों, सफलता कोई एक रात का game नहीं है, उसके लिए पूरा जीवन न्योछावर करना पड़ता है|

आज से करीब 40 साल पहले, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में कुछ researchers ने स्टूडेंट्स पर एक छोटा सा रिसर्च किया|

उन्होनें सारे स्टूडेंट्स को एक जगह बुलाया और और उनसे उनके जीवन के लक्ष्य के बारे में पूछा| उन स्टूडेंट्स में एक से एक मेधावी छात्र थे ,कुछ तो काफ़ी विलक्ष्ण थे| लेकिन पूछने पर पता चला की केवल 3% छात्र ऐसे थे जिन्होने अपना एक लक्ष्य बनाया हुआ था|

करीब 20 साल बाद researchers ने फिर  से उसी group के स्टूडेंट्स को एक साथ बुलाया और उनसे उनके जीवन के बारे में पूछा|

जब research का रिज़ल्ट सामने आया तो पता चला की जो 3% लोग 20 साल पहले अपना लक्ष्य set कर चुके थे वो आज जीवन में बहुत आगे थे जबकि 97% बचे हुए लोग कहीं ना कहीं आज भी संघर्ष कर रहे थे|

मित्रों ये रिसर्च केवल एक research ना होकर जीवन का एक सत्य था, बिना लक्ष्य के दौड़ने वाले लोग जीवन भर संघर्ष करते रह जाते है लेकिन कुछ प्राप्त नहीं होता|
:- संजीव कुमार 

Sunday, 14 March 2021

समय व मुहुर्त की महत्ता ।

समय व मुहुर्त ।।
कोई कहता है हम कोई भी काम विना समय और मुहुरत के करते है । तो कोई समय और मुहुर्त कोई महत्ता देेेेते है । 

भोलेेे है ऐसे लोग, क्योकि आदमी जो पानी की धारा के साथ बहता हो उसको मुहुरत की जरुरत नही परती है ।

 पानी के धारा के खिलाफ जो रास्ता तय करता है वो हर काम समय और समय के तकाजा को देखकर करता है और सफल होता है ।बिना समय कोई भी फुल नही खिलते , तरुबर नही फलते , 
जानवर भी अपना काम , सभी काम समय पर ही करते है ।
प्रकृति हर काम के लिय समय निर्धारित किया है ।जिसको मुहुरत कहते है। पर लोगो ने इसका गलत अर्थ लगा लिया है।
 इसीलिए तो आजकल नैतिक पतन हो रहा है । मानवता कलंकित हो रही है विकृत वच्चे पैदा हो रहे है। 
लोगो के पास धन बढ़ता जा रहा है चैन गाएब , सुख दुर होता जा रहा है । पुस्तके बढ़ रही है पर लोगों मे नैतिकता का ह्रास होता जा रहा है। मानविय मुल्कों का ह्रास हो रहा है ।
भौतिक तरक्की हो रही है पर संस्कार पीछे छुट रहा है. 
परिवार टुट रहा है ।
 टी वी पर धाराबाहिको की संख्या बढ़ती जा रही है तो नानी दादी की नैतिक शिक्षा खोती जा रही है ।
दवा पर दवा का ईजात हो रहा है फिर भी रोग वेकाबु होकर कड़ोड़ो को काल का ग्रास बना रहा है ।
विज्ञान तरक्की कर रहा है ,लोग मंगल पर पंहुचने के लिय वेताव है पर इंसानियत खोती जा रही है. मानवता गर्त मे जा रहा है ।
कम्युनिकेशन के साधन बढते जा रहे है पर लोगो को एक घर मे ही महीनो बात करने की फुरसत नही है।
होसपिटलों कि संख्या बढ़ती जा रहा है फिर भी रोगियों की संख्या घटती नहीं  ।
फैसन बढ़ता जा रहा हैऔर तन से लिबास घटता जा रहा है , बुढ़ापा जल्दी पाव पसार रहा है। चरित्र गिड़ता जा रहा है, मर्यादायों की  सीमाएँ लांघी जा  रही है, पशुता हावी होती जा रही है ।
अपने अपनो से दुर होते जा रहे है।
साइंस तरक्की कर रहा है और हम हमी से दुर होते जा रहे है ।प्रकृति तांडव न करें तो क्या करें भला !
म्युजिक और म्युजिसियन बढता जा रहा है पर संगीत गायव हो रहा है ।
कहां गए वो दिल को छुने वाले नगमे और गजले?
किताबों का बोझ बढ़ता जा रहा है मासुमियत खोता जा रहा है , बजपन नदारद ।
मकान पर मकान , फ्लैट पर फ्लैट बन रहा है पर घर टुटता जा रहा है विखड़ता जा रहे है ।
रिस्ते बेड रुम तक हीं सिमित हो गए है ।
क्योकि हम दादी नानी की पहलु मे बैठना छोड़ कर पव मे बैठना शुरु कर दिय है , जिससे हम हमी से दुर हो रहे है । 
हम दुसरो से अच्छे व्यवहार की अपेक्षा कर रहे है परंतु हम खुद दुसरे की भावना का मजाक उड़ा रहे है । 
यही है अग्रेजी शिक्षा नीति का साइड इफेक्ट या युं कहु की मैकोले की शिक्षा का परिणाम । न जाने हमारी पीढ़ी कहां तक पहुचती है ।क्या क्या दुख सहती है ?

