Wednesday, 28 February 2024

नकलची बंदर या रटंत तोता न बने हम !

नकलची बंदर या रटंत तोता न बने हम ! 
श्री महाराजजी के प्रमुख प्रचारक पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी, श्री युगल शरण जी , श्री मुकुंदानंद जी श्री महाराज जी के सिद्धांतों का समझ तथा उनके व्यवहारिक उपयोगिता यानि अप्लिकेशन पर सबसे अधिक जोर देते हैं । 
ये लोग हु बहु श्री महाराज जी का फिलासफी न बोल कर, उनका हु बहु नकल न करके उसको अपने शब्दों में समझाते हैं, तथा वर्तमान काल के घटनाओं का अधिक से अधिक वर्तमान उदाहरणों के साथ प्रस्तुत करते हुए तथा समझाते हुए श्री महाराज जी के सिद्धांतों का व्यवहारिक समझ पर जोर देते हैं । इसलिए मुझे इन तीनों के समझाने की शैली बहुत पसंद है । और मुझे हीं नहीं आज लाखों लाख युवा लोग , बच्चे , आदि इनका कायल हो चुके है क्योंकि इन लोगों ने स्वयं न कभी श्री महाराज जी के बोली का नकल किया और न उनके सिद्धांतों का , और न उन्हीं के हु बहु बोले गय शब्दों में शैली में जिक्र किया यहां तक कि ये लोग न उनके किताबों का हुबहु नकल किया और न उनके भाषा में प्रवचन दिया कभी । ये लोग श्री महाराज जी से ग्रहित किए शास्त्रों के परसेप्शन को स्वयं ग्रहण करके हमें समझाते हैं अपनी भाषा शैली में जो बहुत लाभकारी है । 

 महापुरुषों के किताबों का नकल करके या रट्टा मार कर हु बहु बोलना , लिखना, कभी भी लाभप्रद नहीं है । इसलिए इन तीनों का हमेशा प्रयास रहता है कि महापुरुषों के वाणी को , उनके सिद्धांतों के सार ( gist) को बोले अपने स्टाईल में , अपने उन शब्दों में , जिसके लिए श्री महाराज जी ने प्रेरित किए हैं, ताकि लोग समझ जाए तथा उसका व्यवहारिक उपयोग भी ठीक से कर सकें अपने जीवन में । तभी कोई भी शिक्षा , ज्ञान सार्थक होती है । 
अन्यथा महापुरुषों का हु बहु नकल करके तो तोता भी मनुष्य से बेहतर बोल देता है ।

"शिकारी आएगा , जाल बिछाएगा , दाना डालेगा , लोभ से उसमें फंसना नहीं "
ये सिद्धांत तोता बोलना सीख लिया और लगा बोलने।
लेकिन जब शिकारी आया वास्तव में और जाल बिछाया , दाना डाला तो यह सिद्धांत बोलते बोलते उस जाल में फंस जाता है , और फिर शिकारी उसको पकड़ लेता है लेकिन फिर भी पिंजरे में भी वो बोलते रहता है यही रट्टा मारा हुआ सिद्धांत । 

तो भला ऐसे छात्र, या लोग का भला या क्या कल्याण होगा जो हुबहु नकल करके लिखते हैं और बोलते हैं और ऐसा ही करने की प्रेरणा दुसरे को भी देते हैं । 
यह एक गंभीर धोखा है । 

मैं तो स्वयं, महापुरूषों के सिद्धांतों को अच्छी तरह समझ कर अपनी भाषा में लिखने का प्रयास करता हूं ताकि उनके सिद्धांतों का समझ ठीक से मस्तिष्क में बैठ जाए जो हमारे व्यवहारिक उपयोग में आ सके । हमारा लाभ हो सके । 
रटा हुआ बात , या किताबों का हु बहु नकल किया हुआ बात दिमाग में अधिक दिनों तक नहीं ठहरता कभी , यह एक युनिवर्सल ट्रूथ है । 
मैंने अनुभव किया है प्रत्यक्ष रूप से सामने से संसार में , न की केवल सोसल मिडिया पर बहुत लोग श्री महाराज जी के फिलासफी को हु बहु बोल देते हैं लिख देते हैं लेकिन उनके खूद के जीवन में वो सिद्धांत का अप्लिकेशन दुर दुर तक नहीं है । आजकल ऐसे रट्टामल नकलची बंदर रूपी विद्वान अधिक मिल जाते हैं फिजिकल वर्ल्ड में तथा इस वर्चुअल सोसल मिडिया पर भी सभी क्षेत्रों में चाहे वो आध्यात्मिक बिषय हो यह अन्य बिषय । 
बस केवल लिख दिया महापुरुषों के किताबों का हु बहु नकल करके । इससे कोई लाभ नहीं । 

आज सीबीएसई बोर्ड ने जो फैसला किया है "ओपन बुक एक्जाम" उसका मैं स्वागत करता हूं । 
अभी तक जो भी परीक्षाएं हो रही है वो परीक्षा रटंत विद्या पर आधारित है । जो विद्यार्थी परीक्षा में रट्टा मार कर प्रश्नों का हु बहु उत्तर दे दे, हुं बहु जो किताबों में लिखा है तो उसको बढ़िया मार्क्स मिल जाता है । 
यही कारण है कि जो छात्र परीक्षा में चोरी करके किताब का नकल करके हु बहु लिख दे उसको भी बढ़िया मार्क्स मिल जाता है । लेकिन जिंदगी के इंतिहान मे वो अधिकतर लोग हर जगह असफल रहते हैं ।

 ऐसे व्यवस्था में पीछे रह जाता है बेचारा वो छात्र जो पढ़ कर, किताबों में लिखे सिद्धांतों को अच्छी तरह समझ कर अपने शब्दों में प्रश्नों का उत्तर देता है । लेकिन यहां ऐसे छात्र जो अपने व्यवहारिक जीवन में उस ज्ञान का उपयोग करता है वहीं हल जगह सफल होता है । 

अब हमारे देश में भी नया परीक्षा पद्धति Open book examination का फर्मुला लागु होने जा रहा है जो बड़ा ही उत्तम है ।
मैं इसका बहुत बहुत स्वागत करता हूं । 
इसमें छात्र किताब खोल कर प्रश्नों का उत्तर दे सकता है लेकिन प्रश्नों का उत्तर किताब से हु बहु नकल करके लिख देने से "0" 
नंबर आएगा । 

किताबों को खोलकर प्रश्नों का उत्तर अपने शब्दों में देने से हीं अच्छे मार्क हासिल होंगे । 
क्योंकि अपने शब्दों में उत्तर देने से पता चलेगा कि छात्रों ने सिद्धांतों को ठीक ठीक समझ लिया है और उसका उपयोग करने में वो सक्षम है , इस तरह से ज्ञान तथा शिक्षा की व्यवहारिक उपयोगिता बढ़ेगी । 

रट्टा मारने पर आज याद है कल वो भूल जाएगा , दुसरा उस शिक्षा का , ज्ञान का उपयोग वो अपने जीवन में नहीं कर पाता है । केवल रटा हुआ सिद्धांत ज्ञान , शाब्दिक ज्ञान कोई ज्ञान नहीं है । ज्ञान प्राप्त कर उसका उपयोग जीवन में आवश्यक है । 
नहीं तो पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ पंडित भया न कोई बाली बात ही अभी तक हो रही है अधिकांश लोगों के साथ ।

अब ओपन बुक एक्जाम में प्रश्न कुछ इस तरह का होगा कि- पानी के वैपोराईजेशन कि प्रक्रिया को , सिद्धांतों के द्वारा यह समझावे कि कीचड़ से वाष्पीकरण किस प्रकार होता है ? 

अब जो स्टूडेंट ओपन बुक से वाष्पीकरण का सिद्धांत लिख देगा हुं बहु उसको जीरो मार्क्स और जो उस सिद्धांतों के आधार पर अपनी भाषा में , समझे हुए प्रैक्टिकल ज्ञान से उत्तर देगा वो बढ़िया मार्क्स से उत्तीर्ण होगा । 

तो मैं तो स्कूल जीवन में अपने शिक्षकों से तथा आज भी अपने गुरू श्री महाराज जी से एवं उनके प्रमुख प्रचारक पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी से यह प्रेरणा हासिल किया है कि कोई भी ज्ञान चाहे वो संसारिक हो या आध्यात्मिक बातें या सिद्धांत वो महापुरुषों का या उनके किताबों का हु बहु नकल करके मत लिखो । 
तुमने क्या समझा वो लिखो अपनी भाषा में ताकि वो मस्तिष्क में ठीक ठीक बैठ जाएं और व्यवहार में आ सके । यही तरीका है जिसने मुझे काफी लाभ पहुचाया है । 
श्री राधे ।

Sunday, 18 February 2024

श्री महाराज जी द्वारा बतलाया गया भक्ति का निम्नलिखित मूल सिद्धांत हमेशा याद रहना चाहिए हमें, तभी भक्ति किया जा सकता है नहीं तो भटकने का पुरा चांस रहता है ।

श्री महाराज जी द्वारा बतलाया गया भक्ति का निम्नलिखित मूल सिद्धांत हमेशा याद रहना चाहिए हमें, तभी भक्ति किया जा सकता है नहीं तो भटकने का पुरा चांस रहता है ।

1. सबसे पहले भक्ति क्या है ? 
तो भक्ति भगवान और गुरू से प्रेम करने के भावक क्रिया का नाम है । भगवान और गुरू से मन के अटैचमेंट करने के साधना को साधन भक्ति करना कहते हैं । और मन जब पुरी तरह अटैच्ड हो जाए तो उसे सिद्ध भक्ति कहते हैं । 

2.भक्ति किसकी करनी है ? 
तो भक्ति गुरू और भगवान की करनी है ।

3.भक्ति किसको करनी है ? 
तो भक्ति मानव तन धारी जीवात्मा को मन से करनी है ।

4.भक्ति किससे करनी है ? तथा भक्ति में किन किन साधनों की जरूरत होती है ?
तो भक्ति "मन" से करनी है, देह तथा ईंद्रियों से भक्ति हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता । हां ईंद्रिया भी अगर सहायक हो तो साधना का स्पीड थोड़ा बढ़ जाता है । 
भक्ति में किसी भी बाह्य साधन या आधार की जरूरत नहीं , भगवान और गुरू के प्रति निष्काम प्रेम तथा उनकी सेवा की चाहत के आंसू ही प्रयाप्त है भगवान और गुरू को द्रवित करने के लिए । जिसके आंख में भगवद् प्रेम का निष्काम आंसू हैं , भगवान उनसे रीझ जाते हैं । 
"भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी " 

5.भक्ति का अधिकारी कौन कौन है ? 
तो भक्ति का अधिकारी प्रत्येक मानव तन धारी जीवात्मा है , चाहे वो कोई भी मनुष्य हो वो भक्ति करने का अधिकारी है । चाहे वो अमीर हो या गरीब हो , वो किसी भी देश , जाति , धर्म या संप्रदाय का हो,पढ़ा लिखा हो या अनपढ़ गंवार हो, विद्वान हो या कोई हो । 
 सभी भक्ति का अधिकारी जीव है । भक्ति देहाभिमान से परे होकर भगवद् प्रेम भाव से करनी चाहिए। 

6.भक्ति किस उम्र का मनुष्य कर सकता है? 
तो भक्ति किसी भी उम्र का व्यक्ति कर सकता है और कैसा भी देह धारी मनुष्य कर सकता है , चाहे वो बालक हो , युवा हो , बृद्ध हो , अपंग हो, लंगड़ा हो, लूला हो , गूंगा हो , बहरा हो , अंधा हो, काना हो, नर हो , नारी हो , चाहे नपुंसक हो , यानि  कोई भी मनुष्य हो ।
हां भक्ति अगर बचपन से प्रारंभ की जाए तो बहुत जल्दी उन्नति हो सकती है भक्ति मार्ग में , क्योंकि कुसंग से बचना आसान हो जाता है शुरू से हीं ।

7.भक्ति कौन से समय या काल में करनी है ? 
भक्ति हर क्षण, हर समय , हर काल में किया जाना चाहिए , चाहे वो दिन हो या रात हो , सुबह हो , या दोपहर या शाम हो । कोई मुहुर्त नहीं , कोई काल अनिवार्य नहीं । भक्ति में समय,  काल और मुहुर्त की कोई जरूरत नहीं, ऐसा नहीं कि ब्रह्म मुहूर्त हीं भक्ति के लिए श्रेष्ठ तथा फलदायी है। ब्रह्म मुहूर्त का महत्व सिर्फ इतना है कि अति सवेरे सो कर उठने पर मन काफी तरो ताजा तथा शांत रहता है एवं इस समय पुरा वातावरण भी शांत तथा अनुकुल होता है ध्यान तथा चिंतन के लिए । अन्यथा ऐसा नहीं है ब्रह्म मुहूर्त में कोई दिव्य शक्ति साथ देती है और अन्य समय में नहीं । 
यह सब सोंच केवल एक भ्रम है । गुरू और ईष्ट हर क्षण हमारे साथ रहते हैं , वो किसी भी क्षण साथ नहीं छोड़ते हमारा । 

