Saturday, 9 March 2024

सुकरात एक फिलॉसफर हुआ है, उसका शिष्य था डायोज़नीज़, उसके पास सिकन्दर बादशाह गया और उसने कहा महाराज! कुछ हमारे लिए सेवा बताइये। तो डायोजनीज ने कहा, हट! धूप छोड़ दे! सेवा करेगा यह। है क्या तेरे पास फटीचर दरिद्री। तू क्या सेवा करेगा? मेरी सेवा करेगा? मेरी सेवा करना है तो दे स्प्रिचुअल हैपीनेस। है तेरे पास? नहीं वह तो नहीं है। फिर क्या सेवा करेगा तू?

श्री महाराज जी का प्रवचन :- *सुकरात एक फिलॉसफर हुआ है, उसका शिष्य था डायोज़नीज़, उसके पास सिकन्दर बादशाह गया और उसने कहा महाराज! कुछ हमारे लिए सेवा बताइये। तो डायोजनीज ने कहा, हट! धूप छोड़ दे! सेवा करेगा यह। है क्या तेरे पास फटीचर दरिद्री। तू क्या सेवा करेगा? मेरी सेवा करेगा? मेरी सेवा करना है तो दे स्प्रिचुअल हैपीनेस। है तेरे पास? नहीं वह तो नहीं है। फिर क्या सेवा करेगा तू? रसगुल्ला खिलायेगा मुझे? इसके लिये मैं बाबा जी बना हूँ? अरे! भाई कोई गरीब पैसा माँगने जाये तो उसको पैसा चाहिए। कोई बुद्धि माँगने जाय उसको ज्ञान चाहिए। हमको स्प्रिचुअल हैपीनेस चाहिए और तू दान करने का स्वांग रचकर के मेरे पास आया है। क्या देगा तू तो खुद भिखारी है। यह जो छोटी मोटी सम्पत्ति यह हीरा मोती यह मिट्टी के टुकड़े जो तू इण्डिया वगैरह से लेके आया है, यह मुझे देने आया है? (हाँ!)*

*तो प्रेम एक दिव्य वस्तु है। यह नं. दो वाला। लेकिन नं. एक वाला जो प्रेम है, वो हमको करना है। करना पड़ेगा। यहीं पर कनफ्यूजन हो जाता है संसार में बड़े-बड़े काबिलों को कि भाई यह तो ऐसा है महाराज जी कि वह तो कृपा साध्य है प्रेम। हाँ है। तो फिर कृपा कर दीजिये। लेकिन यह तुमको पता है कि वह कृपा साध्य है तो उसके लिये बर्तन तो होना चाहिए। आपको दूध चाहिए हम फ्री में देंगे दूध। लेकिन, बर्तन तो ले आओ। यह लीजिये बर्तन इसमें एक हजार छेद हैं इस बर्तन में दूध नहीं टिकेगा। बर्तन ठीक करो, अंत:करण शुद्ध करो। उसके लिये एक प्रेम करो। तो प्रेम शब्द का वैसे तो बहुत लम्बा चौड़ा अर्थ है। लेकिन एक परिभाषा समझ लीजिये आप लोग सबसे पहले-*

*सर्वथा ध्वंसरहितं सत्यपि ध्वंस कारणे।*
*यद्भावबन्धनं यूनो: सः प्रेमा परिकीर्तितः॥*
(उ.न, भ.र.सि.) 

*ध्वंस का कारण हो, प्रेम के नष्ट होने का कारण हो, फिर भी प्रेम न घटे, उसमें हलचल न होने पावे। नॉर्मेलिटी में चलता जाय आगे को, उसका नाम प्रेम।*