हमारी  मानसिकता जीवन के हरेक क्षेत्र मे
निम्नस्तरकी होती जा रही है ऐसा हम महसूस करते रहते हैं ? ऐसा क्युं है ? संत महात्माओं की भरमार होने के बावजूद हम अपने हरेक व्यवहार में क्युं
अप्रमाणिक बनते जा रहे हैं ? 
****************************************** क्यूंकि हम लोग संत महात्माओं , भगवान , महापुरुषों "को" मानतें हैं सुनतें हैं  पढ़ते हैं लेकिन उनकी मानते नहीं ।  गांधी जी पर माला चढ़ातें हैं उनको मानतें हैं , पर "उनकी" मानतें नहीं ।  कारण यही है । विवेकानंद जयंति मनाते हैं पर उनके आदर्शों से दुर हैं ।

मानवत कहता है - मांस मदिरा का सेबन मत करो , 
चोरी मत करो , दुसरे में दोष मत देखो , खुद में दोष देखो ,दुसरे में दुर्भावना मत करो ।
झूठ मत बोलो कि किसी का नुक़सान हो जाए , दूसरे को दु:ख मत दो , हर समय खुद में भगवान को महसूस करों , एक क्षण को भी उनको ना भूलो , राग द्वेष , काम क्रोध , मद् मोह लोभ अहंकार आवे तो दमन करो इन दुर्गुणों का  , जैसे साड़ी के एक छोड़ में आग लग जाती है खाना बनाते समय महिलाओं को तो वो तुरंत दवा देती है । ठीक उसी तरह क्रोध आवे तो दवा दो , शांत हो जाओ ।
अपने शरीर का ध्यान रखो , समय पर सोओ , समय पर उठो , काम करते समय हर आधे घंटे पर भगवान हमारे साथ है एक पल सोंचों , वो हमारे सब काम देख रहें हैं , नोट कर रहे हैं यह गांठ पार लो ।"
पर कितने प्रतिशत लोग , अपनी जिंदगी में अपनाऐं हैं ?
हद की झूठ बोलना हम सिख गए हैं , हर पल हर ओर हर समय पाप बढ़ रहा है , हर ओर निर्दोष जीव के भ्रूण तक को खा रहे हैं । 

