Wednesday, 30 December 2020

जिन्दगी क्या है ? जन्म से मृत्यु तक का सफर जिन्दगी है , जिन्दगी साधन है साध्य नहीं ! साधन है हरि का दिव्य प्रेम पाने के लिय |

जिन्दगी क्या है ? जन्म से मृत्यु तक का सफर जिन्दगी है , जिन्दगी साधन है साध्य नहीं ! साधन है हरि का दिव्य प्रेम पाने के लिय | पर 
हम मनुष्यों ने कुछ पाया कहां , सिर्फ खोया है | या युँ कहें कि हमने सिर्फ उन्हीं चीजों को प्राप्त करने का प्रयास किया या कर रहे है जो खो जाए | हमने अपनी प्रभु प्रदत् सारी शक्ति , मानव तन , मन , धन उन्हीं चीजों को प्राप्त करने में , हांसिल करने में लगा दी, जो हम खो दें , क्योंकि हम हमेशा नश्वर चीजों के पीछे भागते रहे तमाम उम्र | 
तन का स्वरुप बदलता रहा , हम पाते और खोते रहे |
सारी उम्र पाते और खोते रहे , चलनी में पानी भरते रहे , और हम अपने को बहुत समझदार समझते रहे | अन्त मे हाथ लगा सिर्फ शुन्य |

जन्म हुआ , मानव जीवन मिला , शिशु रुप में मां के गर्भ से संसार में आय, 
वाल्यावस्था मिली तो शैशवता खो दी , थोड़ा बड़े हुए तो युवावस्था आया , और जब युवावस्था आया तो बचपना खो दी , फिर प्रौढ़ावस्था आया तो युवावस्था खो दी , और जब बुढ़ापा आया तो प्रौढावस्था खो दी | और अन्त में मृत्यु आई तो जिन्दगी खो दी | 

अनमोल मानव जीवन ऐसे खोया जैसै मिट्टी का खिलौना |
हम हमेशा नश्वर को पाते रहे खोते रहे ! और एक दिन काल का ग्रास बनते रहे | 
भगवान् ने करुणाकर मानव तन दिया , साश्वत सत्य , सत् चित् आनंद को पाने के लिए , श्री हरि को पाने के लिए , उनके कभी न खोने बाले दिव्य प्रेम को पाने के लिय , खुद गुरु रुप में आए , रास्ता दिखाया , हमे चिल्ला चिल्लाकर चेताया ! हमारे लिए तमाम तरह के कष्ठ उठाए , पर हमने ठान लिया है कि हम नही मानेगें | 
कितना आश्चर्य है यह ? ये हमारी विडम्वना नही हमारी बदमाशी है |
इसलिय अब भी वक्त है | ठहरो , सोंचों , समझो , जानो , मानो , साधना करो और वो प्राप्त करो जो गुरु तुम्हे देना चाहता है | गुरु तुम्हे देना चाहता है वो अनमोल दिव्य प्रेम जो तुम पाकर कभी नही खोओगे | आगे तुम्हारी मरजी |
:- मां के प्रवचन से

Tuesday, 22 December 2020

पहले पुर्ण रूप से हरिगुरू पर श्रद्धा और विस्वास करो फिर मेरा प्रचार करो । मैं और मेरा संत एक हैं, भक्त (संत) और भगवान एक हैं ।

पहले पुर्ण रूप से हरिगुरू पर श्रद्धा और विस्वास करो 
फिर मेरा प्रचार करो । 
मैं और मेरा संत एक हैं, भक्त (संत) और भगवान एक हैं ।
मेरे निज-जनों का सम्मान करो , फिर मेरा प्रचार करो ।।

नवधा भक्ति भावयुक्त हो हर क्षण मेरा ध्यान करो, 
छल कपट व्यवहार रहित हो मेरे संतों का गुणगान करो,
प्रत्येक जीव में, खड़ग खंभ में मेरा हीं तुम भान करो,
निष्कामभाव से गुरू की सेवा करके मुझको प्राप्त करो,
मैं जगत , जगत मुझमें हैं , ऐसा तुम विश्वास करो ,
कण कण में वास मेरा है इसका तुम एहसास करो ,
पुर्ण समर्पण भावयुक्त हो,  फिर मेरा प्रचार करो ।।

योगक्षेम मैं वहन करूंगा,  गुरू चरणों का ध्यान करो ,
श्रद्धा भक्ति भाव युक्त हो  हरि गुरू का प्रचार करो ।।
:- तुम्हारा कृष्ण ।

वातावरण का प्रभाव हमारे गुरुदेव ने बहुत सुन्दर एक बात कही है, जिसमें उन्होंने वातावरण का हमारे मन पर क्या प्रभाव पड़ता है, उसकी चर्चा की है |- पूज्यनियां मां

वातावरण का प्रभाव 
हमारे गुरुदेव ने  बहुत सुन्दर एक बात कही है, जिसमें उन्होंने वातावरण का हमारे मन पर क्या प्रभाव पड़ता है, उसकी चर्चा की है |

"दिन में कई बार ऐसा होता है कि आपको जैसा भी वातावरण मिलता है ,वैसे ही आपकी मनोवृत्तियाँ भी बदलती जाती हैं। कभी तो ये विचार होता है कि अरे! पता नहीं कब टिकट कट जाये,शीघ्र से शीघ्र कुछ साधना कर लेनी चाहिए। संसार तो अपने आप छोड़ देगा नहीं, फिर संसार ने पकड़ भी तो नहीं रखा है, मैं स्वयं ही जाकर उसमें पिस रहा हूँ।

कभी यह विचार उत्पन्न होता है ,अरे! कर लेंगे, जल्दी क्या है, समय बहुत पड़ा है, ऐसी भी क्या जल्दी है। फिर अभी अमुक-अमुक संसार का काम (ड्यूटि ) भी तो करना है। रात तक कर लेंगे.....कल कर लेंगे। इत्यादि। कभी-कभी यह विचार पैदा होता है 'अरे यार! खाओ,पियो,मौज उड़ाओ,चार दिन की जिंदगी है ,आगे किसने देखा है क्या होगा भगवान वगवान तो बिगड़े हुए दिमाग की उपज है'। पता नहीं वह मौज उड़ाने का क्या अर्थ समझता है। अरे मौज तो महापुरुष भी चाहता है।

अस्तु, यह सब अंतरंग गुण-वृत्त्यिओ का दैनिक परिवर्तनशील अनुभव है जिसे आप भली-भाँति समझते हैं। अब यह देखिये कि उपर्युक्त रीति से अपनी ही मनोवृत्तियाँ कैसे बदल जाती हैं। किसी क्षण में मान लीजिये कि आपकी मनोवृत्ति यह हुई कि मैं चलूँ कुछ साधना कर लूँ । इतने में ही रजोगुण या तमोगुण आदि का वातावरण विशेष मिल गया ,अर्थात स्त्री पुत्रादि का आसक्ति वर्धक कुछ विषय मिल गया तो हमारी मनोवृत्ति उन गुणों के वातावरण को पाकर फिर बदल गयी एवं हम तत्क्षण साधना से च्युत हो गये। "

भावार्थ यह कि हमारी मनोवृति तीन गुणों के आधीन है, उसपर से जैसा वातावरण मिल जाता है, मन का चिंतन वैसा ही होने लगता है | संग का बहुत गहरा प्रभाव हमारी चितवृत्ति पर पड़ता है | इसीलिए कहा जाता है कि जैसा करोगे संग, वैसा चढ़ेगा रंग ||

श्रद्धा व विश्वास से प्रभुप्राप्ति।

श्रद्धा व विश्वास से प्रभुप्राप्ति
प्राचीन काल की एक घटना हैः

 एक बार एक किशोर ग्वाला अपनी गायों को चराने के लिए नदी के किनारे-किनारे उस जंगल में ले गया जहाँ हरी-भरी घास उगी थी। नदी के तट पर बरगद का एक विशाल वृक्ष था, जिसकी घनी एवं शीतल छाया में अनेक राहगीर अपनी थकान मिटाते थे। ग्वाला भी अपने गायों को चरने के लिए जंगल में छोड़कर उस वृक्ष की शीतल छाया में आराम करने के लिए बैठ गया।

 मध्याह्न के समय उसने देखा कि एक साधुबाबा कहीं से आये और उन्होंने नदी में स्नान किया। इसके बाद वे उस विशाल वटवृक्ष की शीतल छाया में आसन बिछाकर बैठ गये। फिर उन्होंने दोनों आँखें बंद करके, नाक दबाकर कुछ क्रियाएँ कीं। वह ग्वाला साधुबाबा के इन क्रियाकलापों को ध्यानपूर्वक देखता रहा। जब संध्या-वंदन करके वे वहाँ से जाने की तैयारी करने लगे, तब उस ग्वाले ने बाबा के पास जाकर इन यौगिक क्रियाओं के विषय में पूछा।

 उन्होंने कहाः "ऐसा करके मैं भगवान से बातें कर रहा था।"

 ग्वालाः "क्या ऐसा करने से भगवान सचमुच में आते हैं और बातें करते हैं ?"

