Thursday, 20 July 2023

मनुष्य को अच्छे गुणों के लिए आध्यात्मिक होना आवश्यक है ।

हमें भगवदिए कृपा कि बात के बारे में इतना तो समझ हीं लेना चाहिए कि मानव शरीर जीव के पिछले पुण्य पुंजों का संग्रह तथा उस पर भगवान के कृपा से मिलती है । साथ साथ भगवान मनुष्य के जन्म के साथ ही उसके संचित कर्मों का कुछ हिस्सा जैसे एक दो प्रतिसत प्रारब्ध के रूप में भोगने तथा अगले क्रिया मान कर्म को करने के लिए शक्ति के रूप में दे देते हैं ।

 इस प्रार्बध विज्ञान के बारे में हमारे वैदिक शास्त्रों ने तथा वास्तविक संतो ने कहा है कि मनुष्य को भगवान से मिले प्रार्बध के रूप में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के भाग्यों का भोग्य कर्म फल का समावेश होता है। यानि पिछले‌ तमाम मानव जन्मों में किए अच्छे और बुरे उन कर्मो के फल के रूप में हमे भाग्य मिलता है जिसे हम पिछले जन्मों में भोग नहीं पाय है ‌। और जिसे इस जन्म में हमारे द्वारा किया जाने वाला क्रियामान कर्म के अनुसार उसकी तीव्रता , अति तीव्रता तथा अगर क्रिया मान कर्म अच्छा है तो न्यूनता को भोगना परता है । अच्छा कर्म करने से तीव्र दुख भोग फल भी न्यूनतम बन भोग फल बना जाता है । 

 अत: जिस मनुष्य का क्रियामान कर्म अच्छा है तो उसका अच्छा प्रारब्ध भाग्य फल के रूप में एक्टिभ हो जाता है जिससे उसको भगवान और गुरू कि अधिक कृपा प्राप्त होने लगती है जिससे जीव हर जगह सफलता प्राप्त करते चला जाता है जिसके परिणाम स्वरूप उसे संसारिक सुख के साथ अध्यात्मिक सुख तथा गुढ़ ज्ञान भी तत्वज्ञान के रूप में भगवद् अवतार गुरू से सहज रूप से प्राप्त होने लगता है और समझ में भी आने लगता है एवं व्यवहार में भी उतरने लगता है । 

लेकिन जो जीव मुर्खता बस मानव जीवन के मुल्यों के प्रतिकूल कर्म को जैसे ही करना शुरू करता है तो उसके प्रारब्ध के दुर्भाग्य वाला भाग एक्टिभ हो जाता है और‌ वो हर जगह फिर असफलता , निराशा , दुख पाना शुरू करता है । गलत काम करने से वो प्रार्बध के शौभाग्य वाले भाग को इनएक्टिभ कर लेता है , और इस प्रकार वो भगवान तथा गुरू दोनों के कृपा से विलग हो जाता है ,‌वंचित हो जाता है , परिणाम स्वरूप दुख से उसका जीवन भर जाता है । 
ऐसा मनुष्य गलत कर्म में संलग्न होकर भगवान से प्राप्त रिसोर्सेज ( जैसे धन जन परिवार देश समाज आदि ) का दुरूपयोग करता देखा जाता है , जीवन को फुहड़ बना लेता है, गलत बिषयों में लिप्त हो जाता है । तथा भाग्य रूपी सिक्के के डार्क भाग के अनुसार हर जगह असफलता , परेशानी ,‌निराशा, डिप्रेशन तथा दुख से घिर जाता है । और दोष भगवान तथा गुरू को देता है कि हमारा लाभ नहीं हो रहा है , इस प्रकार वो भगवान तथा गुरू पर और अधिक अविस्वास और अधिक दुरी एवं फिर और अधिक दुख परिणाम में पाता चला जाता है । 

तो सबकुछ हम मनुष्यों के अपने हाथ में है । 
बड़ा आश्चर्य होता है आज देख कर अधिकतर मनुष्य मानव जीवन को स्वयं नरक बना लेता है । घटिया फिल्म , घटिया हरकत , गलत संगति , गलत खान पान, अश्लील पहनावा ओढ़ावा, गलत बिषयों में रूचि , अश्लील बातें करना , घटिया मजाक , छिछोरी हरकतें, दारू मांस मदिरा का अधिक से अधिक सेवन, गाली गलौज , गलत भाषा , फैशन के नाम पर गलत भेष भूषा, घटिया पहनावा ओढ़ावा, सस्ती लोकप्रियता के नाम पर ,मौडर्निटी के बहाने गलत विडियो बनाना ,‌ कला के नाम पर, क्रियटिभीटी के नाम पर फुहड़ नृत्य , फुहड़ फिल्म , फुहड़ विडियो , गलत तथा तथ्यहीन संभाषण करना , अश्लील भाषा का उपयोग , दुसरे पर घटिया कटाक्ष करना , झूठ बोलना , चोरी करना , हत्या करना , डाका डालना , स्वतंत्रता के नाम पर अभद्र व्यवहार, अभिव्यक्ति के आजादी के नाम पर घटिया संभाषण करना , ज्योतिष विद्या तथा धर्म के नाम पर अंधविश्वास फैलाना । राजनीति के नाम पर घटिया आरोप प्रत्यारोप करना । प्रोफेशन के नाम पर दुसरे के हित से खिलवाड़ करना , ठगना , धोखा देना । ताकत के नाम पर कमजोर को सताना । दुसरे का हक मारना । पद तथा ज्ञान के नाम पर अहंकार का पोषण करना । 
दुसरे से जलन ईर्ष्या द्वेष करना , व्यास पीठ से मिथ्या संभाषण करना , अंधविश्वासों को फैलाना ।
यह अधिकांश मनुष्यों का आदत बन चुका है आज कलयुग में और दुर्भाग्य को खूद निमंत्रण देते हैं ।

और यह सब कौन करता है ? जिसको मानव जीवन के मूल्य तथा मानविय गुणों के प्रति कोई इंटरेस्ट नहीं है । जिसको भगवान तथा गुरू पर विश्वास नहीं है , जिसको शास्त्रों तथा वैदिक संविधान पर विश्वास नहीं है । जो स्वयं को देह मानता है जीवात्मा नहीं । 

अरे भोगना तो हमको हीं होगा । कोई नहीं बच सकता । कर्म गलत करेगे हम और भोली सुरत बना कर भगवान के मंदिर में जाकर खड़े हो जाएगे , गुरू के सामने खड़े हो जाऐगे ,पुजा पाठ भक्ति का नाटक करेगें , तो हम आप क्या समझते हैं कि आप हम भगवान तथा गुरू को ठग लेगें क्या ? 

" मन गांठ कपट के खोल , हरि बोल हरि बोल हरि बोल " :- श्री महाराज जी ।

भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे बाले हम जीवों को क्या भगवान पहचान नहीं पाते क्या ? 
हम भगवान से, गुरू से छल करेंगे तो हमारे लिए वो भी सबसे बड़ा छलिया बन जाते हैं । हम जितना शूद्ध प्रेम उनसे करेंगे तथा उनके अनुकूल आचरण करेंगे तो वो हमसे उतना ही प्रेम करते हैं , कृपा करते हैं । यह सिद्धांत श्री महाराज जी का हमें याद रखना है ।
इसलिए मानव जीवन को फुहड़ता में मत गंवाए । मानव जीवन को हल्के में हम न गंवाएं । 
श्री राधे ।

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