आज भाई भाई से झूठ बोलते है , मां से झूठ बोलते है लोग पिता  से झूठ बोलते है , बुजुर्गो का सम्मान नहीं , आज हम अपने बच्चों कों सही संस्कार नहीं देतें ,  सही शिक्षा नहीं देते ताकि उनको संस्कार मिले । 
भारतीय संस्कृति पर पश्चात्य संस्कृति हावी है ,खास कर आज के 70% युवाओं और बच्चों में और परिवार में, आज के महानगर में उपनगर में रहने वाले भारतीय दम्पत्ति अपनी संस्कृति को भुल रहे हैं । कहतें हैं हम मोडर्न हैं । तुमने हमारे कपड़े पर सवाल उठाया , तुम्हारी हीं‌ नियत खड़ाब है आदि आदि । 

लड़के फटा जींस पहनतें हैं जो पश्चिम के गाय , याक् आदि के चरवाहे पहनते हैं , क्योंकि उनका जींस फट जाता है घीस कर कठीन परिश्रम से , वह यहां फैशन बन गया है ।‌ जींस का मैं विरोधी‌ नहीं लेकिन जींस फटा खड़ीद कर पहनना गलत है , बोलीवूड का असर हैं , बोलीवुड के अच्छा चीज से मतलव नहीं लेकिन एक्टिंग का नकल अच्छा लगता हैं ।
वो तो एक्टिंग में ऐसा पहनतें हैं करतें हैं फिल्म में , लेकिन हम लोग तो अपने सार्वजनिक जीवन में उनका एक्टिंग अपनातें हैं जिसकी वो लोग सार्वजनिक जगह पर सारी पहन कर आतें हैं , हीरो मर्यादित कपड़े पहन कर आतें हैं लोगों के बीच । और हम ????

हम भौतिकबाद में जितना आगे बढ़ रहें हैं‌ संस्कार उतना ही पीछे छुटते जा रहा है हमारा , नैतिकता समाप्त होती जा रही है , हम आगे बढ़ने की जगह पीछे जा रहें हैं ।
हम अर्थ का अनर्थ करते हैं , शराब कबाब  आदी में पैसे खर्च करते हैं  , घुमने फिरने मौज मस्ती , शादि विवाह में अनावश्यक खर्च करतें हैं । पर सही जगह पर कंजूसी करते हैं  ।

हाय डेड हाय मम कहतें हैं । हमारी बोलीवुड के हिरो हिरोइनी के फिल्मों की नकल करतें हैं , मोटर साईकिल पर युवा स्टंट करतें हैं गर्लस कौलेज के सामने ।
दुसरे के बहु वेटी , पत्नी , धन पर गलत निगाह है ।

तो जैसा मैं अपने कुछ महीने पहले पीछले पोस्ट में लिखा था और   अब भी कहता हुं भगवान अपनी माया शक्ति प्रकृति  के द्वारा कलयुग में समय समय पर कभी कभी  आकाल , आपदा रूपी तांडव करवा कर हमारा विनाश करवातें हैं अपनी योग माया से । 

इसलिए हम सब अगर अपने गुरू और इष्ट को मानतें हैं तो उनकी बातें भी माने , उनके सिद्धांत को अपनावे , तो हमारे पीछले पापों का शमन होगा और आगे ना करें इसकी जिम्मेंदारी ले । तो प्रकृति के प्रकोप से बच जाऐंगें । हंसना खेलना कुदना व्यायाम करना छोड़ चुकें हैं । यह सब  भी अपनाने का प्रयास करें । जो ज्ञान हम दुसरे को देंतें हैं  पहले खुद अपनावें । 

हम लोग राम जैसा वेटा भाई  पति चाहते है , सीता जैसी पत्नी चाहतें हैं लेकिन खुद दसरथ जैसा बाप , शत्रुध्न , भरत जैसा भाई  बनने की जरा भी कोशिश नहीं करतें हैं 
 राम का एक अंश अपना कर उनके जैसा पति नहीं बनतें ।
इसलिए हमारे देश में इतने अवतार भगवान कें संत के और महापुरुषों के हुए लेकिन असर कम पर हुआ । चालिस पचास पर्सेंट पर हीं हुआ है। अंदाज से बोल रहा हुं क्योंकि अभी भी भारत हीं रहने लायक हैं , लेकिन अब इसका भी लोग स्वरूप बदलने पर उतारू हैं ।:- संजीव कुमार, 

