Friday, 18 October 2024

संसार में भौतिक सम्पन्नता के बावजूद लोग इतना दुखी क्यों हैं , और हमारा उद्धार कैसे होगा ? मन को कब शांति मिलेगी ? हमारा कल्याण कैसे होगा ?

एक साधक का प्रश्न :- संसार में भौतिक सम्पन्नता के बावजूद लोग इतना दुखी क्यों हैं , और हमारा उद्धार कैसे होगा ? मन को कब शांति मिलेगी ? हमारा कल्याण कैसे होगा ? 
मां का उत्तर :- बड़ा अच्छा प्रश्न है तुम्हारा , श्री महाराज जी ने कई बार इस पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि यही बात एक बार शौनकादिक ऋषियों के द्वारा सुत जी से पुछा गया की कलयुग में लोगों का कल्याण कैसे होगा ? 
सुत जी ने कहा कि कलयुग में लोगों की यादास्त बहुत कमजोर होगी , लोगों को भुलने की बीमारी होगी , प्रारब्ध बहुत कमजोर होगा , लोग शारीरिक रुप से बहुत कमजोर होंगें , मानसिक शक्ति क्षीण होती जाएगी , लोग पाप और पूण्य में , धर्म अधर्म में फर्क नही समझ पाऐंगें , अच्छे बुरे के ज्ञान का आभाव होगा , लोग तर्क , कुतर्क , वितर्क में समय गवाऐंगें , 
झूठ बोलने , पापादी कर्मों तथा चिंतन में लिप्त रहने के कारण जीव के पुण्य बल तथा आयु क्षीण होती जाऐगी | कुसंगादि के कारण अपना नुकसान ही नुकसान करेंगें | काम-क्रोध, अहंकार, विनाश का प्रमुख कारण होगा | लोगों की रूचि भगवान का प्रेम प्राप्त करने में नहीं होगा । कामनाओ के पूर्ति मात्र के लिए लोग तीरथ 
-विरथ मंदीर मस्जिद गुरुद्वारे में जाएंगे । लोग भगवान के भक्ति का प्रदर्शन मात्र करेंगे । भगवान से निष्काम प्रेम के जगह लोग भक्ति, दान, धर्म का प्रदर्शन अधिक करेंगे । धन वैभव का अहंकार जीवों के उपर हावी रहेगा । धर्म के आड़ में लोग व्यभिचार तथा पाखंड में लिप्त रहेंगे । व्यभिचारी पूजित होंगे, तथा वास्तविक संतों के प्रति कम लोग ही आस्थावान होंगे । 
अत: भगवान से सच्चे तथा निस्वार्थ प्रेम के आभाव में लोग भौतिक सपन्नताओं के बाबजूद दुखी रहेंगे । जीवो का मन अशांत रहेगा । जीव रोगादि से ग्रस्त रहेंगे । चरित्र और सुसंकार का आभाव होगा । घोर कामनाओं तथा वासनात्मक भोगेच्छा के वशिभूत जीवो का नैतिक पतन होगा । 
केवल भगवान की निष्काम भक्ति करके उनका प्रेम प्राप्त करने के बाद ही लोग आनंदमय तथा सुखी होंगे । 

श्री महाराज जी ने समझाया है कि "जीव समझ नही पाते है कि वो जो कष्ट भोग रहे है वो उसके ही अनन्त जन्मो पल्स वर्तमान जन्मों के बुरे कर्मो का फल है | "

लोग देवी देवता का चक्कर काटते हैं , मंदिरो में जाकर तमाम मनता मनौती मनाते है , जादु मंतर के चक्कर में पड़ते है | नकली बाबाओं के चक्कर में पड़कर अपना तमाम तरह का नुकसान पँहुचाते हैं | 
समय आने पर दो चार का खड़ाब प्रारब्ध कट जाने पर कष्ट कम हो जाने पर , रोग ठीक हो जाता है तो लोग उसके द्वारा ढोल पिटवाते है कि अमुख बाबा बड़े सिद्ध हैं फिर कुछ लोग और इस चक्कर में पड़कर अपना और नुकसान कर बैठते हैं | 

वो समझते है देवी देवता खुश हो गये और हम ठीक हो गए | अरे क्या खाक ठीक हो गए , जिसको भगवान ने उसके प्रारब्ध का फल दिया उसे कौन ठीक कर सकता है , वो तो भोगने बाद ही ठीक होगा | देवी देवता में ऐसी हिम्मत कहां जो विधाता के दिये हुऐ फल को काट सके | ये देवी देवता के अवलम्ब , आधार तो खुद श्रीकृष्ण है | इनकी ऐसी हिम्मत कहां जो वो अपने अबलंब के खिलाफ जाऐं ?

