शाब्दिक ज्ञानियो तथा व्यवहारिक ( प्रैक्टिकल ) ज्ञानियों में क्या अंतर एवं लक्षण होते हैं , एकांत साधना सबसे अधिक शक्तिशाली है क्यों ?
उत्तर :- सौ बातन की एक बात :- संसार में प्रत्येक जीव यहां तक कि पशु पक्षी, पेड़ पौधे कीड़े मकोड़े भी एक दुसरे को रिझाने में ही व्यस्त रहते हैं ।
आजकल बहुत कम मनुष्य ऐसे हैं जो संसार की परवाह न करके भगवान और गुरू को रिझाने के लिए प्रयत्नशील है, उनके सुख के लिए प्रयत्नशील है । आश्चर्यजनक बात तो यह है कि हममें से बहुत लोग आज गुरू द्वारा तत्वज्ञान होने के बाबजूद भी संसार को भी रिझाने में व्यस्त हैं, इसलिए तो हमलोग लोकरंजन में अधिक व्यस्त रहते हैं, खास कर मैं । खैर धीरे धीरे यह आदत भी हमारी मिट ही जाएगी गुरू कृपा से । आशावादी होना चाहिए।
कोई अपने ज्ञान से लोगों को रिझाने का प्रयास करता है, कोई अपने धन ऐश्वर्य तथा वैभव से, कोई अपने बस्त्र से , कोई अपने श्रृंगार से, कोई अपने सुरीले गले तथा गायन से, कोई अपने बादन से, कोई अपने पदवी से, कोई अपने कला से , कोई अपने रूतवा से, कोई जिमखाने की अपने मांसल शरीर से, तो कोई अपने कविता से, कोई अपने शेरों शायरी से, कोई चिकनी चुपड़ी बातों से, कोई अपने रूप रंग तथा योवन से, कोई दान से, यहां तक कि कोई माता पिता के सेवा का फोटो तथा विडियो के द्वारा, कोई भाषा से, जैसे English , जहां जरूरत न हो वहां भी शुरू , तो कोई महापुरुषों की सेवा के दिखावे से हीं दुसरे को रिझाने में लगा है तो कोई अपने दीनता से, कोई अकड़ से , तो कोई अपनी गरीबी तथा लाचारी से दुसरे का सहानुभूति इकठ्ठा करने के प्रयास में लगा है । और संसार को भी यही सब पसंद है, रीझाने वाला ही पसंद है । क्योंकि हमारे स्वभाव में एकरूपता है , समानता है , यह सहज संसारिक स्वाभाविक गुण है हम साधारण जीवों का ।
लेकिन जो व्यक्ति गुप्त रूप से , गोपनीयता से भगवान और गुरू को रिझाने के प्रयास में लगा है , उसी जीव की साधना सच्ची है, भगवान और गुरू केवल उसी से खुश रहते हैं केवल उसी को प्राप्त होते हैं ।
वांकि जीवों का प्रयोजन तो संसार को हीं खुश करना , रिझाना , दुसरे का मनोरंजन करना अधिक है ।
यहां तक कि फुलो में रंग रस और खुशबू भी भंवरे को रिझाने के लिए होता है , जानवरों का शरीर खुबसूरत , मनमोहक तथा उसका गंध ( जैसे मृग के नाभी में कस्तूरी , हाथी का दांत , मोर का पंख ) अपने विपरित लिंगी साथी को रिझाने के लिए ही होता है, उसी प्रकार मनुष्यों में भी दुसरे को रिझाने की सहज वृत्ति है यह कोई दोष नहीं है ।
और भगवान को रिझाने के लिए जीव जब इसी सहज वृत्ति का उपयोग गोपनीयता के साथ करता है तब जीव भगवान को प्राप्त कर लेता है । जब तक हम लोग संसार को रिझाने में व्यस्त रहेंगे तब तक भगवान को नहीं पाया जा सकता। क्योंकि भगवान को तथा महापुरुषों को लोक रंजन एक रत्ती भी पसंद नहीं है , वो कहते हैं अगर तुम संसार को रिझाने का प्रयास करोगे तो मैं तेरी तरफ देखूंगा भी नहीं ।
इसलिए आध्यात्मिक एरिया में सफलता का मार्ग केवल एक ही है वो है एकांत साधना, गुप्त सेवा तथा आर्त पुकार ।
इस रहस्य के महत्व को हम जब तक नहीं समझेंगे, भगवान और गुरू के दृष्टि में न तो वास्तविक साधना समझी जाएगी और न असली सेवा ।
