आजकल कलयूग में हितैषी आलोचक या सही निंदक न के बराबर मिलते हैं । कलयुग है भाई साहब , कबीर दास जी जिस निंदक के लिए कुटी छवाने कि बात किए हैं वो वास्तविक महापुरूष , संत , सज्जन हितैषी दोस्त , हरि गुरू , निष्पक्ष ज्ञानि शिक्षक, निष्पक्ष विद्वान मार्ग दर्शक , मां या बाप या वास्तविक शुभचिंतक के लिए कहें है ।
वो मुर्ख , दुर्जन तथा स्वार्थी प्रकृति निंदक के लिए नहीं कहे है यह दोहा ।
आज कल दुष्ट निंदक जब आरोप प्रत्यारोप में हार जाते हैं तो फिर खुद को आलोच्य का हितैषी बता कर ठगने के लिए टूटे संबंध को पुर्नस्थापित करने के लिए कबीर दास जी के इस दोहे का दूरूपयोग झट से करते हैं । हिडेन एजेंडा पहले से तय होता है ऐसे तथाकथित निंदक का ।
इसके लिए निंदक के प्रकृति को समझना आवश्यक हैं पहले :-
वो तू मेरी खुजला मैं तेरी खूजलाता हुं । और जो तू मेरा न खूजलाया तो तुम से बुरा न कोय बाला निंदक , ऐसा आलोचक सही आलोचक नहीं है , ऐसे आलोचक को , निंदक का एक उपाय करने को कहा गया है सूभाषितानी में इस कलयुग में । कि उसको बोलिए कि जरा आप पीछे घुम जाए , और पीछे घुम जाए , तो कहिए साहब अब आप यहां चले जाईए इससे पहले कि यहां का माहौल खड़ाब हो जाय । नहीं तो वो आपको डिस्टर्ब करता रहेगा, आप अच्छा किए तो बुराई , बुरा किय तो बुराई , दोनों में निंदा करेगा वो । क्योंकि वो निंदक नहीं है वो दूष्ट है उससे न दोस्ती भली और न ऐसे का साथ भला , उसके लिए आंगन में कुटी तो क्या उसके साथ रहने से निगेटिव उर्जा मन को खड़ाब करता रहेगा ।
मुर्ख दोस्त से समझदार दुश्मन कहीं अच्छा होता है ।
और सम्मान में भी यह देखना आवश्यक है कि जो सम्मान कर रहा है यह सचमुच का सम्मान कर रहा है या कोई मकसद छुपा है इसका भविष्य में ?
क्योंकि चमचागिरी या चापलूसी भी एक सम्मान होने का भ्रम पैदा करता है । लेकिन जो समझदार है उसको पता चल जाता है कि कोई वास्तव में सम्मान कर रहा है या वनावटी या झूठा तारीफ जिसे असल में चापलूसी और चम्मच गिरी कहते हैं ।
देखना चाहिए कि अगर बिना मेरे डिजर्व किए हुए बेमतलब का मेरा कोई तारीफ कर रहा है तो समझना चाहिए कि जरूर इसका कोई स्वार्थ छिपा है मुझसे जो जरूरत से ज्यादा मेहरबान हो रहा है मुझ पर आजकल । यह आज मेरे गलती में भी मेरा वाह वाह कर रहा है , जरूर कोई मतलव यह कभी न कभी हल करने वाला है मुझसे, डंसेगा यह समय आने पर , सम्मान का जाल फैला रहा है लुटने के लिए , मौका मिलते ही हाथ साफ कर जाएगा जरूर । ऐसे से भी बहुत दूर रहना चाहिए। झूठा तारीफ कोई करें तो तुरंत सावधान ।।
हां अगर कोई उस बात के लिए हमारा सम्मान कर रहा है वाह कह रहा है जिसके लिए भगवान ने हमें कुछ गुण वास्तव में बख्सा है तो फिर ऐसे के सम्मान का स्वागत जरूर करना चाहिए और गुण पहचानने वाले को भी रिटर्न सम्मान देना अवश्य चाहिए। क्योकि सही सही सम्मान हौसला को बढ़ाता है और भी अच्छा करने के लिए प्रेरित करता है , यह सम्मान सकारात्मक होता है । ऐसे जीव का शुक्रिया अदा अवश्य करना चाहिए।
और आलोचना में तो देखना जरूरी है कि आलोचना स्वस्थ आलोचना है या नहीं , आलोचना सकारत्मक होना चाहिए, न की व्यंग का तीर , शब्द वाण समाज में किसी को नीचा दिखाने के उद्देश्य से या टांग खींचने की मकसद से किया गया है ।
अगर आलोचना सकारत्मक है तो स्वागत योग्य होता है , अगर खुद को ऊंचा और दुसरे को नीचा दिखाने के मकसद से आलोचना है तो यह आलोचना ठीक नहीं है । ऐसा आलोचना आलोचक के अहंकार का दर्पण मात्र होता है जिसे स्वीकार करना उसके दुर्भावना युक्त मन को और अधिक बढ़ावा देना है । सार यह कि समालोचना स्वागत योग्य है जो आलोच्य को सुधार का मौका देता है । अगर आलोचना आलोचक के अहंकार का सूचक है तो इसे स्वीकार करना आलोचक को एनार्की फैलाने का कारण बन सकता है । साथ साथ यह भी देखना जरूरी है कि आलोचक खुद कैसा है , कितना उदार है , कितना निर्दोष तथा निष्पक्ष है , कितना दोष रहित तथा दुर्भावना रहित है ? साथ साथ यह भी देखना चाहिए कि आलोचना में आलोच्य के प्रति हित कि चिंता है या नहीं , अगर चिंता दिखाई दे तो स्वीकार्य है पर अगर आलोचना में आलोचक के तिरस्कार , नफरत , द्वेष का गंध हो तो इसका प्रतिरोध आवश्यक है ।अगर प्रतिरोध संभव नहीं तो कम से कम ऐसे से दुर हो जाना या उदासीन रहना आवश्यक है ।
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