वैवर्ण्यमश्रुप्रलय इत्यष्टौ सात्विका: स्मृता: ||
(भ.र.सि.)
अर्थात प्रेमास्पद की याद में वृक्ष के समान स्थिर सामाधिस्थ हो जाना , पसीना निकलना , रोंगटे खड़े हो जाना , आवाज बदल जाना , शरीर काँपना , चेहरे का रंग बदल जाना , आँसू निकलना , मूर्च्छित हो जाना |
उपर्युक्त अष्ट सात्विक भावों का एक साथ उद्रेक अगाध दिव्य प्रेम का परिचायक है | श्री महाराज जी के अन्दर ये सभी सात्विक भावों का जब उद्रेक होता है , सम्पूर्ण वातावरण भक्ति -रस से ओत प्रोत हो जाता है | एक-एक अंग से शोभाश्री की ऐसी सुधा धारा प्रवाहित होती है जो सभी अंग प्रत्यंग में अमृत का संचार कर देती है | भक्तवृंद आह्लाद सुधा सरिता में बह जाते हैं | सभी का ह्रदय अपार आनंद से भर जाता है परमानिर्वचनीय रसमत्तता में डूब जाते हैं |
हरि हरि बोल , बोल हरि बोल
हरि हरि बोल , बोल हरि बोल
हरि हरि बोल , बोल हरि बोल
बोल हरि बोल , बोल हरि बोल
हरि हरि बोल , बोल हरि बोल......... पुज्यनियां मां रासेस्वरी देवी जी।
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