*देखिये, आपके संसार में जो आसक्ति होती है, इसमें क्या होता है? ध्वंस का कारण आया, प्रेम जीरो बटे सौ। अभी-अभी एक लड़का एक लड़की दोनों एक दूसरे में आसक्त थे और साथ ही जियेंगे साथ ही मरेंगे वादा करो खोपड़ा करो और लम्बी चौड़ी बातें हुई और तभी एक लड़की आई और उसने कहा हैलो और लिपट गई, उस लड़के से। तो पहली लड़की ने देखा, हाँ! एक और भी है तुम्हारे। बदमाश हमको ठगते हो? धूर्त हो, मक्कार हो, चार सौ बीस हो। खत्म हो गया प्रेम। यानी ध्वंस का कारण आया, प्रेम समाप्त। अरे! आपकी विवाहिता बीबी हो, सगी माँ हो और जरा भी स्वार्थ की गड़बड़ी हुई चार आने, प्रेम चार आने कम हो गया। आठ आने हुई, आठ आने कम हो गया, बारह आने गड़बड़ी हुई, बारह आने कम हो गया। यानी आपके स्वार्थ के बेपेंदी के लोटे के आधार पर आपका प्यार टिका है। तो ध्वंस का कारण हो और फिर भी प्रेम क्षीण न होने पाये। यह कैसे होगा?*

*गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षणवर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम्॥* 
(नारद भक्ति दर्शन सूत्र - ५४)

*अब आये फिर नारदजी। नारदजी कहते हैं, भाई! यह तब होगा जब तुम जिससे प्रेम करते हो उससे कोई स्वार्थ भावना तुम्हारी न हो। यानी कुछ माँगो मत। देना-देना-देना। इतना देना सीखो कि अघाओ न। सब कुछ देकर के भी यह फील करो, हाय ! मैंने कुछ भी नहीं दिया। यह भी ध्यान रखना। सब कुछ समर्पण करके अगर अहंकार आ गया मैंने सब कुछ दे दिया, हो गया बंटाधार। सब कुछ दो और सब कुछ देने का अहंकार भी दे दो। यह सबसे खतरनाक शत्रु है अहंकार। हम लोग जरा सा दान करते हैं किसी संस्था में, किसी गरीब को, मैटीरियल जगत् में, तो चाहते हैं मेरा नाम अखबार में निकले, मेरा नाम यहाँ दीवाल पर लगा दिया जाय और इतना भूल जाते हैं कि दान तो गुप्त जो होता है, उसको दान कहते हैं। और कोई जाने न। क्योंकि कोई जानेगा और प्रशंसा कर देगा तो अहंकार हो जायेगा। सब चौपट हो गया। जैसे महापुरुष और भगवान् चोरी चोरी सेवा करते हैं शरणागत की, बिना बताये और अगर वह पूछेगा तो भी कह देंगे नहीं-नहीं मैंने तो कुछ नहीं किया तुम्हारे लिये। ऐसे ही, हमको करना है। यानी किसी प्रकार की कामना रख कर के ईश्वरीय जगत् में कदम नहीं रखना। देना देना सीखो। जो कुछ है बस। कहीं से उधार नहीं लाना है। मेरा मन तो गन्दा है क्या दूँ भगवान् को? अरे! तो वही तो शुद्ध करेंगे। कोई गन्दा कपड़ा यह कहे, ऐ निर्मल पानी ! मैं तेरे पास नहीं आऊँगा क्योंकि तू निर्मल है गन्दा हो जायेगा। ये ठीक है निर्मल पानी गन्दे कपड़े के सम्पर्क से गन्दा हो जायेगा। यह सही है लेकिन भगवान् और महापुरुष गंदे को शुद्ध कर देंगे और स्वयं भी शुद्ध रहेंगे, इतना अन्तर है। जैसे गंगाजी में कोई गन्दा नाला बह के जाता है वह गंगा जी बन जायेगा। गंगा जी गन्दा नाला नहीं बन जायेंगी। अग्नि के कुण्ड में जूता-चप्पल, गन्दगी कुछ भी डाल दो, वह अग्नि बन जायेगा। अग्नि जूता चप्पल नहीं बन जायेगा। अग्नि अपनी पर्सनेलिटी में रहेगा। इसलिये यह मत सोचो कि हमारे पास तो जो है सब डर्टी है। भगवान को कैसे दें? अरे वह लेने को तैयार हैं-*

*पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।* 
*तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।*
(गीता ९-२६, भाग. १०-८१-४) 