अरे ये देवी देवता भी तभी खुश होते है जब वे देखते है कि ये हमारे इष्ट को ही भज रहा है उन्हीं की भक्ति कर रहा है | ये उनका हीं हो गया | ध्यान दो - श्री कृष्ण का हीं हो गया है , श्री कृष्ण का भी नहीं | 

अत: देखते हो संसार में तमाम तरह के नए नए रोग बढ़ रहें हैं कीड़े मकोड़े की संख्या बढ़ रही है , लोग काल का ग्रास बन रहें हैं फिर भी नही चेतते , क्योंकि बुद्धि भ्रष्ट हो चूकि हैं | शास्त्रों , पुराणों को अपने अपने तरीके से अर्थ निकाल कर अनर्थ के तरफ बढ रहे हैं | पाप में लिप्त है , धन का दुरुपयोग बढ रहा है | 

अत: इन चीजों को समझों , कुसंग मत करो , हरिगुरु के शरण में जाओ , बार बार सिद्धान्तो को पढ़ो , हरिगुरु का हीं संग करो , गुरुधाम जाओ , हरिगुरु के बुद्धि से अपनी बुद्धि को जोड़ दो , हरिगुरु के बताऐ मार्ग पर चलों , रुपध्यान करो , हरिगुरु निर्दिष्ट साधना करो , साढ़े छ अरब मनुष्यों मे हम सब बड़भागी हैं कि कृपालु जैसा गुरु मिला , जो स्वयं परम तत्व हैं उनका दामन कभी मत छोड़ों । 
मन को वास्तविक शांति सुख और आनंद श्री राधाकृष्ण प्रेम पाने के बाद ही मिलेगी , तर्क , कुतर्क मत करो , अपनी तुक्ष बुद्धि मत लगाओ , ज्यादा से ज्यादा उनके पुस्तकों को पढो , बार बार पढो , उनकी पुस्तके मामुली पुस्तकें मत समझो , यह उनके द्वारा रचित महानतम ग्रन्थ है | 
:- पूज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ।

Saturday, 12 October 2024

सन्यासियों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी के लिए संक्षिप्त लेख ।सन्यासियों के प्रकार :- नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार कूल छः प्रकार के सन्यासी होते हैं जो निम्नलिखित हैं ।


