Tuesday, 30 December 2025

"सिर गिरे सजदे में , दिल में दगाबाजी हो, ऐसे सजदों से भला कैसे खुदा राजी हो ? "

"सिर गिरे सजदे में , दिल में दगाबाजी हो, चोरी और बेईमानी हो , 
ऐसे सजदों से भला कैसे कोई वास्तविक संत व खुदा राजी हो ? " 

भारत में लगभग हम 90% लोग चोर है , भ्रष्ट है। 
सौ में से नब्बे बेइमान फिर भी मेरा देश महान। 
गमला चोरी करने वाला गरीब नहीं , अच्छा खासा मध्यम तथा उच्च वर्गीय परिवार के लोग है । चाहे वो जी 20 में मर्सिडीज कार में आकर गमला चोरी करता है या स्कूटी से आकर संभ्रांत परिवार कि महीला । चोर सब है और दोष देता है कि हमारे देश का नेता चोर है भ्रष्ट है , व्यवस्था चोर और भ्रष्ट है । अरे सबसे पहले हम तुम चोर हो , जहां मौका मिलता है चोरी करने से हम नहीं चुकते । और जिसको मौका नहीं मिलता वो कहता है हम इमानदार है । जिस देश का अधिकांश जनता चोर हो भ्रष्ट हो उसका नेता तो चोर तथा भ्रष्ट होगा ही । 
गलती नेता का नहीं गलती हमारी है । एक चोर , एक भ्रष्ट तो स्वाभाविक है चोर तथा भ्रष्ट को ही चुनेगा । 
एक लाख गदहा मिलके मैजूरिट से किसी गदहे को ही तो नेता चुनेगा जो स्वाभाविक है । और वो चुना गया नेता भी गदहा ही रहेगा , चुनने के बाद घोड़ा तो कभी नहीं बन सकता । 

इसलिए पहले स्वयं को ठीक करना होगा । 
इमानदारी, नैतिकता, संस्कार , दिव्य गुण किताबों में नहीं मिलता । शब्दों से नहीं होता । 
यह होता है वास्तविक गुरू के बतलाए मार्ग पर चल कर । 
इसलिए दुसरे को चोर तथा भ्रष्ट कहना बंद कर दो, जब तक हमारे तुम्हारे संस्कार में भ्रष्ट बेईमान तथा चोर मन बैठा है दुसरे को चोर मत कहो । 

स्वयं को ठीक करो । भगवान को समझो , वास्तविक संत को ठीक से समझो और खूद को बदलो, वर्णा नरक का द्वार तो खुला है हमारे तुम्हारे लिए । मानव जीवन समाप्त होने के बाद कुत्ते बिल्ली के यौनियो में हमें भेज दिया जाएगा । 
मंदीर में घंटा डोलाना काम नहीं आएगा । और न घंटा डोलाने से भाग्य अच्छा होगा । वल्कि और रसातल में जाओगे । 
भगवान को , संत को मानने कि जगह उनकी मानो , यानि उनके बातों को , उनकी शिक्षा को , उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारो , यही पुजा है , यही भक्ति है । 

वर्णा पीपल के पेड़ के निचे अगरबत्ती तथा दीपक जलाने से शनी देव प्रसन्न नहीं होंगे , वो बुरे कर्मों के फल के रूप में और कड़ा दंड देते हैं और न मंदीर में दीपक जलाने से कोई देवता प्रसन्न होंगे । भगवान तथा वास्तविक संत घुसखोर नहीं होते । वो बाहरी आडंबर तथा पाखंड से कभी खुश नहीं होते , वो मन तथा अंत:करण के गंदगी को देखते हैं , जब तक वो शूद्ध नहीं होगा , तब तक राम राम श्याम श्याम भजन किर्तन आदि से कोई लाभ नहीं होगा । 
अपने मन के गंदगी , अपने अंत:करण के गंदगी को , अपनी ग़लती , अपने द्वारा किए गए अनंत जन्मों के पापों को स्वीकार करके जब तक हम भगवान तथा अपने गुरू के प्रति अपने आंतरिक मन से निरंतर शरणागत होकर इसे शूद्ध करने के लिए व्याकुलता के साथ एकांत में इमानदारी की आंसुओ के साथ पुकारेंगे नहीं और आगे कोई भी गलती तथा पाप न करने का शपथ नहीं लेंगे तब तक न भगवान खुश होंगे और न वास्तविक संत , चाहे कितना भी भक्ति , पुजा पाठ , जप तप , उपवास, तिरथ विरथ करते रहो ,कोई फायदा नहीं होगा । 

इस पाखंड से भगवान और अधिक कुपित होते हैं , संत अंदर से दुखी होते हैं अपने अनुयायियों से । 
जब वास्तविक संत चले जाते हैं तो सभी संस्था का पतन देखा गया है इस संसार में , भाषण देने वाला , प्रवचन का व्यापार करने वाला स्वयं अंदर से कैसा है क्या है यह महत्वपूर्ण है । क्योंकि संस्था चलाने वाला मायाबद्ध जीव बचता है संत के जाने के बाद और वो धीरे धीरे जीव को आडंबर , भक्ति का दिखावा, नाटक नौटंकी को संस्था का नया सिद्धांत अपने मन से बना कर पेश करता है । ऐसे चालबाजों से बच कर रहना होगा । 
हम अपने गुरू के अनुयाई हैं , ऐसे चालबाजों के नहीं । अगर डूबना है भवसागर में तो ऐसे निति निर्धारक तथा चाल बाजों से दूर रहो । तथा केवल अपने गुरू के सिद्धांतों पर चलो । 
अगर ऐसा चालबाज हमको तुमको गुरू तथा भगवान के नाम पर डर दिखाने का कोशीश करता है , तो खिसक जाओ वहां से । डरो मत । 
हम अपने गुरू तथा ईष्ट के शरणागत है इनके नहीं । 
हमारे गुरूदेव ने स्वयं जिस शिक्षक यानि प्रचारकों को हमारे लिए नियुक्त किया है , हमें सही दिशा दिखाने के लिए हम उसी शिक्षक का बात मानेंगे । दुसरे किसी अन्य का कभी नहीं चाहे वो भगवान का पुत्र ही क्यों न हो । 
अगर कोई शिक्षक श्री महाराज जी के सिद्धांतों से भटकाता है तो हम उनका भी बात नहीं मानेंगे । 