Saturday, 6 March 2021

मनुष्य की जिंदगी में 99% चुनौतियां

मनुष्य की जिंदगी में 99% चुनौतियां मनुष्यों के द्वारा हीं निर्मित और मनुष्य के खुद के द्वारा ही समाधानकृत होती हैं ।
चाहे कोई विमारी हीं क्यों नहीं हो या घटना दुर्घटना क्यों नहीं हो । व्यक्ति के खुद का रहन-सहन , खान-पान , आचार-विचार , साधन-वाणी और व्यवहार व्यक्ति के लिए चुनौतियां बन जाती है ।
प्रकृति प्रदत्त चुनौतियां तो हमेंशा पूर्व जन्म के किए कर्मों का लेखा जोखा है । परिणाम है ।
हलांकि प्रकृति प्रदत्त आपदा विनाशकारी  तो होती है, वहीं निर्माणकारी भी होती है । 
हालांकि प्रकृति प्रदत्त आपदा भी आज के युग में सामुहिक मानव जाति की भोग कामना का परिणाम है । 
प्रकृति अपने वैलेंश व्यवस्था के परिणामस्वरूप ही रंग बदलती है जो भयावह और सामूहिक नर- जीव- जन्तु संहार का कारक बनती । 
फिर मनुष्य वेचारा ईश्वर को जिम्मेदार मानता है ।
और याचना करता है - रक्षाम रक्षाम रक्षाम ।
पर कैसे मिले रक्षा । 
भक्षक रूपी दैत्य व्यवहार करने पर तो केवल दानविए संहार का हीं भागीदार वनेंगें हम ।
बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां मिलेगा ।
अत: हमें ईश्वरीय- सत्ता का सम्मान करना चाहिए और ईश्वर से , सद्गूरूदेव से प्यार करना चाहिए ।
भोगवादी ना होकर भक्तिवादि होना चाहिए , योगवादि होना चाहिए , खुद को गुरूदेव से योगित होना चाहिए हमेंशा। ध्यान रहे ईश्वर के पास हमारे प्रत्येक कर्मो का लेखा जोखा है जो हमारा प्रारब्ध है । हमें लगता है भ्रमवश , अज्ञानवश की फलाने ने हमें दु:ख दिया किन्तु वास्तव में हमारे दु:ख का कारण हम स्वयं हैं अन्य कतई नहीं !
- संजीव कुमार ।