*अरे, मैं पत्ता भी खा लूँगा, जल भी खा लूँगा। प्यार से दो। तुम जो दोगे, मैं ले लूँगा। इतनी कृपाओं के कानून बना रखे हैं भगवान् ने। हम उनको समझते नहीं, उनकी इंपोर्टेंस नहीं रियेलाइज करते। इसलिये लापरवाह हैं। स्वार्थ युक्त जो संसार में कृपा करने का दावा करते हैं, इन पर तो विश्वास है। देखो हमारी बीबी हमारी बीमारी में रात भर बैठी रही, कितना प्यार करती है हमसे। अरे, बेवकूफ! तुझ से प्यार नहीं करती, वह तो इसलिये बैठी रही कि तुम मर जाओगे तो उसका क्या होगा, इस स्वार्थ के लिये। तू भोला है, नहीं समझता। वह अपने मतलब के लिये सब हिसाब बैठा रही है। तो संसार का जितना भी प्यार है उसमें लेना, लेना, लेना। यही सीखा हमने अनादि काल से अब तक। अब हम को नया पाठ पढ़ना है- देना, देना, देना। बिल्कुल उल्टा है। विपरीत दिशा है ईश्वरीय जगत्। यह अन्धकार है, वह प्रकाश है। इतना बड़ा अन्तर है। माँगते, माँगते, माँगते अनन्त जन्म बीत गये। संसारियों से माँगा, देवी-देवताओं से माँगा और भगवान् से माँगा और भिखमंगे बनते गये। छोड़ो माँगना, अब देना सीखो। तब भगवान के कान में जूँ रेंगेगी, अरे! यह तो माँगता ही नहीं कुछ।*

*जाहि न चाहिय कबहुँ कछु तुम सन सहज सनेह।* 

*भगवान को सोचना पड़ता है, अब तो मामला सीरियस है। यह कुछ नहीं लेना चाहता, लेकिन फिर भी यहाँ कह रहा है- श्याम मोहिं देहु प्रेम निष्काम। माँग तो रहा है। हाँ माँग तो रहा है। क्यों माँग रहा है, यह फिर बतायेंगे।*

*बोलिये वृन्दावन बिहारी लाल की जय।*

*-जगद्गुरूत्तम १००८ स्वामी श्री कृपालु महाप्रभु जी के प्रवचन का अंश।*

Wednesday, 6 March 2024

मेरी गीत मेरी रचना नंबर 122-बेखुदी तुमने मुझको, सताया बहुतबाखुदा इश्क में हम, तड़पने लगे

मेरी गीत मेरी रचना नंबर 122-

बेखुदी तुमने मुझको, सताया बहुत
बाखुदा इश्क में हम, तड़पने लगे 
तुमने कांटों से दामन, भरा था मेरा 
फुल बन के तुम्हीं को, लुभाने लगे 
बेखुदी तुमने मुझको सताया बहुत
बाखुदा इश्क में हम, तड़पने लगे

इश्क में तुमने मुझको, रूलाया मगर
आंसु बनकर तुम्हीं से, इश्क करने लगे 
बेखुदी तुमने मुझको सताया बहुत
बाखुदा इश्क में हम, तड़पने लगे

ये सच है कि मैं, तेरे काबिल नहीं 
काबिलों को भी तुमने, रूलाया बहुत
बेखुदी तुमने मुझको सताया बहुत
बाखुदा इश्क में हम, तड़पने लगे

तुमने लुटे हो मस्ती, कई दिल का 
लुटो मस्ती मेरा भी तो, जाने तुझे 
बेखुदी तुमने मुझको सताया बहुत
बाखुदा इश्क में हम, तड़पने लगे

:- संजीव ।

भगवान ने मनुष्य को संकल्प करने कि शक्ति एवं स्वतंत्रता दी है , फिर संकल्पित कर्म‌ करने कि भी स्वतंत्रता दी है लेकिन फल देने का काम अपने पास रखा है ।

कुछ लोग बराबर बोलते रहते हैं कि आप लोग गलत आचरण वाले को क्यों नहीं रोकते ,भगवान के फोटो से सजे स्टेज पर जूता पहन के डांस करने वाले को क्यों नहीं रोकते ? इसको क्यों नहीं रोकते , उसको क्यों नही टोकते ? उसका जबाब :- 
भगवान ने मनुष्य को संकल्प करने कि शक्ति एवं स्वतंत्रता दी है , फिर संकल्पित कर्म‌ करने कि भी स्वतंत्रता दी है लेकिन फल देने का काम अपने पास रखा है । 

