तुलसीदास जी को जब मुग़ल शासक के कुछ सैनिक पकड़ कर मुगल दरबार में हाजिर किया तो वो मुगल शासक के सामने नहीं झुके वल्कि डट कर खड़े रहे ।
मुगल शासक ने कहा तुम मेरे सामने सिर नहीं झुकाओगे तो मैं तेरा सर धर से अलग कर दूंगा कोई बचाने नहीं आएगा । देखता हुं तुम्हारा राम तुमको बचाने कैसे आता है यहां !
तुलसीदास जी ने कहा मेरे इष्ट को यहां आने कि कोई जरूरत नहीं है । इसके लिए मेरे गुरू हनुमान जी को भी यहां आने कि जरूरत नहीं है । मुझे बचाने के लिए मेरे गुरू हनुमान जी के सेवक ही काफी है ।
इतना कहते हीं पुरे शहर को वानरों ने घेर लिया , यहां तक कि राजमहल के कोने कोने में फ़ैल गया बानर सेना ! हजारों मुगल सैनिकों को जख्मी कर दिया , सब तबाह कर डाला । अंत में मुगल शासक तुलसीदास जी के सामने घुटनों के बल बैठकर उनके शरण में आकर माफी मांगी ।
तो यह है भक्ति की शक्ति और गुरू शरणागति का फल । एक वास्तविक गुरू भक्त अपने गुरू तथा ईष्ट एवं उनके भक्तों के सामने ही झुकता है और किसी के सामने नहीं । जय जय जय श्री राधे ।
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