मुझे पाने के लिए हीं मैंने यह संसार बनाया है और मानव योनि बनाया है । गुरू बन कर तुमको समझाया अनेकों बार लेकिन तुम तो इस संसार को हीं सत्य समझ कर यहीं सुख और आनंद ढूंढने में लगे हुए हो , अनेकों मानव जीवन गवां बैठे ।
यह कभी संभव नहीं है कि इस संसार में सुख हासिल कर लो । इसलिए अब भी मान लो और मेरे शरण में आ जाओ एक बार मैं तुमको आवागमन के चक्र से मुक्त करके हमेशा के लिए अपनाकर अपने लोक गोलोक का सुख और आनंद प्रदान कर दुंगा । तुम मेरे पुत्र हो , तुम मेरे दिव्य संपत्ति ( ज्ञान, वैराग्य, प्रेमाभक्ति, यश , श्री तथा आनंद ) का उत्तराधिकारी हो , लेकिन अज्ञानता के कारण मेरी दासी माया कि दास्ता कर रहे हो , तुम माया को छोड़ कर केवल मेरे शरण में आ जाओ , मैं तुम्हें अपना अनश्वर षठ संपत्ति दे दूंगा , फिर तुम सदा के लिए आनंदमय हो जाओगे ।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। 15.7।।
सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।।18.64।।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ।।18:65।।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।18:66।।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताप कदाचन ।
न चाशुश्रुषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ।।18:67।।
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति |
भक्तिं मयि परां कृत्वा मावैष्यत्यसंशय: ||18: 68||
न च तस्मान्नुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम: ।
भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि ।।18:69।।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।।8.7।।
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।8.14।।
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