हवाओं के थपेड़े झेले,
सुरज कि तपिश झेली
वाष्प बन कर उड़ता रहा आकाश में!
फिर बुंदे बन कर धरा पर बरसता रहा ,
उर्ध्व व निम्न के बंधन में बंधता रहा
इसलिए लक्ष्य को न हासिल कर पाया
तब जाकर गुरू ने आंखें खोली, मार्ग दिखाया
नदियों के तरह बहना सिखाया
बिना भेद भाव तथा ख्वाहिशों के
बिना किसी चिंता तथा फिकर के
कि कौन पुछता है कौन नही संसार में
यह सब मत देखो , बस बहना सीखो
सभी में गुरू और ईश्वर है यह देखना सीखो
सभी का सम्मान करना सीखों
लक्ष्य के तरफ बस बढ़ना सीखों
भावभक्ति कि धाराओं में बहना सीखो
तब से बहना ही हमारी फितरत है
गुरू रूपी समुद्र में मिलना हीं हमारी हसरत है
ईश्वर और गुरू की रहमत है
इसलिए नदियों की तरह बहता हुं
भावों के झूले में झूलता और झूलाता हुं
पानी के कल-कल की तरह गीत गुणगुणाता हूं
लक्ष्य के तरफ, पल पल बढ़ता हुं बढ़ाता हूं।
चलना ही जिंदगी है , रस है , इसलिए सरस बहता हूं और बहाता हूं ।
श्री राधे ।
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