Wednesday, 21 August 2024

आज कल अधिक पुजा पाठ के बाबजूद पापाचार बढ़ रहा है उसका कारण क्या है ?

आजकल हमारे देश में अधिकांश संख्या में लोग जप तप व्रत पूजा पाठ, उपवास तीर्थ-विर्थ हवन यज्ञ रूद्राभिषेक सत्यनारायण की पुजा , दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा , गणेश पूजा , लक्ष्मी पूजा , काली पूजा , सुंदरकांड की पाठ, आदि तमाम तरह के कर्मकांड करने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही है , बड़े बड़े मंदिरों में रात रात भर भजन कीर्तन, जागरण, दान आदि करते पाए जाते हैं । 

आजकल तो इतने प्रवचन करने वाले बाबा लोगों की भरमार हो चुकी है हमारे देश में जितना की आम लोगों की जनसंख्या भी नहीं थी सतयूग तथा त्रेता आदि में हमारे देश भारत में । आजकल इतना अधिक लोग ये सब कर्मकांड करते पाये जाते हैं जितना की सतयुग, त्रेता तथा द्वापर आदि का लोग भी नहीं किया होगा कभी । और करेंगे कैसे द्वापर में आज के तुलना में जनसंख्या ही कितनी थी ? आज भारत में हीं केवल एक सौ चालीस करोड़ लोग रहते हैं । 

लेकिन आज एक भी आदमी यह दावा नहीं कर सकता कि ए सब करने से उनके मन की एक प्रतिशत भी शुद्धि हुई है, मनों रोग - काम क्रोध , मद , मोह, लोभ , मातषर्य , ईर्ष्या घृणा , राग द्वेष चिंता आदि लेश मात्र भी कम हुआ है, सुख शान्ति तो बहुत दूर कि बात है ।

अरे आम लोगों कि कौन कहे स्वयं को बड़े बड़े पंडित , पुजारी , आचार्य , प्रवचन करने वाले लोग , कर्म कांड कराने वाले पंडितो के भी ये रोग कम नहीं हुए हैं । 

जरा सा कुछ प्रतिकूल बातें कोई इनके खिलाफ बोल दे , तुरंत गुस्सा , और लोभ लालच , राग द्वेष, अहंकार आदि इतना अधिक इनके मन में पाय जाते हैं कि उसी मंदिर के दुसरे पंडितो के प्रति राग द्वेष भरा परा है । जब इन पंडितो पुजारियों , आचार्यों का यह हाल है तो आम लोगों कि कौन कहे , अपने ही मंदिर के दुसरे पुजारी , आचार्य का बुराई करते मिल जाते हैं आज । आपस में एक दुसरे कि बुराई तो छोड़िये ये कर्मकांडी पंडित आचार्य लोग तो बड़े बड़े जगद्गुरुओं को भी नहीं छोड़ते , उनके बारे में गलत-सलत बातें बोलते रहते हैं , बड़े बड़े जगद्गुरुओं के प्रति भी दुर्भावना तथा द्वेष रखते हैं अपने मन में । 99% पंडितो में आचार्यों में दीनता , नम्रता, सहिष्णुता नहीं मिलेगा आज आपको , तो फिर पुजा पाठ हवन यज्ञ आदि कराने वाले गृहस्थों की तो बात ही छोड़िए । 

जब पंडितो पंडों, आचार्यों आदि का यह हाल है जो मंदिर में दिन रात भगवान के विग्रह कि सेवा करते हैं पुजा पाठ करते और कराते हैं तो भला साधारण लोग , इनसे कर्म कांड कराने तथा करने वाले गृहस्थों के मन बुद्धि चित्त अहंकार कि शूद्धि कि बात कौन सोचें ? 
तो इन सबका क्या कारण है ? तो पहला और सबसे प्रमुख कारण है आजकल केवल शरीर से भक्ति कि जा रही है । मन इंभौल्व हो या न हो कोई मतलव नहीं । दुसरा कारण कलयुग में कर्मकांड के सभी नियम तथा निषेधों का ठीक ठीक पालन असंभव है ।

अगर कोई पंडित यह कहता है कि भगवान कि फिजिकल सेवा , शरीर से पूजा पाठ , व्रत उपवास हवन यज्ञ करने से अभीष्ट यानि भौतिक बस्तूओं तथा संसारिक सुख सुविधा के साधनों कि प्राप्ति होती है तो जरा उनको देखा जाए जो लोग यह सब नहीं करते और न कभी किया आज तक फिर भी उनके पास आज रूप्या पैसा धन जन आदि पुजा पाठ जप तप हवन यज्ञ व्रत तीर्थ-विर्थ उपवास करने वालों कि अपेक्षा कई गुणा अधिक क्यों हैं ? 