 सन्यासियों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी के लिए संक्षिप्त लेख ।
सन्यासियों के प्रकार :- 
नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार कूल छः प्रकार के सन्यासी होते हैं जो निम्नलिखित हैं - 
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साधारण सन्यासी कुटिचक होते हैं जो मंत्रादि की साधना भी करते है लेकिन मन भगवान में ही स्थित यानि ध्यान मग्न होतें है यानि अधिकतर समय साधना में लगाते हैं । ये शिखा और यज्ञोपवीत ( सूत्र) भी धारण करतें है त्रिदण्ड, कमण्डलु , कौपीन ( लंगोटी ) और कन्था ( कथरी ) धारण करतें है । झोली और पात्र भी रखतें है। ये मिट्टी खोदने वाला खनती भी अपने पास रखते हैं। ये पराविज्ञानी नहीं होते अर्थात अपरोक्ष ज्ञाननिष्ठ नहीं होते। ये  श्वेत ऊर्ध्व पुण्ड्र लगाते हैं। 
ये गुरु के अलावा  माता पिता की भी सेवा कर सकते हैं। 
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बहुदक सन्यासी - जनेऊ, चोटी( शिखा ), दण्ड कमण्डलु लंगोटी, और कथरी के अलावा त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं।ये उत्तम  सज्जन लोगों से ही आठ ग्रास भोजन ग्रहण करते हैं । एक ग्रास उतना ही होता है जो शान्ति से मुख में रखकर चबा सकें न कि बड़ा कौर। ये अपने मन को भगवान में ध्यानस्थ कर कठिन साधना करते हैं 
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हंस :- ये जब चाहे मानसिक स्तर पर भगवान के ध्यान में चले जाएं और पूर्ण जागृत अवस्था में भी भगवान में मन को स्थित रख कर संसार में कर्मयोग करते हैं , ये भिक्षु किसी गांव में एक रात , नगर में पाँच रात और तीर्थ क्षेत्र में अधिक से अधिक  सात रात निवास कर सकते हैं वे अपने आपमें ही मगन रहते हैं और स्वागत सत्कार से दूर रहते हैं। ये जटा जूट धारण करते हैं। ये एक जगह अड़के नहीं बैठते इनको भोजन या आश्रम की सुविधाओं से कोई संबंध नहीं होता।   नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार ये मधुकरी ( भिक्षा) से ही शरीर का पोषण करते हैं।
ये तीनों यानि कुटिचक , बहुदक तथा हंस क्रमशः घासफूस के आश्रम वाले होते हैं प्रायः गृहस्थ जीवन काटकर फिर वानप्रस्थ स्वीकार  करते हैं तदोपरान्त ही अपनी अवस्था के अनुसार कुटिचक या बहुदक अथवा हंस हो पाते हैं। 
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परम हंस :- ये हर क्षण मानसिक स्तर पर भगवान के ध्यान में स्थित होते हैं और शारिरिक और से    शिखा और यज्ञोपवीत धारण नहीं करते ये मात्र 5 घरों से अन्न पाकर एक ही बार पाते हैं दूसरे समय नहीं पाते। ये बांस का दण्ड पास में रखते हैं। ये सम्पूर्ण अंगों में भस्म धारण करते हैं यही इनका वस्त्र है पर ये दिगम्बर हो भी सकते हैं नहीं भी तो एक लंगोटी और एक चादर अपने शरीर पर ओढ़ कर भी रख सकते हैं। परम हंस नामक संन्यासी वृक्ष के मूल अथवा श्मशान में रहते हैं। यज्ञशाला, नदीतट, गड्ढा, झोंपड़ी में भी रह सकते हैं। 
इनको लाभ या अलाभ से कोई संबंध नहीं होता। इनको कोई स्वर्ण भी दे तो उसे मिट्टी या नाशवान समझकर स्वीकार नहीं करते । इनको शुद्ध द्वैत या अशुद्ध द्वैत से कोई भी मतलब नहीं होता ये पूर्णतः आत्माराम होते हैं ये ब्रह्म से अभिन्न होते हैं किसी भी नियम या कर्मकांड आदि से इनको कुछ भी संबध नहीं होता ये सदा ब्रह्मानंद से युक्त होते हैं। ये चाहे चाण्डाल के घर प्राण त्याग करें या काशी या मथुरा में ये मुक्त ही होने से परम निर्वाण को ही पाते हैं।
जड़भरत , श्वेतकेतु व शुकदेव लीलावश परमहंस हैं।और ये सभी वर्णों से भिक्षा ले सकते हैं इनको ब्रह्म के सिवाय कुछ नहीं दिखता स्वयं भी सर्वमय भी। मात्र देह के लिए ही ये किसी से भी भिक्षा ले सकते हैं।
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तुरीयातीत सन्यासी - यह कभी किसी से कुछ भी नहीं मांगते। यदि स्वेच्छापूर्वक कोई दे दे तो ग्रहण कर सकतें है अथवा  ये देह के लिए मात्र तीन घरों से अन्नाहार मांग भी सकते हैं पर धन , वस्त्र और वस्तु नहीं मांगते।  यह नग्न होते हैं। और हर क्षण भीतर से , मानसिक स्तर पर साधना में निमग्न रहते हैं । 
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अवधूत सन्यासी - ये अजगर वृत्ति से जीवित रहते हैं ये बंधन को मिथ्या मानते हैं इनके अनुसार तुमको किसी ने बंधन में नहीं डाला तुम तो मुक्त ही हो अपने अज्ञान के कारण ही तुम मुक्ति चाहते हो वास्तव में जो मुक्त है उसे किस प्रकार की मुक्ति चाहिए बस अज्ञान का नाश कर ले यही मुक्ति है। ये मंत्र और उपासना से रहित सोऽहम् भाव में ( इससे भी अतीत) स्थित होते हैं । :- नारद परिव्राजक उपनिषद । ( संजीव कुमार )