स्वामी विवेकानंदजी

स्वामी विवेकानंदजी ने देवी जगदंबा माता के पास केवल ‘ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य' की मांग की थी । यह क्यूं किया, इसका स्पष्टीकरण देते हुए स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं, ‘संसार में रहने वाले सैकडो विचार मेरे मनमें भरे रहते थे । पहले की तरह धन कमाने हेतु घरसे बाहर निकल पडा । अनेक प्रयास कर इधर-उधर घूम रहा था । एक एटर्नी के कार्यालय में थोडा-बहुत कार्य कर साथ ही कुछ पुस्तकों का अनुवाद कर कुछ धन कमाया तथा बडी कठिनाई से दिन कटने लगे थे; परंतु स्थायी तौर पर कुछ कार्य प्राप्त नहीं हुआ । अतएव मां एवं भाई के पोषण का स्थायी प्रबंध नहीं हुआ । कुछ दिनों पश्चात मन में विचार आया कि ईश्वर ठाकुर जी के (रामकृष्ण परमहंस) कथनानुसार करूंगा, इसलिए मां एवं भाईको अन्न-वस्त्र के अभाव के कारण होने वाले दुःख दूर करने हेतु उनसे विनती कर उनकी ओर से प्रार्थना करवा लूंगा । मेरे कारण ऐसी प्रार्थना करने के लिए वे कभी भी अस्वीकारकृत नहीं करेंगे । ऐसा विचार कर शीघ्र ही मैं दक्षिणेश्वर को पहुंचा तथा ठाकुरजी के पास हठ कर पुनःपुनः उन्हें कहने लगा, ‘मां एवं भाईके आर्थिक कष्ट दूर करने हेतु आपको जगन्माताके समक्ष प्रार्थना करनी ही होगी ।' ठाकुर जी ने उत्तर दिया, ‘पुत्र, यह बात मैं माता को नहीं बता सकता । तू ही स्वयं माता को यह बात क्यों नहीं बताता ? क्या तू माताजी को नहीं मानता ? अतएव इतने कष्ट तू भुगत रहा है ।’ मैंने बता दिया, ‘मैं तो माता को पहचानता भी नहीं हूं; आप ही मेरे लिए उन्हें बताइए । आपको बताना ही पडेगा । वैसा किए बिना मैं आपको बिलकुल नहीं छोडूंगा ।' ठाकुर जी ने प्रेमपूर्वक उत्तर दिया, ‘अरे, कितनी बार मैंने माता को बताया है कि माता, नरेंद्र के दुःख-कष्ट दूर कर; तू उसे नहीं मानता, अतएव माता सुनती नहीं है । ठीक है, आज मंगळवार है; मैं बताता हूं कि आज रात्री को तू काली मंदिर में जाकर माता को प्रणाम कर । तू जो कुछ मांगेगा, माता तुझे वह अवश्य ही प्रदान करेगी । मेरी माता चिन्मयी ब्रह्मशक्ति है । उसने अपनी इच्छा के अनुसार इस जगत को जन्म दिया है । उसकी इच्छा हो, तो उसके लिए क्या करना असंभव है ?' 

         ‘मेरा दृढ विश्वास था कि यदि ठाकुर जी ने इस प्रकार से सूचित किया है, तो उनके प्रार्थना करते ही निश्चित रूप से मेरे सभी दुःख दूर होंगे । अत्यंत बेचैन होकर मैं रात्रि की प्रतीक्षा करने लगा । धीरे धीरे रात्रि होने लगी । एक प्रहर बीत जानेके पश्चात ठाकुर जी ने मुझे काली मंदिर में जानेके लिए कहा । मंदिर में जाते-जाते एक प्रकार की गहरी नशा मुझपर छा गई, मेरे पांव लडखडाने लगे तथा क्या मैं माताको वास्तवमें देख सकूंगा एवं उनके मुंखसे निकलेवाले शब्द सुन सकूंगा इस प्रकार के स्थिर विश्वास के कारण अन्य सभी विषयों को भूलकर मैंने मेरा मन अत्यंत एकाग्र एवं तल्लीन किया तथा उसी बातपर विचार करने लगा । मंदिर में उपस्थित होने पर देखा कि वास्तव में माता चिन्मयी हैं, वास्तव में वह जीवंत हैं साथ ही अनंत प्रीति एवं सौंदर्य का उत्पत्ति स्थान हैं । भक्ति एवं प्यार से हृदय उछलने लगा; व्याकुल होकर पुनःपुनः प्रणाम कर कहता गया, ‘माता, मुझे विवेक, वैराग्य, ज्ञान एवं भक्ति प्रदान करें, वह भी ऐसे कि मुझे निर्विघ्न रूप से निरंतर आपका दर्शन प्राप्त होता रहे ।' हृदय शांति से भर गया । सारा जगत पूरी तरह अदृश्य हो गया केवल माता ही मेरे हृदय में व्याप्त हो गई । 