नंबर दो अगर वो यह कहते हैं कि इन सब कर्मकांड से पाप समाप्त होता है कष्ट मिटते हैं तो आज ये सब करने बाले वेचैन क्यों है , इतना चिंता निराशा आदि से ये लोग घिरे क्यों रहते हैं ? आगे पाप करने के प्रवृत्ति का नाश क्यों नहीं हूआ ? 

नंबर तीन अगर यह दावा करते हैं पंडित लोग कि इससे लोगों के संस्कार का निर्माण होता है मन कि शूद्धि होती है तो जरा यह देखिए आज कि कितने लोगों यहां तक पंडितो तथा पंडों के खुद राग द्वेष काम क्रोध ईर्ष्या आदि समाप्त हुए हैं या कम हूए है ? 

तो यह सब वेकार कि बातें हैं । शास्त्र कहता है कलयुग में मंत्र तंत्र पुजा पाठ , जप तप हवन यज्ञ व्रत उपवास तीर्थ विर्थ संसारिक गानों के साथ भजन कीर्तन, नृत्य , उछल कूद सब निर्थक है इन सबका कोई लाभ नहीं है और न भगवान इन सब कर्मों से एक रत्ती भी खुश होते हैं , और न कृपा करते हैं । 

यहां तक कि इस कलयुग में इनसे न कोई आध्यात्मिक लाभ है और न कोई भौतिक लाभ है । 

भौतिक बस्तुएं तो जीव के केवल पुर्व जन्मों के संचित कर्मों जिसे प्रारब्ध कहते हैं प्लस इस जन्म के क्रियामान कर्मो से ही मिलता है । 
और अपवाद रूप में कोई सतयुग तथा त्रेता एवं द्वापर आदि के जैसे नियम तथा पुरे विधान से जो कि आज असंभव है, अगर कर भी ले ठीक ठीक तो उसके कुछ पिछले संचित पाप आदि धुल सकते हैं लेकिन जीव का उद्धार नहीं हो सकता , क्योंकि जीव के अनंत जन्मों के पाप की गठरी उसके माथे पर है । इन सबका क्षय इन सबसे नहीं हो सकता जब तक जीव के पंचकोष , पंचक्लेश , त्रिविध ताप आदि पुरी तरह भस्म न हो जाए ।
और जहां तक आध्यात्मिक लाभ एवं मन बुद्धि चित्त अहंकार, साधन चातुष्ट्य आदि कि शूद्धि आदि कि बात है तो यह केवल मन से भगवान तथा योग्य गुरू कि निरंतर तथा अनन्य भक्ति , पुर्ण शरणागति एवं साधना से हीं संभव है वरना कलयुग में कोई अन्य साधन फलदायी नहीं है । 
:- गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज द्वारा प्राप्त सिद्धांत ज्ञान से । श्री राधे ।

Tuesday, 20 August 2024

गुरू द्वारा प्राप्त वैदिक सिद्धांतो तथा तत्वज्ञान से अपने मन पर कंट्रोल तथा विजय हासिल करने का अभ्यास हमें हर रोज करना होगा, और यह अभ्यास एकांत में हरि गुरू के रूपध्यान साधना से हीं संभव है अन्यथा मानवीय चंचल मन कि उच्छृंखलता कभी दूर नहीं हो सकती ।

पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी :- अपने गुरू द्वारा प्राप्त वैदिक सिद्धांतो तथा तत्वज्ञान से अपने मन पर कंट्रोल तथा विजय हासिल करने का अभ्यास हमें हर रोज करना होगा, और यह अभ्यास एकांत में हरि गुरू के रूपध्यान साधना से हीं संभव है अन्यथा मानवीय चंचल मन कि उच्छृंखलता कभी दूर नहीं हो सकती । 

 उच्छृंखल मन हमेशा उदंडता करता रहेगा तथा यह तर्क , कुतर्क , वितर्क एवं अति तर्क में हीं उलझा रहेगा हमेशा और यही उदंड मन जीवन के हर क्षेत्र में असफलता का सबसे बड़ा कारण है । एक उच्छृंखल मन मनुष्य का पतन करा देता है । उच्छृंखल मन मनुष्य को अपने लक्ष्य पर कभी पहुंचने नहीं दे सकता है ।
अनेक बिचारों का प्रवाह यह मानवीय मन जीव के आत्मशक्ति को छिन्न-भिन्न करके रखता हैं जिस कारण यह मन किसी भी शुभ कर्म में केंद्रित नहीं हो सकता । 