Thursday, 10 October 2024

श्री कृपालुजी महारप्रभु के अनुयायी भगवान श्री राधाकृष्ण के अनन्य भक्त ।

पुर्व जन्मों का पुण्य पुंज तथा उस पर भगवद् कृपा से जबतक किसी भी जीव के कुसंस्कारों का नाश नहीं होगा तथा उनके चित्त में सर्वश्रेष्ठ संस्कारों का उदय नहीं होगा तबतक वो जीव श्रीमद्पदव्याक्य, प्रमाणपारावरीण, वेदमार्ग-प्रतिष्ठापन, निखिलदर्शन समन्वयाचार्य, सनातन वैदिक धर्म प्रतिष्ठापन सत्संप्रदाय परमाचार्य, भक्तियोग रसावतार, भगवदनन्त श्री विभूषित पंचम मूल जगद्गुरूतमई १००८ स्वामी श्री कृपालु जी महाराज द्वारा दिए गए वैदिक दर्शन, तत्वज्ञान , विशुद्ध एवं श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्तिरस एवं भक्ति सिद्धांतों में रूचि नहीं रख सकता, चाहे वो आज कलयुग में किसी भी धर्म , किसी भी संप्रदाय , किसी भी मत , किसी भी मार्ग के बड़े से बड़े धर्मपीठ पर बैठे बड़े बड़े धर्माधिकारियों , कर्मकांडी पंडितों तथा दुनियां में महान कहलाने वाला जीव या ज्ञानी ध्यानी विज्ञानी आदि ही क्यों न हो । इन बड़े बड़े पंडितो तथा ज्ञानियो से वो चंडाल श्रेष्ठ तथा बंदनिए है जो श्री राधाकृष्ण की अनन्य तथा निष्काम भक्ति करते हैं , उनमें रूचि रखते हैं, उनसे प्रेम करते हैं । 

परम दिव्य तत्व , अवतारी महापुरूषों में सर्वश्रेष्ठ श्री कृपालु जी महाप्रभु द्वारा श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्ति में रूचि इस युग में केवल उन्हीं सौभाग्यशाली जीवों को है जो अपने पुर्व जन्मों में परम तत्व श्री राधाकृष्ण की भक्ति की है तथा भगवान श्री कृष्ण के परमगुप्त,अद्वितीय,अनुपम , अलौकिक अति दुर्लभ प्रेम रस को प्राप्त करने के लिए लालायित हुए थे और हैं । 

श्री राधाकृष्ण के अनुपम , अपरिमेय , अद्भुत, अतुलनीय, अलौकिक, दुर्लभ भक्तिरस के प्रति आकर्षित जीव ही केवल श्री कृपालु जी महाप्रभु को अपना गुरू मानते हैं और आने वाले समय में मानेंगे भी तथा उनके प्रति अनन्य, दृढ़ श्रद्धावान, आस्थावान तथा संकल्पित है तथा होंगे । 

श्री कृपालु जी महाप्रभु जैसे महानतम अवतारी संत के प्रति जिज्ञासु, पिपासु श्रद्धावान, निष्ठावान, अनन्य तथा समर्पित जीवों के सौभाग्य की सराहना करना स्वर्ग के देवी देवताओं तथा सरस्वती एवं बृहस्पति के लिए भी कठीन है ।

अति धन्य हैं वो जीव जो श्री महाराज जी का अनन्य अनुगामी होकर श्री राधाकृष्ण की निष्काम भक्ति करते हैं । 

 मैं संजीव कुमार एक क्षूद्र सा अधम एवं पतित जीव , हमारे गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज के सभी अनुयायियों एवं निष्काम सेवकों के श्री चरणों में मन ही मन नित्य प्रति अपना मस्तक नवाकर स्वयं को धन्य समझता हूं । जय जय श्री राधे , जय जय श्री कृपालु महाप्रभु की जय जय जय, जय जय श्री महाराज जी के साधक समुदाय की जय ।। :- संजीव कुमार ।