अच्छी जिज्ञासा है । अच्छा तर्क है ।
सभी जीवों के अंदर रस सिंधु , आनंद सिंधु भगवान का निवास है और हमेशा रहता है , भगवान किसी भी जीव से एक पल के लिए भी दुर नहीं रहते , यह बातें महापुरुष सम्मत है शास्त्र सम्मत है , फिर भी सभी जीव आनंदमय नहीं है बराबर रूप से सुखी नहीं है ।
वो इसलिए कि सभी जीवों में से कितने जीवों को ठीक ठीक यह मालुम है कि भगवान हमारे अंदर विद्यमान है !
फिर उन जीवों में से कितने जीव ऐसे हैं जिनको यह विश्वास है कि भगवान हमारे अंदर हैं?
फिर उनमें से कितने जीव ऐसे हैं जो सौ प्रतिसत यह मानते है दृढ़ता के साथ कि भगवान हमारे अंदर विद्यमान है ?
फिर उनमें से कितने जीव अपने अंदर के भगवान को खोजने के लिए , उनको प्राप्त करने के लिए प्रयास रत है , यानि साधना रत्त है । फिर उनमें से कितने जीव ऐसे हैं जो उनको प्राप्त करके महापुरूष बन गया है ? जिसने अपने अंदर के भगवान को साधन भक्ति करके प्राप्त कर लिया है , उनसे संबंध स्थापित कर लिया वो सुखी हो गया , वो आनंदमय हो गया है ।
जिसने जाना नहीं , जान कर विश्वास नहीं किया , विश्वास किया लेकिन दृढ़ता के साथ माना नहीं , मान लिया तो फिर उनको प्राप्त करने के लिए साधना नहीं की , उनसे संबंध स्थापित नहीं किया , उनको प्राप्त नहीं किया वो भला कैसे सुखी हो सकता है ?
ए तो ऐसा ही है कि जीव के घर के अंदर गहराई में अकूत धन दौलत खजाना छुपा हुआ है । लेकिन उसको पता नहीं है , वो दो कौड़ी के लिए संसार में मारे मारे फिर रहा है , दुख झेल रहा है ।
अब किसी महापुरुष ने बता दिया , ए तुम्हारे घर के अंदर अकूत धन दौलत छुपा है और तुम संसार में मारे मारे फिर रहे हो ?
अब हमलोगों में से कुछ लोग जान तो लिया कि हमारे घर के अंदर खजाना छुपा है जमीन के गहराई में , लेकिन हम विश्वास नहीं किए महापुरुषों के बातों पर , शास्त्रों के बातों पर ! कुछ विश्वास कर लिया लेकिन विश्वास पक्का नहीं है ।
इसलिए वो मानता नहीं ठीक ठीक ।
हमने मान भी लिया तो फिर उस खजाने को हासिल करने के लिए प्रयास नहीं कर रहे हैं , जमीन के अंदर खुदाई नहीं कर रहे हैं , तो फिर जानते हुए , या मानते हुए भी कि हमारे घर के अंदर अकूत धन दौलत गड़ा हुआ परा है हम उस धन से वंचित हैं तो भला हमें उस खजाने से क्या लाभ होगा ।
लाभ तो तब होगा जब उस खजाने को पाने लिए जमीन के अंदर खुदाई करेंगे और उनको प्राप्त करेंगे !
उसी प्रकार हमारे ह्रदय के अंदर आनंद सिंधु भगवान बैठे हैं लेकिन हम उनका लाभ नहीं ले रहे हैं ।
किसी महापुरुष द्वारा जान भी गए तो विश्वास नहीं है , मानते नहीं है , रियलाईज नहीं करते । केवल उपर ही उपर जय हो जय हो करते रहते हैं , उससे क्या होगा ? कुछ नही ।
अगर रियलाइज ठीक ठीक करते तो फिर उनको पाने के लिए गुरू निर्देशित साधना करते इमानदारी से !
अगर हममें से कुछ साधना कर भी रहे हैं तो गति बहुत धीमी है, ढुलमुल रवैया है ।
जिसने पा लिया उनको , वो महापुरुष बन गया , सुखी हो गया , और हम जानने के बाद भी लापरवाह है ।
यही कारण है कि हम सबके अंदर आनंद सिंधु भगवान के होते हुए भी हम दुखी हैं , संसार में सुख ढूंढ़ रहे हैं, दो कौड़ी के लिए भागे भागे फिर रहे हैं , जबकि रस सिंधु, अकूत धन दौलत हममें से प्रत्येक के अंदर है । सीधी सी बात है ।
:- श्री महाराज जी से प्राप्त ज्ञान से ।
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