पुज्यनियां मां से बच्चों का प्रश्न :- मां परदोष दर्शन का क्या मतलव है ? शास्त्र के अनुसार दुसरे का अपमान करने से, बुराई करने या सुनने से स्वयं को क्या क्या हानियां होती है ?
उत्तर :- दुसरे में दोष यानि अवगुणों को देख कर उसका चिंतन करना , उसकी बुराई करना , उसके अवगुणों का किसी से चर्चा करना परदोष दर्शन कहलाता हैं।
इस माया लोक यानि संसार में एक भी मायाबद्ध जीव ऐसा नहीं है जिसमें कोई न कोई अवगुण नहीं हो । संसार का हरेक वस्तू , हरेक जीव तथा हरेक संसारिक बिषय दोष पुर्ण है , एक भी शूद्ध नहीं है ।
"Everything in this world is a composition of good and evil . "
हम दुसरे में अवगुण और स्वयं में गुण को देखते हैं यह हमारे स्वार्थी तथा दुषित नजरिया एवं अंहकार का परिणाम हैं । स्वार्थ यह कि हम अपना बड़प्पन और दुसरे को अपने से निम्न सिद्ध करना चाहते हैं ।
शास्त्र कहता है जबतक हमारे में एक भी दोष है हमें दुसरे में अवगुण देखने का हक नहीं है। किसी का अपमान करने का हक नहीं है ।
चूंकि हमारा नजरिया शूद्ध नहीं है और हम अपने उसी अशूद्ध नजरिए से दुसरे को बुरा और स्वयं को बढ़िया समझते हैं तो यह पाप है । किसी के अवगुणों कि चर्चा करने से , किसी कि बुराई करने से , अपमान करने से उसको पीड़ा होती हैं । अगर कोई तुम्हारा अपमान करता है तो तुमको दुख होता है या नहीं ?
तुलसीदास जी ने उत्तर कांड में स्पष्ट कहा है :-
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥1॥
हमारा वेद पुरान और भागवद् आदि सभी वैदिक शास्त्रों नें यह कहा है कि दुसरे के अपमान करने जैसा पाप कोई नहीं और दुसरे को सम्मान देने जैसा धर्म नहीं कोई ।
दुसरे के अपमान से उसको पीड़ा होती है , कष्ट होता है और यह पाप है इसलिए हम इस पाप के भागीदार बनते हैं ।
इसिलिय दुसरे का अपमान तथा बुराई करने या सुनने के कारण हुए पाप से सबसे अधिक नुकसान स्वयं को होता हैं जो निम्नलिखित चार प्रकार का हैं 👇👇👇 -
१. आत्म शक्ति क्षीण होती है । यानि आत्मबल ( shelf confidence ) कमजोर होता है जो स्वयं के सफलता में बाधक है ।
२. खुद का प्रारब्ध कमजोर होता है । भाग्य क्षीण हो जाता है । भाग्य कमजोर होने से हमे हर तरफ असफलता मिलती है ।
३. दुसरे का अपमान करने से , बुराईयों की चर्चा करने से उसके पाप का क्षय होता है और हमारे पुण्य का क्षय होता है , किया गया साधना क्षीण होती रहती है । फिर भला ऐसा काम कौन करना चाहेगा ?
४.परदोष दर्शन से हमारा मन बुद्धि चित्त और अधिक गंदा होता है और अंत:करण के गंदा होने से हम अपने ईष्ट और गुरू के कृपा से वंचित होते हैं । हम भगवान से दुर होते जाते हैं । भगवद् कृपा मिलना बंद होने लगता है । यह सबसे बड़ा नुक्सान है ।
:- पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी द्वारा दिया गया उत्तर युवा शिविर में ब्रजगोपिका धाम में । श्री राधे ।
No comments:
Post a Comment