वो दिव्य ज्ञान स्वरूप थे जो चारों वेदों के उद्गम का एक मात्र स्त्रोत थे और हैं । वे अनंत कोटी ब्रह्मांड का स्वामी हैं जो इस धरा धाम पर प्रकट हुए थे ।
और साथ साथ अपने निराकार रूप में इस जगत के कण कण में भी व्याप्त थे, हैं और हमेशा रहेंगे ।
और साथ साथ वो अपने दिव्य लोक गोलोक में भी सगुन साकार मूल स्वरूप में हैं ।
यह प्रकृति, जड़ , चेतन सब उन्हीं के शक्ति से कायम है और उन्हीं में एक दिन लय हो जाएगा और फिर उन्हीं से प्रकट होगा ।
हम सब उन्हीं के जीव शक्ति का अंश है , यह माया उन्हीं की अपरा शक्ति है।
मैंने जब उनको देखा था अपने प्रत्यक्ष आंखों से तब केवल यह सुना था लोगों से , उनके प्रचारकों से शास्त्रों के उपमा से , श्लोकों से कि गुरू भगवान के बराबर हैं और भगवान हीं गुरू रूप लेकर जीव कल्याण के लिए आते हैं धरा पर , यह केवल जानकारी तक सीमित थी हमारे लिए बहुत समय तक ।
फिर उनकी कृपा हुई हम पर तब हमने धीरे धीरे मानना शुरू किया । यह दुसरा फेज था हमारे लिए
लेकिन पिछले चार साल से उनकी कृपा के फलस्वरूप धीरे धीरे अब पूर्ण रूप से हम इस बात को रियलाईज कर लिए हैं उत्तरोत्तर प्रगाढता तथा दृढ़ता से कि श्री कृपालु जी महाराज और कोई नहीं सत प्रतिशत साक्षात पूर्ण ब्रह्म पुरूषोत्तम भगवान श्री कृष्ण का युगल स्वरूप ही थे और है । अब पक्का विश्वास हो गया है उनकी कृपा से , इतना दृढ़ विश्वास की अब अगर वो खुद भी आकर कहे कि ऐसा नहीं है तो यह बात हम नहीं मान सकते और उनको इस बिषय में हार मान कर यह स्वीकार करना हीं होगा वो हमसे तो मजाक कर रहे थे । हमारे विश्वास के दृढ़ता की परीक्षा लेने के लिए ।
जब आंतरिक ज्ञान का चक्षु श्री महाराज जी के कृपा से खुलती हैं तब जीव यह जानने से उपर और फिर मानने से भी ऊपर रियलाईजेशन करने कि स्थिति में प्रवेश कर जाता है ।
आज यह भी रियलाईज हो रहा है कि श्री महाराज जी को इस जन्म में तो हमने कुछ वर्षों पहले ही अपनी आंखों से देखा , उनका संग किया लेकिन वो भगवान होने के नाते हमें अनंत काल से न केवल जानते हैं वल्कि हमें जन्म दर जन्म संभालते हुए हमारे लक्ष्य की ओर धकेलते रहे हैं ।
हमारा पुरा जीवन उनके कृपा का प्रतिफल है ।
हमें यह भी रियलाईज हो रहा है कि हम तो घोर पतित थे लेकिन वे हमारे पापों के तीव्रता को अपनी कृपा से हमारे प्रार्बध के रूप में उतना हीं फल दिए जिसको हम आसानी से झेल सके ।
श्री महाराज जी इतने दयालु और कृपालु है कि एक माता पिता के रूप में वो अनेकों जन्मों में हमारी रक्षा करते रहे , हमें संभालते रहें , हमारे गुणाहों को माफ करते रहे लेकिन हम यह समझ नहीं पाय । वे परम धैर्य के साथ अपलक इंतजार करते रहे कि कब हम उनको अपना एक मात्र सनातन माता पिता रियलाईज कर लें और प्रति क्षण केवल उनका हीं चिंतन करें और अपना कल्याण कर लें । लेकिन हमने बहुत देर कर दी ।
आज एक बात का अत्यंत अफसोस है कि जब हम उनसे मिले तब हम क्यों नहीं तत्क्षण रियलाइजेन कि स्थिति को प्राप्त किया और उनके स्थूल शरीर में रहते उनका शरण ग्रहण कर लिया ?
यह सोंच सोंच कर बहुत पश्चाताप होता है, आत्म ग्लानि होती है । इतनी आत्म ग्लानि कि लगता है हमने परम दिव्य हीरा को पा कर खो दिया ।
लेकिन इस बात कि निश्चिंतता है कि हमने अपने भगवान को देखा है , उनका संग किया है । यह अत्यंत सुख और हर्ष प्रदान करता है अब ।
और फिर इसी से संतोष करते हैं, और जीते हैं हम और अब परम भरोसा है हमें कि उनके चरणों में ही हमारी दम निकलेगी मृत्यु के समय , इस शरीर को छोड़ते समय और उनको सदा के लिए पा लुंगा , फिर कभी उनका वियोग हमें नहीं झेलना होगा ।
इस संसार में आना नहीं पड़ेगा कभी । इतनी कृपा तो वो अवश्य कर देंगे । ये उनकी अंतिम तथा सबसे बड़ी कृपा होगी हम पर ।
श्री महाराज जी के आगे अनंत ब्रह्म लोक का सुख भी फीका सा प्रतीत होता है ।
अत: वो हमें इन मायिक कामनाओं से रक्षा करके सदा के लिए अपने चरण शरण में ले लेगें ।
जब तक आयु है तब तक उनके वियोग का दुख झेलना हमारा प्रारब्ध है , यह प्रार्बध भी जरूर समाप्त हो जाएगा एक दिन ।
और हमे सदा के लिए उनके दिव्य सेवा में शामिल होने का सुअवसर मिल जाएगा ।
" मोहि तो भरोसो है तिहारी री किशोरी राधे"
हे मेरे प्राणाधिपति, मैं तो यह सोंच कर हमेशा हर्षित रहता हुं कि मेरे मृत्यु का मंजर भी कितना हसीन और परम सुखद होगा जब मेरा तेरे चरणों में हीं दम निकलेगा और हम तुमको सदा के लिए पा लेंगे । इससे बढ़ कर मेरे लिए आनंद का कोई क्षण नहीं होगा ।
श्री राधे :- आपका संजीव कुमार।
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