गुरूधाम तो साधकों के लिए , शिष्यों के लिए उसके आत्मा का घर होता है । बाबुल का घर ।
गुरूधाम तो साधकों के लिए इतना प्यारा होता है जितना न तो उसका घर , उसका गांव , उसका शहर और न उसकी अपनी आत्मा ।
जहां हमारे गुरू देव का अवतरण हुआ था , जहां के प्रत्येक रज में हमारे गुरूदेव और ईष्ट की खुशबू है , जहां के कण कण में उनके उपस्थिति का प्रत्यक्ष एहसास है , जहां के मिट्टी में उनके लीलाओं कि यादें सिमटी हैं , जहां के दरों दीवार पर उनका प्रतिबिंब है , जहां के गली गली में उनके चरण का छाप है , जहां पर पहुंचने मात्र से शरीर में रोमांच होता है , मन में एक दिव्य ऊर्जा का संचार होता है । जहां प्रवेश करते हीं आत्मा को आनंद कि परमानुभूति स्वत: होती है ।
जहां रूकने पर ( जितना दिन रूको उतना दिन ) साधकों का प्रत्येक सांसें स्वत: रूपध्यान साधना बन जाती है और ह्रदय की प्रत्येक धड़कनें उनका भजन और कीर्तन ।
जहां जाकर संसार कि कामनाओं का शमन होता है । जहां अत्यधिक सुख और संतोष का अनुभव होता है , जहां प्रवेश करते हीं तमाम दैविक दैहिक भौतिक ताप का शमन होता है और मन में उमंग व्याप्त हो जाता है । जहां ह्रदय में हरि गुरू के प्रति दिव्य प्रेम भाव का उदय होता है , जहां गुरूदेव और श्यामा शयाम के लीला का आभास होता है । जहां प्रवेश करते हीं कलयुग का प्रभाव समाप्त हो जाता है ।
जहां जाकर उनके चरण रज में लोटने की इच्छा जागृत होती है और लोटने पर हमें ऐसा अनुभव होता है कि हम तो गोलोक में हैं । गुरूधाम तो इस धरा-धाम पर गोलोक का हीं प्रत्यक्ष प्रारूप है । यह महत्व है गुरू धाम का ।
लेकिन यह उसके लिए है जो भगवद् भावुक पिपासु है , असली जिज्ञासु हैं , साधक है , शिष्य है । गुरूदेव और ईष्ट से प्रेम है जिसको ।
उसके लिए नहीं जो घुमंतू प्रकृति का है , एक भिजिटर मात्र है , टूरिस्ट भर है । या महज औपचारिकता पुरा कर लौट जाने वाला जीव है ।
घुमंतू के लिए तो गुरूधाम या तीर्थ स्थल केवल संसारिक मौज मस्ती के जैसा जगह मात्र है , गंदगी फैलाने का जगह । फोटू खिंचाने का जगह और फिर उस परम पवित्र दिव्य स्थान को भूल कर दुसरे किसी नय घूमने कि जगह तलाश करने के रास्ते चल देने कि जगह ।
मैं तो गुरू देव से यही प्रार्थना करता हूंं , कि जब तक यह पृथ्वी सलामत रहे तारे और सूर्य का अस्तित्व रहे आपके धाम का यश , नाम जगत के कोने कोने में फैले , यह जीवों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करें । युगों युगों तक आपके महिमा का गुण गान हो और जो भी यहां भाव भक्ति से आवे उसके ह्रदय में आपके और श्री राधाकृष्ण के प्रति प्रेम का संचार हो । हे गुरूदेव आप आपका धाम हमारे प्राण से भी बढ़ कर है । आपने हीं कहा है हमें धाम और धामी में कोई अंतर नहीं होता । हे गुरूदेव आपका इकवाल हमेशा बुलंद रहे । धाम का दिव्य प्रकाश कभी धूमिल ना हो । हमारे प्यारे गुरू धाम - मनगढ़ धाम और ब्रजगोपिका धाम की जय ।।
श्री राधे ।। :-केवल आपको हीं चाहने वाला आपका पागल प्रेमी संजीव कुमार।
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