Thursday, 20 July 2023

Courtesy ( शिष्टाचार) इस शब्द के पीछे बड़ा धोखा है । बनाबट है , खोखलापन है । शिष्टाचार एक बनावटी व्यवहार को , बनावटी तारीफों के शब्दों को सुचित करता है । बड़े बड़े लोग , महान लोगों के लिए शिष्टाचार के नाते दो शब्द , दो बनावटी बातें उनके तारिफ में बोल देते हैं । लेकिन इसमें प्रेम भाव का सर्वथा आभाव होता है ।

Courtesy ( शिष्टाचार) इस शब्द के पीछे बड़ा धोखा है । बनाबट है , खोखलापन है । शिष्टाचार एक बनावटी व्यवहार को , बनावटी तारीफों के शब्दों को सुचित करता है । बड़े बड़े लोग , महान लोगों के लिए शिष्टाचार के नाते दो शब्द , दो बनावटी बातें उनके तारिफ में बोल देते हैं । लेकिन इसमें प्रेम भाव का सर्वथा आभाव होता है ।

 हालांकि बड़े बड़े नामचीन लोग एक्टिंग तो बढ़िया कर लेते हैं । लेकिन एक वास्तविक प्रेमी को पता चल हीं जाता है कि उनके बातों में प्रेम भाव का आभाव है । समर्पण का आभाव है । इसलिए इसे courtesy sentance भर ही समझना चाहिए। 

बड़े बड़े देश के राष्ट्रपति किसी दुसरे देश के शासनाअध्यक्ष के लिए शिष्टाचार बस सम्मान में दो वाक्य बोल देते हैं पर ह्रदय में वो भाव नहीं होता । 
इसलिए कुछ समय बाद वही व्यक्ति विरोध में बातें करने लगतें है । उनका असली भावना , चेहरा प्रकट हो जाता है । 
संसार के लोग धोखे में आ जाते हैं । 
झूठी तारीफ को सच मान कर खुश हो जाते हैं । 
लेकिन यही तो सबसे बड़ा धोखा है । 
आजकल भगवदिए एरिया में भी ऐसा है । 
अत: मेरा मानना है कि हमें ऐसे लोगों के द्वारा शिष्टाचार के नाते कहे गए बातों को आधार नहीं मानना चाहिए। सीरियसली नहीं लेना चाहिए। 

भगवद् एरिया में हमें केवल गुरू के समर्पित जीवों के भावों को हीं अपना आधार बनाना चाहिए । 
एक समर्पित, श्रद्धालु , शरणागत जीव के जो भाव है अपने गुरू के प्रति उसमें सच्चाई होती है । उसमें प्रेम की विशूद्ध भावना भरी होती है अपने गुरू और ईष्ट के प्रति । वो जो कुछ कहतें है अपने गुरू के सम्मान में वो उसके ह्रदय तल कि आवाज होती है , प्रेम का अनुभव तथा भाव समाहित होता है । 
हमारे लिए यही महत्वपूर्ण आधार है । 
समर्पित साधक केवल मुख से या वचन से अपने ईष्ट और गुरू के गुणों को नहीं गाता , वल्कि उसका तन मन तथा धन भी अपने गुरू और ईष्ट के प्रति समर्पित होता हैं ।

मैंने तो देखा है कि कुछ नामचीन तथा अरबपति लोग जो जनता के सामने किसी महान व्यक्ति के लिए तारीफ का पुल बांध कर स्टेज से जब निचे उतरे और उनको कुछ दान करने के लिए आग्रह किया गया तो वो बोले अभी नहीं बाद में आइएगा । और फिर वो कभी संपर्क में नही आए । और ऐसा लगभग 99% नामचीन लोग हैं । मुख से तारिफ करने में क्या जाता है ! ऐसे लोगों का भाव हीं होता है :- 
"वचनम् किं दरिद्रम "

वो शिष्टाचार निभा रहा है महान लोगों के अनुयायी के तुष्टि के लिए बस इससे अधिक कुछ भी नहीं उसके पास ।
अत: ऐसे लोगों के बातों का विश्वास हमें कभी नहीं करना चाहिए। हमें भी वोल देना चाहिए स्वागत है आपका , आपने बड़ी अच्छी बातें की, शुक्रिया, थैंक्यू । 
बस इतना ही । 

हमारे श्री महाराज जी ने सिखाया है हमें इन लोगों के चक्कर में न पड़ो कभी , इनके बातों पर भरोसा न करो । 
वो वोल रहा है तो तुम भी वोल दो एक्टिंग में थैंक्यू । लेकिन इनको सीरियसली न लो । 
सूई के छेद से कड़ोरो ऊंट का काफिला निकल सकता है पर ऐसे लोग ह्रदय से भगवद् प्रेमी हो जाए , असंभव ।

हां भगवान का , गुरू का वास्तविक भक्त , सच्चा साधु , सच्चा संत , समर्पित जीव आदि जिसमें दीनता , नम्रता , सहिष्णुता, अहंकार शून्यता भरपुर है वो कुछ भाव प्रकट करतें है हमारे गुरूदेव के सम्मान में तो वो हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है । इनके शब्द ह्रदय के गहराईयों से निकलती है । इसमें भगवद् प्रेम का रस घुला होता है जो हमारे ह्रदय और आत्मा को भी तृप्त करती है । इसलिए हमें केवल ऐसे जीवों के प्रेम भाव को ही स्वीकार करना चाहिए। इनका भाव हमारे भगवद् भावना के ज्योति को और अधिक प्रज्वलित कर देती है , बढ़ा देती है । 

श्री राधे ।

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