Wednesday, 26 July 2023

मौन क्या है ? मौन किसे कहते हैं

जब हमने श्री महाराज जी से मौन का वास्तविक स्वरूप तथा महत्व समझा । उनके कृपा से प्राप्त तत्वज्ञान "मौन" के बारे में प्रस्तुत है :- 
मौन - कर्म इंद्रियां यथा मुख को बंद रखना , कुछ न बोलना मौन नहीं है । मौन आंतरिक क्रिया है बाहरी नहीं ।

 मनुष्य का स्वरूप हीं ऐसा है कि मनुष्य एक पल के लिए अकर्मा नहीं रह सकता जीवन पर्यंत । यहां तक कि अर्ध सुसुप्ति की अवस्था में बुद्धि हो जाती है लेकिन मन सक्रिय रहता है तभी वो स्वप्न देखता है। पुर्ण सुसुप्ति कि हीं अवस्था ऐसी होती है जिसमें मन तथा बुद्धि भी पुर्ण रूप से सो जाती है । ऐसी अवस्था में मन बुद्धि न तो कोई संकल्प करता है और न विकल्प ना कोई चिंतन करता है ना कोई मनन , ना हीं बुद्धि कोई तर्क या वितर्क करती है । फिर भी इस पूर्ण सुसुप्ति की अवस्था में भी मनुष्य को अकर्मा नहीं कहा जा सकता है क्योंकि इसको भी मनुष्य के द्वारा सोने के क्रिया तथा मनुष्य के कर्म को हीं इंगित करती है । सोने का कर्म । 

तो फिर मौन क्या है ? किसको कहते हैं मौन ? 
तो श्री महाराज जी के कृपा से मैंने जो समझा है वो है कि मौन एक ऐसी अवस्था का नाम है जब हमारा मन तथा बुद्धि किसी भी मायिक बिषय , बस्तु , या जीव यानि संसारिक बिषय बस्तु तथा जीव को छोड़ कर जब केवल पुर्ण रूप से भगवान का या गुरू का रूपध्यान करने के साथ साथ उनके गुणों का , उनके रूप माधुर्य का उनके लीलाओं का, उनके धामों का या उनके द्वारा दिया गया दिव्य वाणी का , प्रवचन का , सिद्धांतों का चिंतन करने में इंगेज्ड हो और मुख से कुछ भी ना बोले, तो ऐसी अवस्था का नाम है मौन । 

वरना केवल मुख बंद हो , मुख पर जीव ताला लगा कर रखें और मन बुद्धि संसार तथा किसी भी संसारिक , मायिक बिषय बस्तु या मायाधिन व्यक्ति का चिंतन कर रहा हो , तर्क कुतर्क वितर्क की क्रिया मन के अंदर चल रहा हो तो ऐसी अवस्था मौन नहीं है । 

और ऐसी अवस्था भी मायाधिन जीव के लिए असंभव है कि वो जगा हो और उसके मन के अंदर कोई बिचार जन्म न लें , मन के अंदर बिचारों का प्रवाह न उठ रहा हो । 

इसलिए जीव के मन के अंदर जब भगवान या भगवद् प्राप्त संत , हरि गुरू के रूप , उनके गुण , उनकी लीला उनके धाम का चिंतन चल रहा हो, बिचारों का प्रवाह भगवद् बिषय संबंधित हो और बाहर से जुवां खामोश हो तो इसी अवस्था का नाम है मौन । 
वरना जुवान से कुछ न बोलना और मन के अंदर संसारिक बिषय संबंधित बिचारों के प्रवाह को संचालित रखना मौन विल्कूल नही , एक नाटक है , एक ढोंग है । इसको "खामोशी" कहते हैं , "मौन" नहीं । 
श्री राधे । 

आज एक मौनी बाबा को देखा , वो व्रत के समय मौन रखने पर लेक्चर दे रहे थे कुछ आदमी को , उपदेश दे रहे थे कि अपने मुख के उपर एक सफेद कपड़ा बांध कर मौन का अभ्यास करो । वो यह नहीं बताया किसी को कि व्रत के दिन जुबां बंद रख कर मन से भगवान का चिंतन करो ! 
अरे कोरोना काल में दुनिया में तो अरबों लोग बड़ा बडा़ मास्क पहन कर घंटों मौनी बाबा बना रहा । क्या लाभ हो गया उस मौन से , कुछ मिला क्या किसी को ? कुछ अनुभव हुआ क्या ? क्या कोई शांति मिली क्या किसी को ? उल्टा बहुत से लोग इस काल में गलत चिंतन से , निगेटिव चिंतन से डिप्रेशन का शिकार हो गय ।
:- संजीव कुमार

रफ्ता रफ्ता जमाने का सितम होता है

रफ्ता—रफ्ता यह जमाने का सितम होता है,
एक दिन रोज मेरी उम्र से कम होता है ।
बाग रोता है असीराने—कफस को शायद
दामने—सज्जा—ओ—गुल सुबह को नम होता है।
हजार तरह तखथ्युल ने करवटें बदलीं
कफस—कफस ही रहा, फिर भी आशिया न हुआ
रंगे—निशात देख मगर मुत्मइन न हो,
शायद कि यह भी हो कोई सूरत मलाल की,
गुलशन बहार पर है, हंसो ऐं गुलो हंसों,
जब तक खबर न हो तुम्हे अपने मआल की,
अहसास अब नही है मगर इतना याद है,
शक्लें जुदा—जुदा थीं उरूजो—जवाल की
हुआ अहसास पैदा मेरे दिल में तकें—दुनिया का,
मगर कब, जब कि दुनिया को जरूरत ही न थी मेरी ।।

अर्थ -रफ्ता—रफ्ता यह जमाने का सितम होता है
एक दिन रोज मेरी उम्र से कम होता है

मनुष्य सोचता है कि वो जीवन जी रहा है, लेकिन सच्चाई कुछ और है दोस्तों ; जन्म के साथ ही हम रोज मर रहे हैं। यह प्रक्रिया, जिसे हम जीवन कहते हैं, मृत्यु की प्रक्रिया है। जिस दिन हम जन्मे उसी दिन से हमारा उम्र आहिस्ता आहिस्ता घटना शुरु हो जाता है। रोज एक—एक दिन चुकता जाता, प्रतिपल जीवन क्षीण होता जा रहा है । घट खाली हो रहा है, भर नहीं रहा है। और बूंद—बूंद खाली हो तो सागर भी खाली हो जाता है। और हम तो केवल गागर हैं।

बाग रोता है असीराने—कफस को शायद
दामने—सज्जा—ओ—गुल सुबह को नम होता है।

असीराने- कफस मतलव -पिंजड़ों में बंद कैदी , यह दुनिया भगवान का बनाया हुआ जेल खाना है । पिंजड़ों में बंद पक्षी तो हमारे आंखों से दिखाई देता है — पर आदमी भी कैद है एक अदृश्य पिंजड़े में , हम आंखों से  पिंजड़ों में बंद दिखाई नहीं पड़ते; क्योंकि हमारे  पिंजड़े सूक्ष्म हैं, अदृश्य हैं। अत: हम भी बंद है। हम भी कैदी है। 

और इसलिए शायद बगीचा भी हमारे लिए रोता है, इसिलिए रोज सुबह बाग में फूलों के, पत्तियों के कोर—किनारे गीले होते हैं। लेकिन हमें होश नहीं, हम दौड़े चले जाते हैं अपनी बेहोशी में। हम वही किए चले जाते हैं जो हमने कल किया था, परसों किया था, जो हमने पिछले जन्मों में अनंत बार किया है। बस खाना पीना मौज मस्ती करना हर मानव जन्म , इसे ही जिंदगी समझ लिया है । 

हजार तरह तखथ्युल ने करवटें बदलीं
कफस—कफस ही रहा, फिर भी आशिया न हुआ

कैद तो कैद ही रहेगी, घर नहीं बन सकती। मनुष्य की कल्पनाएं कितनी ही करवटें बदलें— और यही हमने किया है जन्मों—जन्मों में। शरीरे बदली , चौरासी लाख प्रकार के शरीर में घुम रहे हैं हम । कभी यह थे तो वह होना चाहा, कभी वह थे तो यह होना चाहा— ऐसे हमने चौरासी लाख योनियों में यात्रा की है। कल्पनाओं की करवटें हैं, और कुछ भी नहीं।
गरीब अमीर होना चाहता है और अमीर सोचता है, और अमीर बनें तब सुख मिलेगा !  शथ्या है सुंदर तो क्या होगा और भी महंगा विस्तर चाहिए, तब नींद आएगी , भवन है सुंदर तो क्या हो गया इसमें सुख नही , भवन और बढ़िया चाहिए — इसी चक्कर में नींद तो खो गई है! भोजन है स्वादिष्ट तो क्या करूं, भूख तो खो गई है!  जो जहां है वहीं अतृप्त है। जिनके पास धन है उनकी चिंता का अंत नहीं। और जिनके पास धन नहीं है उनकी एक ही चिंता है कि धन कैसे हो। जिनके पास है वे डरे हैं कि कहीं खो न जाए, जिनके पास नहीं है वे पीड़ित हैं कि कब होगा,?  जिनके पास है वे चाहते हैं कि और हो। तृप्ति कहीं भी नहीं है। आपा— धापी है, असंतोष है, अतृप्ति है।
ये सब हमारे पिंजड़े हैं जिनमें हम बंद हैं। ये अदृश्य हैं पिंजड़े। इसलिए हम चलते हैं, उठते हैं, बैठते हैं; फिर भी हम पिंजड़ों में बंद हैं। ठीक से समझो तो शरीर भी पिंजड़ा है, मन भी पिंजड़ा है। शरीर है हड्डी—मांस—मज्जा से बना पिंजड़ा । बेचारी आत्मा तो कैद है ।।

रंगे—निशात देख मगर मुत्मइन न हो,
शायद कि यह भी हो कोई सूरत मलाल की ।।

यानि - जब जीवन में चारों तरफ उल्लास, उत्सव, तमाशे—शहनाइयां बज रही हो , बांसुरिया बज रही हों, खुशी के गीत गाए जा रहे हों नाच हो रहे हों । तो देखो सब, मगर आश्वस्त मत हो जाना, मुत्मइन मत हो जाना मनुष्यों , यह मान मत लेना कि यह सब सच है! 

गुलशन बहार पर है, हंसो ऐं गुलो हंसों,
जब तक खबर न हो तुम्हे अपने मआल की,

यानि जब तक तुम्हें अपने भविष्य का कुछ पता नहीं है, हंस लो। देर नहीं है पतझड़ के आने में। सुबह खिला फूल सांझ गिर जाएगा। जो पत्ता अभी हरा है, जल्दी ही पीला पड़ जाएगा। जो अभी ऐसा गरूर से भरा था, जो अभी ऐसा मगरूर था, हवाओं से जूझता था, कि सूरज की किरणों से टक्कर लेने की सामर्थ्य समझता था, कि पक्षियों के गीत के साथ नाच रहा था— उसे पता भी नहीं कि सूरज ढल भी न पाएगा और जिंदगी ढल जाएगी! सुबह जो खिला था वह सांझ मुरझा जाएगा।

हकीकत तो यह है कि  हरेक संसारिक सुख में बहुत बड़ा भयानक दुख छुपा होता है , इसलिए अपने जीवन में आस्वस्त न हो जाना । 
इसलिए  यह भी हो कोई सूरत मआल की यानि दुख कि । 

अहसास अब नही है मगर इतना याद है,
शक्लें जुदा—जुदा थीं उरूजो—जवाल की ।।

यानि हमेंशा खयाल रहे कि विधाता का यह भी एक तरीका है , ढंग है इंसान को परखने का । इसलिए जब सुख आए तो उछलो मत ।( ऊरूजओ-जवाल) यानि संसारिक सुख - दुख कि शक्ले अलग अलग होती है अतः संसारिक सुख भी एक दुख ही है उसी का रूप है । इसमें धोखा मत खाओ । 
 
राजा दशरथ ने राम को पुत्र रूप में प्राप्त करके बहुत उत्सव मनाया , पुत्र सुख को पाकर आश्वस्त हो गए लेकिन यह सुख गंभीर दूख का कारण बनने में देर न लगाया । विचारे पुत्र शोक में ही अपार दुख में दम तौर दिया । 
संसार के हरेक सुख में आने वाले दुख का संकेत होता है पर हम नहीं समझे और सुख आने पर उछलने लगते हैं , दिखावा करते हैं । जो स्थित प्रज्ञ है वहीं सुखी है । 

हुआ अहसास पैदा मेरे दिल में तकें—दुनिया का,
मगर कब, जब कि दुनिया को जरूरत ही न थी मेरी ।।

ए मनुष्य अगर हमारी उपर वाली सभी बात तेरे समझ में फिर भी नहीं आई तो फिर वक्त तो जरूर तुमको समझा देगा , इस बात का एहसास करा देगा जब बुढ़ापा आएगा उस समय अफसोस करोगे , लोगों के व्यवहार को देखोगे , अपने ही परिवार के लोगों का व्यवहार देखोगे अपने प्रति , नजारा बदला बदला रहेगा । लोग तेरे पास बैठने से भी कतराएंगे । उस समय तुम सोचोगे और अफसोस करोगे की जिस जिंदगी के लिए धन कमाने में हमने पुरा उम्र खपा दिया , रिस्तों को जोड़ने में हमने पुरा उम्र गवां दिया , हीरा जन्म जैसा अनमोल समुचा मानव जीवन गवां दिया अब उसकी जरूरत इस दुनियां को नहीं रही । 
और जब इस बात का अहसास होगा तब तक चड़िया खेत चुग चुकी होगी । तुम गोविंद को भजने लायक भी नहीं रहोगे । मन शरीर और मानसिक संताप में डूब चुकी होगी । 

इसलिए अभी से समय रहते भज गोविंदम भजगोविंदम , भज गोविंदम मुढ़मते ।।
श्री राधे :- संजीव कुमार

Friday, 21 July 2023

पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी द्वारा रूपध्यान करते समय भाव संबंधित अति महत्वपूर्ण गाइड लाईन ।

पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी द्वारा रूपध्यान करते समय भाव संबंधित अति महत्वपूर्ण गाइडलाइंस:- मनुष्य में किसी-न-किसी से प्रेम करने की सामान्य प्रवृत्ति होती है। इसी प्रवृत्ति को अनन्य भाव से अपने अंशी श्रीकृष्ण में स्थापित करना ही परम प्रेम है, यही आनंद प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है। किंतु हमारे मन की प्रवृत्ति अनादि काल से सांसारिक व्यक्तियों और वस्तुओं में आनंद ढूँढने की रही है क्योंकि मन माया का बना है, अतः माया के संसार के प्रति इसका स्वाभाविक आकर्षण है। मन की इसी प्रवृत्ति को लक्ष्य कर भक्तियोगरसावतार श्री कृपालु जी महाराज ने अपने 'भक्ति शतक' में कहा है-

बंधन और मोक्ष का, कारण मनहि बखान |
 याते कौनिउ भक्ति करु, करु मन ते हरिध्यान ||

यहाँ 'हरिध्यान' से श्री महाराज जी का तात्पर्य स्मरण भक्ति से है जिसके लिए उन्होंने मन द्वारा रूपध्यान साधना किए जाने पर बल दिया है ताकि ध्यान करते समय मन भगवान के रूप, गुण, लीला, धाम के चिंतन में लगा रहे । चिंतन में निरंतर परम शुद्ध भगवान का सान्निध्य मिलने पर अनादि काल से मन पर जमा कलुष साफ होने लगता है और हम भगवान के निकट पहुँचने लगते हैं।

श्री महाराज जी ने कभी भिलाई नगर के सत्संगियों के मध्य रूपध्यान साधना की पद्धति बतलाई थी।