इसलिए मन को ध्यान ( Meditation ) द्वारा "साधना" होगा । एकांत रूपध्यान साधना के द्वारा मन को दिव्य शक्ति यथा ज्ञान शक्ति के मूल स्रोत हरिगुरू में जमाना होगा, केंद्रित करना होगा । रूपध्यान साधना द्वारा इसको नियोजित करने की कला सिखनी होगी । मन को अनावश्यक बिषयों के चिंतन , चिंता तथा नकारात्मक बिचारो के प्रवाह से हटाने कि क्रिया को मन का निग्रह कहते हैं, दुसरे शब्दों में चित्त का मार्जन करना भी इसी क्रिया को कहते हैं तथा इसे हरिगुरू द्वारा दिया ज्ञान एवं सकारात्मक चिंतन में लगा कर दिव्य गुणों को ग्रहण के क्रिया को परिग्रहण कहते हैं । 

मन को अनेको अनुपयोगी बिषयों के चिंतन से हटाकर किसी एक परम उपयोगी तथा कल्याणकारी बिषय में लगाने की कला को मन को नियोजन करना कहते हैं । इंग्लिश में इसे Mind Management कहते हैं । 

अनियोजित मन अज्ञानता के कारण अनादि काल से अनित्य को हीं नित्य मान बैठा है , यह अपने शरीर तथा इस संसार को ही नित्य मान बैठा है , अत: यह सदा से अविद्या माया का शिकार है । इसी अविद्या माया के कारण जीव का मन भ्रम , प्रमाद , विप्रलिप्सा तथा कर्णपाटव जैसे मानसिक रोगों से ग्रसित है । 

यही अविद्या माया अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश का भी मुख्य कारण है । और यही पांचों अवगुण जीव के मन को चिंता तथा भय से ग्रसित कर रखा है । 
जब तक मनुष्य का मन इनसे मुक्त नहीं होगा तब तक जीव अपने लक्ष्य को कभी हासिल नहीं कर सकता । 
जब तक मनुष्य का मन स्थिर नहीं होगा, जीव हमेशा अशांत रहेगा , दुखी रहेगा , हताशा तथा निराशा का शिकार रहेगा चाहे वो कितना भी अनित्य संसाधनो को अपने लिए जमा करके रख ले ।
जब तक जीव अपने मन के अनंत शक्तियों को नियंत्रित करने का कला नहीं सिखेगा तब तक मनुष्य का पंचकोष भष्म नहीं हो सकता , और जब तक पंचकोष भष्म नहीं होगा, जीव पर त्रिताप तथा पंचक्लेश हमेशा हावी रहेगा और जीव दुखी हीं रहेगा , चाहे वो कितना भी धन , जन वैभव तथा अन्य अनित्य भौतिक बस्तूओं को इकट्ठा कर लें । 

आज कलयुग में भगवान तथा गुरू कि भक्ति तथा उनकी बतलाई साधना ही एक मात्र ऐसा साधन है जिससे जीव अपने मन को अपने वश में कर सकता है दुसरा कोई अन्य साधन नहीं है, क्योंकि अनादि काल से संसार में हीं आवागमन के कारण चतुर्युगी युग चक्र के अंतिम युग कलयुग में जीव का मन इतना उच्छृंखल हो चुका है कि वो अंधविश्वास तथा रूढ़िवादिता को ही कर्म तथा धर्म एवं ज्ञान समझ बैठा है । 
अत: कलयुग में जीव कर्म धर्म एवं ज्ञान के मूल स्वरूप को समझने में असमर्थ है । 
यही वजह है कि जीव आज कर्म धर्म के रूप में जो भी कर रहा है वो निष्फल होता जा रहा है चाहे वो पुजा पाठ हो , जप, तप, व्रत, उपवास तीर्थ, विर्थ, हवन या कोई भी अन्य कर्म कांड क्यों न हो । 

अत: कलयुग में केवल भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ तथा कल्याणकारी है, लेकिन अफसोस कि आज कलयुग में अधिकतर लोग भक्ति के मूल स्वरूप तथा वास्तविक अर्थ को भी नहीं जानते। 

इस कलयुग के परमाचार्य पंचम मौलिक जगद्गुरूत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु ने भक्ति कि जो परिभाषा कि है तथा भक्ति के जिस मार्ग को प्रशस्त किया है जीव केवल उसी को अपना कर अपने जीवन को सफल बना सकता है अन्यथा इस कलयुग में अन्य कोई मार्ग सक्षम नहीं है । अन्य सभी मार्ग भ्रम में डालने वाले हैं तथा मानसिक रोग को और भी बढ़ाने वाले मार्ग है । श्री राधे ।