 सिर हिलाकर ग्वाले के प्रश्न का उत्तर 'हाँ' में देते हुए बाबा आगे बढ़ गये। उनकी इतनी ऊँची स्थिति नहीं थी के वे भगवान से बातें कर सकें परंतु उन्होंने उस भोले-भाले ग्वाले को प्रोत्साहन देने के लिए ऐसा कह दिया।

 जब साधु वहाँ से चले गये, तब ग्वाला भी वैसी ही क्रियाएँ करने लगा परंतु उसको भगवान का कुछ पता नहीं चला। फिर भी वह दृढ़ निश्चय करके बैठ गया कि 'बस, आज भगवान के दर्शन करने ही हैं।' उसने सोचा कि 'वे साधु भगवान से बातें कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकता !'
तब ग्वाले ने पुनः अपनी दोनों आँखें बंद कर लें और नाक को जोर-से दबा लिया। ऐसा करने से उसकी हृदयगती धीमी पड़ गयी तथा प्राण निकलने की नौबत आ गयी।

 इधर भगवान शंकर का आसन डोलने लगा। उन्होंने ध्यान में देखा कि किशोर ग्वाला भगवान से बातें करने के लिए हठपूर्वक आँखें बंद करके व नाक दबाकर बैठा है।

 उस अबोध व निर्दोष ग्वाले को अकाल मृत्यु के मुँह में जाते देख भगवान शंकर उसके सामने प्रकट हो गये। भगवान ने ग्वाले से कहाः "वत्स !आँखें खोलो, मैं आ गया हूँ। मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ।"

 ग्वाले ने आँखें बंद रखते हुए इशारे से पूछा कि 'आप कौन हैं ?'

 भगवानः "मैं वही भगवान हूँ जिसके लिए तुम आँखें बंद करके नाक दबाये बैठे हो।"

 ग्वाले ने झट-से आँखें खोलीं और श्वास लेना शुरू किया परंतु उसने कभी भगवान को देखा तो था नहीं। अतः वह कैसे पहचानता कि ये ही सचमुच में भगवान हैं। उसने भगवान को पेड़ के साथ रस्सी से बाँध दिया और साधु को बुलाने के लिए दौड़ता हुआ गया। साधु अभी थोड़ी ही दूर पहुँचे थे, उन्हें रोककर ग्वाले ने सारी घटना कह सुनायी। साधु झटपट वहाँ पहुँचे परंतु जिनके जीवन में झूठ-कपट होता है, विश्वास की कमी होती है, साधन-भजन तो करते हैं परंतु दृढ़ निश्चय एवं प्रेम से नहीं करते उनको भगवान क्यों दिखेंगे ! साधु को भगवान नजर ही नहीं आ रहे थे जबकि ग्वाले को स्पष्ट दिखायी दे रहे थे।

 साधु ने कहा "मुझे तो कुछ नजर नहीं आ रहा है।"

 तब ग्वाले ने इसका कारण भगवान से पूछा। भगवान ने कहाः "यंत्र की नाईं कोई हजार वर्ष भी जप-तप करे फिर भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकता, परंतुत जो श्रद्धा, प्रीति और सच्चाईपूर्वक क्षण भर के लिए भी मुझे भजता है, मैं उसे शीघ्र दर्शन देता हूँ।"

 भगवान ग्वाले से जो कह रहे थे वह साधु को भी सुनायी दे रहा था। उनकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे। वे फूट-फूटकर रोने लगे। इससे द्रवित होकर ग्वाले ने भगवान से उन्हें माफ करने के लिए प्रार्थना की।
ग्वाले की श्रद्धा भाव से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने साधुबाबा को माफ कर दिया और उन्हें भी दर्शन दिये। फिर दोनों को आशीर्वाद देकर वे अंतर्धान हो गये।

 

आप उस ग्वाले की तरह नाक दबाकर हठ करें इसलिए यह कथा नहीं कही गयी है, बल्कि अपने मन को समझायें कि यदि एक अनपढ़ ग्वाला साधारण साधु की देखा-देखी ही सही, विश्वासपूर्वक प्रभु को पुकारता है और उसे प्रभु के दर्शन हो जाते हैं तो फिर यदि कोई व्यक्ति सच्चे उच्चकोटि के महापुरुष, ईश्वर को पाये हुए ब्रह्मवेत्ता सदगुरू की आज्ञानुसार साधना करे तो उसे प्रभुप्राप्ति में देर कितनी !

 
साधना में अति आवश्यक है अपने हरि गुरु पर अटूट श्रद्धा विश्वास रखना। इसको साधना का प्राण कहा गया है। इसके अभाव में संदेह छाया रहता है। विश्वास अपने-आप में एक शक्ति है। विश्वास द्वारा उत्पन्न ऊर्जा अनेक विपदाओं में सफलता दिलाती है। इस अवलम्बन को मजबूती से पकड़े रहने वाले आशावादी साधनों के अभाव में भी ऊँचे उठते, आगे बढ़ते देखे गये हैं। रामायण के प्रणेता महर्षि वाल्मीकि जी ने श्रद्धा और विश्वास को 'भवानी-शंकर' की उपमा दी है। साधना में विशेषरूप से इस तथ्य को समझा जाना चाहिए कि विश्वासी को साधना में सहज सफलता प्राप्त करते देखा गया है, जबकि अविश्वासी को हमेशा असफल होते देखा गया है।

Sunday, 13 December 2020

दो शब्द हमारे युवाओं से , बच्चों से :-

दो शब्द हमारे युवाओं से , बच्चों से :- 

पैसे के पीछे हमे नही भागना चाहिए | हमें अपने में मानवता के गुण के विकास पर जोर देना चाहिए | तब पैसा हमारे पीछे भागेगी | अगर हम पैसे के पिछे भागेंगें तो पैसा हमसे दुर भागेगी | हमे केवल अपने सर्किल औफ इंफुलेंस पर ध्यान देना चाहिए , सर्किल औफ कंसंर्न तो कंसंर्न हीं था और रहेगा | 
पहले पता करो की किस उदेश्य के लिए तुम्हारा जन्म हुआ हैं | क्योंकि विना कारण और उदेश्य का एक पत्ता भी पेड़ से नही गिरता हैं | फिर तुम तो ईश्वर की सर्व श्रेष्ट रचना हो | हम क्या अच्छा काम करते हैं यह जरुरी है | हम बदले में क्या पाते हैं यह जरुरी नही | हम क्या समाज को राष्ट्र को देते है यह आवश्यक है | समाज हमे क्या देता है | गाली या सम्मान यह महत्वपूर्ण नही | 
सारे अच्छे काम करो और प्रभु को समर्पित कर दो , क्रेडिट अपने को नही प्रभु को दो , गुरु को दो , कहो हर रात में सोते समय की हे गुरु देव जो भी मैने अच्छा काम किया वो आपकी मेहरवानी से किया | और जो भी बुरा किया मेरी नादानी थी | आप हमें इतनी शक्ति दिजिए की कल कोई बुरा काम हमसे ना हों |
समय की धारा में अपने आपको मत बहाओ , वल्कि समय का भरपुर उपयोग करो , दुरुप्योग नही | 
भगवान ने केवल एक चीज ही सबको समान रुप से दी है वो है समय , भगवान ने २४ घण्टे सब को बराबर दिया है | इसका जो भी जितना सदुप्योग किया है वह सफल हैं | 
उपलब्धि कुछ हांसिल करने में नही हैं | उपलब्धि प्राप्त कर बांटने में हैं | अपने लिय तो हर जीव जी लेता हैं पर दुसरो के लिए जीना हीं सच्ची उपलब्धि हैं | संतोष तब मिलेगा | और जब संतोष मिलेगा तब जीवन सार्थक होगा | 
दुसरे को दिखाने के लिय मत करो | हमको करना है बस इसलिये करों |
 किसी की आलोचना मत करो , आलोचना करने का अधिकार सिर्फ उसी को है जो पूर्णत: निरदोष और ज्ञानवान हो | 
चरित्रवान बनने पर जोर दो | 
अपने जन्म के उदेश्य को समझ जाओगे आधी सफलता तुम्हे मिल जाऐगी | बाकीं तुम कर्म करके सफल हो जाओगे |
परीक्षा में मार्क्स लाने के लिए मत पढ़ो , मुझे अच्छी तरह रुची से पढना है इसलिए पढों , मार्क्स तो आउट कम है | वो तो अच्छा आएगा ही | 