 देखिए, साधना में सर्वप्रथम कुछ बातें आवश्यक हैं। पहले तो आपको यह मानकर चलना है कि मैं युगल उपासक हूँ। मैं केवल कृष्ण उपासक नहीं हूँ। युगल उपासक होने के कारण मैं दोनों की साधना करता हूँ। वे मेरे माता-पिता हैं। वे मेरे स्वामी स्वामिनी जू हैं, इस भाव को लेकर चलना है। 

आप तिलक लगाते हैं! पहले लम्बा तिलक लगाते हैं, फिर गोल बिंदी लगाते हैं। जो लम्बा तिलक लगाते हैं, वे केवल कृष्ण उपासक हैं। जो लम्बा और गोल लगाते हैं, वे युगल उपासक हैं। ऊपर का तिलक कृष्ण का, नीचे की बिंदी राधारानी की! आपके तिलक से ही लोग समझ जाएँगे कि आप युगल उपासक हैं। पर यह नहीं जान पाएँगे कि आप राधाकृष्ण के उपासक हैं या सीताराम के। लेकिन, यह समझ जाएँगे कि युगल उपासक हैं। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आपको युगल उपासना करनी है।

दूसरी बात, साधना में ऐसा कोई जरूरी नहीं है कि दोनों को सदा साथ रखना है। मान लीजिए कि आप श्रीकृष्ण माधुरी का पद गा रहे है; आपको इस समय श्रीकृष्ण का ध्यान करने की इच्छा है, आप अपने सामने श्रीकृष्ण को खड़ा कीजिए। किसी समय आपको स्वामिनी जू का ध्यान करने की इच्छा है, तो राधारानी को खड़ा कीजिए। कभी आपको युगल उपासना करने की इच्छा है, तो दोनों को खड़ा कीजिए । परन्तु हमेशा हमें यह याद रखना है कि यदि उन्हें हम सर्वस्व मानेंगे तो जब चाहें जिस भाव में आ पाएँगे। लेकिन यदि आप दास्य भाव में भक्ति करेंगे तो फिर सखा नहीं मान सकेंगे। इसलिए टॉप की साधना कीजिए। कभी इच्छा हो रही है श्रीकृष्ण को प्रियतम मानने की, तो उसी भाव से उपासना करें। और पुरुष भी साधना करते समय यह न सोचें कि वे श्रीकृष्ण को कैसे प्रियतम मानेंगे! आपका शरीर पुरुष का है, पर हर कोई कई बार पुरुष या स्त्री दोनों हो चुका है। यह तो शरीर का सिर्फ नाम है।

उपासना मन से होती है। आपका जो भाव देह बनता है, वह मुख्य है। भगवान आपके शरीर को नहीं देखते। आपके मन से जो भावना बनायी जाती है, उसी का भावदेह बनता है। भावदेह से आपने भगवान का जैसा रूपध्यान किया है, आपको उनके वैसे ही साक्षात् दर्शन होंगे। इसलिए यहाँ यह महत्वपूर्ण नहीं है कि मैं पुरुष हूँ। महत्वपूर्ण यह है कि मैं आत्मा हूँ और आत्मा स्त्रीलिंग होती है।

परमात्मा आत्मा को ग्रहण करता है और आत्मा स्त्रीलिंग होती है। इसलिए मीरा ने जीव गोस्वामी से कहा था, अब तक मैंने जाना था कि पूरे ब्रह्माण्ड में एक ही पुरुष है और बाकी सब नारियाँ हैं। वह एक ही प्रियतम है। तुम एक दूसरे पुरुष कहाँ से आ गये ? - तो अब स्पष्ट है कि हम सब आत्माएँ हैं । आत्माओं के प्रियतम परम पुरुष श्रीकृष्ण हैं। दंडकारण्य के ऋषि-मुनि आत्माएँ हैं। तभी तो वे ऋषि-मुनि होकर भी राम को देखकर प्रियतम भाव से आकृष्ट हो रहे हैं। ये ऋषि-मुनि जोगी हैं, वैरागी हैं। काम उनको छू नहीं सकता, किंतु राम को देखकर कामुक हो गए! - आश्चर्य नहीं लगता? इसलिए उनको प्रियतम भाव से प्रेम करना है । पुरुष-स्त्री सभी आत्माएँ हैं और श्रीकृष्ण सबके प्रियतम हैं। :- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ।।

एक वास्तविक शिष्य कि सबसे बड़ी खुशी ।

एक वास्तविक शिष्य को सबसे बड़ी खुशी और सुख उस समय महसूस होता है जब कोई जीव उसके गुरू और ईंष्ट से प्रेम करना शुरू कर देता है , उसके गुरू और ईष्ट का तारीफ करता है , गुण गाता है ह्रदय से । वास्तविक भक्त तो वहीं है जो खुद तो अपने ईष्ट और गुरू से अनन्य प्रेम करता ही है और दुसरे को भी उनसे प्रेम करने के लिए प्रेरित करता हो , उसे अपने गुरू से मिलवाने के लिए भागिरथ प्रयास करता रहे , स्वयं निराश कभी न हो और दुसरे को भी हमेशा प्रेरणा दे , उस मार्ग पर चलने के लिए दुसरे का हमेशा सहयोग करे । दुसरे को उस दिशा में आगे बढ़ता देख खुश हो , हमेशा दुसरे को मान दे , हौसला बढ़ावे , अपने गुरू और ईष्ट का बात बतावे, किसी का अपमान न करें , कोई दुर्भावना न करें कभी किसी से , हरि और गुरू अपने ऐसे शिष्यों से बहुत खुश होते हैं तथा और अधिक कृपा करते रहते हैं उस पर :- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ( भक्ति पियुष से ) । ।

प्रश्न :- क्या जीव का प्रार्बध केवल कर्म फल को प्रभावित करता है या केवल कर्म को या कर्म तथा फल दोनों को? उदाहरण के साथ उत्तर दें

प्रश्न :- क्या जीव का प्रार्बध केवल कर्म फल को प्रभावित करता है या केवल कर्म को या कर्म तथा फल दोनों को? उदाहरण के साथ उत्तर दें।

उत्तर :- अच्छा प्रार्बध जीव के कर्म में सहयोग करता है , इसी को समय बलवान कहा गया है । खड़ाब प्रारब्ध आने पर जीव का मन विचलित होता है । 
इसी को शास्त्रों ने , संतो ने कहा है विनाश काले विपरीत बुद्धि, 
इसी कारण फिर कहा है जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है । 
खड़ाब प्रारब्ध आदमी के मति को खड़ाब कर देता है , जीव भगवान और संत में भी शंका उत्पन्न करता है और कल्याण पथ से विचलित हो जाता है । श्री महाराज जी ने भी कहा है कि खड़ाब प्रारब्ध पहाड़ पर चढ़ने जैसा है , इस समय जीव को विवेक यानि तत्वज्ञान को मजबूती से पकड़ कर मन को समझाना चाहिए और प्रायस जारी रखना चाहिए। अच्छा प्रार्बध आने पर यानि बलवान समय आने पर जीव सही मार्ग पर बड़ी तेजी से बढ़ता है ।
अत: खड़ाब समय आने पर क्रियामाण कर्म प्रभावित होता है और जब कर्म प्रभावित होगा तो फल तो प्रभावित होगा हीं । अत: साबित हुआ कि प्रारब्ध जीव के कर्म के साथ साथ उसके फल को यानि दोनों को प्रभावित करता है । अत: बुरे वक्त में तत्वज्ञान को कस कर पकड़ कर रखना चाहिए। यही तत्वज्ञान विवेक का काम करता है ।
इसलिए संसार में नियति किसी जीव को बुरा फल प्रदान करने के लिए एक खड़ाब प्रारब्ध वाले जीव को निमित्त बनाता है और किसी को अच्छा फल देने के लिए एक अच्छे प्रार्बध वाले जीव को निमित्त बनाता है ।
उदाहरण :- एक जीव का मृत्यू का समय आ गया , नियती ने तय किया उसकी हत्या होगी और हत्या के कारण मृत्यु होनी है । 
यानि मृत्यु फल है उस जीव के लिए ।‌
अब नियती एक खड़ाब प्रारब्ध वाले जीव को निमित्त बना कर उसकी इह् लीला समाप्त करा कर एक को फल दिया दुसरे को हत्या जैसी जघन्य पाप करवा कर फांसी कि सजा या उम्र कैद कर फल दे दिया ।
दुसरा उदाहरण :- एक जीव का प्रार्बध खड़ाब आया , यानि समय खड़ाब आया , नियती ने तय किया कि उसके पुर्व के गलत कर्म के कारण उसके धन कि हानी होगी फलाने समय में । 
अब नियती ने एक और खड़ाब प्रारब्ध वाले जीव को चुना पहले वाले जीव को फल देने के लिए माध्यम बना लिया । 
दुसरे जीव का बुद्धि भ्रष्ट कर दिया नियती ने और उसने पहले वाले जीव के हीरे का हार चुरा लिया । 
अत: खड़ाब प्रारब्ध ने दुसरे जीव से गलत कर्म करा लिया क्योंकि दुसरे जीव को उसके पुर्व गलत कर्म से उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर‌‌ दिया और उस जीव ने पहले वाले जीव को नूकसान कर दिया । जो नियती ने हीं फल के रूप में उसके भाग्य में पहले से लिख रखा था । 
आगे दुसरे जीव को भी चोरी के कर्म कि सजा फल के रूप आगे किसी और से दिलवा देगी नियती वक्त आने पर ।
अत: खड़ाब प्रारब्ध आए तो जबरदस्ती जीव को भगवान में और अधिक मन लगाना चाहिए।
विधाता के इस रहस्य को जो समझ जाता है वो पाप करने से बच जाता है और जो नहीं समझता वो फंस जाता है ।
अत: जो जीव साक्षात ब्रह्म स्वरूप श्री कृपालु महाप्रभु जी के कृपा के फलस्वरूप उनको अपना गुरू मान कर परम ब्रह्म श्री कृष्ण और राधा रानी को ईष्ट मान कर उनकी साधना करता है उसका कल्याण सुनिश्चित है । यह एक अति भाग्यशाली दिव्य योग तथा कृपा है , बहुत बढ़िया प्रारब्ध का परिणाम है । जीव को ऐसे दिव्य योग को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए। 
श्री राधे । 

जीव को शास्त्रों और तत्वज्ञान को पढ़ने और रटने कि जगह अपने गुरू पर श्रद्धा और विश्वास करके तत्वज्ञान को समझ कर मस्तिष्क में बैठाने और उसका उपयोग अपने जीवन में जरूर करना चाहिए, तभी लाभ निश्चित है , नहीं तो जीव तत्वज्ञान के बाबजूद भटक सकता है । तवज्ञान जानने और समझ लेने में बहुत अंतर होता है । तत्वज्ञान सुनना कृपा है और समझ कर उपयोग करना गुरू का विशेष कृपा का परिणाम ।
अत: विशेष कृपा के लिए "हमें गुरू कि सेवा और साधना भक्ति करनी पड़ेगी , चाहे इसी जन्म में करें या दस जन्म लगे , करना तो पड़ेगा - श्री महाराज जी कि हीं वाणी है यह ।
 तभी जीव अहंकार से मुक्त होकर दिव्य कृपा का अधिकारी बन सकता है और फिर नियती के कर्म और फलबंधन चक्र से सदा के लिए मुक्त हो सकता है, उनको पा सकता है , अन्यथा नहीं ।

ये क्या कर रहे हो ? भगवान कि भक्ति कर रहे हैं । भक्ति करके क्या करोगे ? भगवान कि भक्ति प्राप्त करेंगे । भक्ति प्राप्त करके क्या करेंगो ? भगवान कि भक्ति करेंगे ।

श्री महाराज जी :- ये क्या कर रहे हो ? भगवान कि भक्ति कर रहे हैं । भक्ति करके क्या करोगे ? भगवान कि भक्ति प्राप्त करेंगे । भक्ति प्राप्त करके क्या करेंगो ? भगवान कि भक्ति करेंगे । 

तो अभी क्या जो कर रहे हैं वो क्या है ? यह अपने अंत:करण को शुद्ध करने के लिय साधना है । साधना के फलस्वरूप जब अंत:करण शुद्ध हो जाएगा तो गुरू इसे दिव्य बना देगा , दिव्य बना कर फिर भक्ति प्रदान करेगा । इसके बाद हम भगवान को देख सकेंगे , सुन सकेंगे , उनका आलिंगन कर सकेंगे , उनकी सेवा कर सकेंगे , उनकी भक्ति कर सकेंगे , उससे पहले नहीं ।
अभी तो हमारा मन माया का, तन माया का , धन मायिक , और भगवान ठहरे दिव्य , भगवान को ए मायिक बस्तुएँ ग्राह्य नहीं है । फिर हम इन मायिक बस्तूओं से उनकी सेवा कैसे करेगें ? अत: हम भगवान कि जो भक्ति अभी कर रहे हैं वो अपने अंतःकरण को शुद्ध करने के लिए साधन भक्ति कर रहे हैं , इसे शुद्ध करके गुरू से भगवान कि भक्ति प्राप्त करेंगे । जब गुरू से भगवान कि भक्ति मिल जाएगी तब हम भक्त बन जाएंगे , उससे पहले नहीं । :- श्री महाराज जी ।

Thursday, 20 July 2023

गीता के श्लोक द्वारा सिद्ध सिद्धांत।

भगवान श्री कृष्ण :- संसार में कहीं भी भटक लो , संसार का कुछ भी प्राप्त कर लो , संसार में चाहे बड़ा से बड़ा धनकूबेर बन जाओ , कोई उधम कर लो , कोई भी उत्सव मना लो , कहीं सुख नहीं है । मैंने इन सब में से किसी में भी शास्वत सुख डाला ही नही है जो तुम प्राप्त कर लोगे , इसीलिए तो सुख ढूंढ़ते हो और अंत में दुख मिलता है संसार में, क्योंकि आनंद तो मैं हुं , मेरे लोक में हीं शास्वत सुख है । इसलिए तो संसार में कुछ भी करते हो अंत में दु:ख हीं मिलता है । मृत्यू लोक में सुख कैसे हो सकता है ? यहां तो जन्म से लेकर मृत्यू तक सब में दुख छुपा हुआ है । यह मेरी दासी माया है , यह लोक तो मेरा जेल मात्र है, इतना भी ज्ञान नहीं तुमको ? जब तक तुम मुझे नहीं प्राप्त कर लोग तुम इस जेल में भिन्न भिन्न शरीर में दुख झेलने आते रहोगे अनंत काल तक । लेकिन इसी जगत के माध्यम से मानव शरीर द्वारा मेरी भक्ति करके एक बार मुझे पा लोगे तो हमेशा के लिए मेरे साथ मेरे लोक में असली सुख और आनंद के साथ रहोगे । 
मुझे पाने के लिए हीं मैंने यह संसार बनाया है और मानव योनि बनाया है । गुरू बन कर तुमको समझाया अनेकों बार लेकिन तुम तो इस संसार को हीं सत्य समझ कर यहीं सुख और आनंद ढूंढने में लगे हुए हो , अनेकों मानव जीवन गवां बैठे । 
यह कभी संभव नहीं है कि इस संसार में सुख हासिल कर लो । इसलिए अब भी मान लो और मेरे शरण में आ जाओ एक बार मैं तुमको आवागमन के चक्र से मुक्त करके हमेशा के लिए अपनाकर अपने लोक गोलोक का सुख और आनंद प्रदान कर दुंगा । तुम मेरे पुत्र हो , तुम मेरे दिव्य संपत्ति ( ज्ञान, वैराग्य, प्रेमाभक्ति, यश , श्री तथा आनंद ) का उत्तराधिकारी हो , लेकिन अज्ञानता के कारण मेरी दासी माया कि दास्ता कर रहे हो , तुम माया को छोड़ कर केवल मेरे शरण में आ जाओ , मैं तुम्हें अपना अनश्वर षठ संपत्ति दे दूंगा , फिर तुम सदा के लिए आनंदमय हो जाओगे ।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। 15.7।।

सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।।18.64।।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ।।18:65।।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।18:66।। 

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताप कदाचन ।
न चाशुश्रुषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ।।18:67।।

य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति |
भक्तिं मयि परां कृत्वा मावैष्यत्यसंशय: ||18: 68||

न च तस्मान्नुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम: ।
भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि ।।18:69।।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।।8.7।।
 
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।8.14।।

 :- श्री कृष्ण ( गीता ) ।।

निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाए !!! को ठीक से समझना होगा ।

निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाए !!!
आजकल कलयूग में हितैषी आलोचक या सही निंदक न के बराबर मिलते हैं । कलयुग है भाई साहब , कबीर दास जी जिस निंदक के लिए कुटी छवाने कि बात किए हैं वो वास्तविक महापुरूष , संत , सज्जन हितैषी दोस्त , हरि गुरू , निष्पक्ष ज्ञानि शिक्षक, निष्पक्ष विद्वान मार्ग दर्शक , मां या बाप या वास्तविक शुभचिंतक के लिए कहें है । 

वो मुर्ख , दुर्जन तथा स्वार्थी प्रकृति निंदक के लिए नहीं कहे है यह दोहा ।‌

आज कल दुष्ट निंदक जब आरोप प्रत्यारोप में हार जाते हैं तो फिर खुद को आलोच्य का हितैषी बता कर ठगने के लिए टूटे संबंध को पुर्नस्थापित करने के लिए कबीर दास जी के इस दोहे का दूरूपयोग झट से करते हैं । हिडेन एजेंडा पहले से तय होता है ऐसे तथाकथित निंदक का ।

इसके लिए निंदक के प्रकृति को समझना आवश्यक हैं पहले :- 
वो तू मेरी खुजला मैं तेरी खूजलाता हुं । और जो तू मेरा न खूजलाया तो तुम से बुरा न‌ कोय बाला निंदक , ऐसा आलोचक सही आलोचक नहीं है , ऐसे आलोचक को , निंदक का एक उपाय करने को कहा गया है सूभाषितानी में इस कलयुग में । कि उसको बोलिए कि जरा आप पीछे घुम जाए , और पीछे घुम जाए , तो कहिए साहब अब आप यहां चले जाईए इससे पहले कि यहां का माहौल खड़ाब हो जाय ।‌ नहीं तो वो आपको डिस्टर्ब करता रहेगा, आप अच्छा किए तो बुराई , बुरा किय तो बुराई , दोनों में निंदा करेगा वो । क्योंकि वो निंदक नहीं है वो दूष्ट है उससे न दोस्ती भली और न ऐसे का साथ भला , उसके लिए आंगन में कुटी तो क्या उसके साथ रहने से निगेटिव उर्जा मन को खड़ाब करता रहेगा ।

मुर्ख दोस्त से समझदार दुश्मन कहीं अच्छा होता है । 
और सम्मान में भी यह देखना आवश्यक है कि जो सम्मान कर रहा है यह सचमुच का सम्मान कर रहा है या कोई मकसद छुपा है इसका भविष्य में ?  
क्योंकि चमचागिरी या चापलूसी भी एक सम्मान होने का भ्रम पैदा करता है । लेकिन जो समझदार है उसको पता चल जाता है कि कोई वास्तव में सम्मान कर रहा है या वनावटी या झूठा तारीफ जिसे असल में चापलूसी और चम्मच गिरी कहते हैं ।‌

देखना चाहिए कि अगर बिना मेरे डिजर्व किए हुए बेमतलब का मेरा कोई तारीफ कर रहा है तो समझना चाहिए कि जरूर इसका कोई स्वार्थ छिपा है मुझसे जो जरूरत से ज्यादा मेहरबान हो‌ रहा है मुझ पर आजकल । यह आज मेरे गलती में भी मेरा वाह वाह कर रहा है , जरूर कोई मतलव यह कभी न कभी हल करने वाला है मुझसे, डंसेगा यह समय आने पर , सम्मान का जाल फैला रहा है लुटने के लिए , मौका मिलते ही हाथ साफ कर जाएगा जरूर । ऐसे से भी बहुत दूर रहना चाहिए। झूठा तारीफ कोई करें तो तुरंत सावधान ।। 

हां अगर कोई उस बात के लिए हमारा सम्मान कर रहा है वाह कह रहा है जिसके लिए भगवान ने हमें कुछ गुण वास्तव में बख्सा है तो फिर ऐसे के सम्मान का स्वागत जरूर करना चाहिए और गुण पहचानने वाले को भी रिटर्न सम्मान देना अवश्य चाहिए। क्योकि सही सही सम्मान हौसला को बढ़ाता है और भी अच्छा करने के लिए प्रेरित करता है , यह सम्मान सकारात्मक होता है । ऐसे जीव‌ का शुक्रिया अदा अवश्य करना चाहिए। 

और आलोचना में तो देखना जरूरी है कि आलोचना स्वस्थ आलोचना है या नहीं , आलोचना सकारत्मक होना चाहिए, न की व्यंग का तीर , शब्द वाण समाज में किसी को नीचा दिखाने के उद्देश्य से या टांग खींचने की मकसद से किया गया है । 

अगर आलोचना सकारत्मक है तो स्वागत योग्य होता है , अगर खुद को ऊंचा और दुसरे को नीचा दिखाने के मकसद से आलोचना है तो यह आलोचना ठीक नहीं है । ऐसा आलोचना आलोचक के अहंकार का दर्पण मात्र होता है जिसे स्वीकार करना उसके दुर्भावना युक्त मन को और अधिक बढ़ावा देना है । सार यह कि समालोचना स्वागत योग्य है जो आलोच्य को सुधार का मौका देता है । अगर आलोचना आलोचक के अहंकार का सूचक है तो इसे स्वीकार करना आलोचक को एनार्की फैलाने का कारण बन सकता है । साथ साथ यह भी देखना जरूरी है कि आलोचक खुद कैसा है , कितना उदार है , कितना निर्दोष तथा निष्पक्ष है , कितना दोष रहित तथा दुर्भावना रहित है ? साथ साथ यह भी देखना चाहिए कि आलोचना में आलोच्य के प्रति हित कि चिंता है या नहीं , अगर चिंता दिखाई दे तो स्वीकार्य है पर अगर आलोचना में आलोचक के तिरस्कार , नफरत , द्वेष का गंध हो तो इसका प्रतिरोध आवश्यक है ।अगर प्रतिरोध संभव नहीं तो कम से कम ऐसे से दुर हो जाना या उदासीन रहना आवश्यक है ।
श्री राधे । :- गुरूदेव प्रदत ज्ञान तथा उनके अनुकंपा के परिणाम स्वरूप मेरे अनुभव के कलम से :- संजीव कुमार।।

तीर्थस्थल का महत्व

गुरू धाम और तीर्थस्थल का महत्व ( मनगढ़ धाम , ब्रजगोपिका धाम , वृंदावन धाम, बरसाना धाम ) :- गुरू धाम का महत्व तो सिर्फ साधकों और भावुक जनों के लिए ही होता है और वही बता सकता है , किसी घुमंतू ( visitor ) के लिए नहीं । 
गुरूधाम तो साधकों के लिए , शिष्यों के लिए उसके आत्मा का घर होता है । बाबुल का घर ।
गुरूधाम तो साधकों के लिए इतना प्यारा होता है जितना न तो उसका घर , उसका गांव , उसका शहर और न उसकी अपनी आत्मा । 
जहां हमारे गुरू देव का अवतरण हुआ था , जहां के प्रत्येक रज में हमारे गुरूदेव और ईष्ट की खुशबू है , जहां के कण कण में उनके उपस्थिति का प्रत्यक्ष एहसास है , जहां के मिट्टी में उनके लीलाओं कि यादें सिमटी हैं , जहां के दरों दीवार पर उनका प्रतिबिंब है , जहां के गली गली में उनके चरण का छाप है , जहां पर पहुंचने मात्र से शरीर में रोमांच होता है , मन में एक दिव्य ऊर्जा का संचार होता है । जहां प्रवेश करते हीं आत्मा को आनंद कि परमानुभूति स्वत: होती है ।
 
जहां रूकने पर ( जितना दिन रूको उतना दिन ) साधकों का प्रत्येक सांसें स्वत: रूपध्यान साधना बन जाती है और ह्रदय की प्रत्येक धड़कनें उनका भजन और कीर्तन । 

जहां जाकर संसार कि कामनाओं का शमन होता है । जहां अत्यधिक सुख और संतोष का अनुभव होता है , जहां प्रवेश करते हीं तमाम दैविक दैहिक भौतिक ताप का शमन होता है और मन में उमंग व्याप्त हो जाता है । जहां ह्रदय में हरि गुरू के प्रति दिव्य प्रेम भाव का उदय होता है , जहां गुरूदेव और श्यामा शयाम के लीला का आभास होता है । जहां प्रवेश करते हीं कलयुग का प्रभाव समाप्त हो जाता है । 

जहां जाकर उनके चरण रज में लोटने की इच्छा जागृत होती है और लोटने पर हमें ऐसा अनुभव होता है कि हम तो गोलोक में हैं । गुरूधाम तो इस धरा-धाम पर गोलोक का हीं प्रत्यक्ष प्रारूप है । यह महत्व है गुरू धाम का । 
लेकिन यह उसके लिए है जो भगवद् भावुक पिपासु है , असली जिज्ञासु हैं , साधक है , शिष्य है । गुरूदेव और ईष्ट से प्रेम है जिसको । 
उसके लिए नहीं जो घुमंतू प्रकृति का है , एक भिजिटर मात्र है , टूरिस्ट भर है । या महज औपचारिकता पुरा कर लौट जाने वाला जीव है । 
घुमंतू के लिए तो गुरूधाम या तीर्थ स्थल केवल संसारिक मौज मस्ती के जैसा जगह मात्र है , गंदगी फैलाने का जगह । फोटू खिंचाने का जगह और फिर उस परम पवित्र दिव्य स्थान को भूल कर दुसरे किसी नय घूमने कि जगह तलाश करने के रास्ते चल देने कि जगह ।‌

मैं तो गुरू देव से यही प्रार्थना करता हूंं , कि जब तक यह पृथ्वी सलामत रहे तारे और सूर्य का अस्तित्व रहे आपके धाम का यश , नाम जगत के कोने कोने में फैले , यह जीवों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करें । युगों युगों तक आपके महिमा का गुण गान हो और जो भी यहां भाव भक्ति से आवे उसके ह्रदय में आपके और श्री राधाकृष्ण के प्रति प्रेम का संचार हो । हे गुरूदेव आप आपका धाम हमारे प्राण से भी बढ़ कर है । आपने हीं कहा है हमें धाम और धामी में कोई अंतर नहीं होता । हे गुरूदेव आपका इकवाल हमेशा बुलंद रहे । धाम का दिव्य प्रकाश कभी धूमिल ना हो । हमारे प्यारे गुरू धाम - मनगढ़ धाम और ब्रजगोपिका धाम की जय ।। 
श्री राधे ।। :-केवल आपको हीं चाहने वाला‌ आपका पागल प्रेमी संजीव कुमार।

आजकल कलयुग में समझाने वाले अधिक है समझने वाले कम।अपने मन की , अपने दिल कि बात करने वाले अधिक मिलते हैं , दुसरे कि सुनने वाले बहुत कम ।

आजकल कलयुग में समझाने वाले अधिक है समझने वाले कम।
अपने मन की , अपने दिल कि बात करने वाले अधिक मिलते हैं , दुसरे कि सुनने वाले बहुत कम ।

मसविरा देने वाले अधिक मिलते हैं , उस मसविरे को खुद के जीवन में लागु करने वाले बहुत कम। 

जरूरत पर काम साधने वाले अधिक मिलते हैं वक्त पर काम आने वाले कम । 

चरित्र कि बात करने वाले अधिक मिलते हैं , चरित्रवान बहुत कम ।

ईमानदारी का पाठ पढ़ाने वाले अधिक मिलते हैं , ईमानदार बहुत कम । 

काम बिगाड़ने वाले बहुत मिलते हैं, बनाने वाले बहुत कम ।

गुमराह करने वाले अधिक मिलेंगे , सही मार्ग दिखाने वाले कम ।

हतोत्साहित करने करने वाले अधिक मिलेंगे , उत्साहित करने वाले कम ।

टांग खेंचने वाले अधिक मिलेंगे , आगे बढ़ने में सहायता करने वाले कम ।

दिल जले अधिक मिलेंगे , दिल सगे बहुत कम । 

देश भक्ति का पाठ पढ़ाने वाले अधिक मिलते हैं , देश भक्त बहुत हीं कम ।

मंदीर मस्जिद गुरूद्वारा गुरूधाम गिरजाघर तीर्थ में भीड़ अधिक मिलते हैं भक्त बहुत कम ।

बड़ी बड़ी बातें करने वाला बहुत है लेकिन बड़ा काम करने वाले बहुत कम ।

शर्म भी नहीं आती । इसलिए इनका परवाह न करें , आगे बढ़ते रहें , भज गोविंदम्, भज गोविंदम् , भज गोविंदम्। 
पहले स्वयं को बनाएं फिर दुसरे को समझाएं । श्री राधे ।:- संजीव कुमार

आपका इंप्लायर या क्लाईंट जितना पैसा आपको देता है आपका कर्तव्य है कि उतने का काम करके जरूर उनका कर्ज जरूर उतारें , वल्कि उनके दिय पैसे ,‌सैलरी के एवज से अधिक उनका काम कर के दें जिसके लिए वो आपको हायर कियें हैं ।

सूबिचार : आप नौकरी करते हैं या सर्विस सेक्टर का व्यापार ,
आपका इंप्लायर या क्लाईंट जितना पैसा आपको देता है आपका कर्तव्य है कि उतने का काम करके जरूर उनका कर्ज जरूर उतारें , वल्कि उनके दिय पैसे ,‌सैलरी के एवज से अधिक उनका काम कर के दें जिसके लिए वो आपको हायर कियें हैं । 
नहीं तो भगवान के यहां अनावश्यक कर्ज आप पर चढ़ जाता है । हरेक कर्म का हिसाब भगवान के यहां जरूर होता है । 

अगर सैलरी के एवज में कम काम करते हैं तो कर्ज बढ़ता है और फिर अगले जन्म में या इसी जन्म में चुकाना भी पड़ता है । 
कर्म के इस रहस्य को समझना आवश्यक है । 

देखते होंगे , बहुत से लोगों को कि किसी को जी तोड़ मेहनत करना पड़ता है पर उसके एवज में उसको कम पैसा मिल रहा है , बेचारा कहता है हमारा किस्मत खड़ाब है , दुसरे को अधिक मिल रहा है same post पर या same work के लिए और किसी को कम । 
यह इसलिए कि आपने पिछले जन्म में या भूतकाल में इसी जन्म में किसी का काम कम किया और पैसा अधिक लिया ,
तो भगवान की प्रकृति तो हिसाब समय आने पर करेगी हीं । हमें हर हाल में ईमानदार रहना चाहिए अपने संतुष्टी के लिए , सकुन के लिए , संतोष के लिए , अच्छी नींद के लिए , सेहत के लिए आदि । 
अपने इंप्लायर, क्लाईंट , भेंडर ( सप्लायर), कस्टमर्स तथा सबोर्डिनेट में अच्छा ताल मेल बना कर चलें एवं हमेशा निष्पक्ष रहें, विनम्र रहें तथा इगो का त्याग करके चलें ।

जो इस‌ सिद्धांत पर चलतें है वो एक हीं जगह लंबा समय चलते हैं और जरूरत पर भी जाए तो न‌ कभी नौकरी कि कमी होती है और न क्लाईंट की न कस्टमर की । भगवान के घर एप्रऐजल ठीक रहना आवश्यक है , ईश्वर सदा ऐसे का मदद करते हैं । याद रहे हमारा कर्म हमारे हाथ में हैं और हम अपने हीं कर्म के प्रति उत्तरदाई होते हैं हमेशा । 
This is principles of karma
श्री राधे :- संजीव कुमार ।

एक बहुत महत्वपूर्ण हमारे काम का प्रश्न कुछ लोगों ने पुछा है कि उनको गाने नहीं आता है , यानि उनको लय ताल सुर कि जानकारी नहीं है फिर एकांत साधना में पद को कैसे किस तरह गा कर रूपध्यान करें ?

