Saturday, 3 February 2024

दीनता विनम्रता सहिष्णुता केवल गुरू तथा ईष्ट एवं उनके वास्तविक अनुयायियों के सामने , वास्तविक भगवद् भक्तों के सामने दिखाना चाहिए ।। तुलसीदास जी कि कहानी से स्पष्ट है ।

दीनता विनम्रता सहिष्णुता केवल गुरू तथा ईष्ट एवं उनके वास्तविक अनुयायियों के सामने , वास्तविक भगवद् भक्तों के सामने दिखाना चाहिए ।। वांकी विधर्मियों के सामने , राष्ट्र तथा धर्म द्रोहियों के सामने हाथों में तलवार और मुख में ललकार आवश्यक है , नहीं तो ये लोग इन गुणों का मूल्य नहीं समझेगा और कायर मान के और भी दबाने का कोशिश करेगा । 

तुलसीदास जी को जब मुग़ल शासक के कुछ सैनिक पकड़ कर मुगल दरबार में हाजिर किया तो वो मुगल शासक के सामने नहीं झुके वल्कि डट कर खड़े रहे । 

मुगल शासक ने कहा तुम मेरे सामने सिर नहीं झुकाओगे तो मैं तेरा सर धर से अलग कर दूंगा कोई बचाने नहीं आएगा । देखता हुं तुम्हारा राम तुमको बचाने कैसे आता है यहां ! 
तुलसीदास जी ने कहा मेरे इष्ट को यहां आने कि कोई जरूरत नहीं है । इसके लिए मेरे गुरू हनुमान जी को भी यहां आने कि जरूरत नहीं है । मुझे बचाने के लिए मेरे गुरू हनुमान जी के सेवक ही काफी है ।
इतना कहते हीं पुरे शहर को वानरों ने घेर लिया , यहां तक कि राजमहल के कोने कोने में फ़ैल गया बानर सेना ! हजारों मुगल सैनिकों को जख्मी कर दिया , सब तबाह कर डाला । अंत में मुगल शासक तुलसीदास जी के सामने घुटनों के बल बैठकर उनके शरण में आकर माफी मांगी । 
तो यह है भक्ति की शक्ति और गुरू शरणागति का फल । एक वास्तविक गुरू भक्त अपने गुरू तथा ईष्ट एवं उनके भक्तों के सामने ही झुकता है और किसी के सामने नहीं । जय जय जय श्री राधे ।

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