Don't go behind money . Develop your quality,  than money will automatically follow you . If you will run behind the money than money will be always far from you.  And use your money for humanity . Don't misuse your money .  Otherwise one day you will be in trouble. 
Always focus on your circle of influence don't go behind circle of concern .  
Select your careers as per your choice because every youth is made for some deeds . Always trust on yourself than other will trust on you . Be with truth always.
 .  You will get sustainable success . No body will brake your record.  :- Your sanjeev Kumar .


Saturday, 12 December 2020

सब यहीं पड़ा रह जावेगा, जब छोड चलेगा तन बन्जारा,जब प्राण जावेगा निकल निकल ।

यह धूम धड़क्का साथ लिए, क्यों फिरते हो तुम शहर-शहर,
एक तिनका साथ न जावेगा, बंद हुआ जब अन्न और जल,
घर-बार, अटारी, चौबारे, क्या खासा, तनसुख और मखमल,
क्या चिलमन-पर्दे, फर्श नए, क्या लाल पलंग व रंग महल,
सब शेखी, सब रिस्ते-विस्ते, सब रंजीशे गम व सपने-वपने,
सब यहीं पड़ा रह जावेगा, जब छोड चलेगा तन बन्जारा,
जब प्राण जावेगा निकल निकल ,
भज ले हरिनाम ऐ बंदे ,मत कर अब तू कोई फ़िकर-विकर।।

:- संजीव

प्रेम की परिभाषा आसान नही हैं | संसारिक प्रेम , प्रेम नही स्वार्थ है | इसमे स्वार्थ पुरा नही होने पर द्वेश की संभावना छुपी हैं |

प्रेम की परिभाषा आसान नही हैं | संसारिक प्रेम , प्रेम नही स्वार्थ है | इसमे स्वार्थ पुरा नही होने पर द्वेश की संभावना छुपी हैं | 
पर नि:स्वार्थ प्रेम इतना आसान नहीं तो मुश्किल भी नहीं , पर यह तभी हो सकता है जब हम केवल देना और बस सिर्फ देना सिख जाएँ और केवल देने में ही आनंद महसुस करें |
इसको समझने के लिए एक हिरण और हिरणी की कहानी मां ने अपने प्रवचन में सुनाई थी :-
एक हिरण और हिरणी जगंल में प्यास से कई दिनो से तरप रहे थे | सुखा पड़ा था | नदी नाले तालाब सुख चुके थे | प्यास से दोनों का बुरा हाल हो चला था | दोनों को प्यास के मारे दम निकलने वाला था | इतने में किसी मुसाफिर के द्वारा छोड़े हुए फुटे मटके मे केवल चार धुँट पानी दोनो को एक पेर के नीचे परा मिला | 
परन्तु दोनो ने एक दुसरे को यह कहते हुए दम तोर दिया की पहले तौं पी तो पहले तौ पी ! 
यह है प्रेम | प्रेम में प्रेमी अपने लिये नही सिर्फ प्रेमास्पद के सुख के लिये सोचता है | अपने जान की भी परवाह नही करता | महराज जी हमे ऐसा प्रेम हमे हमारे ईष्ट से करने को कहते है | 
:- हरि बोल

प्रेम की पराकाष्ठा।

प्रेम की पराकाष्ठा - चकोर की कहानी के द्वारा मां ने समझाया था एक वार प्रवचन में :- 
चकोर- चकोर एक बहुत प्यारा पक्षी है ।
कहा जाता है की  चकोर चंद्रकिरणों को पीकर जीवित रहता है (शाङ्‌र्गघरपद्धति, १.२३)। इसीलिये इसे "चंद्रिकाजीवन' और "चंद्रिकापायी' भी कहते हैं। प्रवाद है कि वह चंद्रमा का एकांत प्रेमी है और रात भर उसी को एकटक देखा करता है। अँधेरी रातों में चद्रमा और उसकी किरणों के अभाव में वह अंगारों को चंद्रकिरण समझकर चुगता है। चंद्रमा के प्रति उसकी इस प्रसिद्ध मान्यता के आधार पर कवियों द्वारा प्राचीन काल से, अनन्य प्रेम और निष्ठा के उदाहरण स्वरूप चकोर संबंधी उक्तियाँ बराबर की गई हैं। इसका एक नाम विषदशर्नमृत्युक है जिसका आधार यह विश्वास है कि विषयुक्त खाद्य सामाग्री देखते ही उसकी आँखें लाल हो जाती है और वह मर जाता है। कहते हैं, भोजन की परीक्षा के लिये राजा लोग उसे पालते थे।

तो काम की विषय पर आते हैं | एक वार एक चकोर अपने प्रेमास्पद चन्द्रमा की तरफ अपलक दृष्टि से चांदनी रात में निहार रहा था | 
एक टक !  इतने में एक आकाशिये उल्का पिण्ड चन्द्रमा की ओर से चकोर की तरफ बढ़ चला , चकोर तो ठहरा चन्द्रमा का अनन्य प्रेमी वो फुले नही समाया और भ्रम में पर गया , यह सोंचा की उसका प्रेमास्पद चन्द्रमा ही उसकी ओर उससे मिलने बड़ी वेतावी से आ रहा है | अत: प्रेम में विभोर हो वह भी उस उल्का पिण्ड को चन्द्रमा समझ कर उसकी ओर लपका , परन्तु उल्का पिण्ड की अत्यधिक आग की गर्मी से वह जल कर राख बन कर जगंल की एक पगडण्डी पर गिर चला |
इतने में नारद जी उस पगडण्डी से गुजर रहे थे | अव नारद जी तो खुद भक्ति की पराकाष्ठा हैं वे इस चन्द्रमा के अनन्य प्रेमी को कैसे न पहचानते | नारद जी ने सोंचा की क्युँ न सम्मान के साथ इसके अस्थी अवशेष को गंगा में विशर्जित कर इसको मुक्ति यानी मौक्ष प्रदान कर दिया जाय | अत: उन्होने चकोड़ के इस अस्थी अवशेष को अपने पावन हाथों में बड़ी कोमलता से उठाया और बढ़ चले गंगा की ओर , इतने में चकोर के अस्थी अवशेष से आवाज आई ' हे परम पुज्य नारद जी आपको मेरा प्रणाम , मैं समझ गया की आप द्रवित हो कर करुणा वस हमे मौक्ष की ओर ले जा रहें हैं | मैं गद्गद हूँ अपने अस्थी को आपके पावन अँजुली में पाकर , परन्तु हे कृपा निधान मेरी एक विनती हैं आपसे , चुँकी मै मौक्ष नही चाहता इसलिये हे करुणा निधान आप मुझे डालना ही है तो कैलास पर्वत पर बैठे हुए भगवान शंकर की जटा पर मुझे डाल दिजिए | 
नारद आश्चर्य में पर कर पुछा , हे प्रेम के पुजारी तुम भगवान शंकर के जटा पर अपने अस्थी अवशेष को क्युँ डलवाना चाहते हो , क्या तुम्हे उनसे प्रेम है ?  चकोर ने रोते हुए कहा नही  " मै भगवान शंकर की तो पुजा करता हूँ परन्तु प्रेम तो मैं चन्द्रमा से ही करता हूँ , भगवान शंकर के मस्तक पर मेरे प्रेमास्पद का निवास है अत: अगर आप दया करके मेरे अस्थी अवशेष को आप भगवान शंकर के जटा पर डाल देगें तो मैं निश्चित हीं अपने प्रेमास्पद को पाकर सदा के लिय कृत कृत हो जाऊँगा | 
नारद जी ने ऐसा हीं किया और कहा जाओ मैं तुमको वर देता हूँ कि तुम्हारा प्रेम इस दुनियाँ मे नि:स्वार्थ प्रेम के लिए जाना जाएगा |  इसी को कहते हैं प्रेम की पराकाष्ठा , ऐसा ही प्रेम हमे अपने हरि से एवं गुरु से करनी होगी - राधे राधे ( संजीव ,)

