भगवद् उपासना के उपरांत गुरू कृपा के फलस्वरूप वास्तविक ज्ञान चक्षु जैसे जैसे खुलने लगता है वैसे वैसे असली तथा वास्तविक ज्ञान , दृश्य तथा सही समझ का विकास होता है ।
ध्यान साधना के मार्ग में अनेकों नया अनुभव , आनंददायक घटना जैसे जैसे घटती है वैसे वैसे हमारी पंचकोष रूपी ग्रंथी कटती जाती है तथा परिणामस्वरूप हम वैसे वैसे दिव्य शक्तियों के काफी नजदीक स्वयं को पाते हैं । लेकिन यह भी यात्रा हीं हैं भले हीं मंजिल नजदीक सही पर आभास बहुत सुखद और आनंददायक प्रतीत होता है , आंतरिक उत्थान यानि आत्मा के उत्थान के प्रक्रिया में भी असीम आनंद है । यह तो उसी को समझ आता है जो इस अलौकिक प्रकिया का हिस्सा बन जाता है , वांकि के लिए यह केवल एक शब्द है, एक वाक्य है एक कहानी मात्र प्रतीत होता है। तीसरी ज्ञान चक्षु खुलने बाद ही यह सत्य प्रतीत होगा ।
सार यह कि हर प्रकार का ज्ञान इस ब्रह्मांड में व्याप्त है, चाहे वो लौकिक हो या पारलौकिक या भगवदिय दिव्य ज्ञान ।
हां लौकिक और पारलौकिक ज्ञान योग साधना के साधक को मिल जाता है पर दिव्य ज्ञान तो केवल दिव्य महापुरुष के शरण में जाने के बाद ही शुलभ होता है । और इस दिव्य ज्ञान में सभी प्रकार के ज्ञान और सिद्धियां समाहित होती है , स्वभाविक है कि गुरू के कृपा से दिव्य ज्ञान के साथ हरेक ज्ञान और सिद्धियां अपने आप उतरती है साधना मार्ग में ।
इसलिए ज्ञान कहीं से आती जाती नहीं है ।
नहीं तो जरा सोंचिए कि किसी भी बिषय पर पहला पुस्तक लिखने वाले को ज्ञान कहां से मिला ????? उसने कौन सी पुस्तकें पढ़ी, किसकी पुस्तकें पढ़ी ??
तो यह सिद्ध हुआ कि साधारण जन को पुस्तकों कि आवश्यकता होती है पर जब वो दिव्य गुरू के शरण में साधना करता है तो एक समय आने पर फिर उसे पुस्तकों को पढ़ने कि तथा उसके नकल कि जरूरत नहीं पड़ती , फिर ब्रह्मांड बोलता है और साधक सुनता है , ग्रहण करता है और चाहे तो लिख देता है या लिख सकता है । ।
केवल कृपा , कृपा , और गुरू कृपा बस साधक का ज्ञान चक्षु ब्रह्मांड में व्याप्त अलौकिक ज्ञान को ग्रहण करने तथा पढ़ने में सक्षम हो जाता है ।।
भले ही यह बातें हम साधारण जन को असंभव प्रतीत होता हो पर यही सत्य है । वक्त आने पर साक्षात्कार के बाद समझ जाते हैं समझने वाले ।
क्योंकि ब्रह्मांड बोल उठता है और कान सुनने लगता है स्वत: मौन में ।
जबतक जीव कोलाहल में है संसार का तबतक यह घटना घटित होना असंभव है ।
इसके लिए गुरू पर परम आस्था के साथ मौन साधना, एकांत रूपध्यान साधना परामावश्यक है ।
मौन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है ,आवश्यक है । अगली बार समझेंगे कि मौन क्या है , जीव की कौन सी अवस्था मौन है ।
No comments:
Post a Comment