इसलिए मनुष्य भोग प्रधान के साथ साथ कर्म प्रधान योनि भी है । यानि मनुष्य अपने पिछले कर्मों के फलस्वरूप भगवान से प्राप्त फल भोगता भी है और अगला कर्म करके अपना प्रारब्ध या भाग्य बनाता भी है । 
इसलिए मनुष्य का भाग्य या प्रारब्ध उसके अपने ही कर्मों का फल है, अत: उसके अपने ही हाथों में है अपना भाग्य बनाना या बिगाड़ना । 

इसलिए भगवान मनुष्य को संकल्प करने तदनुसार कर्म करने की स्वतंत्रता में कभी कोई दखल नहीं देते और ना ही कोई महापुरुष दखल देते हैं । वो अपने विभिन्न अवतारों में किए गये लीला के द्वारा , तत्वज्ञान द्वारा एवं अपने शास्त्रों के द्वारा सही कर्म धर्म क्या है ? गलत क्या है? वो सब समझा चुके हैं और आगे भी महापुरुष के रूप में अवतार लेकर समझाते रहते हैं और रहेंगे भी । 

अब इन ज्ञान के बाबजूद भी कोई मनुष्य भगवान को भी गाली दे , उनका खिलाफत करें , उनके जनों को कष्ट दे या कोई ग़लत काम करें और फल के रूप में रोग , शोक और कष्ट पावे और भोगे या बढ़िया कर्म करके बढ़िया भाग्य बना ले एवं फल के रूप में संसारिक सुख आदि भोगे यहां तक कि उनके प्रति भक्ति करके, शरणागत होकर भगवद् प्राप्ति करले तो यह उसकी स्वतंत्रता है जो भगवान द्वारा प्रदत है मानव योनि को ।

अगर भगवान किसी मनुष्य को कोई भी संकल्प करने और किसी भी कार्य को करने से पहले ही रोकते तो फिर मनुष्य कर्म प्रधान योनि नहीं रह जाता जो भगवान के खूद के कानून का उन्हीं के द्वारा उलंघन होता और मनुष्य परतंत्र होता कर्म करने में । 
इस प्रकार मनुष्य के कर्म का फल देने का कार्य भगवान के लिए तर्क संगत नहीं होता । 

यही कारण था कि तमाम राक्षसों ने , आसुरी प्रवृत्तियों के जीवों ने भगवान के उपर भी आक्रमण किया , उनको गालियां भी दी , उनके मंदिरों को उजाड़ा, और आज भी कुछ आसुरी लोग कर रहे हैं फिर भी भगवान उसे नहीं रोकते । हां फल जरूर मिलता है सबके अपने अपने कर्म के अनुसार। 

जब बुरा कर्म करने के फलस्वरूप फल के रूप में प्राप्त पाप का घड़ा भरा और जीव जैसे हीं पुण्यक्षिण हुआ भगवान ने उसको सजा दे दी और आसुरी शक्तियां मारा गया , उसका विनाश हुआ , इतिहास में सब दर्ज है । 
शिशुपाल भरी सभा में भगवान को गालियां देता रहा, कुछ धर्म परायण लोग उसे रोकना चाहा वहां भी , उसी सभा में लेकिन भगवान ने हर किसी को उसे रोकने से मना कर दिया । 
और मुस्कुराते हुए शिशुपाल के गालियों को गिनते रहे । सौ गालियां पुरी होते ही शिशुपाल के पुण्य का घड़ा खाली हो गया तथा पाप का घड़ा भर गया । फिर भगवान का चक्र चला और शिशुपाल का सिर धर से अलग । 

तो जब यह बातें ( तत्वज्ञान ) मालुम है आपको तो फिर आप क्यों कहते हैं कि भईया वो ग़लत कर रहा है आप कुछ बोलिए ? इसका मतलव तत्वज्ञान आपके मस्तिष्क से फिसल जाता है ।
 
जो जो ऐसा कर रहा है वो आसुरी वृत्ति का मनुष्य है करने दिजिए उसे । 
हमारे आपके समझाने से या रोकने से वे नहीं रूकने वाले हैं , यह मान लिजिए जितना जल्दी हो सके ।

जब वो नहीं समझने वाला समझाने से भी, तो फिर भगवान के द्वारा दिए हुए स्वतंत्रता में हम दखल अंदाजी क्यों करे ?