एक बहुत महत्वपूर्ण हमारे काम का प्रश्न कुछ लोगों ने पुछा है कि उनको गाने नहीं आता है , यानि उनको लय ताल सुर कि जानकारी नहीं है फिर एकांत साधना में पद को कैसे किस तरह गा कर रूपध्यान करें ? 

उत्तर :- देखिये किसी ने आपके मन में एक भ्रान्ति पैदा कर दिया है कि रूपध्यान साधना के लिए एक अच्छा गायक होने कि आवश्यकता होती है , यह धारणा श्री महाराज जी के सिद्धांत ज्ञान , तत्वज्ञान के विल्कूल विपरित है । 
भगवान और गुरू भाव देखते हैं , सुर लय और ताल नहीं देखते हैं अपने साधक का , अगर ऐसा रहता तो बड़े बड़े गवईया हीं केवल भजन कीर्तन का अधिकारी होता ! और भक्ति के लिय योग्यता सुर ताल लय में expertise होना होता । 
जबकि मैं बता दूं कि जितने भी गवईयां है उनका विशेष ध्यान तो अपने सुर ताल और लय को सजाने में लगा रहता है और उपर से उनको अच्छे सुर का अहंकार भी होता है । वो क्या खाक साधना का लाभ उठा पांऐगे , लोगों को खूश करना उनसे तारीफ पाना ऐसे गवईया का विशेष उद्देश्य होता है । 

नंबर दो :- भगवान और वास्तविक महापुरूष अपने इंद्रियों के गुलाम नहीं होते हैं । वो इंद्रियांतित होते हैं , उनको न कर्णसुख कि जरूरत है और न नयन सुख कि जो उनके सामने विशेष सुर ताल और लय वाला एवं सुंदर वस्त्र और आभूषण वाला हीं गा कर साधना कर सकता है । 

सुर ताल लय कि जरूरत आम लोगों के लिए जरूरी है , और सामुहिक साधना में थोड़ा जरूरी है क्योंकि वहां बिना भाव‌ वाले लोग भी होते हैं जो पद संकीर्तन के सुर लहरी में हीं खोने को हीं साधना समझते हैं जबकि सुर लहरी में खोना अपना सुख है जीव का साथियों । कर्ण सुख । और अपना सुख तो साधना है ही और न हो सकता है कभी । 

हमको तो भगवान और अपने गुरू को अपने भाव से रिझाना है न कि अपने सुर लहरी और ताल से । 
भगवान और संत भावक ग्राही होते हैं वो सुर लहरी और लय ग्राही नहीं । 
अगर वो सुर लहरी लय ग्राही होते तो बड़े बड़े गायक जैसे लता मंगेश्कर और बड़े बड़े गवईया आदि को भगवद प्राप्ति हो जाता झट से । 

आजकल कुछ बाबा जी लोग सुर लय ताल में खो कर वाह वाह करते हैं मंत्र मुग्ध हो जाते हैं गायक के गाने पर , ऐसे बाबा जी अधिकतर भोगी होते हैं, अपना सुख , कर्ण सुख में खोने को हीं भक्ति समझते हैं । 
जबकि यह सब लोक रंजन है , जन रंजन । गायक गाते हैं ताकि अधिक से अधिक लोग ताली बजावें और उनका नाम हो , लोग उनको बुक करें , बुलावें , धन दे । 
कईयों को तो गाने के लिए हीं झगड़ते और मनमुटाव करते देखा है मैंने कि हम गाऐगे तो हम गाऐगे । यह सब नामापराध है । 
ध्यान रहे केवल लय सुर ताल का ग्राहक साधक नहीं होते , भक्त नहीं होते , वो अपने कर्ण सुख का ग्राहक होते हैं । अपने मन का रंजन चाहिए उनको लय सूर और ताल से । जरूरी नहीं कि जो लोग लय ताल सूर पर झूमते है वो भगवान के रूप गुण लीला के ध्यान पर , और भाव पर मुग्ध हो । 

तो सिद्धांतों के अनुसार एकांत साधना में आपको जैसे भी गा कर साधना करना आता है गाइए और ध्यान पद के भाव पर रहे न कि सुर लय ताल पर । 

कोई फिकस्ड मत करिए कि इस पद को हमें ऐसे हीं गा कर साधना करना है । नहीं तो नहीं आवे तो हम रूपध्यान कर हीं नहीं सकते , गा हीं नहीं सकते । 

अगर किसी ने ऐसा कहा है आपको तो वो खूद गुमराह है और आपको भी साधना से दूर रखने का पाप कर रहा हैं । 

भगवान और गुरू के यहां ऐसा कोई विशेष रिजर्वेशन नहीं है कि एक बढ़िया गायक हीं रूपध्यान साधना कर सकता है, और जिसको गला नहीं वो एकांत साधना का अधिकारी नहीं है । बड़े बड़े गायक इसी अहंकार में , अभिमान में आज कहीं के नहीं होते और आगे नहीं बढ़ पाते क्योंकि अपने सुर ताल और लय को संवारने पर हीं उनको हमेशा ध्यान रहता है ,‌भगवान के रूपध्यान पर नहीं । गाने का सूक्ष्म अहंकार उनको साधना पथ से कब दूर धकेल देता है यह उनको एहसास हीं नहीं होता । 

इसलिए आप अपने तरीके से गाइए पद को लेकिन ध्यान रखना है कि आपका भाव पद् के अनुकूल हो , पद का जो 'भावार्थ' है वो सही सही हो , उसी भावार्थ के अनुसार रूपध्यान करके न अधिक जोर से और न इतना धीमे आवाज़ में गाइए कि बाहर का शोर सुनाई परे और ध्यान भटके । मैं तो ऐसे हीं करता हूं हर रोज जब भी मन करता है एकांत रूपध्यान साधना में खुद गाता हुं । न‌ मुझे सुर का ज्ञान है न लय का और न ताल का , भगवान और महापुरूष भाव देखते हैं सुर लय ताल कभी नहीं , हमें भगवान और गुरू को रिझाने के लिए गाना है न कि लोगों के मन को लुभाने के लिए इस बात का ध्यान रहे । 
नोट कर लीजिए संसार में लोगों के मन को रिझाने के उद्देश्य से गाने वाला लोक रंजक और हरिगुरू को भाव भक्ति से रिझाने वाला साधक है । भगवान को भाव का अश्रू चाहिए न कि राग लय ताल और सुर का । 
जैसे गाना आवे बेहिचक, बे झिझक गा कर साधना करें। श्री महाराज जी सहयोग करते हैं । 
श्री राधे । अगर भगवान जीव के सुर लय ताल से रीझते तो बैजू बावरा, तानसेन आदि का नाम भगवद् प्राप्त संतों में सुमार होता, तानसेन के गाने से पत्थर पिघल जाता था और हिरण मंत्र मुग्ध होकर आकर्षित होता था न कि भगवान । कहीं सूना है आपने इतिहास में कि किसी जीव के राग रागिनी सुर लहरी लय ताल से प्रभावित होकर भगवान दर्शन दे दिया हो ।

हां सुर ताल लय लहरी से संसारिक जीव और जंतु मुग्ध अवश्य हुए हैं यह इतिहास में भी है, पर भगवान नहीं । भगवान तो भाव से रीझते है । चाहे साधक को सुर लय ताल का जानकारी हो या न हो । हां यह सुर लय ताल नृत्य आदि सहायक होता है मन को इस बहाने कंट्रोल करके भगवान में लगाने के लिए साधन के तौर पर, लेकिन कंपल्सरी नहीं है । नहीं तो वो बेचारा क्या करें जिनको इन साधनों का ज्ञान नहीं , बल नहीं ,‌वो बेचारा रूपध्यान कैसे करता फिर , यह तो खास लोगों का हीं मार्ग हो जाता ।। 

जब से मुझे इस बात का एहसास श्री महाराज जी एकांत रूपध्यान के दौरान आभास कराए तब से मैने पद के भाव पर मुग्ध होने का रहस्य समझ लिया और जब से सुर ताल लय में न झूम कर पद के भाव में खो कर झूमना शुरू किया , ध्यान करना शुरू किया तब से बहुत लाभ पाया है मैंने । 

तो साधना करने के दौरान इस बात का हमेशा ध्यान रखना आवश्यक है कि कहीं हम सुर ताल लय पर मुग्ध होकर तो नहीं झूम रहे हैं । तुरंत सचेत होकर भगवान के रूप गुण नाम लीला में खो जाना चाहिए नहीं तो मन कब घुमा देता है पता नहीं चलता क्योंकि मन को तो बढ़िया लय ताल सुर और साजो बाजों तथा प्राकृतिक साज सज्जा पर हीं खोने का आकर्षित होने का आदत है मायाबद्ध होने के कारण । 

इसलिए संतो ने बहुत बढ़िया कहें है कि :- 

"जगद् का रंग क्या देखूं तेरा दीदार काफी है 
करूं मैं प्यार किस किस से, तेरा एक प्यार काफी है। 
जगद् के साजो बाजों से हुए हैं कान अब बहरे ।
कहां जाके सुनू अनहद तेरा झनकार काफी है ।‌" 

हमें तो भगवान के नाम रूप गुण लीला के वर्णनों के पद के भाव में खोना है न कि संसारिक चमक दमक , सुर ताल लय में । 
भगवान जब यह देखते हैं कि इसका मन तो मुझको छोड़ कर अपने कर्ण सुख में लीन हैं तो मुख फेर लेते हैं ।हमें सावधान रहना चाहिए। 
श्री राधे । :- 
गुरूदेव प्रदत ज्ञान से । :- संजीव कुमार ।।

एक नट था , मदारी , वो लोगों के मनोरंजन के लिए करतव दिखाया करता था और अपना जीविका चलाता था ।

एक नट था , मदारी , वो लोगों के मनोरंजन के लिए करतव दिखाया करता था और अपना जीविका चलाता था । 
एक दिन मंदिर में वो देखा कि कुछ लोग ( पंडित आदि के साथ ) भजन कीर्तन कर रहे हैं , वो भी वहां बैठ गया भजन कीर्तन में , लेकिन उसको न सुर का ज्ञान था और न लय का, वो शोहर में बेसुरा गाने लगा वहां , भैंस जैसी आवाज थी उसकी । कुछ लोगों ने उसको डांट दिया , ऐ चुप हो जा , हमें भजन कीर्तन में डिस्टर्ब मत कर तुम कोई पद मत दूहरा , तुम्हारा सूर लय गला ठीक नहीं । 

वो बेचारा सोंचा कि इनके पास जो कला है उससे ये लोग भगवान को रिझाते हैं , मैं भगवान को कैसे रिझाऊं ? 
उसने सोंचा कि मुझे रस्सी पर चलने कि कला आती है , उसी से मैं भगवान का मनोरंजन करूंगा , अभी तक लोगों का किया है अब भगवान का करूंगा । 

सबके चले जाने पर वो मंदिर के अंदर गया , पट बंद कर लिया , विल्कूल एकांत साधना कि तरह और दोनों छोड़ पर दो खुंटा खड़ा करके उसके दोनों छोड़ पर रस्सी बांध दिया और उसपर चल कर भगवान को रिझाने का हर रोज प्रयास करने लगा ।
कुछ लोगों ने उसका यह नौटंकी देख लिया और पंडित को कंप्लेन किया कि यह मंदिर के अंदर अपने कला का प्रैक्टिस करता है इसको रोकिए ।

पंडित ने उसको बुला कर डांटा और मना कर दिया । 
वो बेचारा डर गया ।‌
अब दूसरे दिन वो बहुत दुखी था वो अपने घर में मायुस बैठा था ।

भगवान ने अपने भक्त के भावना को आहत देखकर बहुत दुःखी हुए और पंडित को स्वप्न में बहुत डांट पिलाई ।
पंडित सीधे उस नट के घर पर पंहुचा और पैरों में गिर परा , बोला कि धन्य है आप , इतने दिनों से हम। सब भजन कीर्तन करते हैं आज तक भगवान के दर्शन नहीं हुआ लेकिन आपके कारण भगवान ने हमें अपना दर्शन दिया , आप प्रत्येक रोज अपने कला से भगवान को रिझाइए । 
मुझे माफ़ कर दीजिए । हम आपके शरण में है । 
तो इस प्रकार कोई भी कला भगवान को रिझाने में सहायक है केवल संगीत नहीं । 
यह सब साधन मात्र है अगर साधन नहीं तो कोई फिक्र नहीं । 
श्री महाराज जी का तो सिद्धांत ही है ।
" साधन हीन दीन मैं राधे ,तुम करूणामई प्रेम अगाधे।" 
तो जैसे आवे वैसे रूपध्यान हमें करना चाहिए। भाव आवश्यक है साधन नहीं । और साधन का अहंकार तो डूबाने वाला होता है । श्री राधे ।।:- श्री महाराज के प्रवचन से ।

जो सत्य बोलता है, सत्य आचरण करता है उसे कभी किसी का श्राप नहीं लगता अर्थात् उसका अहित चाहनेवाला उसके सत्यता को नष्ट नहीं कर सकता कभी।

सत्यं वद धर्मं चर स्वाध्यायान्मा प्रमदः ।
 आचारस्य प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः ॥ :- तैत्रियोपनिषद 
 भावार्थ - सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, साधना में प्रमाद् अर्थात आलस्य , मत करो, , । श्रेष्ठ पुरूषार्थ तथा कर्मयोग से व्यक्ति को कभी मन नहीं चुराना चाहिए।

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।  
 जाके हिरदय साँच है, ताके हिरदय आप ।।

साँचे श्राप न लागै, साँचे काल न खाय । 
 साँचहि साँचा जो चलै, ताको काह नसाय ।।:- कबीरदास 

जो सत्य बोलता है, सत्य आचरण करता है उसे कभी किसी का श्राप नहीं लगता अर्थात् उसका अहित चाहनेवाला उसके सत्यता को नष्ट नहीं कर सकता कभी। सत्य के राही को काल , कल्पना एवं समय-चक्र कोई हानि नहीं पहुँचा सकता ।
सत्य कि विजय हमेशा होती है , बादल कुछ समय के लिए हीं सूर्य या चंद्रमा को ढंक सकता है, हमेशा के लिए कभी नही ।

सत्य केलिए लड़ने की आवश्यकता नहीं होती कभी,सत्य को स्वीकार करने कि जरूरत होती है पहले ,‌ सत्य को बिना स्वीकार किए जो सत्य के लिए लड़ने की बात करता है वो मतिमंद है ।
:- संजीव कुमार 

आगम और निगम किसे कहते हैं श्रूति प्रस्थान और स्मृति प्रस्थान क्या है ?