8.भक्ति कहां की जा सकती है ? 
तो भक्ति इस धरती पर कहीं भी की जा सकती है । हां एकांत साधना के लिए , यानि कर्म संन्यास कि साधना के लिए एकांत और विल्कूल शांत जगह आवश्यक है । हां सामुहिक साधना के लिए गुरू धाम , भगवद् धाम, शिविर आदि विशेष अनुकुल तथा विशेष सहायक है । 

9. केवल मानव देह धारी जीवात्मा ही भक्ति कर सकता है , ऐसा क्यों ? 
क्योंकि मनुष्य शरीर ही कर्म प्रधान , ज्ञान प्रधान, चिंतन प्रधान है और भक्ति मन को हीं करनी है , इसमें हरि गुरू का नाम,  रूप , लीला, धाम तथा गुणों  का चिंतन प्रमुख हैं जो मन से हीं कि जा सकती है । इसलिए मानव देह धारी जीव ही भक्ति कर सकता है , अन्य देह धारी जीव चिंतन नहीं कर सकता , इसलिए अन्य देह धारी जीव भक्ति नहीं कर सकता । 

10. भक्ति किस भाषा के लोग तथा कौन से भाषा में संभव है ?
तो भक्ति के लिए किसी भी भाषा या बोली कि अनिवार्यता नहीं है । ऐसा नहीं है कि केवल संस्कृत भाषा वाले ही भक्ति कर सकते हैं । भगवान और गुरू किसी भी विशेष भाषा के पोषक नहीं है । वो सर्वज्ञ हैं , सर्वांतर्यामी है, भावक ग्राही हैं ,  मर्मज्ञ है, सर्वसुह्रत है । वो देश , काल,  भाषा, भेष, भूषा, नियम , निषेध आदि से परे हैं । 

इसलिए चाहे जिस भाषा का मनुष्य हो वो अपनी अपनी भाषा में , अपने भाव में भगवान और गुरू का चिंतन करने का अधिकारी है । भक्ति भगवान और गुरू से प्रेम करने का नाम है इसलिए इसमें शब्दों या भाषा की कोई अनिवार्यता नहीं है । भाषा और शब्द अपने मन के भावों को व्यक्त करने का माध्यम भर है । भक्ति जीवात्मा द्वारा उसके मन में भगवान तथा गुरू के नाम रूप लीला तथा धाम के चिंतन से उठे अपने प्रेम भावों को मन ही मन भगवान और गुरू को अर्पित करने का नाम है । 

इसमें कोई भी भेष भूषा,भाषा, शब्द बाधक नहीं हो सकता । डाकु रत्नाकर मरा मरा मरा बोल कर महान ऋषि बन गए , इतिहास गवाह है । इसलिए भक्ति में शब्द आदि का महत्व नहीं है । भक्ति में भाव , चिंतन तथा गुरू अनुकूल बिचार प्रमुख हैं जो मन के उपर निर्भर है । बाहर के क्रिया से इसका कोई मतलव नहीं । भक्ति गोपनीय बस्तू है , यह मनुष्य के ह्रदय में गुप्त रूप से अंकुरित भगवद् प्रेम का नाम है । 

बाहर प्रकट करने से यह प्रेम कि लता सुख जाती है , कुम्हला जाती है , अगर भक्ति परिपक्व न हुआ हो तो । क्योंकि भगवद् प्रेम को बाहर प्रकट करने से लोक रंजन नामक रोग इस लता में लग जाता है, लोक रंजन के फल के रूप में उपजे मान सम्मान तथा अभिमान रूपी खर पतवार भक्ति के लता को प्रारंभ में ही सुखा देती है और जीव भक्ति के राह से भटक सकता है अगर उसका तत्वज्ञान परिपक्व नहीं हुआ हो तो ।

इसलिए तत्वज्ञान तथा भक्ति जबतक परिपक्व न हो जाए तब तक इसे छुपाने के लिए कहा गया है गुरू द्वारा  । जब भक्ति परिपक्व होने लगती है , तब अष्ट सात्विक भाव के कुछ लक्षण अनजाने में कभी कभी अपने आप बिना चाहे बाहर प्रकट होने लगती है तो दोष नहीं है । लेकिन जानबूझ कर भाव भरने या प्रकट करने का दंभ करने से भक्त का पतन संभव है। 
इसलिए साधना काल में भक्ति में गोपनीयता अनिवार्य है  । 

11. भक्ति में क्या क्या नियम और निषेध है ? 
तो भक्ति में कोई नियम निषेध नहीं, केवल निम्नलिखित बातों को छोड़ कर :- 

भक्ति मार्ग के पथिक को अपने गुरू तथा ईंष्ट का अपने साथ उपस्थिति को एक पल भी नहीं भूलना चाहिए । अत: भक्ति में भगवान और गुरू को एक पल के लिए भी भूलना निषेध है । 
और नियम यह है कि भक्ति निरंतर हो , भक्ति अनन्य हो तथा भक्त केवल अपने गुरू तथा ईष्ट का ही शरणागत हों हमेशा के लिए  । गुरू के सिद्धांतों के अनुकूल चिंतन करना , बतलाए मार्ग पर  चलना तथा व्यवहार करना ही शरणागति है । 

12. भक्ति में क्या क्या अर्पित तथा समर्पित करना है ? 
तो भक्ति में अपना सर्वस्व समर्पित करना है अपने गुरू तथा ईंष्ट को मन से । यानि तन मन धन तथा आत्मा । आत्म दान सबसे बड़ी भक्ति है । और मन के संकल्प शक्ति से इन बस्तूओं को एक बार समर्पित करने के बाद कभी भूल कर भी हमें इन सब बस्तूओं को अपना नहीं मानना चाहिए। यह विशेष रूप से ख्याल हमेशा रहे, तो यह भाव हमेशा रहे कि अब जो भी है मेरे पास वो सभी गुरू और ईष्ट का है , मेरा नहीं है । 

बस ये 12 प्वाइंट भक्ति करने वाले को हमेशा याद रहना चाहिए । इन बारह बातों  में से अगर हम एक को भी भूले तो भक्ति से भटकने का खतरा रहता है । श्री राधे ।

( तो लगभग सैकड़ों लोगों ने जो मुझसे मेरे मैसेंजर पर जिज्ञासा कि थी तथा आग्रह किया था कि मैं पोस्ट लिख कर बता दूं तो  मैंने अपने गुरू श्री महाराज जी की कृपा से जो बातें ग्रहण किया है अपने अभी तक के साधना जीवन की यात्रा में वो बातें अपने स्मृति से लिख दिया है यहां । इसको सेभ करके रख लिजिए , ताकि भविष्य में फिर पुछने की आवश्यकता न हो ) श्री राधे ।।

नयनं गलदश्रुधारया वदनं गदगदरुद्धया गिरा। पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नाम-ग्रहणे भविष्यति॥६॥

चैतन्य महाप्रभु जी :- 
चेतोदर्पणमार्जनं भव-महादावाग्नि-निर्वापणम् श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधू-जीवनम् । आनंदाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम् सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्ण-संकीर्तनम् ॥१॥

अर्थात -श्रीकृष्ण-संकीर्तन की परम विजय हो जो हृदय में वर्षों से संचित मल का मार्जन करने वाला तथा बारम्बार जन्म-मृत्यु रूपी दावानल को शांत करने वाला है । भगवान श्री कृष्ण का नाम रूप लीला गुण धाम का चिंतन कीर्तन आदि मानव जीव के लिए परम कल्याणकारी है क्योंकि यह चन्द्र-किरणों की तरह शीतलता प्रदान करता है। समस्त अप्राकृत विद्या रूपी वधु का यही जीवन है । यह आनंद के सागर की वृद्धि करने वाला है और नित्य अमृत का आस्वादन कराने वाला है ॥१॥

नाम्नामकारि बहुधा निज सर्व शक्तिस्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः। एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः॥२॥

अर्थात हे भगवन ! आपका मात्र नाम ही जीवों का सब प्रकार से मंगल करने वाला है-कृष्ण, गोविन्द जैसे आपके लाखों नाम हैं। आपने इन नामों में अपनी समस्त शक्तियां अर्पित कर दी हैं । इन नामों का स्मरण एवं कीर्तन करने में देश-काल आदि का कोई भी नियम नहीं है । प्रभु ! आपने अपनी कृपा के कारण हमें भगवन्नाम के द्वारा अत्यंत ही सरलता से भगवत-प्राप्ति कर लेने में समर्थ बना दिया है, किन्तु मैं इतना दुर्भाग्यशाली हूँ कि आपके नाम में अब भी मेरा अनुराग उत्पन्न नहीं हो पाया है ॥२॥

तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥३॥

अर्थात - स्वयं को मार्ग में पड़े हुए तृण से भी अधिक नीच मानकर, वृक्ष के समान सहनशील होकर, मिथ्या मान की कामना न करके दुसरो को सदैव मान देकर हमें सदा ही श्री हरिनाम कीर्तन विनम्र भाव से करना चाहिए ॥३॥

न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि॥४॥

अर्थात - हे सर्व समर्थ जगदीश ! मुझे धन एकत्र करने की कोई कामना नहीं है, न मैं अनुयायियों, न सुन्दर स्त्री अथवा न प्रशंसनीय काव्यों का इक्छुक हूँ । मेरी तो एकमात्र यही कामना है कि जन्म-जन्मान्तर मैं आपकी अहैतुकी भक्ति कर सकूँ ॥४॥

अयि नन्दतनुज किंकरं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ। कृपया तव पादपंकज-स्थितधूलिसदृशं विचिन्तय॥५॥

अर्थात- हे नन्दतनुज ! मैं आपका नित्य दास हूँ किन्तु किसी कारणवश मैं जन्म-मृत्यु रूपी इस सागर में गिर पड़ा हूँ । कृपया मुझे अपने चरणकमलों की धूलि बनाकर मुझे इस विषम मृत्युसागर से मुक्त करिये ॥५॥

नयनं गलदश्रुधारया वदनं गदगदरुद्धया गिरा। पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नाम-ग्रहणे भविष्यति॥६॥

अर्थात हे प्रभु ! आपका नाम कीर्तन करते हुए कब मेरे नेत्रों से अश्रुओं की अविरल धारा बहेगी, कब आपका नामोच्चारण मात्र से ही मेरा कंठ गद्गद होकर अवरुद्ध हो जायेगा और कब मेरा शरीर रोमांचित हो उठेगा ॥६॥

युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्। शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्द विरहेण मे॥७॥

अर्थात - हे गोविन्द ! आपके विरह में मुझे एक क्षण भी एक युग के बराबर प्रतीत हो रहा है । नेत्रों से मूसलाधार वर्षा के समान निरंतर अश्रु-प्रवाह हो रहा है तथा समस्त जगत एक शून्य के समान दिख रहा है ॥७॥

आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मामदर्शनान्-मर्महतां करोतु वा। यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्-तु स एव नापरः॥८॥

अर्थात - एकमात्र श्रीकृष्ण के अतिरिक्त मेरे कोई प्राणनाथ हैं ही नहीं और वे ही सदैव बने रहेंगे, चाहे वे मेरा आलिंगन करें अथवा दर्शन न देकर मुझे आहत करें। वे नटखट कुछ भी क्यों न करें -वे सभी कुछ करने के लिए स्वतंत्र हैं क्योंकि वे मेरे नित्य आराध्य प्राणनाथ हैं ॥८॥ :- चैतन्य महाप्रभु जी

Thursday, 15 February 2024

साधक साधना तथा सावधानी।

साधक साधना तथा सावधानी। 
श्री महाराज जी के पुराने सत्संगी 50, 60 तथा 70 के दशक वाले लोग साधना के दरम्यान धड़ाम धड़ाम नीचे जमीन पर गिरने लगते थे , श्री महाराज जी द्वारा साधना शुरू कराने के कुछ देर के अंदर हीं , क्योंकि उनकी अपने चेतनावस्था की विस्मृति हो जाती थी । वो रूपध्यान के समय अपने भाव शरीर द्वारा गहरी ध्यान की अवस्था में भगवान और गुरू के लीला में शामिल में हो जाते थे ।‌
यह आजकल के हम साधकों में नहीं है क्योंकि हमारा फोकस डाईवर्ट हो चुका है साधना के प्रैक्टिस के जगह हम लोग बढ़िया गवईया , बढ़िया बजईया और बढ़िया नृत्य कला की ओर बढ़ रहे हैं और इसी को साधना समझ बैठे हैं । सिर पद के ताल लय सुर में खोने लगा है और हिलने लगा है । सिद्धि गाने बजाने तथा नृत्य में जरूर मिल गया, लेकिन भगवान और गुरू का रूप ध्यान कब छूट गए पता नहीं हीं चला । 
इसलिए जाना है जापान पहुंच रहे चीन वाली बात हो रही है आजकल । मन झूम रहा है सुर ताल सरगम तथा लय पर और हमको भ्रम है कि साधना हो रही है । 

साधना में विशेष ध्यान रखने की बात यह है कि साधना किसकी करनी है ? साधना किससे करनी है ? कैसे करनी है ? किन बातों का ध्यान रखना परम आवश्यक है ? किन बातों का सावधानी जरूरी है ? 
नहीं तो भगवान तथा गुरू के रूपध्यान के साधना के जगह केवल सुर, ताल, लय, नृत्य संगीत और बाद्य यंत्र बजाने की साधना यानी प्रैक्टिस न हो जाए , लोग बेहरत गवईया या बजईया या नृत्यकार न बन जाए । अगर साधना के जगह पर यह होने लगे तो समझना चाहिए कि हरि गुरू के रूप ध्यान लीला के साधना की दिशा की जगह हम भटक कर कही और जा रहे हैं ।
क्योंकि जब हमारा ध्यान ताल सुर लय और बजाने का एक्सपर्ट बनने पर केंद्रित हो जाए तो साधना तो गया । 
क्योंकि अक्सर ऐसा ही होता है लोग साधना के बजाए बेहतर गवईया , बजईया बन जाने की ओर अग्रसर हो जाते हैं , क्योंकि साधना करते करते साधना के वास्तविक रास्ते पर से भटक कर लोग गीत गाने , बाद्य यंत्र बजाने और नृत्य का साधना यानि प्रैक्टिस की ओर कब डाईवर्ट हो जाते हैं पता ही नहीं चलता । 

रूपध्यान साधना में गुरू या भगवान या दोनों का रूपध्यान आवश्यक है , फिर पद् के भाव के अनुसार उनके उस जीवंत लीला में खूद के भाव शरीर द्वारा शामिल होना परम आवश्यक है । 

ध्यान रखने की बात है कि साधना का प्रैक्टिस हमको उस ओर ले जाएं , उस ऊंचाई पर ले जा रही है हमारे चिंतन को या नहीं जिसमें हम आभासीय चल चित्र की भांति भगवान या गुरू या दोनों के लीला में खूद को समायोजित करने लग रहे हैं या नहीं । अगर नहीं तो सावधानी कि जरूरत है कहीं हम साधना के दिशा से भटक कर कोई और दिशा में तो नहीं बढ़ रहे हैं । असली साधना के जगह हमारा गाने बजाने तथा नृत्य की साधना या प्रैक्टिस तो नहीं हो रही है ? 