अगर हम उसको समझाने गए भी तो उल्टा वो हमको ही अपने व्यवहार से अशांत करेगा , कुसंग बोलेगा ।‌ और कुसंग अच्छी चिज़ नहीं है हमारे लिए । 

तो इतना तो समझदारी होना ही चाहिए ! जो लोग मुझे कहते हैं रोकने के लिए, उनको तत्वज्ञान याद नहीं रहता इसलिए ऐसा गलती करते हैं और मेरे मैसेज बौक्स में भर देते हैं मैसेज दे देकर और प्रमाण के रूप में मेरे मैसेंजर में और व्हाट्सएप्प पर भी विडियो भेज कर कि आप क्यूं नहीं कुछ बोलते ? अरे पुरे दुनिया का आप ही ठेका ले रखा है क्या ? 

मै तो भाई बहुत साधारण जीव हुं , मेरी इतनी सामर्थ नहीं कि मैं आसुरी प्रवृत्तियों वाले मनुष्य को समझा सकूं और रोक सकूं गुरू द्वारा दिए गए तत्वज्ञान के बाबजूद भी । 

जिसको अहंकार है कि वो उस आसुरी प्रवृत्तियों वाले मनुष्य को समझा देगा , रोक देगा तो जाईए आप ही समझा दिजिए उसको !

अरे जब भगवान नहीं रोकते किसी मनुष्य को गलत या सही संकल्प करके गलत और सही कर्म करने से तो मैं क्यों जाऊं अनाधिकार चेष्टा करने ? 

जब भगवान और महापुरूष ऐसे लोगों को नहीं समझा सके अनेकों अवतार के बाबजूद तो हम आप क्या है भाई ? 

रहने दो उसे उसके हाल पर । छोड़ो उसे । 
भगवान उसके भी कर्मों का फल एक दिन जरूर देंगे ही, जब बड़े बड़े रावण , कुंभकर्ण , हिरण्यकश्यप, हिरण्याक्ष , कंस , शिशुपाल , जरासंध जैसा महावली नष्ट हो गया स्वयं के उदंडता के कारण तो भला हम आप और वो क्या है ? करने दो उसे उदंडता । 

आप क्यों परेशान हो रहे ? क्या भगवान आप ही को ठिकेदारी दी है उसे गलत करने से रोकने के लिए ? आप दुसरे को मत देखो कि दुसरा क्या क्या कर रहा है । आप खूद को देखो कि आप क्या कर रहे हो ? साधना न करके यही सब विडियो आदि देखते रहते हो कि कौन कौन क्या क्या ग़लत कर रहा है क्या नहीं ? 

अरे अपना बना लो न । आपको हमको हमारे किए का फल मिलेगा उसको उसके किए कि फल (सजा) मिलेगा भगवान से । आपको चिंता क्यों हो रही है , क्यों अपना समय आप बर्बाद कर रहे हो ? 
जितना समय और श्रम आपने किया मेरे मैसेंजर पर उसका विडियो भेजने में और मुझे लिखने में , उतना समय आप अगर सिरियसली श्री महाराज जी का प्रवचन सुन लेते , उनका विडियो देख लेते , कुछ तत्वज्ञान और भी पक्का कर लेते , कुछ राधा नाम ले लेते , पांच मिनट साधना कर लिए होते तो आप कुछ और आगे बढ़ चुके होते ।
उल्टा अपना भी समय बर्बाद कर रहे हो, मेरा भी समय खड़ाब करना चाहते हो और मनगढ़ में जाके जिजियों से कंप्लेन करके उनके द्वारा रोकवाने के लिए मुझे बोलते हो !
इतना फालतु समझते हो महापुरुषों के समय को क्या ? इतना भी ज्ञान नहीं है आपको ?