कैसा तुम्हारा काम है!

मुझको बता ऐ ज्ञानियों 
कैसा तुम्हारा काम है
तुमको किताबों की खुशी 
मेरे लिए गुरु का ज्ञान हैं ||

आशिक जला दे आग में 
सारे किताबों का बरक़
एक नाम श्री कृष्ण का याद कर
यही गुरुवर का पैगाम हैं ||

मुझको तो मारा कुसंग ने 
कहता था आ पढ़ किताब 
घर मेरे उस महबूव की 
हर वक्त ही दिदार है ||

क्युँ तेरा ( ज्ञानियों का) हम सजदा करें 
ईश्क है जिसका इमाम् 
दम भर भुलाना कृष्ण को 
नही प्रेमियों का काम है ||

मुझको बता ऐ ज्ञानियों 
कैसा तुम्हारा काम है? 

:- गोपियों को उधो जब ज्ञान देने आए थे तो ऐसा ही गोपियों का भाव था | 
:- संजीव

Friday, 11 December 2020

दु:ख का असली कारण और निदान ।

बहुत-बहुत महत्त्वपूर्ण , अंत तक पढ़े जरूर :- 
दु:ख दो प्रकार का होता है । एक भावनात्मक यानि मानसिक संताप या रोग ,जो इनटैगिबुल होता है , दुसरा शारीरिक यानि टैंगीबुल ।

 अब शारीरिक दु:ख भी दो प्रकार का होता है , एक साध्यरोगात्मक शारीरिक  दु:ख  और दुसरा असाध्यरोगात्मक शारीरिक  दु:ख  । 
इन दोनों दुखों का कारण शारीरिक पीड़ा है । 
साध्य रोग औषधी से या शल्य चिकित्सा क्रिया से ठीक हो जाता है ।
पर असाध्य शारीरिक रोग खराब प्रारब्ध के कारण होता है । 
यह भोगने के बाद ठीक हो जाता है नहीं तो मृत्यु तक पीड़ा झेलनी होती है ।

साध्य शारीरिक रोग भी मन मस्तिष्क के गड़बड़ी का परिणाम है । 
हमारा भोजन ,  अन्न आहार  ग्रहण हमारे मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालता है । यह हमारे बिचारों को भी प्रभावित करता है । यानी भावनात्मक गड़बड़ी के कारणों में से भोजन के प्रकार का बहुत बड़ा योगदान है ।
भावनात्मक दु:ख हमारे विचारों के विकृति का परिणाम भी है ।और विचारों की विकृति अनावश्यक ईच्छा , अपेक्षा और कुसंगती का फल है । यही राग , द्वेष, घृणा , काम , क्रोध आदि तामसिक प्रवृत्ति का भी जन्मदाता है । दुसरे शब्दों में कहें तो  नकारात्मक संवेदनाओं का स्रोत भी यही है । अतः दु:ख अभाव और प्रभाव का प्रतिफल है ।
अभाव वास्तविक ज्ञान का यानि तत्त्व ज्ञान और भगवद् प्रेम का और प्रभाव कुसंग का  ।  
भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं
माने दैन्यभयम्, बले रिपुभयम्, रूपे जराया भयम् ।
शास्त्रे वादिभयम्, गुणे कलभयम्, काये कृतान्ताद्भयं
सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ॥ 
(Bhartrihari from the Vairagya shatakam)

“If you are attached to wealth you will fear of poverty. If you are attached to sensual enjoyment you will fear of diseases. If you are attached to prestige you will fear of humiliation. If you are attached to the people you will fear of loss of people . If you are attached to the world and your body you will fear of death .
The momemt you become detached, you become fearless.”

अतः भावनात्मक दु:ख सबसे ज्यादा खतरनाक है । यह पहले तो हमारे मन को बिमार बनाता है। फिर बिमार मन हमारे शरीर में भी रोग उत्पन्न कर देता है ।

यानी साफ्टवेयर खड़ाब होने के बाद हार्डवेयर पर भी असर पड़ता है और हार्डवेयर भी खड़ाब हो जाता है ।

अब अगर हम अपने सौफ्टवेयर को यानी मन को ठीक रखेंगें तो स्वाभाविक है हमारा हार्डवेयर यानि हमारा शरीर भी ठीक ठाक रहेगा ।

अब आप कहेगें की एक्सीडेंट के कारण शरीर जख्मी हो जाता है या अपाहिज हो जाता है जिससे शारीरिक कष्ट हो जाता है ।
तो एक्सिडेंट भी हमारे या किसी दुसरे के लापरवाही का परिणाम होता है । या तो हमारा मस्तिष्क गड़बड़ हुआ , हमारा ध्यान भंग हुआ और हमारा एक्सिडेंट हो गया , या किसी दुसरे का ध्यान भंग हुआ या उसके नासमझी से एक्सिडेंट हो गया ।
दोनों अवस्था में मन ही दोषी है । चाहे मेरा या किसी दुसरे का ।

तो साबित हुआ की मन हीं मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के  दु:खों का कारण है ।

अब सवाल उठता है कि क्या अगर हम अपने मन को स्वस्थ व संतुलित रखें तो हमे दुख नहीं होगा ?
तो उत्तर है हां , नहीं होगा ।

और मन को ठीक रखने के लिए सबसे पहले सात्त्विक भोजन, यानि शुद्ध आहार यानि सही सही खान पान , फिर सादा परिधान यानि ठीक ठीक पहनावा  उसके बाद विशुद्ध विहार यानि अच्छे लोगों की संगति, संत महापुरुषों का संग और भजनक्रिया, उसके बाद फिर संतुलित निंद और योग की बहुत आवश्यकता है ।

दुसरा  , भावनात्मक संतुलन के लिए ईश्वर का रूपध्यान , मनन , स्मरण, किर्तन यानि सासंग भक्ति बहुत आवश्यक है ।
सासंग भक्ति हीं मन को काबू में रखने का प्रमुख उपाय है ।
अतः भगवान और गुरू की भक्ति से हीं मनुष्य अपने मन पर विजय प्राप्त कर सकता है अपने बल से कादापी नहीं  ।
दुसरे शब्दों में हरि गुरू की भक्ति वो दुर्लभ औषधी है जिससे हम अपने मन की गुलामी से मुक्त होकर अपने मन को बस में करके इसको हरि गुरू का दास बनाकर अपना जीवन सफल कर सकतें हैं ।

नहीं तो जाहिर है कि जाहिलो की तरह हम भी यही कहते फिरेंगे की हम अपने मर्जी यानि मन का मालिक है , जबकि हमको कहना चाहिए की हम अपने मन का गुलाम है । 