प्रश्न :- आगम और निगम किसे कहते हैं श्रूति प्रस्थान और स्मृति प्रस्थान क्या है ? 
उत्तर :- निगम का मतलव भगवान के मुख से निश्रित श्लोकों का समुह , उनके मुख से निकला वाक्य , यानि उनकी आप्त वाणी वेद , वेदांत आदि , जिसे भगवान श्री कृष्ण ने ब्रह्मा , विष्णु तथा शंकर जी को सुनाया तथा ब्रह्मा जी ने मनु , वेदव्यास , नारद, सप्तर्षियों आदि को सुनाया , वेदव्यास ने शुकदेव परमहंस जी को सुनाया अत: इसे श्रूति प्रस्थान भी कहा जाता है और चूंकि यह भगवान के मुख से प्रकट हुआ है अतः इसे विनिर्गत ग्रंथ कहते हैं । 

पहले यह भगवान से लेकर सभी ने अपने शिष्यों को सुनाया था अतः यह सुन कर याद रखने वाला दिव्य वाक्य था , लिखित स्वरूप में नहीं था । इसलिए वेदों को श्रूति प्रस्थान भी कहा गया है । 

फिर द्वापर में वेदव्यास जी ने कलयुग के लोगों का भविष्य देख लिया था कि कलयुग में लोगों कि स्मृति यानि यादाश्त तथा सोंचने एवं समझने कि शक्ति कमजोर होगी, लोग सुनकर जल्द भूल जाएगें इसलिए उन्होंने इसे गणेश जी से लिखवाकर लिखित ग्रंथ का स्वरूप दे दिया । इसलिए वेदों तथा वेदांतों को "निगम" कहते हैं ।

और गीता , श्री मद् भागवद् , रामायण आदि स्मृत ग्रंथ और स्मृति प्रस्थान कहलाते हैं । स्मृत ग्रंथ भी दिव्य तथा चिन्मय ग्रंथ है क्योंकि यह स्वयं भगवान या उनके अवतार या भगवद् प्राप्त महापुरुषों के द्वारा प्रकट किया गया है जैसे वेदव्यास , तुलसीदास, सुरदास, कबीर दास , कालीदास आदि । इसलिए स्मृत ग्रंथ भी निर्दोष तथा निष्कलंक है , दोष रहित है । 

और " आगम " पुराण को कहते हैं , उपनिषद को कहते हैं जो वेदों के श्लोकों को समझने में सहायक है तथा इनके दिव्य चिन्मय श्लोकों को समझ कर व्यवहार में लाकर उससे मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है । 
आगम के बिना वेदों को समझना असंभव है । 
अत: "निगम" यानि वेद, दिव्य तथा चिन्मय आध्यात्मिक साइंस है, शास्त्र है, और आगम इनका व्यवहारिक साइंस है, साधना भक्ति का मार्ग और तरीका , बिधि , निषेध , उपाय , मंत्र , तंत्र , पुजा, पाठ , यज्ञ , हवन विधि आदि का ग्रंथ है जैसे आयुर्वेद, वैदिक ज्योतिष शास्त्र , कर्मकांड वाली, पुराण , उपनिषद आदि आगम शास्त्र है । 

ऐसे वेदों को वास्तविक महापुरुषों के अलावा कोई सही से समझा नहीं सकता । अत: वास्तविक महापुरूषों के द्वारा इसे आसान बना कर समझाया गया उनके लिखे ग्रंथ प्रवचन आदि को भी आगम कहते हैं । 

अत: श्री कृपालु महाराज जी द्वारा लिखा गया तमाम ग्रंथ , पद् संकीर्तन आदि भी "आगम" है । आगम और निगम दोनों निष्कलंक है , पुंदोष पंक रहित है , दिव्य हैं ।

एवं जो मनुष्य भगवद् प्राप्त नहीं थे या नहीं है फिर भी वेदों को विनिर्गत तथा स्मृत ग्रंथों को अपने मन से अर्थ किया है या यूं कहें कि अर्थ का अनर्थ किया है , अपने मायिक भ्रांत बुद्धि से इनका गलत अर्थ किया है वो कृत ग्रंथ कहलाता है । 
यह कृत ग्रंथ हीं हिन्दू धर्म में अनेको अंधविश्वासों को बढ़ावा दिया है क्योंकि यह कुछ लोगों के अपने परसेशन के आधार पर उनके द्वारा लिखा गया मनगढ़ंत बातों की किताबें है , इसलिए इसमें अनेकों प्रकार के दोष है , यह अशूद्ध है एवं मार्ग से भटकाने वाला है । वास्तविक साधकों को इनका सहारा नहीं लेना चाहिए कभी , यह कुसंग है मायिक पुस्तकें हैं क्योंकि मायाबद्ध लोगों के द्वारा लिखा गया है । 
:- संजीव। 

बहुत से ऐसे साधक भी है जिन्होंने उनको प्रत्यक्ष देखा है, सुना है, लेकिन उनको भी डाउट रहता है कि वो कैसे जाने कि श्री महाराज जी , युगल सरकार श्री राधा कृष्ण उनको अपना लिए हैं, अपना मान चुके हैं या नहीं ? वो उनको अपना प्रेम दिय है या नहीं ?

बहुत से ऐसे श्रद्धालु लोग है जिन्होंने श्री महाराज जी का प्रत्यक्ष दर्शन नहीं किया है तथा बहुत से ऐसे साधक भी है जिन्होंने उनको प्रत्यक्ष देखा है, सुना है, लेकिन उनको भी डाउट रहता है कि वो कैसे जाने कि श्री महाराज जी , युगल सरकार श्री राधा कृष्ण उनको अपना लिए हैं, अपना मान चुके हैं या नहीं ? वो उनको अपना प्रेम दिय है या नहीं ? 
तो बड़ा आसान है इन बातों को खुद से जानना अपने ह्रदय को टटोल कर । 
कुछ सवाल का उत्तर आप अपने दिल में ढूंढ़िए आपको उत्तर मिल जाएगा । 

वो प्रश्न है - 
१. क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि आप प्रत्येक क्षण, प्रत्येक दिन, श्री महाराज जी का प्रवचन , उनकी वाणी , उनकी बातें पढ़ें , सुने और देखें तथा उनकी तस्वीरें देखने को हरवक्त लालायित रहते हैं ? 

२. क्या आपको नहीं लगता है कि आप श्री राधाकृष्ण कि युगल छवि हीं अब आपके मन को लुभाने लगा है अब ? आप उन्हें ही सबसे अधिक पसंद करते हैं ?

३. क्या आपको नहीं लगता कि श्री महाराज जी द्वारा प्रकटित पद को सुनें , पद के धून गुणगुणाय ? 

४. क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि आपको केवल श्री महाराज जी , उनका धाम , वृंदावन , बरसाना , प्रेम मंदिर , कृति मंदिर , भक्ति भवन आदि सबसे अधिक लुभाने लगा है ? 

५. क्या आपको नहीं लगता है कि जब भी आप श्री महाराज जी और अम्मा कि छवि देखते हैं , श्री राधाकृष्ण कि छवि देखते हैं तो सबसे अधिक प्रसन्नता होती है ? उनको याद करके आंखें भर जाती है , आंसू छलकने लगते हैं ?

अगर उपर्युक्त पांचों सवाल का उत्तर आपका दिल हां में देता है तो यह पूर्णतया विश्वास कर लीजिए कि श्री महाराज जी आपको अपना लिए हैं और अपने प्रेम का दान आपको कर चुके हैं । 

अब कमी है तो केवल इन बातों को रियलाईज करने का और विभोर होने का । जितना अधिक रियलाईज आपको होगा, प्रेम लता रूपी पेड़ अधिक तेजी से बढ़ेगी , बड़ी होगी आपके ह्रदय रूपी सरोवर में और आपको उतना हीं अधिक प्रेम का प्रत्यक्ष अनुभव अपने आप होगा । 
और यही रियलाईजेशन कि तीव्रता उनका प्रत्यक्ष दर्शन की व्याकुलता को बढ़ाती जाएगी और एक दिन उनके दिव्य युगल स्वरूप का आपको दर्शन हो जाएगा । 

श्री महाराज जी तो हमें प्रेम दान कर चुके हैं , वो अपना काम कर चुके हैं , अब इसे फील करना और उसको बढ़ाने का काम हमारा है , 99% भगवद् प्राप्ति वो हमें करवा चुके हैं , अब केवल 1% वांकि है । और यह 1% हमारे अपने उपर निर्भर करता है अब । 
जिस दिन इस 1% कमी को हम पुरा कर लेंगे भगवद् प्राप्ति हो जाएगी । उनके द्वारा हमारा अंतःकरण यानि मन बुद्धि चित्त तथा इंद्रियां दिव्य बना दिया जाएगा जिसके फलस्वरूप हम उनके वास्तविक स्वरूप को सदा को देख पाएंगे , उनकी सेवा , उनका आनंद हमको मिल जाएगा । 
 इन बातों पर विश्वास है न आपको ? इस कलिकाल में भगवान श्री राधा कृष्ण तथा श्री कृपालु महाप्रभु जैसे परम दिव्य महापुरुष के प्रति आकर्षण, प्रेम , लगाव ह्रदय में उत्पन्न होना कोई साधारण बात नहीं है । यह उनकी कृपा और प्रेम दान का हीं परिणाम है । 
:- आपका संगी संजीव कुमार ।।

अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँति। सब तजि भजन करौं दिन राति॥

अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँति। 
सब तजि भजन करौं दिन राति॥

सीता राम चरन रति मोरें। 
अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।

अब मोहि भा भरोस हनुमंता, 
बिनु हरि कृपा मिलहि नहि संता।

राम कृपाँ नासहिं सब रोगा। 
जौं एहि भाँति बनै संजोगा॥

सदगुरू बैद् बचन बिस्वासा। 
संजम यह न बिषय कै आसा॥

रघुपति भगति सजीवन मूरी। 
अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥

एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। 
नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥

शरणागत के राम रखवाला 
दीन दयाल राम पद प्यारा ।।

जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। 
तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥

निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
 मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥

निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। 
बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा॥

राम कृपा बिनु सुनु खगराई। 
जानि न जाइ राम प्रभुताई॥

जानें बिनु न होइ परतीति। 
बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।

प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। 
जिमि खगपति जल कै चिकनाई।।

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। 
आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। 
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। 
जोग न मख जप तप उपवासा।।

सरल सुभाव न मन कुटिलाई। 
जथा लाभ संतोष सदाई।।

मोर दास कहाइ नर आसा। 
करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा।।

बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। 
एहि आचरन बस्य मैं भाई।।

बैर न बिग्रह आस न त्रासा। 
सुखमय ताहि सदा सब आसा।।

अनारंभ अनिकेत अमानी। 
अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी।।

प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। 
तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा।।

भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। 
दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई।।

सीता-राम मनोहर जोरी, 
दशरथ नंदन जनक दुलारी।।

मंगल भवन अमंगल हारि
द्रवहूं सो दशरथ अजिर बिहारी।।

राम सिया राम सियाराम जय जय राम ।।
- रामचरित्रमानस ।।

अयोध्या में जो हैं अबध बिहारी 
वहीं ब्रज के श्याम बिहारी।। 

ब्रज कि जो हैं राधा रानी 
वहीं अयोध्या की सीता रानी‌ ।।

जाके प्रिय न राम बैदेही, 
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जदपि परम सनेही। :- विनय पत्रिका ( तुलसीदास)
भावार्थ :- जिसके ह्रदय में राम नहीं, जो राम को नहीं मानता है उनका त्याग करना हीं कल्याणकारी है मानव के लिए चाहे वो कितना भी सगा और चाहने वाला क्यों न हो । 

बिना हरि कृपा के संत रूप में परम दिव्य गुरू नहीं मिल सकता । और बिना गुरू कृपा के कोई राम को नहीं जान सकता , भले वो किताब पढ़ के राम के प्राकृत इतिहास को जान ले , रट ले । लेकिन राम वास्तव में कौन है वो कभी नहीं जान सकता गुरू के बिना । और बिना जाने उनसे वास्तविक प्रिति नहीं हो सकती है कभी । अगर हम राम के वास्तविक दिव्य स्वरूप को जान पाए हैं तथा उससे भी बड़ी बात कि अगर राम से प्रिति उपजी है ह्रदय में तो समझें कि यह गुरू कृपा का परिणाम है । उनके अकारण करूणा का प्रसाद है ।

बड़े बड़े उन डिग्रीधारकों के डिग्रियों का कोई मूल्य नहीं जिनकी भाषा, वाणी, सोंच, चरित्र तथा व्यवहार खड़ाब है ,

बड़े बड़े उन डिग्रीधारकों के डिग्रियों का कोई मूल्य नहीं जिनकी भाषा, वाणी, सोंच, चरित्र तथा व्यवहार खड़ाब है , जिनकी बात करने की तमीज और तहजीब गलत है। इनसे तो कहीं अच्छा वो अनपढ़ गंवार और अंगुठा छाप हैं जिसमें नैतिकता , चरित्र, संयमित तथा मर्यादित भाषा, एवं व्यवहार का गुण है । 
जला कर फेंक दिजिए उन डिग्रियों को जिस पर आपको अहंकार है , घमंड है और आप असभ्य भाषा का इस्तेमाल करते हो । 
नहीं चाहिए हमें आपके जैसे डिग्रीधारी लोग ।
काफी पढ़े लिखे होने के बाबजूद भी अगर आपका व्यवहार , वाणी , भाषा सुंदर नहीं है, मर्यादित नहीं है तो आपका डिग्री केवल एक कागज का टुकड़ा भर है जिसका न कोई मूल्य है और न कोई मतलव । :- संजीव कुमार ।

जीव का शरीर मिट्टी के गुलदस्ता के समान है पर उसमें रखा गया फुल आत्मा का प्रतिक है। आत्मा गुलदस्ता नहीं,आत्मा परमात्मा का फुल है ।

जीव का शरीर मिट्टी के गुलदस्ता के समान है पर उसमें रखा गया फुल आत्मा का प्रतिक है। आत्मा गुलदस्ता नहीं,आत्मा परमात्मा का फुल है । आत्मा अजन्मा है अशेष है , जन्म और मृत्यु से परे है । जो मनुष्य स्वयं को शरीर नहीं आत्मा मानता है और अपने अंशी भगवान श्री कृष्ण को अपना परम पिता परमात्मा मानता है उसे संसार का सुख दुख कभी विचलित नहीं कर सकता ।

शरीर रूपी गुलदस्ते का आत्मा रूपी फुल परमात्मा रूपी सुंगध को जब प्राप्त कर लेता है तो उसको माया से मुक्ति मिल जाती है 
फिर वो संसारिक सुख दुख से परे हो जाता है और सदा आनंद में हीं रमण करने वाला अमिट महाचेतना बन जाता है गुरू कृपा द्वारा ।
तब असली जीवन प्रारंभ होता है और तब वो इस बात को प्रत्यक्ष देख पाता है कि आनंद प्राप्ति से पहले उसने जो जीवन जिया है वो जीवन नहीं एक साधन मात्र था अपने अंशी भगवान श्री कृष्ण को प्राप्त करने के लिए , जिसके अधिकांश समय को उसने व्यर्थ कि प्राप्ति तथा उसके उपभोग में गवां दिया था । लेकिन गुरू ने उसे संभाल लिया और अपने कृपा द्वारा उसके जीवन को सार्थक कर दिया । वो गुरू ऋण से कभी ऊऋण नहीं हो सकता । क्योंकि गुरू ने उसे पारस बना दिया है । श्री राधे ।:- संजीव कुमार 

जाकि रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।

साधारण मनुष्य( जो साधना मार्ग , भक्ति मार्ग में नहीं है और संसार में ही गहरा आसक्त है ) कि आंखें संसार में जो देखती है, कान जो सुनती है , मन जो ग्रहण करता है , तथा बुद्धि जो समझती है वो बहुत हीं अल्प है, अधुरा है , अस्थाई है , सम्यक है, अज्ञान है तथा भ्रम है, समाप्त होने वाली है तथा हरेक के चित्त के प्रकृति के अनुसार अलग अलग है , भिन्न भिन्न प्रतिलेख है।  