और रही बात समाज की, तो समाज मे अगर कोई असंवैधानिक काम कर रहा है और आपको लगता है गलत है, तो कानून कहता है पुलिस में कंप्लेन कर दो आप , कोर्ट में जाकर कंप्लेन कर दो , काननू अपने हाथ में लेने का अधिकार तो देश का कानून भी नहीं देता है किसी को संसार में भी ।

ठीक उसी प्रकार भगवान के बनाए कानून के खिलाफ काम करने वाले को भगवान ही दंड देंगे, हम क्यों अनाधिकार चेष्टा करें । वो सबको देखते रहते हैं हम सभी के कर्मों को नोट कर रहे हैं । हम क्यों उनको बतलाने जाए । वो तो सर्वांतर्यामी है , सभी के कर्मों को नोट करते हैं , और स्वत: संज्ञान लेने में भी समर्थ है, फल देने में भी स्वतंत्र है और हर तरह से समर्थ भी है भगवान ।

Sunday, 3 March 2024

कभी भी किसी भी महापुरुष में , संतों में तुलनात्मक बातें हम जैसे नर्सरी कक्षा के साधकों को कभी नहीं करना चाहिए ।

कभी भी किसी भी महापुरुष में , संतों में तुलनात्मक बातें हम जैसे नर्सरी कक्षा के साधकों को कभी नहीं करना चाहिए । हमारा लेवल साधकों में भी बहुत नीचे है । उत्तम साधक वो है जिनका संसार से पुर्ण रूप से मोह भंग हो चुका है और वो अन्य किसी भी विषयों से अपना ध्यान , लगाव हटा कर कर्मयोग कि साधना भी त्याग कर पुर्ण रूपेण कर्म सन्यास कि साधना में अपना जीवन लगा चुके हैं , कर्म सन्यास की साधना में प्रवेश कर चुके हैं । 

ऐसे उच्च स्तर के साधक को भी श्री महाराज जी ने कभी संतों में तुलनात्मक अंतर करने का अधिकार नहीं दिए हैं । यहां तक कि श्री महाराज जी के प्रचारक भी ऐसी तुलनात्मक बातें वर्तमान में उपस्थित किसी संत का नाम लेकर कभी नहीं करते हैं । 
क्योंकि गुरू का आदेश ऐसा करने का विल्कूल नहीं है । और हमलोग तो ठहरे अभी पुर्ण रूपेण संसारिक । 
अभी संसार के "स" से भी हमारा मोह भंग नहीं हुआ है , फिर अगर हम ऐसी तुलनात्मक बाते करे तो उससे श्री महाराज जी को तकलीफ़ होना स्वाभाविक है । 
अगर हम ऐसा करते हैं तो हम दोनों के प्रति नामापराधी ही है । 
दोनों तरफ से गए हम लोग । 
इसलिए ऐसी बातों से सर्वदा बचना चाहिए। 
श्री महाराज जी ने तो यहां तक हमें हिदायत दिए हैं कि संसार में भी हम किसी साधक को बाहरी तौर पर देख कर यह विल्कूल नहीं जान सकते कि वो अंदर से क्या है ? किसका स्तर कितना ऊंचा है ? 
क्योंकि हम मनुष्य तो अल्पज्ञ है, सर्वांतर्यामी नहीं , इतना अल्पज्ञ है हमलोग  कि हमारी खूद कि स्थिति का सही से हमको जानकारी नहीं कि हम कहां तक पहुंचे हैं , उपर उठे हैं या निचे गिरे हैं । दिन भर में कई बार हमारा स्तर उपर निचे होता रहता है , अभी हम विल्कूल स्टेबल भी नहीं कि जहा तक पहुंचे हैं वहीं पर है या उससे आगे बढ़े हैं ।  हम अपने बुद्धि से तो अपना भी आंकलन ठीक से नहीं कर सकते तो भला दुसरे के आंतरिक व्यक्तित्व को हम कैसे जान सकते हैं ? वो भी किसी वर्तमान संत का ? 