भगवान तथा वास्तविक संत हमारे तुम्हारे मन के अंदर के दूषित सोच , अहंकार तथा भ्रष्ट बुद्धि के स्थिति को हमसे तुससे अधिक अच्छी तरह से जानते हैं कि हम तुम कितना शुद्ध है ।‌

जब तक चरित्र नहीं बदलेगा । जब तक संस्कार बढ़िया नहीं होगा , जब तक सोच तथा दृष्टिकोण नहीं अच्छा होगा तब तक दुख रहेगा , डिप्रेशन रहेगा, हर काम में बाधा आएगा । संसारिक सुख भी नसीब नहीं होगा , भगवदिए आनंद तथा सुख पाना‌ तो असंभव ही रहेगा । 

श्री महाराज जी भी यही बातें कहे है संप्रदाय बना कर नाटक करने तथा व्यापार करने वालो के लिए । हमारे गुरू देव श्री महाराज जी भी यही बात कहे है अलग शब्दों में । 
व्यक्ति विशेष में न जाकर इनकी कहीं हुई कटु सच्चाई के एक एक लाईन को अगर ध्यान से सुनें और फिर श्री महाराज जी के बतलाई सिद्धांतों का पालन करें तो लाभ सुनिश्चित है । :- संजीव ।

https://youtu.be/leUj8BZ1kPM?si=6SV_dN2nYXdEx5VT

इस लिंक को क्लिक करके सत्य सुन लो , कौन बोल रहा है यह मत देखो । क्या बता रहा है यह सुनो और सत्य से रू-ब-रू होओ और खुद को ठीक करो ।

हमें अपने आध्यात्मिक गुरू से प्रेरणा लेकर स्वयं को बदलने पर बल देना चाहिए।

उच्च शिक्षा , पढ़ाई लिखाई , तकनिकी विकास, भौतिक उन्नति, आर्थिक उन्नति, उत्तम से उत्तम भौतिक शिक्षा से, केवल बातें आदि बनाने से भाषण देने से उत्तम चरित्र , आदर्श व्यक्तित्व, शान्ति पसंद मनुष्य, ईमानदार , कर्तव्यनिष्ठ तथा न्यायप्रिय व्यक्तित्व का निर्माण कभी नहीं हो सकता तबतक, जबतक मनुष्य के अंदर सही सही अध्यात्मिक ज्ञान का समावेश न हो । 

आज हम सब देख रहे हैं जो देश उन्नत है जो देश तकनिकी रूप से सबसे अधिक विकसित है, जिस देश में सबसे अधिक पढ़ें लिखे लोग हैं, हर तरह से तकनिकी विकास, आर्थिक विकास आदि से लैश है वहां उतनी ही अधिक अशांति है, व्यभिचार है , लड़ाई झगड़ा है , भ्रष्टाचार है, युद्ध है , क्राईम है । आज विकसित देश के काफी पढ़ें लिखे नेतागण तथा लोग असुरों कि भांति व्यवहार कर रहे हैं, आसुरी बात करते पाए जा रहे हैं , तर्क कुतर्क , अतितर्क एवं अतिश्योक्ति का भरमार है उनके बातों में सोंच में , एक दुसरे देश पर बम बरसा रहे हैं, राकेट दाग रहे हैं । निर्दोष लोगों कि हत्या कि जा रही हैं, दुनिया को नर्क बनाने में अथाह धन खर्च किए जा रहे हैं । 

चारों तरफ युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं, युद्ध पर युद्ध हो रहे हैं बरसों से , लोग उन्मादी तथा पागलपन के हद को पार कर चुके हैं , परमाणु बम, हाईड्रोजन बम , तरह तरह के आयुध सामग्री विकसित किए जा रहे हैं , हथियारों कि होड़ लगी हुई है । एक दिन यह दुनिया अवश्य ही अपने ही भौतिक उन्नति, उच्च भौतिक शिक्षा तथा तकनिकी विकास रूपी काल का ग्रास बनने कि दिशा में अग्रसर है । धरती रहने लायक नहीं बचेगी । हमारी पृथ्वी दुसरा मंगल ग्रह बनने वाला है , यह दिन दुर नहीं है ।

 अत: ऐसे समय में इस घोर कलयुग में जो मनुष्य समझदार हैं वो पंचम मूल जगद्गुरूतमई श्री कृपालुजी महाराज जैसे उच्चतम कोटि के श्रोत्रिए एवं ब्रह्मनिष्ठ वास्तविक संत , भगवद् अवतार महापुरूष को अपना गुरू मान कर , उनके द्वारा दिए गए शिक्षा को आत्मसात करके , उनका शरणागति करते हुए अपने खाली समय का एक एक सेकेंड का भरपुर सदुपयोग करके उनके बतलाए मार्ग का अनुसरण करके अपने परम कल्याण के मार्ग पर अग्रसर है।  

और जो जो ना समझदार है वो अपने समय को लोक रंजन , सोसल मीडिया में , इधर उधर गप करने में अपने समय को बर्बाद करने में लगे हैं । इन सबसे कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है , अरे जिसको भगवान के अनेकों अवतार नहीं समझा सके , जिसको बड़े से बड़ा वास्तविक मूल जगद्गुरू नहीं समझा सके इस दुनियां में उसको भला हम आप कैसे समझा लेगें ? 