क्योंकि गुरू द्वारा असली रूपध्यान साधना जैसे जैसे ऊंचाई पर पहुंचती है वैसे वैसे हम उनके रूपध्यान तथा पद् के भाव चिंतन के द्वारा एक प्रकार से जीवंत लीला में प्रविष्ट होने लगते हैं और जैसे जैसे हम लीला में आपने भाव शरीर के द्वारा प्रविष्ट होने लगते हैं हम अपने शारीरिक स्वरूप, यानि देह को भूलने लगते हैं , हम चेतन मन से निकल कर पहले अवचेतन मन के द्वारा लीला में प्रविष्ट करते हैं तथा और भी अधिक साधना के ऊंचाई के कारण अवचेतन मन से भी निकल कर अचेतन मन के रास्ते रूपध्यान द्वारा उनके लीला में प्रविष्ट कर जाते हैं जहां हम अपने देह तथा बाहरी दुनियां को साधना काल में विस्तृत कर देते हैं । 
ऐसे में भला ताल लय सुर , गाने बजाने तथा नृत्य का होश कैसे रहेगा ।
और फिर जीव का शरीर धड़ाम से जमीन पर गिरने लगता है । गला अवरूद्ध । 
अगर सुर ताल नृत्य के स्टेप का ख्याल है इसका मतलव साधना नहीं हो रही है , कुछ और उदेश्य की पूर्ति हो रही है । मन सुर ताल लय में खोया झूम रहा है । 

इसलिए श्री महाराज जी के पुराने सत्संगी 50, 60 तथा 70 के दशक वाले लोग साधना के दरम्यान धड़ाम धड़ाम नीचे जमीन पर गिरने लगते थे , श्री महाराज जी द्वारा साधना शुरू कराने के कुछ ही देर के अंदर हीं , क्योंकि उनकी अपने चेतनावस्था की विस्मृति हो जाती थी । वो रूपध्यान के समय अपने भाव शरीर द्वारा गहरी चिंतन की अवस्था में भगवान और गुरू के लीला में शामिल में हो जाते थे ।‌

स्वाभाविक है कि जैसे जैसे जीव साधना के लेवल के ऊंचाई को प्राप्त करने लगता हैं तो जीव पहले तो अवचेतन फिर अचेतन की अवस्था में जाने लगता है और ऐसे में उसकी वाणी अवरूद्ध , शरीर में कंपन , शरीर बेसुध , होश समाप्ति की ओर उन्मुख होने लगता है , भला उसके लिय सुर ताल लय गाने बजाने और नृत्य को संभाले रखना सब असभंव बन जाता है , सुर ताल तो लड़खाने लगता है । 

तो जब इन सब बातों के जगह सुर ताल लय 
और भी बढ़िया होते जा रहा है तो साधक को सावधान हो जाना चाहिए। हम रूपध्यान साधना के यानि प्रैक्टिस के जगह गाने बजाने , सुर ताल लय तथा नृत्य के प्रैक्टिस की ओर उन्मुख हो रहे हैं । कहीं एक अच्छा साधक बन कर साधना के गहराई में पहुंचने की जगह कुछ और बनने कि दिशा में तो नही बढ़ चले है ! कहीं फोकस डाईवर्ट तो नहीं हो चुका है हमारा ?? 

अगर ऐसा है तो कुछ भी हासिल नहीं होने वाला । कुछ भी अनुभव नहीं होगा , यह निश्चित है तथा स्वाभाविक है ।‌ हां बढ़िया गवईया , बजईया तथा नृत्यांगना जरूर बन जाएंगे क्योंकि साधना तो ( प्रैक्टिस ) गाने बजाने तथा नृत्य की हो रही है । 
साधना में चिंतन आवश्यक है और सुध बुध खोना आवश्यक है । लय ताल सुर मदहोश करता है , वेहोश नहीं । 
लय ताल सुर तो संसारिक गीत सुनने पर आम आदमी को भी मदहोश कर देता है । अत: सुर ताल के मदहोशी और साधना में सुध बुध खोने में जमीन आसमान का अंतर है । साधना में पद के अनुसार चिंतन जरूरी है , सुर ताल लय को एक सीमा तक सिमित रहना है प्रारंभिक अवस्था तक, उसके बाद सुर ताल की जरूरत नहीं रहता । साधना में पांच दस मिनट के बाद पद् के भाव के चिन्तन द्वारा लीला में प्रविष्ठ होना महत्वपूर्ण है , सुर ताल लय तो साधन है साध्य नहीं । यह तो केवल सहायक होते हैं मन को भाव लीला में प्रविष्ट कराने के लिय । 

जब साधना में गहरा रूपध्यान बनता है तो जीव उसी तरह का हो जाता है जैसे गहरी नींद में बाहर कितना भी खट पट की आवाज हो वो कान से सुन ही नहीं सकता । तो भला ये बाहरी सुर ताल लय तथा बाद्य यंत्र की आवाज कैसे रहेगी कान में । गहरी ध्यानावस्था में बाहरी दुनियां से वाह्य ईंद्रिया कट जाती है जीव समाधी में प्रविष्ट कर जाता है । जीव का मन तो भगवान की आभासिय लीला भाव में प्रविष्ट करने लग जाता है । लेकिन असली लगता है चल चित्र की तरह । सुर ताल लय में खोना तो स्व सुख है , कर्ण सुख है । 
श्री राधे ।

Wednesday, 14 February 2024

गुरू निर्देशित मानसिक रूपध्यान साधना तथा सेवा के उपरांत जब गुरू कृपा से प्रज्ञा चक्षु खुलता है तो शब्द का बंधन सीमा तथा जरूरत समाप्त हो जाती है

गुरू निर्देशित मानसिक रूपध्यान साधना तथा सेवा के उपरांत जब गुरू कृपा से प्रज्ञा चक्षु खुलता है तो शब्द का बंधन सीमा तथा जरूरत समाप्त हो जाती है , तब अनुभव का शुरूआत होता है फिर प्रेम को व्यक्त करने के लिए शब्द की जरूरत नहीं होती है, जब तक शब्द हमारे मन बुद्धि और मुख पर बने हुए हैं अपनी भावना को व्यक्त करने के लिए तबतक हम प्रेम नहीं करते । जब प्रेम करना वास्तव में शुरू करते हैं भगवान तथा गुरू को या किसी भी आत्मा को , जब मुख बंद, शब्द समाप्त तथा बचता है तो केवल वास्तविक प्रेम की शुरुआत और उसका मुक आदान प्रदान, एवं अनुभव । भगवद् प्रेम के पहले गुरू कृपा से सबसे पहले आत्म दर्शन तथा माया के वास्तविक स्वरूप का अनुभव होता है । 

जैसे जैसे इस अनुभव की शुरुआत होती है वैसे वैसे संसार से अटैचमेंट घटने तथा गुरू एवं ईष्ट से आत्मा के स्तर पर प्रेम के अनुभव की शुरुआत स्वत: होने लगती है गुरू कृपा से । 
अत: जब तक हम शब्दों के रूप में भगवान से , गुरू से या संसार में भी किसी से आई लव यू कहते रहते हैं तबतक हमें समझना चाहिए कि दरअसल हम प्रेम को हीं नही‌ समझा है जाना है और न अनुभव किया अभी तक तो भला प्रेम का दावा कैसे कर सकते हैं । 
अत: जिस प्रेम को शब्दों से व्यक्त किया जा रहा है वो प्रेम एक भ्रम के सिवा और कुछ भी नहीं । 
ए प्रेम , आत्म बल , आत्म विश्वास, धैर्य , निडरता, बोध आदि जो शब्द के रूप में जबतक हमारे अन्दर है तब तक वास्तव में यह घटित नहीं होती , सार्थक नहीं होती , सत्य नहीं होता । और यह तबतक घटित नहीं होगी जब तक सबसे पहले आत्मदर्शन याथार्थ में अनुभव स्तर पर नहीं हुआ हो ।  
शब्दों के रूप में या स्तर पर या समझ के स्तर पर जबतक ज्ञान , आत्मबल, आत्म शक्ति , प्रेम , विश्वास या धैर्य का भ्रम रहेगा तब ऐन वक्त पर इसकी सच्चाई का पता चल जाता है विपरित परिस्थितियां आने पर , सब डगमगा जाता है , समाप्त हो जाता है । 

जैसे कोई व्यक्ति यह मान ले वो आत्मबल , आत्मशक्ति , मनोबल तथा धैर्य से परिपूर्ण है और वो चला जाए माऊंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने तो पहली ही कठिनाई , पहाड़ों के कठीन बातावरण , विपरित परिस्थितियों में या तो भाग कर घर वापस आ जाएगा या मुर्खता रूपी जोश के कारण अपना जान गंवा बैठेगा और बैठता भी है । क्योंकि उसका आत्मबल , विश्वास, श्रद्धा संपत्ति, धैर्य , ज्ञान तथा जोश अभी तक केबल शाब्दिक स्तर पर ही हैं , यह अनुभव के स्तर पर नहीं आया है । 
इसलिए माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाले शेरपा को पहले ट्रैनिंग सेंटर पर आत्म बल , जोश , चढ़ाई करने का ज्ञान , तरीका , धैर्य आदि का ट्रेनिंग व्यवहारिक स्तर पर हासिल करना होता है , ट्रेनर के द्वारा उसे अनुभव के स्तर पर कराया जाता है। तब वो हर बाधा को पार करते हुए मुक बन कर माऊंट एवरेस्ट को फतह करने के काबिल बनता है वो फिर शब्दों से शोर नहीं करता कभी , गंभीर , अटल , दृढ़ तथा मनोबल से परिपूर्ण एवं अनुभवी हो जाता है और फिर वो फतह कर लेता है । 
अत: जब तक प्रेम शब्द के स्तर पर ही हैं तो समझना चाहिए कि प्रेम नहीं प्रेम का छलावा हमारे मन में है , हमारी मायिक बुद्धि और मायिक मन हमारे साथ छल करके हमको यह समझा रहा है कि तुम गुरू और ईष्ट से प्रेम और तथा उनकी सेवा कर रहे हो तुम तथा सबसे बड़ा प्रेमी तथा सेवक हो । 
प्रेम जबतक शब्द के स्तर पर है तबतक न हमारी साधना शुरू हुई है और न सेवा । ‌केवल‌ शब्दों के रूप में हम खुब शोर कर रहे हैं , आई लव यू श्री महाराज जी , आई लव यू राधाकृष्ण, आई लव यू मां ! ये शब्द शब्द भर है याथार्थ में कुछ नहीं । 
यह सबसे बड़ा प्रमाण है भ्रम के शिकार होने का । 
जब साधना , सेवा तथा प्रेम वास्तविक रूप से आत्मा के स्तर पर शुरू होता है तब शब्द समाप्त हो जाता है । इसको व्यक्त करने की जरूरत ही नहीं । 
जय जय श्री राधे । :- गुरू कृपा से यह मेरा अपना अनुभव है - संजीव कुमार।

मैंने श्री महाराज जी का एक बहुत पुरानी विडियो देखा था बहुत साल पहले , दिल को छू गया मेरे