अपनी ‌बुद्धि तो अभी गड़बड़ ही है हमारी ।
तीन गुणों में हमारी बुद्धि अभी , भाव , डिसिजन पल पल बदलता रहता है, हमारा भाव अभी विल्कूल स्थाई नहीं है  । हमें स्वयं के दोष को भी समझने कि शक्ति नहीं है।  इसलिए अपनी बुद्धि को गुरू के बुद्धि से जोड़ने तथा उनके बल से ही हमें हमारी दोष को समझने तथा  दुर करने का नित्य संकल्प करने का गुरू आदेश है ।

फिर श्री महाराज जी ने ही हमें आदेश दिया है कि किसी भी संत में भेद करने का या तुलनात्मक बातें करने का अधिकार किसी को नहीं है नित्य सिद्ध महापुरूषों को छोड़ कर । 
साधन सिद्ध महापुरूषों को भी इसका अधिकार नहीं है । इसलिए साधन सिद्ध महापुरूष भी इनसे बचते हैं । 

उन्होंने फिर आगे कहा है कि सभी संत उनके ही अंग है , यानि हाथ पैर अंगुली, आंख , कान , नाक , गला, बाल  आदि है । तो फिर कोई पैर की तुलना हाथ से करें , और हाथ की तुलना नाक से करें , नाक कि तुलना कान से करें , कान कि तुलना आंख से करें , तो यह तो हास्यास्पद बातें ही होंगी और महान मुर्खता कि बातें होंगी ।‌ क्योंकि अलग अलग अंगों का बिषय विल्कूल अलग अलग है । 
श्री महाराज जी ने ही हमें समझाया है कि महापुरूषों में भी अनके प्रकार के महापुरूष होते हैं , कोई भगवान के अवतार हैं , कुछ नित्य सिद्ध उनके परिकरों के अवतार हैं , कोई साधन सिद्ध महापुरूष है जो फिर आ गय है अवतार लेकर । 
उसके बाद फिर भाव के अनुसार भी कई कक्षा है महापुरुषों का , कोई शांत भाव के महापुरूष है , कोई दास भाव के है , कोई सखा भाव के है कोई वात्सल्य भाव के और  कोई माधुर्य भाव के है , अब माधुर्य भाव में भी कई क्लासेज है , जैसे कोई सधारणी रति के महापुरूष है तो कोई सामंजसा रति के है , कोई समर्था रति के अवतारी संत हैं । 
अब इनमें भी फिर कई क्लासेज है , जैसे राग भक्ति वाले महापुरुष हैं तो कोई अनुराग भक्ति वाले हैं,  कोई प्रणय भक्ति वाले हैं , कोई मान भक्ति वाले हैं, कोई भाव भक्ति वाले हैं , अब रस के अनुसार भी कई महापुरूष है , जैसे की कोई कुंज रस के रसिक संत हैं , कोई निकुंज रस वाले है तो कोई निभृत निकुंज रस वाले रसिक संत हैं , कोई राधा महाभाव के संत है जो राधा रानी के अवतार हैं जैसे हमारे श्री महाराज जी । 
भगवान श्री कृष्ण स्वयं  राधामहाभाव अंगिकार करके श्री गौरांग महाप्रभु बन कर और फिर श्री कृपालु महाप्रभु बनकर अवतार लिए थे अभी  हम जैसे अधमों को प्रेम रस का पान कराने के लिए । 

इस प्रकार अनेकों क्लास वाले अलग अलग आध्यात्मिक भाव भक्ति विषय , मार्ग वाले संत है । सबका बिषय अलग अलग है । 