हमें स्वयं के निर्माण पर फोकस करना चाहिए। हमें अपने समय को स्वयं के आध्यात्मिक उत्थान उपलब्धि तथा आध्यात्मिक कल्याण में खर्च करना चाहिए । हमें अधिक से अधिक एकांत साधना करके अपना बिगड़ी बनाने में अधिक से अधिक समय तथा उर्जा खर्च करना चाहिए। 

हम साधक लोग साधना करने के बजाए अपना किमती समय तथा इनर्जी यूं हीं फजूल के काम में तथा दुसरो को समझाने में लगा रहें हैं । हम स्वयं का निर्माण न करके दुसरे को समझाने में लगे हैं । 
दुसरा तो कभी नहीं समझेगा, लोग लिखित पोस्ट भी नहीं पढ़ते ठीक से, आत्मसात करने कि बात तो काफी दूर कि कौड़ी है । दुसरा हमको काम नहीं देने वाला यह तय है , हमारा अपना भी लूट रहा है दुसरो को समझाने के चक्कर में और दुसरे पर भी कोई असर नहीं । 

अरे जब हम पर ही असर नहीं श्री महाराज जी के तत्वज्ञान का तो दुसरे को हम क्या खाक समझा लेंगे ? यह तो हास्यास्पद बाला बात तथा व्यवहार के सीवा कुछ भी नहीं । यह सब लोक रंजन है ।

 लोक रंजन को हीं हम साधना , सेवा तथा भक्ति समझ बैठे हैं । हम भ्रम में जी रहे हैं । इस तरह हम आत्मघाती है , हमारी बर्बादी सुनिश्चित है । 
दुसरो के जगह खुद के निर्माण पर हमें ध्यान देना चाहिए , अब अधिक समय नहीं है हमारे पास , जीवन ऊर्जा छीन हो रही है , उम्र बिता जा रहा है ,‌ काल घात लगाए बैठा है , यमदूत घसीटने के लिए तैयार बैठा है । इससे पहले कि हम यमदूत द्वारा घसीटे जाए , चौरासी लाख के चक्कर में फिर से भेज दिए जाएं , हमें अपना समय नष्ट न करके आत्मकेंद्रित होकर हमें आत्मनिर्माण कर लेना चाहिए ताकि कम से कम दुसरा जीवन मानव शरीर में हीं मिले और हम आगे कि साधना करके गोलोक में अपना स्थान सुनिश्चित कर लें । इसलिए हमें खुद कि जय करने में समय खर्च करना चाहिए। 
"दुसरो कि जय से पहले खुद कि जय करें " 
:- संजीव कुमार।

Sunday, 14 December 2025

कलयुग जैसे जैसे बीतेगी अपना प्रभाव इस प्रकार दिखलाएगी

सुत जी ने कलयुग में होने वाले घटनाओं का जो जिक्र किया उसका भावार्थ :- 
कलयुग जैसे जैसे बीतेगी अपना प्रभाव इस प्रकार दिखलाएगी :- 

हां एक बात अवश्य होगी सभी वास्तविक तथा सच्चे धर्मनिष्ठ तथा भगवद् भक्त , वास्तविक संतों में आस्था रखने वाले जीवात्मा अपने ईष्ट और गुरू के लोक में निवास करने चले जाएंगे , उनको कलयुग के ताप से मुक्ति पहले ही मिल जाएगी । जो हमारे गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज या कुछ वर्तमान वास्तविक संतों के प्रति पूर्ण रूप से आस्थावान होंगे, श्रद्धावान होंगे , वे सभी मनुष्य इन घोर कलयुग के लक्षण के प्रकट होने से पहले दिव्य लोक , अपने गुरू के लोक चले जाएंगे, लेकिन जो दुष्ट प्रकृति के होंगे, उनको कलयूग का प्रभाव झेलने के लिए कलयुग में कई कई बार जन्म लेना होगा और इन कठीन पीड़ा से बार बार मरना होगा, गुजड़ना होगा यह एक अटूट सत्य है । 

1. कलयुग में मनुष्य का आत्मबल गिरने लगेगा । लोग आलसी , भोगी तथा अति विलाशी होंगे । 

2. मनुष्य झूठ पर भरोसा करेंगे और सच को स्वीकार करने से परहेज़ करेंगे । सच पर ऊंगली उठाएंगे और झूठ को गले लगायेंगे । सही रास्ता दिखाने सत्य बोलने वाला , सन्मार्ग का बात करने वाला कटु प्रतित होगा , दुश्मन कि तरह नजर आएगा और गलत मार्ग पर ले जाने वाले का लोग संगति करेंगे । गलत लोगों को लोग अपना आदर्श मानेगें , नेता मानेंगे । जो जितना चिल्लाएगा , चीख चीख कर बातें करेगा वो उतना पसंद किया जाएगा । 