मैंने श्री महाराज जी का एक बहुत पुरानी विडियो देखा था बहुत साल पहले , दिल को छू गया मेरे , जिसमें श्री महाराज जी बता रहे थे कि बहुत लोग ऐसे हैं जो शब्दों से मुझे कहते हैं फोन पर महाराज जी, आई लव‌ यू , मैं आपको बहुत प्यार करती हूं तो मैं भी बोल देता हूं आई लव यू टू और फोन रख देता हूं । 

फिर थोड़ी देर चार पांच सेकेंड चुप रहने के बाद श्री महाराज जी ने फिर आगे कहा कल एक ने विदेश से मुझे फोन किया - श्री महाराज जी आई लव यू , आइ मिस यू टू मच ! आप कैसे हैं महाराज जी ? मैंने कहा मैं ठीक हूं, तुम कैसी हो ? उसने कहा मैं भी आपके कृपा से विल्कूल ठीक हूं , घर में भी सब लोग आपकी कृपा से ठीक है । 
तो मैंने भी कहा आई आल्सो लव यू । फिर मैंने कहा अगर मुझे मिस करती हो तो ऐसा करो मैंने एक महिने की साधना रखी है मनगढ़ में तो तुम आ जाओ ! उसने कहा महाराज जी वो वो वो वो ऐसा है महाराज जी कि मेरी बेटी को बेबी हुआ है पिछले महीने , वो मेरे पास आकर रहने वाली है कुछ दिन , इसलिए महराज जी मुझे कुछ दिन उसका हेल्प करना है , मैं नहीं आ सकूंगी । तो मैंने भी कह दिया ओके ठीक है । और फोन रख दिया । 

तो ए शब्दों का प्रेम है, लोग मुझे मुख से बोल देते हैं आई लव यू , आंखों में वो मोटे मोटे आंसूओं के साथ । ए सब एक्टिंग है , तो मैं भी शब्दों से बोल देता हूं उनको आइ लव यू टू , मै भी एक्टिंग कर देता हूं । 
वो एक्टिंग कर रहा है तो मैं भी एक्टिंग कर देता हूं , करना परता है ।
मैं जानता हूं उसको प्यार वार नहीं है, मुझसे कोई अटैचमेंट नहीं है । अटैचमेंट तो उसको अपने बेटा बेटी , नाती पोते से है । 
जिसको सचमुच गुरू से भगवान से प्रेम होगा वो मुंह से भले न बोले आई लव यू लेकिन वो अंदर ही अंदर प्यार करेगा , दुर बैठा है लेकिन उसका मन केवल मुझमें है, भगवान में है ।

फिर श्री महाराज जी ने आगे कहा । बेटी है उसको अपनी मां से प्यार है ,‌ उसकी शादी हो गई , वो चली गई ससुराल वहां से मम्मी को फोन करती है मम्मी आई लव यू , आई मिस यू , मम्मी पापा भी खुश देखो ये मुझसे कितना प्यार करती है , आइ लव यू टू बेटा । दोनों के आंखों में वो मोटे मोटे आंसू हैं ।‌
कुछ साल बाद बेटी को एक दो बच्चा- वच्चा हो गया, वो व्यस्त हो गई । अब उसको फुर्सत नहीं मम्मी से बात करने के लिए, महीने में कभी एक-आध बार बात करके , मम्मी को कहा आई लव यू , मम्मी ने भी कहा आई लव यू टू , फिर उसने पुछा मम्मी तुम कैसी हो ? मम्मी ने कहा कुछ दिनों से तबियत ठीक नहीं, डौक्टर ने कहा है बेड से नहीं उठने के लिए कुछ दिन तक , तुम आ जाओ , मुझे तुम्हारी हेल्प की आवश्यकता है ! 
 बेटी कहती हैं मां कैसे आऊं मैं , सोनु मोनु को देखना पड़ता है , बहुत चंचल है , तैयार करके स्कूल भेजना पड़ता है , उनका भी आज कल प्रोजेक्ट चल रहा है वो औफिस में व्यस्त रहते हैं , उनको भी अभी मुझे समय पर खाना ऊना बना कर देना पड़ता है । तुम ऐसा करो एक फुल टाइम दाई रख लो । कुछ दिन की ही बात है, ठीक हो जाओगी । 

ये लो । तो कहां गया वो आई लव यूं ??? 
तो ये सब शब्दों से प्यार का एक्टिंग है, और आंसू भी एक्टिंग में लोग खुब बहाते हैं । और लोग ऐसा ही एक्टिंग यहां मेरे साथ भी करते हैं तो मैं भी उनके साथ एक्टिंग कर देता हूं प्यार का । लेकिन यह अटैचमेंट नहीं है , प्रेम नहीं है , यह छल है , भ्रम है , धोखा है जो वो खुद को दे रहा है ।  

जिससे सबसे ज्यादा अटैचमेंट जीव का रहता है, जीव को प्रेम भी उसी से होता है सबसे ज्यादा । और जिससे स्वार्थ अधिक है उसी से अधिक अटैचमेंट भी है जीव का , सीधी सी बात है ।‌ जिससे जितने मात्रा का स्वार्थ है जीव का उसी मात्रा का उससे प्रेम है , स्वार्थ खत्म प्रेम खत्म । तो इसको प्रेम नहीं व्यापार कहते है । 

तो अटैचमेंट अगर मुझसे सबसे ज्यादा रहता तो केवल मुख से आई लव यू महाराज जी , नहीं बोलते । अटैचमेंट तो अपने पति बेटे तथा नाती पोते से है । और मुझसे मुख से बोल रहा है आइ लव यूं । तो इससे कोई लाभ नहीं । 
जिसका लव वास्तव में होता है वो मुख से आई लव यू कभी नहीं बोलेगा ।‌
जो सचमुच भीतर से प्यार करता है भगवान और गुरू से , वो बाहर प्रदर्शित नहीं करता कभी । संसार में एक दुसरे से एक्टिंग करते करते लोग वही एक्टिंग भगवान और गुरू के साथ भी करते हैं तो भगवान और गुरू भी उनके साथ एक्टिंग कर देता है । 
 श्री राधे । 
:- श्री महाराज जी के मुख से सुनी हुई वाणी ।

Monday, 12 February 2024

शाब्दिक ज्ञानियो तथा व्यवहारिक ( प्रैक्टिकल ) ज्ञानियों में क्या अंतर एवं लक्षण होते हैं , एकांत साधना सबसे अधिक शक्तिशाली है क्यों ?

बात बड़ी गहरी और अकाट्य है । 
शाब्दिक ज्ञानियो तथा व्यवहारिक ( प्रैक्टिकल ) ज्ञानियों में क्या अंतर एवं लक्षण होते हैं , एकांत साधना सबसे अधिक शक्तिशाली है क्यों ? 

उत्तर :- सौ बातन की एक बात :- संसार में प्रत्येक जीव यहां तक कि पशु पक्षी, पेड़ पौधे कीड़े मकोड़े भी एक दुसरे को रिझाने में ही व्यस्त रहते हैं । 
आजकल बहुत कम मनुष्य ऐसे हैं जो संसार की परवाह न करके भगवान और गुरू को रिझाने के लिए प्रयत्नशील है, उनके सुख के लिए प्रयत्नशील है । आश्चर्यजनक बात तो यह है कि हममें से बहुत लोग आज गुरू द्वारा तत्वज्ञान होने के बाबजूद भी संसार को भी रिझाने में व्यस्त हैं, इसलिए तो हमलोग लोकरंजन में अधिक व्यस्त रहते हैं, खास कर मैं । खैर धीरे धीरे यह आदत भी हमारी मिट ही जाएगी गुरू कृपा से । आशावादी होना चाहिए। 

कोई अपने ज्ञान से लोगों को रिझाने का प्रयास करता है, कोई अपने धन ऐश्वर्य तथा वैभव से, कोई अपने बस्त्र से , कोई अपने श्रृंगार से, कोई अपने सुरीले गले तथा गायन से, कोई अपने बादन से, कोई अपने पदवी से, कोई अपने कला से , कोई अपने रूतवा से, कोई जिमखाने की अपने मांसल शरीर से, तो कोई अपने कविता से, कोई अपने शेरों शायरी से, कोई चिकनी चुपड़ी बातों से, कोई अपने रूप रंग तथा योवन से, कोई दान से, यहां तक कि कोई माता पिता के सेवा का फोटो तथा विडियो के द्वारा, कोई भाषा से, जैसे English , जहां जरूरत न हो वहां भी शुरू , तो कोई महापुरुषों की सेवा के दिखावे से हीं दुसरे को रिझाने में लगा है तो कोई अपने दीनता से, कोई अकड़ से , तो कोई अपनी गरीबी तथा लाचारी से दुसरे का सहानुभूति इकठ्ठा करने के प्रयास में लगा है । और संसार को भी यही सब पसंद है, रीझाने वाला ही पसंद है । क्योंकि हमारे स्वभाव में एकरूपता है , समानता है , यह सहज संसारिक स्वाभाविक गुण है हम साधारण जीवों का । 

लेकिन जो व्यक्ति गुप्त रूप से , गोपनीयता से भगवान और गुरू को रिझाने के प्रयास में लगा है , उसी जीव की साधना सच्ची है, भगवान और गुरू केवल उसी से खुश रहते हैं केवल उसी को प्राप्त होते हैं । 
वांकि जीवों का प्रयोजन तो संसार को हीं खुश करना , रिझाना , दुसरे का मनोरंजन करना अधिक है । 
यहां तक कि फुलो में रंग रस और खुशबू भी भंवरे को रिझाने के लिए होता है , जानवरों का शरीर खुबसूरत , मनमोहक तथा उसका गंध ( जैसे मृग के नाभी में कस्तूरी , हाथी का दांत , मोर का पंख ) अपने विपरित लिंगी साथी को रिझाने के लिए ही होता है, उसी प्रकार मनुष्यों में भी दुसरे को रिझाने की सहज वृत्ति है यह कोई दोष नहीं है । 

और भगवान को रिझाने के लिए जीव जब इसी सहज वृत्ति का उपयोग गोपनीयता के साथ करता है तब जीव भगवान को प्राप्त कर लेता है । जब तक हम लोग संसार को रिझाने में व्यस्त रहेंगे तब तक भगवान को नहीं पाया जा सकता। क्योंकि भगवान को तथा महापुरुषों को लोक रंजन एक रत्ती भी पसंद नहीं है , वो कहते हैं अगर तुम संसार को रिझाने का प्रयास करोगे तो मैं तेरी तरफ देखूंगा भी नहीं । 
इसलिए आध्यात्मिक एरिया में सफलता का मार्ग केवल एक ही है वो है एकांत साधना, गुप्त सेवा तथा आर्त पुकार । 
इस रहस्य के महत्व को हम जब तक नहीं समझेंगे, भगवान और गुरू के दृष्टि में न तो वास्तविक साधना समझी जाएगी और न असली सेवा । 
यही कारण है कि भगवान को प्यार करने वाला सच्चा प्रेमी एकांतवास को सबसे पहले प्रार्थमिकता देता है , इसलिए प्राचीन काल में अधिकतर लोग पहाड़ों में जाकर साधना करते थे और कुछ ही दिनों में दिव्य तत्व को प्राप्त कर लेते थे । 
और आज भी वास्तविक भगवद् प्रेमी एकांत वास को ही महत्वपूर्ण मानते हैं । 

हमलोग तो इतने गिरे हुए हैं कि तीर्थ स्थलों में जाकर, भगवान तथा गुरू धाम में जाकर, मंदिरों में जाकर वहां फोटू खिंचाकर , विडियो तथा रील बना कर वहां से भी संसार को हीं रिझाने में लगे रहते हैं ऐसे में भगवान और गुरू भला कैसे हमसे रिझेगें ? हद तो यह है कि आज का अधिकांश साधु सन्यासी भी पाखंडी है क्योंकि वो भी संसार को हीं रिझाने में व्यस्त हैं , कोई आग में चल रहा है , कोई माथे पर लंबी जटा बांधे घुम रहा है , कोई कांटों पर चल कर दिखा रहा है , तो कोई पानी में समाधी लगा कर लोगो को रिझाने में व्यस्त हैं और ऐसे ही पाखंडी को लोग सनातन धर्म का पर्याय मानते हैं आज, इस ठग विद्या को रिझाना नहीं कहेंगे , हां इसको ठगना कहेंगे, इसलिए इसे ठीक नहीं कह सकते । 

हां कुछ लोग अपवाद है जो अपने ज्ञान का उपयोग दुसरे को भी सन्मार्ग पर प्रेरित करने के लिए करते हैं वो भी निस्वार्थ भाव से । लेकिन उनकी संख्या आज बहुत कम है । क्योकि दुसरे की प्रेरणा बनने से पहले स्वयं का निर्माण बहुत आवश्यक है । प्रैक्टिकल नॉलेज होना आवश्यक है । जब प्रैक्टिकल नॉलेज होगा तो खूद के व्यवहार में सबसे पहले दिखेगा । 
कथनी और करनी में अंतर नहीं झलकेगा । 
सैद्धांतिक ज्ञान वाला प्रभावहीन होता है , तथा प्रैक्टिकल ज्ञान वाला ही प्रभावशाली। 
प्रैक्टिकल ज्ञान वाला भगिरथ ही धरा धाम पर गंगा को उतार कर प्रवाहित करने में सफल होता है ।  

