Saturday, 3 February 2024

एक व्यक्ति ने जिज्ञासा कि है कि महापुरुषों को प्रथम दृष्टया कैसे पहचानें ?

एक व्यक्ति ने जिज्ञासा कि है कि महापुरुषों को प्रथम दृष्टया कैसे पहचानें ? 
यूं तो महापुरुषों को पहचानना काफी दुष्कर कार्य है , वो भी कोई अगर भाव हीन है तो और भी कठीन काम है । क्योंकि महापुरुषों के क्रिया कलाप मुद्रा , भाव भंगिमा आदि अटपटे होते हैं , समझ से परे होते हैं । उनके शरीर भेष भुषा प्राकृत तथा कार्य लोकवत दिखाई देने के बाबजूद भी अलौकिक होते हैं , दिव्य होते हैं जो आमजनों के समझ से परे होते हैं । जिस पर वो स्वयं कृपा कर दे वही जीव उनको जान सकते हैं , समझ सकता हैं ।‌ नही तो बिना कृपा के उनको पहचानना काफी कठीन कार्य है । 

फिर भी शास्त्र के अनुसार , महापुरूष के ही दृष्टि से हम उनको चार प्रकार के गुणों से प्राथमिक तौर पर कुछ कुछ पहचान सकते हैं, अनुमान लगा सकते हैं :- 

स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे।
दानप्रसङ्गो मधुरा च वाणी देवार्चनं ब्राह्मणतर्पणं च, 
श्रोत्रियम ब्रह्मनिष्टम् तथैव च ।। 

इस श्लोक में शास्त्र कहता है कि यूं तो महापुरुषों की पहचान आम व्यक्ति के लिए तो क्या स्वर्ग के देवी देवताओं के लिए भी काफी कठीन है, फिर भी उनकी पहचान 4 प्रकार के गुणों से की जा सकती है‌।

 महापुरुषों में दानशीलता, मधुर वाणी, ईश भक्ति तथा सेवा भाव की भावना एवं भक्ति मार्ग का प्रेरक, निरीक्षक, रक्षक, निडर, भगवद् भक्त के प्रति करूणा का भाव, दया का भाव, कृपा कारक तथा जीव कल्याण की भावना से ओत प्रोत तथा जो श्रोत्रिय यानि सभी शास्त्रों का शास्त्रज्ञ भी हो , अति विद्वान भी हो तथा ब्रह्मनिष्ठ यानि भगवान को प्राप्त भी कर चुके हो या स्वयं साक्षात् भगवद् स्वरूप हो , जिनमें इन 4 प्रकार के गुणों का समावेश होता है। जिन लोगों में ये 4 प्रकार के गुण स्पष्ट रूप से दिखाई दे उनका मूल्यांकन महापुरुषों की श्रेणी में किया जाता है । 

महापुरूष के कई प्रकार होते हैं । नित्य सिद्ध , साधन सिद्ध और स्वयं भगवान के अवतार महापुरूष। 

अत: यदि और भी गहराई में जाना चाहेंगे तो जिनमें अष्ट महा सात्विक भावों का उद्रेक हो , वो महापुरुष भगवान के डाईरेक्ट अवतार महापुरूष होते हैं । ये बहुत अधिक दुर्लभ होते हैं ।

जिन काल खंड में भगवान ऐसे दुर्लभ ( श्री गौरांग महाप्रभु तथा श्री कृपालु महाप्रभु जी जैसे ) महापुरूष के रूप अवतार लेकर जीव कल्याण के लिए धरा धाम पर आते हैं तो उसी कालखंड में हजारों जन्मों से प्रतीक्षारत परम भाग्यशाली जीव भी मनुष्य के शरीर में उनकी हीं कृपा से जन्म लेते हैं जिस पर वो कृपा करते हैं और गुरू बन कर वो उन जीवों को प्राप्त होते हैं, स्वयं उसका मार्ग दर्शन करते हैं और साधना सेवा आदि करवाते हैं । 
ऐसे जीव अति शौभाग्यशाली होते हैं जिनके जीवन काल में भगवान स्वयं महापुरूष रूप में , गुरू रूप में अवतार लेकर धरा धाम पर आते हैं और अपनी कृपा के फलस्वरूप उनको प्राप्त होते हैं । बिना हरि कृपा के ऐसे अवतारी दुर्लभ महापुरूष का मिलना असंभव है । 
विभिषण जी ने स्वयं कहा हनुमान जी से प्रथम भेंट में श्रीलंका में :- 
"अब मोहि भा भरोस हनुमंता,
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहीं संता ।।"
बिना‌ हरि कृपा के ऐसे दुर्लभ महापुरूष मिलना असंभव है । 
अत: हमें स्वयं को बहुत गौरवान्वित महसूस करना चाहिए कि हम श्री कृपालुजी महाराज के अवतार काल में न केवल जन्म लिए वल्कि उनकी अनुकंपा से उनको गुरू रूप में प्राप्त भी किए । इस प्रकार हमलोग भगवान को प्राप्त कर चुके हैं, देख चुके हैं , उनको छु चुके हैं , उनसे बातें की , उनकी वाणी सुनी । अब जरूरत है केवल सौ प्रतिशत रियलाईजेशन की और निष्काम सेवा वासना बढ़ाने की , रो रो कर उनसे उनके दिव्य लोक में उनकी दिव्य सेवा प्राप्त करना अंतिम लक्ष्य है अब । 
श्री राधे ।
:- श्री महाराज जी से प्राप्त तत्वज्ञान के आधार पर ।

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