3. मानव समाज , परिवार में आपसी सहयोग तथा संबंध का आभाव होगा । परिवारिक रिस्तों का कोई अहमियत नहीं होगा , झूठ , बनावट , छल , प्रपंच , इर्ष्या द्वेष से लोगों का मन भरा परा होगा । वाणी में सौम्यता के जगह जहरीले व्यंग होंगे । 

4. मनुष्य का कद काठी बौना होता जाएगा । स्त्री स्त्री से और पुरूष पुरूष से अप्राकृतिक तथा अमर्यादित व्यवहार तथा यौनाचार करेंगे । पुरूष से पुरूषत्व एवं नारी से नारित्व समाप्त हो जाएंगे । वेश्याएं पुजी जाएगीं , उनका मंदिर बनेगा । अंग प्रदर्शन स्टेटस सिंबल बन जाएगा । असली देवी देवताओं का मंदिर खंडित होंगे । जुआ शराब सम्मान का बिषय होगा । मानवीय अंगों का तस्करी तथा व्यापार होगा । 

5. मानवों में आसुरी वृत्ति का लक्षण उत्तरोत्तर दृष्टिगोचर होंगें , जो जितना झूठ बोलेगा , जितना कुकर्म करेगा , अमर्यादित तथा अमानवीय व्यवहार करेगा उसका उतना बड़ा नाम होगा । समाज में पद होगा । 

6. धन के लिए पिता पुत्र का तथा पुत्र पिता का , भाई बहन का तथा बहन भाई का , पति पत्नी का तथा पत्नी पति को धोखा देगा, मर्डर करेगा । एक स्त्री का अनेकों से संबंध होगा उसी प्रकार एक पुरूष का अनेकों से शारीरिक संबंध होगा , यहां तक कि जानवर तक से ।

7. फर्जी साधुओं का लोग चरण चुमेंगे और हाथ कि सफाई बाले बाबाओं के द्वारा दिखलाए गए चमत्कार को नमस्कार करेगे । उनके यहां कड़ोरो कि भीड़ होगी और वास्तविक संतों को शंका के दृष्टि से लोग देखेंगे । वास्तविक संतों का अपमान होगा । शास्त्रों का अपमान होगा और फर्जी तथा बात बनाने बाले साधुओं के यहां , चमत्कार दिखाकर लोगों को ठगने बाले बाबाओं के यहां लोग जाकर खूद को आध्यात्मिक दिखने तथा होने का दावा करेंगे । 

8. हर खाने कि बस्तू दूषित तथा मिलावटी होगा । खान पान जहरीली लेकिन आकर्षक दिखेंगी । नए नए लेकिन जहरीले पकवानों का अविष्कार होगा । अधिकांश लोग मांसाहारी होंगे , मानव का भी मांस पका कर खाएंगे । घरों में रसोई घर तथा स्नान घर नहीं होंगे , भोजन तथा जल के लिए एजेंसी होगी । स्नान के लिए वाशिंग मशीन के तरह वाथ मशीन होगा । 

9. मानव शरीर एक से अधिक रोगो का घर होगा , दवा के नाम पर जहर और बैद् के नाम पर डकैत डाक्टर होगा । 

10. लोगों की याद्दाश्त शक्ति अति अल्प होगी , मनुष्य मनुष्य से दूर तथा जानवरों के साथ एक ही विस्तर पर सोयेगे । 

11. कलयुग में इंसान से इंसानियत गायब होती चली जाएगी , मनुष्य से मानवता समाप्त होती जाएगी लोग वहशी होंगें । साधुओं में साधुता नहीं होगी या दिखावटी होगी । देश धर्म , राष्ट्र धर्म निभाने वालों का आभाव होगा । धर्म , न्याय नीति , नैतिकता पर धन हावी होगा । अधिकतर धार्मिक संस्थानों में धन वाले का सम्मान होगा और निर्धनों का प्रवेश वर्जित होगा । इन्हें भंगी समझा जाएगा । 

12. कलयुग में धर्म कर्म के नाम पर कुकर्म होगा । तीर्थ में व्यभिचार होंगे , यौनाचार होंगे । 

13. निति, नैतिकता न्याय का कोई जगह नहीं होगी । 

14. फुलों से खुशबू , मसालों से उसका स्वाद , औषधी से उसका औषधीय गुण , यानि रोग निरोधक प्रभाव समाप्त होते चला जाएगा । 

15. अनेक नए नए रोग उत्पन्न होगा जो लोगों को काल के मुख में भेजेगा । 

16. खेत से उपजाऊपन , अन्न से अन्नरस , वृक्षों से फल देने कि क्षमता , गाए से दुध, उत्पादन कि क्षमता समाप्त होने लगेगी । 

17. तरह तरह के विध्वंशक विनाशकारी हथियार का निर्माण होगा जो स्वयं के विनाश का कारण होगा । 

18. अति वृष्टि, अनावृष्टि, जलजला , भयानक से भयानक तुफान , भयानक बाढ़ तथा सुनामी जल्द जल्द उत्पन्न होगा । पहाड़ दड़कने लगेगा , वर्फ का पहाड़ तेजी से पिघलने लगेगा । रेगिस्तान का क्षेत्रफल बढ़ने लगेगा । दिन का समय छोटा होगा , रातें बड़ी होंगी । 

19. मशीन में बच्चे पैदा होंगे , गर्भ धारण करना एक इतिहास बन जाएगा । 
विचार विवेक बुद्धि हीन बच्चे पैदा होंगे , उनका दिमाग मशीनी होगा जो भावनात्मक शून्य होंगे , संस्कार , चरित्र आदि शब्द लुप्त हो जाएंगे । बच्चा जो अपने पैर पर खड़े होते ही मां वाप को पशुओं के तरह छोड़ कर अलग हो जाएंगे हमेशा के लिए । 