अब कैसे पहचानें कि कौन शाब्दिक ज्ञानी है और कौन प्रैक्टिकल ज्ञानी है ! 
तो प्रथम लक्षण है अहंकार, शाब्दिक ज्ञानियों में अहंकार कूट कूट कर भरा होता है , जरा सा भी उसके अहंकार को चोट लगा वो क्रोधित हो जाता है , क्योंकि शाब्दिक ज्ञानी भीतर से खोखला होता है , 'थोथा चना बाजे घना' वाली कहावत ऐसे लोगों के लिए ही कहा गया है । 

शाब्दिक ज्ञानियों का दुसरा लक्षण है स्वयं को हमेशा उपर रखने और दुसरे को निचा दिखाने तथा रखने का प्रयत्न करना तथा दुसरे को निम्न मानना । 

शाब्दिक ज्ञानियो का तीसरा लक्षण है स्वगुणों का बखान करना और दुसरों का मज़ाक़ उड़ाना तथा दुसरे की भावना का निरादर करना एवं तिरस्कार करना । 

शाब्दिक ज्ञानियों का चौथा लक्षण है बोलना अधिक, सुनना कम या तो सुनना हीं नहीं किसी का । 

अत: शास्त्र कहता है :- 
विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परपीड़नाय ।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतद् ज्ञानादानाय च रक्षणाय॥

यानि :- शाब्दिक ज्ञानी और दुर्जन की विद्या विवाद के लिये, धन उन्माद के लिये, और शक्ति दूसरों का दमन करने के लिये होती है। वहीं व्यवहारिक ज्ञानी अपने ज्ञान का इस्तेमाल दुसरे को सन्मार्ग दिखाने के लिए, गुप्त दान जीवों का भलाई के लिए और बल दूसरों के रक्षा के लिये उपयोग करते हैं।

अत: व्यवहारिक ज्ञानी, ( प्रैक्टिकल नॉलेज वाला ) स्वाभाविक रूप से सरल , विनम्र , दीन तथा सहिष्णु होते हैं वो हर किसी को सम्मान देते हैं, मान देते हैं और खूद को निचे रखते हैं एवं दुसरो को उपर उठाने का प्रयास करते हैं ।  
श्री राधे ।:- गुरू ज्ञान से

Sunday, 11 February 2024

बर्षो झीलों के तरह ठहरा रहा

बर्षो झीलों के तरह ठहरा रहा 
हवाओं के थपेड़े झेले,
सुरज कि तपिश झेली 
वाष्प बन कर उड़ता रहा आकाश में!
फिर बुंदे बन कर धरा पर बरसता रहा ,
उर्ध्व व निम्न के बंधन में बंधता रहा 
इसलिए लक्ष्य को न हासिल कर पाया 
तब जाकर गुरू ने आंखें खोली, मार्ग दिखाया 
नदियों के तरह बहना सिखाया 
बिना भेद भाव तथा ख्वाहिशों के 
बिना किसी चिंता तथा फिकर के 
कि कौन पुछता है कौन नही संसार में
यह सब मत देखो , बस बहना सीखो 
सभी में गुरू और ईश्वर है यह देखना सीखो
सभी का सम्मान करना सीखों 
लक्ष्य के तरफ बस बढ़ना सीखों 
भावभक्ति कि धाराओं में बहना सीखो 
तब से बहना ही हमारी फितरत है 
गुरू रूपी समुद्र में मिलना हीं हमारी हसरत है
ईश्वर और गुरू की रहमत है  
इसलिए नदियों की तरह बहता हुं 
भावों के झूले में झूलता और झूलाता हुं 
पानी के कल-कल की तरह गीत गुणगुणाता हूं 
लक्ष्य के तरफ, पल पल बढ़ता हुं बढ़ाता हूं। 
चलना ही जिंदगी है , रस है , इसलिए सरस बहता हूं और बहाता हूं । 
श्री राधे ।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

Friday, 9 February 2024

आज प्रभु तुम मौन क्यूँ हो ? मानता हुं तुम मेरे हो पर, मैं तेरा न बन पाया

आज प्रभु तुम मौन क्यूँ हो ? 
मानता हुं तुम मेरे हो 
पर, मैं तेरा न बन पाया 
अपने पतित मन को मैंने 
अब तक न समझा पाया 
अपने मूल माता पिता से 
सनातन संबंध न समझ पाया 
शायद इसी को देख तुमने 
 मौन धारण कर लिया !

आज प्रभु तुम मौन क्यूं हो ?
मानता मैं, अति हीं पतित हूं 
संसार चक्र से ही व्यथित हूं 
फिर भी इस जग के मोह से 
स्वयं को न छुड़ा पाया 
तुमने अथक परिश्रम करके 
हमको दुर्लभ ज्ञान दिया 
फिर भी लोक रंजन के खातिर 
हमने ज्ञान भुला दिया 
साधना करते नहीं हम 
हममें सेवा का भाव नहीं 
शायद इसी को देख तुमने
मौन धारण कर लिया ! 

आज प्रभु तुम मौन क्यूं हो ?
तुमने अपनी दिव्य भाव से 
जग में प्रेम को प्रकट किया 
प्रेममंदीर के रूप में तुमने 
ब्रज में खुद को साकार किया 
'कीर्तिमंदिर' बरसाने में, प्रकट कर 
अपने ममता का इजहार किया 
'भक्तिमंदिर' के रूप में तुमने 
हमको भक्ति का दान किया 
फिर भी हमने अपनी करनी से 
हरवक्त तुमको निराश किया 
हमारी दैनिय दशा देख कर तुमने 
मौन धारण कर लिया ! 

आज प्रभु तुम मौन क्यूं हो ?
देखो प्रिय , तुम निराश होते नहीं 
हमारी विचित्र स्थिति को देखकर 
कभी व्यथित होते नहीं 
वादा करता हूं तुमसे प्रिय 
तेरा ही गुण गाऊंगा 
जैसा तुमने राह दिखाया 
उसी पथ को अपनाऊंगा 
है देर, पर दुर नहीं है
दुरूस्त होकर आऊंगा  
तुम तो कृपा साध्य हो प्रियतम 
तुमको हीं मैं पाऊंगा 
तेरी हीं कृपा दृष्टि से 
मैं पवित्र हो जाऊंगा 
तेरे ही कृपाबल से गुरूवर 
अवश्य ही तुमको पाऊंगा 
है विश्वास अति मन में 
मैं भी, अपना वचन निभाऊंगा ।।

:- मेरी कविता, प्रार्थना तथा संकल्प, आपके इस तस्वीर की गहराई के चिंतन से , संजीव कुमार ।

Wednesday, 7 February 2024

मेरी कविता :- लक्ष्य को पाने के खातिर ऐ मुसाफिर तू तो चल

मेरी कविता :- 
लक्ष्य को पाने के खातिर 
ऐ मुसाफिर तू तो चल 
रास्ते हो लाख दुर्गम
ऐ मुसाफिर तू तो चल 
सिर्फ चलना तेरे वश में 
ऐ मुसाफिर तू तो चल 

राह में कितने भी कांटे
हौसलों में प्राण फुंके 
कर्म के खुशबू बिखेरे 
धर्म पथ पर चाहे अकेले
इष्ट हर क्षण साथ तेरे
भक्ति का संगित गाता 
भक्ति पथ पर तू तो चल
 ऐ मुसाफिर तू तो चल
सिर्फ चलना तेरे वश में 
ऐ मुसाफिर तू तो चल 

आसमां में घटा घेरे 
लाख तुफां आके घेरे
प्राण की बाजी लगाए 
कर्तव्य पथ पर तू तो चल 
ऐ मुसाफिर तू तो चल 
सिर्फ चलना तेरे वश में 
ऐ मुसाफिर तू तो चल 

गम न कर ठोकर लगे जब
ऐ मुसाफिर तू तो चल 
असफलताओं से सीखे
देख न मुड़ करके पीछे
दुर्गमें हो लाख घाटी 
राह में ऊंचे पहाड़ 
आशाओं के दीपक जलाए
ऐ मुसाफिर तू तो चल 
सिर्फ चलना तेरे वश में 
ऐ मुसाफिर तू तो चल 

मंजिलें अवश्य मिलेगी 
ऐ मुसाफिर तू तो चल 
तुमको तेरा राम मिलेंगे 
ऐ मुसाफिर तुम तो चल 
सिर्फ चलना तेरे वश में 
ऐ मुसाफिर तू तो चल 
बैठ न थक करके पीछे 
ऐ मुसाफिर तू तो चल
 सिर्फ चलना तेरे वश में 
ऐ मुसाफिर तू तो चल 
चलते रहना ही है जीवन
ऐ मुसाफिर तू तो चल
।।‌ :- मेरी कविता , संजीव कुमार

आजकल 99.9% व्यक्ति अपने अपने परसेप्शन में हीं जीतें है और अपनी‌ अपनी दृष्टिकोण को ही सही ठहराते रहते है ।

आजकल 99.9% व्यक्ति अपने अपने परसेप्शन में हीं जीतें है और अपनी‌ अपनी दृष्टिकोण को ही सही ठहराते रहते है । अपने अपने कमजोरी को छिपाने तथा दोष को सही सिद्ध करने के लिए तमाम दलीलें देतें है चाहे वो कुतर्क ही क्यूं न हो ! 
 एक शराबी शराब‌ पीना क्यूँ सही है यह सिद्ध करने में लगा रहता है और इसी को जायज मानता है , दुसरा व्यक्ति मांस खाना‌ क्यूं दोष पुर्ण नहीं है ,‌ तीसरा व्यक्ति बिना विवाह के लिविंग रिलेशन क्यूं गलत नहीं है ! चौथा व्यक्ति समलैंगिकता क्यूं सही है ! पांचवां व्यक्ति धर्म तथा भगवान की परिभाषा अपने अनुसार करता है , छंटवा व्यक्ति संत और शास्त्र क्यों गलत है यह सिद्ध करने में लगा रहता है और अपने समझ के अनुसार ही सातवें को आंकता है ! सब कि अपनी अपनी अलग अलग डफली और राग है और इसी तरह अपने गलत अवधारणाओं को जीते जीते अशांति भरे , असंतोष भरे जीवन को जीते हुए अंत को प्राप्त करता है एक दिन । 

फिर भी आगे के लोग यानी अगली पीढ़ी अपनी ही बातों को सही साबित करने के लिए अपना अपना दलील देते रहते है और अपने समान सोंच रखने वाले का समर्थन करते हैं और दुसरे का विरोध ।‌ यही समर्थन और विरोध चलता रहता है उम्र भर लेकिन अधिकतर लोग न तो जिंदगी ठीक से समझ पाते हैं और न जीने के ढंग को ! लोग जीते रहते हैं अपने अपने गलतफहमियों का शिकार होकर । कोई पहले से स्थापित सदियों संस्थापित शास्त्रों को सही से नहीं समझते, और न कोशिश करते हैं , वास्तविक संतों को नहीं समझते और न कोशिश करते हैं , कुछ समझते भी है तो मानते नहीं , मानते भी हैं तो उनके बतलाए रास्तों पर नहीं चलते । जो चलते हैं केवल वही जीते हैं और शरीर छोड़ने के बाद भी जीते रहते हैं ।‌ वांकी जन्म लेते रहते हैं और मरते रहते हैं , यही नियति है । 

बस सब अपने अपने नशे में है और उसी नशे को सही समझते हैं और दुसरे के नशे को गलत , लेकिन हमाम में सब नंगे हैं यह कोई स्वीकार नहीं करता । और यही सबसे बड़ा दुख तथा विषाद का कारण है । और इसी का नाम कलयुग है । :

लोग पुछते है संजीव भाई आप किताब लिखो ! 
अरे क्या लिखूं , अगर लिखूं तो वो भी मेरे खूद का परसेप्शन होगा और यही फिर मेरी भी मुर्खता हीं होगी , अत: मैं एक और गलतफहमी क्यों थोपु लोगों पर ? बेहतर है अनेकों वास्तविक संत लिख चुके हैं उसी को पढूं और पढ़ने के लिए प्रेरित करूं दुसरे को , तथा स्वयं उसी को जिऊं और अपने जिंदगी को सार्थक बना लूं । यही सबसे बड़ा उपकार होगा खूद पर और अन्य लोगों पर भी । - संजीव कुमार

Saturday, 3 February 2024

एक व्यक्ति ने जिज्ञासा कि है कि महापुरुषों को प्रथम दृष्टया कैसे पहचानें ?