         पुनः ठाकुर जी के पास पहुंचते ही उन्होंने पूछा, ‘क्या संसार की न्यूनता दूर करने हेतु तुमने माता को प्रार्थना की ?' उनके प्रश्न से विस्मित होकर मैंने बताया, ‘नहीं महाराज, मैं भूल गया । अब मैं क्या करूं ?' उन्होंने उत्तर दिया, ‘जाओ, पुनः जाओ एवं प्रार्थना करो ।’ पुनः मैं मंदिर में गया । माताके सामने उपस्थित होने पर पुनः मोहित होकर सबकुछ भूल गया एवं पुनःपुनः प्रणाम कर ज्ञान-भक्ति प्राप्त होने हेतु प्रार्थना कर लौटकर आया । ठाकुर जी ने हंसते हंसते पूछा, ‘क्या इस समय तूने बताया ?' पुनः विस्मित होकर मैंने उत्तर दिया , ‘नहीं महाराज, माता का दर्शन होते ही एक दैवी शक्ति के प्रभाव के कारण सभी बातें भूलकर केवल ज्ञान-भक्तिलाभ के विषयमें ही मैंने बताया । अब क्या होगा ?' ठाकुर जी ने बताया, ‘वाह रे पुत्र, क्या तुमने स्वयं को थोडा संभाल कर यह प्रार्थना की ! यदि संभव हो, तो पुनः एक बार जाकर वह बातें बताकर आओ । जाओ, शीघ्र जाओ ।' लौटकर पुनः मंदिर में गया; मंदिर में प्रवेश करते ही अत्यंत शरम से मेरा हृदय भर गया । विचार करने लगा कि वास्तव में क्षुद्र सी यह बात माता को बताने हेतु आया था । यह तो ठाकुरजीके कथनानुसार ‘राजा को प्रसन्न कर लेने पर उसके पास कद्दु मांगने जैसी मूर्खता होगी ! क्या मेरी बुद्धि इतनी हीन हो गई है! शरम एवं घृणा से उमडकर माता को पुनःपुनः प्रणाम कर कहने लगा, ‘माता, मुझे अन्य कुछ नहीं चाहिए, केवल ज्ञानभक्ति प्रदान करें ।' मंदिर के बाहर आने पर मन में विचार आया कि निश्चित ही यह ठाकुर जी की लीला है । अन्यथा तीन-तीन बार माता के पास जाने पर कुछ भी बताने में असमर्थ रहना । तदुपरांत ठाकुरजी को मैंने अनुरोध से बताया कि निश्चित रूप से आपने ही मुझे ऐसे मोह में डाल दिया है, अब आपको ही बताना पडेगा कि मेरी मां एवं भाईको अन्नवस्त्र का अभाव न रहे । उन्होंने उत्तर दिया ‘अरे, इस प्रकारकी प्रार्थना मैं किसी के लिए कभी भी नहीं कर सका । मेरे मुंह से इस प्रकार की प्रार्थना बाहर निकलती ही नहीं है । तुझे मैंने बताया था कि माता के पास जो कुछ मांगेगा, वहीं तुझे प्राप्त होगा । तू माता के पास मांग न सका । तेरे भाग्य में सांसारिक सुख नहीं है, उसके लिए मैं क्या कर सकता हूं ?' मैंने बताया, ‘महाराज, यह कुछ नहीं चलेगा । मेरे लिए आपको यह बात बतानी ही होगी; मेरा दृढ विश्वास है कि आपके कहने पर मेरी मां तथा भाई के दुःख शेष ही नहीं रहेंगे । इस प्रकार जब मैं बारबार उनके पीछे पडा, तो उन्होंने बताया, ‘ठीक है, उन्हें खुरदरे अन्नवस्त्र की कभी भी न्यूनता प्रतीत नहीं होगी ।'

        सारांश, चित्तशुद्ध रहनेवाला उपासक मांग करेगा, तो केवल परमार्थ की ही ! जनकल्याण की ही ! तनिक भी स्वार्थका अंश उसकी मांगमें नहीं होगा । ऐसे उपसकोंकी इच्छापूर्ति द्वारा ही जगत का कल्याण निःसंशय होगा !