20. वाइलोजिकल जरूरत जैसे सेक्स , नींद , सांसें तथा भोजन आदि को मशीन से पुरा करेंगे , लोग संवेदनहीन होंगे ।

21. मनोरंजन के विशुद्ध साधन के जगह लोग अमार्यादित नृत्य संगीत , तथा नाटक से अपना रंजन करेंगे । 

22. असली नकली का पहचान लोगों को नहीं होगा । कलयूग का दस हजार सात सौ साल वितने के साथ हीं मानव सभ्यता लुप्त हो जाएगा, पर ग्रही जीवों का आक्रमण होगा , सबकुछ तहस नहस हो जाएगा पृथ्वी पर । पृथ्वी पर केवल भोग योनि के जीव कीट पतंग तथा जानवरों का शासन होगा , सभी अधर्मी मानव जानवर शरीर में जन्म लेंगे कर्म भोग के लिए , ये जानवर कुछ कुछ मनुष्य कि तरह दिखेंगे । पृथ्वी पर जानवरों का शासन चार लाख तिरेपन हजार तीन सौ बर्ष तक रहेगा , उसके बाद पृथ्वी समाप्त । 

23. रिस्तों में वाणी कि मधुरता के जगह कर्कशता का समावेश होगा । दर्पण झूठ बोलेगी । 

24. वेद शास्त्र, असली संत , फल तथा छाया प्रदान करने वाले बृक्ष एवं निर्मल सरिता नदी तालाब लूप्त हो जाएंगे । शास्त्रों को तोड मोड़ कर पेश करेंगे बहुरूपिए पंडित । बड़ी संख्या में ब्राह्मण मांस भक्षि होंगे । चंडाल प्रवचन करेंगे । अधिकतर ब्राह्मण उसका चरण धोकर पिएंगे , उनको अपना आदर्श मानेगें । शास्त्रों के नाम पर चंडाल मिथ्या प्रवचन करेंगे । 

25. लोग या तो जमीन के निचे चुहे कि तरह या गगन चुंबी इमारत में कबुतर के भांति निवास करेंगे और सर्दी एवं गर्मी से उम्र कमतर होगी । शरीर दुर्बल होगी । लोग हवा में उड़ेंगे । 

अंत में ब्रह्मांड कि गति अनियमित तथा अनियंत्रित हो जाएगी एवं एक भयानक विस्फोट होगा ब्रह्मांड में , ग्रह से ग्रह टकराएंगे और सृष्टि का महाप्रलय होगा । 

हां एक बात अवश्य होगी सभी वास्तविक तथा सच्चे धर्मनिष्ठ तथा भगवद् भक्त , वास्तविक संतों में आस्था रखने वाले जीवात्मा अपने ईष्ट और गुरू के लोक में निवास करने चले जाएंगे कल्युग के प्रारंभिक अवस्था में ही , उनको कलयुग के इन तापों से , घटनाओं से मुक्ति पहले ही मिल जाएगी ।
:- सोर्स - पद्म पुराण , गरूड़ पुराण एवं भविष्य पुराण । 
यह सभी बातें सत् प्रतिसत होके रहेगी । कुछ कुछ दिखने भी लगा है आजकल । 
:- संजीव कुमार ।

जाकी रही भावना जैसी , प्रभु मुरत देखी तिन तैसी

इस संसार में भगवान राम भी मनुष्य के जैसा प्राकृत शरीर के धारण करके आए , कृष्ण भी आए, अनेक अवतार हुआ भगवान का नर रूप में ।  

 मूल जगद्गुरू के रूप में वही भगवान श्री कृष्ण आए प्राकृत शरीर धारण करके जीव कल्याण हेतु , अपने अनुग्रहित श्रद्धावान मनुष्य का उद्धार करने हेतु । अनेकों जीवों का कल्याण हुआ , वो इस संसार के आवागमन से छुट गए । और आज भी श्रद्धालु जीवो का कल्याण लगातार हो रहा है अंदर ही अंदर । आज भी अपने गुरू के कृपा से अनन्य शिष्यों के आंतरिक स्वरूप में परिवर्तन हो रहा है , अनेकों का अंत:करण शुद्ध हो रहा है तथा लक्ष्य कि प्राप्ति भी गुप्त रूप से निरंतर हो रहा है अंदर ही अंदर , जिसको वो शिष्य हीं समझता है तथा गुरूदेव एवं ईष्ट जानते हैं किसका अंत:करण कितना शुद्ध हुआ है , कितना लाभ हुआ है ? बाहरी मनुष्य भला क्या समझेगा ? वो तो बेचारा स्वयं के हाल के जैसा हीं दुसरे को समझेगा । जैसा उसका चश्मा है, जैसा उसका अंत:करण है वैसा ही उसे दुसरा भी दिखाई देता है । क्या समझेगा बेचारा वो ? ऐसे लोग दया के पात्र हैं । 

इसलिए तुलसीदास ने लिखा है रामचरितमानस में :- " जाकी रही भावना जैसी , प्रभु मुरत देखी तिन तैसी "

अरे भगवान तथा वास्तविक महापुरूष को कोई जीव उनके कृपा के बिना कैसे समझ सकता है भला , बेचारे कृपा का पात्र ही नहीं है ? 

राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई।।
जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।। 

जब भगवान गुरू बन कर आए तो उस समय भी बहुत श्रद्धालु भावुक जीव उनको भगवान माना , तत्वदर्शी उस परमतत्व को पहचाना , उनके प्राकृत शरीर के अंदर छुपे दिव्य स्वरूप को देखा , पहचाना और खुले दिल से घोषणा कि ए मनुष्यों ये साक्षात भगवान है धरती पर गुरू रूप में आएं हैं , जो जो जीव अपना कल्याण चाहते हो वो इनको अपना गुरू मानकर इनका दर्शन , सेवा तथा भक्ति कर सकते हैं तथा इनके बतलाए मार्ग का अनुसरण करके भगवान के लोक परम धाम प्राप्त करके इस संसार के आवागमन से मुक्त हो सकते हैं, अपना परम कल्याण कर सकते हो । 

लेकिन जो मनुष्य अपने क्षूद्र ज्ञान के पराकाष्ठा पर थे और आज भी है वो सभी उनको साधारण मनुष्य ही समझा । आज भी ऐसे क्षूद्र मनुष्यों कि कमी नहीं है इस संसार में , वल्कि ऐसे नीच लोगों कि संख्या अधिक है आजकल । 

तुलसीदास जी ने ऐसे लोगो के लिए कहा है :- 
"जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ। 
सो कृतघ्न मंदमति आत्माहन गति जाइ॥"

तुलसीदास जी के इस चौपाई का भावार्थ इस प्रकार है :- वे कहते है कि ऐसे क्षूद्र लोगों को उसके हाल पर छोड़ देना हीं उत्तम है , ऐसे श्रद्धाहीन लोगों का मुंह कभी नहीं लगना चाहिए और न ऐसे जीवों के साथ बहस करना चाहिए कभी । ऐसे अधम दुराचारी आत्महंता जीव के किसी भी बात का कोई उत्तर कभी नहीं देना चाहिए। और सबसे विशेष बात कि ऐसे बेचारे लोगों के साथ न कोई दुर्भावना रखना चाहिए और न राग , न द्वेष। ऐसे लोगो से विल्कूल उदासीन रहना चाहिए । 

हमारे ईष्ट भगवान श्री कृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय के चालिसवे श्लोक में स्पष्ट कहा :- 

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।4.40।। गीता ।
 
इस श्लोक का भावार्थ इस प्रकार है :- 
इस संसार में तीन प्रकार का मनुष्य है , एक वो जो अज्ञ है यानि महान मुर्ख है, चपाट है ,‌नास्तिक है जो भगवान उगवान नहीं मानता , वो स्वयं को ही भगवान मानता है । 

दुसरा वो जो किसी तत्वदर्शी के द्वारा बताए जाने पर भी , सब सुनने समझने के बाद भी श्रद्धाहीन है, अविश्वासी है ।उसका मन मानने के लिए तैयार नहीं । 

तीसरा वो जो तत्वज्ञान सुनने समझने के बाबजूद कभी तो मानता है पर कभी नहीं मानता , उपर के दो प्रकार के लोगों के बातों में आकर , प्रभाव में आकर उसका विश्वास डगमगाते रहता है , ऐसे लोगों का ढुलमुल रवैया होता है , विल्कूल शंकालु प्रवृति । 

तो इस तीनों प्रकार के मनुष्य के बारे में भगवान कहते हैं इसी श्लोक के दुसरे पंक्ति में कि ऐसे संशयात्मा को न तो इस लोक यानि इस संसार में कभी सुख और आनंद नसीब हो सकता है और न कभी परलोक में । यानि स्वर्ग के सुख कि तो ऐसा नीच मनुष्य , शंकालु मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता है । तो ऐसे जीवों का क्या हर्ष होता है ? तो ऐसे मनुष्य का पतन हो जाता है करोड़ो कल्पों तक के लिए , और पतन भी ऐसा वैसा नहीं ! ऐसे मनुष्य को अगले अरबों जन्म तक तिर्यक योनियों यानि कुत्ता बिल्ली , नाली का कीड़ा मकोड़ा आदि योनियों में भगवान के द्वारा भेज दिया जाता है । यह भगवान श्री कृष्ण द्वारा गीता में इस श्लोक के माध्यम से खुल्लमखुल्ला उद्घोष है । श्री राधे :- संजीव कुमार।

ईष्ट और गुरू कि कृपा तथा गुरू द्वारा बतलाई साधना करने का परिणाम क्या है , लक्षण क्या हैं फल क्या है ?

ईष्ट और गुरू कि कृपा तथा गुरू द्वारा बतलाई साधना करने का परिणाम क्या है , लक्षण क्या हैं फल क्या है ? 

साधना और गुरू कृपा का परिणाम निम्नलिखित है :- 
1. पहला लक्षण या फल - शास्त्रों का सही सही ज्ञान तथा शास्त्र युक्ति में निपुणता । (यानि तत्वज्ञान पक्का होना तथा तत्वज्ञान का व्यवहारिक उपयोग ) .

