Sunday, 3 March 2024

कभी भी किसी भी महापुरुष में , संतों में तुलनात्मक बातें हम जैसे नर्सरी कक्षा के साधकों को कभी नहीं करना चाहिए ।

कभी भी किसी भी महापुरुष में , संतों में तुलनात्मक बातें हम जैसे नर्सरी कक्षा के साधकों को कभी नहीं करना चाहिए । हमारा लेवल साधकों में भी बहुत नीचे है । उत्तम साधक वो है जिनका संसार से पुर्ण रूप से मोह भंग हो चुका है और वो अन्य किसी भी विषयों से अपना ध्यान , लगाव हटा कर कर्मयोग कि साधना भी त्याग कर पुर्ण रूपेण कर्म सन्यास कि साधना में अपना जीवन लगा चुके हैं , कर्म सन्यास की साधना में प्रवेश कर चुके हैं । 

ऐसे उच्च स्तर के साधक को भी श्री महाराज जी ने कभी संतों में तुलनात्मक अंतर करने का अधिकार नहीं दिए हैं । यहां तक कि श्री महाराज जी के प्रचारक भी ऐसी तुलनात्मक बातें वर्तमान में उपस्थित किसी संत का नाम लेकर कभी नहीं करते हैं । 
क्योंकि गुरू का आदेश ऐसा करने का विल्कूल नहीं है । और हमलोग तो ठहरे अभी पुर्ण रूपेण संसारिक । 
अभी संसार के "स" से भी हमारा मोह भंग नहीं हुआ है , फिर अगर हम ऐसी तुलनात्मक बाते करे तो उससे श्री महाराज जी को तकलीफ़ होना स्वाभाविक है । 
अगर हम ऐसा करते हैं तो हम दोनों के प्रति नामापराधी ही है । 
दोनों तरफ से गए हम लोग । 
इसलिए ऐसी बातों से सर्वदा बचना चाहिए। 
श्री महाराज जी ने तो यहां तक हमें हिदायत दिए हैं कि संसार में भी हम किसी साधक को बाहरी तौर पर देख कर यह विल्कूल नहीं जान सकते कि वो अंदर से क्या है ? किसका स्तर कितना ऊंचा है ? 
क्योंकि हम मनुष्य तो अल्पज्ञ है, सर्वांतर्यामी नहीं , इतना अल्पज्ञ है हमलोग  कि हमारी खूद कि स्थिति का सही से हमको जानकारी नहीं कि हम कहां तक पहुंचे हैं , उपर उठे हैं या निचे गिरे हैं । दिन भर में कई बार हमारा स्तर उपर निचे होता रहता है , अभी हम विल्कूल स्टेबल भी नहीं कि जहा तक पहुंचे हैं वहीं पर है या उससे आगे बढ़े हैं ।  हम अपने बुद्धि से तो अपना भी आंकलन ठीक से नहीं कर सकते तो भला दुसरे के आंतरिक व्यक्तित्व को हम कैसे जान सकते हैं ? वो भी किसी वर्तमान संत का ? 

अपनी ‌बुद्धि तो अभी गड़बड़ ही है हमारी ।
तीन गुणों में हमारी बुद्धि अभी , भाव , डिसिजन पल पल बदलता रहता है, हमारा भाव अभी विल्कूल स्थाई नहीं है  । हमें स्वयं के दोष को भी समझने कि शक्ति नहीं है।  इसलिए अपनी बुद्धि को गुरू के बुद्धि से जोड़ने तथा उनके बल से ही हमें हमारी दोष को समझने तथा  दुर करने का नित्य संकल्प करने का गुरू आदेश है ।

फिर श्री महाराज जी ने ही हमें आदेश दिया है कि किसी भी संत में भेद करने का या तुलनात्मक बातें करने का अधिकार किसी को नहीं है नित्य सिद्ध महापुरूषों को छोड़ कर । 
साधन सिद्ध महापुरूषों को भी इसका अधिकार नहीं है । इसलिए साधन सिद्ध महापुरूष भी इनसे बचते हैं । 

उन्होंने फिर आगे कहा है कि सभी संत उनके ही अंग है , यानि हाथ पैर अंगुली, आंख , कान , नाक , गला, बाल  आदि है । तो फिर कोई पैर की तुलना हाथ से करें , और हाथ की तुलना नाक से करें , नाक कि तुलना कान से करें , कान कि तुलना आंख से करें , तो यह तो हास्यास्पद बातें ही होंगी और महान मुर्खता कि बातें होंगी ।‌ क्योंकि अलग अलग अंगों का बिषय विल्कूल अलग अलग है । 
श्री महाराज जी ने ही हमें समझाया है कि महापुरूषों में भी अनके प्रकार के महापुरूष होते हैं , कोई भगवान के अवतार हैं , कुछ नित्य सिद्ध उनके परिकरों के अवतार हैं , कोई साधन सिद्ध महापुरूष है जो फिर आ गय है अवतार लेकर । 
उसके बाद फिर भाव के अनुसार भी कई कक्षा है महापुरुषों का , कोई शांत भाव के महापुरूष है , कोई दास भाव के है , कोई सखा भाव के है कोई वात्सल्य भाव के और  कोई माधुर्य भाव के है , अब माधुर्य भाव में भी कई क्लासेज है , जैसे कोई सधारणी रति के महापुरूष है तो कोई सामंजसा रति के है , कोई समर्था रति के अवतारी संत हैं । 
अब इनमें भी फिर कई क्लासेज है , जैसे राग भक्ति वाले महापुरुष हैं तो कोई अनुराग भक्ति वाले हैं,  कोई प्रणय भक्ति वाले हैं , कोई मान भक्ति वाले हैं, कोई भाव भक्ति वाले हैं , अब रस के अनुसार भी कई महापुरूष है , जैसे की कोई कुंज रस के रसिक संत हैं , कोई निकुंज रस वाले है तो कोई निभृत निकुंज रस वाले रसिक संत हैं , कोई राधा महाभाव के संत है जो राधा रानी के अवतार हैं जैसे हमारे श्री महाराज जी । 
भगवान श्री कृष्ण स्वयं  राधामहाभाव अंगिकार करके श्री गौरांग महाप्रभु बन कर और फिर श्री कृपालु महाप्रभु बनकर अवतार लिए थे अभी  हम जैसे अधमों को प्रेम रस का पान कराने के लिए । 

