Thursday, 20 July 2023

गीता के श्लोक द्वारा सिद्ध सिद्धांत।

भगवान श्री कृष्ण :- संसार में कहीं भी भटक लो , संसार का कुछ भी प्राप्त कर लो , संसार में चाहे बड़ा से बड़ा धनकूबेर बन जाओ , कोई उधम कर लो , कोई भी उत्सव मना लो , कहीं सुख नहीं है । मैंने इन सब में से किसी में भी शास्वत सुख डाला ही नही है जो तुम प्राप्त कर लोगे , इसीलिए तो सुख ढूंढ़ते हो और अंत में दुख मिलता है संसार में, क्योंकि आनंद तो मैं हुं , मेरे लोक में हीं शास्वत सुख है । इसलिए तो संसार में कुछ भी करते हो अंत में दु:ख हीं मिलता है । मृत्यू लोक में सुख कैसे हो सकता है ? यहां तो जन्म से लेकर मृत्यू तक सब में दुख छुपा हुआ है । यह मेरी दासी माया है , यह लोक तो मेरा जेल मात्र है, इतना भी ज्ञान नहीं तुमको ? जब तक तुम मुझे नहीं प्राप्त कर लोग तुम इस जेल में भिन्न भिन्न शरीर में दुख झेलने आते रहोगे अनंत काल तक । लेकिन इसी जगत के माध्यम से मानव शरीर द्वारा मेरी भक्ति करके एक बार मुझे पा लोगे तो हमेशा के लिए मेरे साथ मेरे लोक में असली सुख और आनंद के साथ रहोगे । 
मुझे पाने के लिए हीं मैंने यह संसार बनाया है और मानव योनि बनाया है । गुरू बन कर तुमको समझाया अनेकों बार लेकिन तुम तो इस संसार को हीं सत्य समझ कर यहीं सुख और आनंद ढूंढने में लगे हुए हो , अनेकों मानव जीवन गवां बैठे । 
यह कभी संभव नहीं है कि इस संसार में सुख हासिल कर लो । इसलिए अब भी मान लो और मेरे शरण में आ जाओ एक बार मैं तुमको आवागमन के चक्र से मुक्त करके हमेशा के लिए अपनाकर अपने लोक गोलोक का सुख और आनंद प्रदान कर दुंगा । तुम मेरे पुत्र हो , तुम मेरे दिव्य संपत्ति ( ज्ञान, वैराग्य, प्रेमाभक्ति, यश , श्री तथा आनंद ) का उत्तराधिकारी हो , लेकिन अज्ञानता के कारण मेरी दासी माया कि दास्ता कर रहे हो , तुम माया को छोड़ कर केवल मेरे शरण में आ जाओ , मैं तुम्हें अपना अनश्वर षठ संपत्ति दे दूंगा , फिर तुम सदा के लिए आनंदमय हो जाओगे ।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। 15.7।।

सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।।18.64।।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ।।18:65।।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।18:66।। 

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताप कदाचन ।
न चाशुश्रुषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ।।18:67।।

य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति |
भक्तिं मयि परां कृत्वा मावैष्यत्यसंशय: ||18: 68||

न च तस्मान्नुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम: ।
भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि ।।18:69।।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।।8.7।।
 
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।8.14।।

 :- श्री कृष्ण ( गीता ) ।।

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