बारहवां प्रश्न - ज्ञानी किस प्रकार मौक्ष प्राप्त करते हैं ?
उत्तर - ज्ञानी पंचकोश को विद्यामाया के द्वारा भष्म कर देंतें हैं , ये स्वरूपावरी का माया को तो समाप्त कर देतें हैं लेकिन गुणावरी के माया को समाप्त नहीं कर पाते हैं ।
यानि अविद्या माया को विद्या माया द्वारा समाप्त कर देतें हैं लैकिन विद्या माया को समाप्त नहीं कर पाते हैं ।
ये ज्ञानी लोग अविद्या को समाप्त कर पंचकोश ( अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमय कोश , आनंदमय कोश) के अंतिम कक्षा आनंदमय कोश के परे चले जातें हैं और उसको भी भष्म कर लेते़ है , अब वहां उन्हें ध्यान में भगवान का केवल आभास होता है वो भी ध्यान में केवल, लेकिन साक्षात्कार नहीं हो पाता है । वो इसी आनंदमय कोश के परे जाकर आनंद का अनुभव करके भ्रम में आ जातें हैं कि आनंद मिल गया ।
,वो महान यानि महत् तत्व और प्रकृति को लांघ नहीं पातें हैं । इसलिए मायाबद्ध ही रहतें हैं , इनकी माया समाप्त नहीं होती ।
फिर इन्हे भी सगुण साकार भगवान श्रीकृष्ण की हीं भक्ति करनी परती है । तब जाकर कैवल्य , मौक्ष की चाह रखने वाले ज्ञानी को मौक्ष मिल जाता है । बस खत्म, छुट्टी । अब वो अपने दिव्य इंद्रियों से परमानंद का अनुभव नहीं कर पातें हैं । वो स्वयं आनंद में लीन हो जातें हैं । जैसे मीठी पानी की नदी समुद्र में मिल कर अपना अस्तित्व खो देती है और स्वयं खारा जल हो जाता है ।
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