"जिंदगी भर बस हम एक ही गलती करते रहे ,
धुल हमारे चेहरे पर थी और हम आइना साफ करते रहे । "
हम सभी मायाबद्ध जीव किसी भी दुसरे जीव के अंत:करण का हाल, सच्चाई नहीं जान सकते ठीक तरह से , क्योंकि हम अंतर्यामी नहीं है ।
हम मायाबद्ध जीव केवल अपने दृष्टिकोण से ही दुसरे के बात व्यवहार आदि का आकलन करके अक्सर अपना जजमेंट दे देते हैं जो जरूरी नहीं कि सही हो । जैसा हमारे स्वयं का व्यक्तित्व होता है , अंत:करण होता है , दृष्टिकोण होता है नजरिया होता है वैसा ही हम दुसरे के बारे में आइडिया लगा लेते हैं, जो सबसे बड़ा दोष है हममें ।
हो सकता है दुसरा सही हो सहज रूप से , इसलिए अगर किसी भी दुसरे व्यक्ति या वस्तु या बिषय में अगर हमें कोई भी पोजिटिव बात नज़र आए तो, तो हमें पोजीटिव सोच रख कर पौजिटिव आइडिया ही लगाना चाहिए उसके प्रति, न कि prejudice के कारण हम गलत अनुमान लगा कर अपने गलत दृष्टिकोण से गलत निर्णय किसी के बारे में दे दे। हमें जल्दबाजी में किसी दुसरे के लिए जजमेंटल होने से बचना चाहिए। ऐसा बुद्धिमान तथा वास्तविक रूप से पढ़े-लिखे लोगों का पहला लक्षण व निशानी है ।
भगवद् कृपा से , साधना से, अच्छी शिक्षा एवं माता पिता द्वारा दिए गए अच्छे संस्कारों का जब मनुष्य में उदय होता है, तत्पश्चात् जैसे जैसे हमारे खूद का अंत:करण शुद्ध होता है वैसे वैसे हमारा दृष्टिकोण, नजरिया, सोच पौजिटीव होने लगता है, हम किसी दूसरे व्यक्ति तथा वस्तु के बारे में सही सही आईडिया बनाने लगते हैं । बस यही प्रमाण है अंत:करण शुद्धि का , अच्छी शिक्षा तथा अच्छे संस्कारों का ।
हर दुसरे व्यक्ति में जो हमें दोष नजर आता है वो दरअसल हमारे अपने ही चरित्र का चित्रण होता है । भ्रम के कारण हम अपने अंदर के ही दोष का रिफ्लेक्शन पाते हैं लेकिन हम समझते हैं कि यह दोष दुसरे में है , मेरे में नहीं और हम बहुत साफ सुथरा मनुष्य है । ऐसा हम सभी मायाबद्ध मनुष्य का वास्तविक हाल है ।
इसलिए एक शेर प्रस्तुत है:-
जिंदगी भर बस हम एक ही गलती करते रहे ,
धुल हमारे चेहरे पर थी और हम आइना साफ करते रहे ।
श्री राधे :- संजीव कुमार।
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