जैसे आंख से संसारिक वस्तुओं को देखने का सुख , कान से अपने मन के मुताबिक शब्द को सुनना , उसमें आनंद लेना , जैसे किसी कि बुराई , किसी संसारी की बराई , अपनी बराई , अपना मान सम्मान के शब्द को सुनने का सुख ।
जीभ से तरह तरह के अनावश्यक भोजन का सुख , अनावश्यक व्यंजन को चटकारे लेकर ग्रहण करने का सुख।
नाक से संसारिक वस्तुओं के सुगंध का सुख , त्वचा से संसारिक वस्तुओं को छुने का सुख , शारीरिक वासनाओं को भोगने का सुख यानि मैथुन ।
इन सब बिषय भोग का नाम है "काम " ।
अत: इन पांचों स्थूल ईंद्रियों के सुख की कामना को काम वासना कहते हैं ।
ये काम वासना जब प्रकृति के नियम और लिमिट के अनुसार होती है तो यह निर्माणकारी है संसार में जीवन चक्र यानि इको सिस्टम के लिए । लेकिन यही जब आवश्यकता से अधिक हो जाए तो बिष बन जाता है , पाप कर्म कहलाते हैं । अपराध को जन्म देता है , जीव के पतन का मुख्य कारण बनता है ।
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