एक व्यक्ति ने जिज्ञासा कि है कि महापुरुषों को प्रथम दृष्टया कैसे पहचानें ? 
यूं तो महापुरुषों को पहचानना काफी दुष्कर कार्य है , वो भी कोई अगर भाव हीन है तो और भी कठीन काम है । क्योंकि महापुरुषों के क्रिया कलाप मुद्रा , भाव भंगिमा आदि अटपटे होते हैं , समझ से परे होते हैं । उनके शरीर भेष भुषा प्राकृत तथा कार्य लोकवत दिखाई देने के बाबजूद भी अलौकिक होते हैं , दिव्य होते हैं जो आमजनों के समझ से परे होते हैं । जिस पर वो स्वयं कृपा कर दे वही जीव उनको जान सकते हैं , समझ सकता हैं ।‌ नही तो बिना कृपा के उनको पहचानना काफी कठीन कार्य है । 

फिर भी शास्त्र के अनुसार , महापुरूष के ही दृष्टि से हम उनको चार प्रकार के गुणों से प्राथमिक तौर पर कुछ कुछ पहचान सकते हैं, अनुमान लगा सकते हैं :- 

स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे।
दानप्रसङ्गो मधुरा च वाणी देवार्चनं ब्राह्मणतर्पणं च, 
श्रोत्रियम ब्रह्मनिष्टम् तथैव च ।। 

इस श्लोक में शास्त्र कहता है कि यूं तो महापुरुषों की पहचान आम व्यक्ति के लिए तो क्या स्वर्ग के देवी देवताओं के लिए भी काफी कठीन है, फिर भी उनकी पहचान 4 प्रकार के गुणों से की जा सकती है‌।

 महापुरुषों में दानशीलता, मधुर वाणी, ईश भक्ति तथा सेवा भाव की भावना एवं भक्ति मार्ग का प्रेरक, निरीक्षक, रक्षक, निडर, भगवद् भक्त के प्रति करूणा का भाव, दया का भाव, कृपा कारक तथा जीव कल्याण की भावना से ओत प्रोत तथा जो श्रोत्रिय यानि सभी शास्त्रों का शास्त्रज्ञ भी हो , अति विद्वान भी हो तथा ब्रह्मनिष्ठ यानि भगवान को प्राप्त भी कर चुके हो या स्वयं साक्षात् भगवद् स्वरूप हो , जिनमें इन 4 प्रकार के गुणों का समावेश होता है। जिन लोगों में ये 4 प्रकार के गुण स्पष्ट रूप से दिखाई दे उनका मूल्यांकन महापुरुषों की श्रेणी में किया जाता है । 

महापुरूष के कई प्रकार होते हैं । नित्य सिद्ध , साधन सिद्ध और स्वयं भगवान के अवतार महापुरूष। 

अत: यदि और भी गहराई में जाना चाहेंगे तो जिनमें अष्ट महा सात्विक भावों का उद्रेक हो , वो महापुरुष भगवान के डाईरेक्ट अवतार महापुरूष होते हैं । ये बहुत अधिक दुर्लभ होते हैं ।

जिन काल खंड में भगवान ऐसे दुर्लभ ( श्री गौरांग महाप्रभु तथा श्री कृपालु महाप्रभु जी जैसे ) महापुरूष के रूप अवतार लेकर जीव कल्याण के लिए धरा धाम पर आते हैं तो उसी कालखंड में हजारों जन्मों से प्रतीक्षारत परम भाग्यशाली जीव भी मनुष्य के शरीर में उनकी हीं कृपा से जन्म लेते हैं जिस पर वो कृपा करते हैं और गुरू बन कर वो उन जीवों को प्राप्त होते हैं, स्वयं उसका मार्ग दर्शन करते हैं और साधना सेवा आदि करवाते हैं । 
ऐसे जीव अति शौभाग्यशाली होते हैं जिनके जीवन काल में भगवान स्वयं महापुरूष रूप में , गुरू रूप में अवतार लेकर धरा धाम पर आते हैं और अपनी कृपा के फलस्वरूप उनको प्राप्त होते हैं । बिना हरि कृपा के ऐसे अवतारी दुर्लभ महापुरूष का मिलना असंभव है । 
विभिषण जी ने स्वयं कहा हनुमान जी से प्रथम भेंट में श्रीलंका में :- 
"अब मोहि भा भरोस हनुमंता,
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहीं संता ।।"
बिना‌ हरि कृपा के ऐसे दुर्लभ महापुरूष मिलना असंभव है । 
अत: हमें स्वयं को बहुत गौरवान्वित महसूस करना चाहिए कि हम श्री कृपालुजी महाराज के अवतार काल में न केवल जन्म लिए वल्कि उनकी अनुकंपा से उनको गुरू रूप में प्राप्त भी किए । इस प्रकार हमलोग भगवान को प्राप्त कर चुके हैं, देख चुके हैं , उनको छु चुके हैं , उनसे बातें की , उनकी वाणी सुनी । अब जरूरत है केवल सौ प्रतिशत रियलाईजेशन की और निष्काम सेवा वासना बढ़ाने की , रो रो कर उनसे उनके दिव्य लोक में उनकी दिव्य सेवा प्राप्त करना अंतिम लक्ष्य है अब । 
श्री राधे ।
:- श्री महाराज जी से प्राप्त तत्वज्ञान के आधार पर ।

प्रश्न: महापुरुष संसार में रहते हैं, आते हैं। ये कष्ट का संसार है, गन्दा संसार। सब मायाबद्ध गड़बड़ लोग यहाँ रहते हैं, उसमें महापुरुष आते क्यों हैं?

प्रश्न: महापुरुष संसार में रहते हैं, आते हैं। ये कष्ट का संसार है, गन्दा संसार। सब मायाबद्ध गड़बड़ लोग यहाँ रहते हैं, उसमें महापुरुष आते क्यों हैं?

महापुरुषों में बहुत प्रकार के महापुरुष होते हैं। कुछ अवतारी महापुरुष होते हैं, कुछ साधन सिद्ध महापुरुष होते हैं लेकिन कष्ट किसी महापुरुष को नहीं होता। बाहर का जो भी स्वरूप हो शारीरिक रोग का या बाप मरे, बेटा मरे, कुछ हो उनको भीतर से कष्ट नहीं होता। एक फार्मूला याद कर लो। तुलसीदास को संग्रहणी हुई मर गये, रामकृष्ण परमहंस को कैंसर हुआ मर गये और वैसे भी हमेशा बुखार-वुखार सब ये होता रहता है शरीर जब तक है, लेकिन भीतर से कष्ट नहीं होता उनको। "ज्ञानी भुगतै ज्ञान ते मूरख भुगते रोय" सबका बाप, बेटा, स्त्री, पति मरेंगे अपने समय पर लेकिन महापुरुष को फीलिंग नहीं होगी और मायाबद्ध को फीलिंग होगी इतना सा अन्तर है। और तुमको महापुरुषों की फिकर क्यों है? अपनी फ़िकर करो। कितने ही महापुरुषों को संसार वालों ने जेल भेज दिया, पिटाई किया। कितने- कितने नाटक हुए हैं- प्रह्लाद वगैरह को, मीरा वगैरह को, सब इतिहास भरा पड़ा है। लेकिन वो भीतर से दुःखी नहीं हुये, बाहर से सब दिखाई पड़ रहा है और बहुत से महापुरुषों ने अपने भक्तों का कष्ट ले लिया है। बहुत सी बातें हैं उसमें बारीक। महापुरुष और भगवान् की बातें न पूछो, न सोचो, न अकल लगाओ। वो बुद्धि से परे हैं।

भागवत में लिखा है कि श्रीकृष्ण ने १६,१०८ ब्याह किया और एक-एक स्त्री के दस-दस बच्चे हुए और सौ वर्ष के बाद उनको वैराग्य हो गया। रामायण पढ़ते हो? लक्ष्मण के वियोग में राम रो रहे हैं-बाकायदा रो रहे हैं और सीता के वियोग में तो बहुत ही बुरा हाल। सब एक्टिंग है। भगवान् और महापुरुष जो हैं नम्बरी चार सौ बीस होते हैं समझे रहो। "भगवत् रसिक रसिक की बातें रसिक बिना कोउ समुझि सकै ना"। कोई नहीं समझ सकता। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न ये चारों एक हैं, भगवान् हैं इसमें कोई महापुरुष नहीं है। सदा से अनादिकाल से हैं। चतुर्व्यूह कहलाते हैं ये। लेकिन जगह-जगह कैसी एक्टिंग हो रही है ? श्रीकृष्ण बलराम दोनों एक हैं और श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा को जब मोह हुआ और सब गाय, बछड़े, ग्वाल बाल सब हर ले गया, चुरा ले गया योगमाया से और भगवान् ने नया बना दिया। साल भर चलता रहा वो और बलराम को नहीं पता चला। तो बलराम ने देखा कि ये बड़ी-बड़ी अजीब-अजीब बातें हो रही हैं ! ये ग्वाल बाल ये आजकल ऐसा-ऐसा प्यार अपनी माँ से, भाई से, बहन से सब से कर रहे हैं। ये तो ऐसा कभी नहीं हुआ ये बात क्या है? मेरा तो दिमाग खराब है। क्या हो रहा है? कहीं कोई राक्षस की लीला तो नहीं हो रही है हमारे ऊपर। तब भगवान् से पूछा। तब भगवान् ने कहा- हाँ हाँ, वह मैं ही बना हूँ सब गाय, ग्वाल बाल, बछड़े सब मैं ही बन गया हूँ। एक्टिंग करते हैं सब इसी प्रकार की।

हनुमान जी राम को नहीं पहचान रहे हैं। जो हृदय फाड़कर के सीताराम को दिखा सकते हैं और जिनके रोम-रोम से सदा राम-राम निकलता रहता है, वह अपने इष्टदेव ही को नहीं पहचाने। "की तुम तीन देव मँह कोई।" की तुम, की तुम, की तुम....। ये की तुम, की तुम क्या लगा रखा है? और राम भी वैसी ही एक्टिंग करते हैं- अरे! तुम कौन हो भाई! हाँ, अपना परिचय तो बताओ। तो हनुमान जी कहते हैं- "मोर न्याउ मैं पूछा साईं।" मैं मायाबद्ध हूँ। अच्छा ! ये भगवान् के पार्षद हैं सदा से और अपने को बता रहे हैं मायाबद्ध हैं-

मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम कस पूछिय नर की नाईं।

तुम बन्दर की तरह हो वह नर की तरह है दोनों एक्टिंग कर रहे हैं। राम लक्ष्मण के लिए रो रहे हैं बैठ के, पहाड़ उठा के ला रहे हैं हनुमान जी। सब नाटक है। नाटक में सब तरह की बातें होती हैं। वहाँ बुद्धि का काम नहीं। बस लीला सुनकर के विभोर हो जाओ। सोचने विचारने की, अकल लगाने का काम नहीं है।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।। 

दीनता विनम्रता सहिष्णुता केवल गुरू तथा ईष्ट एवं उनके वास्तविक अनुयायियों के सामने , वास्तविक भगवद् भक्तों के सामने दिखाना चाहिए ।। तुलसीदास जी कि कहानी से स्पष्ट है ।

दीनता विनम्रता सहिष्णुता केवल गुरू तथा ईष्ट एवं उनके वास्तविक अनुयायियों के सामने , वास्तविक भगवद् भक्तों के सामने दिखाना चाहिए ।। वांकी विधर्मियों के सामने , राष्ट्र तथा धर्म द्रोहियों के सामने हाथों में तलवार और मुख में ललकार आवश्यक है , नहीं तो ये लोग इन गुणों का मूल्य नहीं समझेगा और कायर मान के और भी दबाने का कोशिश करेगा । 

तुलसीदास जी को जब मुग़ल शासक के कुछ सैनिक पकड़ कर मुगल दरबार में हाजिर किया तो वो मुगल शासक के सामने नहीं झुके वल्कि डट कर खड़े रहे । 

मुगल शासक ने कहा तुम मेरे सामने सिर नहीं झुकाओगे तो मैं तेरा सर धर से अलग कर दूंगा कोई बचाने नहीं आएगा । देखता हुं तुम्हारा राम तुमको बचाने कैसे आता है यहां ! 
तुलसीदास जी ने कहा मेरे इष्ट को यहां आने कि कोई जरूरत नहीं है । इसके लिए मेरे गुरू हनुमान जी को भी यहां आने कि जरूरत नहीं है । मुझे बचाने के लिए मेरे गुरू हनुमान जी के सेवक ही काफी है ।
इतना कहते हीं पुरे शहर को वानरों ने घेर लिया , यहां तक कि राजमहल के कोने कोने में फ़ैल गया बानर सेना ! हजारों मुगल सैनिकों को जख्मी कर दिया , सब तबाह कर डाला । अंत में मुगल शासक तुलसीदास जी के सामने घुटनों के बल बैठकर उनके शरण में आकर माफी मांगी । 
तो यह है भक्ति की शक्ति और गुरू शरणागति का फल । एक वास्तविक गुरू भक्त अपने गुरू तथा ईष्ट एवं उनके भक्तों के सामने ही झुकता है और किसी के सामने नहीं । जय जय जय श्री राधे ।

कुछ बनाना ही हो तो मुझे विभिषण बना देना जो अधर्म के साथ युद्ध में अगर मेरा भाई और समाज भी विधर्मी हो तो मैं उसे त्याग कर आपके पक्ष में खड़ा रहुं ।