भगवद् उपासना के उपरांत गुरू कृपा के फलस्वरूप वास्तविक ज्ञान चक्षु जैसे जैसे खुलने लगता है वैसे वैसे असली तथा वास्तविक ज्ञान , दृश्य तथा सही समझ का विकास होता है । 
ध्यान साधना के मार्ग में अनेकों नया अनुभव , आनंददायक घटना जैसे जैसे घटती है वैसे वैसे हमारी पंचकोष रूपी ग्रंथी कटती जाती है तथा परिणामस्वरूप हम वैसे वैसे दिव्य शक्तियों के काफी नजदीक स्वयं को पाते हैं । लेकिन यह भी यात्रा हीं हैं भले हीं मंजिल नजदीक सही पर आभास बहुत सुखद और आनंददायक प्रतीत होता है , आंतरिक उत्थान यानि आत्मा के उत्थान के प्रक्रिया में भी असीम आनंद है । यह तो उसी को समझ आता है जो इस अलौकिक प्रकिया का हिस्सा बन जाता है , वांकि के लिए यह केवल एक शब्द है, एक वाक्य है एक कहानी मात्र प्रतीत होता है। तीसरी ज्ञान चक्षु खुलने बाद ही यह सत्य प्रतीत होगा ।‌ 

सार यह कि हर प्रकार का ज्ञान इस ब्रह्मांड में व्याप्त है, चाहे वो लौकिक हो या पारलौकिक या भगवदिय दिव्य ज्ञान । 

हां लौकिक और पारलौकिक ज्ञान योग साधना के साधक को मिल जाता है पर दिव्य ज्ञान तो केवल दिव्य महापुरुष के शरण में जाने के बाद ही शुलभ होता है । और इस दिव्य ज्ञान में सभी प्रकार के ज्ञान और सिद्धियां समाहित होती है , स्वभाविक है कि गुरू के कृपा से दिव्य ज्ञान के साथ हरेक ज्ञान और सिद्धियां अपने आप उतरती है साधना मार्ग में । 

इसलिए ज्ञान कहीं से आती जाती नहीं है । 
नहीं तो जरा सोंचिए कि किसी भी बिषय पर पहला पुस्तक लिखने वाले को ज्ञान कहां से मिला ????? उसने कौन सी पुस्तकें पढ़ी, किसकी पुस्तकें पढ़ी ?? 
तो यह सिद्ध हुआ कि साधारण जन को पुस्तकों कि आवश्यकता होती है पर जब वो दिव्य गुरू के शरण में साधना करता है तो एक समय आने पर फिर उसे पुस्तकों को पढ़ने कि तथा उसके नकल कि जरूरत नहीं पड़ती , फिर ब्रह्मांड बोलता है और साधक सुनता है , ग्रहण करता है और चाहे तो लिख देता है या लिख सकता है । ।

 केवल कृपा ,‌ कृपा , और गुरू कृपा बस साधक का ज्ञान चक्षु ब्रह्मांड में व्याप्त अलौकिक ज्ञान को ग्रहण करने तथा पढ़ने में सक्षम हो जाता है ।।
भले ही यह बातें हम साधारण जन को असंभव प्रतीत होता हो पर यही सत्य है । वक्त आने पर साक्षात्कार के बाद समझ जाते हैं समझने वाले । 

 क्योंकि ब्रह्मांड बोल उठता है और कान सुनने लगता है स्वत: मौन में । 
जबतक जीव कोलाहल में है संसार का तबतक यह घटना घटित होना असंभव है । 
इसके लिए गुरू पर परम आस्था के साथ मौन साधना, एकांत रूपध्यान साधना परामावश्यक है । 
मौन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है ,‌आवश्यक है । अगली बार समझेंगे कि मौन क्या है , जीव की कौन सी अवस्था मौन है । 
  श्री राधे ।।:- संजीव कुमार 

तो यह मौन क्या है ? किसे कहते हैं मौन मैंने पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी से यह समझा था जो प्रस्तूत कर रहा हूं यहां :- क्या मौन खामोश रहने का नाम है ? क्या मौन केवल मुख से कुछ न बोलने का नाम है ? नहीं यह मौन नहीं है ।

हमारे गुरूदेव ने मौन साधना को बिशेष रूप से महत्वपूर्ण बताए हैं । 
तो यह मौन क्या है ? किसे कहते हैं मौन 
मैंने पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी से यह समझा था जो प्रस्तूत कर रहा हूं यहां :- 

क्या मौन खामोश रहने का नाम है ? क्या मौन केवल मुख से कुछ न बोलने का नाम है ? 
नहीं यह मौन नहीं है । 

मौन को समझने से पहले हमें मन के प्रकृति और कार्य को समझना आवश्यक है । 
बिचारों के प्रवाह का दुसरा नाम मन है । 
मन कभी शांत या मौन रह हीं नहीं सकता । मन सतत कार्यशील रहता है । परम सुषुप्ति की अवस्था में ही मन निष्क्रिय रहता है । 

तो सवाल उठता है कि क्या परम सुषुप्ति कि अवस्था मौन है ? 
नहीं गहरी निंद्रा में मन बुद्धि दोनों सो जाती है , परम स्तबद्धता कि अवस्था । 
तो यह भी मौन नहीं है । 

तो मौन क्या है ? मौन कैसे रहा जाए ?

तो मौन एक ऐसे बिचारों प्रवाह है , चिंतन का प्रवाह है जिसमें साधक केवल भगवद् बिषयों के चिंतन में खोया रहता है, भगवान या गुरू या दोनों के रूपध्यान गुण लीला धाम के चिंतन में मग्न रहता है । 

मौन एक ऐसी अवस्था का नाम है जिसमें जीव बाहरी कोलाहल , ईर्ष्या, राग द्वेष , जलन, किसी से नफरत वाली भावना रूपी संसारिक बिषयों से ध्यान को हटा कर केवल भगवद् चिंतन में लगाए रखता है । 

रूपध्यान युक्त भगवद् चिंतन वाले अवस्था का नाम है मौन । 

मन चुकि बिचारों के प्रवाह का नाम है , अत: जब मन संसारिक बिषयों से हट कर भगवद् चिंतन में लग जाता है तो इसे मौन कि अवस्था कहते हैं । 
मौन दिव्य बिषयों एवं बस्तूओं को आत्मसात करने का सबसे सशक्त माध्यम है । 

मौन साधना में ही सिद्धार्थ अपने अंदर गौतम बुद्ध को अवतरित किए थे , ग्रहण किए थे । 
गया जी में पीपल के बृक्ष के नीचे मौन साधना के माध्यम से हीं दिव्य ज्ञान को प्राप्त करके वो सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बने , किताब पढ़ कर नहीं । 

इस ब्रह्मांड में अनंत ज्ञान है , लौकिक , पारलौकिक तथा दिव्य सभी प्रकार के ज्ञान से अच्छादित है यह ब्रह्मांड। 

इस ब्रह्मांड में भगवान कि आप्त वाणी , उनके तमाम अवतारों तथा महापुरुषों के द्वारा दिया गया ज्ञान व्याप्त है और आसुरी तामसिक बिषय रूपी कोलाहल भी भरा परा है । इस ब्रह्मांड में भौतिक ज्ञान विज्ञान के साथ साथ आध्यात्मिक ज्ञान विज्ञान आदि भी व्याप्त है । 

भगवान महापुरूष के रूप में इस धरा धाम पर गुरू रूप में अवतरित होकर अपने इन्ही दिव्य ज्ञान को स्वाभाविक रूप से बोध करने के लिए जीव को प्रेरित करते हैं, तामसिक बिषय से मन को हटा कर भगवद‌् बिषय में लगाने की प्रेरणा देते हैं । 

दिव्य ज्ञान के बोध के लिए खाली , शूद्ध एवं दिव्य बर्तन कि आवश्यकता है जिसे हासिल करने के लिए एकांत में रूपध्यान करते हुए उनको रो कर पुकारना मौन है । आर्त पुकार , आरती भी मौन कि अवस्था में हीं संभव है । मौन भगवान से जीव को जोड़ने का एक शक्तिशाली माध्यम है । 

जब तक जीव संसार के कोलाहल को , शोर को , कुसंग को अपने कानों से ग्रहण करता रहेगा और केवल मुख से खामोश रहेगा तो कुछ भी हासिल नहीं कर सकता । और यह मौन कदापि नहीं है । 

यहां तक कि संसार में भी एक कक्षा में विद्यार्थी, शिक्षक के डर से भले खामोश रहे लेकिन उसका मन संसार के बिषय में बाहर भटक रहा है तो यह मौन नहीं है और वो कुछ भी सीख नहीं पाता है अपने क्लास के शिक्षक से । असफल रहता है । 

और दुसरा तामम प्रकार के कोलाहल के बीच है लेकिन उसका कान उन कोलाहल को ग्रहण न करके अपने शिक्षक को हीं सुनने में मशगूल हैं तो वो मौन कि अवस्था है । 

उदाहरण :- लाखों मेंढ़क एक खड़े पहाड़ की चढ़ाई पर चढ़ने में असफल रहा । वहीं एक दुबला पतला मेढ़क उस असंभव सा लगने वाले पहाड़ के चोटी पर चढ़ने में सफल हो गया । 
उसके चढ़ने के प्रयास के समय सभी मेढ़क चिल्ला रहा था " तुम यह नहीं कर पाओगे , बड़े बड़े पहलवान मेंढ़क नहीं चढ़ पाए तो तुम कैसे सफल हो सकते हो ? " 
लेकिन वो सफल रहा । जानते हैं क्यों ? 
क्योंकि वो मेंढ़क बहरा था । वो हतोत्साहित करने वाले के शोर को नहीं सुना और अपना ध्यान अपने लक्ष्य तथा प्रयास पर केंद्रित कर दिया था । वो मौन के अवस्था को प्राप्त था । 

आज संसार में सौ में से कुछ हीं छात्र कलक्टर कमिश्नर , या कुछ भी बढ़िया बनने में सफल होते हैं वांकि नहीं । क्योंकि असफल छात्र मौन साधना के तरह केवल पढ़ाई के उपर हीं ध्यान को केन्द्रित करने के महत्व को नहीं जानते ।‌

इस ब्रह्मांड में अनंत ज्ञान है लेकिन जबतक हम मौन तथा एकाग्र होकर अपने गुरू के दिव्य वाणी को नहीं सुनेंगे , तबतक हम इसे अपने अंत:करण में ग्रहण नहीं कर सकते । 
सुनेंगे और कुछ देर में फिर विस्मृति हो जाएगी । 

आज हमारी स्थिति यह है कि हमारा मन दिव्य वाणी को सुनने से अधिक दुसरे को सुनाने के लिए अधीर रहता है । सुनने से अधिक बोलने के लिए आतुर रहता है । 
पढ़ने से अधिक लोक रंजन के लिए लिखने के लिए व्यग्र रहता है । 

महापुरुषों के वाणी को या उनके पुस्तकों से स्वयं बोधात्मक ज्ञान न प्राप्त करके, ग्रहण न करके इसे नकल करके, लिख कर दुसरे को पढ़ाने के लिए अधिक अधीर रहता है । 

यहां तक कि आज संसार में अधिकतर लोगों का मन महापुरुषों के कोटेशन, उनके प्रवचन आदि से खुद लाभ न लेकर इनका इस्तेमाल दुसरे को ज़बाब देने के लिए करते अधिक पाय जाते हैं । ताकि दुसरा खामोश हो जाए । चुप हो जाए । 
नहले पर दहला वाली बात झूठे अहंकार के कारण । इस चक्कर में उनके स्वयं का कितना नुक्सान होता है इसका अंदाजा उन्हें नहीं होता कभी । 
हमें स्वयं के निर्माण के लिए विशेष रूप से हर क्षण प्रयत्न शील रहना चाहिए, सजग रहना चाहिए।  

हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि अपने मन को राग, द्वेष, ईर्ष्या,घृणा, बदले की भावना रूपी मन के कोलाहल , बेचैनी तथा संसारिक बिषय रूपी जहरीले बातों से हटा कर भगवान और गुरू में लगा देना ही मौन है , मौन साधना है । और इसी से हमारी अंत:करण कि शूद्धि संभव है । 

सिर्फ मुख से कुछ न बोलना लेकिन मन में संसारिक बिषयों का उथल पुथल चलना मौन कदापि नहीं है । 

:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी के उत्तर तथा गुरूदेव से प्राप्त ज्ञान के आधार पर ।

इस बात पर आज बहस है कि हनुमान जी को ,‌ शनि देव के विग्रहों को स्त्रियां छू सकती है या नहीं ??

श्री महाराज जी के द्वारा समन्वय तथा समाधान पर आधारित लेख :- 
इस बात पर आज बहस है कि हनुमान जी को ,‌ शनि देव के विग्रहों को स्त्रियां छू सकती है या नहीं ??
श्री महाराज जी ने एक साधक के ऐसे हीं प्रश्नों का उत्तर देते हुए समाधान दिए थे तथा समन्वय किये थे ।
देखिए एक है भक्ति मार्ग जहां कोई नियम और निषेध नहीं है वहीं कर्मकांड यानि पुजा पाठ यज्ञ हवन आदि में बहुत से कड़े कड़े नियम और बड़े बड़े निषेध है जिसका पालन आवश्यक है । नियम का उलंघन हुआ , दंड मिलेगा । 
नंबर दो - भक्ति मार्ग में जीव स्वयं को आत्मा मानता है देह नहीं , अब तत्वज्ञान कि दृष्टि से आत्मा न पुरूष है , न स्त्री और न नपुंसक । 
अत: भक्ति मार्ग से जाने वाले किसी भी जीव पर कर्मकांड मार्ग के किसी भी नियमों और निषेधों को मानने तथा पालन करने की कोई आवश्यकता नहीं है । 
भक्ति मार्ग के जीव को केवल भक्ति मार्ग के एक हीं नियम का पालन करना होता है कि वो आत्मा है, देह नहीं और हमेशा अपने ईष्ट में हीं मन को समर्पित करना है यानि अपने गुरू और ईष्ट की हीं शरणागति करनी है , सेवा करनी है तथा निषेध यह है कि अपने ईष्ट और गुरू को एक पल के लिए भी नहीं भुलना है एवं अनन्यता का पालन करना है और कुछ नहीं । 

तो सिद्ध होता है कि भक्ति मार्ग के जीव चाहे वो स्त्री हो या पुरूष या नपुंसक सभी को अपने ईष्ट के विग्रह को छुने से , उनकी सेवा करने से कोई मनाहीं नहीं है वेदांत में । 

लेकिन अगर कोई पुजा , पाठी , जपी तपी , यज्ञ हवन, आदि कर्म कांड मार्ग को अपनाता है तो उसको कर्मकांड संबंधित बड़े बड़े तथा कड़े कड़े नियमों का पालन आवश्य करना होगा । 
इस प्रकार कर्मकांड मार्ग के जीव को अगर कर्मकांड मार्ग के सभी नियमों और निषेधों को मानना परम आवश्यक है । अत: कर्मकांड मार्ग में शरीर अगर स्त्री है तो उसको श्री हनुमान जी के विग्रह को छुना बिधि निषेध के अंतर्गत आता है । 

कर्म कांड मार्ग में कोई स्त्री अगर हनुमान जी , शनि देवता आदि के मंदिर में जाकर उनके विग्रह को छूती है तो उसे इस अपराध का दंड मिलेगा , कर्मकांड के कर्म बिधिनिषेध के कानून के अनुसार । 

वेदों में एक लाख श्लोक है इसमें से अस्सी हजार कर्म कांड , ज्ञान योग , कर्म धर्म आदि के बारे में है , इसके नियम और निषेध आदि है पुराणों में जिसे किसी भी कर्मकांडी को मानना आवश्यक है । 

और केवल बीस हजार श्लोक वेद वेदांतों में भक्ति मार्ग का है जिसमें तत्वज्ञान है । इसमें कोई नियम निषेध है । 
हालांकि प्रत्येक जीव भक्ति मार्ग का अधिकारी है चाहे वो स्त्री हो या पुरुष या नंपुसक। इस मार्ग के जीव पर कर्मकांड मार्ग का कोई भी नियम और निषेध लागु नहीं होता है । भक्ति मार्ग का अनुसरण करने वाला चाहे वो स्त्री हो , पुरूष हो या नपुंसक वो अपने ईष्ट के विग्रह को छू सकता है , उनकी सेवा कर सकता है सकती है ।
झगड़ा खत्म । 
श्री राधे ।:- संजीव कुमार 

महिलाओं को हनुमान चालिसा पढ़ना वर्जित है या पढ़ सकती है ?

