‘मेरा दृढ विश्वास था कि यदि ठाकुर जी ने इस प्रकार से सूचित किया है, तो उनके प्रार्थना करते ही निश्चित रूप से मेरे सभी दुःख दूर होंगे । अत्यंत बेचैन होकर मैं रात्रि की प्रतीक्षा करने लगा । धीरे धीरे रात्रि होने लगी । एक प्रहर बीत जानेके पश्चात ठाकुर जी ने मुझे काली मंदिर में जानेके लिए कहा । मंदिर में जाते-जाते एक प्रकार की गहरी नशा मुझपर छा गई, मेरे पांव लडखडाने लगे तथा क्या मैं माताको वास्तवमें देख सकूंगा एवं उनके मुंखसे निकलेवाले शब्द सुन सकूंगा इस प्रकार के स्थिर विश्वास के कारण अन्य सभी विषयों को भूलकर मैंने मेरा मन अत्यंत एकाग्र एवं तल्लीन किया तथा उसी बातपर विचार करने लगा । मंदिर में उपस्थित होने पर देखा कि वास्तव में माता चिन्मयी हैं, वास्तव में वह जीवंत हैं साथ ही अनंत प्रीति एवं सौंदर्य का उत्पत्ति स्थान हैं । भक्ति एवं प्यार से हृदय उछलने लगा; व्याकुल होकर पुनःपुनः प्रणाम कर कहता गया, ‘माता, मुझे विवेक, वैराग्य, ज्ञान एवं भक्ति प्रदान करें, वह भी ऐसे कि मुझे निर्विघ्न रूप से निरंतर आपका दर्शन प्राप्त होता रहे ।' हृदय शांति से भर गया । सारा जगत पूरी तरह अदृश्य हो गया केवल माता ही मेरे हृदय में व्याप्त हो गई ।
पुनः ठाकुर जी के पास पहुंचते ही उन्होंने पूछा, ‘क्या संसार की न्यूनता दूर करने हेतु तुमने माता को प्रार्थना की ?' उनके प्रश्न से विस्मित होकर मैंने बताया, ‘नहीं महाराज, मैं भूल गया । अब मैं क्या करूं ?' उन्होंने उत्तर दिया, ‘जाओ, पुनः जाओ एवं प्रार्थना करो ।’ पुनः मैं मंदिर में गया । माताके सामने उपस्थित होने पर पुनः मोहित होकर सबकुछ भूल गया एवं पुनःपुनः प्रणाम कर ज्ञान-भक्ति प्राप्त होने हेतु प्रार्थना कर लौटकर आया । ठाकुर जी ने हंसते हंसते पूछा, ‘क्या इस समय तूने बताया ?' पुनः विस्मित होकर मैंने उत्तर दिया , ‘नहीं महाराज, माता का दर्शन होते ही एक दैवी शक्ति के प्रभाव के कारण सभी बातें भूलकर केवल ज्ञान-भक्तिलाभ के विषयमें ही मैंने बताया । अब क्या होगा ?' ठाकुर जी ने बताया, ‘वाह रे पुत्र, क्या तुमने स्वयं को थोडा संभाल कर यह प्रार्थना की ! यदि संभव हो, तो पुनः एक बार जाकर वह बातें बताकर आओ । जाओ, शीघ्र जाओ ।' लौटकर पुनः मंदिर में गया; मंदिर में प्रवेश करते ही अत्यंत शरम से मेरा हृदय भर गया । विचार करने लगा कि वास्तव में क्षुद्र सी यह बात माता को बताने हेतु आया था । यह तो ठाकुरजीके कथनानुसार ‘राजा को प्रसन्न कर लेने पर उसके पास कद्दु मांगने जैसी मूर्खता होगी ! क्या मेरी बुद्धि इतनी हीन हो गई है! शरम एवं घृणा से उमडकर माता को पुनःपुनः प्रणाम कर कहने लगा, ‘माता, मुझे अन्य कुछ नहीं चाहिए, केवल ज्ञानभक्ति प्रदान करें ।' मंदिर के बाहर आने पर मन में विचार आया कि निश्चित ही यह ठाकुर जी की लीला है । अन्यथा तीन-तीन बार माता के पास जाने पर कुछ भी बताने में असमर्थ रहना । तदुपरांत ठाकुरजी को मैंने अनुरोध से बताया कि निश्चित रूप से आपने ही मुझे ऐसे मोह में डाल दिया है, अब आपको ही बताना पडेगा कि मेरी मां एवं भाईको अन्नवस्त्र का अभाव न रहे । उन्होंने उत्तर दिया ‘अरे, इस प्रकारकी प्रार्थना मैं किसी के लिए कभी भी नहीं कर सका । मेरे मुंह से इस प्रकार की प्रार्थना बाहर निकलती ही नहीं है । तुझे मैंने बताया था कि माता के पास जो कुछ मांगेगा, वहीं तुझे प्राप्त होगा । तू माता के पास मांग न सका । तेरे भाग्य में सांसारिक सुख नहीं है, उसके लिए मैं क्या कर सकता हूं ?' मैंने बताया, ‘महाराज, यह कुछ नहीं चलेगा । मेरे लिए आपको यह बात बतानी ही होगी; मेरा दृढ विश्वास है कि आपके कहने पर मेरी मां तथा भाई के दुःख शेष ही नहीं रहेंगे । इस प्रकार जब मैं बारबार उनके पीछे पडा, तो उन्होंने बताया, ‘ठीक है, उन्हें खुरदरे अन्नवस्त्र की कभी भी न्यूनता प्रतीत नहीं होगी ।'
सारांश, चित्तशुद्ध रहनेवाला उपासक मांग करेगा, तो केवल परमार्थ की ही ! जनकल्याण की ही ! तनिक भी स्वार्थका अंश उसकी मांगमें नहीं होगा । ऐसे उपसकोंकी इच्छापूर्ति द्वारा ही जगत का कल्याण निःसंशय होगा !
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