भावनात्मक दुख शारीरिक दुख से ज्यादा खतरनाक होता है । यह हमारे मन को तो दुख देता ही है साथ साथ शरीर को भी पीड़ादायक बना देता है । और इतना हीं नहीं हम दुसरे के भावनात्मक दुख का भी कारण बन जाते हैं । 
अतः हमें भोजन के साथ साथ भजन पर विशेष ध्यान देना चाहिए । साथ साथ शरीर को और दुरूस्त रखने के लिए योग , प्राणायाम का सहारा भी लेना चाहिए । फिर हम साक्षी भाव से मन में उठते हुए नकारात्मक भावना को रीड करके उससे उदासिन और सकारात्मक भावना को अपना कर इसका उपयोग मन को शांत रख कर हरि गुरू में और गहरे रूप से लगाकर अपना लक्ष्य हासिल आसानी से कर सकते हैं ।
फिर रूपध्यान के दरम्यान अलौकिक अनुभव को जल्द प्राप्त करते हुए असली आनंद का आभास पाना शूरू कर सकते हैं ।
जिसका मन बेचैन , असंतुलित होता है उसका न भजन में मन लगता है और न सात्विक भोजन में , ऐसे व्यक्ति का मन कुसंग में ही लगता है ।  बिगड़े मन , बहके मन बाले कभी भगवान और गुरू में भरोसा नहीं करते । कारण उनका खान पान दूषित है । जो तमोगुण को बढ़ा देता है । 
अतः ऐसे व्यक्ति को सबसे पहले अपने भोजन को ठीक करना होगा , और फिर बार बार असली महापुरुष का सत्संग सुनना होगा जबरदस्ती , फिर मन धीरे धीरे तमोगुण से रजोगुण , फिर रजोगुण से सतोगुण में विचरण करने लगेगा और फिर जीव का मन भगवान और उनके भक्त यानी संत के संगती में लगने लगेगा । असली रस का आभास यहीं से शुरू होगा  और यहीं से असली यात्रा शुरू होगी और परमानंद की प्राप्ति पर जाकर खत्म होगी । श्री राधे ।।
:- संजीव कुमार ।

Thursday, 10 December 2020

How to give up your fear and become fearless in your life . the life will made easy and happy .

(Inspiration: Bhagavad Gita - the Song of God )

Shukdev Goswami is the divine parrot (लीला शुक) in Golok who speaks appropriate words for the pleasure of Shree Radha Krishna. We learnt in the eternal story about the glories of Srimad Bhagwatam (अमर कथा) that when chased by Lord Shiva the divine parrot Shuk entered the mouth of the wife of Vyasdeva. He remained in his mother’s womb for nine months, after which he controlled his body for twelve years and would refuse to come out. He would also point out mistakes when his father would recite mantras. Only after being whispered through the ears of his mother by Narada Muni that the material energy maya (माया) would not touch him he came out and transformed into a twelve year old boy. However, he did not look back and straightaway walked away and wandered into the forest. Being a gyani - the meditator of the supreme Brahaman (ब्रह्म) he would sit in divine consciousness. Vyasadev’s efforts in calling him back would not work until he heard some of the sweetest verses from Bhagwat Mahapuran spoken into his ears by the disciples of Vyasadev. When he heard these verses to his delight the light he was meditating on turned into a form - the personal form of the all attractive God.

Later he heard the entire Bhagawat Mahapuran from his father Vyasadev which he was now narrating to Parikshit Maharaj. Parikishit’s question about the duties of a man who is dying is very relevant. Scriptures would indicate that in reality everybody was close to death. A 60-70 years span of life may appear a long time to us but compared to the infinity it is a short while.

Shukdev Goswami advised Parikshit Maharaj and said that his first instruction to him was to give up his fear and become fearless. He explains: “There are different types of fear of which the greatest fear is that of death. However, fear is the symptom, the cause being the attachment.”

भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं
माने दैन्यभयम्, बले रिपुभयम्, रूपे जराया भयम् ।
शास्त्रे वादिभयम्, गुणे कलभयम्, काये कृतान्ताद्भयं
सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ॥ 
(Bhartrihari from the Vairagya shatakam)

“If you are attached to wealth you will fear of poverty. If you are attached to sensual enjoyment you will fear of diseases. If you are attached to prestige you will fear of humiliation. The momemt you become detached, you become fearless.”

Shukdev Goswami continued:
“Inspire yourself to take advantage of this opportunity. You have seven days before you. Your ancestor Khatwang Muni had only one and a half gharis. (Khatwang Muni had assisted the devatas during the daivasur battle. The devatas pleased with him after their victory wanted to grant him a boon. Khatwang Muni wanted to know how much life was left for him. It was found that he had only one and a half gharis to live. A ghari is only 24 minutes. A muhurt is 48 minutes and a prahar or yam is 3 hours. Khatwang Muni completed his surrender in the 24 minutes and achieved God realisation).”

स्माद्भारत सर्वात्मा भगवानीश्वरो हरि: ।
श्रोतव्य: कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यश्चेच्छताभयम् ॥ 
(Bhagwat Mahapurana 2.1.5)

“O descendant of King Bharata, one who desires to be free from all miseries must hear about God, must sing his glories and also remember him all the time.”

Shukdev Goswami teaches Pariksit Maharaj the three fold devotion (त्रिधा भक्ति) which is:

Shravanam: Hearing about the names, forms, abodes, virtues, pastimes etc of God.

Kirtanam: Singing and chanting the glories of God.

Smaranam: Remembering i.e. meditating upon God’s names, forms, abodes, virtues, pastimes etc.

Shukdev Goswami also teaches two kinds of meditation to Parikshit Maharaj:

Meditation on God’s universal form : He advised Parikshit Maharaj to look on the whole universe as the manifestation of God. “You need to realise that God is everywhere and is in everyone. This will neutralise your hankering and lamentation. If you see the whole world as the veritable form of God there will be no attachment or hatred.”

Meditation on the personal form of God - To increase the longing for God (प्रेमा भक्ति), the devotee needs to meditate on the personal form of God.

Bhagwat Mahapuran lays such a strong emphasis about the path of devotion.

बिले बतोरुक्रमविक्रमान् ये
न श‍ृण्वत: कर्णपुटे नरस्य ।
जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत
न चोपगायत्युरुगायगाथा: ॥
(Bhagwat Mahapurana 2.3.20)

Which is also echoed in Ramayana when Kagbhushundi Maharaj tells the following to Garuda Jee.

“जिन्ह हरि कथा सुनी नहि काना। श्रवण रंध्र अहि भवन समाना। 
नयनन्हि संत दरस नहि देखा। लोचन मोर पंख कर लेखा। 
ते सिर कटु तुंबरि समतूला I जे न नमत हरि गुर पद मूला। 
जिन्ह हरि भगति हृदयँ नहि आनी। जीवत सव समान सोइ प्रानी। 
जो नहि करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना। 
कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती। सुनि हरिचरित न जो हरषाती।”

“Ears that do not hear the glories of God, are mere snake-holes.

Eyes that do not behold the divine sight of Godly saints are like the artificial eyes on peacock feathers.

The head that does not bow to God and Guru is like a bitter gourd.

The heart bereft of devotion belongs to one who is dead while living.

The tongue that does not glorify Ram, is like the tongue of a frog uttering nothing but ugly croaking sounds.

It is a very hard and merciless heart that does not experience extreme joy upon hearing God’s pastimes.”