यही कारण है कि भगवान को प्यार करने वाला सच्चा प्रेमी एकांतवास को सबसे पहले प्रार्थमिकता देता है , इसलिए प्राचीन काल में अधिकतर लोग पहाड़ों में जाकर साधना करते थे और कुछ ही दिनों में दिव्य तत्व को प्राप्त कर लेते थे ।
और आज भी वास्तविक भगवद् प्रेमी एकांत वास को ही महत्वपूर्ण मानते हैं ।
हमलोग तो इतने गिरे हुए हैं कि तीर्थ स्थलों में जाकर, भगवान तथा गुरू धाम में जाकर, मंदिरों में जाकर वहां फोटू खिंचाकर , विडियो तथा रील बना कर वहां से भी संसार को हीं रिझाने में लगे रहते हैं ऐसे में भगवान और गुरू भला कैसे हमसे रिझेगें ? हद तो यह है कि आज का अधिकांश साधु सन्यासी भी पाखंडी है क्योंकि वो भी संसार को हीं रिझाने में व्यस्त हैं , कोई आग में चल रहा है , कोई माथे पर लंबी जटा बांधे घुम रहा है , कोई कांटों पर चल कर दिखा रहा है , तो कोई पानी में समाधी लगा कर लोगो को रिझाने में व्यस्त हैं और ऐसे ही पाखंडी को लोग सनातन धर्म का पर्याय मानते हैं आज, इस ठग विद्या को रिझाना नहीं कहेंगे , हां इसको ठगना कहेंगे, इसलिए इसे ठीक नहीं कह सकते ।
हां कुछ लोग अपवाद है जो अपने ज्ञान का उपयोग दुसरे को भी सन्मार्ग पर प्रेरित करने के लिए करते हैं वो भी निस्वार्थ भाव से । लेकिन उनकी संख्या आज बहुत कम है । क्योकि दुसरे की प्रेरणा बनने से पहले स्वयं का निर्माण बहुत आवश्यक है । प्रैक्टिकल नॉलेज होना आवश्यक है । जब प्रैक्टिकल नॉलेज होगा तो खूद के व्यवहार में सबसे पहले दिखेगा ।
कथनी और करनी में अंतर नहीं झलकेगा ।
सैद्धांतिक ज्ञान वाला प्रभावहीन होता है , तथा प्रैक्टिकल ज्ञान वाला ही प्रभावशाली।
प्रैक्टिकल ज्ञान वाला भगिरथ ही धरा धाम पर गंगा को उतार कर प्रवाहित करने में सफल होता है ।
अब कैसे पहचानें कि कौन शाब्दिक ज्ञानी है और कौन प्रैक्टिकल ज्ञानी है !
तो प्रथम लक्षण है अहंकार, शाब्दिक ज्ञानियों में अहंकार कूट कूट कर भरा होता है , जरा सा भी उसके अहंकार को चोट लगा वो क्रोधित हो जाता है , क्योंकि शाब्दिक ज्ञानी भीतर से खोखला होता है , 'थोथा चना बाजे घना' वाली कहावत ऐसे लोगों के लिए ही कहा गया है ।
शाब्दिक ज्ञानियों का दुसरा लक्षण है स्वयं को हमेशा उपर रखने और दुसरे को निचा दिखाने तथा रखने का प्रयत्न करना तथा दुसरे को निम्न मानना ।
शाब्दिक ज्ञानियो का तीसरा लक्षण है स्वगुणों का बखान करना और दुसरों का मज़ाक़ उड़ाना तथा दुसरे की भावना का निरादर करना एवं तिरस्कार करना ।
शाब्दिक ज्ञानियों का चौथा लक्षण है बोलना अधिक, सुनना कम या तो सुनना हीं नहीं किसी का ।
अत: शास्त्र कहता है :-
विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परपीड़नाय ।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतद् ज्ञानादानाय च रक्षणाय॥
यानि :- शाब्दिक ज्ञानी और दुर्जन की विद्या विवाद के लिये, धन उन्माद के लिये, और शक्ति दूसरों का दमन करने के लिये होती है। वहीं व्यवहारिक ज्ञानी अपने ज्ञान का इस्तेमाल दुसरे को सन्मार्ग दिखाने के लिए, गुप्त दान जीवों का भलाई के लिए और बल दूसरों के रक्षा के लिये उपयोग करते हैं।
अत: व्यवहारिक ज्ञानी, ( प्रैक्टिकल नॉलेज वाला ) स्वाभाविक रूप से सरल , विनम्र , दीन तथा सहिष्णु होते हैं वो हर किसी को सम्मान देते हैं, मान देते हैं और खूद को निचे रखते हैं एवं दुसरो को उपर उठाने का प्रयास करते हैं ।
श्री राधे ।:- गुरू ज्ञान से
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