Wednesday, 14 February 2024

गुरू निर्देशित मानसिक रूपध्यान साधना तथा सेवा के उपरांत जब गुरू कृपा से प्रज्ञा चक्षु खुलता है तो शब्द का बंधन सीमा तथा जरूरत समाप्त हो जाती है

गुरू निर्देशित मानसिक रूपध्यान साधना तथा सेवा के उपरांत जब गुरू कृपा से प्रज्ञा चक्षु खुलता है तो शब्द का बंधन सीमा तथा जरूरत समाप्त हो जाती है , तब अनुभव का शुरूआत होता है फिर प्रेम को व्यक्त करने के लिए शब्द की जरूरत नहीं होती है, जब तक शब्द हमारे मन बुद्धि और मुख पर बने हुए हैं अपनी भावना को व्यक्त करने के लिए तबतक हम प्रेम नहीं करते । जब प्रेम करना वास्तव में शुरू करते हैं भगवान तथा गुरू को या किसी भी आत्मा को , जब मुख बंद, शब्द समाप्त तथा बचता है तो केवल वास्तविक प्रेम की शुरुआत और उसका मुक आदान प्रदान, एवं अनुभव । भगवद् प्रेम के पहले गुरू कृपा से सबसे पहले आत्म दर्शन तथा माया के वास्तविक स्वरूप का अनुभव होता है । 

जैसे जैसे इस अनुभव की शुरुआत होती है वैसे वैसे संसार से अटैचमेंट घटने तथा गुरू एवं ईष्ट से आत्मा के स्तर पर प्रेम के अनुभव की शुरुआत स्वत: होने लगती है गुरू कृपा से । 
अत: जब तक हम शब्दों के रूप में भगवान से , गुरू से या संसार में भी किसी से आई लव यू कहते रहते हैं तबतक हमें समझना चाहिए कि दरअसल हम प्रेम को हीं नही‌ समझा है जाना है और न अनुभव किया अभी तक तो भला प्रेम का दावा कैसे कर सकते हैं । 
अत: जिस प्रेम को शब्दों से व्यक्त किया जा रहा है वो प्रेम एक भ्रम के सिवा और कुछ भी नहीं । 
ए प्रेम , आत्म बल , आत्म विश्वास, धैर्य , निडरता, बोध आदि जो शब्द के रूप में जबतक हमारे अन्दर है तब तक वास्तव में यह घटित नहीं होती , सार्थक नहीं होती , सत्य नहीं होता । और यह तबतक घटित नहीं होगी जब तक सबसे पहले आत्मदर्शन याथार्थ में अनुभव स्तर पर नहीं हुआ हो ।  
शब्दों के रूप में या स्तर पर या समझ के स्तर पर जबतक ज्ञान , आत्मबल, आत्म शक्ति , प्रेम , विश्वास या धैर्य का भ्रम रहेगा तब ऐन वक्त पर इसकी सच्चाई का पता चल जाता है विपरित परिस्थितियां आने पर , सब डगमगा जाता है , समाप्त हो जाता है । 

जैसे कोई व्यक्ति यह मान ले वो आत्मबल , आत्मशक्ति , मनोबल तथा धैर्य से परिपूर्ण है और वो चला जाए माऊंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने तो पहली ही कठिनाई , पहाड़ों के कठीन बातावरण , विपरित परिस्थितियों में या तो भाग कर घर वापस आ जाएगा या मुर्खता रूपी जोश के कारण अपना जान गंवा बैठेगा और बैठता भी है । क्योंकि उसका आत्मबल , विश्वास, श्रद्धा संपत्ति, धैर्य , ज्ञान तथा जोश अभी तक केबल शाब्दिक स्तर पर ही हैं , यह अनुभव के स्तर पर नहीं आया है । 
इसलिए माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाले शेरपा को पहले ट्रैनिंग सेंटर पर आत्म बल , जोश , चढ़ाई करने का ज्ञान , तरीका , धैर्य आदि का ट्रेनिंग व्यवहारिक स्तर पर हासिल करना होता है , ट्रेनर के द्वारा उसे अनुभव के स्तर पर कराया जाता है। तब वो हर बाधा को पार करते हुए मुक बन कर माऊंट एवरेस्ट को फतह करने के काबिल बनता है वो फिर शब्दों से शोर नहीं करता कभी , गंभीर , अटल , दृढ़ तथा मनोबल से परिपूर्ण एवं अनुभवी हो जाता है और फिर वो फतह कर लेता है । 
अत: जब तक प्रेम शब्द के स्तर पर ही हैं तो समझना चाहिए कि प्रेम नहीं प्रेम का छलावा हमारे मन में है , हमारी मायिक बुद्धि और मायिक मन हमारे साथ छल करके हमको यह समझा रहा है कि तुम गुरू और ईष्ट से प्रेम और तथा उनकी सेवा कर रहे हो तुम तथा सबसे बड़ा प्रेमी तथा सेवक हो । 
प्रेम जबतक शब्द के स्तर पर है तबतक न हमारी साधना शुरू हुई है और न सेवा । ‌केवल‌ शब्दों के रूप में हम खुब शोर कर रहे हैं , आई लव यू श्री महाराज जी , आई लव यू राधाकृष्ण, आई लव यू मां ! ये शब्द शब्द भर है याथार्थ में कुछ नहीं । 
यह सबसे बड़ा प्रमाण है भ्रम के शिकार होने का । 
जब साधना , सेवा तथा प्रेम वास्तविक रूप से आत्मा के स्तर पर शुरू होता है तब शब्द समाप्त हो जाता है । इसको व्यक्त करने की जरूरत ही नहीं । 
जय जय श्री राधे । :- गुरू कृपा से यह मेरा अपना अनुभव है - संजीव कुमार।

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