हे महाप्रभु मुझे कभी भी भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य तथा कर्ण बनने कि शिक्षा और प्रेरणा नहीं देना ,जो आपका भक्त होते हुए भी या तो विधर्मियों के साथ खड़ा था या तो मुक दर्शक था !
 कुछ बनाना ही हो तो मुझे विभिषण बना देना जो अधर्म के साथ युद्ध में अगर मेरा भाई और समाज भी विधर्मी हो तो मैं उसे त्याग कर आपके पक्ष में खड़ा रहुं ।
अगर विभिषण भी नहीं बनाने कि इच्छा हो तो मुझे बानर , भालु या रीछ बना देना जो मैं आपके निमित्त ही आपके पक्ष में अधर्म से युद्ध लड़ूं और आपके प्रति मैं अपना छोटा ही सही पर योगदान दे सकूँ ! 
हे प्रभु अगर ये सब भी नहीं बनाना है तो जटायु कि तरह एक पक्षी बना देना जो अपनी मां सीता के निमित्त अधर्मी से युद्ध करके आपके निमित्त शहीद हो जाऊं । 
हे महाप्रभु अगर इसके भी योग्य मुझे ना समझो तो मुझे वो गिलहरी बना देना जो आपके निमित्त राम सेतु बन्धन में दो छोटा पत्थर डाल के आपके प्रति अपना फर्ज और उत्तरदायित्व पुरा करके अपने जीवन को सार्थक कर सकूं ।

हे महाप्रभु कृपालु जू सरकार मुझे स्वार्थी भक्त कभी नहीं बनाना , मुझे ऐसा भक्त बनने का वरदान कभी मत देना जो अपने सुख और आनंद के निम्मित आपकी भक्ति करें ! 
मुझे तो ऐसा भक्त बनने का वर दो जिससे मेरा जीवन आपके काम आ सके । मेरे खून का कतरा कतरा आप पर बलि बलि जाए । मेरे खून का कतरा कतरा आप पर निक्षावर हो सके । आपके हर अवतार में आपके तथा आपके सनातन धर्म तथा सिद्धांतों के निम्मित सेवा करते करते अपना प्राण , तन मन धन निक्षावर कर सकूं । मैं मरूं तो सिर्फ आपके निम्मित और जिऊं तो सिर्फ आपके सेवा के खातिर तथा आपके सनातन वैदिक धर्म के उत्थान में योगदान के खातिर । आपकी कृपा से मुझे बोध हो गया है कि आपके सकाम सेवा में सुख नहीं , वल्कि आपकी निष्काम सेवा ही धर्म है, सुख और आनंद है । 
"गुरू सेवा हीं धर्म हमारो , दास न हम श्रूतिचारि के । 
ठाकुर युगल किशोर हमारो , चाकर हम पिय प्यारी के "।। 
जय जय सियाराम । :- आपका कृपा आकांक्षी आपका पुत्र संजीव कुमार ।

पुरे विश्व में सबसे दुखी भारत के हीं लोग हैं , और सबसे सुखी कुछ गिने चुने लोग भारत में ही हैं , जानते हैं क्यों ?

पुरे विश्व में सबसे दुखी भारत के हीं लोग हैं , और सबसे सुखी कुछ गिने चुने लोग भारत में ही हैं , जानते हैं क्यों ? 
क्योंकि हमारे भारत के अधिकांशत: हमारे हिन्दू भाई बहन लोग हिन्दू संस्कृति, सनातन धर्म, सांस्कृतिक विरासत के प्रति उदासीन है , लापरवाह है , या विरोधी है , यहां तक कि अपने हीं हिन्दू देवी देवता तथा संतों , महापुरुषों के अपमान करने , अपमान सुनने , सुनकर शांत बैठने में पुरे विश्व में अग्रगणी है । 
हिन्दू का सबसे बड़ा दुश्मन स्वयं हिन्दू हीं है । अत: इन अपराधों के परिणामस्वरूप फल के रूप से दैविक शक्तियों के द्वारा दिए गए परिणामों से तीनों रूपों से पिड़ित हैं और रहेंगे । 
आध्यात्मिक ताप , भौतिक ताप तथा दैविक तापों से ग्रस्त हैं और रहेंगे ।
हमारे हिन्दू बाहुल्य देश में जितना आक्रमण विदेशी आक्रांताओं का हुआ उतना किसी देश में नहीं हुआ । 
विदेशी आक्रांताओं ने हमारे भारत में आकर हमें लूटा , हमारे बहु बेटियों के अस्मिता को लुटा , हमारे तीर्थों और मंदिरों को लुटा , ध्वस्त किया , उस पर मस्जिदें बनवाई , और हमारे तथाकथित क्षूद्र प्रकृति के गद्दार हिन्दू भाई या तो हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे या उनसे जाकर दोस्ती कर ली , उनसे संबंध स्थापित किया , उन आक्रांताओं को यहां बसने में , राज करने में मदद की । और आज भी विधर्मियों को राज करने में मदद कर रहे हैं । अत: गद्दार हिन्दू ही इन सबके लिए सबसे पहले दोषी है ।

आज भी कुछ राज्य इसका उदाहरण है जहां विधर्मियों ने खुलेआम हमारे सनातन वैदिक धर्म को , सांस्कृतिक विरासत तथा रीति-रिवाजों पर तीखा प्रहार करते हैं और वहां अधिसंख्य क्षूद्र स्वभाव के , दुष्ट स्वभाव के गद्दार हिन्दू ताली बजाते हैं , उनको अपना बहुमूल्य वोट देकर ताकत देते हैं । यही हमारे देश का दुर्भाग्य है । 

अगर अब भी नहीं चेतोगे तो एक एक के घर घुस कर वो लोग तुम्हारे बहु बेटियों को लुटेंगे और तुम ताली बजाओगे , यह दिन फिर दुर नहीं है । 

बड़े आश्चर्य कि बात है हमारे देश में नास्तिकों की फौज है और वो भी हिन्दूओं कि , आज विदेश में अधिक संख्या में विदेशी लोग सनातन वैदिक धर्म की ओर तेजी से रूख कर रहे हैं लेकिन हमारे देश के अधिसंख्यक हिन्दू गर्त की ओर बढ़ रहे हैं । 

इन सबका विनाश नियती ने तय कर रखा है वो अवश्य होगा । यह एक ध्रुव सत्य है यह नोट कर लिया जाए । 

कितने आश्चर्य की बात है कि कुछ स्वघोषित जगद्गुरु कालनेमी तथा मारिच के रूप में बहुरूपिए हमारे देश में वास्तविक संतों तथा महापुरुषों पर ऊंगली उठाते हैं और देश का हिन्दू समाज ताली बजाता है । 
यह पाप कहां जाएगा ? 
इतिहास गवाह है रावण का साम्राज्य , कंश का साम्राज्य, हिरण्यकश्यप तथा हिरण्याक्ष तथा उनके वंशज , जरासंध और शिशुपाल का साम्राज्य, कौरवों का साम्राज्य तथा उनके वंशज बुरी तरह समाप्त हो गए , महाकाल के ग्रास बन गए ऐसे ही अधर्म के कारण और अधर्मी को साथ देने के परिणाम स्वरूप । 
अग्नी शायनी द्रोपदी के चिर हरण के समय जो लोग मुक दर्शक बन कर दर्शक दीर्घा में बैठे रहे वो भी बुरी तरह मारे गए ।
फिर भी आज के अधिकांश हिन्दू यह सब देख कर अकर्मण्य बने हुए हैं मुक दर्शक बने हुए हैं , और अधिकांश तो विधर्मियों के साथ है । इन सबकी क्या दशा होने वाली है भविष्य में वो इतिहास में ही निहित है । 

मुझे तो दिखाई दे रहा है । 
एक बार फिर महाभारत से भी बड़ा विनाशकारी युद्ध , प्राकृतिक आपदा , विध्वंशक घटना बहुत जल्द घटने वाली है इसी सदी में । जिसमें बड़ी संख्या में महाविनाश होने वाला है । 
अभी तो छोटी मोटी घटना घटी है कोरोना का केवल , टेलर था , जब एक अदृश्य वायरस ने कितने परिवारों को लील गया जो एक संकेत मात्र है कि अभी भी वक्त है सुधर जाओं नहीं तो मानव शरीर बुरी तरह से छीन लिया जाएगा और फिर नहीं मिलेगा दुबारा । 
फिर कल्पो तक निकृष्ट शरीर में पड़े रहोगे । 
ए आपका विरोधी स्वाभाव , गंदी सोंच, कलुषित विचार, घटिया कर्म ले डूबेगा तुम्हें । 
प्रकृति और भगवान से अधिक ताकतवर तुम नहीं हो । अपनी दो अंगुलियों कि खोपड़ी से जो सोंच रहे हो वो सत्य नहीं है । कुतर्क वितर्क अतितर्क सबका फल अवश्य मिलेगा । 
अभी तो गदही और गद्हा के जवानी के जोश की तरह नशे में हो , जब इसका परिणाम भुगतना होगा तब पता चलेगा , जब सनातन वैदिक धर्म , हिन्दू देवी देवता और वास्तविक संतों का अपमान कर रहे थे , या होता देख कर ताली बजा रहे थे या भीष्म, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र तथा गंधारी की तरह बहरे और गुंगे बने हूए थे तब क्यों नहीं सोंचा ! 

मैं तो जब भी इस तरह के अपमान की घटना देखता हुं तब तब अपने ईष्ट और गुरू के सामने रोता हुं , फरियाद करता हुं अपार कष्ट और दुख के साथ कि हे प्रभो अब जल्दी करो । आज करोड़ों दुर्योधन है हमारे समाज में, हमारे देश में , तुमने तो एक दुर्योधन के पाप से त्रस्त अपने जनों के रक्षा के लिए महाभारत जैसा युद्ध होने दिया और स्वयं धर्म के साथ खड़े रहे । 
आज तो अधिकांश हिन्दू दुर्योधन बन कर अपने ही संतों और महापुरुषों का , अपने ही धर्मों का केवल अपमान ही नहीं कर रहे हैं वल्कि उनका साथ दे रहे हैं । तो 
भगवान मुझे संकेत देते हैं कि मत रो , ऐसे लोग स्वयं अपने विनाश को बुला रहे हैं जो अवश्य संभावित है मेरे पुत्र । एक बार फिर सबसे पहले भीष्म , द्रोणाचार्य और कृपाचार्य , कर्ण जैसे लोगों का विनाश सबसे पहले होने वाला है , दुर्योधन से पहले , क्योंकि ये तत्वज्ञानी तथा भगवान का भक्त होने के बाबजूद विधर्मी दुर्योधन के साथ खरा है एक बार फिर ।
 
भगवान के इसी सांत्वना के बल पर मै आश्वस्त हुं कि सभी विधर्मी अबकी बार फिर महाकाल का ग्रास बनने बाले है और यह भारत कि बसुंधरा पाप तथा पापियों के बोझ से उत्तीर्ण होने वाली है एक बार फिर । 
जय जय सियाराम , जय महाकाल , महाकालो के काल , जय महाकाली अपने देव भूमि भारत की रक्षा करो । 
जय जय श्री राधे ।
:- संजीव कुमार।

Friday, 2 February 2024

ग्रह नक्षत्र , ज्योतिष विज्ञान के बारे में थोड़ा गाईड लाईन जो आपको डर से बाहर निकलने में मदद करेगा ।

ग्रह नक्षत्र , ज्योतिष विज्ञान के बारे में थोड़ा गाईड लाईन जो आपको डर से बाहर निकलने में मदद करेगा ।

 वास्तविक संत क्यों कहते हैं मत उलझो इसमें । यह सब इस पोस्ट से क्लियर हो जाएगा , अगर ध्यान से पढ़ें तो। 

तो सबसे पहले समझिए जब हम यात्रा करते हैं तो रस्ते में माइल स्टोन देखा होगा आपने । 
वो हमें दुरियां बताता है कितना चल चुके और आगे किधर चलना है , जगह भी बताता है उस जगह का प्रभाव , प्रकृति , वहां का सब परिस्थितियां , वातावरण ।

 यह माईल स्टोन को ग्रह, नक्षत्र, दशा , अंतर दशा , प्रत्यंतर दशा , सूक्ष्म दशा के और इनके बीच की दुरी समय का अंतराल मान लिजिय ।

अब आप कन्याकुमारी से चले , यानि जहां आपका हमारा जन्म हुआ , उस समय वहां के माईल स्टोन से चलना प्रारंभ किये ।
( कन्याकुमारी एक उदाहरण है , कोई मदुरई में जन्म लिया तो वहां का माईल स्टोन यात्रा के आरंभ का कुंडली बन गया , जो चे़न्नई में जन्म लिया वहा का माईल स्टोन अलग हैं । 
और उसी माईल स्टोन को ग्रह नक्षत्र दशा महादशा आदि मान लिजिए । 
अब जन्म लिय हम , उस समय जिस माईल स्टोन के बीच थे वो हमारा कुंडली बन गया । 
और हां जन्म तो मिला पिछले संचित कर्मों के अनुसार , हमारे प्रारब्ध के अनुसार , ऊंच घर में गरीब घर में समृद्ध घर में लाखो प्रकार के घर स्थान और समय में ‌ 
ठीक जन्म के समय की स्थिति में ग्रह यानि माईल स्टोन कुंडली बन गया ।‌
अब हमें अपने पिछले कर्मो का फल मिलना शुरू हो गया जन्म लेते हीं। कोई जन्म के समय मर गया , कोई इंटेलिजेंट और स्वस्थ पैदा हुआ । कोई विकलांग तमाम प्रकार के । 
अब बच्चा है वो कर्म नहीं कर सकता उसको होश नहीं । तो पहले वो भोगता है अच्छा या बुरा जो भी अपने प्रारब्ध से । पर जीवन यात्रा शुरू हो चुकी जन्म के साथ हीं जीरो माइल से , समय के चक्र शुरू महादशा अंतर दशा गोचर शुरू ।‌ 
कुछ दिन में होश हुआ , मन सोचना शुरू किया , ज्ञान हुआ , अब भोग के साथ कर्म शुरू , माईल स्टोन, यात्रा के साथ बदल रहा है । उसे हीं महादशा ,अंतर दशा, प्रत्यंतर दशा , सूक्षम दशा समय का पहिया गोचर है सब सांकेतिक है पर है माईल स्टोन और पहिया , उस पहीये में हव है स्पोक है और उसका गणना है , गति है । 
तो वो माईल स्टोन हमारे पिछले कर्मों के फल का आइडिया देता है , ना कि हम कर्म क्या कर रहे हैं वो और आगे क्या करने वाला हैं वो , कर्म की स्वतंत्रता हमें मिला है । कर्म करने का प्लान बनाने , सोचने और करने में मनुष्य स्वतंत्र है । इसलिए आगे कर्मो का यानि क्रियामान और आगे का हमारे द्वारा किया जाने वाला कर्म , हमारे पिछे के अच्छे और बुरे फल में बृद्धि यह कमी लाने बाला है उत्पेरक है । अच्छा करेंगे तो बुरे फल कि तीव्रता कम होगी । और यदि बुरा किया तो बुरे फल कि तीव्रता और बढ़ेगी । 
हम आगे क्या करेंगे या अभी क्या करेंगे वो भगवान भी नहीं बता सकते हैं न जानते हैं । ज्योतिष की तो बात ही छोड़िए ।