महिलाओं  को हनुमान चालिसा पढ़ना वर्जित है या पढ़ सकती है ?
देखिए किसी भी बात को समझने के लिए तत्वज्ञान पक्का होना चाहिए तथा उस बिषय पर गहराई से चिंतन करिए । आपको ज़बाब स्वत: मिल जाएगा अगर आप सिरियस साधक हैं तो । 
अब आप मेरा उत्तर जानने से पहले आप मुझे बतलाए कि हनुमान चालीसा के लेखक कौन है ? 
आपने उत्तर दिया तुलसीदास जी , बहुत बढ़िया । यानि आप जानते हैं कि हनुमान चालीसा का लेखक तुलसीदास जी है ।

अब आप स्वयं से चिंतन में यह पुछिए कि
 तुलसीदास जी कौन से मार्ग के उपासक हैं ? 
आपको उत्तर मिला भक्ति मार्ग के यानि दास भाव भक्ति के उपासक है तुलसीदास जी । बहुत बढ़िया । यानि इसका भी उत्तर आप सही सही जानते हैं । 

अब आप यह बतलाए कि तुलसीदास जी ने अपना गुरू किनको माना था ? 
आपने उत्तर दिया :- हनुमान जी को , भेरी गुड । यानि यह भी आपको पता है । 

अब आप खुद से यह प्रश्न करिए कि हनुमान चलीसा में क्या है ? 

तो आपने उत्तर दिया - हनुमान जी के रूप गुण लीला , कृति , यश का वर्णन है , बहुत बढ़िया । यानि अब आप यहां तक जान गई चिंतन के द्वारा कि जब भक्ति मार्ग का उपासक जब भगवान के या अपने गुरू के रूप गुण , लीला यश कृति का गुण गाता है तो वो कौन से मार्ग का अनुसरण करता है ?

आपने उत्तर दिया :- भक्ति मार्ग का , क्योंकि अपने गुरू या ईष्ट या दोनो के रूप गुण लीला यश , कृति का गुण गान करना भजन करना सब भक्ति है । कर्मकांड नहीं ।‌
अब आप श्री महाराज जी द्वारा दिया गया तत्वज्ञान अप्लाई करें यहां कि भक्ति मार्ग में कोई नियम निषेध , कायदा कानून , देश 
काल , धर्म योग्यता , अधिकारित्व की कोई बंदिश और आवश्यकता नहीं है । 

अब आपको स्पष्ट हो गया कि भक्ति मार्ग के उपासक के लिखे पद् भजन कीर्तन चालिसा आदि कर्मकांड नहीं है इसलिए इसे पुरूष , स्त्री , नपुंसक या कोई भी उनका रूपध्यान करके गा सकता है पुकार सकता है । 

एक और उदाहरण :- आदि जगद्गुरु शकंराचार्य जी संन्यास मार्ग का अनुसरण किये थे और दुनिया के लिए एक पक्षीय अद्वैत सिद्धांत का प्रति पादन किए थे । जिसमें बहुत से नियम निषेध कायदा कानून है जो उस मार्ग की साधना करने वाले पर लागु होते हैं ।

पर स्वयं तथा उनकी मां सगुण साकार ब्रह्म श्री कृष्ण का भक्ति किए और वो कुछ भक्ति पद रचे जो हमलोग अपने साधना में गाते हैं भगवान का रूपध्यान करने के लिए और यह हमारे श्री महाराज जी के सभी आश्रमों में भी गाया जाता है दैनिक प्रार्थना में । 

" यमुनानिकटतटस्थितवृन्दावनकानने महारम्ये |
कल्पद्रुमतलभूमौ चरणं चरणोपरिस्थाप्य ||
तिष्ठतं घननीलं स्वतेजसा भासयन्तमिह विश्वम् |
पीताम्बरपरिधानं चन्दनकर्पूरलिप्तसर्वांगम् ||
आकर्णपूर्णनेत्रं कुण्डलयुगमंडितश्रवणम् |
मंदस्मितमुखकमलं सकौस्तुभोदारमणिहारम् ||
वलयांगुलीयकाधानुज्ज्वलयन्तं स्वलंकारान् |
गलविलुलितवनमालं स्वतेजसापास्तकलिकालम् ||
गुंजारवालिकलितमं गुंजापुंजान्विते शिरसि |
भुंजानं सह गोपै: कुंजांतर्वर्तिनं नमत ||
मन्दारपुष्पवासित मंदानिलसेवित परानन्दम् |
मन्दाकिनीयुतपदं नमत महानन्ददं महापुरुषम् ||
सुरभीकृतदिग्वलयं सुरभिशतैरावृत: परित: |
सुरभीतिक्षपणमहासुरभीमं यादवं नमत ||

अत: कहने का तात्पर्य यह कि हम केवल भक्ति मार्ग के अनुकूल पद को हीं अपनाते हैं लेकिन अन्य मार्ग का नहीं ।
तो सिद्ध हुआ की तुलसीदास, सुरदास , रै दास , रविदास , मीरा आदि भक्ति मार्ग के भजन कीर्तन को कोई भी जीव गाने का अधिकारी है । 
लेकिन अगर आप किसी कर्मकांड मार्ग के महापुरुषों के मार्ग को अपनाते हैं तो वहां का कर्मकांड संबंधित नियम निषेधों , कायदा , कानून अधिकारित्व का पालन करना होगा । 

देखिये अगर आप श्री महाराज के अनुयाई हैं तो अंत में यही प्रार्थना करना चाहुंगा की हमे हर रोज कम से कम दो घंटा रूपध्यान करते हुए एकांत में उनके लिखे प्रेम रस मदिरा में सिद्धांत माधुरी , रूप माधुरी , लीला माधुरी , दैन्य भाव वाला कीर्तन भजन के साथ करने पर विशेष बल तथा खाली समय में केवल उनके लिखे सिद्धांतों पर चिंतन मनन गहराई से प्रतिदिन करना चाहिए।
अगर ऐसा करते हैं तो हमारे आपके हरेक प्रश्नों का समाधान श्री महाराज जी चिंतन के माध्यम से हमारे मस्तिष्क में उत्तर के रूप में स्वयं प्रकाशित कर देतें हैं , बिषय कोई भी हो वो डाईरेक्ट आज भी अपने साधकों के प्रश्नों का उत्तर स्वयं दे देते हैं और भूले हुए सिद्धांतों को हमारे मस्तिष्क में उभार भी देते हैं । 
कमी हमारे में हैं जो ऐसा नहीं करते वो भटक जाते हैं भूल जाते हैं । जितना अधिक रूपध्यान साधना आप करेंगें , जितना अधिक तत्वज्ञान पर , सिद्धांत ज्ञान पर चिंतन करेंगे उतना अधिक गुरू का मार्गदर्शन , उनका कृपा , उनके प्रेम की अनुभूति आपको होगी । 
कोई नया जिज्ञासु जिज्ञासा भाव से कोई प्रश्न पुछेगा तो आप श्री महाराज जी के हीं कृपा बल से ठीक ठीक उत्तर दे सकेंगे और उन्हें भी श्री महाराज जी से जोर सकेंगे । 
मानिए मेरी बात एक बार और अगर नहीं तो हमेशा कन्फ्यूजन होगा , हरेक बिषय में । 
श्री राधे ।

प्रश्न :- महाराज जी किसी साधक को भगवद्‌ प्राप्ति हो चुका है यह हम कैसे जान सकते हैं ?

प्रश्न :- महाराज जी किसी साधक को भगवद्‌ प्राप्ति हो चुका है यह हम कैसे जान सकते हैं ? 

श्री महाराज जी :- तुमलोग नहीं जान सकते इस बात को , नहीं पकड़ सकते । क्योंकि भगवद् प्राप्ति के बाद वो इस बात को छुपाता है संसार से और अपने सारे संसारिक कार्य शरीर संबंधी पूर्ववत करता रहता है जब तक उसकी आयु शेष है ।
लेकिन उसका गुरू जानता है । संसार में जिस जीव को भगवद् प्राप्ति हो जाती है वो इस बात को प्रकट नहीं करता किसी से । गोपनीयता का पालन करता है । 
वो शांत हो जाता है , आनंद में डूब जाता है। उसकी सभी संसारिक कामनाए समाप्त हो जाती है अंदर हीं अंदर । 

एक घड़ा है , खाली है जब उसको तालाब में पानी में डूबाते हैं तो वो आवाज करता है भक भक भक भक भक , और फिर शांत , पानी भर गया उसमें , इसीलिए पानी में डूब जाता है वो , अब आवाज नहीं करेगा कभी क्योंकि उसके अंदर की सारी हवा बाहर निकल गई और उसमें पानी भर चुका । पानी भरने के बाद वो तालाब में डूब गया ।
जबतक खाली था , उसमें हवा भरा था तब तक वो आवाज कर रहा था , लेकिन अब आवाज नहीं करेगा वो । विल्कूल शांत । 

उसी प्रकार जिसको भगवद् प्राप्ति हो चुकी इसका मतलव उसके अंतःकरण की सारी गंदगी निकल गई , अंत:करण शूद्ध हो गया, तथा उसको दिव्यानंद मिल गया अपने गुरू से । 
उसकी संसार संबंधी सभी भौतिक कामनाएं समाप्त हो चुकि और भगवान संबंधित दिव्य बस्तूएं मिल चुका । अब वो नहीं बोलेगा उस भरे हुए घरे के समान । अब उसका बोलना बंद , अब वो शांत हो चुका , तृप्त हो चुका । संतुष्ट हो चुका । 

अब वो खूद को छुपाएगा संसार से । तथा जितनी आयु शेष है, उसमें वो केवल अपना शरीर संबधित आवश्यक कर्म करेगा , लेकिन भीतर से दिव्यानंद में डूबा रहेगा हमेशा । 
इसलिए आप लोग उसको नहीं पकड़ सकते । कोई महापुरुष हीं जान सकता है उसको , और गुरू तो जानता हीं है क्योंकि गुरू के द्वारा हीं उसको दिव्यानंद मिला है । लेकिन गुरू भी नहीं बताएगा संसार को कि इसको भगवद् प्राप्ति करा चुका है । महापुरूष और गुरू भी उसके गोपनीयता की रक्षा करता है । 
:- श्री महाराज जी ।

सीनियर जुनियर का फिलिंग भक्ति मार्ग में बहुत बड़ा अवरोधक है । श्री महाराज जी ने हमें यह आदेश दिया है कि हरेक को सम्मान दो , चाहे कोई उम्र में भी छोटा बड़ा क्यों न हो ।

तीनों दीदी जी से ने भी स्पष्ट रूप से कहिन है कि यह सीनियर जुनियर का फिलिंग भक्ति मार्ग में बहुत बड़ा अवरोधक है । 
श्री महाराज जी ने हमें यह आदेश दिया है कि हरेक को सम्मान दो , चाहे कोई उम्र में भी छोटा बड़ा क्यों न हो । 

इसलिए श्री महाराज जी का सिद्धांत है सबकों , भईया तथा दीदी हीं बोलना है वो भी दीनता के साथ , चाहे वो उम्र में हमसे छोटा हीं क्यों न हो । और हम लोग आप लोग‌ सभी लोग इस आदेश को निभाते हैं । 
प्रह्लाद, ध्रूव तो उम्र में छोटा था , इतना छोटा कि उस उम्र का बच्चा इस कलयुग में पहले कक्षा का भी विद्यार्थी नहीं होगा । लेकिन उन्होंने भगवद् प्राप्ति छोटी सी उम्र में ही कर ली । 
तो यह साबित होता है कि भक्ति मार्ग में सीनियर जुनियर का कोई मतलव नहीं । 
एक छोटा बच्चा भी शरणागत होकर गुरू कृपा से एक दिन में वहां पहुंच सकता है या बहुत पहुंचा है , इतिहास गवाह है , जैसे मधुप , जैसे नचिकेता आदि जहां पहुंचना बड़े बड़े के लिए असंभव हो जाता है । तथा भवगद् प्राप्ति तक कर लेता है जीव छोटी सी उम्र में । 

अगर किसी को यह अभिमान हो जाए कि हम तो बहुत दिन श्री महाराज जी के साथ बिताए बचपन से हीं , हमारा उम्र बीत गया उनके साथ रहते और सेवा करते , तो उससे बड़ा नामापराधी कोई नहीं , यह श्री महाराज जी का कहा हुआ है । इसी अहंकार के कारण वो कुछ भी हासिल नहीं कर पाता है । जहां था वहीं रहता है । 

भक्ति में तो कोई आज भी अभी श्री महाराज जी के चरणों में मन लगा दें , सेंट प्रसेंट शरणागत हो जाए उनका तो वो वहां पहुंच सकता है जहां पहुंचना हमारे लिए मुश्किल है ।‌

दूसरी बात किसी साधक के बाहरी आचरण से हम उसके अंदर कि स्थिति कभी नहीं जान सकते कि वो क्या है, कहां पहुंचा है , क्या पाया है ? इसलिए भी हमें हमेशा सतर्क रहने के लिए श्री महराज जी का आदेश है । 
श्री महाराज जी ने स्वयं कहा है कि महापुरुषों के व्यवहार को देख कर मत यह अनुमान लगाओ कि वो उसकी तरफ देखते हैं , उसके गाल में बहुत प्यार करते हैं , उसके यहां अधिक आते जाते हैं या थे और हमारे यहां नहीं आएं । या हमारी तरफ कभी नहीं देखे तो इसका मतलब वो उस पर अधिक कृपा किए हैं । और हमारे उपर नहीं ।

 महापुरुषों का व्यवहार हमेशा उल्टा होता है। वो देखते हैं किसी और को, और कृपा कर देते हैं दुर गांव और शहर में वैठे ऐसे जीव पर जो वहीं से उनको व्याकूल होकर पुकारता है । वो शरीर से यहां है पर सूक्ष्म रूप में अपने शरणागत के पास तुरंत पहुंच जाते हैं उसके ह्रदय में । 

वो कभी कभी अपने से दुर बैठे शिष्य के तरफ देखते तक नहीं , उसके परीक्षा के लिए कि देखें तो सही इसको इग्नोर करके कि फिर भी इसका प्रेम मेरे प्रति बढ़ता है या मुरझा जाता है ‌। 

वो कहते हैं कि महापुरूष तो देखते हैं इसको और कृपा करते हैं उस पर जिसके तरफ देखते तक नहीं । इसलिए शरणागत को कभी यह नहीं सोंचना चाहिए कि उसके तरफ अधिक देखते हैं और हमारे तरफ नहीं तो वो हमसे प्यार नहीं करते ? 