क्रोधाद्भवति. सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति। । (गीता 2.63)


 क्रोधाद्भवति. सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:।
 स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति। । (गीता 2.63)
 जब कोई क्रोध करता है तो क्रोध से व्यक्ति सम्मोहित हो जाता है और सम्मोहित होते हीं उसकी स्मृति चली जाती है तुरंत। वो स्मृतिविभ्रम का शिकार हो जाता है, मनुष्य भूल जाता है , क्या अच्छा है, क्या बुरा है, वह राक्षस बन जाता है व्यवहार से ।
 राक्षस के तरह व्यवहार करने लग जाता है क्रोध के समय । उसकी बुद्धि का नाश हो जाता है। और बुद्धि नाश होते ही अनेकानेक पाप कर वैठता है। 
अत: क्रोध सबसे खड़ाव बिमारी है। यह सबसे बड़ा शत्रु है मनुष्य के स्वयं का तथा इससे दुसरे को भी अनेक नुकसान होता है। क्रोध मे अनेकों पाप कर वैठता है मनुष्य। 
क्रोधी अपने मन को और गंदा कर लेता है। पाप की तरफ धकेल देता है क्रोध । क्रोध खुद के विनाश का कारण तो बन ही जाता है , दुसरे को भी बहुत नुकसान पहूँचाता है। क्रोधी व्यक्ति भस्मासुर बन जाता है। 
भगवान् तो इन्द्रियादि के द्वारा किए कर्मो को नहीं नोट नहीं करते, आपको कई बार बताया जा चुका है, वो मन मे उठे संकल्पो को अंदर वैठकर नोट करते जाते हैं।

 क्योकि कोई भी कार्य करने से पहले मन में ही संकल्प उठते हैं। अब क्रोध मे व्यक्ति सोचता है उसको यह कर दुगां , तो वह कर दुंगा, तो उसका ये हो जाये,  तो वो हो जाये आदि। सारे पाप भगवान् नोट करते जाते हैं जिससे मनुष्य के स्वयं का बड़ा नुकसान हो जाता है। 

अहंकार बढता जाता है। क्रोध बढता जाता है, पाप होता जाता है। पुण्य का छय होता जाता है। और व्यक्ति अपने पतन का कारण बनता जाता है। पुण्य का छय और पाप की बढ़ोतरी। कष्ट ही कष्ट। जीवन नरक,  फिर दोष भगवान् को नसीब को, भाग्य को, अरे तुम खुद को देखो, खुद को। 
आपका क्रोध ही आपके हीं विनाश का कारण है। इसलिये आप सब हर समय यह महसुस करें की हम अकेले नहीं है, हम अकेले नहीं हैं वो अंदर वैठे है, वो अंदर वैठे है। वो सब देख सुन रहे हैं, नोट कर रहे हैं। गलत न सोचें किसी के विरुद्ध, अरे उनसे बच कर कहां जाऐगें आप , वो तो आपके ह्रदय में बैठे हैं , ठीक वही पर है जहां आप है । झुठ वोलते है , वो सब देख सुन रहे हैं, नोट हो रहा है । इसलिये क्रोध न करें कभी। क्रोध आये तो भगवान् को याद करें,  गुरू को याद करें ,  क्रोध समाप्त हो जायेगा। प्रैक्टिस करें। देखो क्रोध से दुनिया में कोई काम आज तक नहीं बना किसी का। और न कभी बनेगा ,यह याद रहे हमेशा नंबर एक और नंबर दो  भगवान हमारे अंदर बैठे हैं सब नोट कर रहें हैं  , तो यह दोनों याद रखें हर क्षण तो कोई ग़लत काम आप नही करेंगें :- श्री महाराज जी ।।

God is omnipresence . He permeates every particle equal measures with all his powers and qualities .

प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना ।

God is omnipresence . He permeates every particle equal measures with all his powers and qualities . You do not have to search for him anywhere . Simply cry out to him like a small child with an intense desire to meet him , and he shall appear right before you. Remember , all form of God are one . It's not that one form is less than another or one form is more merciful than another .
Such dogma is totally childish and baseless . Without completly surrender it is not possible to meet him . Even though God is causelessly merciful , he showers his grace only on those who seek only his support and surrenders to him alone, like a new born baby who use to be Selfishless (Nishkama).

निज गुरु ईष्ट भक्ति में राधे ,
रहु अनन्यमति राधे, राधे राधे राधे ।

Your mind should always be exclusively devoted to your spiritual Master and sri radha Rani .

If you need to find water , you should dig deeply at one place. If you dig ten feet at one place and finding no water you give up and go dig twelve feet at some another place , and so on, you will not find water .
Similarly , someone may advise you to worship Goddess Durga , leaving Sri Krishna. Another would say , no, no , worship loard Shankara ji or Hanumana ji or Bhairav ji , who bestow perfection very quickly...
You will waste your time entire life if you blindly follow such crazy advice .
In today's world it is extremely loughful or very childish that most of devotee use to worship every form of God with sense or keeping his own view that if he will not worship Ganesh jee than Ganesh ji would anoyed , and than if leave Shankara ji than Shankara ji will not be happy similarly if than not put flower to Durga than Durga ji will be unhappy with him.
It's all madness .
People perceive that in world if any body will not touch the feet of uncle, buwa , brothers , sister etc along with father and mother or every body present in a house , than it will be disaster and all will be unhappy as it is happening in our society or family.
Similerly because of his worldly view or perception or thinking in same way he use to think that every God have same feeling like wordly people .
They did not understand that God is beyond of all these nonsense .
So these way of devotion will not do any thing and totally against the " Ananyata"
We must to realise that our intellect is under " maya" so link your intellect and Mana ( mind) with it to your Spritual Guru and do practice or sadhana as your Guru is suggesting to you than you will achieve your goal .
Other wise you will wander here and there , from this temple to that temple , from this form of God to that form of God and hence you will lose or waste your entire life into physical exercise of marching all tirtha and Dham and so will not get or achieve any goal.
 
" Na khuda hi Mila Na vishale Sanam ,
Na edhar ke rahe or Na udhar ke rahe .

:- by sri maharaj jee

success and failure .



Suppose you _have_ failed so far.   It would be foolish to give up the struggle, accepting failure as the decree of "fate."     It is better to die struggling than to abandon your efforts while there is still a possibility of accomplishing something more; for even when death comes, your struggles must soon be renewed in another life.  Success or failure is the just result of what you have done in the past, _plus_ what you do now.   So you should stimulate all the success thoughts of past lives until they are revitalised and able to overrule the influence of all failure tendencies in the present life.   

The Law of Success.    P15
Paramhans yogananda.

Compiled spiritual insights by scientists, including some of the greatest physicists of the 20th century...

Compiled spiritual insights by scientists, including some of the greatest physicists of the 20th century...

"Our separation from each other is an optical illusion.
Concerning matter, we have been all wrong. What we have called matter is energy, whose vibration has been so lowered as to be perceptible to the senses. Matter is spirit reduced to point of visibility. There is no matter.
Time does not exist – we invented it. Time is what the clock says. The distinction between the past, present and future is only a stubbornly persistent illusion.
Time and space are not conditions in which we live, but modes by which we think.
The more I learn of physics, the more I am drawn to metaphysics.
The common idea that I am an atheist is based on a big mistake. Anyone who interprets my scientific theories this way, did not understand them.
I’m not an atheist. The problem involved is too vast for our limited minds. We are in the position of a little child entering a huge library filled with books in many languages. The child knows someone must have written those books."
~ Albert Einstein
(Developed the theory of relativity - one of the two pillars of modern physics (alongside quantum mechanics); won the Nobel Prize for Physics in 1921)

“I regard consciousness as fundamental. I regard matter as derivative from consciousness. We cannot get behind consciousness. Everything that we talk about, everything that we regard as existing, postulates consciousness.
There is no matter as such – mind is the matrix of all matter.”
~ Max Planck
(Originator of quantum theory, which revolutionized human understanding of atomic and subatomic processes; Nobel Prize in Physics in 1918)

“Consciousness cannot be accounted for in physical terms. For consciousness is absolutely fundamental. It cannot be accounted for in terms of anything else.
The total number of minds in the universe is one. In fact, consciousness is a singularity phasing within all beings.
Consciousness is never experienced in the plural, only in the singular. Not only has none of us ever experienced more than one consciousness, but there is also no trace of evidence of this ever happening anywhere in the world.”
~ Erwin Schrödinger
(One of the founders of quantum theory; developed a number of fundamental results; Nobel Prize in Physics in 1933)

"Everything we call real is made of things that cannot be regarded as real.
If quantum mechanics hasn't profoundly shocked you, you haven't understood it yet."
~ Niels Bohr
(Made foundational contributions to understanding atomic structure and quantum theory, for which he received the Nobel Prize in Physics in 1922)