ज्योतिष से बस इतना पता चलता है कि हम क्या कैसा फल भोगे पिछले सभी माईल स्टोन के बीच जहां से चले थे इस जीवन यात्रा में और आगे क्या भोगेंगे पिछले कर्मों के फल के रूप में वो केवल पता चलता हैं वो भी आज के किये कर्म के हिसाब तक ।

बस इतना हीं इससे अधिक कुछ भी नहीं । 
और एक सबसे बड़ी खास बात कि मान लिजिए पिछले कर्मों के अनुसार हमको जेल जाना लिखा है , ग्रह दशा , गोचर , अंतर दशा सब बता रहा है । पर हम जान गए सही सही जानकार ज्योतिष से की हमारा बुरा समय चल रहा है या अच्छा चल रहा है और बुरा आने वाला है , हम जेल जाने वाले हैं घोटाला किये है पहले , चोरी किया है सताया है किसी को । उसके फल के रूप में हमको खडाब फल पर मिलने का योग है भविष्य में इतने से इतने माईल स्टोन के बिच आगे कि यात्रा में , और मान लिजिए हमको जेल जाने का तीव्र योग है और ज्योतिष बता रहा है तो हम अगर सजा से बचना चाहते हैं या सजा कम मिले तो हमको करना क्या चाहिए ।

तो वो अगर सही ज्योतिष है तो कहेगा जाके सरकार के सामने सरेंडर हो जाइए । 
आगे आगे अभी जाकर इनकम टैक्स के सामने सरेंडर कर दें । और बोलिए मालिक गलती हो गई , हमने गुणाह किया है , कानून का पालन नहीं किया वो ये लिजिए चुराया धन , और माफ कर दिजिए हमको । 
तो यह कर्म किया । कर्म योनि है ना तो अच्छा कर्म कर लिया तुरंत , तुरंत सरेंडर कर दिया , अब सरकार थोड़ा बहुत सजा दे के फाइन करके माफ कर दिया । 
फल भोगना था, जेल का हवा खाना था आगे भविष्य में , ग्रह दशा सब बता रहा था । पर सचेत हो गये हम । और अच्छा उपाय किया , अच्छा ज्योतिष बता दिया कि ये फल मिलने वाला है , जाकर सरेंडर कर दो तुरंत । आप सरेंडर कर दिए , थोड़ा फाइन उन हुआ और आप बच गए । 
तो यह फायदा हुआ ज्योतिष ज्ञान से । 

लेकिन आज बहुत सारे ज्योतिष करते क्या हैं? तो बता देंगे की आपको जेल मिलने का योग है । पर उपाय के नाम पर कहेंगे आप रूद्राक्ष पहन लो , हीरा पहन लो , मोती पहन लो निलम पहन लो। हमसे प्राण प्रतिष्ठित यह चीज ले लो । और एक बड़ा रकम हमको दे दे दो । यानि एक तो आपने गलत काम किया । उसको वो जान कर अब आपको लुट रहा है , वो आपसे भी भारी चोर है , आप चोरी किये हैं , वो जान गया , वो नंबरी गुंडा उपर से 😀😀 , उसको ज्ञान है ज्योतिष शास्त्र का , लेकिन वो क्या कर रहा है तो वो आपका सरदार बन गया अब । ऐ तुमको हम बचा देंगें , ग्रह को घुमा देगें😂😀😀 
ये जाप करो , ये पुजा , हवन करो , ये पत्थर पहनो , यह करो, वह करो , इतना खर्च करो । यानि चोर चोर मौसेरा भाई ‌ आपका भाई बन गया आपका सीक्रेट्स जान गया । 
अब आपको डरा रहा है फिर जो धन आप लुटे गलत काम कर चुके है वो आपसे हिस्सेदारी मांग लिया ।
और जब वो समय आया तो आप गय जेल क्योंकि एक तो पाप किया आप पहले , उपर से उसको और छुपाया , और भी भारी पाप किया , डबल ।
आप हतप्रभ । कुछ काम नहीं आया । अरे आएगा कैसे । एक तो पाप कर चुके हैं और दुसरा पापी आके आपको सही सलाह न देकर आपको और छुपाने का पाप करा दिया ।

 सही ज्योतिष होता तो कहता भाई देख तुमने गलत काम किया है कोई उपाय काम नहीं देगा । तुमको भविष्य में या अभी यह सजा मिली है ।
तुम्हरा किया गया पाप हीं शनी बन गया है और वो भी नीच का शनी, खडाब शनी , वक्री । अच्छा किये रहते तुम अगर, तो शनी यानि फल शुभदायक होता तुम्हारे लिए , सब तरह का अच्छा शनी रूपी फल मिलता तुमको । पर किया गलत इसलिए तुम्हारे उपर क्रूर शनी जो तुम्हारे कर्मो के फल के रूप में खड़ा है आने वाले समय में वो बड़ा खतरनाक है । भाई एक हीं रस्ता है जाके सरेंडर कर दें इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के सामने , सजा कम हो जाएगा । लेकिन चुंकि वो ज्योतिष गलत है इसलिए 
 वो लुट के चल दिया वो आगे मिलेगा उसको भी सजा । पर आप तो नहीं बचने बाले फिलहाल ।

इसलिए संत लोग कहते हैं कि छोड़ो ज्योतिष का चक्कर , तुम आज से अच्छा काम करो, वो न सताओ किसी को , न अपमान करो किसी का , किसी को दूख मत दो आज से , पड़ पीड़ा सम नहीं अधमाई । और भगवान का नाम लो आज से सही सही , और आज से शुभ कर्म करना शुरू कर दो । सब सजा कम हो जाऐगा आगे का अगर खडाब समय आने वाला होगा तो । 
और अगर अच्छा समय आगे आने वाला होगा तुम्हारा तो और भी अच्छा अच्छा हो के आएगा । 
और छोटी गरबरी किया है पहले तो उसका फल भी मिट भी सकता हैं । तो यह है थोड़ा आईडिया जो मैंने आपको दिया है , गहरी बात समझना संभव नही छोटे से पोस्ट में । यह वृहत बिषय हैं ।
हां एक बात समझ लिजिए एक अच्छा ज्योतिष आपको अच्छा बनने का सलाह देगा । शुभ कर्म का सलाह । 
और अपने आजिविका को चलाने के लिय वाजिब फीस लेगा केवल , क्योंकि वही उसकी आजिविका का साधन है वेचारे का । हर तरफ से नहीं लुटेगा आपको । 
 श्री राधे :- आपका संजीव ।

कुछ लोगों का स्वाभाविक जिज्ञासा है , तर्क है कि भगवान रस सिंधु हैं , आनंद है और वो सभी जीवों के अंदर बराबर विद्यमान है तो फिर सभी जीव बराबर मात्रा में आनंदमय क्यों नहीं है , सुखी क्यों नहीं है , दुखी क्यों है , ?

कुछ लोगों का स्वाभाविक जिज्ञासा है , तर्क है कि भगवान रस सिंधु हैं , आनंद है और वो सभी जीवों के अंदर बराबर विद्यमान है तो फिर सभी जीव बराबर मात्रा में आनंदमय क्यों नहीं है , सुखी क्यों नहीं है , दुखी क्यों है , ? 

अच्छी जिज्ञासा है । अच्छा तर्क है । 
सभी जीवों के अंदर रस सिंधु , आनंद सिंधु भगवान का निवास है और हमेशा रहता है , भगवान किसी भी जीव से एक पल के लिए भी दुर नहीं रहते , यह बातें महापुरुष सम्मत है शास्त्र सम्मत है , फिर भी सभी जीव आनंदमय नहीं है बराबर रूप से सुखी नहीं है । 

वो इसलिए कि सभी जीवों में से कितने जीवों को ठीक ठीक यह मालुम है कि भगवान हमारे अंदर विद्यमान है !
फिर उन जीवों में से कितने जीव ऐसे हैं जिनको यह विश्वास है कि भगवान हमारे अंदर हैं?  
फिर उनमें से कितने जीव ऐसे हैं जो सौ प्रतिसत यह मानते है दृढ़ता के साथ कि भगवान हमारे अंदर विद्यमान है ?

फिर उनमें से कितने जीव अपने अंदर के भगवान को खोजने के लिए , उनको प्राप्त करने के लिए प्रयास रत है , यानि साधना रत्त है । फिर उनमें से कितने जीव ऐसे हैं जो उनको प्राप्त करके महापुरूष बन गया है ? जिसने अपने अंदर के भगवान को साधन भक्ति करके प्राप्त कर लिया है , उनसे संबंध स्थापित कर लिया वो सुखी हो गया , वो आनंदमय हो गया है । 

जिसने जाना नहीं , जान कर विश्वास नहीं किया , विश्वास किया लेकिन दृढ़ता के साथ माना नहीं , मान लिया तो फिर उनको प्राप्त करने के लिए साधना नहीं की , उनसे संबंध स्थापित नहीं किया , उनको प्राप्त नहीं किया वो भला कैसे सुखी हो सकता है ? 

ए तो ऐसा ही है कि जीव के घर के अंदर गहराई में अकूत धन‌ दौलत खजाना छुपा हुआ है । लेकिन उसको पता नहीं है , वो दो कौड़ी के लिए संसार में मारे मारे फिर रहा है , दुख झेल रहा है । 
अब किसी महापुरुष ने बता दिया , ए तुम्हारे घर के अंदर अकूत धन दौलत छुपा है और तुम संसार में मारे मारे फिर रहे हो ?

अब हमलोगों में से कुछ लोग जान तो लिया कि हमारे घर के अंदर खजाना छुपा है जमीन के गहराई में , लेकिन हम विश्वास नहीं किए महापुरुषों के बातों पर , शास्त्रों के बातों पर ! कुछ विश्वास कर लिया लेकिन विश्वास पक्का नहीं है । 
इसलिए वो मानता नहीं ठीक ठीक । 

हमने मान भी लिया तो फिर उस खजाने को हासिल करने के लिए प्रयास नहीं कर रहे हैं , जमीन के अंदर खुदाई नहीं कर रहे हैं , तो फिर जानते हुए , या मानते हुए भी कि हमारे घर के अंदर अकूत धन दौलत गड़ा हुआ परा है हम उस धन से वंचित हैं तो भला हमें उस खजाने से क्या लाभ होगा । 
लाभ तो तब होगा जब उस खजाने को पाने लिए जमीन के अंदर खुदाई करेंगे और उनको प्राप्त करेंगे !

उसी प्रकार हमारे ह्रदय के अंदर आनंद सिंधु भगवान बैठे हैं लेकिन हम उनका लाभ नहीं ले रहे हैं । 
किसी महापुरुष द्वारा जान भी गए तो विश्वास नहीं है , मानते नहीं है , रियलाईज नहीं करते ।‌ केवल उपर ही उपर जय हो जय हो करते रहते हैं , उससे क्या होगा ? कुछ नही । 
अगर रियलाइज ठीक ठीक करते तो फिर उनको पाने के लिए गुरू निर्देशित साधना करते इमानदारी से ! 
अगर हममें से कुछ साधना कर भी रहे हैं तो गति बहुत धीमी है, ढुलमुल रवैया है । 

जिसने पा लिया उनको , वो महापुरुष बन गया , सुखी हो गया , और हम जानने के बाद भी लापरवाह है । 
यही कारण है कि हम सबके अंदर आनंद सिंधु भगवान के होते हुए भी हम दुखी हैं , संसार में सुख ढूंढ़ रहे हैं, दो कौड़ी के लिए भागे भागे फिर रहे हैं , जबकि रस सिंधु, अकूत धन दौलत हममें से प्रत्येक के अंदर है । सीधी सी बात है । 
:- श्री महाराज जी से प्राप्त ज्ञान से । 
#hilighted