यहां तक कि सन्यासियों में भी चार कक्षा के सन्यासी हैं , कुटिचक, बहुधक, अवधूत, तुरियातीत आदि फिर उससे भी उपर और आगे हंस है,  उससे और आगे परमहंस आदि है । अत: इन सब में तुलना करना ठीक उसी प्रकार है जैसे संसार में फिजिक्स के प्रोफेसर की तुलना जीव विज्ञान के प्रोफेसर से की जाए , भुगोल के प्रोफेसर की तुलना केमिस्ट्री के प्रोफेसर की जाए । गणित के प्रोफेसर कि तुलना हिन्दी के प्रोफेसर से कि जाए । अत: ऐसी तुलनात्मक बाते करना विल्कूल सही नहीं है । 
उसमें भी हमलोग नर्सरी कक्षा के साधक अगर ऐसी बातें करते है तो यह नामापराध के सीवा और कुछ नहीं है , ऐसी बातें करने से कम से कम हम श्री महाराज जी के अनुयायियों को विल्कूल बचना चाहिए। अगर हम साधारण साधकों में से ऐसी तुलनात्मक बाते कोई करता है तो इसका मतलव उसे श्री महाराज जी द्वारा दिए गए तत्वज्ञान के " त" का भी जानकारी सही से नहीं है । इसलिए इन सबसे आज के युवा साधकों को या किसी भी साधकों को बचना चाहिए। जो आज्ञा हमको गुरू द्वारा दि गई है उसी का पालन ठीक से करने पर फोकस करना  हमारे हित में  है । 

ऐसे भी संसारिक दृष्टि से भी अगर कोई एक व्यक्ति दुसरे के पिता को छोटा  और खुद के पिता को बड़ा बोले तो दुसरा भी पहले वाले के पिता को बोल देगा की नहीं जी मेरा पिता तेरे बाप से बड़ा है , फिर शुरू होती है एक दूसरे के बाप को लेकर गालियां शुरू , तो ये जो हम अपने बाप के बारे दुसरे से गलत बातें सुने , उसको मौका दिये , उसके लिए जिम्मेदार कौन है ? 
तो इस तरह कि बातें पब्लिकली करना भारी मुर्खता कि निशानी है । 
इसलिए पहले स्वयं अपना ध्यान पी एच डी करने पर दें हमलोग तो अच्छा रहेगा । 
नही तो संसार में जे एन यू से पी एच डी किया हुआ छात्र भी बैठा रह जाता है फेल होकर और  अनेकों साधारण युनिवर्सिटी का छात्र आई ए एस कंपीटिशन कंपीट करके कलक्टर बन जाता है , आई एफ एस तक होकर राजदूत बन जाता है दूसरे देश में । इतना तो हम लोगों के पास उदाहरण है हीं है संसार में भी । 
तो युनिवर्सिटी के महानता के अलावा छात्र का अपना पढ़ाई और मेहनत महत्वपूर्ण होता है  । नहीं तो बड़े से बड़े युनिवर्सिटी भी काम नहीं देगा , परीक्षा में सफलता का गारंटी नहीं है । 

और रही बात अपने महान माता पिता रूपी गुरू के महानता के गुणों का चर्चा करने के लिए जो कि एक अच्छी बात है तो बिना दुसरे का नाम लिए , बिना दुसरे का नाम लेकर उसको बिना छोटा बता भी तो हम अपने माता पिता को महान , सर्वोत्तम बता सकते हैं और हम बताते भी है और वो हैं भी सर्वोच्च । 

याद रखना चाहिए हमेशा कि  हम महान संत के अनुयाई हैं तो हमें हर जगह मर्यादा का पालन करना अधिक जरूरी है , नहीं तो संसार के आम लोग कहेंगे कि देखो सर्वोच्च गुरू का शिष्य या अनुयाई होकर भी कितना उदंड है । इस प्रकार लोगों को हम ही मोका देते हैं अपने पिता को कुछ  सुनवाने के लिए । 
हमारे ऐसे व्यवहार से हमारे गुरूदेव को दुख होता है । 
भक्त प्रति अपराध करें कोई सही सके न मेरे श्याम । 
श्री महाराज जी यह  कभी स्वीकार नहीं करेंगे कि हम किसी संत यानि भक्त के प्रति अपराध करें । 
जो हमारा मूल काम साधना करनी है, गुरू सेवा करनी है  वो तो हम नहीं करेंगे और दो शब्द तत्वज्ञान का कान में परा नहीं कि हम लगते हैं उड़ने और दुसरे को छोटा बताने , यह अच्छी बातें विल्कूल नहीं है । अरे गर्त में हम चले जाएंगे । हमको दंड मिलेगा । 
So Please avoid comparing in between any saint . This is pure Namapradh . It is strictly forbidden by Sri Maharaj jee .

श्री राधे । 
 श्री राधे ।