Thursday, 20 July 2023

सत्य कि स्थापना असत्य के द्वारा नहीं हो सकता कभी । धर्म कि स्थापना अधर्म से नहीं किया जा सकता कभी । सत्य को झूठ के द्वारा कभी सावित नहीं किया जा सकता है ।

सत्य कि स्थापना असत्य के द्वारा नहीं हो सकता कभी । 
धर्म कि स्थापना अधर्म से नहीं किया जा सकता कभी ।
 सत्य को झूठ के द्वारा कभी सावित नहीं किया जा सकता है । 
न्याय को अन्याय से नहीं पाया जा सकता है कभी । यह अकाट्य सिद्धांत है । 
धर्म के आर में कुछ लोग अधर्म करते हैं ।‌ धर्म के नाम पर आज कलयुग में लोग अधर्म करते हैं । भगवान के नाम पर कुछ लोग पाखंड करते हैं । 
ऐसे लोगों का अंत गति बहुत भयावह होती है । और मरने के बाद रो रो नरक में जाते हैं , हनुमान जी को चमत्कार दिखाने की लालसा नहीं होती है । वो भगवान है । भगवान अपने बनाए नियम को नहीं तोड़ते । हनुमान जी स्वयं भगवान है और उनके भी ईष्ट श्री राम अल्टिमेट भगवान हैं । उनके लिखे विधान का निरादर हनुमान जी करेंगे ऐसा सोंचना भी महापाप है । 
भगवान श्री राम ने किसी के पुर्व कर्म का फल लिख दिया उसको भला हनुमान जी कैसे बदल सकते हैं ?
भगवान के नाम पर अपनी मर्जी चलाना और अनाधिकारी के कर्म फल को बदलने का दावा करना सनातन वैदिक धर्म तथा वेद के प्रतिकूल है । ऐसे पाखंडियों से आस्तिकों को बचना चाहिए। 
भला चाहते हैं अपना तो हमेशा शुभ कर्म करने का संकल्प लें और आज से करना शुरू कर दें , देखिए किस्मत कैसे बदलती है । भाग्य कैसे बदलती है आपकी । 
मनुष्य का भाग्य मनुष्य का शुभ कर्म हीं बदलने में सक्षम है । और कोई नहीं । 

कर्म प्रधान विश्व करि राखा , जो जस करहीं सो तस फल चाखा ,- भगवान का यह सिद्धांत सभी संसारी लोगों के लिए है । संसारिक भोग कि बस्तुओं की प्राप्ति के लिए विश्व में कर्म का विधान है । 

और "होईहे वहीं जो राम रची राखा" को करि तर्क बढ़ावही शाखा - यह नियम भगवान तथा गुरू के शरणागत जीवों के लिए है । शरणागत जीव का काम तथा फल भगवान की इच्छा से होता है । भगवान हीं शरणागत जीव का कर्म करते हैं । वो जीव उनके इच्छा के विरुद्ध नहीं जाता । भगवान के प्रत्येक इच्छा को वो सहर्ष स्वीकार करता है ।‌

शरणागत जीव भगवान से भगवान का प्रेम , उनकी सेवा , उनकी भक्ति , उनका ज्ञान और वैराग्य चाहता है ,‌संसार नहीं ।‌

संसार की प्राप्ति के लिए तो कर्म का विधान है । और भगवान की प्राप्ति के लिए पुर्ण शरणागति का विधान है । 

एक असली महापुरूष और संत कभी आशिर्वाद का नाटक नहीं करता है । असली संत कभी भगवान के कर्म फल विधान में दखल नहीं देते हैं ‌। और जो देने का नाटक करता है , वो संत के भेष में बहुरूपिया है ‌, उसका विनाश उसके पाप का घड़ा भरने के बाद स्वत: हो जाता है । ऐसे लोग अपना तो अहित करते हीं है धर्म विरूद्ध आचरण, भगवान विरोधी आचरण करके अपने अनुयायियों को भी रौ रो नरक में पहुंचाने का गंभीर पाप करते हैं । इनको कहीं मुक्ति नहीं मिलती । इनको फिर कभी मानव शरीर नहीं मिलता ।

 इसलिए हमेशा वास्तविक महापुरूष के यहां जाएं । कभी संसार कि कामना न हो । सब उन पर छोड़ दें । वो जो करते हैं जीव के कल्याण के लिए करते हैं । वास्तविक संत पर पुर्ण श्रद्धा और विश्वास रखें । 

अनाधिकार कुछ भी पाने के लिए पाखंडियों के शरण में न जाएं ‌ । 
क्योंकि पाखंडियों के पास न खुदा यानि न भगवान हीं मिलेगें और न कभी विशाले सनम ( यानि संसारिक वैभव ) मिलेगा । 
आप न इधर के रहेंगे और न‌ उधर के । 
जो है आपके पास धर्म , कर्म पुण्य वो भी छीन जाएगा पाखंडियों के यहां जाने से । 
इसलिए समझदारी से काम लें । 
हर पीला बस्तु सोंना नहीं होता । 
हर चमकने वाला पत्थर हीरा नहीं होता । 
अत: संत के भेष में अधिकतर बहुरूपिया भरा परा है , पाखंडी भरा परा है । 
असली संत न मिले न सही लेकिन बहुरूपिया के चक्कर में अपना सबकुछ न‌ गवाएं । सत्संग न मिले न सही लेकिन कुसंग में न फंसे कभी ।। 
असली संत को पाने के लिए भगवान के सामने रोया करें ह्रदय से । असली संत मिल जाएंगे । :- संजीव कुमार। 

श्री राधे ।

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