जिस व्यक्ति को यह फिलिंग या अहंकार हो गया कि मैं श्री महाराज जी का सबसे बड़ा तथा पुराना सेवक तथा नजदीकी रहा हुं , बहुत सेवा किया है , तो वो तो गया उसी क्षण । 
आज से कुछ महीने पहले एक पचपन साल की दीदी थी कोई कानपुर कि वो मुझे भला बुरा इसलिए बोली कि वो श्री महाराज जी के एक ग्रुप में गीता पर लिखा अपना फिलोसॉफी डालना चाहती थी , मैंने मना कर दिया था । वो बहुत फायर हो गई मुझ पर , मुझे बहुत खड़ी खोटी सुनाई , यह बोल के श्री महाराज जी के साथ बचपन से खेली है और श्री महाराज उनके यहां हीं अधिक रहते थे । श्री महाराज जी उनके साथ हीं खेलते थे और उनके माता पिता श्री महाराज जी के लिए सबसे अधिक किए हैं , उनका फेमिली बहुत स्कौलर तथा ऊंचे ऊंचे पदों पर हैं । इसलिए वो मुझे लिखी कि "मैं उनके सामने जीरो हुं । मेरा तो कोई हैसियत नहीं है उस दीदी के परिवार के सामने । जिसे मैं तो स्वीकार दिल से कर लिया कि सचमुच मेरी कोई हैसियत वास्तव में नहीं है । माफी मांग कर अलग हो गया मैं उनसे । 
तब से मैं हैसियत वालों से दुर ही रहना पसंद करता हुं , ऐसे लोगों को हमारे कारण कोई दुख न हो , इसका ध्यान रहता है मुझे हमेशा । बड़े लोगो के सामने हम जैसे लोगों का कोई मोल नहीं है और होना भी नहीं चाहिए।। क्योंकि यह तो स्वाभाविक है कि हम सम्मान के लायक नहीं है उनके सामने तो भला कोई हमें क्यों सम्मान देगा , देना भी नहीं चाहिए , यह मैं ह्रदय में रियलाईजेशन हमेशा करके रखता हुं । सत्य को स्वीकार करने में देर नहीं करना चाहिए। 
न मेरे पास गला है , न रूप है न ज्ञान , न कोई दैविक गुण है और न कोई संसारिक धन और न दिव्य वस्तू हीं , तो मैं भला अपने निम्न हैसियत को क्यों न स्वीकार कर लूं इमानदारी से ?

खैर हमें स्वयं के भावना को देखना है दुसरा कुछ भी करे , भगवान और श्री महाराज जी सब पर अपना कृपा दृष्टि बनाए रखते हैं । सब उनके हीं बच्चे हैं । और मां बाप को तो हमारे जैसा गड़बड़ बच्चे की अधिक चिंता रहती है । जो बन गया उनकी कृपा से उस पर उनको अधिक ध्यान देने कि कोई आवश्यकता नहीं परती है । हम लोग तो हर तरीके से गड़बड़ है अंदर से , उनको हमारे उपर अधिक मेहनत करना परता है । काश कि हम उनके लायक जल्दी बन जाते। श्री महाराज जी और राधा रानी का कृपा सदा सबहीं पर । श्री राधे ।।

आध्यात्मिक शक्ति , अष्ट सिद्धियां और नव‌निधि कौन कौन से होते हैं ?

 आध्यात्मिक शक्ति , अष्ट सिद्धियां और नव‌निधि कौन कौन से होते हैं ? जो नित्य सिद्ध , साधन सिद्ध आदि महापुरुषों के सामने हाथ जोड़े , उनकी सेवा करने के लिए हमेशा ऊपस्थित रहतें हैं ।लेकिन वास्तविक संत , महापुरुष, अपने इस शक्ति का प्रदर्शन नहीं करतें हैं संसार में कभी ।
हनुमान जी को यह सारी सिद्धियां मिली हुई थी जिसका उपयोग वो भगवान राम के सेवा के लिए हीं किए हमेशा । और हरि जनों के रक्षा के लिए करतें हैं ।
हनुमान जी अपने इन सिद्धियों का दुरूपयोग संसार में किसी भी अनाधिकारी जीव को बिना अच्छे कर्म किए खडाब प्रार्बध को , भाग्य को बदलने के लिए नहीं किए । लेकिन आज कल कुछ लोग उनके नाम पर लाखों लोगों के भाग्य को झूठा आशीर्वाद देकर बदलने के लिए कर रहे हैं जो घृणित है । 

आठों सिद्धियां और नौ निधियां ए हैं ।
 
1.) अणिमा- जिससे साधक किसी को दिखाई नहीं पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ में प्रवेश कर जाता है जैसे तल , अतल , वितल, सुतल, तलातल और पाताल आदि तक । और किसी भी जीव के शरीर में भी प्रवेश कर जाता है । कठोर से कठोर बन जाता है । 
2.) महिमा- जिसमें योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है। जितना बड़ा बनाना चाहें उतना ।
3.) गरिमा- जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है। कैसी भी भारी बस्तु को उठा सकता है । पेड़ पहाड़ आदि भी उखाड़ सकता है । हाथी को अंतरिक्ष तक फेंक सकता है ।
4.) लघिमा- जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है। अनेकों रूप धारण कर सकता है । 
5.) प्राप्ति- जिससे इच्छित माईक पदार्थ की प्राप्ति कर लेता है ।
6.) प्राकाम्य- जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी में समा सकता है, आकाश में उड़ सकता है। पानी पर चल सकता है । अंतरिक्ष में उड़ सकता है । किसी भी ग्रह पर जा सकता है ।
7.) ईशित्व- जिससे सब पर शासन का सामर्थ्य हो जाता है।
8.) वशित्व- जिससे दूसरों को वश में किया जाता है। दूसरे के मन की बात जान लेना आदि ।

ये हैं नवनिधियां -
1. पद्म निधि, 2. महापद्म निधि, 3. नील निधि, 4. मुकुंद निधि, 5. नंद निधि, 6. मकर निधि, 7. कच्छप निधि, 8. शंख निधि और 9. खर्व या मिश्र निधि। माना जाता है कि नव निधियों में केवल खर्व निधि को छोड़कर शेष 8 निधियां पद्मिनी नामक विद्या के सिद्ध होने पर प्राप्त हो जाती हैं, लेकिन इन्हें प्राप्त करना इतना भी सरल नहीं है।
श्री राधे । पद्मिनी नामक विद्या, चौंसठ योगिनी में से एक योगिनी विद्या , पद्मिनी योगिनी साधना से मिलती है । यह साधना भारत में स्थित तीन शक्ति पीठ , १. कामरूपकामख्या मंदीर के क्षेत्र , मालेगांव , गोहाटी , असम २. मां तारापीठ , प. वंगाल तथा , ३. मां रजरप्पा शक्ति पीठ , झारखंड में की जाती है ।

प्रेम दिले मगरूर को भी दिवाना बना देता है ,

प्रेम दिले मगरूर को भी दिवाना बना देता है ,
मुझ जैसे पत्थरों को भी शायराना बना देता है ,
महफिलों में रंग भरने के लिए 
मयखाने के बुत को भी आशिकाना बना देता है,
प्रेम वो शय है जो साकी को भी पैमाना बना देता है ,
टूट जाते हैं कसमें जहान की सारी , उनकी दिव्य आंखें इतना मस्ताना बना देता है ।‌।
:- अभी का रचना । संजीव

भगवान को भक्त के लिए पृथ्वी पर अवतार लेने कि आवश्यकता क्यों हैं ?

प्रश्न :- भगवान को भक्त के लिए पृथ्वी पर अवतार लेने कि आवश्यकता क्यों हैं ?
 आपके प्रश्न का उत्तर :- भगवान को भी अपने भोले भाले ऐश्वर्य रहित, ज्ञान रहित भक्तों के निष्काम प्रेम रस को पीने कि इच्छा बनी रहती है सदा । 
भाव भक्ति के इसी रस के पान के लिए वो मानव शरीर धर कर पृथ्वी पर अपने निष्काम भोले भाले भक्तों के बीच आते रहते हैं । 

उदाहरण :- जैसे संसार में प्रत्येक मां बाप को भी अपने भोले भाले शिशु के शैशव काल के भोले भाले स्वाभाविक प्रेम को प्राप्त करने तथा अपने शिशु को अपने मातृत्व का सुख देने कि अभिलाषा होती है हमेशा । जब वही बच्चा बड़ा हो जाता है तो वो पढलिख कर भौतिक ज्ञान ऐश्वर्य से युक्त हो जाता है , वो शिशु के समान भोला नहीं रहता । 
अत: मां बाप से उसे वैसा भोलापन युक्त प्रेम नहीं रहता जैसे उसके शैशव काल में था । तोतली बोली , कोमलता , मृदु स्वभाव , भोलापन आदि नहीं रहता । 

उसी प्रकार भगवान में भी अपने अंश रूपी मानव भक्तो के निष्काम प्रेम को प्राप्त करने कि प्यास वलवती हो जाती है जिसे परकिया भाव का प्रेम कहते हैं , यह प्रेम उन्हें उनके दिव्य लोक में नहीं मिल सकता है । 
क्योंकि वहां जो जीव पहुंच जाता है वो दिव्य ज्ञान , दिव्य ऐश्वर्य तथा दिव्य भाव से भर जाता है प्रेम का स्वरूप दिव्य हो जाता है । 
लेकिन जो जीव माया लोक में गुरू कृपा द्वारा भगवान से प्रेम करने के लिए प्रेरित होता है तो वो भगवान को अच्छा लगता है क्योंकि यह दीनता , नम्रता , अहंकार शून्यता , ऐश्वर्य रहित, ज्ञान रहित तथा भक्तों के भोला पन युक्त प्रेम भाव से भरा होता है ।
अत: ऐसे ही भाव भक्ति पूर्ण भोला भाले भक्तों के प्रेम भाव युक्त रस को पाने के लिए तथा अपना प्रेम देने के लिए भगवान नर देह धारण करके आते हैं धरा धाम पर । 

 पृथ्वी पर आकर भगवान योग माया द्वारा अपने भगवत्ता को भुला देते हैं और भक्त भी उनको भगवान न मान कर अपना पुत्र तो सखा या अनेकों संबंध से जानता है‌, ( अगर यशोदा मईया जान जाती कि यह भगवान हैं तो वो‌ वात्सल्य सुख पाने‌ तथा उन्हें मातृत्व सुख प्रदान करने से वंचित हो जाती ) इस प्रकार वो किसी भक्त का पुत्र तो किसी का सखा किसी का प्रेमास्पद् तो किसी का दास बन उनको वात्सल्य सुख , मित्र सुख आनंद , किसी को अपना गुरू बना कर उसे शिष्य सुख प्रदान करते हैं और उनसे वैसा ही मातृत्व सुख हासिल करते हैं । जैसे यशोदा और नंद बाबा से मां बाप का मातृत्व सुख , गोपियों से निष्काम प्रेमिका वाला सुख , गुरू से उनका अनुयायी वाले भाव का सुख , मनसुख सुदामा आदि से मित्रता वाला सुख आदि प्राप्ति करते हैं ।‌ ऐसा सुख उनको गोलक में नहीं मिल सकता , इसलिए वो नर देह में आते हैं अपने अंशो के बीच धरा धाम पर । श्री राधे ।
भगवान का अवतार राक्षसों के विनाश के लिए नहीं होता, वल्कि उनका अवतार अपने भक्तों के उद्धार के लिए होता है । प्रेमी जनों के प्रेम को स्वीकार करने तथा उन्हे अपना प्रेम देने के लिए भगवान का नर देह में अवतार होता है इस धरा धाम पर , और इसी क्रम में राक्षसों का विनाश भी हो जाता है लगे हाथों उनके द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनके रहते , क्योंकि भगवान सभी प्रकार के निर्दोष जीवों का, निराबलम्बी जीवों का भी अवलंब होते हैं । अत: उनके कष्टों का निवारण भी वो करते हैं अपने प्रेमी जनों के साथ साथ ।

लेकिन जब उनका आना नहीं होता है इस धरा धाम पर तो उस समय भी वो दुष्टों का , अत्याचारियों का तथा छल बल वाले एवं राक्षस प्रवृत्ति वाले जीवों के अतिशय अत्याचार को समाप्त करने के लिए एवं पृथ्वी पर संतुलन बनाए रखने के लिए वे किसी भी जीव चाहे वो राक्षस हो या मनुष्य या तो पशु हो या बृक्ष हो , असाध्य रोग या प्राकृतिक आपदा , या अकस्मात दुर्घटना आदि के माध्यम का उपयोग करते रहते हैं समय समय पर ।

यानि जब जब धर्म कि हानि होती है तब तब वो अनेकों अप्रत्यक्ष या परोक्ष तरीकों का इस्तेमाल करते रहते हैं दुष्टों के संहार के लिए पृथ्वी पर , जरूरी नहीं कि वो स्वयं आ हीं जाए । वो तो सत्य संकल्प हैं किसी न किसी माध्यम से या किसी को भी माध्यम बना कर वो दुष्टों का संहार कर हीं देते हैं । जिसे समझना हम साधारण लोगों के वश कि बात नहीं है। 

उनको मनुष्यों के द्वारा बनाए गए किसी भी देशों के संविधान से कोई मतलव नहीं है । 
मनुष्यों के द्वारा बनाया गया संविधान दोष रहित नहीं होता , न ही पुंदोष और ना ही निष्कलंक होता है और न निष्पक्ष । 
मनुष्यों के द्वारा बनाए गए संविधान में तो अनेकों त्रूटियां , पक्षपातपूर्ण कानून तथा कुछ लोगो के द्वारा बहुमत से अपने सुविधा के अनुसार बदल लेने वाला एक अक्षम अस्थाई अपूर्ण व्यवस्था है । 

लेकिन भगवान का विधान ( वेद- शास्त्र उपनिषद आदि) तो सनातन है , पुंदोष है तथा निष्कलंक एवं निष्पक्ष है सदा से । 

अत: मनुष्य को पाप करते समय , निर्दोषों को सताने वाले, अन्याय करने वाले जीव को एवं अन्य किसी भी संसारिक सत्ता तथा बल के नशे में अंधे हो चुके दुराचारी मनुष्य को ही नहीं वल्कि इनका सहभागी जीव को एवं इनका पक्ष लेने वाले को भी कभी यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्यों के द्वारा बनाए गए किसी भी देश के संविधान के त्रूटियों का सहारा लेकर , नजायज फायदा उठा कर वो थोड़ी देर के लिए बच सकतें है लेकिन भगवान के बनाए संविधान से वो नहीं बच सकते है कभी , अंतत्वोगत्वा फैसला उपर से हो हीं जाता है । 

क्योंकि आखिरी और सबसे बड़ा अंतिम फैसला तो भगवान के संविधान से हीं होता है जीवों का । इस बात का रियलाईजेशन जिस मनुष्य को हो गया वो फिर कभी कोई पाप नहीं करेगा धरा धाम पर । 
अन्यथा केवल पुजा पाठ यज्ञ जप तप उपवास गंगा स्नान आदि से पाप नहीं मिटते कभी , भगवान खुश नहीं होते कभी। 

जीव का आचरण कैसा है यह बहुत महत्वपूर्ण है । जीव का आचरण , व्यवहार, चरित्र, सोंच , संकल्प तथा मन की शूद्धता परमावश्यक है । 
अन्यथा जप तप व्रत उपवास पुजा यज्ञ तीर्थ विरथ गंगा स्नान जप दान आदि से कभी कोई लाभ नहीं होता कलयुग में । 
अंत करण की शूद्धि परमावश्यक है । 
जो मनुष्य इन बातों को या तो जानते नहीं या जानने के बाद भी स्वीकार करके अपने संकल्प और आचरण को नहीं बदलते , भगवान के विधान के अनुकूल नहीं होते वो अपने ही मन के दुष्टता , दुर्वलता , ईर्ष्या, द्वेष घृणा के अग्नि में जल कर नष्ट हो जाते हैं यह भगवान का विधान है । 
श्री राधे ।  
श्री राधे । श्री राधे।
:- गुरू प्रदत तत्वज्ञान से ।- संजीव कुमार