पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी द्वारा उत्तर :-
एक शिष्य को , साधक को संसार में अच्छे और बुरे बिषय, बस्तू तथा व्यक्ति में अंतर अपने गुरू के सिद्धांतों के कसौटी पर कस कर करना चाहिए।
जो भी बिषय , व्यक्ति या वस्तू गुरू के सिद्धांतों के प्रतिकूल है उन सभी से दुर रहना श्रेयकर है । जो व्यक्ति हमारे गुरू के सिद्धांतों के विरोधी बातों को मानता हो तथा करता हो , उनसे हमें दुर रहना है ।
हमें हर बिषय बस्तुओं तथा व्यक्ति की पहचान अपने बुद्धि को गुरू के बुद्धि से जोड़कर करना चाहिए।
गुरू के बुद्धि से अपनी बुद्धि को जोड़ने का मतलव है उनके सिद्धांतों के कसौटी पर किसी बिषय, वस्तु तथा व्यक्ति को कस कर उसे पहचानना तथा विरोधी तत्वों से स्वयं को दुर रखना । गुरू का दिया तत्वज्ञान, सिद्धांत ज्ञान हमारी आंखें तथा बुद्धि है, पैमाना है ।
बस हमें यह ध्यान रखना है कि किसी कि बुराई नहीं करनी है, उसमें रस नहीं लेना है , इंटरेस्ट नहीं रखना है , लेकिन अच्छे और बुरे में अंतर , अनुकुल और प्रतिकुल व्यक्ति में अंतर तो हमें समझना ही होगा । नहीं तो हम कुसंग और कुसंगी से बचेंगे कैसे ? फर्क पहचानेंगे तभी तो बचेंगे कुसंग और कुसंगी से ।
यहां तक कि हमें स्वयं के मन के भावों को , मन में उठ रहे बिचारो को , संकल्पों को अपने गुरू के सिद्धांतों के कसौटी पर हर बार , बार-बार परखते रहना चाहिए, जो भाव, बिचार तथा संकल्प अनुकुल नहीं है उसे तुरंत त्याग देना चाहिए, राधे राधे करना शुरू कर देना चाहिए । मन में गलत भाव आवे , गलत बिचार उत्पन्न हो , निगेटिव ख्याल आवे तो हरि गुरू को याद करने लगना चाहिए , तत्वज्ञान से गलत बिचार तथा निगेटिव भाव दुर हो जाते हैं ।
:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ( युवा शिविर ब्रजगोपिका धाम )।
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