2.दुसरा फल - साधक के मन में संसार से Detachment and attachment with GOD and GURU . संसार से वैराग्य तथा हरि गुरू से प्रेम कि उत्तरोत्तर बृद्धि। 
अंत:करण कि शुद्धि जिससे जीवन में संतोष , शांति,भगवद् आनंद का उत्तरोत्तर बृद्धि। 

3. तीसरा - साधक के अंदर सद्गुणों यानि दैविक गुणों का विकास । 

4.चौथा - निम्नलिखित पंचक्लेशों यानि पांचों प्रकार के विपत्तियों का क्रमिक शमन यानि लगातार नाश :- 

A) पहला पंचक्लेश - अविधा माया से मुक्ति यानि साधक के अंदर स्वाभाविक दिव्य ज्ञान कि उत्पत्ति तथा अज्ञानता रूपी अंधकार का नाश एवं विवेक का जागरण । 

B) दुसरा - अस्मिता यानि अहंकार तथा देहाभिमान का स्वाभाविक नाश , तृण से बढ़ कर दीनता तथा वृक्ष से बढ़ कर सहनशिलता यानि सहिष्णुता, नम्रता- विनम्रता आदि गुणों कि उत्पत्ति ।   

C) तीसरा - राग यानि किसी भी मायाबद्ध जीवों से अटैचमेंट यानि आसक्ति का नाश एवं केवल हरि गुरू से राग यानि केवल उनके प्रति ही हृदय में प्रेम कि उत्त्पति। 

D ) चौथा - द्वेष यानि दुसरे किसी भी मायाबद्ध व्यक्ति, विषय तथा वस्तु से घृणा के भाव का आभाव तथा संसार के प्रत्येक जीवों में हमारे ही ईंष्ट विद्यमान है इसका हर क्षण एहसास, अनुभूति। मन में अच्छे विचारों कि स्वाभाविक उत्पत्ति। मन के अंदर सर्वजन हिताय तथा सर्वजन सुखाए भाव कि उत्पत्ति बिना भेद भाव के । 

E) पांचवा- अभिनिवेश यानि मृत्यु के भय से मुक्ति। जीवन में निर्भयता , निश्चिंतता, निडरता का समावेश एवं उदंडता , उद्विग्नता, बेचैनी‌ आदि के भाव कि समाप्ति। संसार का कोई भी सामान मेरा नहीं है , यह नष्ट होने वाला है । समाप्त होने वाला है । यह देह भी अल्प समय के लिए मुझे भगवान के कृपा से मिला है ताकि मैं अपने भगवद् संबंधित लक्ष्य को हासिल कर सकूं । 

तथा इस भाव कि उत्पत्ति एवं अनुभूति कि हरि गुरू हर क्षण हमारे साथ है , मैं एक दिव्य आत्मा हूं , मैं देह नहीं हूं । मैं भी अनादि हूं , शाश्वत हूं , सनातन हूं , अविनाशी हूं , दिव्य हूं , क्योंकि मैं उस दिव्य , अनंत, अनादि , अविनाशी, सर्वसमर्थ, सर्वभूत , सर्वांतर्यामी , सर्वसुहृत, सर्वशक्तिमान, सर्वसुंदर, सर्वगुणों का खान, सत् चित् आनंदकंद भगवान श्री कृष्ण का सनातन अंश हूं । वो मेरे अंशी हैं , वो मेरे सर्वस्व हैं । मेरा सभी रिश्ता नाता केवल उन्हीं से है । हम उनके दास हैं , हम उनके पुत्र हैं , उनके दैविक संपत्ति पर मेरा अधिकार है जिसे देने के लिए वो मुझे अनुग्रहित करने लगे हैं । 

अत: मैं नश्वर , विनाशी , प्रतिक्षण घटने वाला , मिटने वाला , कम होने वाला , समाप्त होने वाले वस्तु , विषय तथा मायाबद्ध जीव से एवं इस संसार से आसक्ति क्यों रखूं ? 
मायाबद्ध विषय वस्तु तथा जीव से आसक्ति रखना ही मेरे दुख का एक मात्र कारण है । 

अत : साधना के फलस्वरूप जब ऐसे भावों का स्वाभाविक जागरण , उदय , उत्त्पति जीव के अंत:करण में होने लगे एवं हरि गुरू के लिए प्रेम का अनुभूति होने लगे तो समझना चाहिए कि हम ठीक ठीक रास्ते पर है, हमारी साधना ठीक चल रही है एवं मेरे उपर मेरे गुरू एवं मेरे एक मात्र ईष्ट श्री राधाकृष्ण कि अपार कृपा बरसने लगी है :- 
संजीव कुमार ।

"जिंदगी भर बस हम एक ही गलती करते रहे , धुल हमारे चेहरे पर थी और हम आइना साफ करते रहे । "

"जिंदगी भर बस हम एक ही गलती करते रहे , 
धुल हमारे चेहरे पर थी और हम आइना साफ करते रहे । " 

हम सभी मायाबद्ध जीव किसी भी दुसरे जीव के अंत:करण का हाल, सच्चाई नहीं जान सकते ठीक तरह से , क्योंकि हम अंतर्यामी नहीं है । 

हम मायाबद्ध जीव केवल अपने दृष्टिकोण से ही दुसरे के बात व्यवहार आदि का आकलन करके अक्सर अपना जजमेंट दे देते हैं जो जरूरी नहीं कि सही हो । जैसा हमारे स्वयं का व्यक्तित्व होता है , अंत:करण होता है , दृष्टिकोण होता है नजरिया होता है वैसा ही हम दुसरे के बारे में आइडिया लगा लेते हैं, जो सबसे बड़ा दोष है हममें । 

हो सकता है दुसरा सही हो सहज रूप से  , इसलिए अगर किसी भी दुसरे व्यक्ति या वस्तु या बिषय में अगर हमें कोई भी पोजिटिव बात नज़र आए तो,  तो हमें पोजीटिव सोच रख कर पौजिटिव आइडिया ही लगाना चाहिए उसके प्रति, न कि prejudice के कारण हम गलत अनुमान लगा कर अपने गलत दृष्टिकोण से गलत निर्णय किसी के बारे में दे दे। हमें जल्दबाजी में किसी दुसरे के लिए जजमेंटल होने से बचना चाहिए। ऐसा बुद्धिमान तथा वास्तविक रूप से पढ़े-लिखे लोगों का पहला लक्षण व निशानी है । 