इस प्रकार अनेकों क्लास वाले अलग अलग आध्यात्मिक भाव भक्ति विषय , मार्ग वाले संत है । सबका बिषय अलग अलग है । 

यहां तक कि सन्यासियों में भी चार कक्षा के सन्यासी हैं , कुटिचक, बहुधक, अवधूत, तुरियातीत आदि फिर उससे भी उपर और आगे हंस है,  उससे और आगे परमहंस आदि है । अत: इन सब में तुलना करना ठीक उसी प्रकार है जैसे संसार में फिजिक्स के प्रोफेसर की तुलना जीव विज्ञान के प्रोफेसर से की जाए , भुगोल के प्रोफेसर की तुलना केमिस्ट्री के प्रोफेसर की जाए । गणित के प्रोफेसर कि तुलना हिन्दी के प्रोफेसर से कि जाए । अत: ऐसी तुलनात्मक बाते करना विल्कूल सही नहीं है । 
उसमें भी हमलोग नर्सरी कक्षा के साधक अगर ऐसी बातें करते है तो यह नामापराध के सीवा और कुछ नहीं है , ऐसी बातें करने से कम से कम हम श्री महाराज जी के अनुयायियों को विल्कूल बचना चाहिए। अगर हम साधारण साधकों में से ऐसी तुलनात्मक बाते कोई करता है तो इसका मतलव उसे श्री महाराज जी द्वारा दिए गए तत्वज्ञान के " त" का भी जानकारी सही से नहीं है । इसलिए इन सबसे आज के युवा साधकों को या किसी भी साधकों को बचना चाहिए। जो आज्ञा हमको गुरू द्वारा दि गई है उसी का पालन ठीक से करने पर फोकस करना  हमारे हित में  है । 

ऐसे भी संसारिक दृष्टि से भी अगर कोई एक व्यक्ति दुसरे के पिता को छोटा  और खुद के पिता को बड़ा बोले तो दुसरा भी पहले वाले के पिता को बोल देगा की नहीं जी मेरा पिता तेरे बाप से बड़ा है , फिर शुरू होती है एक दूसरे के बाप को लेकर गालियां शुरू , तो ये जो हम अपने बाप के बारे दुसरे से गलत बातें सुने , उसको मौका दिये , उसके लिए जिम्मेदार कौन है ? 
तो इस तरह कि बातें पब्लिकली करना भारी मुर्खता कि निशानी है । 
इसलिए पहले स्वयं अपना ध्यान पी एच डी करने पर दें हमलोग तो अच्छा रहेगा । 
नही तो संसार में जे एन यू से पी एच डी किया हुआ छात्र भी बैठा रह जाता है फेल होकर और  अनेकों साधारण युनिवर्सिटी का छात्र आई ए एस कंपीटिशन कंपीट करके कलक्टर बन जाता है , आई एफ एस तक होकर राजदूत बन जाता है दूसरे देश में । इतना तो हम लोगों के पास उदाहरण है हीं है संसार में भी । 
तो युनिवर्सिटी के महानता के अलावा छात्र का अपना पढ़ाई और मेहनत महत्वपूर्ण होता है  । नहीं तो बड़े से बड़े युनिवर्सिटी भी काम नहीं देगा , परीक्षा में सफलता का गारंटी नहीं है । 

और रही बात अपने महान माता पिता रूपी गुरू के महानता के गुणों का चर्चा करने के लिए जो कि एक अच्छी बात है तो बिना दुसरे का नाम लिए , बिना दुसरे का नाम लेकर उसको बिना छोटा बता भी तो हम अपने माता पिता को महान , सर्वोत्तम बता सकते हैं और हम बताते भी है और वो हैं भी सर्वोच्च । 

याद रखना चाहिए हमेशा कि  हम महान संत के अनुयाई हैं तो हमें हर जगह मर्यादा का पालन करना अधिक जरूरी है , नहीं तो संसार के आम लोग कहेंगे कि देखो सर्वोच्च गुरू का शिष्य या अनुयाई होकर भी कितना उदंड है । इस प्रकार लोगों को हम ही मोका देते हैं अपने पिता को कुछ  सुनवाने के लिए । 
हमारे ऐसे व्यवहार से हमारे गुरूदेव को दुख होता है । 
भक्त प्रति अपराध करें कोई सही सके न मेरे श्याम । 
श्री महाराज जी यह  कभी स्वीकार नहीं करेंगे कि हम किसी संत यानि भक्त के प्रति अपराध करें । 
जो हमारा मूल काम साधना करनी है, गुरू सेवा करनी है  वो तो हम नहीं करेंगे और दो शब्द तत्वज्ञान का कान में परा नहीं कि हम लगते हैं उड़ने और दुसरे को छोटा बताने , यह अच्छी बातें विल्कूल नहीं है । अरे गर्त में हम चले जाएंगे । हमको दंड मिलेगा । 
So Please avoid comparing in between any saint . This is pure Namapradh . It is strictly forbidden by Sri Maharaj jee .

श्री राधे । 
 श्री राधे ।

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