"The first gulp from the glass of natural sciences will turn you into an atheist, but at the bottom of the glass God is waiting for you."
~ Werner Heisenberg
(One of the key pioneers of quantum mechanics; Winner of the 1932 Nobel Prize in Physics)

“A bit of science distances one from God, but much science nears one to Him.
The more I study nature, the more I stand amazed at the work of the Creator.”
~ Louis Pasteur
(Influential microbiologist and chemist; one of the most important founders of modern bacteriology and medical microbiology) 

"The laws of nature are written by the hand of God in the language of mathematics."
~ Galileo Galilei 
(Considered the "father of observational astronomy", even "father of modern physics / science"; made major contributions to the fields of physics, astronomy, cosmology, mathematics and philosophy)

“This most beautiful system of the sun, planets and comets, could only proceed from the counsel and dominion of an intelligent and powerful Being."
~ Isaac Newton
(Key figure in the scientific revolution; laid the foundations of classical mechanics; formulated the laws of motion and universal gravitation that formed the dominant scientific viewpoint until it was superseded by the theory of relativity; widely recognised as one of the most influential scientists of all time)

"A scientist in his laboratory is not a mere technician. He is also a child confronting natural phenomena that impress him as though they were fairy tales told by a mysterious, invisible storyteller.
Nothing in life is to be feared, it is only to be understood. Now is the time to understand more, so that we may fear less."
~ Marie Curie
(Physicist and chemist; did research on radioactivity; first woman to win a Nobel Prize; first person to win two Nobel Prizes)

“The day science begins to study non-physical phenomena, it will make more progress in one decade than in all the previous centuries of its existence.
My brain is only a receiver, there is a core from which we obtain knowledge, strength and inspiration. I have not penetrated into the secrets of this core, but I know that it exists.
Even matter called inorganic, believed to be dead, gives clear, unmistakable evidence of a life principle within. Though we cannot understand the life of a crystal, it is nonetheless a living being.
The Buddhist expresses it in one way, the Christian in another, but both say the same: We are all one.”
~ Nikola Tesla
(Electrical engineer, mechanical engineer, physicist, and futurist; considered one of the greatest inventors in history; sometimes regarded as the most outstanding genius of all time; Einstein once called him the most intelligent person on the planet)

"Looking for consciousness in the brain is like looking inside a radio for the announcer."
~ Nassim Haramein
(Physicist; Founder of groundbreaking theories, published papers and patented inventions in unified physics, which are now gaining worldwide recognition and acceptance)

If anyone ever claims that spirituality and science are incompatible, this compilation of quotes might clearly demonstrate the ignorance of such an assumption.

कमजोर मानसिक अवस्था वाला मनुष्य आसानी से दुसरे के बहकावे में आ जातें हैं ।

जो व्यक्ति कमजोर मानसिक अवस्था का होता है , कान का कच्चा होता है, खुद से ज्यादा दुसरे पर भरोषा करता है । आत्मविश्वास की कमी होती है तो ऐसे व्यक्ति स्वाभाविक तौर पर ब्रेन ड्रेन का शिकार आसानी से हो जाते हैं । ऐसे व्यक्ति का ब्रेन हैक कोई आसानी से कर लेता है । इसमें आश्चर्य की बात नहीं । 
ऐसे लोग अनुवांशिक तौर पर मानसिक गुलाम होते हैं जिनकी जिंदगी बहुत सारी बनावटी मानसिक समस्याओं से घिरा होता है तथा ऐसे लोग असफल होते हैं अपने जीवन में ।
शंका , राग द्वेश , घृणा, ईष्या , जलन आदी दुर्गुणों के कारण ऐसे व्यक्ति हमेशा व्यथित होते हैं ।
हमेशा दुसरे में दोष देखने की आदत और खुद को अच्छा समझना इनकी आदत होती है जिस कारण ऐसे जीव कुंठा और तनाव से व्याकुल होतें हैं ।
ऐसे लोग खुद के दु:ख का कारण किसी और को समझते हैं और इनका नेचर हमेशा कंप्लेनिंग होता है । 
अतः ऐसे वेचारे जीव हीं हमेशा हैरान और परेशान रहते हैं जीवन भर ।।

इंसानियत
एक सहेली ने दूसरी सहेली से पूछा:- बच्चा पैदा होने की खुशी में तुम्हारे पति ने तुम्हें क्या तोहफा दिया ?
सहेली ने कहा - कुछ भी नहीं!
उसने सवाल करते हुए पूछा कि क्या ये अच्छी बात है ? 
क्या उस की नज़र में तुम्हारी कोई कीमत नहीं ?
लफ्ज़ों का ये ज़हरीला बम गिरा कर वह सहेली दूसरी सहेली को अपनी फिक्र में छोड़कर चलती बनी।।
थोड़ी देर बाद शाम के वक्त उसका पति घर आया और पत्नी का मुंह लटका हुआ पाया।। 
फिर दोनों में झगड़ा हुआ।।
एक दूसरे को लानतें भेजी।। 
मारपीट हुई, और आखिर पति पत्नी में तलाक हो गया।।
जानते हैं प्रॉब्लम की शुरुआत कहां से हुई ? उस फिजूल जुमले से जो उसका हालचाल जानने आई सहेली ने कहा था।।
.
रवि ने अपने जिगरी दोस्त पवन से पूछा:- तुम कहां काम करते हो?
पवन- फला दुकान में।। रवि- कितनी तनख्वाह देता है मालिक?
पवन-18 हजार।।
रवि-18000 रुपये बस, तुम्हारी जिंदगी कैसे कटती है इतने पैसों में ?
पवन- (गहरी सांस खींचते हुए)- बस यार क्या बताऊं।।
मीटिंग खत्म हुई, कुछ दिनों के बाद पवन अब अपने काम से बेरूखा हो गया।। और तनख्वाह बढ़ाने की डिमांड कर दी।। जिसे मालिक ने रद्द कर दिया।। पवन ने जॉब छोड़ दी और बेरोजगार हो गया।। 
पहले उसके पास काम था अब काम नहीं रहा।।
.
एक साहब ने एक शख्स से कहा जो अपने बेटे से अलग रहता था।। 
तुम्हारा बेटा तुमसे बहुत कम मिलने आता है।। 
क्या उसे तुमसे मोहब्बत नहीं रही? 
बाप ने कहा बेटा ज्यादा व्यस्त रहता है, 
उसका काम का शेड्यूल बहुत सख्त है।। 
उसके बीवी बच्चे हैं, उसे बहुत कम वक्त मिलता है।।
पहला आदमी बोला- वाह!! यह क्या बात हुई, 
तुमने उसे पाला-पोसा उसकी हर ख्वाहिश पूरी की, 
अब उसको बुढ़ापे में व्यस्तता की वजह से मिलने का वक्त नहीं मिलता है।। तो यह ना मिलने का बहाना है।।
इस बातचीत के बाद बाप के दिल में बेटे के प्रति शंका पैदा हो गई।। 
बेटा जब भी मिलने आता वो ये ही सोचता रहता कि उसके पास सबके लिए वक्त है सिवाय मेरे।।
.
याद रखिए जुबान से निकले शब्द दूसरे पर बड़ा गहरा असर डाल देते हैं।। बेशक कुछ लोगों की जुबानों से शैतानी बोल निकलते हैं।। हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बहुत से सवाल हमें बहुत मासूम लगते हैं।।
जैसे-
.
तुमने यह क्यों नहीं खरीदा।।
तुम्हारे पास यह क्यों नहीं है।।
तुम इस शख्स के साथ पूरी जिंदगी कैसे चल सकती हो।।
तुम उसे कैसे मान सकते हो।।
वगैरा वगैरा।।
इस तरह के बेमतलबी फिजूल के सवाल नादानी में या बिना मकसद के हम पूछ बैठते हैं।।
जबकि हम यह भूल जाते हैं कि हमारे ये सवाल सुनने वाले के दिल में 
नफरत या मोहब्बत का कौन सा बीज बो रहे हैं।।
.
आज के दौर में हमारे इर्द-गिर्द, समाज या घरों में जो टेंशन टाइट होती जा रही है, उनकी जड़ तक जाया जाए तो अक्सर उसके पीछे किसी और का हाथ होता है।। 
.
वो ये नहीं जानते कि नादानी में या जानबूझकर बोले जाने वाले जुमले किसी की ज़िंदगी को तबाह कर सकते हैं।।
ऐसी हवा फैलाने वाले हम ना बनें।।
लोगों के घरों में अंधे बनकर जाओ और वहां से गूंगे बनकर निकलो।।