भगवद् कृपा से , साधना से, अच्छी शिक्षा एवं माता पिता द्वारा दिए गए अच्छे संस्कारों का जब मनुष्य में उदय होता है, तत्पश्चात् जैसे जैसे हमारे खूद का अंत:करण शुद्ध होता है वैसे वैसे हमारा दृष्टिकोण, नजरिया, सोच पौजिटीव होने लगता है, हम किसी दूसरे व्यक्ति तथा वस्तु के बारे में सही सही आईडिया बनाने लगते हैं । बस यही प्रमाण है अंत:करण शुद्धि का , अच्छी शिक्षा तथा अच्छे संस्कारों का । 

हर दुसरे व्यक्ति में जो हमें दोष नजर आता है वो दरअसल हमारे अपने ही चरित्र का चित्रण होता है । भ्रम के कारण  हम अपने अंदर के ही दोष का रिफ्लेक्शन पाते हैं लेकिन हम समझते हैं कि यह दोष दुसरे में है , मेरे में नहीं और हम बहुत साफ सुथरा मनुष्य है । ऐसा हम सभी मायाबद्ध  मनुष्य का वास्तविक हाल है । 

इसलिए एक शेर प्रस्तुत है:- 
जिंदगी भर बस हम एक ही गलती करते रहे , 
धुल हमारे चेहरे पर थी और हम आइना साफ करते रहे । 
श्री राधे :- संजीव कुमार।

दो शब्द हमारे देश के युवाओं से , बच्चों से

दो शब्द हमारे देश के युवाओं से , बच्चों से :- 

पैसे के पीछे हमे नही भागना चाहिए | हमें स्वयं में मानवता के गुणों के विकास पर जोर देना चाहिए | जब गुण विकसित होंगे , तब पैसा हमारे पीछे भागेगी | अगर हम पैसे के पिछे भागेंगें तो पैसा हमसे दुर भागेगी | यह नियम है संसार का । 
 हमे केवल अपने सर्किल औफ इंफुलेंस पर ध्यान देना चाहिए , सर्किल औफ कंसंर्न तो कंसंर्न हीं था और रहेगा | 
पहले पता करो की किस उदेश्य के लिए तुम्हारा जन्म हुआ हैं | क्योंकि विना कारण और उदेश्य का एक पत्ता भी पेड़ से नही गिरता हैं | फिर तुम तो ईश्वर की सर्वश्रेष्ट रचना हो | 
हम क्या अच्छा काम करते हैं यह जरुरी है | हम बदले में क्या पाते हैं यह जरुरी नही | हम क्या समाज को राष्ट्र को देते है यह आवश्यक है | समाज हमे क्या देता है | गाली या सम्मान यह महत्वपूर्ण नही | 
सारे अच्छे काम करो और प्रभु को समर्पित कर दो , क्रेडिट अपने को नही प्रभु को दो , गुरु को दो , कहो हर रात में सोते समय की हे गुरु देव जो भी मैने अच्छा काम किया वो आपकी मेहरवानी से किया | और जो भी बुरा किया मेरी नादानी थी | आप हमें इतनी शक्ति दिजिए की कल कोई बुरा काम हमसे ना हों |
समय की धारा में अपने आपको मत बहाओ , वल्कि समय का भरपुर उपयोग करो , दुरुप्योग नही | 
भगवान ने केवल एक चीज ही सबको समान रुप से दी है वो है समय , भगवान ने 24 घण्टे सब को बराबर दिया है | इसका जो भी जितना सदुप्योग किया है वह सफल हैं | 
उपलब्धि कुछ हांसिल करने में नही हैं | उपलब्धि प्राप्त कर बांटने में हैं | अपने लिय तो हर जीव जी लेता हैं पर दुसरो के लिए जीना हीं सच्ची उपलब्धि हैं | संतोष तब मिलेगा | और जब संतोष मिलेगा तब जीवन सार्थक होगा | 
दुसरे को दिखाने के लिय मत करो | हमको करना है बस इसलिये करों |
 किसी की आलोचना मत करो , आलोचना करने का अधिकार सिर्फ उसी को है जो पूर्णत: निर्दोष और ज्ञानवान हो | आलोचक बनने से पहले योग्य बनों । आलोचित या आलोच्य से ऊपर उठो और उपर पहुंचो ज्ञान में , बुद्धि में, विवेक में , यश में , प्रतिष्ठा में , पद में , और धर्म कर्म में । 
चरित्रवान बनने पर जोर दो | 
अपने जन्म के उदेश्य को जिस क्षण समझ जाओगे आधी सफलता तुम्हे मिल जाऐगी | बाकीं तुम कर्म करके सफल हो जाओगे |
परिक्षा में मार्क्स लाने के लिए मत पढ़ो , मुझे अच्छी तरह रुची से पढना है इसलिए पढों , मार्क्स तो आउट कम है | वो तो अच्छा आएगा ही | :- तुम्हारा संजीव कुमार 

Don't go behind money . Develop your quality, than money will automatically follow you . If you will run behind the money than money will be always far from you. And use your money for humanity . Don't misuse your money . Otherwise one day you will be in trouble. 
Always focus on your circle of influence don't go behind circle of concern .  
Select your careers as per your choice because every youth is made for some deeds . Always trust on yourself than other will trust on you . Be with truth always.
 . You will get sustainable success . No body will brake your record. :- Your sanjeev