मानव के रोगी होने का महत्त्वपूर्ण कारण ।

मानव शरीर के सभी आर्गन ( आंतरिक अंगों का भी ) का संचालक मानव का मस्तिष्क है, मनुष्य के खुद का दुर्गुण - ईर्ष्या, द्वेष, घृणा , काम , क्रोध , जलन और नकारात्मक भाव आदि मानव मस्तिष्क में डूपामिन और सोरोटोनीन नामक अमृत समान रसायन के स्तर बहुत कम कर देता है जिस कारण मानव मस्तिष्क का संचालन क्षमता खराब हो जाता है, ऐसी परिस्थितियों में शरीर के सभी आंतरिक अंग एक ड्राइवर विहिन वाहन के समान हो जाता है और फिर मानव शरीर बहुत से रोगों का शिकार बन जाता है ।
ठीक वैसे हीं जैसे विना लुब्रीकेंट के या इसकी कमी हो जाने से मोटर गाड़ी का इंजन सीज हो जाता है ।

अतः हम किसी से राग , द्वेष , क्रोध आदि करते हैं तो दुसरे के नुकसान से कई गुणा ज्यादा नुकसान हमारा होता है । 

डुपामीन और सोरोटीनीन एक ऐसा अमृत रासायन है जिससे हमारा मस्तिष्क हमेशा संतुलित रहता है और संसार में अपने जीवन में हम बहुत सारे संसारिक बस्तुओं के अभाव के बाबजूद भी खुशी महसूस करते हैं । हम समाज में दुसरे से अच्छा ताल मेल बना पाते हैं ।

वर्णा इसके अभाव में आदमी डिप्रेशन , चिंता , का शिकार होकर आत्महत्या तक कर लेता है । 

अतः हमेशा योग ,ध्यान और साधना का सहारा लेकर हम अपने इन दोनों रसायनों के स्तर को ठीक ठीक बनाए रख कर निरोगी जीवन जी सकते हैं , और सफल हो सकते हैं ।
सुख अंदर की इन्ही रसायनों पर निर्भर करती है , वर्णा अरबों की प्रोपर्टी और सुख सुविधा के बाबजूद आदमी आत्महत्या तक कर लेता है ।  ।। :- संजीव कुमार , रांची ( लेख नंबर 181)।

Wednesday, 9 December 2020

धर्म से क्या मिलता है ? धर्म क्या है ?

एक शक्स ने बड़े रूआब से मुझसे पुछा !
बता धर्म से क्या मिलेगा ?
मैंने कहा ' धर्म से सब कुछ मिलेगा !
उसने पुछा कैसे ?
मैंने पुछा पहले तु बता तुम धर्म को जानता भी है ?
उसने बड़े आत्मविश्वास से वोला हां , हिंदु , मुस्लिम , सिख , इसाई ।

मैनै कहा नहीं मेरे दोस्त मैं जिस धर्म को जानता हुं और मानता हुं , उससे सबकुछ मिलेगा , 
तेरे धर्म को मैं नहीं जानता , लेकिन मैं जिस धर्म को जानता हुं , वह हैं इंसानियत ,
धर्म वह है जिससे इंसानियत जिंदा रहता है , वांकी सब अधर्म हैं ।
धर्म के बल पर हीं  एक मजबुत एक मजलुमों को सहारा देता है ।
एक इंशान , एक प्यासे को पानी पिलाता है ।
एक मां बाप अपने बच्चे को सही शिक्षा देता है और ख्याल रखता है, सुसंस्कार देता है   ‌।
एक बच्चा अपने मां बाप और अपने से बड़े का कदर करता हैं , देख भाल करता है ।
एक शिष्य अपने इष्ट और गुरू के प्रति श्रद्धावान और समर्पित होता है । 
एक नागरिक अपने देश के लिए जान देता है ।
एक सैनिक बोर्डर पर शहिद होता है 
एक इंसान दुसरे इंसान का कदर करता है ।
धर्म दुसरे के लिए जीना सीखाता हैं ।
अधर्म खुद के लिए , दुसरे को लुटना सिखाता है ।
धर्म जोड़ना‌ सिखाता है , अधर्म तोड़ना सिखाता है । 

धर्म है तो परिवार है , धर्म है तो समाज हैं , धर्म है तो राष्ट्र है । धर्म है तो इंसानियत हैं । 
धर्म अपने इष्ट के चरणों में , गुरू के चरणों में समर्पण सिखलाता है । 

धर्म हीं  सत्य है । धर्म हीं जय है ‌, धर्म हीं विजय है । धर्म हीं जीवन है । धर्म हीं न्याय है । धर्म हीं देश की धड़कन हैं , धर्म हीं सांस हैं । धर्म हीं मानवता है। धर्म जिलाता है ।
अधर्म जलाता है ।

धर्म फुल है , अधर्म कांटा है ।
धर्म शुद्ध जल है , अधर्म जह़र है । 
धर्म गंगा यमुना सरस्वती है ।
अधर्म गंदी नाली है ।

और तुमने जिसको धर्म कहा वो तो संस्कृति हैं मेरे दोस्त । संस्कृति बदलती हैं , धर्म शाश्र्वत है । हमेशा था , है और रहेगा ।
जो धर्म को जीता है वो इंसान हैं ।
जो अधर्म को जीता है वो खुंखार है ।

मैकोले के स्कूल से डिग्री लेकर जी न्यूज पर "क्या कहता है इंडिया ' में डिवेट करने वाले और वाली सो कौल्ड विद्वान और विदुषी को मेरा पैगाम   ।

"मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना,
हिन्दी हैं हम वतन है,  हिन्दोस्तां हमारा "

Friday, 4 December 2020

गोलोक - जिस गोलोक में नित्य नवीन लीलाएँ हो रही हैं , उस गोलोक का वर्णन संक्षिप्त में :- श्री कृपालु महाप्रभु जु ।

गोलोक - जिस गोलोक में नित्य नवीन लीलाएँ हो रही हैं , उस गोलोक का वर्णन संक्षिप्त में -
प्रकृति से परे कारण समुद्र, उससे परे सिद्ध लोक, उससे परे शिवलोक, उससे परे परव्योम लोक है जहाँ अनंत भगवद् रुपों के अनंत बैकुण्ठ लोक हैं । उस परव्योम लोक के उपर सहस्त्र दल कमल के आकार का एक धाम है, जिसे गोलोक कहते हैं । 
उस कमल के कर्णिका के स्थान पर श्रीकृष्ण का महल अन्त:पुर है, जिसमें नंद-यशोदा के साथ श्रीराधा सहित श्रीकृष्ण वास करते हैं । कमलाकृति गोलोक के इतने भाग का नाम गोकुल है । उस कमल की पंखुड़ियों के स्थान पर गोप-गोपसुन्दरियों के उपवन हैं । ये उपवन गोकुल के मार्ग से मिले हुए हैं । ये मार्ग पंखुड़ियों के मूल संधि स्थान पर हैं । पंखुड़ियों के अग्र भाग की संधियों के स्थान पर गौओं के निवास या गोष्ठ हैं, जिसे केलि वृन्दावन या श्री वृन्दावन कहते हैं । प्रभु इन्ही स्थानों में नित्य अप्रकट लीला करते हैं और ब्रह्मा के एक दिन में इस पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर अपनी लीला को परिकर एवं धाम सहित प्रकट करते हैं एवं जीवों को उसे देखने की शक्ति भी प्रदान करते हैं । :- श्री महाराज जी